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Sep 1, 2024

कहानीः प्रार्थनाओं के विरुद्ध

 - सत्या शर्मा ‘कीर्ति’

आज  मैं अस्पताल से घर  लौट तो आई थी, पर मेरा लौटना कहाँ लौटना था बस आ जाना था जैसे कोई आ जाता है अनचाहे ही।  ऑपरेशन  के दौरान अवचेतन में महसूस कर रही थी। यहाँ मौजूद सभी लोग पूरे मनोयोग से मुझे बचाने के लिए अथक कोशिश में जुटे हैं और मुझे कुकी की बात याद आ रही है- " दादी देखिएगा आप भी एक दिन जरूर मानेंगी कि डॉ. भगवान होते हैं।" पर अब मुझे भगवान के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में डॉ. भगवान है या इंसान समझकर क्या करूँ; क्योंकि होगा तो वही, जो मेरी प्रार्थनाओं के विरुद्ध होगा।

“ अच्छा बताइए दादी माँ, क्या भगवान भी पैसे लेते हैं?"

‘‘क्यों, नहीं तो’’- मैंने चौंककर पूछा था ।

“आप ही तो कहती थी डॉक्टर भगवान होते हैं ; लेकिन जब भी डॉक्टर के पास जाती हूँ , तो मिलने के पहले पापा को ढेर सारा पैसा जमा करना होता है। फिर लंबी लाइन में  घण्टों बैठो, तब जाकर डॉक्टर अंकल मिलते हैं। फिर उतने सारे पैसे और समय के बदले कुछ दवाई लिख देते हैं। हद है न दादी ! दवा भी कहीं से पैसे देकर खरीदना होता है हुँह ...’’- मुँह बिचकाते हुए कुकी ने कहा था।

घण्टों बैठे रहो, कहते हुए कुकी की आँखों में थकावट साफ झलक रही थी।

हम सभी उसे कुकी ही कहते थे, बिल्कुल कोयल जैसी प्यारी आवाज़। दिनभर चहकती रहती। थोड़ी देर भी चुप हो जाए, तो लगता पूरा आसमान पक्षी- विहीन हो गया है।  अच्छी नहीं लगती थी उसकी चुप्पी।

उसे प्यार से समझाते हुए मैंने कहा था- “कुकी, जब हम मंदिर जाते हैं, तब लाइन में लगते हैं न, पैसे देकर प्रसाद खरीदते हैं न और अंदर जाते ही पंडित जी कहते हैं- आगे बढ़िए -आगे बढ़िए। हमलोग कहाँ कुछ देर रुककर भगवान से अपनी बात कह पाते हैं। क्षणभर ठीक से भगवान पर नजर पड़ती भी नहीं कि पुजारी कहना शुरू कर देते हैं-  “चलिए-चलिए पीछे लोग खड़े हैं।’’

“हम्म, आप सच कह रही हैं दादी’’- कुछ सोचते हुए उसने कहा । जैसे उसकी भी कोई याद ताजा हो गई हो। फिर क्षण भर बाद ही उछलती- कूदती भाग गई; लेकिन मुझे वह सब याद आ रहा था, जब मन में गहरी आस्था और विश्वास लिये लंबी यात्रा के बाद पुरी धाम गई थी। अभी हाथ जोड़ी भी नहीं पाई थी, सिर्फ भरी आँखों से कुकी के लिए दुआएँ माँग ही रही थी - “आगे बढ़िए-आगे बढ़िए का शोर होने लगा। क्या वे मेरे भगवान नहीं थे? चालीस घण्टे की यात्रा कर पहुँची थी: किन्तु चालीस सेकेंड भी भगवान के सानिध्य में खड़ी न हो पाई। लोगों के शोर में बस कुकी.. कुकी ही बोल पाई थी। पर क्या  भगवान भी शोर में बस मेरे होठों से निकले शब्द ही सुन पाए, मेरे मन की नहीं। या फिर इतनी लंबी भीड़ में किसकी- किसकी सुनते।

   तब अपने मन को समझते हुए मंदिर के बाहर बैठकर खूब रोई थी। ईश्वर से मन ही मन पूछती रही। जीवन कम ही देना होता है,  तो मोह ही क्यों जगाते हो प्रभु ? पर उसकी तरफ से कोई उत्तर नहीं मिला। मेरे सवाल, मेरी पुकार वहीं दीवारों से टकराकर हवाओं में बिखर गई।

 उन दिनों कितने ही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, धागा, मन्नत , टोटके करती रही पर सब व्यर्थ होते गए और मेरी आस्था टूटती रही।  खैर, वहाँ का प्रसाद कुकी ने बहुत मन से खाया, चेहरे पर रौनक लौटने लगी थी। 

    कुकी कहती- “दादी मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूँगी और बच्चों का मुफ्त में इलाज करूँगी।’’ तब मैं खुश होकर उसे ढेर सारे आशीर्वाद देती और पूछती- मुफ्त में क्यों? तब कहती- आप ही तो कहते हो- “बच्चे भगवान होते हैं फिर एक भगवान किसी दूसरे भगवान से पैसे कैसे ले सकते हैं।’’

    मैं मासूम बन पूछती- “तुमसे तो लेते हैं।’’ तब वह उदास हो कहती- शायद मैं अच्छी वाली भगवान नहीं हूँ। तभी तो रोज बीमार ही रहती हूँ। और दीदी अच्छी वाली भगवान।

    फिर परेशान हो पूछती-“ सच बताओ दादी! बच्चे भी भगवान होते हैं ?’’

    मैं कभी - कभी झुँझलाकर कहती- “अरे बिटिया तू हमेशा भगवान के पीछे ही क्यों पड़ी रहती है।”

    सभी इंसान हैं - तू, मैं, तेरी दीदी, डॉक्टर, सब के सब। बस जो पूजा रूम में हैं न, जिसकी हम पूजा करते हैं, सिर्फ  वही भगवान है।

    कुकी कुछ देर सोचती फिर कहती- “दादी मुझे संस्कृत पढ़नी है।’’

 “अब संस्कृत क्यों?’’

 “मुझे भगवान से बात करनी है।’’

 ‘‘वो तो सभी भाषा में बात करते हैं बच्चा।’’

 “नहीं, वो चुप बैठे रहते हैं, मैं बोलती रहती हूँ, वो केवल मुस्कुराते रहते हैं। शायद वो हिन्दी नहीं समझ पाते।’’-बड़ी मासूमियत से कहती।

  मुझे जोर की हँसी आ जाती पर उसी क्षण उसके मन, उसके शरीर की पीड़ा का एहसास मुझे रुला देता।

  और फिर अपने कमजोर होते शरीर से धीरे-धीरे पूजा रूम में जा धीमी आवाज में जाने क्या -क्या बातें करती रहती।

  कभी- कभी सोचती हूँ, वह भी समझने लगी थी कि अब वह ज्यादा दिन नहीं बचेगी; क्योंकि अब उसकी प्रार्थनाओं में कई बार मेरे बाद... सुनाई देता।

   मात्र ग्यारह साल की कुकी कई बार मुझे अस्सी साल की लगती।

   डॉक्टर कहते- ईश्वर से प्रार्थना कीजिए तब कुकी कहती- “आप ही तो ईश्वर हो,  ऐसा दादी कहती हैं।’’ 

     डॉक्टर भी प्यारी- सी गुड़िया को देख मायूस हो जाते । कहते बिटिया अगर मैं ईश्वर होता, तो चुटकियों में तुम्हें ठीक कर देता। तब कुकी उदास हो जाती।

   और आज जब हार्ट अटैक के बाद लोग कह रहे हैं कि सच में डॉक्टर भगवान होते हैं, तो मुझे कुकी बहुत याद आ रही है। लग रहा है- वो हँसकर कह रही है- मैंने कहा था न दादी!

   पर मुझे तो कुकी की दुनिया में जाना था । उसके साथ फिर से खेलना था। देखना था, अब वह थोड़ी और बड़ी होकर कैसी दिखती है। आज  डॉक्टर मुझे भगवान नहीं, दुश्मन नजर आ रहे थे, जो जबरदस्ती मुझे इस शरीर में कैद करके रखना चाह रहे थे। पर अब मुझे नहीं जीना था। बिना इच्छा के ही उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते- चढ़ते यहाँ तक आ गई थी; पर मंजिल के पहुँचने के पहले ही डॉक्टर ने हाथ पकड़कर रोक लिया- नहीं तुम इतनी जल्दी आजाद नहीं हो सकती। अभी तो तुम्हारी सजा की लंबी उम्र बाकी है। मेरे ऊपर शायद दवाइयों का असर-सा होने लगा था। 

  जिस डॉक्टर से मुझे इतनी नफरत हो रही थी। उसी की तस्वीर एक दिन घर के मंदिर में रखकर कुकी ने कहा था- “दादी, इनकी ही पूजा करो न, भगवान जाने होते भी हैं या नहीं । शायद डॉक्टर ही पूजा से खुश हो मुझे ठीक कर दें।’’

    तब फूट-फूटकर रोने लगी थी मैं। यह उन दिनों की बात है, जब मैंने भी मन को समझना शुरू कर दिया था। पर मन को समझना भी इतना सरल कहाँ होता है? रोज दिन- रात प्रार्थना करती- ईश्वर मेरी उम्र मेरी बच्ची को दे दो । मुझे ले चलो प्रभु। पर! प्रार्थनाएँ कितनी असफल हो सकती हैं इतने वर्षों में बार- बार मुझे अनुभव हुआ ।कुकी के रहते, उसे बचाने की प्रार्थना और उसके बाद मुझे ले जाने की।    

अंतिम दिनों में जब वह ढंग से खड़ी भी नहीं हो पाती थी, तब भी मुस्कुराती रहती । जाने कितनी हिम्मत थी उस छोटी सी जान में जो हँसते हुए इतनी पीड़ा सहती थी या जन्म से पीड़ा झेलती, वह कभी जान ही नहीं पाई थी बिना पीड़ा के देह कैसी होती है। 

    धीरे-धीरे पहले उसकी आवाज गई। फिर पीड़ा सहते-सहते एक दिन वह खुद भी चली गई।

   पर सिर्फ वह ही कहाँ गई थी, उसके  साथ ही इस घर की चहचहाट, खुशियाँ, रौनक सब  चली गई थीं।

    खैर ... आज लोग कह  रहे हैं ईश्वर की असीम कृपा है। आप ठीक हो गईं। उनकी माया, उसकी लीला वे ही समझ सकते हैं।

  पर अब इस लीला, इस माया को  मैं समझना नहीं चाहती। मेरी बच्ची इसी लीला, माया के चक्रव्यूह में फँसी अपनी चंद साँसों के लिए, कभी डॉक्टर में भगवान , कभी भगवान में डॉक्टर ढूँढते – ढूँढते हार गई और मैं अपनी असफल प्रार्थनाओं के अस्सी वर्ष की उम्र में लौटकर आ रही हूँ एक खामोश और उदास घर में। ■

सम्पर्कः राँची, झारखण्ड, मो- 7717765690, ईमेल-satyaranchi732@gmail.com


कविताः कभी ऐसा भी हो

 - स्वाति बरनवाल

कभी ऐसा भी हो 

हम दोनों अचानक 

किसी मॉल में शॉपिंग करते

या बाजार से सब्जियाँ लेकर लौटते हुए

या फिर किसी स्टेशन पर टकरा जाते 

तुम मेरा सामान उठा लेते

और मैं तुम्हारे साथ साथ चल पड़ती

गाहे- अगाहे 

 

ट्रेन में मैं अपना टिफिन शेयर कर देती 

और तुम अपनी रोटी की चिंता

ये सोचते हुए कि

जिम्मेदारी भी मिलकर बाँटी जा सकती है 

 

तुम खिड़की से बाहर देखते 

और मैं तुम्हें कि

अप्रत्याशित ही हमारा मिलना

जीवन का असली सुख होगा।


दो कविताएँ

  - सुरभि डागर

1-  पीड़ा 

मौन रूप धारण कर 

कहीं दूर से ताक

सरक आती है चित के 

किसी कोने में, 

हाँ यह पीड़ा ही है.....

ध्वनि रहित है ये पीड़ा 

दीमक बन घुनती रहती है

शरीर को, मस्तिष्क को खोकर 

करने का प्रयत्न करती है

हाँ ये पीड़ा ही है...... 

लक्ष्यहीन बन व्यक्ति चल

पडता है, पीड़ा के संग...

गुमराह हो निकल पड़ता है

अनजान – अँधेरी राहों में

पथरीली राहों की भाँति,

काँच के टुकड़ों पर पाँव

धरने- सा एहसास करती है

हाँ ये पीड़ा ही है...

पल -पल रिक्तता, बेचैनी 

हर  क्षण सालों- सी अनुभूति 

कराती है यह पीड़ा...

2-   पाँव

सूरज की चिलचिलाती धूप में

झुलस उठते हैं तलवे

धधकते अँगारे- सी धूप में 

एड़ियों की दरारों से रक्त की

बूँद बह निकलती है 

पर नहीं थमते जिम्मेदारियों

से लदे पाँव ,

आकांक्षा रहित अग्रसर 

रहते हैं हर क्षण, 

कभी ठहर जाते हैं नीम की 

कड़वी ठण्डी छाँव के नीचे,

दो पल, फिर चल पड़ते हैं

गरम हवा के बीच, चेहरे पर

लगती लूँ के थपेड़ों की 

चोट से भी नहीं थमते

जिम्मेदारियों से जकड़े पाँव... साँझ ढले 

चेहरे पर झलक उठती है मुस्कान

चौखट पर अधिक तीव्र हो उठते हैं

जिम्मेदारियों से बँधे पाँव, 

द्वार को ताकती 

बूढ़ी माँ की आँखों में खुशी

उमड़ आती है। 

टूटी खाट के सिरहाने पर बैठी बूढ़ी माँ

सहलाती तपती धूप में

घायल पाँव और हल्दी के लेप के संग 

नयनों से बहती जलधारा से

मरहम लगा देती, नई सुबह फिर 

अपनी मंजिल की ओर 

बढ़ते हैं जिम्मेदारियों बँधे पाँव...

किताबेंः मन की वीणा पर सधे संवेदना के गीत-‘गाएगी सदी’

- रश्मि विभा त्रिपाठी

‘गाएगी सदी’ (हाइकु- संग्रह) : डॉ. सुरंगमा यादव, पृष्ठ: 112, मूल्य: 320 रुपये, आईएसबीएन: 978-81-968022-9-5, प्रथम संस्करण: 2024, प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे- 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059

जिस साहित्य में पावन भावों के चन्दन की चौकी पर आदर्शों की प्राण प्रतिष्ठा हो, आशा का घट स्थापन हो, अमंगल के नाश का आह्वान हो, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की स्तुति हो, मन्थन का मंत्रोच्चार हो, जागृति की जोत जगे, नैतिकता का नीराजन हो और पूरे विश्व के कल्याण की प्रार्थना हो, रचना रचने के व्रत को धारण करने से पूर्व लिया गया यह शुभ संकल्प ही संवेदना है। 
डॉ. सुरंगमा यादव पुस्तक ने भूमिका में काव्य- संवेदना का महत्त्व रेखांकित किया है- “जीवन हो या काव्य, संवेदनायुक्त होने पर ही सार्थक है। संवेदनायुक्त काव्य ही जनवादी काव्य कहलाता है।”
उनकी इसी संवेदना का राग है- ‘गाएगी सदी’ हाइकु- संग्रह।  इस संग्रह के पाँच उपशीर्षक हैं- ढाई आखर, वक्त की धूप, हरित कथा, जग की रीत एवं सुधियों की सुरभि।
जगत् एक स्वर्णमृग के समान है, जिसकी छलना में व्यक्ति उम्रभर इधर- उधर भटकाता रहता है और अपने ही भीतर की छिपी हुई कस्तूरी को कभी ढूँढ नहीं पाता। 
ढूँढी कस्तूरी/ निज अंतर छोड़/ दुनिया पूरी। (पृष्ठ 17)
जीवन की माला में जहाँ सुख के मोती की चमक मन को खूब जुड़ाती है, वहीं दुख के मोती पर नजर पड़ते ही उसकी चौंध मन को दुखाती है, रुलाती है कि मन टूटकर बिखर जाता है। बिखराव से बचाने के लिए डॉ. सुरंगमा यादव धीरज के धागे में मन को पिरोने की युक्ति बताती हैं-
जब भी रोया/ धीरज के धागे में/ मन पिरोया। (पृष्ठ 17)
जीवन भी रेत पर लिखे नाम की तरह है जिसका अस्तित्व केवल तभी तक है, जब तक कोई लहर उस तक नहीं आती! उस लहर के आने तक भवसागर के तट पर जीवन को जीभर जी लें।
रुक लहर/ रेत पर लिखा नाम/ देखूँ जीभर। (पृष्ठ 17)
तृप्ति का बादल उमड़ उमड़कर रोम- रोम को पुलकित करता है और बरसकर तपते मन को ठहराव देता है-
तुम्हें जो पाया/ झील- सा ठहराव/ मन में आया। पृष्ठ (18)
हम प्राय: अपनी सोच के साँचे में जीवन को ढालने का प्रयास करते हैं, परन्तु जीवन उस साँचे में पूरी तरह कभी नहीं ढल पाता! 
कितना सींचे/ पत्थरों पर कब/ उगे बगीचे। (पृष्ठ 21)
कवयित्री ने चाँद का मानवीकरण एक नए ढंग से करके हाइकु की सुन्दरता में चार चाँद लगा दिए हैं। नवीन भावबोध के इस हाइकु की चमक देखिए-
पूनो को देख/ दे रहा क्लोजअप/ चाँद सलोना। (पृष्ठ 23)
इस क्लोजअप शब्द के प्रयोग से चाँद के फोटोजेनिक फेस पर अपनी अंतर्दृष्टि का कैमरा फोकस कर पूनो की रात में बादल की ओट से निकलकर आए चाँद का एक सुन्दर चित्र सुरंगमा जी ने क्लिक किया है।
मन की पीर/ संवेदना की ऊष्मा/ मिली, पिघली। (पृष्ठ 29)
संवेदना की ऊष्मा मिलते ही मन की पीर पिघल जाती है। आज इसी संवेदना के अभाव में जीव जगत जल रहा है।
धूप जब ढलती है, तो झुलसे हुए तन- मन को साँझ की बेला में राहत मिलती है; लेकिन वक्त की यह धूप जब ढलती है तो संवेदनहीनता की काली छाया आकर डराने लगती है-
साँझ की बेला/ नीड़ निहारे पंक्षी/ बैठ अकेला। (पृष्ठ 31)
जीवन की साँझ में मनुष्य पक्षी की तरह अकेला बैठा अपना नीड़ ताकता रह जाता है और जिनके लिए तिनका- तिनका चुनकर नीड़ बनाया था, वे चूजे पंख निकलते ही उसे छोड़कर उड़कर दूर चले जाते हैं।
आज के नारी सशक्तीकरण के युग में नारी की वास्तविक स्थिति का आंकलन कवयित्री ने अपने हाइकु में किया है-
चाँद को छुआ/ भू पे नारी संघर्ष/ कम न हुआ। (पृष्ठ 40)
दुर्भाग्य यह है कि धरती पर आज भी नारी का शोषण जारी है-
नन्ही- सी कली/ वासना की सेज पे/ गई मसली। (पृष्ठ 32)
नारी की स्थिति में आज भी कोई बदलाव नहीं! उसका जीवन पीड़ा का एक शपथ- पत्र है-
नारी जीवन/ एक शपथ-पत्र/ पीड़ा के नाम। (पृष्ठ 39)
इसलिए कवयित्री का नारी जाति के लिए आह्वान है-
नारी कहो न!/ क्या लता ही रहोगी?/ वृक्ष बनो ना। (पृष्ठ 42)
वह नारी को वृक्ष का सहारा लेकर खड़ी होने वाली लता बनते नहीं देखना चाहतीं बल्कि वे चाहती हैं कि नारी स्वयं एक मजबूत वृक्ष बने, जिसकी जड़ें कोई हिला न पाए।
कवयित्री ने अपने हाइकु में अपने पर्यावरण के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है। लोलुप दृष्टि के वनों पर गहराने से वृष्टि लगातार घट रही है। इसका परिणाम कितना विनाशकारी होगा?
घटती वृष्टि/ वनों पे गहराई/ लोलुप दृष्टि। (पृष्ठ 44)
पाँव पसारे/ कंक्रीट आ पहुँचा/ वन के द्वारे। (पृष्ठ 59)
कंक्रीट अपने पाँव पसारते हुए वन के द्वारे तक पहुँच गया है। इसे देखकर पंक्षी व्यथित हैं। पंक्षी की व्यथा बताते अत्यंत मार्मिक हाइकु-
लेकर तृण/ कंक्रीट के वन में/ भटकें पंछी। (पृष्ठ 45)
खंभे से पूछे/ हाँफता हुआ पक्षी/ छाँव का पता। (पृष्ठ 49)
उन्हें घने कोहरे में भी सर्दी की धूप के व्यवहार में अनियमितता दिखी है। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है कि सर्दी की धूप एक कामचोर कर्मचारी की तरह है-
सर्दी की धूप/ उपस्थिति लगाके/ चली झट से। (पृष्ठ 46)
सूरज क्वारंटीन है और उसका अपने स्वभाव के विपरीत व्यवहार है-
नभ में मेघ/ क्वारंटीन सूरज/ हुआ निस्तेज। (पृष्ठ 54)
बादलों को उन्होंने नभ का सर्वे करते हुए पाया है-
बादल छाए/ नभ का सर्वे कर/ वापस चले। (पृष्ठ 58)
जीवन के तूफान से लड़ने के लिए मनुष्य को सदैव एक वृक्ष की भाँति डटकर खड़े होना चाहिए और इस तूफान में अपनी जिजीविषा का दीप कभी बुझने नहीं देना चाहिए क्योंकि जिजीविषा वह वृक्ष है जिसके ठूँठ होने पर भी उसमें फिर से नई कोंपलें निकल आती हैं और वह हरा हो जाता है-
वृक्ष हैं वही/ जो तूफान से लड़े/ आज हैं खड़े (पृष्ठ 54)
जिजीविषाएँ/ ठूँठ पर कोंपल/ निकल आए। (पृष्ठ 71)
आज के युग में रिश्तों में कुछ बचा है, तो केवल संवादहीनता, उदासीनता, तनाव और स्वार्थ-
एक ही घर/ छत और फर्श- सी/ दूरी हममें। (पृष्ठ 33)
संवादहीनता में हाइकुकार ने एक धीमे जहर की पुष्टि की है जो धीरे- धीरे रिश्तों का दम घोंट रहा है। उदासीनता ने रिश्तों की तरलता को सोखकर उन्हें बेजान बना दिया वृद्धों के प्रति नई पीढ़ी की उदासीनता इस हाइकु में झलकती है-
वृद्ध लाचार/ अपनों की उपेक्षा/ देह भी भार। (पृष्ठ 33)
धुँधली आँखें/ कर गया किनारा/ आँख का तारा। (पृष्ठ 34)
भाव, भाषा, छन्द की कसौटी पर कसे बिम्ब योजना, सादृश्य विधान एवं प्रतीकात्मक शैली में संवेदना के स्वर इन हाइकु की शक्ति है।   ‘गाएगी सदी’ में संवेदना के ये गीत निस्संदेह सुर, लय, ताल से प्रबुद्ध पाठक की भावनाओं को झंकृत करेंगे। ■

आलेखः अनुवाद एक कठिन कार्य है

  - महेंद्र राजा जैन

अनुवाद करना एक कठिन कार्य है। यह शब्द सुनने-पढ़ने में जितना सरल और सहज जान पड़ता है , वास्तव में उतना सरल-सहज है नहीं। यह अत्यंत कठिन इस कारण भी है कि अनुवाद के लिए अनुवादक को कम-से-कम दो भाषाओं का ज्ञान – केवल कामचलाऊ ज्ञान नहीं, वरन अच्छा ज्ञान – होना आवश्यक है। इसके साथ ही दोनों भाषाओं के मुहावरे, लोकोक्तियाँ, व्याकरण आदि का ज्ञान होना भी आवश्यक है, क्योंकि अनुवाद में केवल भाषा का अनुवाद नहीं बल्कि उसके साथ भाव, संस्कृति, सन्दर्भ शैली आदि का अनुवाद भी किया जाता है। इससे भी अधिक महत्त्वर्ण बात यह है कि अनुवादक को उस विषय का भी अच्छा ज्ञान होना चाहिए जिस विषय की रचना का वह अनुवाद कर रहा है। यही कारण है कि असाहित्यिक या असाहित्येतर विषयों का अनुवाद करना और भी कठिन होता है क्योंकि इसके लिए उस विषय के तकनीकी शब्दों से अधिकतर लोग अनभिज्ञ होते हैं। साहित्यिक रचनाओं के अनुवाद में भी यह बात कुछ अंश तक लागू होती है, जैसे यदि किसी ऐसे उपन्यास या कहानी का अनुवाद किया जा रहा है जिसकी पृष्ठभूमि ‘1857 का स्वतंत्रता संग्राम’ है तो सफल अनुवाद के लिए आवश्यक है कि अनुवादक को इस विषय की भी कुछ जानकारी है, पर व्यवहार में देखा गया है कि ऐसा प्रायः होता नहीं है।

अनुवाद कठिन होने के साथ ही एक जटिल कार्य भी है। इसे ‘परकाया प्रवेश’ भी कहा गया है। प्रायः देखा गया है कि साहित्यिक कृतियों का अनुवाद करते समय सीधे, सरल वाक्यों का अनुवाद तो कर दिया जाता है , पर जहाँ भाषा बोलचाल की या मुहावरेदार शैली की होती है  उतना अंश छोड़ कर उस वाक्य या वाक्य समूह का भावानुवाद कर काम चला लिया जाता है, या फिर कुछ लोग शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद कर डालते हैं बिना यह सोचे कि ऐसा करने से कभी-कभी अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। ‘औरंगजेब’ भारतीय इतिहास का एक पात्र है। यदि अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले किसी व्यक्ति  को इसका ज्ञान न हो, तो वह इसका अंग्रेजी अनुवाद and colour pocket भी कर सकता है। अंग्रेजी का एक बहुत ही प्रचलित मुहावरा है –  Throw some light . प्रायः लोग इसका शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद – कुछ प्रकाश डालना –  कर डालते हैं , जब कि इसका अनुवाद [किसी विषय पर] कुछ विचार रखना या कहना होना चाहिए। इसी प्रकार financially sound  का शब्दानुवाद ‘आर्थिक दृष्टि से आवाज’ नहीं वरन ‘आर्थिक दृष्टि से मजबूत’  होना चाहिए। दोनों भाषाओं पर समान अधिकार नहीं होने के कारण ही इस प्रकार की हास्यास्पद भूलें हो जाती हैं।  इस प्रकार के शब्दानुवाद में वाक्यों पर अंग्रेजी की छाया बनी रहती है; इसलिए पूरी तरह शब्दानुवाद करना हमेशा उचित नहीं समझा जाता। इसके विपरीत भावानुवाद में मूल के शब्द, वाक्यांश आदि पर अधिक ध्यान न देते हुए भाव या अर्थ पक्ष पर अधिक बल दिया जाता है। अतः अनुवाद में शब्दानुवाद के साथ ही भावानुवाद भी होना चाहिए तभी पाठक को अनुवाद किए गए कार्य को समझने में आसानी होगी। इसे अनुवाद का ‘मध्यम मार्ग’ भी कहा जा सकता है। अनुवाद कार्य में होने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए। यही सफल एवं आदर्श अनुवाद होगा।

कुछ लोग कहते हैं कि अनुवादक को ‘न कुछ जोड़ें, न कुछ छोड़ें’ की नीति अपनाना चाहिए । यहाँ प्रश्न होता है कि क्या यह संभव है? , क्योंकि स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों की प्रकृति अलग होती है, इसलिए कुछ-न-कुछ जोड़ना- छोड़ना होगा ही। इसी से अनुवाद अच्छा होगा। प्रत्येक भाषा के कुछ शब्द अपने होते हैं। उनका लक्ष्य भाषा में अनुवाद नहीं किया जा सकता। यदि उन शब्दों को अनुवाद में रखना आवश्यक ही हो तो उनका लिप्यन्तरण कर उनके सम्बन्ध में इस आशय की पाद-टिप्पणी दे देना ठीक होता है।

Email-  mrjain@gmail.com