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Sep 1, 2022

नवगीतः सारे बन्धन भूल गए


 - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

स्नेह सिंचित

सारे सम्बोधन

याद रहे

काँटों ने कितना  बींधा

वह चुभन भूल गए।

चुपके से रक्ताभ हथेली को छूकर

अधरों से जो चूम लिया

वह याद रहा

लोगों की विष-बुझी जीभ के सारे

वर्जन- तर्जन भूल गए ।

भूल गए  अब  राहें 

अपने सपन गाँव की,

गिरते- पड़ते पगडंडी की

फिसलन भूल गए ।

सूखी बेलें अंगूरों की,

माँ-बाप गए तो;

भरापूरा कोलाहल  से अपना

आँगन भूल गए।

गाँव -देश की माटी छूटी

छूटे सम्बन्धों के अनुबंध,

छली-कपटी

और परम आत्मीय

सबसे दूर हुए ।

उधड़े रिश्ते बहुत टीसते

सुख का कम्पन भूल गए।

दीवारें हैं,

चुप्पी है,

बेगानी धरती

अपनी ही छाया है संग में

धूप -किरन सब  भूल गए ।

सब कुछ भूले,

पर स्पर्श तुम्हारा

छपा तिलक-सा

किसने कितना हमें सताया

झूठे नर्तन भूल गए ।

परहित का आनन्द क्या होता

लोग न जाने

भीगे नयनों को जब चूमा

तो सारे दर्पन भूल गए ।

एक किरन

नयनों में अब भी जाग रही है-

तुझसे मिलने की आशा में

सारे बन्धन भूल गए।

कविताः हमें बेखौफ उड़ने दो


 - डॉ. शिप्रा मिश्रा

डरते हैं हम अपनी आँखें खोलने से

डरते हैं हम अपनी पाँखें खोलने से

 

उस घूरने वाले से हम काँप जाते हैं

उसके गंदे इरादे हम भाँप जाते हैं

 

हमारे थरथराने पर वह ठहाके लगाता है

अपने मंसूबों को साजिशों से सजाता है

 

बेजान तितलियों के पंख वह मसल देता है

हमारी मासूम खिलखिलाहट में दखल देता है

 

हमारा चहकना उसे अच्छा नहीं लगता

वह एक दरिंदा हमें सच्चा नहीं लगता

 

उसकी मुट्ठियों में शिकारियों के जाल हैं

वहशी बेखौफ शैतानों से बड़े बाल है

 

जी चाहता है नाखूनों से चिथड़े कर दें

उसके कलूटे जिस्म के टुकड़े कर दें

 

इन भेड़ियों को बनाया क्यों भगवान ने

या इंसानियत ही छोड़ दी यहाँ इंसान ने

 

जज अंकल!! इन्हें लटका दो फाँसी पर

अरे!कुछ तो तरस खाओ मुझ रुआँसी पर

 

तिल-तिल मरने का दर्द क्या होता है

बेजुबान सिसकती रातें सर्द क्या होता है

 

हम नन्ही चिड़िया हमें बेखौफ उड़ने दो

हमारे ख्वाबों में चाँद-सितारे जड़ने दो

 

हमें मचलने दो हमें भी खिलने दो

इन्द्र-धनुष के रंगों में हमें घुलने दो

 

हम तक जो पहुँचे हाथ वो जल जाए

हमारी जलती रोशनी से वो सँभल जाए

 

उससे कह दो हम अबला या कमजोर नहीं

हमें छू सके उन बाजुओं में इतना जोर नहीं

चिंतनः जीवन के कुछ पल

 – साधना मदान

खुराक

आज सुबह उठते ही अलमस्त हवाओं में साँस लेने ही लगी थी कि पुरानी बात चाय की प्याली की तरह जीभ पर लहराने लगी। ये बातें कभी कड़वी दवा बनकर , कभी तपते अंगारों सी बैचेन कर देती हैं मुझे, पर सामने बैठे हंसमुख और ज़िंदादिल शख्स को देखकर मैं फिर संभली। मैने मन को आज सुबह ही हिदायत दे दी कि याद वह जो सकून बने, बातें वे जो खुशी की खुराक बन मेरे तन-मन को एक खुशहाल और हरियाली दुनिया की सैर करा दें। अब  मेरा मन फिर से कनखियों से हंसा भी और मुस्कराया भी।

पुड़िया

काला घना अँधेरा, हवा की चुप्पी मानो पेड़ों पर मौन की बेड़ियाँ डाल कहीं गुम हो गई है। लोहे के बड़े काले गेट के अंदर सितारा अपने पिता के साथ गेट की सलाखों के पीछे किसी का बेसब्री से इंतजार कर रही है। पीछे से चीखने कराहाने की आवाज़ें जैसे चुप्पी में टूटते काँच की तरह बिखरने लगी थी। सितारा रोना भी चाहती है और चीखना भी कि कब आएगा वह …..वह आ क्यूँ नहीं रहा। माँ को तड़पते देखने से अच्छा है कि पुड़िया खाए और फिर दो दिन तक दर्द से राहत मिल जाए‌। पिता अपनी लाल और सूजी आँखों से सितारा से जैसे कह रहे थे कि राहत माँ को मिलेगी या हमें।

मुलाकात

हरियाली में पत्तों की महक और पिघलती बर्फ की ठंडक  पहाड़ी रास्तों पर तेज़ दौड़ती कार से जैसे रुक जाने को कह रही थी। फिर हरियाली ने हवा के इक झोंके से कहा कारें दौड़ती ही रहती हैं, रुकती क्यों नहीं। रुकतीं तो देवदार को निहारती, चीड़ की खनकती आवाज़ को सुनती। धीरे- धीरे रिसते हुए पानी की मिट्टी को हाथ में लेकर उसकी ठंडक महसूस करतीं। पर कार अभी भी केवल रास्ते नापती अपने गंतव्य या सिर्फ़ दौड़ और होड़ में ही भाग रही है। हवा का झोंका अब कुछ इतराया और हंसते हुए कहने लगा कि मुलाकात का सलीका भी हर कोई नहीं जानता।

निगाहें

आज सुबह ही आँखे मलती योग्या अपना चश्मा ढूँढने लगी। मैंने कहा ...आज इतनी जल्दी कैसे तुम्हारी सुबह हो गई? कुछ चुस्त आवाज़ में सुनाई दिया 9 बजे मीटिंग है। थोड़ा जूस और पपीता खाने के बाद उँगलियाँ फिर काले की बोर्ड पर ऐसे हिलने लगीं जैसे पहले कभी दाल बीनते हाथ दाएँ से बाएँ घूम जाते थे।

मैं सोचने लगी ये कमसिन उम्र न जाने कौन-कौन से आँकड़ों को ढूँढती हुई नफ़ा नुकसान की रिपोर्ट तैयार करने में सक्षम हैं , उसी पल याद आया गुजरा ज़माना , जब यही उम्र बलखाती कमर, वेणी जैसी चोटी लहराते हुए मंदिर की घंटियों पर झूमती, बालों में फूल लगाते हुए इठलाती थी। वक्त बदला है, नज़ाकत के अंदाज़ भी बदले।तभी योग्या की मिश्री जैसी मीठी आवाज़ में सुनाई दिया मेरी जीन्ज़, शर्ट और कार की चाभी टेबल पर रख दो । दोस्तों के साथ देर रात तक पार्टी में शामिल होना है। मैं भी मुस्करा दी कि निगाहें कम से कम की बोर्ड और स्क्रीन से तो हटेंगी।

इनाम

बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों को बार-बार निहारते हुए  मैं न जाने क्यूँ रिजोर्ट की हरियाली पर ही टकटकी लगाए रही। फूलों का हिलना, अपनी रंगीन अदा से हवा में झूम जाना जैसे किसी मनचले गीत की याद दिला रहा हो.. फूलों की पत्तियों को सहलाते हुए मैं फिर हैरान थी कि यह छोटी-छोटी पौध भी कितनी कोमल है। ये क्यारियां नन्हे बच्चों जैसे मुझे कह रही थीं कि हमें भी तो देखो बड़े जतन से बड़े हो रहे हैं।अभी हमारा रहनुमा आएगा हमें फिर से आकार देगा, बढ़ने की दिशा देगा, तभी पेड़ों की हिलती झालरें देख मैं सोचने लगी ये भला किसकी कीर्ति के गीत गा रही हैं? तभी मैंने  पेड़ की सबसे ऊँची डाल से पूछ लिया इतनी खुशी का, मस्ती का राज़ क्या है…..एक साथ कई लताएँ और वल्लरियाँ मुस्करा कर अपनी पलकों को झुकाने लगीं। मुझे समझते देर न लगी कि आज इनकी मुलाकात अपने प्रिय से हुई है। अचानक रुम से बाहर सामान ले जाते लड़के को देख याद आया कि अब हरियाली और चोटियों की सुनहरी यादों वाली गठरी समेटने का समय आ गया है। तभी मेरे साथियों ने सामान उठाने वाले, खाना बनाने वाले और कमरा साफ़ करने वाले को इनाम देते हुए अलविदा कहा। रिसेप्शन पर रिजोर्ट की प्रशंसा में कमेंट लिखते हुए मेरी कलम रिजोर्ट के माली पर कविता लिखने लगी, तभी कलम रोककर सोचने लगी यहाँ का माली भी तो किसी बड़े इनाम का हकदार है।

ओ! नादान

यूँ ही सुबह खुली हवा में चाय पीते -पीते सोचने लगी कि आज घर में बिखरी चीज़ों को सहेज दूँगी। बस आवश्यक काम खत्म करते ही उलझ गई कपड़ों की अलमारी से, बस अब तो कपड़े इकट्ठा करती तो वहीं पड़ी असंख्य फ़ोटोज़ भी सहेज दीं। वहीं साथ में पड़े दोहर, चादरें और मेकअप का सामान भी दया की भीख सी माँगता गुहार कर हिलने लगा। मैंने भी मुसकरा कर सब सहेज दिया। मुझे अच्छा लगा सबको यथास्थान रखना। दो दिन बाद  दालों के पैकेट समेट रही थी तो सोचा उस दिन सहेज कर रखे सामान को समेट भी दूँ। होश और जोश दोनों प्रबल उछाल भर ही रहे थे कि सोचा समेटा है तो सीमित भी कर दूँ।  अब सार- सार गहि करो तो आवश्यक चीज़ें रखी रहीं बाकी सहयोग के आवेग से दूसरों को देने या बाँटने के भाव से  बैग में भर दीं कि, लगाव, मोह, ममत्व और मेरी है, मेरी चीज़ें सब को तिलांजलि दे  बाँट दीं। दो एक दिन तो हलके पन का एहसास था पर फिर वही व्यर्थ प्रलाप जैसे अभी तो कपड़े नए ही थे, न जाने ये भिखारी भी बेच देते हों चीज़ें, सामान रख ही लेती, क्या था बैग में ही तो पड़ा रहता… बस ऐसा व्यर्थ संकल्प मुझे अपनी चपेट में लेने ही वाला था कि मेरे अंतर की एलईडी ने मुझे फिर से रोशन किया कि ममत्व नहीं महत्त्व का मूल्य समझ… क्योंकि महत्त्व देने और बाँटने का है, इकट्ठा करना तो ममत्व है… ओ नादान

हिलोरे

दादी तख्तपोश पर बैठे- बैठे ही आस- पास बिखरे सामान को समेट ही रहीं थीं कि मैं उनके लिए गुड़ वाला दलिया कटोरे में लेकर आ गई। अपनी दादी की मुसकान और मुख की मिठास को महसूस करना मुझे सबसे प्रिय लगता।  दादी की महकती साड़ी और कसकर बंधी चोटी में उनके व्यक्तित्त्व का सिमटना समाया हुआ था। दादी की न तो किसी वार्ता में, न आवाज़ में, न वाणी में, न बिस्तर पर पड़ी सिलवटों में, न हाव- भाव में और न रिश्तों की माला में …कहीं भी तो बिखराव नहीं था। दादी बुढ़ापे के सच्चे नुस्खे जान चुकी हैं। अरे! यह क्या मैं फिर से दादी को अपने में समाने ही लगी थी कि देखते ही देखते चाचा, चाची, सौम्य भाई और भाभी के संग उनके जुड़वा बेटे और बुआ की दोनों बेटियाँ… हम सभी दादी के वट वृक्ष की छांव में बैठ चुके थे। सारे दिन के हवाले की आवाजें और दादी के ओठों की मुसकान जैसे नसीहतों से परे, अपने ज़माने के हवाले से दूर। हम सबके काम, तौर-तरीकों को सराहाते हुए, हर एक को महत्त्व देते हुए सबकी प्रशंसा के पत्ते अपने स्पर्श और स्नेह से बिखेरते हुए ऐसे लग रहीं थीं मानो छतनार पेड़ अपनी लताओं की झालर में सभी को ठंडी हवा के हिलोरे दे रहा हो।  शायद दादी आज भी सब संग जुड़ने की जड़ों को अपने झुर्रियों वाले हाथों से पकड़े हुए हैं।

व्यंग्यः आप कौन से अतिथि हैं

- राजेंद्र वर्मा

अतिथि शब्द सुनते ही मन में घबराहट-सी होने लगती है, क्योंकि वह बिना तिथिवाला ठहरा। अतिथि का अर्थ ही होता है- जिसके आने की तिथि न मालूम हो, यानी जो बिना बुलाए आ टपके अथवा, बुलाने पर भी बिना बताए कि वह कब पधार रहा है, आ धमके। लेकिन जब कोई बिना बताए या बिना बुलाए टपक ही पड़े तो क्या किया जाए? उसका स्वागत-सम्मान करना ही पड़ता है। स्कूल के समय से पढ़ते आए हैं- अतिथि देवो भवः । इसलिए चाहे खुद के खाने का ठिकाना न हो, अतिथि को भोग लगना ही चाहिए- छप्पन प्रकार के न सही, आठ-दस प्रकार के तो चाहिए ही। नाश्ते में, शहर के नामी हलवाई की दो प्रकार की मिठाई, भुने काजू, दालमोठ, अधिकाधिक दूध में पकी अच्छी-सी चाय और खाने में  दो सब्ज़ियाँ, दाल, रोटी, चावल, पापड़, खीर या मिठाई।  भोग का सामान घर में न हो तो उधार लेकर लगना चाहिए, भले ही उसके जाने के बाद हफ़्ते भर सब्ज़ी खरीदने तक के लाले पड़ जाएँ। प्रेमचंद के ज़माने में तो एक शंकर नामक गरीब आदमी ने ‘सवा सेर गेहूँ’ उधार लेकर अतिथि-सत्कार किया और उधारी चुकाते-चुकाते बेचारा चुक गया, फिर भी बाक़ी न चुकी। इसके बावज़ूद अतिथि-सत्कार की पावन परम्परा का पालन पूरे मनोभाव से किया जाता है। इसका कारण शायद यही है कि जब कभी आतिथेय को अतिथि बनने का सुयोग आए तो उसकी सेवा में भी कोई कमी न रहे।

  पुराणों में तो अतिथि-सत्कार में आतिथेय को अपना धर्म निभाने के लिए अपनी पत्नी तक को पेश कर देने की कहानी मिलती है। वह तो ख़ैर पुरानी बात है, लेकिन आजकल के अतिथि का एक ही धर्म होता है, देवता की तरह आराम से भोग लगाकर आसन जमाना। उसे इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं रहती कि उसके आने से आतिथेय की हालत कितनी पतली हो रही है! दो कमरे के मकान का एक कमरा तो उनके लिए आरक्षित हो गया, दूसरे कमरे में पाँच लोग कैसे रहते और सोते हैं- इससे उनका कोई लेना-देना नहीं होता। पुराने ज़माने की बात कुछ और थी। अब तो यातायात के इतने निजी और सार्वजनिक साधन हो गए हैं कि अगर अतिथि महोदय थोड़ी हिम्मत दिखाएँ और शाम होते अपने दौलतखाने को लौट जाएँ तो देर रात पहुँच ही जाएँगे, लेकिन नहीं, वे तो ‘गरीबखाने’ पर रात बिताकर ही जाएँगे। कभी-कभी आतिथेय के शहर में उनका काम ऐसे अटक जाता है कि दो-तीन दिनों तक वे किसी वैताल की तरह घरवालों पर सवार रहते हैं गोया उनके काम न होने के पीछे घरवालों की कोई साज़िश हो।... 

   कुछ अतिथि ऐसे भी पाए जाते हैं कि उनकी सेवा में चाहे जितना निवेश कर दिया जाए, उनके चेहरे पर असंतुष्टि का भाव ही बना रहता है। किसी प्रोफेशनल देवता की भाँति वे प्रसन्न होना जानते ही नहीं, केवल भोग लगाना जानते हैं। यही उनकी महत्ता और प्रतिष्ठा है।... अतिथि बेचारा यजमान बना मन-ही-मन रोता रहता है। उसे देवता से सिद्धि प्राप्ति की भी आशा नहीं।

  अतिथि आजकल विस्तारवादी हो गया है। वह घरों के साथ-साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों तक पहुँच गया है। किसी कार्यक्रम में उसे मंच पर बिठाने का विधान है। यह विधान प्रचलन तब से आया होगा, जब कोई वी.आई.पी. कार्यक्रम में बिना बुलाए पहुँच गया होगा। अतः उसे यथोचित सम्मान देने के लिए मंच पर कार्यक्रम के अध्यक्ष, संस्थाध्यक्ष, संचालन आदि के साथ विराजमान कर दिया गया होगा। उसे विराजते समय मन में कहीं यह भी भावना रही होगी, कि वी.आई.पी. है, जान-पहचान हो जाएगी तो कल काम ही आएगा।... आम आदमी की ज़िंदगी इतनी जटिल हो गई है कि हमें आए दिन वी.आई.पी. की ज़रूरत पड़ ही जाती है।

   इस बात की महत्ता को समझ सयानों ने आगे चलकर मंच पर विराजमान होने के लिए एक स्थायी अतिथि का प्रावधान ही कर दिया। उसे ‘मुख्य अतिथि’ कहा गया, क्योंकि कार्यक्रम के साक्षी दर्शक-श्रोता अतिथि होते ही हैं। मुख्य अतिथि प्रायः विषय के विशेषज्ञ न होकर दीगर मामलों के जानकार या मददगार होते हैं। विषय-विशेषज्ञ तो ‘वक्ता’ के रूप में मंचस्थ रहते हैं। जब अतिथि के रूप में बुलाए गए वक्ताओं की संख्या अधिक होती है, अथवा, कुछ कमज़ोर वक्ता हों, तो उन्हें श्रोताओं की पहली पंक्ति में बिठाया जाता है। इसे वे बुरा भी नहीं मानते। अंधों में काना राजा-जैसा सम्मान पाकर वे अभिभूत हो उठते हैं।

  कुछ दिन पहले एक साहित्यिक कार्यक्रम का पोस्टर देखने को मिला। वह ‘वर्तमान व्यंग्य साहित्य में सरोकार’ विषय पर केंद्रित था। उसमें चार अतिथियों को मंचासीन करने की बात चित्रित और प्रचारित थी- मुख्य अतिथि, प्रमुख अतिथि, विशिष्ट अतिथि और अति विशिष्ट अतिथि। ताज्जुब की बात यह थी इस विषय का वक्ता एक भी न था। जितने प्रकार के अतिथि पोस्टर में चिपकाए गए थे, उनके फोटो देख यह अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता था कि वे सभी वक्तागण हैं। गनीमत थी कि अध्यक्ष एक ही था। अतिथियों के विभिन्न प्रकार को देखते हुए यह उचित लगता था कि अब अध्यक्ष पद का भी विस्तार किया जाना चाहिए।  बतर्ज़ अतिथि, अध्यक्ष भी पाँच प्रकार के हो सकते हैं, यथा- अध्यक्ष, मुख्य अध्यक्ष, प्रमुख अध्यक्ष, विशिष्ट अध्यक्ष और अति विशिष्ट अध्यक्ष। लेकिन ऐसी स्थिति में यह स्थिति और हास्यास्पद हो सकती है।

  एक कार्यक्रम में मैंने देखा कि मंच पर अध्यक्ष कई हैं, लेकिन अतिथि एक भी नहीं है। सयानों ने इन अध्यक्षों का नाम ‘अध्यक्ष- मंडल’ दिया। यह अध्यक्ष पद के दावेदारों के अहं की तुष्टि का अच्छा उपाय है। न्याय की माँग यह है कि जब अतिथियों की संख्या काबू से बाहर होने लगे तो ‘अतिथि-मंडल’ को अस्तित्व में आ ही जाना चाहिए। इससे कम-से-कम दो लाभ हैं- एक तो, इस मंडल को कितना ही बढ़ाया जा सकता है। चार-पाँच से आठ-दस तक। दूसरे, कौन किस प्रकार का अतिथि है और उसे किस क्रम में सम्मानित करने या करवाने के लिए बुलाया जाए, यह ध्यान रखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। अन्यथा, स्थिति ऐसी उत्पन्न हो सकती है कि संचालक की आँखों-तले अँधेरा छा जाए, जैसा कि नीचे वर्णित प्रसंग में हुआ।

   एक सम्मान समारोह में तमाम प्रकार के अतिथियों को मंचासीन करने में संचालक को एक पर्ची का सहारा लेना पड़ा जिसमें उसने लिख रखा था कि कौन किस प्रकार का अतिथि है, यानी कौन मुख्य अतिथि है और कौन प्रमुख या विशिष्ट? अतिथियों को मंचासीन करने में तो उसे कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन जब उन्हें सम्मान-पत्र देने की बात आयी तो उसकी पर्ची कहीं खो गई। एक अतिथि को सम्मानित करने के लिए उसने जब उन्हें आहूत किया, तो उनसे धीरे से पूछा कि वे कौन से अतिथि हैं? मुख्य अतिथि हैं या प्रमुख अतिथि हैं? इतने प्रकार के अतिथियों से निपटने का यह उसका पहला अवसर था। वह चाहता तो मंच के पीछे लगे बैनर की मदद ले सकता था जिसमें अतिथियों के प्रकार लिखे हुए थे, पर या तो घबराहट में उसे इसका ध्यान न रहा हो, अथवा, यह भी हो सकता है कि अगर वह बार-बार बैनर को देखता तो उसकी संचालन-क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता था।

   मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा था कि साहित्यिक समारोह में इतने प्रकार के अतिथियों से साहित्य का कौन सा हित सिद्ध हो रहा था, जब वे कोई सार्थक चर्चा नहीं कर रहे थे?

सम्पर्कः 3/29 विकास नगर, लखनऊ-226 022, मो. 80096 60096

कविताः धरोहर के रूप में

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डॉ. लता अग्रवाल

पास की थी जब मैट्रिक

प्रथम श्रेणी में

अखबार की सुर्खियों में था नाम

उठाते हुए अखबार

नम थी आँखें आपकी

तब पूछा था मैंने

पापा आप रो रहे हैं !

ख़ुशी नहीं हुई मेरे पास होने की ?

कहा था आपने

 

पगली! बाप का ख़ुशी जताने का

अपना तरीका होता है

बाप जब बहुत खुश होता है

तो रो देता है |

 

उस दिन ज्वाइन करते हुए नौकरी

बहुत खुश थी मैं

आप भी थे साथ मेरे मगर

सिग्नेचर करते हुए

देखा था मैंने आपको

भीगी थी आँखें आपकी

किया नहीं कोई प्रश्न

उत्तर जो जानती थी मैं

 

बिदा होते समय उस दिन

संग रो रहा था मेरे पूरा घर,

 नहीं देखा आपको

चली आई थी अपने कमरे में

आप नम आँखों से

मेरे टेडीबियर को

सहला रहे थे

समझ गई थी

यह ख़ुशी उस पिता की है

जिसकी बेटी अपना नया संसार

रचाने जा रही है

 

पहली बार बनी थी माँ

आपका ओहदा और ऊँचा

हो गया था

अपनी नवासी को लेते हुए

गोद में कभी उसकी

नन्ही उँगली पकड़ते,

कभी छोटे- छोटे पैरों को

माथे लगाते हुए देखा था

आपकी छलकती आँखों को मैंने

 

पूछा नहीं था आपसे कुछ

महसूस कर पा रही थी

आपकी खुशी को

 

फिर एक दिन

अचानक बिना किसी से कुछ कहे

आप चले गए

अनंत यात्रा पर ,

चाहकर भी आपको देख नहीं पाऊँगी

मगर पापा,

खुशियों से सराबोर वे आँखें

धरोहर के रूप में

छोड़ गए आप

आँखों में मेरी

जब भी बच्चे हासिल करते हैं

कोई खुशी

आँखें मेरी छलक आती हैं।

 

रचनाकार के बारे में- शिक्षा  - एम  ए  अर्थशास्त्र, एम  ए  हिन्दी, एम एड., पी एच डी  हिन्दी., जन्म- शोलापुर महाराष्ट्र.  महाविद्यालय में प्राचार्य।  पिछले 9 वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन  पर  संचालन, कहानी तथा कविताओं का प्रसारण, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित। मो. 9926481878, सम्पर्कः 30 सीनियर एमआईजी, अप्सरा कोम्प्लेक्स, इंद्रपुरी, भेल क्षेत्र, भोपाल- 462022