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Jul 1, 2023

क्षणिकाएँः प्रेम








  -  पारुल हर्ष बंसल

1

प्रेम कब आया

कब गया

इसका भान ही ना हुआ

इसके पाँव में घुँघरू

बँधे होने चाहिए

2

प्रेम को प्रेम ही रहने दो

व्यापार के लिए और

बहुत कुछ है

3

प्रेम पगी बातें हैं

कहीं अधिक मिश्री से भी मीठी

आशंका है श्रवण मात्र से

मधुमेह की

4

 प्रेम है या नहीं

इसका निर्धारण उतना ही कठिन

जितना दर्पण की सच्चाई

5

प्रेमपाश में बंदी को

उम्रकैद नसीब होना

ईश्वर की झोली में

छेद हो जाने -सा है

6

 छोटी बच्ची को

खिलखिलाते देख

प्रेम ने खुद पर नाज़ किया

मैं अभी जिंदा हूँ.....

7

प्रेम ने मुझे 

इस तरह पोसा

अब काँधे पर ही 

बिठा लिया है.....

8

प्रेम बिन जिया जो, 

वो क्या जिया

काबिले- तारीफ तो वो है

जो प्रेम की सभी अवस्थाओं

संग जिया....

9

प्रेम ने सुनी 

सिसकी कानों से

और आ गया 

आँखों के रास्ते से


कविताः यात्रा की थकान


 





 -  रश्मि विभा त्रिपाठी

भँवर में

बुरी तरह से

फँसने पर

सर से पाँव तलक

धँसने पर

मेरी आँखों के गड्ढों में

क्यों नहीं भरा

एक बूँद भी

जल !


सुनो!

सच ये है कि

मैं

नहीं रखना चाहती

अपने पास

हार की

कोई निशानी

दिशाएँ

दोस्त बन करके

दिन- ब- दिन

मुझे समझाती रही हैं

भीड़ में रास्ता

दिखलाती रही हैं

और हमेशा ही

ये जताती रही हैं

कि

कभी न रोना

परिस्थितियों के फेर से

दिग्भ्रमित न होना


मेरी धरती माँ ने

मेरा दामन भरा

आकाश पिता ने

सर पर हाथ धरा

सूरज भाई ने

चिट्ठी में लिखकर

भेजा है पता

मुझे क्षितिज का

तो अब रश्मि को

तुम ही बताओ

क्या करे?

क्यों घबराए- डरें?


कुछ भी हो

फिर भी

नहीं रहना

पलकें भिगोकर

दुख के साथ रहकर भी

दुख के हवाले होकर

मेरा पंथ दूसरा है

भले खुरदरा है

तो भी

वहीं रुकूँगी

जहाँ

समष्टि की

एक बहती निर्झरा है


हाँ!

थक गई हूँ

खा- खाकर ठोकर

खींच रही हूँ

घायल सपनों को

तन्मयता से,

खुद को ढो- ढोकर

मेरी पसलियों पर

भले ही

पड़ रहा है

आज

अत्यधिक दबाव

पर मुझे दिख रहा है

केवल और केवल

मेरा पड़ाव


वहाँ

मील के पत्थर

मेरे स्वागताकांक्षी हैं,

यात्रा की थकान

उतार रहे हैं

वे 

मेरे घायल पाँव धोकर।

सम्पर्कः 363 द, अशोक नगर, तहसील- बाह, जिला- आगरा, उ. प्र.

किताबेंः आमजन की ग़ज़लें ‘दो मिसरों में’

   - डॉ. उपमा शर्मा

पुस्तक : दो मिसरों में (ग़ज़ल-संग्रह): मनीष बादल, मूल्य: रु195, पृष्ठ:116, वर्ष: 2023, प्रकाशक: मंजुल पब्लिशिंग हाउस, सेकंड फ्लोर , उषा प्रीत कॉम्प्लेक्स, 42। मालवीय नगर,भोपाल - 46200
 
शताब्दियों पूर्व अरबी में जन्म लेने वाली, अपनी कोमलता, शृगारिकता, संक्षिप्तता और गहराई के कारण मन मोहने वाली ग़ज़ल अपनी विकास यात्रा तय करते हुए आज हिन्दी के मार्ग पर पूरी शिद्दत से खड़ी हुई है। ग़ज़लगो मनीष बादल अपनी गज़लों में मानव जीवन की रोजमर्रा घटना, दु:ख, पीड़ा, तनाव, अतिवाद, शोषण, अभाव, भूख के विपदाजन्य जीवन क्षणों को प्रस्तुत करने की भूमिका निर्वहन करने की क्षमता रखती हैं। इस संग्रह की ग़ज़लें भी आत्म संवेदनाओं से भरपूर हैं।
यह दौर घोर अनिश्चितताओं, विषमताओं और त्रासदियों का समय है, जिसमें सहज मानवीय संबधों की उष्णता तेजी से घटती जा रही है। नैतिकता हाशिए पर खड़ी आँसू बहा रही है। पूँजी और बाजार के कसते हुए शिकंजे ने आम आदमी की छटपटाहट, गिरते मूल्य, संबधों में उपजी उदासीनता आदि ऐसे सैकड़ों सवाल हैं, जिनका कोई उत्तर नहीं है। मनीष की ग़ज़लों में वर्तमान परिदृश्य के ऐसे सरोकारों को पिरो ग़ज़ल का फ़लक विस्तृत कर दिया है।
धनवानों को देख ग़रीबी बे-बस हो रब से पूछे
मेरा हिस्सा लिखने वाले क्यों ये लापरवाही है।
मनीष की ग़ज़लें सत्ता के षड्यंत्रों तथा मध्यम वर्गीय परिवार की परेशानी को उजागर करती हैं, साथ ही हमारी सामाजिक समस्याओं और सवालों को उनकी जटिलता और जनपक्षीय दृष्टिकोण सहित बख़ूबी व्यक्त करती हैं-
हमने उनको चुनके कुर्सी दी, तो देखा 'सीन' ये
बादशाही ठाठ उनके, हैं रि'आया आम हम।
साहित्य अपने काल का जीवन्त दस्तावेज़ होता है, जो समय-समय पर जीवन में होने वाले परिवर्तित संवेदनाओं और विचारों को सम्यक संतुलन प्रदान करता है। इस सम्यक् संतुलन की अभिव्यक्ति ही साहित्य का सौन्दर्य होता है। कई बार इस अभिव्यक्ति की पूर्णता में रचनाकार के व्यक्तित्व का विलयन हो जाता है और सामाजिक, सांस्कृतिक और मूल्यगत संदर्भों को पिरोते हुए जब रचना रची जाती है। इन सारे गुणों का समावेश मनीष बादल के रचनात्मक संसार में मिलता है। 
चेहरे पर चेहरा इक पहने तीरथ पर जो निकले हैं
ऐसे मानुष को धरती पर भार लिखा करता हूँ मैं।
मनीष की ग़ज़ल पढ़ते हुए स्पष्ट पता लगता है कि मनीष की ग़ज़ल साधना बहुत पुरानी संग्रह की हर ग़ज़ल गुनगुनाने पर कानों में मिश्री- सी घोलती है। कहते हैं अनुभूति कितनी ही जटिल, सूक्ष्म क्यों न हो, ग़जल में रूपान्तरित होने पर वह साधारण पाठकों के लिए ग्राह्य बन जाए, यही रचना की सबसे बड़ी चुनौती है। मनीष की ग़ज़लों में यह चुनौती पूरी तरह निभाई गई है- 
बदलकर सोच तुम अपनी नज़रिया साफ कर लेना
कि' सूरज है कहीं उगता, तुम्हें लगता कि ढलता है।
मनीष की जिजीविषा उन्हें कभी हारने नहीं देती। उनकी जिजीविषा यही सिखाती है कि पंख काटने को तत्पर कितने ही धूर्त शिकारी क्यों न बैठे हों, लेकिन उड़ने का प्रयास कभी नहीं छोड़ो-
पर कटे पंछी का यारो हौसला तो देखिए
उड़ नहीं पाता है लेकिन फड़फड़ाता है बहुत।।
सृजक का तात्कालिक सम्बन्ध प्रकट रूप से समाज से ही होता है और उसकी झलक उसके लेखन में परिलक्षित होती है। मनीष के सृजित समाज का फलक भी बेहद विस्तृत है। अधिकतर ग़ज़लें सामाजिक सरोकार को समर्पित हैं ।
नारी का प्रत्येक रूप वन्दनीय है; परन्तु माँ इस संसार का सबसे प्यारा शब्द है। माँ की तुलना ईश्वर से की जाती है। माँ स्रष्टा होती है। उसे जाति-मजहब तो बहुत दूर की बात है, उसे इंसानों की परिधि में भी नहीं बाँधा जा सकता। मनीष ने माँ को समर्पित बहुत ही ख़ूबसूरत शे'र कहे हैं। 
सँभाला कोख में हमको में हमको है पूरे नौ महीने तक
ये ममता माँ की हम सब पर हमेशा की उधारी है।
आधुनिकीकरण के इस दौर में रिश्तों और समाज पर बाज़ार तेज़ी से हावी होता जा रहा है। वो एक-दूसरे से मिलना-मिलाना, वो दोस्तों के साथ ख़ुश-गप्पियाँ, चाय पकौड़े के साथ चर्चाओं का दौर कहीं गुम हो चुका है। बच्चों का बचपन गुम हो चुका है। इसे मनीष कुछ यूँ कहते हैं- 
मैदानों में ख़ामोशी है गुम-सुम सा माहौल हुआ
बच्चे गायब होते जाते, शाम रहे है संशय में।
ग़ज़लगो की इस पीड़ा को गहराई से समझो, तो यह आज के वक्त की कठिन सच्चाई को स्पष्ट निष्कर्षित करता है। जहाँ तक दृष्टि जायेगी वहाँ तक स्वार्थ की सिद्ध स्थली ही नज़र आएगी।
जुगनू जैसा कम चमकेगा, जल्दी ही मर जाएगा
किंतु न माथा टेकेगा वो सामन्ती दरबारों में।।
जिस तरह के भाव और विचार सामने आते गए उसी के अनुरूप कथ्य को उसी शैली में विस्तार देकर मनीष ग़ज़ल कहते हैं। बड़ी बातों को सहजता से कह देने का हुनर मनीष में बखूबी नज़र आता है। 
इन ग़ज़लों का एक सुखद पक्ष यह भी है कि दुर्गेश उपाध्याय और मोनिका साईं ने इन ग़ज़लों में सुरों की खोज़ की है। इन्होंने मनीष की कई ग़ज़लों को न सिर्फ संगीतबद्ध कर सुर ताल से सजाया है; अपितु अपनी सुमधुर आवाज़ भी दी है। कानों में रस घोलती ये ग़ज़लें मन को सहज की छू जाती हैं। 
ग़ज़ल की भाषा ग़ज़ल को अभिव्यक्ति देने का सिर्फ एक माध्यम ही नहीं; बल्कि वह ग़ज़ल कहने वाले के व्यक्तित्व की सटीक पहचान भी होती है। मनीष की ग़ज़लों की भाषा गूढ़ता और क्लिष्टता से इंकार करती है। संभवतः यह उनके व्यक्तित्व की बेबाकी और खारापन ही है कि संग्रह की तमाम ग़जल एक निष्कपट, निष्कवच और निडर भाषा में लिखी गईं हैं। कहते हैं नए प्रयोग किसी भी विधा को समृद्ध करते हैं। मनीष ने अपनी ग़ज़लों में भाषा का मिथक तोड़ते हुए हिंदी,उर्दू,अंग्रेजी शब्दों का बखूबी इस्तेमाल किया है। यह शब्द इतनी सहजता से प्रयोग किए हैं कि पढ़कर लगता है , इनकी जगह पर कोई और शब्द शायद ग़ज़ल को वो ख़ूबसूरती न दे पाता। 
बहुत से कवि अपने को प्रगतिवादी कहते हैं; पर उन्होंने देश और मजहब के जैसे ही भाषा का भी बँटवारा कर लिया है। ग़ज़ल केवल ग़ज़ल है, उसे हिंदी, उर्दू के शब्दों की परिधि में क्यों बाँधना? आज आम बोलचाल की भाषा में कुछ उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द दूध में शक्कर के जैसे घुल-मिल गये हैं। ये सर्वत्र पाठक को अनूठा स्वाद देते हैं। ऐसे में भाषा विशेष से परहेज़ मुझे तो समझ नहीं आता। अंग्रेज़ी शब्दों के सटीक प्रयोग से इन शे'रों की मिठास देखिए। 
मैं ऑफिस की सभी टेंशन-थकन सब भूल जाता हूँ
कि' इक पुचकार पर बिटिया मेरी जब खिलखिलाती है। 
जेंटलमैनों में जब बैठा तो मैं पाया कुछ ऐसा
वो उतना मधुरस बरसाए, जो जितने ज़हरीले थे।
 स्वयं को व्यक्त करने के लिए उन्होंने भाषा का इस्तेमाल एक सशक्त और मारक अस्त्र के रूप में किया है। मनीष बादल में जहाँ अनुभूति की गहराई है, जीवन-दृष्टि की नवीनता है, वहीं भाषा और अनुभवों को ग़ज़ल मे पिरोने की अद्भुत कला है। आम बोली-बानी में रचे बसे शब्दों को जिस खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है वह शिल्प के स्तर पर बेहद कारीगरी का उदाहरण है। काव्य- भाषा के स्तर पर मनीष जितने आधुनिक, प्रयोगशील दिखते हैं उतने ही वे परम्परावादी एवं परम्परान्वेषी भी दिखते हैं।
वो तो रहती है दिलो-जाँ में उमर भर 'बादल'
जाने क्यों लोग कहें- बेटी पराई होती।
सम्यक् अभिव्यक्ति ही साहित्य का सौन्दर्य होता है जिसमें रचनाकारका व्यक्तित्व विलय हो जाता है। इसमें सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मूल्यगत संदर्भ विद्यमान होते हैं। भाषा इन सारे सबंधों को समाहित करती हुई, इस वैशिष्ट्य को प्राप्त करती है। मनीष एक लोकोन्मुखी शायर  हैं। उनकी रचनाओं में स्पष्ट परिलक्षित होता है कि लोकचेतना को चित्रित तथा जाग्रत करना ही उनका मुख्य लक्ष्य है। मनीष अपनी अनुभूतियों को पाठकों तक सम्प्रेषित करने में पूरी तरह कामयाब हुए हैं। ■■ 
सम्पर्कः बी-1/248, यमुना विहार, दिल्ली-110053

प्रेरकः लौटा लाइए अपने भीतर का बचपन

 - निशांत

कभी-कभी छत पर बनी सिंटेक्स की टंकी की हालत जाँचने के लिए ऊपर चढ़ना पड़ता है. इसमें दिक्कत यही है कि ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ नहीं बनाई गयीं हैं और बाँस की बनी नसैनी की मदद लेनी पड़ती है. इस नसैनी की हालत खस्ता है और कुछ पायदान भी गायब हैं. बीच के पायदानों के बाँस चटक गए हैं और उनको थामने वाली कीलें जंग से कमज़ोर हो चलीं हैं। इस नसैनी का उपयोग करना बेहद खतरनाक है. पैर रखने पर यह कभी भी भसक सकती है और चढ़ने/उतरनेवाले को बड़ी चोट आने की पूरी संभावनाएँ हैं; फिर भी मैं अमूमन दो-एक महीने में एक बार तो इसका उपयोग बेखटके करता आ रहा हूँ।

ऐसा ही कुछ मैं बहुत सी दूसरी चीज़ों के साथ भी करता हूँ। कई दफा पुराने दफ्तर की लिफ्ट अटक जाने पर उसे ताक़त लगाकर खोलता था और दो तलों के बीच से निकलकर बाहर आ जाता था. जानता हूँ कि ऐसे काम बेहद खतरनाक हैं; पर दिल बहुत से खतरे उठाने की इज़ाज़त बेहिचक दे देता है। दिल कहता है, “अभी तो मैं जवान हूँ, मुझे किसी चीज़ से खौफ़ खाने की क्या जरूरत है!”

मैं नई चीज़ें करने से नहीं कतराता। कुछ नहीं जानते हुए भी मैंने कम्प्यूटर और बहुतेरी मशीनों को खोलकर देखा और दुरुस्त करके ही दम लिया। करेंट तो मुझे इतनी बार लग चुका है कि इसका कोई हिसाब ही नहीं है। जब छोटा था तब आठ-नौ सीढ़ियाँ एक साथ कूदकर उतरने में अपनी शान समझता था। अभी कुछ दिनों पहले ऐसा करके देखा तो समझ में आ गया कि ऐसे ‘करतब’ मुझे अब शोभा नहीं देते। इसके बावजूद मैं ऐसी बहुत सी चीज़ें करके देखता हूँ , जिनमें मुझे चोट लगने का अंदेशा होता है। जितने ज्यादा मैंने खतरे उठाए हैं, उतना अधिक ही मैं चीज़ों को और दुनिया को समझ पाया हूँ। खतरे उठाने से मेरा मतलब है नपे-तुले रिस्क के साथ नए काम करके देखना। गाड़ी मैं बहुत सावधानी से चलाता हूँ। कभी हड़बड़ी नहीं करता और मध्यम गति पर ही वाहन चलाता हूँ; क्योंकि यह मेरे और सभी के हित में है।

खैर…खतरे उठाने वाले बहुत से काम हम सभी अपने बचपन में करते थे। पेड़ों पर चढ़ना, झाड़ियों में घुसना, अंगारों से खेलना, खंडहरों में घुस जाना- कुछ तो कौतूहलवश और कुछ जोश में आकर हम खुद को खतरे में डालकर भी नया सीखते थे।

बड़े होने पर हमने यह सब करना बंद कर दिया। इसके पीछे कई कारण थे। सबसे बड़ी वज़ह तो यह थी कि हमें सिद्धांततः बहुत सी बातें समझ में आने लगीं; इसलिए उन्हें आजमाकर परखने की जरूरत ख़त्म हो गई। एक और अहम वज़ह यह भी रही कि हर चीज़ को करके देखने के लिए हमने जितने दर्द सहे उनके एवज में हमें कुछ कीमती चीज़ नहीं मिली। नतीज़तन, हम अपना बचाव करना सीख गए।

इस सबसे एक नुकसान हुआ- हम तो खुद को महफूज़ रखने में कामयाब रहे;  पर खतरे उठानेवाले फायदे में रहे। जिन व्यक्तियों ने यथास्थितिवाद को उचित माना उनकी दुनिया वहीं थम गई। मुश्किल तो यह है कि वे समझ ही नहीं पाते कि दूसरे उनसे आगे क्यों निकल गए। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि दूसरों से आगे निकलने के मेरे मापदंड कुछ अलग हैं। मैं उस व्यक्ति को दूसरों से आगे मानता हूँ, जो हर पल कुछ-न-कुछ सीखता और आतंरिक विकास करता रहता है। दूसरों से ज्यादा कमाई करना या अधिक धन जुटा लेना, आगे बढ़ने या बड़े होने का बड़ा लचर पैमाना है।

इस तरह मैं अपनी दुनिया को हमेशा घूमती-डोलती देखना चाहता हूँ। मैं अपनी नौका किनारे के खूँटे से बँधी नहीं देख सकता। किसी बड़े आदमी ने कहा भी है - “नौकाएं किनारे पर सबसे सुरक्षित होती हैं; लेकिन नौकाओं को किनारे पर बाँधने के लिए नहीं बनाया जाता।” आप भी अपनी नौका को किनारे पर कूड़ा-कचरा भरता नहीं देखना चाहेंगे।

ग्रीक दार्शनिक अनाक्सागोरस ने कहा था, “हाथों की उपस्थिति के कारण ही मनुष्य सभी प्राणियों में सर्वाधिक बुद्धिमान है।” चीज़ों को बेहतर तरीके से उठाने और थामने की हमारी योग्यता हमें अपने परिवेश में सबसे आगे रखती है। अपने अँगूठे और उँगलियों की मदद से हम दाना चुनने से लेकर हथौड़ा पीटने जैसे काम बखूबी अंजाम देते हैं और हमारा दिमाग इस तथ्य को जानता है कि हमें कौन- सा काम किस तरह करना है। अपने दिमाग को प्रशिक्षित करने के लिए हमें बचपन से ही विविधतापूर्ण काम करके देखने चाहिए।

कुछ भी नया करते समय भीतर से भय का स्वर उठता है। इस भय का सामना करना किसी भी उम्र में सीखा जा सकता है। खुद को यह बार-बार कहने की ज़रूरत है, “हाँ, मुझे चोट लग सकती है; पर एक बार करके देखने में क्या हर्ज़ है?”, “इसे करके देखना चाहिए”, “यह इतना मुश्किल भी नहीं लगता कि मैं कर न सकूँ”, “करके देखते हैं, ज्यादा-से-ज्यादा नाकामयाब ही तो रहेंगे!”

मेरे दोनों बच्चे दिए की लौ छूने के चक्कर में उँगलियाँ जला चुके हैं। बेटे ने तो एक बार सब्जी मार्केट में गैस बत्ती की रक्त-तप्त जाली को ही पकड़कर मसल दिया। दोनों ने ऐसे कई काम कई बार किए और उन्हें चुप कराने में हमें नानी याद आ गई, लेकिन यह उनके लिए बड़ा सबक था। ढाई साल की बिटिया अब बहुत होशियार है और जलते दिए/मोमबत्ती/अगरबत्ती से दूरी बनाकर चलती है। बच्चों को बिस्तर से नहीं गिरने देने के हर संभव प्रयास करने के बाद भी अभी भी कोई-न-कोई किनारे से टपक जाता है। एक मिनट का रोना, कभी तो झूठमूठ कर, फिर वही धमाचौकड़ी चालू। पहले तो मैं इन चीज़ों से बहुत घबरा जाता था; पर अब यह जान गया हूँ कि गिरना-पड़ना-जलना उनकी विकासयात्रा का अनिवार्य चरण हैं, बस इनकी पुनरावृत्ति न हो और हमेशा अहतियात बरता जाए।

हम मनुष्य सभी प्राणियों में सर्वाधिक तेजी से सीखते हैं। अपनी गलतियों से सबक लेने में हमें महारत हासिल है। हमने अपनी भौतिक सीमाओं का अतिक्रमण करना सीख लिया है, केवल मानसिकता ही हमें अक्सर पीछे धकेल देती है। प्रयोगधर्मिता मनुष्यों का बहुत महत्त्वपूर्ण गुण है। यही सफल व्यक्ति को असफल से पृथक् करता है। दफ्तर में पिछले दस सालों से काम करने के नाते मैं जानता हूँ कि जो व्यक्ति प्रयोगधर्मी होता है, वह कार्यकुशल भी होता है और अपने कार्य का बेहतर निष्पादन करता है। यह बात और है कि ऐसे व्यक्ति पर और अधिक कार्य लाद दिया जाता है और वह बहुधा अपने काम के साथ-साथ कुछ निठल्लों का काम भी निपटाता रहता है; लेकिन इस मुद्दे पर बात करना विषयांतर हो जाएगा। सारी बात का लब्बोलुआब यह है कि नए प्रयोग और नई चीज़ें करके देखते रहना हमें आगे ले जाता है और यथास्थितिवादी बने रहना जड़ बना देता है।

लौटा लाइए अपने भीतर अपना बचपन… जब आप जिज्ञासा एवं ऊर्जा से भरपूर थे और कुछ भी नया देखने-करने के लिए आपको किन्हीं प्रेरक पोस्टों की जरूरत नहीं पड़ती थी।

डिस्क्लेमर : जानबूझकर खतरे मोल न लें और अपने बच्चों को खतरनाक चीज़ों से दूर रखें। मैं सीढ़ी का सुरक्षित विकल्प तलाश रहा हूँ  (हिन्दी ज़ेन से )  ■■

लेखकों की अजब गज़ब दुनियाःनियम बनाकर चलने वाले लेखक

 - सूरज प्रकाश

ई बी व्‍हाइट अपने लेखन के बारे में लिखते हैं कि मैं काम करते समय संगीत नहीं सुनता। मुझमें ध्‍यान देने का इतना माद्दा नहीं है। हाँ, छोटे मोटे व्‍यवधानों के बीच मैं काम कर लेता हूँ। मेरे घर में जो बैठक का कमरा है, घर भर की सारी गतिविधियाँ वहीं से होती हैं। वहीं से तहखाने में जाने का रास्‍ता है। रसोई में जाना हो, तो वहीं से गुजर कर जाना होगा।  फोन भी एकदम पास ही रखा होता है। यानी हर समय वहाँ चहल पहल रहती है; लेकिन ये कमरा उजास लिये हुए है। आसपास बेशक मेला चल रहा हो, मैं यहीं बैठ कर लिख लेता हूँ। नतीजा ये होता है कि मेरे घर के लोग इस बात की जरा- सी भी परवाह नहीं करते कि ये बंदा लेखक है। वे शोर गुल करते रहते हैं। अगर मैं इनसे ज्‍यादा ही परेशान हो जाऊँ, तो वहाँ से दूर जाने के लिए मेरे पास जगहें हैं। अगर लेखक इस बात का इंतज़ार करता रहे कि उसे लिखने के लिए आदर्श स्‍थितियाँ चाहिए, तो माफ करना, वह एक भी शब्‍द लिखे बिना मर जाएगा।

ओरहान पामुक
ओरहान पामुक अभी भी पेन से लाइनों वाले काग़ज़ पर लिखते हैं। तय करके लिखते हैं और समय बरबाद नहीं करते। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्‍हें घर पर लिखना अजीब लगता है। उन्हें हमेशा एक दफ़्तर चाहिए, जो घर से अलग हो, जहाँ वे सिर्फ़ लिख सकें। वे घर में लिखने की मजबूरी से अलग ही ढंग से निपटते हैं। वे सुबह उठते हैं, नहाते-धोते हैं, नाश्ता करते हैं, बाक़ायदा फॉर्मल सूट पहनते हैं और पत्‍नी से यह कहकर घर से निकल पड़ते हैं कि मैं ऑफिस जा रहा हूँ। पंद्रह-बीस मिनट सड़क पर टहलने के बाद वे घर लौट आते हैं, अपने कमरे में घुसते हैं और उसे अपना ऑफिस मान लिखने लग जाते हैं।
जेम्‍स जॉयस सफेद कोट पहनकर पेट के बल बिस्‍तर पर लेट जाते। हाथ में लंबी नीली पैंसिल होती। वे कार्ड बोर्ड पर क्रेयान से लिखते। इस तरह की हरकत के पीछे कोई सनक या वहम की बात नहीं थी। दरअसल उन्‍हें ठीक से दिखना बंद हो गया था। बचपन में आँख में हुई तकलीफ बीस बरस की उम्र आते आते परेशान करने लगी थी और कोढ़ में खाज ये हुआ कि जब वे पच्‍चीस बरस के थे तो बुखार से ये हालत हो गयी कि उन्‍हें 25 बार आँखों के ऑपरेशन कराने पड़े; लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब यही तरीका बचता था कि बड़े से क्रेयान से जो लिख पाते, वही देख पाते थे। सफेद कोट से कागज पर रात के वक्‍त ज्‍यादा रौशनी पड़ती। इसके बावजूद उन्‍हें अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। वे मानकर चलते थे कि अगर पूरे दिन में ढंग के दो पूरे वाक्‍य भी लिख लिये तो दिहाड़ी पक्‍की समझो।

• विक्‍टर ह्यूगो जब द हंचबैक ऑफ नोत्रेदम लिखने बैठे, तो अपने लिए बेहद मुश्‍किल से लगने वाली समय सीमा तय कर ली। वे स्‍याही की एक पूरी बोतल खरीद लाए और एक तरह से अपने आपको घर में कैद कर लिया। वे घर से बाहर ही न निकलें इसके लिए उन्‍होंने एक नायाब तरीका अपनाया। अपने कपड़े उन्‍होंने ताले में बंद करके रख दिए; ताकि बाहर जाने का लालच ही न रहे। बस, एक भूरी- सी शॉल ओढ़कर बैठे रहते। उन्‍होंने मौके -बे मौके के लिए पंजों तक आने वाला बुना हुआ एक लबादा- सा खरीद लिया था, जो कई महीने तक उनकी पोशाक बना रहा। किताब तय समय सीमा से पहले ही पूरी हो गयी थी। अलबत्‍ता, स्‍याही की पूरी बोतल खाली हो चुकी थी। वे तो इस किताब का नाम ही ये रखना चाहते थे – स्‍याही की बोतल से क्या हासिल हुआ, लेकिन बाद में ये नाम रहने दिया।

विलियम फॅाकनर जब लिखते थे, तो खूब व्हिस्की पीते थे। जितनी शराब अंदर, उतना लेखन बाहर। मजे की बात वे खुद दारू बनाने वाली कंपनी में काम करते थे।

अमरीकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजेन एक लंबे राइटर्स ब्लॉक के दौरान जब कुछ नहीं लिख पा रहे थे, तो उन्होंने तंबाकू खाना शुरू कर दिया। यह आदत उनके लेखक मित्र डेविड फ़ॉस्टर वैलेस में थी। वैलेस की आत्महत्या के बाद वह आदत उनमें आ गई। जब वे लिखते हैं, तो अपने पुराने डेल के लैपटॉप के
आगे ज़ोर-ज़ोर से अपने डायलॉग्स बोलते हैं। छह घंटे के लेखन-सेशन के बाद उनका गला बैठ जाता है और यह लगभग रोज़ की बात है।

सलमान रश्दी
सलमान रश्दी सुबह उठने के बाद पहला काम जो करते हैं, वह है लिखना। बैठते ही पढ़ेंगे कि कल क्या- क्या कितना लिखा था। फिर आगे लिखने का काम शुरू होगा। तीन घंटे लिखने के बाद पहला ब्रेक। फिर दुनियादारी। शाम को पेज तीन वाली जि़ंदगी में घुसने से पहले एक बार फिर पढ़ेंगे कि सुबह क्या क्या- लिखा था। फिर अगली सुबह छुएँगे। कोई करेक्शन हुआ, तो वह भी अगली सुबह। मिडनाइट्स चिल्ड्रेन लिखते समय वे नौकरी कर रहे थे। पाँच दिन नौकरी बजाते थे, पाँचवीं शाम घर पहुँच घंटा-डेढ़ घंटा गरम पानी में नहाते, फिर लिखने बैठ जाते। सोमवार की सुबह तक सोते-जागते लिखते, फिर अपने काम पर चले जाते, पाँच दिन के लिए।

द काइट रनर के प्रसिद्ध लेखक खालिद हुसैनी लिखते हैं कि मैं ऐसे कई लोगों से मिलता हूँ जो बताते हैं कि उनके दिमाग में एक किताब बस तैयार है; लेकिन वे एक शब्‍द भी नहीं लिखते। लेखक होने के लिए आपको सचमुच लिखना पड़ता है। आपको हर दिन लिखना होता है। और आपको अच्‍छा लगे या बुरा लगे, लिखना होता है। शायद सबसे जरूरी बात ये होती है कि आपको श्रोता के लिए लिखना होता है। ये श्रोता आप खुद होते हैं। वह कहानी लिखो, जो आप सुनाने की ज़रूरत महसूस करते हैं और जो कहानी आप पढ़ना चाहते हैं। ये पता करना बहुत ही मुश्किल होता है कि दूसरे क्‍या चाहते हैं, इसलिए ये सब जानने में समय बरबाद न करें। जो कुछ भी आपकी आँखों के सामने है उसे लिखें और वह सब लिखें जो आपकी रातों की नींद खराब करती हैं।

अंग्रेजी के लेखक नाथन इंगलैंडर लिखते हैं कि लिखते समय अपना मोबाइल बंद कर दें। सच तो ये है कि अगर आप काम करना चाहते हैं तो आपको अलग रहने की कला आनी  चाहिए। कोई एसएमएस नहीं, ईमेल नहीं, फेसबुक नहीं, कुछ भी नहीं। आप जो कुछ भी कर रहे  हों लिखते समय सब बंद कर देना चाहिए। आपको जान कर हैरानी होगी कि जब मैं लिखता हूँ, आसपास भले ही सन्‍नाटा हो, मैं कानों में ईयर प्‍लग घुसेड़े रहता हूँ।

जापानी लेखक हारुकी मुराकामी बताते हैं कि जब मैं उपन्‍यास लिखने के मूड में होता हूँ, तो सुबह चार बजे जग जाता हूँ और पाँच से छह घंटे काम करता हूँ। दोपहर के वक्‍त मैं दस किलोमीटर की दौड़ लगाता हूँ या डेढ़ किलोमीटर की तैराकी करता हूँ या दोनों ही करता हूँ। तब कुछ देर पढ़ता हूँ और कुछ संगीत सुनता हूँ। रात नौ बजे मेरा सोने का समय होता है। मेरे इस रूटीन में कोई बदलाव नहीं आता। दोहराव ही सबसे अहम हो जाता है। ये एक तरह से मन को वश में करने की तरह की बात है। मैं अपने दिमाग की गहराई तक पहुँचने के लिए अपने आपको सम्‍मोहित करता हूँ;  लेकिन इस दोहराव को लंबे समय तक, छह महीने से एक बरस तक चलाना बहुत अधिक मानसिक और शारीरिक मेहनत की माँग करता है। एक तरह से कहें तो लंबा उपन्‍यास लिखना जीवित रहने के प्रशिक्षण की तरह  है। शारीरिक श्रम भी कलात्‍मक संवेदना की तरह जरूरी होता है।

हेनरी मिलर ने अपने लेखन के लिए जो रूटीन बनाया था, वह बेहद रोचक है: एक वक्‍त में एक ही काम और उसके खत्‍म हो जाने तक उसी पर डटे रहो। अधूरे कामों की सूची बढ़ाने की जरूरत नहीं। कोई नई किताब या नया काम हाथ में मत लो। तनाव में आने की जरूरत नहीं। धीरज से काम करो, काम में खुशी तलाशो, जो भी काम हाथ में हो, पूरी शिद्दत से करो। तय कार्यक्रम के हिसाब से काम करो न कि मूड के हिसाब से। ठीक वक्‍त पर काम बंद। जब आप रच नहीं सकते, तब काम कर सकते हैं। जमीन धीरे धीरे पुख्‍ता करें। रोजाना नई खाद डालने से कुछ नहीं होने वाला। संबंध बनाए रखें, लोगों से मिलें जुलें, घूमें, मन करे तो शराब की चुस्‍की लें। गधे की तरह काम न करें। खुशी-खुशी काम करें। मन न करे तो तयशुदा कार्यक्रम छोड़ दें; लेकिन अगले दिन उसी पर लौट आएँ। ध्‍यान लगाएँ। लक्ष्‍य पर ध्‍यान दें। उन किताबों को भूल जाएँ जो आप लिखना चाहते हैं। सिर्फ उसी के बारे में सोचें, जिस पर काम कर रहे हैं। लेखन पहले और लेखन हमेशा। पेंटिंग, संगीत, दोस्‍त, सिनेमा, सब चीजें बाद में आती हैं। (क्रमशः)  ■■