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Mar 1, 2023

कविताः 8 मार्च महिला दिवस- सोई हुई औरतें

 - डॉ. शिप्रा मिश्रा

सोई हुई औरतें

मधुमक्खियों की तरह

शहद भी रखती हैं

और डंक भी

कभी भूल कर भी मत देखना

उनकी दहलीज पर

बहुत फर्क है

तुममें और उनमें

तुम खड़े रहते हो

अपने चौगान पर

लेकिन रख नहीं पाते

उसे सुरक्षित

औरतें घर की अँधेरी

सुराखों से भी

परख लेती हैं

किसी की लोलुप निगाहें

इन्हें बहुत भाती हैं

टहटह लाल सेंदूर

इन्हें लुभाती हैं

रंग- बिरंगी चूडियाँ

पर..

भूलना मत

इनकी आँखों में

एक आग भी होती है

जो जला सकती है

पल भर में

तुम्हारा वजूद

ललित लेखः चिठ्ठी आई है...

 - प्रियंका गुप्ता

अभी दो-चार दिन पहले दरवाज़े पर दस्तक हुई, जाकर देखा तो डाकिया था। सोचा, शायद रजिस्ट्री से कोई पुस्तक आई हो, पर नहीं, डाकिया तो हाथों में एक लिफ़ाफ़ा लिए खड़ा था। ‘लिफ़ाफा देख के मजमून भाँपने’ के ज़माने तो कब के चले गए, फिर भी इतना अन्दाज़ा तो लग ही गया कि वो कोई किताब या मैगज़ीन नहीं, एक ख़त था।

ख़त और इस ज़माने में...? जितनी हैरानी मुझे हुई यह सोच कर कि ऐसा कौन है जो अब भी कागज़-क़लम लेकर पत्र लिखने बैठा होगा, उतना ही हल्का-फुल्का अचरज़ डाकिया के चेहरे पर भी दिखा। जाने क्यों पत्र हाथ में लेकर एक अनजानी-अनचीन्ही खुशी भी महसूस हुई। एक झटके से जैसे पुरानी यादें दिमाग़ में रील की तरह चल गई। बचपन की यादें...किशोरावस्था की यादें...और कुछ साल पहले तक की भी यादें...। चिठ्ठियों का आना और जाना...राह चलते डाकिया के मिल जाने पर पूछना...भैया, कोई चिठ्ठी है हमारी...? और उसका ‘इंकार’ में गर्दन हिलाते हुए आगे बढ़ जाने पर थोड़ा मायूस हो जाना। बिना किसी खास इंतज़ार के भी वो बार-बार जाकर लेटर-बॉक्स खोल कर देखना...सब जैसे सदियों पुरानी बातें लगती हैं। याद नहीं पड़ता, पिछला ख़त कब और किसने लिखा था मुझे। सच कहूँ, तो कागज़-क़लम लेकर मैंने आखिरी ख़त कब और किसको लिखा, मुझे खुद भी यह याद नहीं।

ज़रा याद कीजिए वो पहले के भूले-बिसरे पल...दीवाली हो या फिर नया साल...न केवल ग्रीटिंग कॉर्ड खरीदने या बनाने का शौक परवान चढ़ता था, बल्कि कुछ अपनों को हम महज ग्रीटिंग से ही नहीं, वरन अपने पत्रों से अपनी उपस्थिति जताने के ख़्वाहिशमन्द रहा करते थे। घरवालों के लिए मेरी पूरी कोशिश रहती थी कि उनको मैं अपने हाथ से बना हुआ कॉर्ड दूँ। यह आदत मैंने एक लम्बे समय तक चुनमुन (प्रांजल) के अन्दर भी बरकरार रखी। वैसे भी वह ड्राइंग-पेण्टिंग का इतना शौकीन था कि खुशी-खुशी इस काम को अंजाम देता था। हाँ, कॉर्ड के अन्दर हर व्यक्ति के हिसाब से चुन-चुन के कुछ लिखने का काम तब भी मेरा ही होता था। कारण सिर्फ़ दो हुआ करते थे, पहला यह कि मेरी लिखावट में काटा-पीटी नहीं हुआ करती थी...और दूसरे, चुनमुन के बहाने ही सही, पर मैं भी अपना बचपन एक बार फिर जी लिया करती थी।

बचपन में जब भी किसी भी अवसर पर मुझे ग्रीटिंग कॉर्ड्स मिला करते थे, मुझे उन्हें अपनी नज़रों के सामने रखना बहुत भाता था। जाने क्यों उन सबसे एक अपनेपन की खुशबू सी आती थी। अब टेबिल या कमरे की अलमारी पर तो इक्का-दुक्का कॉर्ड ही जगह पा सकते थे न...? (और वैसे भी उस ज़माने में हम दो कमरों के किराए के मकान में हुआ करते थे) तो फिर बाकी के कॉर्ड्स...? इसका एक बहुत बढ़िया हल निकाल लिया था मैंने...एक मोटे कॉर्डबोर्ड पर उनका एक कोलाज़ जैसा बना लेती थी। बाकायदा वेल्वेट पेपर, रंगीन टेप, सितारों और शीशों से उस कोलाज़ को सजाती और फिर एक खूबसूरत कलाकृति तैयार हो जाती। एक अर्सा बीत जाने पर जब नए कोलाज़ का वक़्त आता, तो बड़े सम्हाल कर उन पुराने कॉर्ड्स को निकाल कर अपने ख़ज़ाने का हिस्सा बना लेती। जाने कितने बरसों तक यह सिलसिला चलता रहा, पर जब किराए के मकान से निकल कर अपने मकान में कदम रखा, तो कई दिनों में धीरे-धीरे सैटिल होने के बाद भी जब मुझे अपना ख़ज़ाना नहीं मिल पाया, तब जाकर यक़ीन हुआ कि मकान बदलने की आपाधापी में मेरा वो अनमोल यादों का पिटारा अब सिर्फ़ यादों में ही रह गया था। उसके बाद पता नहीं क्यों, मन कुछ ऐसा उचटा कि कॉर्ड्स हर साल भले सम्हाल के रखती रही, पर उनका कोलाज़ फिर कभी नहीं बना पाई। कभी-कभी बचपन का वो बीता हुआ वक़्त...वो कोलाज़...और वो लम्हें, सब बड़ी शिद्दत से याद आते हैं। पर सच कहूँ...यादों का कोलाज़ तो आज भी सजता है मेरे मन की किसी दीवार पर...और कभी किन्हीं फ़ुर्सत के लम्हों में उन्हें ताक मैं आज भी मुस्करा देती हूँ।

मेरी पीढ़ी के लोग शायद इस धरती पर आखिरी होंगे जिन्होंने चिठ्ठियाँ लिखी होंगी। आठ-दस लाइनों में लिखे जाने वाले पोस्टकार्ड से लेकर एक छोटी-मोटी कहानी जितने पन्नों वाली चिट्ठियाँ भी...। फिर उन चिट्ठियों को डाक में डालने के बाद उनके जवाब का जो एक बेसब्र इंतज़ार का वक़्त होता था, उसकी मीठी कसक की बात ही कुछ और थी। पत्र का जवाब मिलने पर चेहरे का खिल जाना...घर के दूसरे सदस्यों को इकट्ठा कर के उस चिट्ठी को ज़ोर-ज़ोर से बाँचना...फिर उस पर सबकी टीका-टिप्पणी...आज की पीढ़ी कहाँ जानती है ये सब...?

आज के बच्चों ने शायद ही चिट्ठी में बसी उस गंध को महसूस किया हो...एक ही ख़त को बारम्बार पढ़ने का सुख जाना हो। कभी पुराने कागज़ों को टटोलते वक़्त उनके बीच दबे किसी अपने के ख़त के मिल जाने पर होने वाली खुशी को महसूसा हो।

आज कम्प्यूटर-मोबाइल के चटपट-फटाफट मैसेज से हर पल ‘कनेक्टेड’ रहने वाली बेसब्र हो चुकी है और बहुत हद तक सम्बन्धों की गर्माहट के प्रति बेपरवाह भी...। दिनों-हफ़्तों-महीनों किसी अपने के जवाब का इंतज़ार करने का धैर्य नहीं बचा आज ‘टू मिनट्स नूडल्स’ से झट से पेट भरने वाली पीढ़ी के अन्दर। आज मल्टीटास्किंग के युग में रिश्ते निभाना भी बस एक टॉस्क ही रह गया है। यहाँ उँगलियों की जुम्बिश से पट से रिश्ते बनते हैं और चट से टूट भी जाते हैं।

आज मशीन पर लिखे जाने वाले संदेशे भी मानो मशीनी हो गए हैं। हम स्माइली बनाते हैं, पर मुस्कराते नहीं। हम दिल भेजते हैं, पर पत्थर के...। एक ईमेल या मैसेज में हम सब कुछ दर्शा सकते हैं। सुख-दुःख... हँसना-रोना... प्यार-गुस्सा... शायद हर एक भाव...पर फिर भी भावना-रहित...। इनमें फूल ही नहीं, गुलदस्ते भी हैं, पर खुश्बू नही। हँसी है, पर खिलखिलाहट नहीं...रोना है, पर आँसुओं से भीगते पन्ने नहीं...दिल है, पर प्यार नहीं...। हम सिर्फ़ कनेक्टेड हैं, पर हममें जुड़ाव नहीं।

आज भी मुझे कभी चिट्ठियों की याद आती है तो उनसे जुड़े चेहरे याद आते हैं। उसमें लिखी कितनी बातें अब भी दिमाग़ में उतनी ही शिद्दत से ताज़ा हैं। लेकिन आप कभी किसी ईमेल या मैसेज के बारे में सोच कर देखिए...क्या लिखा था, याद भी है आपको? अपनी लिखी चिट्ठियों से मुझे वो अपने याद आते हैं जो वक़्त के बहाव में जाने कहाँ चले गए। अपनी दुनिया में मस्त-मगन...पर फिर भी शायद किन्ही पलों में सिर्फ़ चिट्ठी की वजह से वो भी मुझे याद करते होंगे।

अपनी एक ऐसी ही बिछुड़ी, लगभग हम‍उम्र मौसेरी बहन से लगभग पन्द्रह साल बाद मिली मैं...राह चलते...(राह चलते इस लिए क्योंकि दुनिया की तमाम फ़सादातों की तीन वजहों में से एक के कारण उनसे हमारा रिश्ता ख़तम हो चुका है) तो पुराने सगे रिश्तों की ख़ातिर हम दोनों ही पूरी गर्मजोशी से मिल लिए। हम दोनों ने बरसों एक-दूसरे को लम्बे-लम्बे ख़त लिखे थे। ख़तों के माध्यम से ही हम न जाने कितनी बातें शेयर करते थे। दस मिनट की इस मुलाक़ात में एक बार फिर बिछड़ते वक़्त उनके शब्द यही थे, “तुम्हें याद है...हम लोग खर्रा (लम्बी चिट्टी) लिखा करते थे एक-दूसरे को...। कितने अच्छे दिन थे न वो...?" पल भर के लिए सिर्फ़ इस एक याद से हम दोनो वही पुरानी सहेलियों-सी बहनें हो गई थी...‘आँखों में नमी, हँसी लबों पे...’ वाली स्टाइल में...।

उनसे उस दिन बिछड़ने के बाद शायद हम दोनों फिर कभी न मिल सकें...पर एक सवाल अब भी मेरे मन में आता है। अगर ख़तो-किताबत का सिलसिला हम दोनो के दरमियाँ कायम रहता तो क्या मेरी चिठ्ठियों पर गिरकर सूख चुके मेरे आँसू हमारे रिश्ते को सूखने से बचा लेते...?

आपके उत्तर की प्रतीक्षा तो रहेगी ही न...।

सम्पर्कः एम.आई.जी-292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र), ईमेल:  priyanka.gupta.knpr@gmail.com, ब्लॉग: www.priyankakedastavez.co.in

वैश्विक पुनर्चक्रण दिवस 18 मार्चः प्लास्टिक प्रदूषण के समाधान के लिए वैश्विक संधि

पिछले कुछ वर्षों से प्लास्टिक उत्पादन में काफी तेज़ी से वृद्धि हुई है। वर्ष 2050 तक इसका उत्पादन प्रति वर्ष एक अरब टन होने की संभावना है। इसके चलते प्लास्टिक प्रदूषण में वृद्धि निश्चित है। इस समस्या से निपटने के लिए उरुग्वे में 150 से अधिक देशों के बीच एक बैठक का आयोजन किया जा रहा है।

गौरतलब है कि गत वर्ष मार्च में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा ने निर्णय किया था कि प्लास्टिक कचरे को नियंत्रित करने के लिए एक बाध्यकारी संधि लाई जाए। इस संधि में प्लास्टिक उत्पादन से लेकर उसके निपटारे तक के संपूर्ण जीवनचक्र को शामिल किया जाएगा। इस संधि को 2024 तक अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। इस अवधि में राष्ट्रों को मिलकर प्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए नियम और रणनीतियाँ तैयार करने का चुनौतीपूर्ण कार्य करना होगा। नेचर पत्रिका के एक संपादकीय के मुताबिक इस संदर्भ में तीन प्रमुख मुद्दों को संबोधित करना होगा और इनसे निपटने की दृष्टि से कुछ सुझाव भी दिए गए हैं।

प्रदूषण-

तमाम समुद्री कचरे में से लगभग 85 प्रतिशत तो प्लास्टिक कचरा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) का अनुमान है कि समुद्रों में प्रति वर्ष लगभग 2.3-3.7 करोड़ टन कचरा पहुँचेगा और वर्ष 2040 तक समुद्र में प्लास्टिक कचरे की मात्रा तिगुनी हो जाएगी। दरअसल, अधिकांश प्लास्टिक कचरा उत्पन्न तो भूमि पर होता है लेकिन नदियों से होते हुए अंतत: समुद्रों में पहुँच जाता है।

ऑस्ट्रेलिया स्थित मिंडेरू फाउंडेशन के अनुसार समाज के लिए प्लास्टिक प्रदूषण की लागत प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर से अधिक होती है जिसमें पर्यावरण की सफाई और पारिस्थितिक क्षति शामिल हैं। यह लागत प्लास्टिक प्रदूषण को संबोधित न करने की वजह से पैदा होती है।

इस सम्बंध में दक्षिण अफ्रीका स्थित काउंसिल फॉर साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च की प्रमुख वैज्ञानिक लिंडा गॉडफ्रे के अनुसार संधि वार्ताकारों को प्लास्टिक प्रदूषण समस्या हल करने सम्बंधी विभिन्न प्रतिस्पर्धी विचारों से निपटना होगा। जैसे गैर-सरकारी संगठन और कार्यकर्ता एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने और सुरक्षित विकल्प खोजने पर ज़ोर देते हैं। दूसरी ओर, प्लास्टिक उद्योग का मत है कि कचरे के बेहतर संग्रहण के माध्यम से प्रदूषण से निपटा जा सकता है। इन दोनों से अलग, अपशिष्ट प्रबंधन और पुनर्चक्रण उद्योग अधिक से अधिक पुनर्चक्रण की वकालत करते हैं।

गॉडफ्रे को उम्मीद है कि संधि में इन सारे उपायों का समावेश होगा। वैसे प्रत्येक उपाय का अनुपात हरेक देश के लिए भिन्न हो सकता है। उनका मत है कि उच्च आय वाले देशों से निम्न आय वाले देशों में प्लास्टिक कचरे के स्थानांतरण पर प्रतिबंध लगाने से भी प्रदूषण काफी कम किया जा सकता है।        

गॉडफ्रे यह भी चाहती हैं कि इस संधि के माध्यम से प्लास्टिक निर्माता उनके द्वारा बनाए गए उत्पादों के संग्रहण, छंटाई और पुनर्चक्रण की भी ज़िम्मेदारी व खर्च उठाएँ। इससे लैंडफिल में प्लास्टिक प्रदूषण में कमी आएगी और स्थानीय निकायों पर अपशिष्ट प्रबंधन का वित्तीय बोझ भी कम होगा। इसके साथ ही समुद्रों में प्लास्टिक की मात्रा को कम करने के लिए संधि में यह भी शामिल होना चाहिए कि विभिन्न देश अपने द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्लास्टिक की मात्रा को कम करने का लक्ष्य एक समय सीमा में निर्धारित करें।

पुनर्चक्रण -

वर्तमान में केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण किया जा रहा है क्योंकि इस कचरे का मूल्य बहुत कम है। यदि इसका मूल्य अधिक होता तो अधिक से अधिक प्लास्टिक का पुन:उपयोग किया जाता, पर्यावरण में यह कम मात्रा में पहुँचता और नए प्लास्टिक उत्पादन की ज़रूरत भी कम होती। इसे वर्तुल अर्थव्यवस्था कहा जाता है।

प्लास्टिक क्षेत्र में वर्तुल अर्थव्यवस्था के लिए ऑस्ट्रेलिया के अरबपति व मिंडेरू फाउंडेशन के अध्यक्ष एंड्रयू फॉरेस्ट ने इस संधि के माध्यम से पॉलीमर (प्लास्टिक निर्माण के बुनियादी घटक) के निर्माण पर अधिभार लगाने का प्रस्ताव दिया है। इससे प्राप्त राशि का उपयोग पुनर्चक्रण के लिए किया जा सकता है।

इसके अलावा वे प्लास्टिक उत्पाद बेचने वाले खुदरा विक्रेताओं से प्लास्टिक कचरा वापस खरीदने और इसका पुन: उपयोग करने के तरीके खोजने का भी सुझाव देते हैं। हालांकि खुदरा विक्रेताओं पर पड़ने वाली अतिरिक्त लागत का प्रभाव सीधे तौर पर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा लेकिन फॉरेस्ट को उम्मीद है कि उपभोक्ता उन उत्पादों के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार होंगे जिससे पर्यावरण में पहुँचने वाले प्लास्टिक की मात्रा कम होती है। इस विचार को अपनाने से ऐसे प्लास्टिक का उत्पादन बंद हो जाएगा जिसका पुन: उपयोग या पुनर्चक्रण नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें पुन: खरीदने वाला कोई नहीं होगा।

फॉरेस्ट चाहते हैं कि इस संधि के माध्यम से अगले पाँच वर्षों में एक ऐसी प्रणाली विकसित हो जिसके तहत प्लास्टिक प्रदूषण करने वाली कंपनियों को दंडित किया जा सके। ऐसा होने पर कंपनियाँ अपने वर्तमान तौर-तरीकों को बदलेंगी।

हालांकि गॉडफ्रे प्लास्टिक में वर्तुल अर्थव्यवस्था को लेकर शंका में हैं क्योंकि अभी तक पुनर्चक्रित प्लास्टिक से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में बहुत कम जानकारी है। कहीं ऐसा न हो कि हम पर्यावरण बचाने के चक्कर में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा दें।

सामाजिक और स्वास्थ्य प्रभाव-

पूरे विश्व और विशेष रूप से एशिया में प्लास्टिक कचरे को जला दिया जाता है। इससे काफी कम समय में कचरा कम हो जाता है और यह बैक्टीरिया, वायरस और मच्छरों का प्रजनन स्थल नहीं बन पाता। लेकिन प्लास्टिक के जलने से भारी वायु प्रदूषण होता है। बाहरी वायु प्रदूषण मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। कई क्षेत्रों में तो प्लास्टिक भूदृश्य का एक हिस्सा बन चुका है और स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। यह मिट्टी में रच-बस गया है और इसे हटाना एक बड़ी चुनौती होगी।

कई अध्ययनों से पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक सांस, भोजन और पानी के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकता है। नैनोप्लास्टिक से मानव त्वचा और फेफड़े की कोशिकाओं में क्षति और सूजन पैदा करने के भी साक्ष्य मिले हैं। प्लास्टिक में बिसफेनॉल-ए, थेलेट्स और पीसीबी जैसे पदार्थ मिलाए जाते हैं जो अंतःस्रावी गड़बड़ी और प्रजनन सम्बंधी विकारों का कारण बन सकते हैं। इस सम्बंध में कई विशेषज्ञ इस संधि के माध्यम से प्लास्टिक में उपयोग किए जाने वाले रसायनों पर प्रतिबंध लगाने या उसको चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का सुझाव देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

बाल कविताः 22 मार्च विश्व जल दिवस- पानी जीवन का आधार

 - डॉ. कमलेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

राजू भैया जब बाहर से,

घर में आते हैं।

‘ठंडा पानी जल्दी दे दो’,

यह चिल्लाते हैं।।

लू से पीड़ित नन्ही चिड़िया,

जब गिर जाती है।

जल में चोंच डुबो दो उसकी,

जीवन पाती है ।।

पानी जीवन का आधार है,

है पते की बात ।

पल- पल हम पानी को चाहें,

चाहे दिन हो रात ।।

कहते हैं चेन्नई हमारा,

जल संकट में है ।

भूगर्भ जल खत्म हो गया,

जन संकट में है ।।

खूब  करो मत दोहन इसका,

मेरे प्यारे राम ।

जीवन अपना तभी सुरक्षित

पूरे होंगे काम ।।

सम्पर्कः रावगंज, कालपी, जालौन, उ.प्र.

प्रदूषणः सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध


प्लास्टिक
की वस्तुओं के उपयोग को लेकर पहले भी सरकारों की ओर से कई कदम उठाए गए हैं। लेकिन अब पूरी तरीके से देशभर में सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगने जा रहा है। भारत सरकार ने इसके बनने, बेचने स्टोर करने और एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध करने की आदेश दिया है। यह रोक इसलिए लगाया जा रहा है, ताकि सिंगल यूज प्लास्टिक के कचरे से होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सके।
सिंगल यूज प्लास्टिक यानी प्लास्टिक से बनी ऐसी चीजें, जिसका हम सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर इस्तेमाल कर फेंक देते हैं और जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है।
कानून के तहत 7 साल तक की सज़ा
 सिंगल यूज प्लास्टिक से बने 19 आइटम्स को एन्वार्यमेंट प्रोटेक्शन एक्ट (Environment Protection Act) के तहत प्रतिबंधित किया गया है। अगर कोई भी इन आइटम्स का अब इस्तेमाल करता है, तो उसे इस एक्ट की धारा 15 के तहत जुर्माना या जेल या दोनों की सजा हो सकती है। धारा 15 के तहत 7 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।
कितना खतरनाक है प्लास्टिक का इस्तेमाल?
यह तो हम सबको ही पता है कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर्यावरण के लिए बहुत खतरनाक है। ऐसे प्लास्टिक न तो डिकंपोज होते हैं और न ही इन्हें जलाया जा सकता है। प्लास्टिक के टुकड़े पर्यावरण में जहरीले रसायन छोड़ते हैं, जो इंसानों और जानवरों के लिए खतरनाक होते हैं। इसके अलावा, सिंगल यूज प्लास्टिक का कचरा बारिश के पानी को जमीन के नीचे जाने से रोकता है, जिससे ग्राउंड वॉटर लेवल में कमी आती है।
क्या है भारत के हाल
इस मामले पर भारत की बात करें तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का एक सर्वे बताता है कि देश में हर दिन 26 हजार टन प्लास्टिक कचरा निकलता है, जिसमें से सिर्फ 60% को ही इकट्ठा किया जाता है। बाकी कचरा नदी-नालों में मिल जाता है या पड़ा रहता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मानें तो, भारत में हर साल 2.4 लाख टन सिंगल यूज प्लास्टिक पैदा होता है।  इस हिसाब से हर व्यक्ति हर साल 18 ग्राम सिंगल यूज प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। 
प्लास्टिकल कि इन चीजों पर लगा बैन
1. प्लास्टिक स्टिक वाले ईयर बड्स, 2. गुब्बारों के लिए प्लास्टिक स्टिक, 3. प्लास्टिक के झंडे, 3. कैंडी स्टिक, 4. आइसक्रीम स्टिक, 5. थर्मोकोल, 6. प्लास्टिक की प्लेट, 7. कप,  8. गिलास, 9. कटलरी, 10. कांटे, 11. चम्मच, 12. चाकू, 13. स्ट्रॉ, 14. ट्रे, 15. मिठाई के डिब्बों को रैप या पैक करने वाली फिल्म, 16. इन्विटेशन कार्ड, 17. सिगरेट के पैकेट, 18. 100 माइक्रोन से कम के प्लास्टिक या पीवीसी बैनर, 19. स्टिरर
क्या है प्लास्टिक का विकल्प?
- केंद्र सरकार ने अभी 19 आइटम्स पर प्रतिबंध लगाया है।  आगे इसमें और भी सामान जोड़े जाएँगे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सिंगल यूज प्लास्टिक के कुछ विकल्प के बारे में भी बताया है।
- प्लास्टिक बैग की बजाय कॉटन बैग का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह प्लास्टिक से बनी चम्मच की जगह बैम्बू स्टिक का इस्तेमाल कर सकते हैं। प्लास्टिक कप की बजाय कुल्हड़ का इस्तेमाल हो सकता है।