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Jul 1, 2025

कविताः तोते

  - हरभगवान चावला

तोते पानी से भरे तालाब ढूँढ रहे हैं

कि तालाब के ऊपर से उड़ान भर सकें

तोते अमरूद के बाग़ ढूँढ रहे हैं

कि उन्हें पसंद हैं लाल गूदेदार अमरूद

तोते नीम के पेड़ ढूँढ रहे हैं

कि तपती दोपहरी में उन पर सुस्ता सकें

तोते बमों के धमाकों और बारूद की गंध से

डरे और चीख़ते हुए सब तरफ़ उड़ रहे हैं

वे ख़ुद गवाह हैं -

यहीं इसी दुनिया में हुआ करते थे

पानी से भरे तालाब

अमरूद के बाग़

और नीम के पेड़

बदहवास तोते अब बिजली के खंभों से

और इमारतों से टकराते हैं लगातार

तोते अब तेज़ी से कम हो रहे हैं दुनिया में।


दो लघुकथाएँः

 - सन्तोष सुपेकर

1. उसके मरने के बाद

“क्या हुआ? ये हल्ला  कैसा है?” मोहल्ले में घुसते हुए मैंने भीड़ लगी देखी, तो  आशंकित होकर पड़ोसी अनूप से पूछा।

  “आपको नहीं पता?” वह धीरे से बोला, “बी ब्लॉक वाले  शशधर जी की लड़की मर गयी! जवान लड़की!”

    “शशधर जी की लड़की?”  कुछ याद करता हुआ बोला मैं, “वो  न…नम्रता! पर  कैसे?”

“पता नहीं, बता रहे हैं कि घूमने गयी थी नैनीताल । वहाँ होटल में गलती से एसिड की बोतल पी ली।”

“एसिड की बोतल!  होटल में एसिड की बोतल कौन लाया होगा?”

  “पता नहीं।” दूसरे पड़ोसी अमन बोले, “अरे, मुझे तो लगता है, सुसाइड किया होगा।”

“पता नहीं, पर मुझे तो लगता है, किसी ने मारा होगा। आजकल लीव- इन.. बहुत चल रहा है।”

“पता नहीं क्या हुआ,; पर हो सकता है पहले कोई मोलस्टेशन, टॉर्चर की घटना हुई हो, फिर किसी ने मार दिया हो।”

   “क्लीयर पता तो नहीं, पर हो सकता है- मारा कहीं और हो, बॉडी वहाँ डम्प की हो….. “क्राइम पेट्रोल सीरियल का एक नियमित दर्शक बोला।

और इस तरह बातों का कलाइडॉस्कोप  घूमता रहा।

  “पता नहीं, सही बात क्या है? “मैंने भी सबकी तरह बात के आगे ‘पता नहीं’ जोड़ते हुए धीरे से कहा, “लेकिन एक तथ्य तो पता है- कोई जवान लड़की जब अचानक मर जाती है, तो उसकी मृत्यु के अनेक कारणों के जन्म होने लगते है।”

2.  फुलस्टॉप

टीवी सीरियल के सेट पर सीरियल की नायिका नेहा , आज बहुत तनाव में थी, मेकअप रूम में  उसे घबराहट  सी होने लगी थी। सेट पर भी वह  बेचैनी से बार बार अपने नाखून चबा रही थी , पसीना पोंछ रही थी, टीम के सदस्यों से अनमनेपन से बात कर रही थी, चोर नज़रों से चारों ओर देख रही थी।

आज के शॉट में उसे सीरियल के नायक, अजय को थप्पड़ मारने थे। मीडिया में उसके और अजय के बारे में चल रही तरह -तरह  की अफवाहों से वह व्यथित थी।  कल पति की  कही बात उसके कानों में गूँज रही थी , मनीष ने कहा था कि वह जानता है कि जो  बातें  बाहर चल रही हैं वो वास्तविक नहीं है पर आज वाला शॉट वास्तविक होना चाहिए, तभी वह मानेगा कि नेहा के मन में अजय के लिए 'कुछ' नहीं है। आज  सेट पर  मनीष भी साथ आया था और शायद उसकी हर गतिविधि नोट कर रहा था।

मन मे उथल- पुथल मचा रही उलझनों को आखिर नेहा ने विराम दे ही दिया। कड़ा फैसला लेते हुए उसने शॉट के मुताबिक सीरियल के नायक को कसकर, पूरी ताकत से दो थप्पड़ मारे। एक ही बार मे शॉट ओके हो गया।

देखकर सारा शूटिंग स्टाफ हक्का बक्का रह गया, सिवाय नेहा के पति के।

नेहा को दुख था कि उसके थप्पड़ों से हतप्रभ,  नायक अजय लड़खड़ा गया ,पर खुश भी थी कि उसका रिश्ता सँभल गया था।

सम्पर्कः  31, सुदामा नगर, आगर रोड़, उज्जैन, मो. 942481609

किताबेंः ‘तुम हो मुझमें’ नवगीतों की आत्मीय यात्रा

  - पूनम चौधरी

पुस्तकः तुम हो मुझमें (नवगीत-संग्रह) : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, वर्ष 2023, पृष्ठ: 144, मूल्य: 400 रुपये, आईएसबीएन-978-93-94221-73-4, अयन प्रकाशन, जे-19 / 39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

कविता आत्मा का नाद है- वह आवाज है, जो काल की सीमाओं से परे, अनुभूतियों के सबसे कोमल हिस्सों को स्पर्श करती है। जब कविता केवल अभिव्यक्ति नहीं, आत्मा की तापमयी यात्रा बन जाती है और नवगीत केवल लय नहीं,; बल्कि जीवन के धूप-छाँव में सुलगते सचों की अनुभूति बनकर पाठक के अंतस्तल में उतरने लगते हैं, तब वह सृजन एक साधना का रूप ले लेता है। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का नवगीत संग्रह ‘तुम हो मुझ में’ इसी आत्मीय संस्पर्श की काव्यात्मक परिणति है, जहाँ प्रत्येक शब्द अपने भीतर एक सम्पूर्ण जीवन संवाद लिये हुए हैं। यह काव्य मात्र नहीं,; बल्कि कवि के अंतर-जगत् की वह झलक है, जो पाठक को न केवल स्पर्श करती है,; बल्कि उसे भीतर से खोलती भी है। ‘हिमांशु’ जी का यह संग्रह इसी साधना का जीवंत, संवेदनशील और समय संवेदन से ओतप्रोत साक्षात्कार है।

      इस संग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि हम किसी आत्मीय व्यक्ति के साथ बैठे हैं, जो अपने जीवन की सबसे गूढ़ अनुभूतियों को हमारे सम्मुख बिना किसी कृत्रिमता के रख रहे हैं। बिना किसी कलात्मक चमत्कार और काव्य नाटकीयता के, एक अपूर्व सम्मोहन के साथ, जो पूरे काव्य संग्रह में व्याप्त है। इस संग्रह को पढ़ना, मानो किसी झरते हुए आँसू में झाँकना है, किसी टूटे हुए पल में साँस लेना है, किसी उजड़ती हुई राह में सिसकती उम्मीद की लौ को पहचाना है। ‘तुम हो मुझ में’ एक शीर्षक मात्र नहीं है, यह एक प्रतीक है, उस समस्त मानवीय जिजीविषा का, जो टूटती है, बिखरती है, छलती है, फिर भी पुनः उठ खड़ी होती है -प्रार्थना की तरह, रुदन की तरह, मौन की तरह।

इन नवगीतों को पढ़ते हुए अनुभूति होती है कि यह कवि मात्र शब्दों से नहीं रचते वह तो अपने जीवन की अनुभूतियों को, अपने समय की विद्रूपताओं को और हृदय की शिराओं में बहती आशा -अश्रु की नदी को लेकर शब्दों के माध्यम से संवेदना की धुन रचते हैं। एक धुन- जो कहीं विरह का गीत बनती है, कहीं प्रतिरोध की गूँज, कहीं मन की पीड़ा, कहीं प्रेमिका की प्रतीक्षा, कहीं श्रमिक की घुटन,कहीं प्रवासी की थकान और कहीं उस भारतीय आत्मा की अस्मिता जो तमाम व्यथा के बाद भी आशा की लौ थामे खड़ी है।  इनके नवगीत में व्यथा है; लेकिन करुणा भी है विसंगति है; पर दिशा भी है, टूटन है, पर पुनर्निर्माण की संभावना भी। यह विरोधाभास ही इनके काव्य को गहराई देता है क्योंकि जीवन भी अंततः इन्हीं विरोधाभासों का संगम है।

‘हिमांशु’ जी के शब्दों में एक अनोखी आत्मीयता है। वह जब लिखते हैं, ‘तुम हो मुझ में’ तो यह शीर्षक में ‘तुम’ केवल कोई व्यक्ति विशेष नहीं है। यह कभी समय होता है, कभी समाज, कभी चेतना और कभी खुद कवि का ही कोई अंश। यह ‘तुम’ पाठक भी हो सकता है जिससे कवि सीधे संवाद करता है, यही संवाद उन्हें एक शिक्षक के रूप में और भी प्रभावशाली बनाता है; क्योंकि शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, वह अनुभव बाँटता है, वह भावों की थाली परोसता है। यह संग्रह ऐसे ही शिक्षक की लेखनी से निकली आत्मा की आवाज है, जो पाठक के मन को न केवल शिक्षित करती है; बल्कि संस्कारित भी करती है और संवेदना से मन का कोना-कोना सुवासित कर देती है।

 कवि की भाषा कहीं मिट्टी की महक लिये हुए हैं कहीं खेतों में बहती हवा की तरह सरल और मन को छूने वाली, तो कहीं वह शहरी धुएँ और झूठ से जूझती आत्मा की गूँज बन जाती है। हर कविता के साथ एक गहरी करुणा बहती है - एक ऐसी करुणा जो केवल रुलाने के लिए नहीं; बल्कि भीतर कुछ तोड़कर फिर नया विश्वास बोने के लिए जन्म लेती है।

जलधारा /नहीं थी शीतल/ अपने पैरों के नीचे,

 गर्म अश्रु से/ संकल्प सभी /अहर्निश हमने सींचे

ये साधारण पंक्तियाँ नहीं है। यह जीवन के उस मोड़ की स्वीकारोक्ति है, जहाँ आँसू हार का प्रतीक नहीं;  बल्कि आत्मबोध और पुनर्नवा होने की प्रक्रिया बन जाते हैं। इनकी कविता किसी क्लिष्टता अथवा अबूझ दर्शन की माँग नहीं करती,  इनका दर्शन तो जीवन के छोटे-छोटे संवेदनात्मक अनुभवों से बना है और यही  इनकी भाषा को आत्मीयता प्रदान करती है। 

 ‘हिमांशु’ जी भी जीवन के आलोक की बात करते हैं। यहाँ तक की अँधेरे में भी आस की गुंजाइश ढूँढ लेते हैं, यही नवगीत की शक्ति है, वह अँधेरे को नकारता नहीं, उसे स्वीकार कर, उसमें प्रकाश की खोज करता है-

बीत गया जो/ लेकर उसको/  आँसू कौन बहाए,

 नए साल में/ नई आस की/ दुनिया एक बनाएँ 

कविता का स्वरूप बदल रहा है। नई पीढ़ी के कवियों के लिए भी यह पुस्तक एक मार्गदर्शन है। यह दिखाती है कि किस प्रकार व्यक्तिगत अनुभव को सार्वभौमिक बनाया जा सकता है। ‘तुम हो मुझ में’ कोई घोषणा -पत्र नहीं, वह एक आंतरिक याचना है कि हम अपने भीतर के ‘तुम' को फिर से जानें-

गढ़ने दो सबको/ अपना असली चेहरा

 खिलने दो श्वेत कमल -सा/ यह पावन अंतर्मन 

जलने दो/ हर देहरी पर/ दीप नए 

  इनकी कविता में ‘पंख’, ‘पत्थर’, ‘धूप’, ‘नागफनी’, ‘अधजला गीत’ जैसे प्रतीकों का प्रयोग केवल रूपक नहीं; बल्कि विचार की परतें खोलने वाले औजार हैं। जब वे कहते हैं-

 जब तक पंखों में ताकत है/  दूर देश तक जाना

 बाट देखता जब तक कोई/  तब तक वापस आना।

 यह उड़ान केवल आकांक्षा नहीं, अनुभव से ऊपजी चेतना है, जहाँ उड़ना कठिन भी है और आवश्यक भी। साथ ही हर स्थिति में लौट आने का विश्वास कवि की जीवन में गहन आस्था का परिचायक है। 

डूब गया तम की बाँहों में व्याकुल अंबर

ये कविताएँ, उस आंतरिक संत्रास को बयान करती हैं, जहाँ द्रष्टा न केवल भावनाओं से गुजरता है; बल्कि उन्हें जीता है, निगलता है, और अंततः आत्मा की वंशी से उसे नई धुन में ढाल देता है। 

दुख में होकर/ निपट अकेले/ हम सब कुछ सहते हैं

आज का आदमी आंतरिक रूप से इतना अकेला क्यों है? उत्तर मिलता है - जानोगे तुम कैसी होती/  मन की व्याकुलता है

           पता तभी तो चल पाता है/  जब कोई छलता है

यह ‘छल’ केवल व्यक्तिगत नहीं है- वह व्यवस्था का है, समाज का है, संबंधों का है और उस तमाम कथित नैतिकता का है जो केवल मुखौटों के लिए रची गई है। आप इन नवगीतों में इस ‘छल संसार’ का कोई क्रूर चित्रण नहीं करते, जैसा है, वैसा ही सामने रख देते हैं- लो पोथियाँ हमने/ पुरानी ताक पर रख दीं

- यह सिर्फ अतीत को समेटने की बात नहीं है, यह उस सांस्कृतिक विस्थापन का संकेत है, जहाँ इतिहास की धूल हटाकर हमने आधुनिकता का आवरण पहन लिया है, बिना यह समझे कि हमने क्या खोया। यह नवगीत इतिहास, स्मृति, और आधुनिक बोध का एक साथ समांतर पुल बनाता है, जहाँ ‘संन्यास’ की चर्चा केवल दार्शनिक विमर्श नहीं रह जाती, वह एक सामाजिक निस्संगता की स्वीकृति बन जाती है।

खड़े जहाँ पर ठूँठ/ कभी यहाँ/  पेड़ हुआ करते थे

- यह एक व्यंग्यात्मक नवगीत है, जो आज के राजनीतिक, सामाजिक विमर्शों की खोखलेपन और कुतर्कों की दुर्गंध को उजागर करता है। कवि यहाँ अनुभूत कर रहा है, उसे हमारी अनुभूति का हिस्सा बना रहा है। अपने आप में इतना मार्मिक है कि पाठक थम जाता है। भीतर कोई दरवाजा खुलता है, जिसमें कवि की कर्मठता और इच्छाशक्ति पाठक को आस्थावान बना देती थी। यह नवगीत- संग्रह केवल काव्य का अनुभव नहीं है, यह मौन का भाष्य है। एक ऐसा भाष्य, जो केवल कवि की संवेदना नहीं, बल्कि हम सबकी गुम हो रही मानवीयता का दर्पण है-

 दर्द का क्या/ नदी सा एक दिन बह जाएगा

और पीछे सिर्फ कुछ/ रेत ही रह जाएगा।

 ‘हिमांशु’ जी की यह काव्य-यात्रा केवल रचनात्मक दक्षता का परिचय नहीं; बल्कि संवेदना की प्रामाणिकता का साक्ष्य है। आपके शब्दों में- 

तिनका -तिनका लाकर चिड़िया/रचती है आवास नया।

इसी तरह से रच जाता है /सर्जन का आकाश नया। 


व्यंग्यः युद्ध और बुद्ध के बीच ट्रेड युद्ध की तीसरी टाँग

  - बी. एल. आच्छा

   युद्ध के दौरान महान  चिन्तकों के चेहरे पिघले-पिघले नजर आते हैं। जैसे सूरज की तीखी झुलसाती किरणों से  रुआँसे ग्लेशियर पिघल रहे हैं। उनकी चतुर समाधि में भूकम्प आ गया है। कितनी कविताएँ। कितनी संवेदनाएँ। बच्चों के मासूम चेहरे। अपने दर्शन की विडियो- क्रांति। सभ्यता का विनाश । पूरा     मानवतावादी चैप्टर तैरने लगता है। तब वे बुद्ध की बात करते हैं। सो भी हँसते हुए बुद्ध की नहीं। उनकी अश्रु- लहरियाँ सीमा पार जाकर वैश्विक चीत्कार बन जाती हैं।

        पर जब हमला हो ही गया हो, तो चौबीस घंटे में उत्तर माँगते हैं। कब दोगे जवाब? क्या इतनी भी तैयारी नहीं है? इतनी बेचैनियाँ कि सत्ताएँ व्यंग्यों-तंजों में नागफनी चुभन का शिकार बना दी जाती हैं। सोच ही नहीं पाते कि युद्ध को कितने कोण चाहिए? कितने गलियारों से आती विरोधी हवाओं को भेदने का चक्रव्यूह रचना पड़‌ता है। कैसी मार ?  कितनी मार ? कौन- कौन पाले में  आएगा? कौन छुपी मदद पहुँचाएगा? युद्ध का अर्थशास्त्र कितना होगा? अजीब- सा है, जब युद्ध होता है, तो शांति चाहिए। हमले हो जाएँ, तो जवाब देने की मिसाइली तल्खी।

        पर दो की लड़ाई में तीसरा अपना काम साधता है। यह तीसरी टाँग कभी दृश्य, कभी अदृश्य होती है। पिटते-मरते से क्या लिया जा सकता है? भाइयों की तकलीफ में कोई फूटी कौड़ी निकालते भी देर लगाता है; मगर कूटनीति  में कंगाली-फटेहाली में भी मित्रता के थेगले दौड़े चले आते हैं। यही देश-विदेश की कूटनीति की अपनी नागफनियाँ हैं। सुहानी लगती हैं, जब कोई  किसी मुल्क के लिए युद्ध का दहेज ले आता है, फिर अपना कब्जा जमाते चले जाता है।

   मुझे ज्योतिष का ज्ञान  नहीं; पर डर और विश्वास गहरा है। युद्ध में लड़ते तो दो ही देश है, पर तीसरे घर में बैठा शनि अपना काम घर बैठे ही कर जाता है और सातवें का मंगल अपना पराक्रम दिखा जाता है। यों राहु और केतु के अदृश्य खेल एक देश को हथियारों के जखीरे दे जाते हैं। पिटता हुआ भी इन विदेशी जखीरों से खेलता रहता हैं।  तीसरे घर का स्वामी ग्रह हथियारों का व्यापार कर जाता है। युद्ध भूमि पर लड़ता हुआ देश पिट भी जाता है और हथियारों की देनदारी से गुलाम बनता चला  जाता है। जिसको मारना होता है, उसे- इसे वे खिलाते-पिलाते भी अच्छा हैं। ऐसे में लगातार दुहते जाना, युद्धों का बाजार - लाभ बन जाता है।

       युद्ध और बुद्ध के बीच ये  शांति के मुखौटे कभी नोबेल पुरस्कार की सुर्खी बनने लगते हैं; पर भीतर- भीतर में ट्रेड- कूटनीति का सूचकांक शूट+ अप करवा देते हैं। उनको जलते-मरते  पंचलकड़ी ही तो देनी है; पर वे उस दशा तक पहुँचने नहीं देते। दिलासे दे जाते हैं। सहायता को मानववादी मुखौटा लगाकर कुश्ती के  पह‌लवान को फिर खड़ा करते हैं। पिटेगा, तो फिर सहायता शर्तों की हथकड़ी में। ले जाओ कर्जा हम से, दुनिया के फंडों से। यह अदृश्य टाँग न युद्ध देखती है, न बुद्ध। यदि  जातक  कथाओं वाले बुद्ध  होते, तो बुद्धत्व  समझ पाते; पर वे  युद्ध  और बुद्ध  से ज्यादा  सांसारिक प्रबुद्ध हैं। व्यापार युद्ध में छलांग की तीसरी टाँग तो अंतरराष्ट्रीय महाजनी संस्कृति का नाग‌फनिया ऋण- जाल है। हरी- हरी काई जैसा कार्पेट‌नुमा सत्कार पर सदा- सदा की बिछलन।

     अब कोई बुलाए न बुलाए, पर कुछ निछावर करते रहो। मौके पर कूदमकूद लगा जाओ। मिसाइलें भी दाग दो। सौदा हो जाए, तो घोर विरोधी से भी गलबहियाँ कर लो। मिलती गलबहियाँ  हैं; पर नजर  जियो- पॉलिटिक्स पर। पराई धरती  से कैसे कूटनीति साधी जा सकती है। दोस्ती भी कोई निर्मल मन की रागिनी नहीं है। मौका पड़ने पर छल- छद्‌म से उसी देश को युद्ध- राग में झोंक देते हैं। अपनी हथेलियाँ पाक- साफ बताते  हथियारों की डील कर जाते हैं।

      इन दिनों आँखें उतना काम नहीं करतीं। जैसे डॉक्टर नाड़ी नहीं देखता, जाँचों से  नुस्खे लिखता है। ऐसे ही परमशक्तियों के पास सेटेलाइट आँखें हैं। उस देश की धरती में छुपे खजाने को देखने वाली आँख है। तकनीक के हाथ हैं। धरती में छुपे मूल्यवान खनिजों को अपना बनाकर पराई धरती से अपना व्यापार चलाने की व्यापार - फनियाँ  हैं।  खिलाने और खरीदने के व्यापार युद्ध हैं। युद्ध- राग भी, शांति का बुद्ध- राग  भी। पर इन रंगीन  रेपरों में छुपा व्यापार युद्ध का प्रबुद्ध- राग हैं। जैसे छह अँगुलियों वाला या पीठ पर जीभ वाला नन्दी अलग ही होता है, वैसे  ही  युद्ध और बुद्ध  के फलसफे में तीसरी टाँग वाले प्रबुद्ध कुछ अलग ही होते हैं।

सम्पर्कः फ्लैट नं-701 टॉवर-27, नॉर्थ टाउन अपार्टमेंट, स्टीफेंशन रोड (बिन्नी मिल्स) पेरंबूर चेन्नई (तमिलनाडु)-600012, मो-9425083335


लघुकथाः परिवर्तन

- उपमा शर्मा

सुबह से मिसेज सिंह तैयारियों में लगी हुई थीं। उनकी लाड़ली बिटिया दीक्षा को देखने सचिन का परिवार आने वाला था। साथ में एक की कालेज से मेडिकल की पढ़ाई की थी। दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे फिर भी परिवार की रजामंदी के बिना विवाह को तैयार न थे। मिसेज सिंह ने पूरी तैयारी कर ली, सब कुछ चाक- चौबंद । फिर भी चिन्तित थीं, इकलौती बेटी की पसंद था सचिन। कैसे भी यह रिश्ता होना जरूरी था। दीक्षा पढ़ाई-लिखाई में बेहद होशियार लेकिन गृहस्थ जीवन का इतना कोई अनुभव नहीं था। बस यही चिंता सता रही थी उन्हें बार- बार। नियत समय पर सचिन का परिवार आ गई । चाय-नाश्ते के साथ बातों का सिलसिला भी जारी था।

सचिन की दादी ने प्यार से पूछा-"बेटी खाना बनाना भी पसन्द है कि खाना-खाना ही।"

"जी माँ जी, ज्यादा कुछ परफेक्टली नहीं बना पाती; लेकिन थोड़ा बहुत बना लेती हूँ।"

"जी, आप चिंता न कीजिए माँ जी। अब तक पढ़ाई में रही। अब इसकी पढ़ाई-लिखाई सब बंद कर इसे खाना बनाने में कुशल कर दूँगी। मैं सब अपने हाथ से बनाती हूँ। जी रसोई को मैं पूजाघर और खाना बनाने को पूजा मानती हूँ मैं। मेरी रसोई में कोई बाहरी झाँक भी नहीं सकता।" मिसेज सिंह ने जल्दी से जवाब दिया। डर था कहीं रिश्ता हाथ से ही न निकल जाए।

"माफ करना बेटी, हम रसोई को नहीं, कर्म को पूजा मानते हैं और यह क्या बिटिया की पढ़ाई क्यों रुकवानी? सचिन इसके खाना बनाने से नहीं, इसकी काबिलीयत से प्रभावित हो शादी कर रहा है। आज के युग में भी अगर घर सम्हालने की जिम्मेदारी लड़की की है कहकर उसकी प्रतिभा रोक दी जाएगी, कैसे सही है यह? बिटिया खाना एक बाई भी बना लेगी, लेकिन वह किसी मरीज को सही नहीं कर पाएगी। दीक्षा अब हमारी बहू है, इसे विशिष्ट डिग्री ले समाज की सेवा करने दो। खाना हम किसी से भी बनवा लेंगे।"

परिवर्तन की इस सुखद बयार से दीक्षा और सचिन के चेहरे खिल गए।