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Oct 1, 2023

संस्मरणः ईनाम पाने की चाह

अपने लेखन के शुरुआती दिनों से जुड़ा एक प्रसंग अमृता प्रीतम ने एक पत्रिका के स्तम्भ में बताया-

“वो दिन आज भी मेरी आँखों के सामने आ जाता है… और मुझे दिखती है मेरे पिता के माथे पर चढ़ी हुई त्यौरी। मैं तो बस एक बच्ची ही थी जब मेरी पहली किताब 1936 में छपी थी। उस किताब को बेहद पसंद करते हुए मेरी हौसलाफजाई के लिए महाराजा कपूरथला ने मुझे दो सौ रुपये का मनीआर्डर किया थ्। इसके चंद दिनों बाद नाभा की महारानी ने भी मेरी किताब के लिए उपहारस्वरूप डाक से मुझे एक साड़ी भेजी।

कुछ दिनों बाद डाकिये ने एक बार फिर हमारे घर का रुख किया और दरवाज़ा खटखटाया. दस्तक सुनते ही मुझे लगा कि फिर से मेरे नाम का मनीआर्डर या पार्सल आया है। मैं जोर से कहते हुए दरवाजे की ओर भागी – “आज फिर एक और ईनाम आ गया!”

इतना सुनते ही पिताजी का चेहरा तमतमा गया और उनके माथे पर चढ़ी वह त्यौरी मुझे आज भी याद है।

मैं वाकई एक बच्ची ही थी उन दिनों और यह नहीं जानती थी कि पिताजी मेरे अन्दर कुछ अलग तरह की शख्सियत देखना चाहते थे। उस दिन तो मुझे बस इतना लगा कि इस तरह के अल्फाज़ नहीं निकालने चाहिए। बहुत बाद में ही मैं यह समझ पाई कि लिखने के एवज़ में रुपया या ईनाम पाने की चाह दरअसल लेखक को छोटा बना देती है.

कविताः मेरा छोटा- सा गाँव

  -  निर्देश निधि







निर्मला प्रकृति के रंगीन दुशाले में लिपटा

मेरा छोटा सा गाँव


जेठ की दुपहरी में भुनी हुई रेत पर

जलते हुए मेरे पाँव

पके बेरों की ललक में काँटों को धता बताकर

कठखनी झड़बेरियों के रोज़ उमेठना कान

आज भी याद आते हैं मुझे


भादों की अनमनी बरसात में

रपटनी दौड़, चिकने गारे का चंदन चढ़ाए कपड़े

खेल की मौज और माँ की डाँट की काकटेल का नशा

आज भी ताज़ा है मुझमें


चूल्हे के धुएँ हल्के - हल्के उछालती

माँ की कामधेनु- सी रसोई पर पड़ी सुरमई छान

सम्पदाओं से भरी माँ की राजदार साहूकारिणी टाँड 

आज भी भर देती है यादों के खज़ाने मुझमें


बूढ़ी पोखर के चेहरे पर पड़ी गर्वीली झुर्रियाँ

पीपल की पत्तियों की देसी खरताल, उदार घनी  छाँव

अब भी साथ - साथ चलते हैं मेरे


पंचायती चबूतरे पर खड़े

सही – गलत फैसलों की उधेड़ बुन से बेख़बर

समय के अंधड़ों में बेख़ौफ़ जमें बुजुर्ग बरगद के अडिग पाँव

गढ़े हैं कहीं गहरे अब भी मुझमें

डोल, काड्ढी लिये कुएँ से पानी ले जाती

भुरिया भाभी की लचकती चाल

पथवारे में चमनों चाची के उपले पाथते मृदंग पर थाप से हाथ

आते - जाते थपथपा जाते हैं मुझे


दालान के चबूतरों पर बैठे बुजुर्ग

प्रौढ़ स्वरलहरियाँ बिखेरते हुक्के

चिलम पर चढ़े लाल अंगार

अब तक भुनते हैं मेरी यादों की आँच में


आँगन वाले बूढ़े नीम पर

साँझ ढले सूरज की जिम्मेदारियाँ सँभालती- सी

जुगनुओं की जगमग जमात और आले में साँझ का दीपक 

झिलमिला जाते हैं मेरी बंद आँखों में अब भी

गर्मियों की रात खुले आँगन में चाँदनी बन

बगल में सोता हुआ वो ठंडा - ठंडा चाँद

या सर्दियों की सुबह कोहरा बन

फसलों पर तैरता वो पिघला हुआ- सा आसमान

गोधूलि संग कदमताल कर घर लौटते डँगरों की घंटियाँ

मंदिर के घंटों की सहोदर- सी

बज उठती हैं मेरे कानों में अक्सर


पर शहर का षड्यंत्र तो देखो

तुला है सब यादों को शहरी बनाने मे

मुझसे मेरी धरती, मेरे आसमान छुड़ाने में ।


लोक कथाः तराजू और चील

  - डॉ.  उपमा शर्मा

एक गाँव में एक ईमानदार व्यापारी सुखदेव रहा करता था। उसकी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार के कारण उसकी दुकान ख़ूब चलती थी। उसने दुकान के कार्यों में सहायता के लिए रामदीन नाम का एक नौकर रखा हुआ था। रामदीन नज़र बचाकर दुकान के सामान में हेराफेरी कर देता था। ग्राहकों की शिकायत पर सुखदेव ने रामदीन की डाँट लगाई और उस पर नज़र रखने लगा। अब रामदीन हेराफेरी नहीं कर पाता था,  जिस कारण वो सुखदेव से नाराज़ रहने लगा और समय आने पर बदला लेने की ठान दुकान पर काम करने लगा।

दुकान पर रामदीन को ईमानदारी से काम करते देख सुखदेव ने चैन की साँस ली। एक बार सुखदेव को दो दिन के लिए गाँव से बाहर जाना पड़ा। वह रामदीन को दुकान पर ध्यान से काम करने को कह बाहर चला गया। रामदीन दिन भर दुकान पर काम करता और शाम को नियत समय पर घर चला जाता। वापस  जब आकर सुखदेव ने देखा कि रामदीन ने दुकान बहुत अच्छे से सँभाली हुई है, तो वो बहुत ख़ुश हुआ। ग्राहक के आने पर सुखदेव ने सामान तोलने के लिए तराजू देखा, तो वह उसे नहीं दिखाई दिया। उसने तराजू के विषय में रामदीन से पूछा। रामदीन ने बताया कि मालिक तराजू चूहे ले गए। सुखदेव का माथा ठनका। लोहे का तराजू चूहे कैसे ले जा सकते हैं? लेकिन रामदीन अपनी बात पर अड़ा रहा। सुखदेव रामदीन की बदमाशी समझ गया और चुप हो गया।

अब बिना तराजू दुकान का काम बिगड़ने लगा। नया तराजू लेने शहर जाना पड़ता। उसमें कई दिन लगते। सुखदेव तराजू वापस पाने की तरकीब सोचने लगा। अगले दिन सुखदेव ने रामदीन को कहा कि दुकान का काम तुम सँभाल ही लेते हो। मैं नदी पर जाकर नहाने की सोच रहा हूँ। तुम चाहो, तो अपना लड़का साथ भेज दो। मुझे भी पानी -चबैना का सहारा हो जाएगा।

रामदीन ख़ुशी-ख़ुशी मान गया कि लड़का थोड़ा घूम लेगा और । अगले दिन तड़के ही सुखदेव रामदीन के लड़के को लेकर नदी की ओर चला गया। जब शाम को सुखदेव दुकान पर अकेले लौटा, तब रामदीन ने अपने लड़के के विषय में पूछा। सुखदेव ने बताया-“तुम्हारे लड़के को चील उठाकर ले गई।”

रामदीन झगड़ने लगा। सुखदेव अपनी बात पर अड़ा रहा। रामदीन न्याय के लिए राजा के दरबार पहुँचा। राजा ने सिपाहियों से सुखदेव को बुलवाया और पूरी बात सही से बताने को कहा। सुखदेव ने बताया नदी से लौटते समय दो चील आईं । और उनमें से एक उसके लड़के को उठाकर ले गई। राजा नाराज़ हो गया कि सुखदेव लगातार झूठ बोल रहा है। उसने गुस्से में सुखदेव से कहा- सच बताओ नहीं तुम्हें कठोर सजा दी जाएगी। रामदीन रोने लगा-“मेरा लड़का वापस दिलाइए!”

सुखदेव ने कहा-इसके लड़के को चील ले गई।”

रामदीन गुस्से में चिल्लाया –“इतने बड़े लड़के को चील कैसे ले जा सकती है?”

सुखदेव ने कहा- “वैसे ही, जैसे लोहे की इतना बड़ी तराजू चूहे ले जा सकते हैं।”

राजा ने पूरा मामला पूछा। सुखदेव ने बताया कैसे रामदीन ने उसका तराजू गायब कर दिया। उसने कहा, हुजूर बच्चा सुरक्षित है। मैंने बस अपना तराजू पाने के लिए यह सब किया। राजा ने रामदीन को बहुत फटकारा। साथ ही हुक्म दिया कि सुखदेव की तराजू वापस कर दे। इस बार वह उसे छोड़ रहा है। आगे से ऐसा कुछ किया, तो उसे कठोर दंड मिलेगा। राजा ने सुखदेव को उसकी चतुराई पर ईनाम भी दिया। इस तरह चतुराई से सुखदेव ने अपना तराजू वापस पा लिया और रामदीन को सबक भी सिखा दिया।

सम्पर्कः बी-1/248, यमुना विहार, दिल्ली-110053


प्रेरकः आम्रपाली और भिक्षुक

  - निशांत

बुद्ध अपने एक प्रवास में वैशाली आये। कहते हैं कि उनके साथ दस हज़ार शिष्य भी हमेशा साथ रहते थे। सभी शिष्य प्रतिदिन वैशाली की गलियों में भिक्षा माँगने जाते थे।

वैशाली में ही आम्रपाली का महल भी था। वह वैशाली की सबसे सुन्दर स्त्री और नगरवधू थी। वह वैशाली के राजा, राजकुमारों, और सबसे धनी और शक्तिशाली व्यक्तियों का मनोरंजन करती थी। एक दिन उसके द्वार पर भी एक भिक्षुक भिक्षा माँगने के लिए आया। उस भिक्षुक को देखते ही वह उसके प्रेम में पड़ गई। वह प्रतिदिन ही राजा और राजकुमारों को देखती थी पर मात्र एक भिक्षापात्र लिये हुए उस भिक्षुक में उसे अनुपम गरिमा और सौंदर्य दिखाई दिया।

वह अपने परकोटे से भागी आई और भिक्षुक से बोली – “आइए, कृपया मेरा दान गृहण करें।”

उस भिक्षुक के पीछे और भी कई भिक्षुक थे। उन सभी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जब युवक भिक्षु आम्रपाली की भवन में भिक्षा लेने के लिए गया, तो वे ईर्ष्या और क्रोध से जल उठे।

भिक्षा देने के बाद आम्रपाली ने युवक भिक्षु से कहा – “तीन दिनों के बाद वर्षाकाल प्रारंभ होनेवाला है। मैं चाहती हूँ कि आप उस अवधि में मेरे महल में ही रहें।”

युवक भिक्षु ने कहा – “मुझे इसके लिए अपने स्वामी तथागत बुद्ध से अनुमति लेनी होगी। यदि वे अनुमति देंगे, तो मैं यहाँ रुक जाऊँगा।”

उसके बाहर निकलने पर अन्य भिक्षुओं ने उससे बात की। उसने आम्रपाली के निवेदन के बारे में बताया। यह सुनकर सभी भिक्षु बड़े क्रोधित हो गए। वे तो एक दिन के लिए ही इतने ईर्ष्यालु हो गए थे और यहाँ तो पूरे चार महीनों की योजना बन रही थी! युवक भिक्षु के बुद्ध के पास पहुँचने से पहले ही कई भिक्षु वहाँ पहुँच गए और उन्होंने इस वृत्तांत को बढ़ा-चढ़ाकर सुनाया – “वह स्त्री वेश्या है और एक भिक्षु वहाँ पूरे चार महीनों तक कैसे रह सकता है!?”

बुद्ध ने कहा – “शांत रहो। उसे आने दो। अभी उसने रुकने का निश्चय नहीं किया है। वह वहाँ तभी रुकेगा जब मैं उसे अनुमति दूँगा।”

युवक भिक्षु आया और उसने बुद्ध के चरण छूकर सारी बात बताई – “आम्रपाली यहाँ की नगरवधू है। उसने मुझे चातुर्मास में अपने महल में रहने के लिए कहा है। सारे भिक्षु किसी-न-किसी के घर में रहेंगे। मैंने उसे कहा है कि आपकी अनुमति मिलने के बाद ही मैं वहाँ रह सकता हूँ।”

बुद्ध ने उसकी आँखों में देखा और कहा – “तुम वहाँ रह सकते हो।”

यह सुनकर कई भिक्षुओं को बहुत बड़ा आघात पहुँचा। वे सभी इसपर विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि बुद्ध ने एक युवक शिष्य को एक वेश्या के घर में चार मास तक रहने के लिए अनुमति दे दी। तीन दिनों के बाद युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में रहने के लिए चला गया। अन्य भिक्षु नगर में चल रही बातें बुद्ध को सुनाने लगे – “सारे नगर में एक ही चर्चा हो रही है कि एक युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में चार महीनों तक रहेगा!”

बुद्ध ने कहा – “तुम सब अपनी चर्या का पालन करो। मुझे अपने शिष्य पर विश्वास है। मैंने उसकी आँखों में देखा है कि उसके मन में अब कोई इच्छा नहीं है। यदि मैं उसे अनुमति न भी देता, तो भी उसे बुरा नहीं लगता। मैंने उसे अनुमति दी और वह चला गया। मुझे उसके ध्यान और संयम पर विश्वास है। तुम सभी इतने व्यग्र और चिंतित क्यों हो रहे हो? यदि उसका धम्म अटल है तो आम्रपाली भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। और यदि उसका धम्म निर्बल है, तो वह आम्रपाली के सामने समर्पण कर देगा। यह तो भिक्षु के लिए परीक्षण का समय है। बस चार महीनों तक प्रतीक्षा कर लो। मुझे उसपर पूर्ण विश्वास है। वह मेरे विश्वास पर खरा उतरेगा।”

उनमें से कई भिक्षुओं को बुद्ध की बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने सोचा – “वे उसपर नाहक ही इतना भरोसा करते हैं। भिक्षु अभी युवक है और आम्रपाली बहुत सुन्दर है। वे भिक्षु संघ की प्रतिष्ठा को खतरे में डाल रहे हैं।” – लेकिन वे कुछ कर भी नहीं सकते थे।

चार महीनों के बाद युवक भिक्षु विहार लौट आया और उसके पीछे-पीछे आम्रपाली भी बुद्ध के पास आई। आम्रपाली ने बुद्ध से भिक्षुणी संघ में प्रवेश देने की आज्ञा माँगी। उसने कहा – “मैंने आपके भिक्षु को अपनी ओर खींचने का हर संभव प्रयास किया, पर मैं हार गई। उसके आचरण ने मुझे यह मानने पर विवश कर दिया कि आपके चरणों में ही सत्य और मुक्ति का मार्ग है। मैं अपनी समस्त सम्पदा भिक्षु संघ के लिए दान में देती हूँ।”

आम्रपाली के महल और उपवनों को चातुर्मास में सभी भिक्षुओं के रहने के लिए उपयोग में लिया जाने लगा। वह बुद्ध के संघ में सबसे प्रतिष्ठित भिक्षुणियों में से एक थी। (हिन्दी ज़ेन से)

लघुकथाः माँ

 - ऋता शेखर ‘मधु’

आज मैं अपनी सहेली को लेकर अस्पताल गई थी। मैटरनिटी वार्ड में उसे भर्ती किया। सहेली की माँ या सास में कोई पहुँच नहीं पाई थीं इसलिए मैं ही लेकर गई थी । मैं वहीं बाहर बैठी थी। तभी वहीँ एक फ़ैमिली आई। उनके घर भी नया मेहमान आने वाला था। लड़की कम उम्र की ही थी। बातों से लग रहा था कि लड़की के मैके और ससुराल, दोनों ही तरफ़ यह प्रथम सन्तान थी । 

लड़की के साथ दो महिलाएँ आई थीं। दोनों के ही चेहरे पर चिन्ता की रेखाएँ साफ़ झलक रही थीं। लड़की जब अन्दर जाने लगी तो दोनों ने ही उसे प्यार किया । लड़की दोनों को माँ कहकर सम्बोधित कर रही थी। जब वह अन्दर चली गई तो दोनों महिलाएँ वहीं बैठ गईं।

मैं यह तय नहीं कर पा रही थी कि उनमें लड़की की माँ कौन है और सास कौन है। क़रीब एक घंटे के बाद पता चला कि लड़की ने बेटे को जन्म दिया था । दोनों महिलाओं ने गर्म जोशी से एक दूसरे को बधाइयाँ दीं। मैं अभी भी उलझन में थी कि कौन माँ है और कौन सास।

तभी जच्चा और बच्चा दोनों ही बाहर आए । बच्चा नर्स की गोद में था। एक महिला दौड़कर नर्स के पास पहुँची और बच्चे को गोद में ले लिया। उसकी खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी ।

दूसरी महिला लड़की के पास गई और इस कष्ट से उबरने के लिए उसे प्यार करने लगी। एक झटके में ही मेरी समझ में आ गया कि लड़की की माँ कौन थी ।