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Sep 1, 2025

कहानीः कैक्टस के फूल

  -  डॉ. दीक्षा चौबे

रश्मि अपनी बालकनी में खड़ी आसमान के बदलते रंगों को निहार रही थी । सूरज दिन भर का थका हारा शनैः - शनैः क्षितिज की ओर बढ़ रहा था । किरणों की प्रखरता मंद पड़ गई थी और अपनी लालिमा से विविध प्रकार की कलाकृतियाँ सिरजती जा रहीं थीं । उसका लाल-नारंगी रंग आसमानी साड़ी के चौड़े बार्डर की तरह खूबसूरत दिखाई दे रहा था । यह सूरज सिर्फ अनंत ऊर्जा का ही नहीं संसार के लिए प्रेरणा का भी अक्षय-पुंज है । एक सजग कर्मठ कर्मचारी की तरह नित्य अपने समय पर उगना और नित्य ही अपना अवसान देखना , अँधेरों से रोज लड़ना और अपने अस्तित्व को सार्थक सिद्ध करना क्या कोई आसान बात है। हम मनुष्य तो जीवन का एक अवसान सहन नहीं कर पाते, मुश्किल घड़ी आई नहीं कि उससे घबरा कर हार मान लेते हैं । रश्मि की नजरें आसमानी रंगोली से हटकर अपनी बालकनी की शोभा बढ़ाने वाली छोटी-सी बगिया पर टिक गईं थीं ।

       रश्मि सोच में डूब गई थी ..राजीव जब भी बालकनी में आते हैं एक बार जरूर मुझे जरूर टोकते हैं - "ये क्या कैक्टस लगा रखे हैं तुमने...सिर्फ काँटे ही काँटे... इन्हें फेंकती क्यों नहीं हो । घर शिफ्ट करते वक्त ही कहा था मैंने,  इन्हें वहीं छोड़ दो; पर नहीं, तुम तो किसी की बात मानती नहीं  ..ले ही आई । ऐसे भी इस घर में कितनी कम जगह है, उस पर तुम्हारे ये कैक्टस।"  

   अरे ! कितने अच्छे तो लगते हैं ये, फिर इन्हें पानी खाद या किसी विशेष देखभाल की आवश्यकता नहीं होती । मरुस्थल में पड़े उपेक्षित रहने वाले ये कैक्टस कितने जीवट होते हैं। मेरे जैसे लापरवाह माली के लिए यही ठीक हैं । जैसे जीवन में सुख तभी महत्त्वपूर्ण होते हैं जब दुःख का एहसास कर लिया जाये वैसे ही फूलों के साथ काँटों को भी रखना चाहिए। "सब दिन होत न एक समान" हमें जीवन के हर पहलू के लिए तैयार रहना चाहिए । जीवन की विषमताओं को सहन कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं ये कैक्टस और जनाब ! जब इन कंटीले कैक्टस के फूल देखोगे न तुम ..तो दाँतों तले उँगलियाँ दबा लोगे। इतने खूबसूरत होते हैं ये ..अपनी हथेलियों को अपने सिर के ऊपर तक फैलाते हुए रश्मि ने कहा तो राजीव हँस पड़ा । "तुम और तुम्हारी ग्रेट फिलॉसफी" ..मैंने तो देखे नहीं कभी तुम्हारे इन कैक्टस को खिलते हुए । मुझसे तो दूर ही रखो इन्हें , डर लगता है मुझे इनके काँटों से  ..राजीव ने मुँह बनाते हुए कहा तो उसकी अदा पर रश्मि भी हँस पड़ी । राजीव और रश्मि की शादी को  लगभग आठ वर्ष होने को आए हैं ।  रश्मि को राजीव ने पहली बार अपने भैया की शादी में देखा था ।  दिखने में आकर्षक तो वह थी ही, बातचीत में भी कुशल थी । भाभी की चचेरी बहन होने के कारण और भी कई कार्यक्रमों में उससे मुलाकात हुई । परिवार भी ठीक था इसलिए राजीव की  चाहत जाहिर करते ही दोनों परिवार के बड़ों को रिश्ता मंजूर हो गया और दोनों का विवाह हो गया ।

      रश्मि राजीव के बीच बहुत अच्छा सामंजस्य है । बहुत ही सुघड़ता से रश्मि ने अपनी गृहस्थी को सजा रखा है; पर कहते हैं न कि हर किसी के जीवन में कोई न कोई कमी जरूर होती है । उनके आँगन में किसी फूल का न खिलना उन्हें कभी - कभी बहुत दुखी कर देता है । पर वे दोनों इस कारण को अपने बीच की दीवार नहीं बनाते बल्कि यह उन्हें एक- दूसरे के अधिक करीब लाता है । वे दोनों अन्य बातों में खुशी ढूँढने का प्रयास करते हैं और खुश व व्यस्त रहते हैं । शादी के तीन- चार वर्ष घर पर रहने के बाद इसी वजह से राजीव ने जिद करके उसे पास के ही  एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका के रूप में  ज्वाइन करवा दिया, ताकि वह हमेशा व्यस्त रहे और अपनी उच्च शिक्षा का सदुपयोग भी कर सके ।

    सास - ससुर व अन्य रिश्तेदारों के साथ भी उसके मधुर सम्बन्ध हैं । हर त्योहार वे परिवार के साथ ही गाँव जाकर मनाते हैं और फिर अपनी नौकरी में वापस आ जाते हैं । गाँव में भी वह कोई न कोई सृजनात्मक कार्य करती रहती है, तो बोर नहीं होती पर कुछ दिन वहाँ रहकर आने के बाद उसे बहुत  सूनापन महसूस होता है; क्योंकि वहाँ शायद सबके पूछने पर कि कुछ खुशखबरी है तो नहीं , तुम लोग बच्चे का मुख कब दिखाओगे, कोई कमी है क्या, कुछ इलाज क्यों नहीं कराते तुम लोग, ध्यान दो अब समय निकलने लगा है... जैसे कई सुझाव और सवाल उसके मन को छलनी कर देते हैं । जीवन की जिस कमी के बारे में वे सोचते भी नहीं, घर जाने पर नाते - रिश्तेदार  सभी उसके बारे में ही बात करते हैं ।  इस मामले में  उसके शहर  के लोग अच्छे हैं, जिन्हें किसी के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं है । भले  ही यह आदत उन्हें असामाजिक बना देती है, लोग अपने  पड़ोसी  को भी नहीं पहचानते । जितना बड़ा शहर उनके दायरे भी उतने ही सीमित, गाँवों में तो लोगों को हर घर के एक - एक सदस्य की जानकारी रहती है; इसलिए हर छोटी बात पर फुसफुसाहट शुरू हो जाती है ।

   रश्मि शाम को स्कूल  से आकर थोड़ा आराम कर बालकनी में आ जाती है । उसने जो छोटी सी बगिया लगाई है , उसकी साज - सँवार करती है । उसके घर के पास ही एक बड़ा- सा मैदान है जिसमें बच्चे खेलते रहते हैं, वह अपना काम करके उन्हें देखती रहती है । उत्साह से भरे मासूम चेहरे ...कभी लड़ते झगड़ते तो कभी हँसते-  मुस्कुराते । क्रिकेट खेलते हुए कई बार उनकी गेंद उसकी बालकनी में आ जाती है तो उनकी प्यार भरी मनुहार रश्मि को स्नेहसिक्त कर देती है । "आंटी बॉल दीजिए न  " जब तक दो - चार मनुहारें नहीं आ जाती  वह चुपचाप अपने काम में लगी रहती है फिर मुस्कुरा कर धीरे से बॉल फेंक देती है । जब वे खुश होकर "थैंक्यू आंटी" कहते हैं, वह पुलकित हो उठती है किसी बच्चे की तरह मानो वह भी उनके खेल का हिस्सा हो । 

    वह पल उसे बचपन की स्मृतियों में ले जाता है और याद आता है पीहर का आँगन । कितनी खिलंदड़ी थी वह भी । शाम को स्कूल से आने के बाद खेलने के लिए बाहर निकलती थी तो वापस जाने का नाम ही नहीं लेती । मम्मी ही आकर डाँट- डपटकर घर ले जाती । दीदी का स्वभाव उससे बिल्कुल अलग था, वह तो घर से बाहर निकलना ही पसन्द नहीं करती । दिन भर घर में ही घुसी रहती। दीदी को पढ़ाई, घर के कामों में दिलचस्पी थी। रश्मि को घर का कोई काम करना न आता, उसको बाहर घूमना, खेलना-कूदना, दोस्तों के साथ मस्ती करना ही भाता था। माँ बड़बड़ाते रहती - दो बच्चे दोनों दो विपरीत दिशा में भागती हैं, मैं किसके पीछे भागूँ।

    वक्त कैसा भी हो रुकता नहीं है । साल दर साल बीतते गए । अब तो सभी सलाह देने लगे थे कि एक बच्चा गोद ले लो । कितने ही बच्चे अनाथालय में पलते एक घर की आस पाले रहते हैं, उन्हें घर-परिवार मिल जाएगा ।  उसने राजीव से भी यह बात कही पर वे कोई निर्णय नहीं ले पा रहे थे । बच्चा गोद लेकर उसका पालन - पोषण  कर वे अपनी जिंदगी सार्थक बना  सकते  हैं पर क्या जीने की सिर्फ यही राह है? 

    राजीव संजीवनी फाउंडेशन से जुड़ा हुआ था । एक बार उनके इवेंट में  रश्मि भी गई थी वृद्धाश्रम । वहाँ वे लगभग तीन घण्टे रहे, बुजुर्गों के साथ बातें की, उनके साथ  कुछ वक्त बिताकर उन्हें अकेलेपन के अँधेरों से बाहर निकालने की कोशिश की। वहाँ से लौटते वक्त उन बुजुर्गों के मुसकुराते चेहरों के साथ ढेर सारा स्नेह व आशीर्वाद भी वे अपने दामन में समेटकर ले आए थे।

     उस दिन की घटना ने विचलित कर दिया था रश्मि को। उसके स्टाफ के किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो गई थी । उनके बेटे अमेरिका में रहते थे, मुखाग्नि देने भी नहीं पहुँच पाए । अड़ोस - पड़ोस के लोगों और दूर के रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार किया । जीवन का अंतिम सत्य यही है, तो बच्चे के होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है । बच्चे को जन्म देने और उसका पालन - पोषण करने में ही क्या जीवन की सार्थकता है? जिंदगी को इतनी छोटी परिधि में सीमित क्यों रखना? अपनी ममता को एक बच्चे  के पालन - पोषण तक ही सीमित न रखकर उसे वृहद् आकाश भी तो दे सकते हैं । बहुत  दिनों से दुविधा में फँसा मन आज निर्णय ले सका था । अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए अपनी सेवा वह अनाथालय और वृद्धाश्रम को भी दे सकती है, अपनी सुविधानुसार । बिना किसी बंधन , बिना शर्त जीवन जीना चाहिए,  न  कि  किसी रिश्ते में बँधकर  इसे  मजबूरी में निभाना । उसने अपना विचार राजीव को  बताया तो वह भी बहुत खुश हुआ । उसने महसूस किया  उसकी बालकनी  के कैक्टस में ढेर सारे  फूल खिल आये  हैं । ■

सम्पर्कः HIG 1 /33 आदित्यनगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़- 491001, फोन 9424132359

प्रेरकः अच्छे पॉइंट्स

सौ साल से भी पहले सं. रा. अमेरिका के महान उद्योगपति जॉन डी. रॉकफ़ेलर के स्वामित्व में स्टैंडर्ड ऑइल कंपनी विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक थी।  एक दिन कंपनी में काम करनेवाले एक कर्मचारी ने एक गलत निर्णय ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप कंपनी को 20 लाख डॉलर का घाटा हो गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में यह बहुत बड़ी रकम थी।

एडवर्ड बेडफ़ोर्ड इस कंपनी में पार्टनर थे। वे रॉकफ़ेलर से मिलने के लिए गए. रॉकफ़ेलर के ऑफ़िस में दाखिल होने पर उन्होंने देखा कि रॉकफ़ेलर टेबल पर झुके हुए एक पेपर पर कुछ लिखने में व्यस्त थे। बेडफ़ोर्ड को देखने पर रॉकफ़ेलर ने उनसे कहा, “तुम्हें कंपनी को हुए नुकसान के बारे में तो पता ही होगा? मैं भी इसी बारे में सोच रहा था, इसीलिए मैं उस कर्मचारी से मिलकर बात करने से पहले कुछ नोट्स बना रहा हूँ।”

बेडफ़ोर्ड ने टेबल पर रखे पेपर पर एक निगाह डाली, जिसपर रॉकफ़ेलर नें नोट्स लिखे थे। पेपर के सबसे ऊपर शीर्षक लिखा था, “मिस्टर … के पक्ष में पॉइंट्स” इसके नीचे उस कर्मचारी के गुणों की लंबी लिस्ट थी और यह भी लिखा था कि पहले तीन मौकों पर उसके द्वारा लिए गए निर्णयों से कंपनी को हालिया नुकसान से भी कई गुना लाभ हुआ था।

बेडफ़ोर्ड ने बाद में कहा, “यह सबक मैं कभी नहीं भूल सकता। बाद में कभी जब मुझे किसी व्यक्ति की गलती पर भरपूर क्रोध करने का अवसर मिला, तो मैंने कुछ देर भलीभांति सोचविचार के उसकी सारी अच्छी बातों की ओर ध्यान दिया। इसका परिणाम हर बार यही हुआ कि उसकी अच्छाइयों की लिस्ट बनाते-बनाते मुझे सारी चीजें स्पष्ट दिखने लगीं और मेरा क्रोध कम हो गया। इस आदत ने न जाने कितनी ही बार मुझे किसी भी एक्ज़ीक्यूटिव द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी गलती करने से बचा लिया, ये गलती है ‘अपना आपा खोना’। ( हिन्दी जे़न से) ■

लघुकथाः धमाका

  -  प्रगति गुप्ता

हकते हुए प्रवेश करने वाली दयाजी आज कुछ ज्यादा ही चुप थीं। उन्होंने किसी के गुड मॉर्निंग का जवाब नहीं दिया। उनका व्यवहार मौजूद महिलाओं और थेरेपिस्ट के लिए अप्रत्याशित था। दया जी पिछले आठ महीनों से कमर-दर्द के निदान हेतु सेंटर आ रही थीं। थेरेपिस्ट डॉ. वेद ने उनसे पूछ लिया- “दया जी आर यू ऑल राइट?”

जवाब न मिलने पर वेद थेरेपी शुरू करने के उद्देश्य से उनके निकट पहुँचा। अकस्मात दयाजी की तेज आवाज हॉल में गूँज उठी-"डॉक्टर! मेरे पति कहते हैं- तुमने थेरेपी के नाम पर डेढ़ लाख रुपये को आग लगा दी।...  दर्द में रत्ती भर भी फर्क नहीं!... वहाँ गप्पे हाँकने जाती हो या...?... मर जाती तो फूँकने के बाद, कुछ दिन रोना होता... कम से कम फिर शांति तो रहती।"

दया जी अब फफक कर रो पड़ी। सुई पटक सन्नाटा छा गया। उसने दया जी को समझाने की कोशिश की-"दया जी! फिजियोथेरेपी से कभी जल्दी तो कभी देर से तकलीफ़ का समाधान होता है। आप भी ठीक...!"

अभी वेद की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि दया जी फट पड़ी- “मैं समझती हूँ डॉक्टर! मगर रुपयों को दाँत से पकड़ने वाला मेरा पति...। घर बनाने में लगी हुई मेरी मेहनत की कीमत अगर मृत्यु है, तो क्या फर्क पड़ता है। शरीर दर्द के साथ जलाया जाए या दर्द के बगैर!”

अब पसरा हुआ सन्नाटा, और भी घना हो गया था। कुछ महिलाएँ दया जी को शांत करने में जुट गईं। परिवार के लिए समर्पित महिला की पीड़ा ने वेद को भी भावुक कर दिया। 

कुछ देर बाद खुद को संयत कर दया जी ने कहा- “ सॉरी!... मेरी वजह से सभी की थेरेपी रुक गई है।... मुझे अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।  आज शारीरिक और मानसिक दर्द आपस में कुछ ज्यादा ही जोर से टकरा गए कि धमाका हो गया।”

अब दया जी सामान्य होने की कोशिश में लगी थीं।  ■

किताबेंः अधूरी मूर्तियों का क्रंदन: एक संवेदनात्मक पड़ताल

 -  पूनम चौधरी

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन (कहानी -संग्रह ) : सुदर्शन रत्नाकर, प्रथम संस्करण: 2025, मूल्य:  ₹ 380 ,  पृष्ठ:-136,  अयन प्रकाशन,  जे 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

सुदर्शन रत्नाकरजी का कहानी -संग्रह ‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ साहित्य में अपनी संवेदनात्मक गहनता, प्रतीकात्मक शिल्प और दार्शनिक अंतर्दृष्टि के कारण विशेष महत्व रखता है। यह केवल कहानियों का संग्रह नहीं; बल्कि जीवन की विद्रूपता और विसंगतियों के साथ, जिजीविषा और मानवीय आकांक्षाओं की करुण परिणति का गहन साहित्यिक प्रतिरूप है। संग्रह का शीर्षक अपने आप में इतना सशक्त और प्रतीकात्मक है कि सम्पूर्ण रचना-समुच्चय की आत्मा को उद्घाटित करता है। अधूरी मूर्तियाँ मात्र पाषाण की टूटी काया नहीं, अपितु जीवन की अधूरी इच्छाओं, अपूर्ण आकांक्षाओं और म्लान स्वप्नों का दर्पण हैं। उनका क्रंदन मनुष्य की आत्मा का वह मौन स्वर है, जो कभी मुखर नहीं हो पाता, परंतु निरंतर अंतर्मन में गुंजायमान रहता है।

‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ शीर्षक केवल शाब्दिक अर्थ में टूटे हुए शिल्पों का विलाप नहीं है; बल्कि यह उन समस्त मनुष्यों के अनुभवों और मानसिक द्वंद्वों का रूपक है, जहाँ व्यक्ति चाह कर भी अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाता। समुद्र की अनंत लहरों के बीच अधूरी पड़ी मूर्तियों का क्रन्दन न केवल समय की विडंबना है; बल्कि मनुष्य के असंतोष, असफलताओं और अपूर्णता का भी मार्मिक प्रतीक है। इस प्रकार शीर्षक में संग्रह की आत्मा निहित है, जो न केवल भावनात्मक मार्मिकता; बल्कि गहन दार्शनिक दृष्टि को भी प्रकट करता है।

 संग्रह में कुल 15 कहानियाँ हैं, जो अपने-अपने स्तर पर मानवीय जीवन के विविध पक्षों का उद्घाटन करती हैं। कहानियाँ केवल घटनाओं का विवरण नहीं देतीं; बल्कि पाठक को पात्रों के मानसिक संसार में प्रवेश कराती हैं। प्रत्येक कहानी में पात्रों की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा इस प्रकार चित्रित है कि पाठक स्वयं उनके जीवन का सहभागी प्रतीत होता है।

संग्रह की भूमिका स्वयं लेखिका की आंतरिक दृष्टि को उद्घाटित करती है। इसमें स्पष्ट है कि रचना केवल कला का साधन नहीं; बल्कि जीवन के अनुभवों और संवेदनाओं का सूक्ष्म चित्रण है। लेखिका ने यह स्पष्ट किया है कि वह जीवन की कठिनाइयों, पीड़ा और असफलताओं को मात्र उद्घाटित नहीं करती, बल्कि उनके भीतर से उत्पन्न आशा, साहस और जीवन के प्रति जिजीविषा को भी उन्होंने पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। भाषा की सहजता, प्रवाह और भावनाओं की शुद्धता भूमिका को पठनीयता और अनुभवात्मकता का गहन स्तर प्रदान करती है। सुदर्शन रत्नाकर की लेखनी का यह प्रारंभिक वक्तव्य मात्र भूमिका न होकर, उनके रचना-संसार का आत्मस्वर है। यहाँ लेखिका ने अपने सृजन की प्रक्रिया को अत्यंत आत्मीयता और संवेदनशीलता के साथ उजागर किया है। वे स्पष्ट करती हैं कि लेखन केवल दृष्टिगोचर जगत की पुनर्रचना नहीं; बल्कि अंतःकरण से अनुभव किए गए दुःख–सुख, वेदना–संघर्ष और जीवन के विविध रंगों का साक्षात्कार है।

लेखिका की दृष्टि में सृजन वह यात्रा है, जिसमें आँखें, हृदय और बुद्धि एकाकार होकर नया संसार रचती हैं। वे मानती हैं कि लेखक अपने पात्रों के साथ जीता है, उनसे वार्तालाप करता है और उन्हें आत्मसात करके शब्दों में उतारता है। इसी कारण उनकी रचनाएँ जीवन की सच्चाइयों से गहराई से जुड़ जाती हैं और पाठक के हृदय तक पहुँचकर उसकी संवेदना को स्पंदित करती हैं।

इस भूमिका में एक अत्यंत मार्मिक उद्घोष है—“लेखन का अंत नहीं होगा; क्योंकि उसके बिना मेरा जीवन निःसार है।” यह कथन लेखिका की लेखनी और जीवन के बीच के गहरे संबंध को प्रकट करता है। उनके लिए लेखन केवल एक अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ जीवन की जटिलताओं से जूझते हुए भी सकारात्मकता और जिजीविषा का संचार करती हैं।

‘अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ शीर्षक से ही यह संकेत मिलता है कि ये कहानियाँ अधूरेपन, वेदना और संघर्ष से उपजी संवेदनाओं को मुखर करती हैं। किंतु यह अपूर्णता नकारात्मकता की नहीं बल्कि उस सतत अन्वेषण का प्रतीक है, जो जीवन को गतिमान और रचनाशील बनाए रखता है।

भूमिका की भाषा सरल होते हुए भी मार्मिक है और उसकी संवेदनाएँ इतनी प्रामाणिक हैं कि पाठक अनायास ही लेखिका के आत्मसंवाद का सहभागी बन जाता है। यह भूमिका वस्तुतः उस धड़कन के समान है, जो संपूर्ण संग्रह को जीवंत कर देती है और पाठक को आगामी कहानियों के प्रति गहन उत्सुकता से भर देती है।

इस संग्रह की पंद्रह कहानियाँ जीवन की विविध स्थितियों, मानवीय संबंधों की जटिलताओं और स्त्री–मन की गहन संवेदनाओं को मार्मिक रूप में अभिव्यक्त करती हैं। प्रत्येक कहानी अपनी विशिष्टता रखती है; किंतु कुछ रचनाएँ विशेष रूप से हृदय में गहरी छाप छोड़ती हैं। 

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन’ कहानी-संग्रह की शीर्षक कहानी है। लेखिका ने स्त्री जीवन के अधूरेपन और उसकी मौन वेदना को जिस करुण स्वर में प्रस्तुत किया गया है, वह पाठक को भीतर तक विचलित कर देता है।

यह कहानी मानवीय संबंधों के अधूरेपन और स्त्री-जीवन की पीड़ा को उजागर करती है। अंशुला के जीवन के माध्यम से लेखिका ने दिखाया है कि एक स्त्री अपने कर्तव्यों, रिश्तों और सामाजिक बंधनों में उलझकर अपने सपनों और आकांक्षाओं को अधूरा छोड़ देती है। उसका व्यक्तित्व एक ऐसी मूर्ति की तरह है, जो आकार तो लेती है पर कभी पूर्णता तक नहीं पहुँच पाती। कथ्य का उद्देश्य नारी जीवन की विडंबना को सामने लाना और पाठक को यह सोचने पर विवश करना है कि क्यों स्त्री की इच्छाएँ बार-बार दबा दी जाती हैं। शिल्प की दृष्टि से कहानी प्रवाहमयी और आत्मीय है, जिसमें वर्णन और संवाद दोनों का संतुलित प्रयोग हुआ है। बिंब और प्रतीकों—विशेषकर ‘अधूरी मूर्ति’ और ‘क्रंदन’—ने कथा को गहन भावुकता और गहराई दी है। यह रचना अपने उद्देश्य, संवेदना और सहज शैली के कारण पाठक को भीतर तक छू जाती है।

‘अकेलेपन का दंश’  कहानी मानव-जीवन की उस शाश्वत समस्या को उद्घाटित करती है, जहाँ बाहरी स्वतंत्रता के होते हुए भी आंतरिक स्तर पर मनुष्य बंधनों में जकड़ा रहता है। समुद्र की मुक्त लहरों में तैरती मछलियाँ स्वतंत्रता और पूर्णता का प्रतीक हैं, किंतु जब वही मछलियाँ एक्वेरियम की सीमाओं में कैद हो जाती हैं, तो उनका अस्तित्व मात्र शारीरिक होता है, आत्मिक नहीं। यह रूपक मनुष्य की स्थिति का सटीक चित्रण करता है- सामाजिक नियम, पारिवारिक बंधन और मानसिक सीमाएँ हमें बाहरी स्वतंत्रता के बावजूद भीतर से कैद कर देती हैं। कहानी का संदेश स्पष्ट है कि वास्तविक स्वतंत्रता मानसिक और आत्मिक मुक्ति में निहित है।

‘बस एक बार’ कथा व्यक्तिगत संबंधों और सामाजिक कठोरताओं की गहरी पड़ताल करती है। विवाह से पूर्व हुए एसिड-अटैक और मंगेतर के पलायन का प्रसंग मानवीय संवेदनाओं की भीषण परीक्षा है। मुख्य पात्र की मन की चीखें केवल व्यक्तिगत शोक का द्योतक नहीं, बल्कि समाज की असंवेदनशीलता और स्त्री की असुरक्षा का भी उद्घाटन हैं। यहाँ लेखिका यह प्रतिपादित करती हैं कि जीवन केवल बाहरी सौंदर्य या सामाजिक मान्यताओं पर आधारित नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदना और आत्मिक जुड़ाव ही संबंधों का वास्तविक आधार है। यह कथा पाठक को भीतर तक झकझोर देती है और समाज की क्रूर विडंबनाओं पर गहन प्रश्नचिह्न लगाती है।

‘वह हारा नहीं’ कहानी संघर्ष और साहस की अनूठी अभिव्यक्ति है। विपरीत परिस्थितियों, सामाजिक दबाव और अप्रत्याशित घटनाओं के बीच नायक का आत्मबल और धैर्य ही उसे जीवन में विजय की ओर अग्रसर करता है। यहाँ लेखिका यह स्पष्ट करती हैं कि बाहरी हार ही वास्तविक पराजय नहीं होती; पराजय तब होती है जब मनुष्य का आत्मबल टूट जाता है। यह कथा पाठक के भीतर छिपी जिजीविषा को जगाती है और संदेश देती है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, साहस और आत्मविश्वास ही मनुष्य को जीवन-पथ पर अग्रसर करते हैं।

 संग्रह की अन्य कहानियाँ दिद्दा, केंचुली,बेजी, मैं लड़ूँगी दारजी, नेगी अंकल, वह लौट आया आदि भी अपनी संवेदनात्मक शक्ति और कथ्य की विविधता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं, समग्रतः यह कहानी–संग्रह जीवन की अनकही पीड़ाओं और आशाओं का संवेदनशील दस्तावेज़ है।

लेखिका की भाषा सहज, प्रवाही और मार्मिक है। इसमें न तो कृत्रिम अलंकरण का बोझ है और न ही दुरूहता का आग्रह। भावों की शुद्धता और शब्दों की सादगी मिलकर एक ऐसा वातावरण रचती है, जहाँ पाठक सहज ही पात्रों की संवेदनाओं से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। संग्रह की कहानियों में संवाद, वर्णन और वातावरण—तीनों का संतुलित उपयोग हुआ है, जो कथानक को जीवंत और प्रभावशाली बनाता है।

 कहानियाँ केवल व्यक्तिगत पीड़ा और मानसिक संघर्ष तक सीमित नहीं है; इसमें समाज की असमानताओं, विडंबनाओं और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण है। संबंधों की जटिलता, सामाजिक अपेक्षाएँ, आर्थिक विषमताएँ- ये सब संग्रह की कहानियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हैं।

कहानियाँ वास्तविकता के उद्घाटन के साथ साथ उनके भीतर छिपी आशा, सहानुभूति और जिजीविषा की अभिव्यक्ति भी करती हैं। यही कारण है कि इन कहानियों को पढ़ते हुए पाठक निराशा नहीं होता बल्कि जीवन की कठिनताओं से जूझने का साहस पाता है। यह द्वंद्वात्मक दृष्टि ही संग्रह को संवेदनशीलता के साथ-साथ दर्शनिकता भी प्रदान करती है।

भाषा की सहजता, शिल्पगत संतुलन, प्रतीकात्मकता और मार्मिकता के कारण यह संग्रह हिंदी कथा-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण और अविस्मरणीय योगदान सिद्ध होगा। यह न केवल पठनीय है; बल्कि अनुभवजन्य और चिंतन-प्रेरक भी है।

अधूरी मूर्तियों का क्रंदन पाठक को जीवन की कठिनताओं और विसंगतियाँ से अवगत कराते हुए उसे संवेदनशील और जागरूक बनाता है। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है कि यह पाठक के मन, मस्तिष्क और हृदय पर गहरा व स्थायी प्रभाव छोड़ता है। ■

चुनिंदा शेरः सुख जल्दी उड़ जाते

   - हस्तीमल हस्ती 

1

काँटों को लंबी जिंदगी, फूलों को चंद साँस।

क्या-क्या निराले खेल हैं, परवरदिगार के।

2

सुख से अपनी भेंट रही यूँ, जैसे चलती गाड़ी में।

प्यारी सूरत दिखकर कोई, हो ओझल बाबा।

3

यूँ अपना किरदार रहे, दुख दर्द हो या संताप कोई

बच्चों को कंधों पर लादे, घूमे जैसे बाप कोई

4.

आने को तो दोनों आते हैं जीवन की मुँडेरों पर ।

दु:ख अरसे तक बैठे रहते, सुख जल्दी उड़ जाते हैं।