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Jun 1, 2022

रेखाचित्रः क्वीनी

- कुसुमलता चांडक

बात उन दिनों की है जब मैं नई- नई शादी होकर आई थी। छोटा सा परिवार था हमारा। सास- ससुर, ननद ,मेरे पति और मैं। हमारे इस छोटे से परिवार में एक दिन एक और सदस्य का आगमन हुआ।

मेहमान तो नन्हा सा ही था मगर वो नहीं जिसे आप सोच रहे हैं। एक दिन ऑफिस से लौटते हुए मेरे ससुर जी की गोद मे बांसी कागज में लिपटा हुआ कोई सामान था। मैं उनसे सामान लेने उनके पास गई तो चौंक उठी क्योंकि वह कोई सामान नही था। बांसी कागज में लिपटी एक प्यारी सी पिलिया आराम से उनकी गोदी में बैठी मुझे देख रही  थी।

सुनहरे भूरे रंग की नन्ही सी काया, छोटे- छोटे तराशे हुए से बाल, हिरनी जैसी चमकदार आँखें देखकर मैं हैरान थी। ससुर जी ने उसे मुझे थमा दिया । अब तक घर के सभी लोग हमारे आस-पास आ चुके थे। मेरी ननद तो उसे देखकर खुशी से चिल्ला ही उठी। हम सभी उसे अपनी- अपनी गोद मे लेने के लालायित हो रहे थे।

कुछ दिन तक जैसे उसके आने का उत्सव ही मनता रहा। उसके साथ खेलने के चक्कर मे अक्सर काम देर से होने लगे। ननद भी अपनी पढ़ाई से ज्यादा ध्यान उसकी तरफ देने लगी थी। ये सब देखकर एक दिन मेरी सासु जी ने ससुर जी को उसे छोड़ आने का फरमान जारी कर दिया।

बेमन से ससुर जी उसे अपनी गोद मे लेकर कुकड़ैल पर छोड़ने चले गए। वहाँ पल के पास उसे अपनी गोद से उतारकर वह चलने लगे तो वो भी कुँ - कुँ करती हुई उनके पीछे चलने लगी। कभी रुक जाती तो कभी खरगोश की तरह तेज भागकर ससुर जी की पेंट का पायचा अपने मुँह में भर लेती।  ससुर जी बहुत देर तक अपने मन को मजबूत नहीं रख सके और उसे लेकर वापिस आ गए। उसे घर वापिस आया देखकर हम सभी के उदास चेहरे खिल गए लेकिन आश्चर्य, हममें से कोई उसे अपनी गोद में लेता उसके पहले सासुजी उसे अपनी गोद में लेकर इस तरह लाड़ करने लगी जैसे कितने दिन बाद मिली हो। हम सबकी चुप्पी से अचानक उनका ध्यान जब हम लोगों पर गया तो बनावटी गुस्से से डाँटते हुए उन्होंने कहा, ‘अब इसका कोई नाम रखोगे या ये ऐसी ही बेनाम रहेगी!’

अभी तक उसका कोई नाम नहीं रखा गया था। उसका नाम क्या रखा जाय, इसके लिए हम सभी की मीटिंग शुरू हो गई। जब वह सड़क पर चलती थी तो अपने आस-पास के कुत्तों को बड़ी हिकारत भरी नजर से देखते हुए गर्दन अकड़ा कर और पूँछ उठा कर चलती थी। इसलिए यह तय हुआ कि इसका नाम ‘क्वीनी’ रखा जाय।

क्वीनी शाकाहारी थी और हर मंगलवार वह पूरे दिन कुछ नहीं खाती थी। शुरू में उसके न खाने पर हम सभी परेशान हो जाते थे लेकिन फिर गौर करने पर पता चला कि ऐसा वह केवल मंगलवार के दिन करती थी। यह हमारे साथ - साथ हमारे परिचितों के लिए भी कौतुहल का विषय था। क्वीनी  पूरी जिंदगी ब्रह्मचारी बन कर रही, कभी किसी कुत्ते को उसने अपने पास नहीं आने दिया।

उन्ही दिनों गाँव से पत्र आया कि अमुक तारीख को मेरे दादा ससुर ( दादा जी ) आ रहे हैं।  सभी लोग ये जानकर परेशान हो गए क्योंकि उन्हें कुत्ते- बिल्लियों से बहुत चिढ़ थी। रोज नई योजनाएँ बनाई जाती और निरस्त कर दी जाती।

इन सबसे बेखबर क्वीनी हमारे साथ पहले की तरह ही खेलना चाहती थी मगर हम उसे उतना समय नहीं दे पा रहे थे। वह नाराज हो जाती थी और तब तक नही मानती थी जब तक उसकी पसंद का खाना उसे नहीं मिलता था।

आखिरकार नियत तिथि पर दादा जी आ गए। क्वीनी को शोर न मचाने की हिदायत देकर उसे आँगन के कोने में जंजीर से बाँध दिया गया था। चारपाई पर बैठ पानी पीते हुए दादाजी की नजर जैसे ही क्वीनी पर गई उनके माथे पर बल पड़ गए लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं। क्वीनी चुपचाप सिर गर्दन में दबाये आँखें बंद करके पड़ी थी। बीच - बीच में आँख खोलकर स्थिति का जायज़ा लेती थी फिर आँख बंद कर लेती थी ।

रात को खाना खाने के पहले उन्होंने ससुर जी से कहा, ‘जब ले ही आये हो तो बाँध कर क्यों रखा है! खोलो उसको।’

कुछ तो बात थी उसमें जो दो दिन में उसकी मनमोहक उछल कूद और शरारतों ने उसे दादा जी की प्यारी बना दिया।

एक बार दादा जी आम लेकर आये। मुझे देते हुए उन्होंने उन आमों को पानी में भिगो कर रखने के कहा। मैंने एक छोटी बाल्टी में उन आमों को भिगो कर रख दिया।

शाम को मेरी सासु जी ने कहा, ‘ये क्वीनी दबे पाँव आ रही है और फिर भाग कर छत पर चली जाती है थोड़ी देर बाद वापिस दबे पाँव आती है। देखकर आओ ये कर क्या रही है।’

मैं और मेरी ननद छत पर गए तो देखकर हैरान रह गए। क्वीनी बड़ी सफाई से एक आम खा रही थी। वही कुछ गुठलियाँ और पड़ी थी जिनको देखकर लग ही नहीं रहा था कि इन पर कभी आम का गूदा भी था। बाद में ये बात सबको बताने पर किसी की भी हँसी नहीं रुकी। उसके बाद दादा जी जब भी आते उसके लिए अलग से आम लाते थे।

उम्र बढ़ने के साथ क्वीनी सुस्त और बीमार रहने लगी थी। डॉक्टर को दिखाने पर पता चला उसे ट्यूमर है जिसका ऑपरेशन करना पड़ेगा। डॉक्टर को जब उसकी उम्र चौदह साल पता चली तो उन्होंने बताया कि बहुत कम कुत्ते इतनी आयु तक जीवित रह पाते हैं।

ऑपरेशन वाले दिन हम सभी चिंतित थे। क्वीनी हम सभी को एकटक देख रही थी और अपने कमजोर पंजे को बार-बार हमारे पास ला रही थी। अपनी मूक आँखों से जैसे हमें सांत्वना दे रही थी कि चिंता मत करो।

ऑपरेशन सफल नहीं हो सका। उसका कमजोर शरीर ऑपरेशन नहीं झेल पाया। जिस लाल शॉल में लपेट कर हम उसे हॉस्पिटल लाये थे, उसी शॉल में लपेट कर आँसुओं  के साथ हम सभी ने उसे अंतिम विदाई दी इस वादे के साथ कि वह हमेशा हमारी यादों में जिंदा रहेगी।

कविताः पेड़ से बातचीत

- हरभगवान चावला

आज मैंने उस पेड़ से बात की

जिसकी छाया में बैठ मैं सालों पढ़ा

मैं तब बच्चा था और पेड़ बूढ़ा

आज मैं बूढ़ा था और पेड़ जवान

हम दोनों ने एक दूसरे का हाल जाना

और पाया कि दोनों मज़े में ही हैं

पेड़ को बस एक ही दुख था

कि अब पंछी बहुत कम आते हैं

मैंने अपने दुख के बारे में सोचा तो पाया

हम दोनों का दुःख कितना मिलता था

हम एक दूसरे के गले लग देर तक

बीते दिनों को याद करते रहे

हम कई बार हँसे, कई बार रोए

हमने बहुत बातें कीं और थक गए

हमारी बातों को किसी ने नहीं सुना

कहते हैं जिन बातों को कोई नहीं सुनता

उन बातों को ईश्वर सुनता है चुपचाप

पेड़ और मैं किसी ईश्वरीय सत्ता में

यक़ीन नहीं करते थे, इसके बावजूद

हम दोनों ने महसूस की ईश्वर की मौजूदगी

जो हँसता और रोता रहा था हमारे साथ

हम दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराए

और आँखों ही आँखों में एक दूसरे से कहा-

अरे, ईश्वर तो बिल्कुल हम जैसा निकला!

सम्पर्क- 406, सेक्टर-20, सिरसा-125055 ( हरियाणा)


व्यंग्यः कृपया फूल न तोड़ें

- डॉ. गोपालबाबू शर्मा

आज से पचास साल पहले हम एकदम छड़े थे, अल्ल बछेड़े थे। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की भाँति हम भी मानते थे कि 'सैर कर दुनिया की ग़ाफिल जिन्दगानी फिर कहाँ? ज़िन्दगानी भी रही तो नौजवानी फिर कहाँ?' सो एक बार जा पहुँचे नैनीताल। तल्‍ली ताल और मल्‍ली ताल के बीच फलों की झील के सहारे-सहारे सड़क और सड़क के एक किनारे पर जगह-जगह फूलों की क्यारियों की खूबसूरत कतार। नगरपालिका की ओर से क्यारियों में लगी पट्टिकाओं पर लिखवाया गया था- ‘कृपया फूल न तोड़ें। यह आपके नगर की शोभा है।’ पता नहीं, अब नैनीताल का क्‍या हाल-चाल है। देश के बँटवारे की तरह अब समाज में मध्यम वर्ग के भी दो टुकड़े हो गए हैं- उच्च मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग। इस कमरतोड़ महँगाई के ज़माने में 'नौन, तेल, लकड़ी' के चक्कर में पड़े निम्न मध्यम वर्ग के किसी व्यक्ति को अब नैनीताल, मसूरी या शिमला कहाँ सूझ पाता है।

पेड़-पौधों और फूलों का संरक्षण स्वस्थ पर्यावरण के लिए भी ज़रूरी है। पर्यावरण-प्रदूषण तो थोड़ा-बहुत पहले भी था, पर इन दिनों लोग हर ओर उसके सुधार की बात ज़ोर-शोर से करने लगे हैं, भले ही वह काग़ज़ी या दिखावटी ज़्यादा हो। बिजली अक्सर गुल होगी, तो दुकानों पर जनरेटर चलेंगे ही और जब जनरेटर चलेंगे तो प्रदूषण फैलेगा ही। कैसे रुक पाएगा यह? रेलवे रोड जैसे पॉश बाज़ार में भी जनरेटरों का धुआँ और इतना हल्ला कि साफ-साफ देखना और सुनना दोनों ही मुश्किल।

अभी एक लतीफा सुनने को मिला। एक व्यक्ति ने अपने मित्र से कहा-आज मैंने दस रुपये बचा लिए।

‘कैसे?’ मित्र ने पूछा।

‘मैं सुबह टहलने जाता हूँ। पार्क में लिखा- फूल तोड़ने पर दस रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा। मैंने फूल नहीं तोड़ा।’

‘फूलों को तोड़े जाने से बचाने की यह एक अच्छी हिमायत है, पर व्यवहार में कितनी कारगर हो पाती है है?’

कुछ लोगों को फूल चोरी- चोरी तोड़ने में ही मजा आता है। पता नहीं कि एक अत्यन्त तेज-तर्रार और पाक-साफ छवि वाले भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त की जानकारी में यह बात थी या नहीं कि उनके दैनिक पूजा-पाठ के लिए उनका नौकर एक पार्क से चोरी- छिपे फूल तोड़ कर लाता था। उसका पकड़ा जाना देश-व्यापी चर्चा का विषय बन गया।

लोग-बाग तो अब आमतौर पर घर के आगे पटरी की जगह को भी घेर लेने में बड़ी शान समझते हैं, पर हमने घर में ही खाली ज़मीन छोड़ रखी है और उसमें पेड़-पौधे लगा दिए हैं। केले का भी एक पेड़ लगाया था। एक पेड़ से अनेक पेड़ हो गए। उन पर केले भी आते थे, लेकिन हम उन्हें अकेले नहीं खाते ये। इतने सारे खा भी नहीं पाते थे। अतः आस-पड़ोस और परिचितों में बाँट देते थे और मुफ्त की वाहवाही लूट लेते थे। बड़ा सुख मिलता था।

पर केलों के कारण परेशानी में पड़ गए। जिसे देखो वही केले के पत्ते कथा के लिए माँगने चला आता। लोग कथा करवाते हैं और कई- कई बार कथा करवाने के बाद भी वे लीलावती और कलावती की सन्दर्भ- कथा को ही सत्यनारायण की कथा समझते हैं। ‘सत्य ही नारायण है’ और यही असली कथा है, इस वे नहीं जान पाते। खैर, कथा करवाने वाले पत्ते लेने आते, लेकिन वक्‍त का भी ध्यान न रखते। हमें अपना नहाना, खाना, लिखना-पढ़ना, सब कुछ छोड़कर, पहले उन्हें केले के पत्ते देने पड़ते। दो पत्तों से भी काम न चलता, पूरे चार ही हों। कई बार तो पत्ते काटते समय हड़बड़ी में केले के पत्तों का रस टपककर हमारे कपड़ों पर गिर पड़ता और कभी न छूटने वाले निशान छोड़ जाता। कुछ ऐसे भी परिचित सज्जन आते, जिन्हें चिरे हुए पत्ते बिल्कुल न भाते और वे मन-पसन्द नए-नए छाँटकर ले जाते।

लोगों की समझ में न तो अपने आप आया और न हमारे समझाने से आया कि जब पत्ते ही नहीं रहेंगे, तो केले के पेड़ भी कहाँ रह पाएँगे? सूख नहीं जाएँगे? माँगने वालों से तभी पीछा छूटा, जब केले के पेड़ जड़ से उखड़ गए।

केले के पत्तों की तरह ही शामत आई गुलाब के फूलों की। हमारे यहाँ छह-सात पौधे हैं। उन पर फूल आते हैं, पर बच नहीं पाते हैं। आजकल भजन-पूजन और व्रत भी एक फैशन जैसे हो गए हैं। कुछ दिन पहले महिलाओं में सन्‍तोषी माँ की पूजा का ज़ोर था। अब शुक्रवार के दिन ‘शुभ लक्ष्मी’ की पूजा का शोर है। पूजा के लिए गुलाब का लाल फूल ही चाहिए। पता नहीं क्यों?

‘फूल चौराहे’ से एक-आध रुपये में उसे मोल मँगाने में उन्हें क्या आपत्ति है? अच्छे-भले घर की महिलाएँ भी मुफ्त माँगकर या किसी बच्चे से मँगवाकर काम चलाती हैं। मुहल्ले के नुक्कड़ पर रहने वाली एक लालाइन जी हैं। उनके यहाँ परचून की दुकान है। वे बिना नागा हर शुक्रवार को हमारे यहाँ फूल लेने चली आती हैं और इस तरह अड़ जाती हैं, जैसे हम उनके यहाँ से कोई सामान उधार ले आए हों और वे उसके पैसे वसूल करने आई हों।

महिलाओं के बिहाफ़ पर कुछ पुरुष लोग फूल माँगने इतने अधिकारपूर्वक आते हैं, मानो हमारी यह ज़मीन और ये गुलाब के पौधे उन्हीं के बाप के हों और हम तो बस उनकी ओर से माली की मुफ्त नौकरी बजा रहे हों।

शुक्रवार को सुबह से ही हमारा मन उदास हो जाता है। जानते हैं कि दिन भर गुलाब के फूल तोड़-तोड़ कर लोगों को देने पड़ेंगे और कई दिन तक सूने-सूने, लुटे-पिटे से पौधे अपनी करुण कथा कहते रहेंगे।

हमारे पड़ोसी एक डाक्टर साहब की सरकारी नियुक्ति कहीं ‘हिल एरिया’ में है, लेकिन वे जनाब रहते अक्सर मैदान में ही हैं। पता नहीं, वहाँ उनकी हाज़िरी कौन लगाता है? जब भी उनकी या उनके किसी घर वाले की नाक में कोई फूंसी निकल आती है, तो दवा छोड़ उन्हें फूल सूँघने की ज़रूरत पड़ जाती है। वे बेझिझक आते हैं और घण्टी बजाने के बजाय ज़ोर- ज़ोर से दरवाजा खटखटाते हैं या आवाज़ लगाते हैं। हमें गुलाब का ताजा फूल सादर उनके हवाले करना पड़ता है।

वही दिक्कत पैदा हो गई है, जो केले के पेड़ों की वजह से आती थी। लेने वालों को गुलाब का लाल फूल ही चाहिए। मन के मुताबिक चाहिए। नया-नया चाहिए। छोटा नहीं, बड़ा वाला चाहिए। किसी- किसी को एक-दो नहीं, तीन- तीन चाहिए। जिस समय माँगने आएँ, उसी समय मिलने चाहिए।

एक दिन पर-उपदेश में कुशल एक सज्जन ने हमें समझाया-‘अमाँ यार, क्यों बेकार में दुखी होते हो? फूल तो झर ही जाते हैं। कोई ले जाए तो क्या हर्ज है? इंसान के काम आना इंसान का फर्ज है।’ हमारा कहने का मन हुआ- ‘जनाब, यह जीवन भी तो नश्वर है। इसे भी फूलों की तरह एक दिन झर जाना है, लेकिन क्या इसका मतलब यह हुआ कि इसे आज ही समाप्त कर दें?’ पर कहना निरर्थक ही रहता। स्वार्थ के आगे भला तर्क को कौन सुनता है, कौन गुनता है?

हम बड़े असमंजस में हैं। क्या करें, क्‍या न करें? इस तरह खिले-अधखिले कोमल, सुन्दर फूलों को तोड़-तोड़कर परोपकार करते रहें या फिर हारकर किसी दिन कह दें कि ‘ले जाओ, पूरा पौधा ही उखाड़ कर ले जाओ’ रोज़-ःरोज की झंझट से तो मुक्ति पाएँगे। न बासी बचेगा, न क॒त्ते खाएँगे।

सम्पर्कः 46, गोपाल विहार कॉलोनी, देवरी रोड, आगरा- 282001 (उ.प्र.)

कहानीः बाबा जी का भोग

- प्रेमचंद

रामधन अहीर के द्वार पर एक साधु आकर बोला- बच्चा तेरा कल्याण हो, कुछ साधु पर श्रद्धा कर।

रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- साधु द्वार पर आये हैं, उन्हें कुछ दे दे।

स्त्री- बरतन माँज रही थी, और इस घोर चिंता में मग्न थी कि आज भोजन क्या बनेगा, घर में अनाज का एक दाना भी न था। चैत का महीना था। किंतु यहाँ दोपहर ही को अँधकार छा गया था। उपज सारी-की-सारी खलिहान से उठ गयी। आधी महाजन ने ले ली, आधी जमींदार के प्यादों ने वसूल की। भूसा बेचा तो बैल के व्यापारी से गला छूटा, बस थोड़ी-सी गाँठ अपने हिस्से में आयी। उसी को पीट-पीटकर एक मन-भर दाना निकाला था। किसी तरह चैत का महीना पार हुआ। अब आगे क्या होगा। क्या बैल खाएँगे, क्या घर के प्राणी खाएँगे, यह ईश्वर ही जाने ! पर द्वार पर साधु आ गया है, उसे निराश कैसे लौटाए, अपने दिल में क्या कहेगा।

स्त्री ने कहा- क्या दे दूँ, कुछ तो रहा नहीं ?

रामधन- जा, देख तो मटके में, कुछ आटा-वाटा मिल जाय तो ले आ।

स्त्री ने कहा- मटके झाड़-पोंछकर तो कल ही चूल्हा जला था। क्या उसमें बरक्कत होगी ?

रामधन- तो मुझसे तो यह न कहा जायगा कि बाबा घर में कुछ नहीं है। किसी के घर से माँग ला।

स्त्री- जिससे लिया उसे देने की नौबत नहीं आयी, अब और किस मुँह से माँगू ?

रामधन- देवताओं के लिए कुछ अँगौवा निकाला है न, वही ला, दे आऊँ !

स्त्री- देवताओं की पूजा कहाँ से होगी ?

रामधन- देवता माँगने तो नहीं आते ? समाई होगी करना, न समाई हो न करना।

स्त्री- अरे तो कुछ अँगौवा भी पंसेरी दो पंसेरी है ? बहुत होगा तो आध सेर। इसके बाद क्या फिर कोई साधु न आयेगा। उसे तो जवाब देना ही पड़ेगा।

रामधन- यह बला तो टलेगी, फिर देखी जायगी।

स्त्री झुँझलाकर उठी और एक छोटी-सी हाँड़ी उठा लायी, जिसमें मुश्किल से आध सेर आटा था। वह गेहूँ का आटा बड़े यत्न से देवताओं के लिए रखा हुआ था। रामधन कुछ देर खड़ा सोचता रहा, तब आटा एक कटोरे में रखकर बाहर आया और साधु की झोली में डाल दिया।

महात्मा ने आटा लेकर कहा- बच्चा, अब तो साधु आज यहीं रमेंगे। कुछ थोड़ी-सी दाल दे, तो साधु का भोग लग जाय।

रामधन ने फिर आकर स्त्री से कहा। संयोग से दाल घर में थी। रामधन ने दाल, नमक, उपले जुटा दिये। फिर कुएँ से पानी खींच लाया। साधु ने बड़ी विधि से बाटियाँ बनायीं, दाल पकायी और आलू झोली में से निकालकर भुरता बनाया। जब सब सामग्री तैयार हो गयी, तो रामधन से बोले- बच्चा, भगवान के भोग के लिए कौड़ी-भर घी चाहिए। रसोई पवित्र न होगी, तो भोग कैसे लगेगा ?

रामधन- बाबाजी, घी तो घर में न होगा।

साधु- बच्चा, भगवान का दिया तेरे पास बहुत है। ऐसी बातें न कह।

रामधन- महाराज, मेरे गाय-भैंस कुछ नहीं है, घी कहाँ से होगा ?

साधु- बच्चा, भगवान के भंडार में सब कुछ है, जाकर मालकिन से कहो तो ?

रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- घी माँगते हैं, माँगने को भीख, पर घी बिना कौर नहीं धँसता !

स्त्री- तो इसी दाल में से थोड़ी लेकर बनिये के यहाँ से ला दो। जब सब किया है तो इतने के लिए उन्हें क्यों नाराज करते हो ?

घी आ गया। साधुजी ने ठाकुरजी की पिंडी निकाली, घंटी बजायी और भोग लगाने बैठे। खूब तन कर खाया, फिर पेट पर हाथ फेरते हुए द्वार पर लेट गये। थाली, बटली और कलछुली रामधन घर में माँजने के लिए उठा ले गया।

उस रात रामधन के घर चूल्हा नहीं जला। खाली दाल पकाकर ही पी ली।

रामधन लेटा, तो सोच रहा था- मुझसे तो यही अच्छे !

मौसमः तपते सूरज के तेवर

- डॉ. महेश परिमल
सूरज लगातार तप रहा है। भीषण गर्मी का दौर शुरू हो गया है। तापमान का पारा लगातार ऊँचाई पर पहुँच रहा है। लोग बेहाल हैं। इस दौरान कुछ राज्यों में बिजली संकट भी शुरू हो गया है। सड़कों से पेड़ गायब होने लगे हैं। पेड़ काटने वाले भी छाया तलाश रहे हैं। ऐसे में रोशनी की एक किरण दिखाई दे रही है। आपके पास फोन आए, जिसमें सामने वाला आपसे यह पूछे कि क्या आप अपने घर या दुकान के आसपास पौधे लगवाना चाहेंगे? आज जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उसके लिए यह बहुत ही उपयोगी है। ऐसे में आप इंकार तो नहीं करेंगे ना? हरियाणा में करनाल के वन विभाग के अधिकारियों ने नगरीय क्षेत्रों में हरीतिमा संवर्धन के लिए जो योजना शुरू की है। यह इसी का एक भाग है। इसी योजना के तहत वन कर्मचारी लोगों से फोन पर इस प्रकार का वार्तालाप करते हैं। कितनी अच्छी पहल है यह?

हम सभी जानते हैं कि आज जिस तरह से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है, उसके पीछे भले ही कई कारण बताए जा रहे हों, पर सबसे महत्त्वपूर्ण यही है कि आज भी पेड़ों की कटाई बदस्तूर जारी है। जितनी तेजी से पेड़ कट रहे हैं, उतनी तेजी से पेड़ लगाए नहीं जा रहे हैं। यही असंतुलन ही है, जो आज बढ़ रही बेतहाशा गर्मी के रूप में हमारे सामने है। इस गर्मी का मुकाबला न तो  हमारे कूलर कर पाएँगे और न ही हमारे एसी। सब धरे के धरे रह जाएँगे, यदि हम न चेते तो। केवल पेड़ ही हमें इस गर्मी से निजात दिला सकते हैं। अब तक जो पेड़ शेष हैं, वे हमारे पूर्वजों के पराक्रम के कारण हैं। हमने भावी पीढ़ी के लिए ऐसा कुछ भी शेष नहीं रखा है, जिसे वे उपलब्धि मानें। हमारे पूर्वजों ने हमें दिए हरे-भरे जंगल और हमने भावी पीढ़ी को दिए कांक्रीट के जंगल। एक जंगल हमें सुकून देता है, दूसरा जंगल हमें देता है गर्मी...गर्मी...और केवल गर्मी।

सूरज की प्रखरता हमें झुलसा रही है। वनस्पतियाँ उसके तेवर के आगे लाचार हो गई हैं। पेड़ों की सामूहिक शक्ति समाप्त हो गई है। पुराणों में तरु महिमा का उल्लेख मिलता है। आखिर क्या होती है यह तरु महिमा। कभी जानने की कोशिश की आपने? शायद भूल गए आप। बचपन में आँवला अष्टमी पर माँ के साथ जंगल जाते थे। वहां आँवले के किसी पेड़ के नीचे हम सब जमा होते। माँ पेड़ की पूजा करती, पर हमें इंतजार होता, माँ के बनाए व्यंजनों का। हम छककर घर पर बनाए गए पकवानों का स्वाद लेते। एक छोटी-सी पिकनिक ही हो जाती थी। तब हमें पता नहीं होता था कि आखिर ये क्या है? माँ पेड़ों की पूजा क्यों करती है? आज पता चल रहा है कि सचमुच हम तो पेड़ों की पूजा करना ही नहीं जानते। या फिर भूल गए हैं तरु -महिमा को।

संस्कृत में तरु का आशय है -आपदाओं से रक्षा करने वाला। भला किसे अच्छा नहीं लगता घना और हरियाला छायादार पेड़। चिलचिलाती धूप में पसीने से तरबतर, थके हारे किसी राहगीर को इस तरह का पेड़ दिखाई दे जाए, तो निश्चित ही वह उस पेड़ की ठंडी छाँव में थोड़ी देर के लिए आराम करना चाहेगा। पेड़ का हरियालापन ही लोगों को आकर्षित करता है. अब हम अपने चारों ओर नजर घुमा लें, तो क्या आप पाएँगे, कोई छायादार हरियाला पेड़। जब आपदाओं से रक्षा करने वाले को ही हमने काटकर ड्राइंग रुम की शोभा बना ली है, तो वह हमारी रक्षा कैसे कर पाएगा? सोचा कभी आपने?

पेड़ का मानव से बरसों पुराना नाता है. मानव भी इसके महत्त्व को समझता है। पर आज वह अपने स्वार्थों में इतना लिपट गया है कि वह अपनी रक्षा करने वाले को ही काटने लगा है। जिस पेड़ की जड़ें जितनी ही गहरी होंगी, वह उतना ही विश्वसनीय होता है। इसी तरह जिस व्यक्ति के सद्विचारों की जड़ें जितनी गहरी होंगी,

वह उतना ही परोपकारी होगा। इंसान ने पेड़ से यही सीखा। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। अब व्यक्ति के विचारों की जड़ें इतनी गहरी नहीं हैं कि वह कुछ अच्छा सोचे। इसके साथ ही वह अपने इस तरह के विचारों को आरोपित करते हुए गहरी जड़ों वाले पेड़ों का अस्तित्व ही समाप्त करने में लग गया है। मानव की यह प्रवृत्ति उसे कहाँ ले जाएगी, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह सच है कि प्रकृति को अब गुस्सा आने लगा है। यही कारण है कि अब हमें समय-समय पर प्रकृति के रौद्र रूप के दर्शन कुछ अधिक ही होने लगे हैं।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि हमें अब पेड़ों से दोस्ती कर ही लेनी चाहिए। हरियाणा सरकार की पहल सराहनीय है। वन विभाग के कर्मचारी हमारी दुकान या घर के आसपास पौधे तो लगा देंगे, पर उसकी देखभाल की जिम्मेदारी हमारी ही होगी। आखिर हम गमलों में तुलसी, मीठा नीम आदि औषधीय पौधे लगाते ही हैं। उसकी देखभाल भी करते हैं। हम पेड़ों की देखभाल करेंगे, तो हमारी पीढ़ी भी इसे ध्यान से देखेगी, वह भी समझेगी पेड़ों की महत्ता। अनजाने में हम उन्हें एक हरियाला संस्कार दे जाएँगे। इसी हरियाले संस्कार की आज महती आवश्यकता है। तो एक कदम बढ़ाएँ हम देश की धरती पर हरीतिमा की चादर ओढ़ाने की ओर....