मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Aug 1, 2024

हास्य व्यंग्यः बत्तीसी पुराण

 -  प्रेम गुप्ता ‘मानी’   

बरसों पहले किसी ने उन्हें बताया था कि हँसते रहने से आदमी की सेहत अच्छी रहती है। बस, उसी दिन से उन्होंने अपनी सेहत की खातिर इस बात को गाँठ बाँध लिया। जीवन में दुःख होता या सुख, वे बस हँसते रहते थे और हर वक़्त हँसते रहने के कारण उनकी सेहत तो अच्छी हो गई, पर वे एक मुसीबत में पड़ गए। उन्हें हर वक़्त हँसते रहने का इतना अभ्यास हो गया था कि चाहकर भी उनकी बत्तीसी भीतर जाती ही नहीं थी।            

हर समय मुँह खोलकर बत्तीसी झलकाने के कारण टाइम-बेटाइम उन्हें लोगों की लताड़ पड़ चुकी थी; पर वे थे कि आदत से मजबूर...मुँह खोलकर हँसते रहते...। लताड़ देने वाला भी हारकर हँस देता, “यार...तुम्हारे जैसे बेहया आदमी नहीं देखा...।”          

‘बेहया’ शब्द अपने लिए सुनकर उन्हें ठेस लगती। वे जबरिया अपना मुँह बन्द कर लेते, पर दूसरे ही क्षण बत्तीसी अपने आप ही झलक जाती...होंठ फैल जाते...। देखकर लगता, जैसे हँस रहे हों। सामने वाला गुस्से में आगे बढ़ जाता, “अरे, कुछ तो शर्म करो...।"

अपनी इस आदत से वे भी कम परेशान नहीं थे। सो समय-बेसमय हँसते वक़्त वे उस आदमी को लाख-लाख बद्दुआ देते, जिसने उन्हें हँसना सिखाया था। उनकी इस आदत से उनकी पत्नी और बच्चे भी कम परेशान नहीं थे।        एक दिन ऑफ़िस से लौटे , तो देखा, पत्नी पेट-दर्द से बुरी तरह तड़प रही है। उन्होंने उसे इस हालत में देखा, तो हँसने लगे, "क्यों, क्या हुआ तुम्हें? तुम इस तरह लोट-पोट क्यों हो रही हो?”

"तुम्हें क्या दिखाई नहीं दे रहा? पेट-दर्द से मेरा बुरा हाल है और तुम हो कि खुश हो रहे हो? अरे, जल्दी से डॉक्टर को बुलाओ, नहीं तो मैं मर जाऊँगी।"

 पत्नी ने रोते हुए कहा, तो उनकी हँसी तो बन्द हो गई; पर बत्तीसी खुली रही, "हाँ...हाँ...मैं अभी डॉक्टर को लेकर आता हूँ...।"

 बत्तीसी खोले हुए वे बाहर निकले, तो पड़ोसी शर्मा ने कहा, ‘‘क्या बात है मिश्रा जी...बड़े खुश नज़र आ रहे हो...?”

 “अरे नहीं शर्मा जी, ऐसी कोई बात नहीं...। दर‍असल डॉक्टर को बुलाने जा रहा हूँ। पेट-दर्द से पत्नी की हालत बहुत खराब है।”

आश्चर्यचकित शर्मा उनसे कुछ और पूछता कि वे हँसते हुए चले गए।

 डॉक्टर का क्लिनिक घर के पास ही थी। दस मिनट में ही पहुँच गए। डॉक्टर किसी दूसरे मरीज को देख रहा था। समय लगते देख वे हँसते हुए बेंच पर बैठ गए और आने वाले मरीजों को पूरी बत्तीसी खोलकर देखने लगे। मरीज उन्हें गुस्से से देखते और फिर आगे बढ़ जाते।

 थोड़ी देर बाद जब डॉक्टर खाली हुए, तो उनकी ओर मुड़े, “कहिए मिश्रा जी...कैसे आना हुआ?”         

“जी, पत्नी के पेट में भयंकर दर्द है...ज़रा चलकर देख लेते।” कहकर वे हँसने लगे, तो डॉक्टर को भी हँसी आ गई, “ऐसी भी क्या नफ़रत मिश्रा जी अपनी पत्नी से कि उसके दुःख में भी आप इतना खुश हो रहे...।”           

“नहीं…नहीं... “कुछ सफ़ाई- सी देते हुए उन्होंने डॉक्टर का बैग उठाया और फिर अपनी पूरी बत्तीसी झलकाते हुए घर की ओर चल दिए।

    पत्नी का चेक‍अप कर दवा वगैरह लिखकर डॉक्टर तो चले गए; पर उसके बाद पत्नी ने घर में जो महाभारत मचाया कि असली कौरव भी होते, तो यह देखकर महाभारत से तौबा कर लेते।           

उन्होंने पत्नी को समझाने की बहुत कोशिश की, हर तरह से अपने अमर प्रेम का यक़ीन दिलाया, पर सब व्यर्थ...। उसकी एक ही रट- “मेरे दुःख में तुम्हें बहुत हँसी आती है न...। अब देखना, जब तुम बीमार पड़ोगे, तो मैं डॉक्टर को भी नहीं बुलाऊँगी...।”

 पत्नी फिर दहाड़ मारकर रोने लगी, तो दीर्घशंका का बहाना बनाकर वे जल्दी से खिसक लिये। काफ़ी देर बाद हँसते हुए निकले, तो फिर वही नज़ारा...। घबराकर लघुशंका घर में घुस गए। ऐसी विकट परिस्थिति में उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें...। काफ़ी देर बाद बाहर निकले, तो एकदम निचुड़े हुए।

अपनी इस आदत से उत्पन्न स्थिति से उन्हें कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है, यह किसी को कैसे समझाएँ? एक बार तो इस आदत के कारण इतना परेशान हुए कि उन्हें उस जगह से मुँह ही छिपाकर भागना पड़ा। हुआ यूँ कि उनके एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गई। न चाहते हुए भी पिता की आज्ञा के कारण उन्हें वहाँ जाना ही पड़ा। जाते वक़्त पिता ने उन्हें खास हिदायत दी थी, “धीरज बँधाते समय ज़रा अपनी बत्तीसी पर नज़र रखना...। इसके कारण अगर हमारे व्यवहार पर असर पड़ा तो समझे रहना...तुम्हारी ख़ैर नहीं...।”

और उन्होंने पिता के निर्देशानुसार ऐसा ही किया भी...। वहाँ सबके सामने उदास आँखों के साथ उन्होंने अपनी बत्तीसी पर काफ़ी देर नियन्त्रण रखा, पर जैसे ही मृत रिश्तेदार की पत्नी-बच्चों ने दहाड़ मारकर रोना शुरू किया, उनकी बत्तीसी खुल गई...। उन्हें देख गुस्से में लोगों ने जो-जो बात कही कि दुम दबाकर उन्हें वहाँ से भागना पड़ा।

 इस भीषण काण्ड के बाद से तो उन्होंने किसी के घर मातम में जाना ही छोड़ दिया। दूसरे तक तो फिर भी चल गया पर अपने घर क्या करते...? पिता की सहसा मृत्यु हो गई; पर तब भी उनका वही हाल रहा। कन्धे पर पिता की अर्थी थी और नीचे उनके चेहरे पर पूरी बत्तीसी खिली हुई थी। रिश्तेदारों ने देखा तो थू-थू किया, “कैसा कपूत जन्मा है चिरौंजीलाल के यहाँ...। देखो तो ज़रा, बाप के मरने पर कैसा हँस रहा...इतना खुश तो कोई दुश्मन के मरने पर भी नहीं होता...।”

पत्नी ने भी रात को आड़े हाथों लिया, “शर्म नहीं आती इस तरह खींसे निपोरते हुए...? अरे, अगर दिल में दुःख नहीं था, तो कम-से-कम झूठमूठ ही दुःख दर्शाकर इज्ज़त बचा लेते। रिश्तेदारों का तो ख़्याल करते। छिः...क्या सोचते होंगे सब...। तुम खुद सोचो कि तुम्हारे मरने पर; अगर तुम्हारा बेटा भी इसी तरह हँसे, तो कैसा लगेगा तुम्हें...?”

और फिर दूसरे ही क्षण पत्नी दहाड़ मारकर रोने लगी, “जब तुम जन्म देने वाले पिता के मरने पर नहीं रोए, तो मेरे मरने पर क्या रो‍ओगे...?”

ऐसी बात नहीं है कि वह अपनी इस आदत से मुक्ति का कोई उपाय सोचने की कोशिश न करते हों। इसी सन्दर्भ में एक बार उन्होंने बुर्का पहनने पर भी विचार किया था; पर फिर जगहँसाई के भय से इस विचार को भी त्याग दिया।

इधर वे एक और संकट में फँस गए थे। पत्नी ने खुद तो उनसे बोलना छोड़ा ही, साथ ही बच्चों को भी सख़्त हिदायत दी थी, “जब तक तुम्हारे बाबू सुधरें नहीं, तब तक उनसे कोई नहीं बोलेगा...।” अब बच्चे ठहरे माँ के परम भक्त...सबने उनसे बोलना छोड़ दिया।

वे रोज़ सुबह हँसते हुए उठते...दीर्घशंका-लघुशंका से निपट मेज पर पहले से रख दिए गए खाने को हँसते-हँसते खाते और ऑफ़िस चले जाते। माँ से उनका अकेलापन देखा नहीं जा रहा था। एक दिन उन्होंने बहुत समझाया, “बेटा, खुश रहना अच्छी बात है; पर दुःख के समय भी तू खींसे निपोरे रहता है, यह भी कोई बात हुई...? यह अच्छी बात नहीं है बेटा...।”

 माँ की यह बात तीर की तरह उनकी अन्तरात्मा को भेद गई। उन्होंने उसी वक़्त प्रण किया...न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी...। आज इसी वक़्त बत्तीसी को उखाड़ फेंकूँगा...मारे गुस्से और क्षोभ के मन-ही-मन उन्होंने यह प्रण लिया पर उस कठिन घड़ी में भी उनकी खुली बत्तीसी से हँसी बरकरार थी। अपनी प्रतिक्रिया उन्हें सामने लगे शीशे में दिखाई दी, तो शीशे को तोड़कर जा पहुँचे दाँतों के डॉक्टर के पास, “डॉक्टर साहब, पूरी बत्तीसी उखाड़ने का आप क्या लेंगे...?”

 डॉक्टर ने उनकी ओर देखा। बत्तीसी खुली देखकर क्रोधित हो गया, “शरम नहीं आती डॉक्टर से मसखरी करते हुए...?”           

वे परेशान हो गए। किसी तरह डॉक्टर को उन्होंने अपनी समस्या समझाई। डॉक्टर को दया आ गई। वह कलयुगी होने के बावजूद पैसे व दया के मामले में सतयुगी निकला। कम पैसे व उससे भी कम समय  में ही उसने उनकी पूरी बत्तीसी उखाड़कर उनके हाथों में थमा दी।

वे बेहद प्रसन्न हुए और प्रसन्नता के आवेग में अपना सारा कष्ट भूल गए। खूब खुश होकर वे घर पहुँचे और पत्नी से बोले, “लो भाग्यवान, जिस कारण से तुम मुझसे नाराज़ रहा करती थी, वह कारण ही मैने जड़ से उखाड़ फेंका।”

कहते-कहते उनका मुँह फिर खुल गया। उनके मुँह का अँधेरा देख पत्नी तो गश खाकर गिर पड़ी। माँ ने देखा तो दहाड़ मारकर रो पड़ी, “अरे, अभी तो मैं ही बैठी हूँ, तो फिर तू कैसे इतना बुढ़ा गया रे...?”

पत्नी भी आते-जाते गुस्से में मुँह फेरकर आगे बढ़ जाती है, “खूसट बुड्ढा कहीं का...।”

अब वे पहले से कहीं अधिक परेशान हैं। पहले जहाँ सिर्फ़ पत्नी और बच्चे उनसे रूठे थे, वहीं अब माँ भी रूठ गई है। उनका घर से बाहर निकलना भी दूभर हो गया है। आदतन उनका मुँह अब भी खुल जाता है, जिसे देखकर लड़कियाँ-औरतें गुस्से से फूट पड़ती हैं, “इस बुढ़ौने को देखो तो सही...मुँह में एक भी दाँत नहीं...क़ब्र में पाँव लटकाए है, फिर भी लड़कियों को देखकर हँसता है...कुत्ता कहीं का...।”

  इन सब दुर्घटनाओं से वे इतने अधिक परेशान हो गए हैं कि अब फिर से बत्तीसी लगवाने के चक्कर में हैं। बस्स, उन्हें तलाश है तो एक दूसरे डॉक्टर की...।                                               

शोधः प्लास्टिकोसिस की जद में पक्षियों का जीवन

  -  अली खान

हालिया अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है कि प्लास्टिक के कारण समुद्री पक्षियों का पाचन- तंत्र खराब हो रहा है। बता दें कि यह पहली बार प्लास्टिक से होने वाली बीमारी का पता चला है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम प्लास्टिकोसिस रखा है। फिलहाल यह बीमारी समुद्री पक्षियों को हो रही है; किन आशंका है कि भविष्य में यह कई प्रजातियों में फैल सकती है।

प्लास्टिकोसिस उन पक्षियों को हो रहा है जो समुद्र में अपना शिकार ढूँढते हैं। शिकार के साथ ही उनके शरीर में छोटे और बड़े आकार के प्लास्टिक चले जाते हैं जिनसे उनके शरीर को नुकसान होने लगता है। धीरे-धीरे वे बीमार होकर मर जाते हैं। वैज्ञानिकों ने प्लास्टिकोसिस की वजह से शरीर पर पड़ने वाले असर को भी रिकॉर्ड किया है। 

इस शोध की रिपोर्ट हैज़ार्डस मटेरियल्स जर्नल में प्रकाशित हुई है। शोध के मुताबिक प्लास्टिक प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि विभिन्न उम्र के पक्षियों में प्लास्टिक की उपस्थिति के संकेत पाए गए हैं। शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया में शीयरवाटर्स पक्षी का अध्ययन करने के बाद यह जानकारी दी है। अध्ययन में बताया गया है कि पक्षियों की आहार नाल के प्रोवेन्ट्रिकुलस नामक अंग की ग्रंथियों के क्रमिक क्षय के कारण यह रोग होता है। इन ग्रंथियों की कमी से पक्षी संक्रमण और परजीवियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ये भोजन को पचाने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

हकीकत यही है कि रोज़मर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक थैलियों, बर्तनों व अन्य प्लास्टिक से उपजा प्रदूषण पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक एक ऐसा नॉन-बायोडीग्रेडबल पदार्थ है जो जल और भूमि में विघटित नहीं होता है। यह लंबे समय तक हवा, मिट्टी व पानी के संपर्क में रहने पर हानिकारक विषैले पदार्थ उत्सर्जित करने लगता है। ये विषैले पदार्थ घुलकर पानी के स्रोतों तक पहुँच जाते हैं। ऐसे में यह लोगों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ फैलाने का काम करता है। एक शोध से पता चला है कि प्लास्टिक के ज़्यादा संपर्क में रहने से खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है जिससे गर्भ में शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुँचता है। प्लास्टिक उत्पादों में प्रयोग होने वाला बिस्फेनाल रसायन शरीर में मधुमेह और यकृत एंज़ाइम को असंतुलित कर देता है। इसके अलावा प्लास्टिक कचरा जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और डाईऑक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इनसे श्वसन, त्वचा और आंखों से सम्बंधित बीमारियाँ होने की आशंका बढ़ जाती है।

सवाल है कि प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम कैसे हो? सर्वप्रथम तो प्लास्टिक के खतरों के प्रति आम लोगों में जागरूकता पैदा करनी होगी। साथ ही सरकारी प्रयासों को गति दी जानी चाहिए। इसमें आम लोगों की सहभागिता को सुनिश्चित किया जाना भी ज़रूरी है। इसके बिना प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण संभव नहीं हो सकेगा। (स्रोत फीचर्स) 

किताबेंः समृद्ध अतीत के सिंहावलोकन का अवसर

 -  पुरु शर्मा , भोपाल

पुस्तक : हिन्दवी स्वराज्य दर्शन 'श्री शिव छत्रपति दुर्ग यात्रा वृतांत'. लेखक : लोकेन्द्र सिंह,  मूल्य : 250 रुपये (पेपरबैक), पृष्ठ 128, प्रकाशक : सर्वत्र, मंजुल पब्लिशिंग हाउस, मालवीय नगर, भोपाल (म. प्र.)

यात्राएँ हमेशा रुचिकर होती हैं। उनका अपना लोक, चरित्र और व्यवहार होता है। यात्रा अपरिचय को परिचय में बदलती है, अज्ञात को ज्ञात में। यायावरी का यही गुण लेखक तथा उसके लेखन को समृद्ध करता है, उसे पैना बनाता है। उद्देश्यपूर्ण यात्राएँ सदैव सार्थक सर्जन का आह्वान करती हैं। चलने से चेतना और बहने से पानी निर्मल होता है। कल्पना के पंखों पर सवार मन जाने कहाँ-कहाँ उड़ता फिरता है। अगर कोलंबस, वास्को डिगामा, मेगास्थनीज आदि ने यात्राएँ न की होतीं, तो अमेरिका को कौन जानता, भारत का इतिहास क्या होता? अमृतलाल वेगड़ जी ने नर्मदा यात्रा न की होती, तो क्या यात्रा-साहित्य नर्मदा माई की अविरलता और प्रवाहशीलता से परिचित हो पाता?
यात्राओं ने हमेशा साहित्य, समाज, संस्कृति और वैचारिकी को माँजा है, पुष्ट तथा समृद्ध किया है। पैरों में पंख बाँधकर उड़ते रामवृक्ष बेनीपुरी हों या यायावरी को याद करते अज्ञेय, 'अजंता की ओर' संघबद्ध कला-कलाप को निहारते जानकीवल्लभ शास्त्री और 'स्मरण को पाथेय बनने दो' की पुकार लगाते विष्णुकांत शास्त्री, सभी ने अपनी यात्राओं में जीवन के नए सूत्रों को खोजा। 
लेखक यात्रा के सहारे इतिहास की कथाओं के कई रास्ते खोलते हुए चलता है। समाज, संस्कृति और अतीत की तह तक पहुँचने का यत्न करता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक और पत्रकार लोकेन्द्र सिंह ने कुछ यही प्रयत्न अपनी पुस्तक  'हिंदवी स्वराज्य दर्शन' के माध्यम से किया है। अपनी यात्रा के दौरान वह इतिहास की उँगली थामें उन दुर्गों तक पहुँचते हैं, जहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य के, हिन्दवी स्वराज्य के उनके संकल्प के और भारतीय गौरव के चिह्न अक्षुण्ण हैं। 
अज्ञेय कहते हैं कि ज्ञान-वृद्धि और अनुभव-संचय के लिए देशाटन उपयोगी है। हिंदवी स्वराज्य दर्शन हमें एक दृष्टि और दिशा देती है। पन्ने दर पन्ने, अध्याय दर अध्याय, पड़ाव दर पड़ाव नई परतें खुलती जाती हैं। दुर्गम रास्तों और कई पड़ावों से गुजरते हुए यह यात्रा अतीत के समृद्ध विरासत तक हमें लेकर जाती है। इसमें प्रकृति के विराट बिंब खिंचे हैं। शैल-शिखरों से घिरी रमणीक उपत्यका का वर्णन है, तो साथ ही सघन अरण्यों के बीच से झाँकते अडिग और अजेय दुर्ग की शौर्यगाथा भी।
सिंहगढ़ दुर्ग से प्रारंभ हुई इस यात्रा में अनेक मंदिर, रमणीय स्थल हमें मिलते हैं, साथ ही लोकमान्य तिलक और सुभाष चंद्र बोस सरीखे वीर क्रांतिकारी भी हमारी स्मृतियों में झाँकते हैं। तानाजी महाराज का पराक्रम और बलिदान हमें उद्वेलित करता है, वो हिन्दवी स्वराज्य की नौसेना के पराक्रम का साक्षी  कोलाबा जलदुर्ग हमें विस्मित करता है। लाल महल के कोने-कोने से शिवाजी महाराज का बचपन हमें उत्साहित करता है, तो वहीं रायरेश्वर और दुर्गदुर्गेश्वर रायगढ़ हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का उद्घोष भरता है।
सचमुच हिंदवी स्वराज्य के दुर्ग एक जीवंत यात्रा हैं, साक्षात् क्रांति पुरुष हैं. जो आज भी भारत, भारतीयता और हमारी अस्मिता को नव ऊर्जा, नव प्रकाश दे रहे हैं। विद्वज्जनों तथा विचारकों ने नागरिकों में देश के सांस्कृतिक गौरव के प्रति अभिमान उत्पन्न करने, आत्मगौरव का भाव जाग्रत करने और गौरवशाली इतिहास से परिचित कराने के लिए हमेशा साहित्य का सहारा लिया। इन्हीं उद्देश्यों को लक्षित कर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने 'सम्राट चंद्रगुप्त' और 'जगद्‌गुरु शंकराचार्य' जैसी कृतियों की रचना की, उन्हें आकार दिया। राष्ट्रीयता के भाव को पोषित करती हिंदवी स्वराज्य दर्शन पुस्तक भी इसी दृष्टि और विचार की परिचायक हैं।
प्रामाणिकता तथा रोचकता से परिपूर्ण यह पुस्तक इतिहास को, स्वराज्य के लिए हुए संघर्ष और बलिदान को निकटता से जानने-समझने का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। एक प्रकार से यह पुस्तक समृद्ध अतीत के सिंहावलोकन का अवसर हमें देती है और अपनी इस अद्वितीय विरासत को बचाने का आग्रह भी करती है।
हिंदवी स्वराज्य से संबंधित महत्त्वपूर्ण स्थानों, व्यक्तियों, घटनाक्रमों की जानकारी देती यह पुस्तक प्रभावाभिव्यंजक और पठनीय है। जो भारत के इतिहास, संस्कृति और युद्ध तथा वास्तु कला कौशल से हमें परिचित कराती है और भारत के लोक-मन की आंतरिकता के उद्घाटन तथा गौरवबोध के जागरण में भी समर्थ सिद्ध होती है। यात्रा के वैचारिक, ऐतिहासिक और साहित्यिक पक्ष को मथकर लेखक ने पाठकों को अतीत के आत्मगौरव का नवनीत दिया है। भावों की तेजस्विता, भाषा के लालित्य और कथा के प्रवाह ने पुस्तक को रोचक भी बनाया, साथ ही ग्रहणीय तथा संग्रहणीय भी। निश्चय ही 'हिंदवी स्वराज्य दर्शन' के रुप में एक महत्त्वपूर्ण अमूल्य निधि पाठकों के हाथ लगी है। 

लघुकथाः झूले का दाम

  -  भावना सक्सैना

शहर में बड़ा पार्क बना था। समाचार पत्र उद्घाटन की तस्वीरों से भरा हुआ था। रेडियो पर, टेलीविज़न के हर चैनल पर पार्क की चर्चा थी। मुनिया नहीं जानती थी 700 करोड़ कितना होता है ;लेकिन जब माँ ने नुक्कड़ की दुकान पर डबलरोटी लाने भेजा तो वहाँ कुछ सुन आई थी और इतना समझ गयी थी कि बहुत बढ़िया पार्क बना है! अपनी कालोनी के सूखी मिट्टी वाले रेलिंग टूटे व गायों के गोबर से भरे पार्क में बहुत दिन से जाना छोड़ दिया था। वहाँ के सभी झूले भी तो टूट चुके थे। बहुत जिद करने पर और माँ के मनाने पर पिताजी रविवार को नए पार्क ले जाने को मान गए। आलू पूड़ी, थर्मस, चिप्स, छोटे अन्नू का बैट-बॉल लिये पार्क पहुँचे तो दरबान ने गेट पर ही सारा खाना रखवा दिया, "अंदर खाना पीना मना है! जाते समय वापस मिल जाएगा; लेकिन बाहर का रास्ता दो नंबर गेट से है। यहाँ तक चलना कर आना होगा!"

अंदर अन्नू ने बॉल उछाली तो तुरंत एक गार्ड दौड़ा आया। - " अरे-अरे-रे ,बोर्ड नहीं देखते,क्या लिखा है - घास पर खेलना मना है!"

ताज़ा खिले गुलाब ने मुनिया की आँखों में चमक भर दी । उसने हौले से पंखुड़ी छुई तो माली चिल्लाया -‘अए लड़की ! फूल क्यों तोड़ रही है!”

वह रुआँसी हो उठी - ‘‘ पापा , मैं तो फूल छू रही थी !”

सुंदरता की फंकी लगा कर ट्रैक पर चलते बाहर निकलने को थे कि एकाएक मुनिया पूछ बैठी – " माँ झूले कितने के आते हैं?"       

जीवन दर्शनःस्वर्ग का मॉल

  - विजय जोशी 

 पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

चार शास्त्र छह उपनिषद बात मिली है दोय
 सुख दीन्हें सुख होत है, दुख दीन्हें दुःख होय 
  
 कुछ
वर्षों पूर्व जब मैं यात्रा के दौरान हाई वे से गुजर रहा था तो मुझे अचानक एक विशाल मार्ट पर लगा विज्ञापन पटल दृष्टिगत हुआ जिस पर लिखा था : स्वर्ग का वस्तु विक्रय केंद्र।  और जब उत्सुकता वश मैं वहाँ उतरा तो उसका बड़ा सा प्रवेश द्वार अपने आप खुल गया और जब तक मुझे एहसास हुआ मैं उस विस्तृत मॉल के अंदर था। एक से बढ़कर एक देवदूत (Angel) मेरा स्वागत कर रहे थे।
 -  उन्हीं में से एक ने आगे बढ़कर ट्रॉली थमाते हुए कहा : बच्चे सावधानीपूर्वक।
-  आदमी की आवश्यकता की हर वस्तु वहाँ उपलब्ध थी और जो एक बार में न उठा सकें उसके लिए दुबारा प्रवेश की भी सुविधा थी।
-  सबसे पहले मैंने धैर्य (Patience) को चुना तो देखा समीप ही प्रेम (Love) उपलब्ध था और उसी के आगे समझदारी (Understanding)। हर चीज़ वहाँ बहुतायत से हासिल थी, सो इन्हें ले लिया। 
- फिर मैंने बुद्धि (Wisdom) के दो बक्से अपनी ट्रॉली में रख लिये। अरे परोपकार (Charity) तथा आस्था  (Faith) भी तो हैं जो मुझे चाहिये थीं। मैंने  पवित्र आत्मा (Holy Ghost) पर भी नज़र रखी तथा उसी की सहायता से शक्ति (Strength) एवं साहस (Courage ) चुन लिया।
-  मेरी ट्रॉली अब तक भर चुकी थी; लेकिन तभी मुझे गलियारे में अनुग्रह (Grace) और मोक्ष (Salvation) मुफ़्त की पर्ची लगी दिखे। चूँकि कोई दाम नहीं लगने अतः मैंने इनकी अधिकाधिक मात्रा चुन ली।
-  और तमाम खरीदी के पश्चात मैं कीमत चुकाने बिलिंग काउंटर की ओर बढ़ा। अपनी आवश्यकतानुसार मैंने सब कुछ चुन लिया था। गलियारे की ओर बढ़ते समय मैंने जब एक रैक में प्रार्थना (Prayer) लिखी देखी, सो उसे भी इसलिए संगृहीत कर लिया, क्योंकि बाहर निकलते ही मैं फिर पाप की दुनिया में प्रवेश कर जाऊँगा। शांति (Peace) तथा आनंद (Joy) अंतिम शेल्फ पर तो गाना (Song) व प्रशंसा (Praise) काउंटर पर एक डोर से  लटके हुए थे, सो मैंने खुद की मदद की। 
-  और अंत में मैंने देवदूत से पूछा : कितने दाम चुकाने हैं मुझे। उसने मुस्कुराते हुए कहा : इन्हें अपने साथ ले जाकर हर दिशा में फैला दो। 
-  पर मेरा प्रश्न अपनी जगह पर कायम था सो मैंने फिर पूछा : कितना भुगतान करना है मुझे।
-  उसने शांत स्वर मधुर ध्वनि सहित कहा : कुछ भी नहीं। तुम्हारा बिल तो स्वयं ईश्वर ने पहले ही चुका दिया है। तुम्हारा उत्तरदायित्व तो इसे आगे विस्तारित मात्र करने का है। 
स्वर्ग नरक किसने देखा है
पाप पुण्य का क्या लेखा है
सुख देने से सुख मिलता है
दुख से दुख मिलता है ।