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Jul 10, 2020

प्रयास हम रोज जीते हैं हम रोज मरते हैं

प्रयास
 हम रोज जीते हैं हम रोज मरते हैं
-सुमन परमार
कहते हैं अपने दोस्तों की लिस्ट में एक डॉक्टर और एक वकील जरूर होना चाहिए। पता नहीं कब कहाँ इनकी सलाह की जरूरत महसूस हो। बीमारियों को लेकर हमारे मन में तरह-तरह की धारणाएँ हैं। लेकिन जब आप डॉक्टर अबरार मुल्तानी से मिलेंगे तो इनमें से ज्यादातर धारणाएं बिलकुल उलट-पुलट जाती हैं। उनके अनुसार दर्द हमारे हमदर्द होते हैं।
अबरार मुल्तानी का कहना है, दर्द शरीर का मैसेज है। अगर हमें दर्द नहीं होगा तो हम जीवित नहीं रह पायेंगे। दर्द बताता है कि देखों यहाँ परेशानी है इसका इलाज़ करो। पेनकिलर खाकर हम हमारे हमदर्द' का मुँह बंद कर देते हैं। ज्यादा दर्द, मतलब परेशानी ज्यादा बड़ी है डॉक्टर के पास जल्दी जाना जरूरी है।
पेशे से आयुर्वेदिक एवं यूनानी डॉक्टर अबरार मुल्तानी लेखक भी हैं। 5 पिल्स डिप्रेशन स्ट्रेस से मुक्ति के लिए एवं क्यों अलग है स्त्री-पुरूष का प्रेमराजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इनकी चर्चित किताबों में शामिल है।
भारत में 1 जुलाई नेशनल डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया जाता है। इसी अवसर पर राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा #CelebrateDoctorsDayWithRajkamal कार्यक्रम के अंतर्गत लेखक-डाक्टर से मुलाक़ात एवं स्वास्थ चर्चोओं का सिलसिला शुरू किया गया है। फेसबुक लाइव के जरिए डॉ.अबरार मुल्तानी, डॉ.यतीश अग्रवाल और डॉ.विनय कुमार समूह के फेसबुक पेज से लाइव आकर अपने अनुभव एवं अच्छे स्वास्थ के लिए महत्वपूर्ण बातें लोगों से साझा कर रहे हैं।
हमें क्यों स्वस्थ रहना चाहिए
वैज्ञानिक अर्थ में हमारे अंदर बहुत सारे अणु रोज़ नष्ट होते हैं और रोज नए अणु बनते भी हैं। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो शरीर के भीतर चलती रहती है। इसलिए डॉक्टर कहते हैं कि शरीर के भीतर नए बनने वाले अणु जितने स्वस्थ होंगे उतना ही युवा हमारा शरीर होगा।
राजकमल प्रकाशन समूह के फेसबुक पेज से लाइव बातचीत में अबरार मुल्तानी ने कहा, बीमारियां हमारी शत्रु नहीं हैं और हर रोग दवाओं से ठीक नहीं किया जा सकता। ये दो बातें ऐसी हैं जो बीमारी के प्रति हमारी धारणा को उलट कर रख देती है। लेकिन, जरूरी है कि शरीर की भाषा को, उसकी जरूरतों को समझना। हमारे भीतर जो विचार पनपते हैं वो हमारे स्वास्य्थ पर सीधा असर करते हैं। निगेटिव सोच शरीर पर प्रतिकूल असर पैदा करते हैं।
कोविड 19 के इस समय में हमारे डॉक्टर्स एवं स्वास्थ कर्मी लगातार डटकर मुक़ाबला कर रहे हैं। वो हर संभव कोशिश कर रहे हैं हम स्वस्थ एवं सुरक्षित रहें। उनके इस प्रयास में हमारी सरकार एवं हम सभी शामिल हैं। लेकिन, असल सम्मान तभी संभव है जब हम उनकी बातों को सुनें और उसे अमल में लाएं।
हमारा शरीर अलग-अलग तरह से हमसे संवाद करता है। खाँसी, बुखार, शरीर दर्द और अन्य लक्ष्ण दरअसल शरीर की अपनी भाषा है जिसके जरिए वो हमसे संवाद करना चाहता है। जरूरी है कि हम इसे सुनें और समझें।
लॉकडाउन के दौरान और अनलॉक की प्रक्रिया में भी राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा कई महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। हर एक पाठक से संवाद बनाए रखने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण पहल 'पाठपुनःपाठ' पुस्तिका 67 दिनों से दैनिक वितरित की जा रही थी। 1 जुलाई से इसके साप्ताहिक अंक वाट्सएप्प के जरिए साझा किए जा रहे हैं। इन 67 अंकों में कई विशेष और विषय-केंद्रित अंक भी निकाले गए। नई रचनाओं के दो विशेष अंक रचना-चयन की ताजगी के कारण पाठकों द्वारा बहुत पसंद किए गए।
राजकमल प्रकाशन समूह, फोन - 9540851294

वायरस से लड़ने में मददगार गुड़ और अदरक

वायरस से लड़ने में मददगार गुड़ और अदरक
-डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
हाल ही में मुझे भयानक सर्दी-ज़ुकाम हुआ था। दवाओं (एंटीबायोटिक, विटामिन सी) से कुछ भी आराम नहीं मिल रहा था। तो मेरी पत्नी ने घरेलू नुस्खा - गुड़ और अदरक मिलाकर - दिन में तीन बार लेने की सलाह दी। बस एक-दो दिन में ही सर्दी-खाँसी गायब थी! यह कमाल गुड़ का था या अदरक का, यह जानने के लिए मैंने आधुनिक वैज्ञानिक साहित्य खँगाला। मैंने पाया कि सालों से चीन के लोग भी सर्दी-ज़ुकाम तथा कुछ अन्य तकलीफों से राहत पाने के लिए इसी तरह के एक पारंपरिक नुस्खे - जे जेन तांग - का उपयोग करते आए हैं। इसमें अदरक के साथ एक मीठी जड़ी-बूटी (कुद्ज़ु की जड़) का सेवन किया जाता है।
अदरक के औषधीय गुणों से तो सभी वाकिफ है। कई जगहों, खासकर भारत, चीन, पाकिस्तान और ईरान में इसके औषधीय गुणों के अध्ययन भी हुए हैं। ऐसा पाया गया है कि इसमें दर्जन भर औषधीय रसायन मौजूद होते हैं। 1994 में डॉ. सी. वी. डेनियर और उनके साथियों ने अदरक के औषधीय गुणों पर हुए 12 प्रमुख अध्ययनों की समीक्षा नेचुरल प्रोडक्ट्स पत्रिका में की थी। ये अध्ययन अदरक के ऑक्सीकरण-रोधी गुण, शोथ-रोधी गुण, मितली में राहत और वमनरोघी गुणों पर हुए थे। इसके अलावा पश्चिम एशियाई क्षेत्र के एक शोध पत्र के मुताबिक अदरक स्मृति-लोप और अल्ज़ाइमर जैसे रोगों में भी फायदेमंद है। इस्फहान के ईरानी शोधकर्ताओं के एक समूह ने अदरक में स्वास्थ्य और शारीरिक क्रियाकलापों पर असर के अलावा कैंसर-रोघी गुण होने के मौजूदा प्रमाणों की समीक्षा की है।
कैंसर-रोधी गुण
कई अध्ययनों में अदरक में कैंसर-रोधी गुण होने की बात सामने आई है। औद्योगिक विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (अब भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान) के डॉ. योगेश्वर शुक्ला और डॉ. एम. सिंह ने साल 2007 में अपने पर्चे में अदरक के कैंसर-रोधी गुण के बारे में बात की थी। उनके अनुसार अदरक में 6-जिंजेरॉल और 6-पेराडोल अवयव सक्रिय होने की संभावना है। साल 2011 में डॉ. ए. एम. बोड़े और डॉ. ज़ेड डोंग ने इस बात की पुन: समीक्षा की। अपनी पुस्तक दी अमेज़िंग एंड माइटी जिंजर हर्बल मेडिसिनमें उन्होंने ताज़ी और सूखी (सौंठ), दोनों तरह की अदरक में मौजूद 115 घटकों के बारे में बताया, जिनमें जिंजेरॉल और उसके यौगिक मुख्य थे। शंघाई में हाल ही में प्रकाशित पर्चे के अनुसार अदरक कैंसर-रोधी 5-फ्लोरोयूरेसिल यौगिक की गठान-रोधक क्रिया को बढ़ाता है।
यानी अदरक औषधियों का खजाना है। मगर वापिस सर्दी-खांसी पर आ जाते हैं। कैसे अदरक सर्दी-खांसी में राहत पहुँचाता है? इसके बारे में कुछ जानकारी साल 2013 में जर्नल ऑफ एथ्नोमोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित प्रो. जुंग सान चांग के पेपर से मिलती है। पेपर के अनुसार ताज़े अदरक में वायरस-रोधी गुण होते हैं। आम तौर पर सर्दी-ज़ुकाम वायरल संक्रमण के कारण होता है (इसीलिए एंटीबायोटिक दवाइयां सर्दी-ज़ुकाम में कारगर नहीं होती)। संक्रमण के लिए दो तरह के वायरस ज़िम्मेदार होते हैं। इनमें से एक है ह्यूमन रेस्पीरेटरी सिंशियल वायरस (HRSV)। चांग और उनके साथियों ने HRSV वायरस से संक्रमित कोशिकाओं पर अदरक के प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि अदरक श्लेष्मा कोशिकाओं को वायरस से लड़ने वाले यौगिक का स्राव करने के लिए प्रेरित करता है। यह अनुमान तो पहले से था कि अदरक में विभिन्न वायरस से लड़ने वाले यौगिक मौजूद होते हैं। यह अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि अदरक कोशिकाओं को वायरस से लड़ने वाले यौगिक का स्राव करने के लिए प्रेरित करता है। इसके पहले डेनियर और उनके साथियों ने बताया था कि अदरक में मौजूद बीटा-सेस्क्वीफिलांड्रीन सर्दी-ज़ुकाम के वायरस से लड़ता है और उसमें राहत पहुँचाता है।
वर्तमान में प्राकृतिक स्रोत से अच्छे एंटीबायोटिक और एंटीबैक्टीरियल पदार्थों की खोज, पारंपरिक औषधियों की तरफ रुझान, आधुनिक विधियों से उनकी कारगरता की जांच और पारंपरिक औषधियों को समझने के क्षेत्र में काफी काम हो रहा है। चीन इस क्षेत्र में अग्रणी है। चीन ने पेकिंग विश्वविद्यालय में पूर्ण विकसित औषधि विज्ञान केंद्र शुरू किया है। भारत भी इस मामले में पीछे नहीं है। भारत फंडिंग और कैरियर प्रोत्साहन के ज़रिए इस क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा दे रहा है।
परंपरा और वर्तमान
भारत में भी आयुष मंत्रालय इसी तरह के काम के लिए है। यह मंत्रालय यूनानी, आयुर्वेदिक, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध, योग और होम्योपैथी के क्षेत्र में शोध और चिकित्सीय परीक्षण को बढ़ावा देता है। यह एक स्वागत-योग्य शुरुआती कदम है। दरअसल, हमें इस क्षेत्र के (पारंपरिक) चिकित्सकों और शोधकर्ताओं की ज़रूरत है जो आधुनिक तकनीकों और तरीकों से काम करने वाले जीव वैज्ञानिकों और औषधि वैज्ञानिकों के साथ काम कर सकें ताकि इससे अधिक से अधिक लाभ उठाया जा सके। वैसे सलीमुज़्ज़मन सिद्दीकी, टी. आर. शेषाद्री, के. वेंकटरमन, टी.आर. गोविंदाचारी, आसिमा चटर्जी, नित्यानंद जैसे जैव-रसायनज्ञ और औषधि वैज्ञानिक वनस्पति विज्ञानियों और पारंपरिक चिकित्सकों के साथ मिलकर काम करते रहे हैं। यदि आयुष मंत्रालय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और रसायन और उर्वरक मंत्रालय के सम्बंधित विभागों के साथ मिलकर काम करे तो कम समय में अधिक प्रगति की जा सकती है। भारत में घरेलू उपचार की समृद्ध परंपरा रही है। देश भर में फैली अपनी सुसज्जित प्रयोगशाला के दम पर भारत भी चीन की तरह सफलता हासिल कर सकता है। शुरुआत हम भी चीन की तरह ही प्राकृतिक स्रोतों में एंटी-वायरल तत्व खोजने के कार्यक्रम से कर सकते हैं।
मगर आखिर इस नुस्खे में गुड़ क्या काम करता है। ऐसा लगता है कि तीखे स्वाद के अदरक को खाने के लिए गुड़ की मिठास का सहारा लेते हैं। पर गुड़ में शक्कर की तुलना में 15-35 प्रतिशत कम सुक्रोस होता है और ज़्यादा खनिज तत्व (कैल्शियम, मैग्नीशियम और लौह) होते हैं। साथ ही यह फ्लू के लक्षणों से लड़ने के लिए भी अच्छा माना जाता है। दुर्भाग्य से गुड़ के जैव रासायनिक और औषधीय गुणों पर अधिक अनुसंधान नहीं हुए हैं। तो शोध के लिए एक और रोचक विषय सामने है। 

प्रेमचंदजी के साथ दो दिन

प्रेमचंदजी के साथ दो दिन
मुझे याद नहीं रहता, मैं भूल जाता हूँ...
- बनारसीदास चतुर्वेदी
प्रेमचंदजी की सेवा में उपस्थित होने की इच्छा बहुत दिनों से थी। यद्यपि आठ वर्ष पहले लखनऊ में एक बार उनके दर्शन किए थे, पर उस समय अधिक बातचीत करने का मौका नहीं मिला था। इन आठ वर्षों में कई बार काशी जाना हुआ, पर प्रेमचंदजी उन दिनों काशी में नहीं थे;  इसलिए ऊपर की चिट्ठी मिलते ही मैंने बनारस कैंट का टिकट कटाया और इक्का लेकर बेनिया पार्क पहुँच ही गया। प्रेमचंद जी का मकान खुली जगह में सुंदर स्थान पर है और कलकत्ते का कोई भी हिन्दी पत्रकार इस विषय में उनसे ईर्ष्या किए बिना नहीं रह सकता। लखनऊ के आठ वर्ष पुराने प्रेमचंदजी और काशी के प्रेमचंदजी की रूपरेखा में विशेष अंतर नहीं पड़ा। हाँ मूँछों के बाल जरूर 53 फीसदी सफेद हो गए हैं। उम्र भी करीब-करीब इतनी ही है। परमात्मा उन्हें शतायु करे, क्योंकि हिन्दी वाले उन्हीं की बदौलत आज दूसरी भाषा वालों के सामने मूँछों पर ताव दे सकते हैं। यद्यपि इस बात में संदेह है कि प्रेमचंदजी हिन्दी भाषा-भाषी जनता में कभी उतने लोकप्रिय बन सकेंगे, जितने कविवर मैथिलीशरण जी हैं, पर प्रेमचंदजी के सिवा भारत की सीमा उल्लंघन करने की क्षमता रखने वाला कोई दूसरा हिन्दी कलाकार इस समय हिन्दी -जगत्  में विद्यमान नहीं। लोग उनको उपन्यास सम्राट कहते हैं,  पर कोई भी समझदार आदमी उनसे दो ही मिनट बातचीत करने के बाद समझ सकता है कि प्रेमचंदजी में साम्राज्यवादिता का नामोनिशान नहीं। कद के छोटे हैं, शरीर निर्बल-सा है। चेहरा भी कोई प्रभावशाली नहीं और श्रीमती शिवरानी देवी जी हमें क्षमा करें, यदि हम कहें कि जिस समय ईश्वर के यहाँ शारीरिक सौंदर्य बँट रहा था, प्रेमचंदजी जरा देर से पहुँचे थे। पर उनकी उन्मुक्त हँसी की ज्योति पर, जो एक सीधे-सादे, सच्चे स्नेहमय हृदय से ही निकल सकती है, कोई भी सहृदया सुकुमारी पतंगवत् अपना जीवन निछावर कर सकती है। प्रेमचंदजी ने बहुत से कष्ट पाए हैं, अनेक मुसीबतों का सामना किया है, पर उन्होंने अपने हृदय में कटुता को नहीं आने दिया। वे शुष्क बनियापन से कोसों दूर हैं और बेनिया पार्क का तालाब भले ही सूख जाए, उनके हृदय -सरोवर से सरसता कदापि नहीं जा सकती। प्रेमचंदजी में सबसे बड़ा गुण यही है कि उन्हें धोखा दिया जा सकता है। जब इस चालाक साहित्य-संसार में बीसियों आदमी ऐसे पाए जाते हैं, जो दिन-दहाड़े दूसरों को धोखा दिया करते हैं, प्रेमचंदजी की तरह के कुछ आदमियों का होना गनीमत है। उनमें दिखावट नहीं, अभिमान उन्हें छू भी नहीं गया और भारत व्यापी कीर्ति उनकी सहज विनम्रता को उनसे छीन नहीं पाई।
प्रेमचंदजी से अबकी बार घंटों बातचीत हुई। एक दिन तो प्रातःकाल 11 बजे से रात के 10 बजे तक और दूसरे दिन सवेरे से शाम तक। प्रेमचंदजी गल्प लेखक हैं, इसलिए गप लड़ाने में आनंद आना उनके लिए स्वाभाविक ही है। (भाषा तत्त्वविद बतलावें कि गप शब्द की व्युत्पत्ति गल्प से हुई है या नहीं?)
यदि प्रेमचंदजी को अपनी डिक्टेटरी श्रीमती शिवरानी देवी का डर न रहे, तो वे चौबीस घंटे यही निष्काम कर्म कर सकते हैं। एक दिन बात करते-करते काफी देर हो गई। घड़ी देखी, तो पता लगा कि पौन दो बजे हैं। रोटी का वक्त निकल चुका था। प्रेमचंदजी ने कहा - 'खैरियत यह है कि घर में ऊपर घड़ी नहीं है, नहीं तो अभी अच्छी खासी डाँट सुननी पड़ती!' घर में एक घड़ी रखना, और सो भी अपने पास, बात सिद्ध करती है कि पुरुष यदि चाहे तो स्त्री से कहीं अधिक चालाक बन सकता है, और प्रेमचंदजी में इस प्रकार का चातुर्य बीजरूप में तो विद्यमान है ही।
प्रेमचंदजी स्वर्गीय कविवर शंकरजी की तरह प्रवास भीरु हैं। जब पिछली बार आप दिल्ली गए थे, तो हमारे एक मित्र ने लिखा था- ''पचास वर्ष की उम्र में प्रेमचंदजी पहली बार दिल्ली आए हैं !'' इससे हमें आश्चर्य नहीं हुआ। आखिर सम्राट पंचमजॉर्ज भी जीवन में एक बार ही दिल्ली पधारे हैं और प्रेमचंदजी भी तो उपन्यास सम्राट ठहरे! इसके सिवा यदि प्रेमचंदजी इतने दिन बाद दिल्ली गए, तो इसमें दिल्ली का कसूर है, उनका नहीं।
प्रेमचंदजी में गुण ही गुण विद्यमान हों, सो बात नहीं। दोष हैं और संभवतः अनेक दोष हैं। एक बार महात्माजी से किसी ने पूछा था - ''यह सवाल आप बा (श्रीमती कस्तूरबा गाँधी) से पूछिए।'' श्रीमती शिवरानी देवी से हम प्रार्थना करेंगे कि वे उनके दोषों पर प्रकाश डालें। एक बात तो उन्होंने हमें बतला भी दी कि ''उनमें प्रबंध शक्ति का बिल्कुल अभाव है। हमीं-सी हैं, जो इनके घर का इंतजाम कर सकी हैं।'' पर इस विषय में श्रीमती सुदर्शन उनसे कहीं आगे बढ़ी हुई हैं। वे सुदर्शनजी के घर का ही प्रबंध नहीं करतीं, स्वयं सुदर्शनजी का भी प्रबंध करती हैं और कुछ लोगों का तो जिनमें सम्मिलित होने की इच्छा इन पंक्तियों के लेखक की भी है- यह दृढ़ विश्वास है कि श्रीमती सुदर्शन गल्प लिखती हैं और नाम श्रीमान सुदर्शनजी का होता है।
प्रेमचंदजी में मानसिक स्फूर्ति चाहे कितनी ही अधिक मात्रा में क्यों न हो, शारीरिक फुर्ती का प्रायः अभाव ही है। यदि कोई भला आदमी प्रेमचंदजी तथा सुदर्शनजी को एक मकान में बंद कर दे, तो सुदर्शनजी तिकड़म भिड़ाकर छत से नीचे कूद पड़ेंगे और प्रेमचंदजी वहीं बैठे रहेंगे। यह दूसरी बात है कि प्रेमचंदजी वहाँ बैठै-बैठै कोई गल्प लिख डालें।
जमके बैठ जाने में ही प्रेमचंदजी की शक्ति और निर्बलता का मूल स्रोत छिपा हुआ है। प्रेमचंदजी ग्रामों में जमकर बैठ गए और उन्होंने अपने मस्तिष्क के सुपरफाइन कैमरे से वहाँ के चित्र-विचित्र जीवन का फिल्म ले लिया। सुना है इटली की एक लेखिका श्रीमती ग्रेजियादलिद्दा ने अपने देश के एक प्रांत-विशेष के निवासियों की मनोवृत्ति का ऐसा बढ़िया अध्ययन किया और उसे अपनी पुस्तक में इतनी खूबी के साथ चित्रित कर दिया कि उन्हें 'नोबेलप्राइज' मिल गया। प्रेमचंदजी का युक्त प्रांतीय ग्राम्य-जीवन का अध्ययन अत्यंत गंभीर है, और ग्रामवासियों के मनोभावों का विश्लेषण इतने उँचे दर्जे का है कि इस विषय में अन्य भाषाओं के अच्छे से अच्छे लेखक उनसे ईर्ष्या कर सकते हैं।
कहानी लेखकों तथा कहानी लेखन कला के विषय में प्रेमचंदजी से बहुत देर तक बातचीत हुई। उनसे पूछने के लिए मैं कुछ सवाल लिखकर ले गया था। पहला सवाल यह था, ''कहानी लेखन कला के विषय में क्या बतलाऊँ? हम कहानी लिखते हैं, दूसरे लोग पढ़ते। दूसरे लिखते हैं, हम पढ़ते हैं और क्या कहूँ?'' इतना कहकर खिलखिलाकर हँस पड़े और मेरा प्रश्न धारा-प्रवाह अट्टहास में विलीन हो गया। दरअसल बात यह थी कि प्रेमचंदजी की सम्मति में वे सवाल ऐसे थे, जिन पर अलग-अलग निबंध लिखे जा सकते हैं।
प्रश्न - हिंदी कहानी लेखन की वर्तमान प्रगति कैसी है? क्या वह स्वस्थ तथा उन्नतिशील मार्ग पर है?
उत्तर - प्रगति बहुत अच्छी है। यह सवाल ऐसा नहीं कि इसका जवाब ऑफ़हैंड दिया जा सके।
प्रश्न - नवयुवक कहानी लेखकों में सबसे अधिक होनहार कौन है?
उत्तर - जैनेंद्र तो हैं ही और उनके विषय में पूछना ही क्या है? इधर श्री वीरेश्वर सिंह ने कई अच्छी कहानियाँ लिखी हैं। बहुत ऊँचे दर्जे की कला तो उनमें अभी विकसित नहीं हो पाई, पर तब भी अच्छा लिख लेते हैं। बाज-बाज कहानियाँ तो बहुत अच्छी हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के ललित किशोर सिंह भी अच्छा लिखते हैं। श्री जनार्दन झा द्विज में भी प्रतिभा है।
प्रश्न - विदेशी कहानियों का हमारे लेखकों पर कहाँ तक प्रभाव पड़ा है?
उत्तर - हम लोगों ने जितनी कहानियाँ पढ़ी हैं, उनमें रसियन कहानियों का ही सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है। अभी तक हमारे यहाँ 'एडवेंचर' (साहसिकता) की कहानियाँ हैं ही नहीं और जासूसी कहानियाँ भी बहुत कम हैं। जो हैं भी, वे मौलिक नहीं हैं, कॉनन डॉयल की अथवा अन्य कहानी लेखकों की छायामात्र है। क्राइम डिटैक्शन की साइंस का हमारे यहाँ विकास ही नहीं हुआ है।
बनारसीदास चतुर्वेदी
प्रश्न - संसार का सर्वश्रेष्ठ कहानी लेखक कौन है?
उत्तर - चेखव।
प्रश्न - आपको सर्वोत्तम कहानी कौन जँची?
उत्तर - यह बतलाना बहुत मुश्किल है। मुझे याद नहीं रहता। मैं भूल जाता हूँ। टाल्सटॉय की वह कहानी, जिसमें दो यात्री तीर्थयात्रा पर जा रहे हैं, मुझे बहुत पसंद आई। नाम उसका याद नहीं रहा। चेखव की वह कहानी भी जिसमें एक स्त्री बड़े मनोयोगपूर्वक अपनी लड़की के लिए, जिसका विवाह होने वाला है ,कपड़े सी रही है, मुझे बहुत अच्छी जँची। वह स्त्री आगे चलकर उतने ही मनोयोगपूर्वक अपनी मृत पुत्री के कन के लिए कपड़ा सीती हुई दिखलाई गई है। कवींद्र रवींद्रनाथ की 'दृष्टिदान' नामक कहानी भी इतनी अच्छी है कि वह संसार की अच्छी से अच्छी कहानियों से टक्कर ले सकती है।
इस पर मैंने पूछा कि 'काबुलीवाला' के विषय में आपकी क्या राय है?
प्रेमचंदजी ने कहा कि ''निस्संदेह वह अत्युत्तम कहानी है। उसकी अपील यूनिवर्सल है, पर भारतीय स्त्री का भाव जैसे उत्तम ढंग से 'दृष्टिदान' में दिखलाया गया है, वैसा अन्यत्र शायद ही कहीं मिले। मोपासां की कोई-कोई कहानी बहुत अच्छी है, पर मुश्किल यह है कि वह 'सैक्स' से ग्रस्त है।''
प्रेमचंदजी टाल्सटॉय के उतने ही बड़े भक्त हैं, जितना मैं तुर्गनेव का। उन्होंने सिफारिश की कि टाल्सटॉय के अन्ना कैरेनिना और 'वार एंड पीस' शीर्षक पढ़ो। पर प्रेमचंदजी की एक बात से मेरे हृय को एक बड़ा धक्का लगा। जब उन्होंने कहा - टाल्सटॉय के मुकाबले में तुर्गनेव अत्यंत क्षुद्र हैं, तो मेरे मन में यह भावना उत्पन्न हुए बिना न रही कि प्रेमचंदजी उच्चकोटि के आलोचक नहीं। संसार के श्रेष्ठ आलोचकों की सम्मति में कला की दृष्टि से तुर्गनेव उन्नीसवीं शताब्दी का सर्वोत्तम कलाकार था। मैंने प्रेमचंदजी से यही निवेदन किया कि तुर्गनेव को एक बार फिर पढ़िए।
प्रेमचंदजी के सत्संग में एक अजीब आकर्षण है। उनका घर एक निष्कपट आडंबर शून्य, सद्-गृहस्थ का घर है। और यद्यपि प्रेमचंदजी काफी प्रगतिशील हैं- समय के साथ बराबर चल रहे हैं- फिर भी उनकी सरलता तथा विवेकशीलता ने उनके गृह-जीवन के सौंदर्य को अक्षुण्ण तथा अविचलित बनाए रखा है। उनके साथ व्यतीत हुए दो दिन जीवन के चिरस्मरणीय दिनों में रहेंगे।
(जनवरी, 1932)

जब दोस्त पुराना मिलता है

जब दोस्त पुराना मिलता है
-ख़्तर अली
पुराने दोस्त से मिलना सिर्फ दोस्त से मिलना नहीं होता है। यह उन लम्हों से मिलना होता है जो बीत गए है, यह उन दृश्यों में विचरण करना होता है जो बदल गए है, यह उन बुजुर्गो से बतियाना होता है जो गुजऱ गए है।
बरसो का बिछड़ा दोस्त जब पीछे से आवाज़ देता है तब वह शब्द कानो में रस घोल देता है, वह शब्द ऐसी झंकार पैदा करता है कि पूरा व्यक्तित्व झूमने लगता है। फिर रे, तू , बे जैसे शब्द दुनिया की सबसे शालीन भाषा बन जाते है। उस वक्त तो खुशियों की बारिश हो जाती है, जब वह उसी पुराने लहज़े में गाली देकर पूछता हैये बता इतने सालों से था कहाँ?
इस एक प्रश्न के जवाब में पिछले बीस पच्चीस तीस वर्षो का लेखा जोखा शामिल होता है। दोस्त की गाली सुन कर पहली बार अहसास होता है कि गाली इतनी मीठी, इतनी पौष्टिक, इतनी रूमानी, इतनी रसीली, इतनी नशीली, इतनी चुम्बकीय होती है। दोस्ती के बही खाते में सिर्फ आय ही होती है, व्यय का इसमें कोई काँलम नहीं होता। दुनिया जिसे हानि मानती है, दोस्ती में वही शुद्ध लाभ कहलाता है।
रोज़ी रोटी दोस्त को दोस्त से दूर कर देती है, वरना दो दोस्त के बीच एक ज़माना ऐसा भी गुजऱा होता है, जब लोग एक दोस्त के हाल चाल की जानकारी दूसरे दोस्त से लिया करते थे।
हर उस्ताद अपने दोस्त का शागिर्द होता है। बिछड़े दोस्त से मिलते ही मदरसे का भूला सबक याद आ जाता है। दोस्त जब गले में हाथ डालकर पूछता हैकैसा है? तब जीवन सार्थक हो जाता है, बढ़ती उम्र घट जाती है, जून दिसंबर लगने लगता है। जब दोस्त पुराना मिल जाता है, तब जि़ंदगी के चौराहे पर खड़ी साँसों की गाड़ी को उमंग का ग्रीन सिंग्नल मिल जाता है। जब दोस्त की कमर में हाथ डालकर पथरीली ज़मीन पर भी चलो,  तो नर्म कालीन पर चलने का अहसास होता है।
जीवन के प्रात:काल वाले मित्र के साथ जब जीवन के संध्याकाल में घूमते हुए शहर के बाहर किसी छोटी सी बस्ती में किसी टपरीनुमा होटल में फूटे कप में चाय पियो, तब जो आनंद मिलता है वह कश्मीर, शिमला, मसूरी और नैनीताल की वादियों में भी नसीब नहीं हो सकता। वहाँ चुप बैठे जब दो दोस्त एक दूसरे को देख रहे होते है तब होठ तो चुप रहते है लेकिन आँखों ही आँखों में सवाल जवाब, शिकवे शिकायत की तकऱीर जारी रहती है।
मित्रता का जो रसायनशास्त्र है, उसके भूगोल ने जो इतिहास रचे है, उससे गणित के सभी सूत्र विल हो  गए  हैं। ढाई अक्षर से बने इस शब्द पर वर्णमाला भी गर्व करती होगी। बोलने वालो की भीड़ में दोस्त ही कमात्र ऐसा शख्स है, जो सुनता है। दोस्त एक रूहानी रिश्ता है, इसका कोई बाहरी आवरण नहीं होता। दोस्त बनाने की कोई रेसिपी है, न कोई मन्त्र है। किसी कारखाने में दोस्ती का निर्माण नहीं किया जा सकता। इस ब्रह्माण्ड में किसी का किसी का दोस्त हो जाना, फूल खिलने, चाँद चमकने और बारिश होने जैसी प्राकृतिक घटना है।
मै हर पल हर घड़ी पर वाले से यही दुआ माँगता रहता हूँ कि या अल्लाह इस दुनिया में हर शख्स को एक दोस्त ज़रूर देना। जिसका कोई दोस्त न हो किसी को भी इतना दरिद्र इतना निर्धन नहीं रखना।

सम्पर्क: निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर (छत्तीसगढ़) मो.न. 9826126781  

अब तो घर लौटना है

अब तो घर लौटना है

- शशि पाधा

न छत बची न छप्परी
घोर विपदा की घड़ी
मीलों तक दौड़ना है
अब तो घर लौटना है ।

बहुत दूर मंजिलें
राहें  सुनसान है 
धूप के दंश हैं
देह परेशान है
फिर भी कुछ सुकून है
कि घर को लौटना है ।

अंग अंग भेदती
भूख की बर्छिया
रीत गई बूँद- बूँद
हाँडियाँ कल्छियाँ

बचा न तेल नून अब
अब तो घर लौटना है।

रोक न सकें हमें
पैर की बिवाइयाँ
आस  देह घसीटती
काँपती परछाइयाँ

अभी तो गर्म खून है
चलो तो, घर लौटना है

पता नहीं गाँव में
द्वार कोई खोलेगा
या बंद किवाड़ से
हाथ कोई जोड़ेगा
वहाँ का क्या क़ानून है
फिर भी घर लौटना है।
हमें तो घर लौटना है।