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Oct 1, 2022

व्यंग्यः एक और युग का अंत

- विनोद साव

युग प्रवर्तन अब दिनों दिन आसान होता जा रहा है। हर क्षेत्र में प्रवचन देने वाले अब केवल प्रवचनकार नहीं रहे वे प्रवर्तक हो रहे हैं। वे प्रवचनकार की मुद्रा में नहीं हैं; बल्कि किसी प्रवर्तक की मुद्रा में आ गए हैं। वे और उनके समर्थक ये मानकर चल रहे हैं कि उनके गुरु महराज अब किसी सिद्धांत के ही नहीं बल्कि समूचे युग के प्रवर्तक हो गए हैं। सम्पूर्ण युग का अब वही दिशा निर्देश करेंगे। वही धरम करम की बात करेंगे और वही सरकार चलाएँगे। संस्कृति की परिभाषा वे ही व्याख्यायित करेंगे और उन्हीं की कलाकारी होगी। दंगल में वे उतरेंगे और सबका मंगल वे करेंगे। उनका जब मन नाचेगा ऊँची छलांग लगाएँगे, जब मन डूबेगा समाधि लगा लेंगे। समाधि स्थल पर भीड़ थी। बाहर जय जयकार थी – ‘बाबा बाहर आ गए?’ किसी श्रद्धालु की आवाज आई।

‘आ जावेंगे बाबा’ संयत स्वर में एक सहायक ने कहा।

‘कुछ दिव्य सन्देश देंगे?’

‘देंगे देंगे.. सब कुछ देंगे।’ सहायक ने आश्वस्त किया।

‘हाँ.. जब इतने दिनों की समाधि लगाई थी, तब कुछ न कुछ तो प्राप्त होगा?’ बाहर लोगों को भी यही विश्वास था।  बाबा लंगोटी सहित बाहर आ गए थे।  अपने सिकुड़े हुए पेट को हाथ में लिए हुए थे, कहा ‘मुझे भीतर पता चल गया था सत्ता परिवर्तन होने का। इस परिवर्तन के पीछे मेरी शक्ति लगी है।  चिंता की कोई बात नहीं, अब सब के अच्छे दिन आ रहे हैं।’

भीड़ में किसी ने चिंतापूर्ण होकर कहा ‘लेकिन ये तो लंगोटी में हैं। ये दूसरों को कितना देंगे? ये क्या नहाएँगे और क्या निचोड़ेंगे?

‘अरे दादा.. उनके पास लंगोटी तो है । बहुतों के पास तो वो भी नहीं है।’

उनके समर्थकों ने उन्हें घेरा और उन्हें कार में लेकर चलते बने। एक सहायक ने बताया कि ‘समाधि लगाकर बाबा ने जो सत्ता परिवर्तन किया है, इसके कारण उन्हें दिल्ली से बुलावा आया है। अब इस देश में एक नए युग की शुरुआत होगी।  हमने पुराने युग को उखाड़ फेंका है।’ उपस्थित जन ने देखा कि बड़े से बड़ा प्रवर्तक भी किस तरह राज्याश्रय के सहारे टिका होता है।  भीतर उन्हें जो प्राप्त हुआ है उसका प्रतिसाद उन्हें बाहर मिलेगा। उनके अच्छे दिन आ गए हैं।

साहित्य के एक युग प्रवर्तक जी सड़क किनारे मिल गए थे। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व में एक साथ कई बातें थीं।  वे जब भी दिखाई देते उनके हाथ में चौबीस इंची साइकिल होती थी। वे अक्सर साइकिल चलाते हुए कम दिखते बल्कि साइकिल को लेकर पैदल चलते हुए अधिक दिखते थे। उनके हाथ में साइकिल थी पर उनके पाँव जमीन पर थे। कुर्ता- पाजामा पहने हुए थे। इक्कीसवीं सदीं में भी उनके सिर के बाल उन्नीसवीं सदीं के कवियों की तरह लहलहा रहे थे।  मूँछे घनी थीं पर मूँछों से भी ज्यादा घनी उनकी भौंहें थीं। उनका चेहरा भौंह प्रधान था। एक बारगी उनके चेहरे को देखने से उनके चेहरे पर दो मूँछें दिखलाई देती। एक नाक के नीचे और दूसरी नाक के ऊपर। उनके पुराने मित्र उन्हें साधिकार कह उठते थे कि ‘तुम अपनी भौंहों को कंघी कर उनकी चोटी बाँध लिया करो।’ तब वे कहने वाले को टिपिर- टिपिर देखते थे।

‘इधर बहुत दिनों से आपका लिखा कुछ दिखा नहीं।’ मैंने उन्हें पूछा।  वे रुके नहीं और साइकिल लिए पैदल चलते हुए ही बोले कि ‘अब लिखने के लिए रह भी क्या गया है?’

‘पर आपके समकालीन तो अभी भी लिखते हुए दिख रहे हैं।’ मैंने उनसे साहित्य चर्चा छेड़ी।

‘जो दिख रहे हैं वे क्या लिख रहें हैं। यह भी देखा जाना चाहिये।’

‘पर किताबें तो खूब छप रहीं हैं!’

‘छप रहीं हैं लेकिन उनमें कृतियाँ सामने नहीं आ रही हैं। हर गली मोहल्ले में स्क्रीन प्रिंटिंग की दुकान खुल गई हैं। उन्हें भी तो जीने के लिए काम चाहिए। ऐसे में जो लिख रहे हैं वे लेखक तो जीवित हैं पर उनकी रचनाएँ मरी हुई है।’

‘तो अब आपकी क्या योजना है?’ मैंने उन्हें ससम्मान पूछा।

‘हमारी अब कुछ नहीं हैं । बस सम्मान सेवी संस्थाएँ हैं। वे बुलाते हैं हम चले जाते हैं। आज भी ऐसे ही एक सम्मान ग्रहण के लिए जा रहा हूँ।’  सम्मान के लिए उनके साइकिल पर सवार होने का समय आ गया था। वे पैडल मारते हुए निकल पड़े।  ये साहित्य के एक युग प्रवर्तक थे, सच्चे साहित्य साधक थे।  साहित्य में उनके युग की शुरुआत साइकिल से हुई थी और साइकिल में ही खतम हो रही थी।  वे यह भी प्रमाणित कर रहे थे कि चाहे जितना भी बड़ा युग हो उसे साइकिल में ढोया जा सकता है।

‘साइकिल में ही क्यूँ। ट्रेनों और जहाजों में भी ढोने वाले लोग हैं।’ एक सुधि श्रोता ने ध्यानाकर्षण किया।  संस्कृति समागम में जो युग प्रवर्तक आ रहे हैं वे तो सब ट्रेन ए. सी. क्लास और एरोप्लेन में आ जा रहे हैं। उनका कहना है कि ‘हम इक्कीसवीं सदी में संस्कृति का बोझा साइकिल में नहीं ढो सकते। संस्कृति का क्या हम अपना खुद का बोझा भी साइकिल में नहीं ढो सकते।’  सुधिगण कहते हैं ‘देखा नहीं। वाजपेयी जी को। वे रोज सुबह दिल्ली से संस्कृति पर व्याख्यान देने निकलते हैं तो शाम-रात तक दिल्ली वापस आ जाते हैं। वे हवाई टिकटों को ही ओढ़ते बिछाते हैं।  वे हमारी संस्कृति के आई. एस. आई. मार्का प्रवर्तक हैं। वे संस्कृति की हवा को हवाई टिकटों पर ही फैलाते हैं। हालाँकि हमारे इन संस्कृति प्रवर्तकों की वैसी हैसियत नहीं बनी है जैसी यूरोप में हैं जहाँ प्रवर्तकों के व्याख्यान सुनने के लिए टिकट बेचे और खरीदे जाते हैं।  यहाँ अगर इनके टिकट बेचने लगें तो फिर इनकी हवाई यात्रा बंद हो जाएगी। हवा निकल जाएगी। उनके हवा हवाई सांस्कृतिक प्रवर्तन के एक युग का अंत हो जाएगा।

आजकल बहुत से युग प्रवर्तकों की गाथा श्मशानों में गूँजती है।  पहले शब्द छोटे और ओछे जान पड़ते थे क्योंकि ‘जग भूखे भावना’ पर विश्वास था। पर अब शब्दहीन भावना के भाव गिरे हैं। चुप्पी भरे आँसुओं का मोल नहीं है। अब इन आँसुओं से पगे कुछ शब्द हो जाएँ, लच्छेदार बातें हो जाएँ। राग-विराग में कुछ गीत हो जाएँ। तब जाकर गमगीनों की महफ़िल सजेगी।  युग प्रवर्तक को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  कार्यक्रम संचालक सामने आए और अपने को ग़मगीन किया फिर शुरू हो गए:  टोपी शुक्ला जी हमारे सच्चे युग प्रवर्तक थे। वे अपने दौर के भले इंसान थे। ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’ की सूक्ति पर बिलकुल खरे उतरते रहे।  ‘ना उधो से लेना ना माधो को देना’। कोउ नृप होई हमें का हानि के विरक्त भाव से उन्होंने जीवन को जिया और सदैव अपने बनाये मार्ग पर ही चले थे। आज हम जो शब्दांजलि यहाँ देंगे वही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके साथ ही एक अद्भुत आत्म-केंद्रित युग का अंत हुआ।

‘यदि इसी तरह लोग युग- युगों का अंत करते रहेंगे तो हमारे लिए बचेगा क्या ? हम कहाँ जायेंगे? किस युग में रहेंगे? हमारे जीने के लिए भी कोई युग रहेगा कि बस हर प्रवर्तक की तरह मामला खल्लास?’ किसी नई पीढ़ी के ओजस्वी इंसान का विरोधमय स्वर सुनाई दिया।

‘बचेगा आप के लिए भी बचेगा।  आपके साथ भी कोई न कोई युग जायेगा। आप भी अपने युग के एक प्रवर्तक हो सकते हैं। जिस तरह चन्द्रमा के साथ उसका वातावरण रहता है, सूरज के साथ उसका वातावरण होता है उसी तरह अपना वातावरण आप बना, आपके साथ आपका वातावरण होगा। अपने युग का अंत आप स्वयं करेंगे कोई दूसरा भांजी नहीं मारेगा। निश्चिन्त रहें।

‘पर देश भी आजाद हो गया है। लड़ने के लिए कोई लड़ाई बाकी नहीं रह गई है। साहित्य में अंग्रेजी का बोलबाला हो रहा है।  हम लिखें किस भाषा में और कौन पढ़ेगा? हमारे मूल्यवान विचारों का होगा क्या ? जनता जनार्दन भजन कीर्तन में भिड़ गई है । हमारी राग सुनेगा कौन? जो बच गए हैं वे आइनाक्स और शापिंग माल से बाहर निकल नहीं रहे हैं – हमारे हुनर को देखेगा कौन ? हमारा युग हमारे हाथ में नहीं आ रहा है आखिर किस विषय का प्रवर्तन करेंगे हम ?

‘आप सारे युग प्रवर्तकों के योगदान का स्मरण करने वाली एक संस्था का गठन कर लें। सरकारी भाषा में इसे एन. जी. ओ. कहते हैं। किसने इतिहास बनाया ? किसने पुराने कीर्तिमान को भंग किया? किसने नए कीर्तिमान गढ़े? किसने अपने युग को प्रभावित किया और किसने दुष्प्रभावित किया ? इन सबका लेखा- जोखा आप रखें।  युग प्रवर्तकों के जन्म दिवस या उनके पुण्य दिवस, उनकी जन्म शताब्दी पर कार्यक्रम करवाएँ और नेता अभिनेता लोगों को बुलवाएँ और अपने सम्पर्क बढ़ाएँ।  इसके लिए आप अनुदान प्राप्त कर सकते हैं। चंदा देने वाले आपके सामने आएँगे। ऐसा कर आप एक नए युग की शुरुआत कर सकते हैं। शासन- प्रशासन में आपके रुके- पिटे काम भी समय आने पर निपट जाएँगे।’ यह सुनकर वे जोश से भर गए और योजना की रूप- रेखा बनाने निकल पड़े।

‘मेरे साथ भी एक युग का अंत हो जायेगा ऐसा लग रहा है।’ षष्ठिपूर्ति संपन्न महाशय मेरे सामने खड़े थे।

‘आपने क्या किया महोदय?’ मैंने जिज्ञासु की भांति उन्हें देखा।

‘18 की उम्र में नौकरी शुरू की थी, 60 में रिटायर हो रहे हैं। 42 साल नौकरी कर ली है। विगत बीसवीं शताब्दी की आधी सदी को पार कर लिया और अब 21 वीं सदी के भी 20 बरस निकाल लिये हैं। चार बच्चे पैदा किए उन्हें भी पाल पोसकर बड़ा कर दिया, सबका ब्याह कर दिया, वे भी लग गए सब अपनी- अपनी लाइन पर। सरकार की कृपा से अच्छा खासा मकान है, दो चार प्लाट हैं। मोटर गाड़ी है।  इस युग में हमने सब कर तो लिया है और क्या होना?’

नौकरी में थे वे रिटायर हो रहे हैं। उनके साथ एक बड़े युग का अंत हो रहा है। कार्यालयीन काम काज में अपने युग का प्रवर्तन किया। विभागीय दायित्वों के दौरान फाइलों को लटकाने, लाल फीताशाही दिखाने विभागीय सम्पदा को अपना समझ भरपूर दोहन करने में उनका जवाब नहीं था। जाहिर है ऐसे तेजस्वी जन की कमी तो उनके विभाग वालों को शिद्दत से महसूस होगी।  उनके विदाई समारोह में विभाग वाले उसांसे भरते हुए कह रहे थे कि भई। कुछ भी हो गुप्ता साहब गुप्ता साहब थे।  उनकी जगह कोई नहीं ले सकता।  इस विभाग में वे हमारे पथ प्रदर्शक थे उनकी सेवा-निवृति के साथ ही हमारे विभाग में एक और युग का अंत हुआ।

सम्पर्कः मुक्तनगर, दुर्ग 491001, मो। 9009884014

सामयिकः कार्पोरेट गिफ्ट में छिपी सम्बंध प्रगाढ़ करने की कला

- डॉ. महेश परिमल

दीपावली के इस त्योहार पर कार्पोरेट कंपनियों के गिफ्ट की खूब चर्चा होती है। इस उपहार से सम्बंधों को सुदृढ़ एवं प्रगाढ़ करने में मदद मिलती है। लोग पिछली भूलों को याद न करते हुए सम्बंधों को एक नया आयाम देने की कोशिश करते हैं। हर कंपनी गिफ्ट के लिए एक विशेष बजट तैयार करती है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के डायरेक्टर अपने व्यावसायिक संबंधों को बनाए रखने के लिए स्वयं ही उन्हें अपने हाथों से गिफ्ट देते हैं।

त्योहार के समय मुँह मीठा करना एक परंपरा है; इसलिए पहले गिफ्ट में मिठाइयाँ हुआ करती थीं, उसके बाद सूखे मेवों की परंपरा शुरू हुई। अब इलेक्ट्रॉनिक्स चीजें देने की सिलसिला शुरू हुआ है। गिफ्ट के हर पैकेट से सम्बंधों की नई शुरुआत ही नहीं, बल्कि सम्बंधों को सुधारने और उसे मजबूती देने का संदेश होता है। अब गिफ्ट देना बिजनेस का एक आवश्यक अंग हो गया है। आज हर व्यापारी यह अच्छी तरह से जानता है कि समय ऐसा भी आता है, जब धूल भी बिक जाती है। इस दिशा में गिफ्ट जो काम करते हैं, उससे सम्बंधों की मजबूती को एक नई विकसित राह मिल जाती है। इससे उनके बिजनेस को एक नई ऊँचाई भी मिल जाती है। गिफ्ट का यह सिलसिला दीपावली से लेकर नए साल तक चलता रहेगा। लोग आपस में परस्पर गिफ्ट देकर मेलजोल बढ़ाने का जरिया तलाशते हैं। यह एक अवसर है, जिससे लोग सम्बंधों की नई राह बनाते हैं।

कार्पोरेट गिफ्ट कंपनी की इम्प्रेशन बनाता है। इससे व्यापारियों से अच्छे सम्बंध उजागर होते हैं। कई कंपनियाँ अपने प्रतिनिधियों को गिफ्ट लेकर भेजती हैं, तो कई बिजनेसमेन स्वयं ही गिफ्ट अपने हाथों से देते हैं। उपहार के इस लेन-देन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। उपहार का चयन करने के लिए बाकायदा एक कमेटी भी बनाई जाती है। काफी विचार-विमर्श के बाद उपहार तय होता है। इसमें यह तय किया जाता है कि समय के अनुसार आज कौन-सा उपहार लोगों को प्रभावित कर सकता है। इस प्रक्रिया को ‘ब्रेन स्टार्मिंग’ कहते हैं। जिसमें उपहार की उपयोगिता पर काफी बहस होती है। 

दीपावली पर उपहार के बतौर पहले मिठाइयों का चलन था। उसके बाद लोग ड्राइफ्रूट्स देने लगे। अब बड़ी-बड़ी कंपनियाँ मिठाई और ड्राइफ्रूट्स से एक कदम आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम देने लगे हैं। उदाहरण के लिए हेड फोन या फिर लक्ष्मीजी की छोटी-सी प्रतिमा आकर्षक पेकिंग के साथ दिए जाने लगे हैं। उपहार के इस लेन-देन में दोनों पक्षों को खुशी होती है। दोनों पक्ष एक-दूसरे के लिए सद्भावना व्यक्त करते हैं। दोनों ही एक-दूसरे को अपनी गुड बुक में स्थान देते हैं। गिफ्ट के बारे में हार्वर्ड बिजनेस के रिव्यू में लिखा गया है कि बिजनेस के लिए सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों की एक सूची बनाई जाती है। जिन्हें भी एक छोटा-सा ही सही उपहार मिलता है, तो उसकी खुशी बढ़ जाती है। यह उपहार उनके मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। उससे अच्छे विचारों का प्रवाह शुरू हो जाता है। आश्चर्य इस बात का है कि गिफ्ट लेने से कोई इंकार भी नहीं करता।

कार्पोरेट गिफ्ट की एक खासियत यह होती है कि वह दो प्रकार के गिफ्ट तैयार करती है। जिसमें साधारण लोग, जिनकी कंपनी को बहुत ही कम आवश्यकता होती है और दूसरे वह विशिष्ट लोग, जिनके साथ कंपनी के व्यावसायिक सम्बंध होते हैं। ऐसे लोगों के लिए कंपनी कुछ महँगे गिफ्ट तैयार करती है। इन उपहारों के पीछे धंधे को एक नई ऊँचाई देने की भावना छिपी होती है। आज के जमाने में उपहार को हम रिश्वत का परिष्कृत रूप भी कह सकते हैं। जिसे उपहार दिया जा रहा है,

वह कुछ देर के लिए उपकृत हो ही जाता है। उपहार देने वाले को वह हमेशा याद रखता है। उपहार देने वाले के लिए वह अतिरिक्त समय भी देता है। बाद में यही उपहार अपने काम को सिद्ध करने में सहायक भी होता है। अपना काम साधन की दिशा में उपहार देना पहला कदम माना जाता है। गिफ्ट देना आज लोग अपनी शान समझते हैं। इसे देकर तो राहत मिलती ही है, पर लेने वाला भी राहत ही महसूस करता है। आज यह परंपरा समाज के लिए बहुत ही आवश्यक अंग बन गई है।

पुलिस विभाग के अधिकारियों एवं नेताओं के यहाँ कार्पोरेट कंपनी के इतने अधिक गिफ्ट पहुँचते हैं कि उसे ले जाने के लिए विशेष प्रकार के वाहन की व्यवस्था करनी होती है। कई बार इनके घर पहुँचने वाली मिठाइयाँ इतने दिनों तक रह जाती हैं कि उसमें फंगस लग जाती है। वे उसका इस्तेमाल ही नहीं कर पाते हैं। दूसरी ओर कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपने उपहारों को अपने से छोटे या जरूरतमंदों के बीच बाँटकर खुशियाँ प्राप्त करते हैं। यह सच है कि उपहार सम्बंधों को मजबूत बनाने का काम करते हैं। उपहारों से कटुता कम होती है। एक अच्छी भावना का संचार होता है। अच्छे सम्बंधों की राह खुलती है। मेल-मिलाप बढ़ाने का एक अवसर मिलता है। उपहार से ही पता चल जाता है कि सामने वाले की क्या मंशा है, उसके विचार कैसे हैं? उपहार प्राप्त करने वाला और उपहार देने वाला दोनों ही खुश होते हैं। कंपनी का मालिक या डायरेक्टर अपने हाथों से यदि कर्मचारी को उपहार देता है, तो कर्मचारी स्वयं को धन्य समझता है। ऐसे में यदि उपहार मामूली है, तो व्यक्ति भी मामूली बन जाता है। यहाँ अच्छी भावना काम नहीं आती। अमीर आदमी यदि सस्ता उपहार दे, तो यह उसकी अमीरी पर एक तमाचा साबित होती है। पर गरीब यदि महँगा उपहार दे, तो लोग उसकी नीयत पर शक करने लगते हैं।  यही है उपहार के पीछे का गणित।

प्रकृतिः पाकिस्तान में सदी की सबसे भीषण बाढ़


इस
वर्ष पाकिस्तान सदी की सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है। देश का एक-तिहाई हिस्सा जलमग्न हो गया है। बाढ़ ने लगभग 3.3 करोड़ लोगों को विस्थापित किया और 1200 से अधिक लोग मारे गए। कई ऐतिहासिक इमारतों को भी काफी नुकसान पहुँचा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार इस तबाही की शुरुआत इस वर्ष भीषण ग्रीष्म लहर से हुई। अप्रैल और मई माह के दौरान कई स्थानों पर काफी लंबे समय तक तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। जैकबाबाद शहर में तो तापमान 51 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रहा। पाकिस्तान के कुछ स्थान विश्व के सबसे गर्म स्थानों में रहे।

गर्म हवा अधिक नमी धारण कर सकती है। लिहाज़ा गर्म मौसम को देखते हुए कई मौसम विज्ञानियों ने इस वर्ष की शुरुआत में ही जुलाई से सितंबर के बीच देश में सामान्य से अधिक वर्षा होने की चेतावनी दी थी।

जलवायु वैज्ञानिक अतहर हुसैन के अनुसार भीषण गर्मी से हिमनदों के पिघलने से सिंधु की सहायक नदियों में जल-प्रवाह बढ़ा जो अंततः सिंधु नदी में पहुंचा। सिंधु नदी पाकिस्तान की सबसे बड़ी नदी है जो देश के उत्तरी क्षेत्र से शुरू होकर दक्षिण तक बहती है। इस नदी से कई शहरों और कृषि की ज़रूरतें पूरी होती हैं। जुलाई माह में हिमाच्छादित क्षेत्रों का दौरा करने पर सिंधु की सहायक हुनज़ा नदी में भारी प्रवाह और कीचड़ भरा पानी देखा गया। कीचड़ वाला पानी इस बात का संकेत था कि हिमनद काफी तेज़ी से पिघल रहे हैं और तेज़ी से बहता पानी अपने साथ तलछट लेकर बह रहा है। इसके अलावा कई झीलों की बर्फीली मेड़ें फूट गईं और उनका पानी सिंधु में पहुँचा।

ग्रीष्म लहर के साथ ही एक और बात हुई - अरब सागर में कम दबाव का सिस्टम बना जिसकी वजह से जून की शुरुआत में ही पाकिस्तान के तटीय प्रांतों में भारी बारिश हुई। इस तरह का सिस्टम बनना काफी असामान्य था। इस वर्ष पाकिस्तान के अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से तीन गुना और दक्षिण पाकिस्तान स्थित सिंध और बलूचिस्तान में औसत से पांच गुना वर्षा हुई। एक बार ज़मीन पर आने के बाद इस पानी को जाने के लिए कोई जगह नहीं थी, सो इसने तबाही मचा दी।

कुछ मौसम एजेंसियों ने ला-नीना जलवायु घटना की भी भविष्यवाणी की थी जिसका सम्बंध भारत और पाकिस्तान में भारी मानसून से देखा गया है। संभवत: ला-नीना प्रभाव इस वर्ष के अंत तक जारी रहेगा।

शायद मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग ने भी वर्षा को तेज़ किया होगा। इस संदर्भ में 1986 से 2015 के बीच पाकिस्तान के तापमान में 0.3 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की वृद्धि हुई है जो वैश्विक औसत से अधिक है।

तबाही को बढ़ाने में कमज़ोर चेतावनी प्रणाली, खराब आपदा प्रबंधन, राजनीतिक अस्थिरता और बेतरतीब शहरी विकास सहित अन्य कारकों की भी भूमिका रही है। जल निकासी और जल भंडारण के बुनियादी ढांचे की कमी के साथ-साथ बाढ़ संभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की बड़ी संख्या भी एक गंभीर समस्या के रूप में उभरी है। (स्रोत फीचर्स)

सभ्यता- संस्कृतिः अस्मिता खोती मोक्षदायिनी नदियाँ

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

नदियाँ केवल जल प्रवाहित ही नहीं करती बल्कि हमारी सभ्यता को विकसित करने का एक बहुत ही सशक्त माध्यम भी है। भारत में जिस आर्य संस्कृति का विकास हुआ वह वास्तव में गंगा, यमुना और सरस्वती नदी के तट पर विकसित हुई मानी जाती है। ऋषि मुनियों ने इन्हीं नदियों के पवित्र तटों पर वैदिक मंत्रों का गायन किया। नदी और उसमें प्रवाहित जल का मनुष्य से इतना गहरा सम्बंध है कि जल के बिना किसी कार्य की कल्पना संभव ही नहीं है। सभी धार्मिक अनुष्ठान, अभिषेक, आचमन, पूजन और अनुष्ठान आदि जल से ही सम्पन्न होते हैं। भारतीय सभ्यता के जितने पुनीत और पवित्र स्थल हैं वे सब नदी के तट पर ही हैं। उनकी पवित्रता भी नदियों के कारण है। इन नदियों के तटों पर स्नान करना आदिकाल से पुण्यदायी माना गया है। अमरकोशकार ने जल को ‘जीवनं भुवनं वनम्’ कहा है। अर्थात् जीवन के लिए जल अमृत है, शक्ति है तथा वनों के लिए जीवन रस है।

नदियों की वैसी ही चरित गाथाएँ हैं जैसी मनुष्य की होती हैं। पुराणों में प्रत्येक नदी की उत्पत्ति की कथा है। गंगा नदी विष्णुपद से नि:सृत होकर शंकर जी की जटाओं में समाई और भगीरथ की तपस्या के परिणामस्वरूप धरती पर अवतरित हुई और उनके पूर्वजों को मोक्ष प्रदान की। कदाचित इसीलिए नदी संगम में अस्थि प्रवाहित कर उनके मोक्ष की कामना की जाती है। इसीलिए हमारे देश को नदियों का देश कहा गया है। हमारे देश की धरती पर नदियों का जाल बिछा है जैसे शरीर में धमनियाँ। जिस प्रकार धमनियों में बहने वाला रक्त जीवनदायी होता है, उसी प्रकार नदियों का जल भी जीवनदायी है। इसीलिए नदियाँ हमारी जीवन रेखा है, भारतीय जन-आस्था का केंद्र है, देवी और माँ भी है। क्यों न हों, नदियों के तट पर सभ्यताओं ने जन्म लिया और फूला फला है। पुरातन काल से नदियों के तट पर स्थित नगर पवित्र और धार्मिकता के प्रमाण रहे हैं। यहाँ लगने वाले मेले, उत्सव प्रकृति के साथ हमारे रिश्तों को मजबूत बनाते रहे हैं। शायद ही कोई नदी हो जिसकी उत्पत्ति से जुड़ी कोई कथा न हो? कदाचित् इसीलिए नदी के तट भक्ति, ज्ञान वैराग्य की तपस्थली है, ऋषि-मुनियों की कर्मस्थली है। प्रत्येक नदी की अद्भुत महिमा बतायी गई है। गंगा में स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं, नर्मदा के दर्शन मात्र से पापों का नाश हो जाता है और महानदी में अस्थि विसर्जन से मोक्ष मिल जाता है। हजारों लाखों वर्षों तक नदियाँ हमें जीना सिखाती रही क्यों कि हमने उनकी पूजा अर्चना की। लेकिन जैसे नदी और मनुष्यों के रिश्ते बिगड़ने लगे। मनुष्यों ने उन्हें बेजान समझकर सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगा; नतीजा, नदियों ने हमसे रूठकर पहले धार पतली की फिर हमारी गंदगी को ढोने पर बाध्य हुई और सूखने लगी। आज देश की एक भी नदी साफ सुथरा नहीं बची है जिसे निर्मल कहा जा सके ? उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है; क्योंकि यहाँ से अनेक नदियों ने जन्म लिया है। गंगा जैसे पवित्र नदी में समाहित होने वाली लगभग 300 सहायक नदियाँ आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। उसमें जल का कलकल नाद खत्म हो गया है। ये नदियाँ आज विकास की भेंट चढ़कर शहरों की गंदगी और उद्योगों के अपशिष्ट पदार्थों को ढोने वाली बनकर रह गई है। इसीलिए उसमें नहाने तो क्या आचमन करने से भी लोग कतराते हैं।

नदियों की पवित्रता पर किसी को कोई संशय नहीं है। नदियों के तट पर बसे गाँव और शहर देवस्थान और तीर्थ स्थान जरूर कहलाये। पर्व और त्योहारों पर लोग नदियों में डुबकी लगाकर पुण्य के भागीदार बनते हैं। मरने के बाद उनकी अस्थियों को संगम में प्रवाहित करते हैं और ये मानते हैं कि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी? ये व्यापार के बहुत बड़े माध्यम भी बने इसलिये लोग यहाँ रहने लगे। रहने के लिये जमीन कम पड़ी तो जंगल काट डाले, तालाबों को पाट डाला। जीविका के अनेक साधन बना डाले, गाँव शहरों में तबदील हो गया, लोग बढ़े, आबादी बढ़ी, घर बढ़े और गंदगी का अंबार बढ़ा। गंदगी पहले नाली फिर नाला और अंत में नदियों में डाला जाने लगा। विकास के लिए अनेक उद्योग लगे। उद्योग से प्रदूषण फैला, अपशिष्ट पदार्थ निकला और उसे भी नदियों में प्रवाहित किया जाने लगा। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये जंगल काटे गए, सड़क चौड़ा करने के लिए पेड़ काटे गए, नदियाँ प्रदूषित हुई तो जमीन के गर्भ से पानी निकाला जाने लगा। नदियों के जल के संग्रहण से समुद्र बना और समुद्र से पहले अमृत, फिर मोती और अब पेट्रोल निकालने लगे और ज्वलनशील होने से उसमें आग लगी और समुद्र के जीव- जन्तु मरने लगे, उनका संसार नष्ट होने लगा। विकास की दौड़ और उद्योगों की जलापूर्ति के लिए हमने नदियों के प्रवाह को रोक दिया, रेगिस्तान और समुद्र में अनेक प्रकार के प्रयोग, विस्फोट आदि से प्रकृति विकृत होने लगी, प्रकृति की अनमोल रचनाएँ नष्ट होने लगी और हमारा जीवन प्रभावित होने लगा। प्रकृति से हमने जो खिलवाड़ करने का उपक्रम किया तो उससे होने वाले दुष्परिणामों का खामियाजा आखिर हमें ही तो भुगतना पड़ेगा ?

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रो. उमाकांत चौधरी जो गंगा मैनेजमेंट के संस्थापक एवं निदेशक हैं, के अनुसार नदी अपने आधारभूत जल से प्रवाहित होती है। वह आधारभूत जल है- भूजल। भूजल अपना रूप बदलकर पहाड़ पर चढ़ता है, वहाँ पहुँचकर फटता है तो नदी के रूप में उद्भूत होकर नीचे बहने लगता है। भूजल के पहाड़ में फटने के कारण नदियों का जन्म होता है। इसे ‘‘बेस ऑफ रीवर कहते हैं। भूजल का जितना भंडार होगा, नदियाँ उतनी शक्ति सम्पन्न और जल सम्पन्न होगी। आज हम भूजल इतना अधिक दोहन कर रहे हैं जिससे भूजल का स्तर भूगर्भ के रसातल में चला गया है। बाँधों के निर्माण, बरसात में उससे छोड़े जाने वाले जल से कृत्रिम बाढ़ से होने वाले नुकसान से बचने के लिए तटबंध का निर्माण कराये गए। लेकिन इन निर्माण कार्यों में नदी विज्ञान के मूलभूत नियमों की अनदेखी हुई। पर उसके कारण होने वाली हानियों को कम करने की दिशा में कॉमन नहीं हुआ। इससे जुड़े आंदोलनों में स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता के बीच बहस मुख्यतः उत्पादन और विस्थापन के बीच केन्द्रित रही।

पानी अपने साथ लगभग 205 करोड़ टन मिट्टी बहाकर ले जाता है। यह नदी की प्रकृति है। लेकिन बाँध बनाते समय इससे होने वाले हानि के बारे में कभी विचार नहीं किया जाता। इस अनदेखी के कारण बाँधों में हर साल 48 करोड़ टन मिट्टी जमा हो रही है। उल्लेखनीय है कि बाँध बनने के कारण नदी का प्रवाह रुक जाता है और वह अपना वजूद खो देता है। तब वह जलाशय बन जाता है। जलाशय बनने से उसका चरित्र भी बदल जाता है। जलाशय की तल में जमा कचरा धीरे- धीरे सड़ने लगता है और तब कचरे के रसायन से पानी का गुण बदल जाता है। इससे पानी की शुद्धता और निर्मलता खत्म होने लगती है। जल में रहने वाले जीव- जन्तुओं और पादप मरने लगते हैं।         

यह भी सही है कि बाँध बनने से मूल नदी खत्म हो जाती है और बाँध से छोड़े जाने वाले पानी से कृत्रिम नदी का जन्म होता है। वह मूल नदी के मार्ग में बहती अवश्य है मगर उसकी पुरानी निर्मलता उसमें नहीं होती। इसी प्रकार मुख्य नदी और उसकी सहायक नदी के अंतरंग सम्बंध में समझ की कमी के कारण लोग केवल मुख्य नदी या उसकी सहायक नदी में उपलब्ध जल की मात्रा के बारे में अध्ययन करते हैं जिन पर बाँध बनाया जाता है। इसे समझने के लिए वृक्ष का उदाहरण जरूरी है। वृक्ष के तीन अंग होते है- जड़, तना और शाखाएँ। वृक्ष उस समय तक जिंदा रहता है जब तक उसे जड़ों से पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। जड़ों का योगदान तने के सहारे शाखाओं को मिलता है। इस व्यवस्था से वृक्ष के लाभ अर्थात् फूल और फल को प्राणवायु मिलती है। जड़ों के योगदान के कम होने से वृक्ष के योगदान कम हो जाते हैं, परन्तु जड़ों के मरते ही वृक्ष की भी मृत्यु हो जाती है। ठीक उसी प्रकार सहायक नदियों के जीवित रहने पर मुख्य नदी जीवित रहती हैं। 

आज नदियों के अस्तित्व खतरे में हैं और शासन स्तर पर गंगा नदी को बचाने, उसकी सफाई करने के लिए हजारों करोड़ रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है। गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए ‘गंगा-यमुना एक्शन प्लान’, ‘गंगा बेसिन अथॉरिटी’,  ‘नेशनल मिशन फ़ॉर क्लीन गंगा’, ‘नमामि गंगे परियोजना’ भी प्रयासरत हैं। कई स्वयं सेवी संस्थाएँ नदी और उसके जल को बचाने के लिए समय समय पर आंदोलन भी करते हैं। कुछ कथित लोग ‘जलदूत’ के रूप में भी यदाकदा दिखते हैं। समय निकालकर शिक्षण संस्थाओं में जाकर लोगों को जल बचाने के लिए शपथ दिला जाते हैं, फोटो खिंचवाकर, पेपर और टी वी. में समाचार प्रसारित होने से सुर्खियाँ जरूर बटोर लेते हैं लेकिन अफसोस आज तक ऐसे जलदूत एक बूँद जल भी बचा नहीं पाए। हाँ, किसी पुरस्कार के लिए वे दस्तावेज तैयार जरूर कर लेते हैं और उन्हें प्रादेशिक या राष्ट्रीय पुरस्कार अवश्य मिल जाता है। ऐसे कागजी  जलदूत से कुछ हो सकेगा ? नदियों को हम बचा नहीं पा रहे हैं, बल्कि पूर्वजों के द्वारा खुदवाए तालाब और कुँओं को पाटते जा रहे हैं। यही नहीं बल्कि भूजल का भी भरपूर दोहन कर रहे हैं, यह चिंता की बात है।

20 मार्च 2017 को नैनीताल हाईकोर्ट का एक फैसला आया कि गंगा- यमुना जीवित इंसान हैं। जिसमें ग्लेशियरों और पेड़ पौधों को भी शामिल किया गया है। यद्यपि हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तराखंड तक ही सीमित है। इसे अन्य प्रदेशों में भी लागू किया जाना चाहिए। नदियों के अस्तित्व को बचाने में कारगर उपाय हो सकता है। नदियों की जीवंतता उसके बहते रहने में है। नदियों के वेग को बनाये रखना, प्रदूषण और गंदगियों से भरे नालियों से बचाये रखना हमारी जिम्मेदारी है।●

सम्पर्कः डागा कालोनी, चांपा (छ.ग.)

प्रेरकः प्रकाश की एक किरण

 - ओशो

एक राजा था। वह एक दिन अपने वज़ीर से नाराज हो गया और उसे एक बहुत बड़ी मीनार के ऊपर कैद कर दिया। एक प्रकार से यह अत्यन्त कष्टप्रद मृत्युदण्ड ही था। न तो उसे कोई भोजन पहुँचा सकता था और न उस गगनचुम्बी मीनार से कूदकर उसके भागने की कोई संभावना थी।

जिस समय उसे पकड़कर मीनार पर ले जाया रहा था, लोगों ने देखा कि वह जरा भी चिंतित और दुखी नहीं है, उल्टे सदा की भांति आनंदित और प्रसन्न है। उसकी पत्नी ने रोते हुए उसे विदा दी और पूछा, "तुम इतने प्रसन्न क्यों हो?"

उसने कहा, "यदि रेशम का एक बहुत पतला सूत भी मेरे पास पहुँचाया जा सकता तो मैं स्वतंत्र हो जाऊँगा। क्या इतना-सा काम भी तुम नहीं कर सकोगी?"

उसकी पत्नी ने बहुत सोचा, लेकिन इतनी ऊँची मीनार पर रेशम का पतला धागा पहुँचाने का कोई उपाय उसकी समझ में न आया। तब उसने एक फकीर से पूछा। फकीर ने कहा, "भृंग नाम के कीड़े को पकड़ो। उसके पैर में रेशम के धागे को बाँध दो और उसकी मूँछों के बालों पर शहद की एक बूँद रखकर उसका मुँह चोटी की ओर करके मीनार पर छोड़ दो।"

उसी रात को ऐसा किया गया। वह कीड़ा सामने मधु की गंध पाकर, उसे पाने के लोभ में, धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा और आखिर उसने अपनी यात्रा पूरी कर ली। रेशम के धागे का एक छोर कैदी के हाथ में पहुँच गया। रेशम का यह पतला धागा उसकी मुक्ति और जीवन बन गया। उससे फिर सूत का धागा बाँधकर ऊपर पहुँचाया गया, फिर सूत के धागे से डोरी और डोरी से मोटा रस्सा। उस रस्से के सहारे वह कैद से बाहर हो गया।

सूर्य तक पहुँचने के लिए प्रकाश की एक किरण बहुत है। वह किरण किसी को पहुँचानी भी नहीं है। वह तो हर एक के पास मौजूद है।