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May 15, 2020

दु:ख

 दु:ख
-पृथ्वीराज अरोड़ा

उसने पास जाकर पुकारा, ‘माँ!’
माँ ने सिलाई– मशीन के रिंग को हाथ से रोकते हुए कहा, ‘क्या है बेटा?’
पिताजी कब लौटेंगे, माँ?’
आज तुम फिर वही रोना ले बैठे! वह अब क्या आएँगे बेटा?’ फिर थोड़ा मुस्कराकर बोली, ‘तू चिंता क्यों करता है….मैं अपने लाल को पढ़ा–लिखाकर बड़ा आदमी बनाऊँगी। मेरे ये हाथ और यह सिलाई–मशीन सलामत रहें, अपने बेटे के जीवन में कोई कमी नहीं आने दूँगी।’
माँ, पिताजी गए क्यों?’
क्या कहूँ!’
बताकर भी नहीं गए, माँ?’
नहीं।’
क्यों?….क्यों माँ?’
तूने सिद्धार्थ की कहानी सुनी है…नहीं? ले, तुझे सुनाती हूँ–सिद्धार्थ कपिलवस्तु के राजकुमार थे। उनकी एक सुन्दर पत्नी थी…’
तुम्हारी जैसी, माँ?’ बेटे ने बीच में टोका।
ऐसा ही समझ ले। उनका तेरे जैसा एक चाँद–सा बेटा था। सब–कुछ होते हुए भी सिद्धार्थ सांसारिक दु:खों को देखकर बहुत उदासी में रहते थे। इसलिए एक रात अपनी पत्नी और बेटे को सोते छोड़कर वन की ओर चले गए…संन्यासी हो गए…’
परन्तु माँ ! वह तो कपिलवस्तु के राजकुमार थे…..खूब धन–दौलत के मालिक!’
तो?’
पिताजी तो कहीं के राजकुमार नहीं थे। उनके घर में तो मुश्किल से दो जून का खाना पकता था। फिर वह क्यों चले गए?’

लगता है बेटे, दोनों ही दु:खों से डर गए।’ कहते हुए माँ ने मशीन के रिंग पर उँगलियाँ रखकर उसे घुमा दिया।

दो लघुकथाएँ


1. सूरजमुखी खिल उठे

-सुदर्शन रत्नाकर

दरवाज़े की घंटी बजते ही शीना बिस्तर से उठ कर बाहर आ गई। इतनी सुबह कौन हो सकता है। दरवाजा खोलातो देखा मम्मी जी खड़ी थीं। अनायास ही उसके मुँह से निकला, ‘अरे मम्मी जी आप! इतनी सुबह, सब ठीक तो है न। आपने आने के लिए फ़ोन ही नहीं किया। हम आपको लेने आ जातेउसने एक साथ कई प्रश्न पूछ डाले और साथ ही झुक कर पाँव छू लिए।
सब ठीक है, अंदर तो आने दो।उनकी आवाज़ सुन कर अजय भी उठ कर आ गया। आते ही वह माँ के गले लग गया और उन्हें गोद में उठाने की कोशिश करने लगा।
चल हट ,अभी तुम्हारा बचपना नहीं गया।कहते हुए पुष्पा अंदर आ गई। अजय ने सामान उनके कमरे में रख  दिया।
मम्मी जी फ़्रेश होने के लिए गईं तो शीना उनके लिए चाय-नाश्ता बनाने किचन में चली गई। ट्रे हाथ में लिए जब वह मम्मी जी के कमरे के सामने पहुँची तो उसने सुना, वह कह रही थीं, ‘नहीं परेशानी तो कोई नहीं थी। रिया ने बड़े आराम से रखा लेकिन जब उसके सास -ससुर आ गए तो वह कुछ अधिक ही व्यस्त हो गई थी। घर, परिवार, नौकरी सभी जगह काम करना, पर वह सब सम्भाल लेती थी। इन सबके बीच मुझे परायापन सा लगता था। सोचती शीना से अकारण नाराज़ हो कर अपना घर छोड़ कर यहाँ चली आई हूँ। अपनी बेटी है फिर भी कुछ था, जो ठीक नहीं, अच्छा नहीं लगता था। बेटा अपना घर अपना ही होता है। अब तो शीना ही बहू है, शीना ही बेटी है।
शूल जो चुभा था, निकल गया था।
उसने अंदर आकर मुस्कुराते हुए नाश्ते की ट्रे मेज़ पर रख दी। भोर हो गई थी और सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के रास्ते आकर कमरे में फैल गई थीं मानों हज़ारों सूरजमुखी खिल गए हों।

2. मैं हूँ न

आज माँ की सतरहवीं था। सुबह ही सभी रस्में निभा ली गईं थीं । ब्राह्मणों को भोजन करा लिया गया। दोपहर तक सभी काम निपट गए। शाम की गाड़ी से अंजलि को अपने घर लौटना था। उसका मन बुझा -बुझा सा था। माँ थी तो वह कभी कभार मायके चली आती थी। भाई-भाभी भी उसका ध्यान रखते थे। मायका तो माँ के साथ होता है। वह नहीं रही तो किस अधिकार से आएगी। सबकी अपनी अपनी गृहस्थी है। जीवन की आपा-धापी है । किसी के पास रिश्तों को निभाने का समय कहाँ है !
एक तो माँ नहीं रही, दूसरा पता नहीं भाई-भतीजों से फिर कब मिल पाएगी। यह सोच कर अंजलि के मन में कुछ कँटीला -सा चुभ रहा था। सब कुछ समाप्त हो गया था।
गाड़ी रात आठ बजे छूटनी थी। वह सात बजे घर से निकलने के लिए तैयार हो गई। बार बार मना करने पर भी
भाई- भाभी उसे स्टेशन पर छोड़ने आए। गाड़ी चलने लगी तो भाई ने आँखों में आँसू भर कर कहा, ‘दीदी आप ज़रूर आती रहें। माँ नहीं रही तो मत सोचना कि यहाँ कोई नहीं है । मैं हूँ न दीदी, माँ के बाद मेरा सहारा भी तो आप हैं।भाई ने चलते चलते कहा तो भाभी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘हा दीदी ज़रूर आते रहना। यह भी आपका ही घर है।
गाड़ी के चलने के साथ भाभी के शब्द दूर होते जा रहे थे पर उसका बोझिल मन हल्का हो गया था।

सम्पर्कः ई-29, नेहरू ग्राँऊड, फ़रीदाबाद 12100, मो. 9811251135

पाँच लघुकथाएँ

1. तिलिस्म
-डॉ. शील कौशिक
 साल भर से अलग रह रहे विनय ने अनुष्का को कॉल किया,
“क्या कल तुम ओम सिने गार्डन में मिलने आ सकती हो?” यह पूछते हुए विनय का दिल जोरों से धड़क रहा था।
“हाँ,” अनुष्का के दिल में वैसी ही धड़कन बजी, वैसी ही चाहत उभरी।
“ठीक है, कल शाम को पाँच बजे।”
साल भर पहले पाश्चात्य सोच उन्हें विपरीत दिशा में ले गई थी।
वे दोनों इस नवनिर्मित सिने गार्डन के रेस्टोरेंट में गोल मेज के आमने-सामने एक दूजे पर नजर टिकाए बैठे हैं। विनय ने अनुष्का की पसंद की कोल्ड कॉफ़ी फ्रेंच फ्राइज़ के साथ आर्डर की और अपने लिए लिम्का। अनुष्का के मन में हूक-सी उठी और यह सोच कर आँखें नम हो गई कि विनय को आज भी उसकी पसंद का कितना ख्याल है।
“पता है तुम्हें! दीपक बहुत चालाक है... वह एक नम्बर का झूठा है... उसके कई लड़कियों के साथ अफेयर्स हैं... मैं भी उसके झांसे में आ गई,” यह कहते हुए अनुष्का के मुँह में कॉफ़ी की कड़वाहट घुल गई, ‘पर... तुम तो हमेशा समर्पित और ईमानदार रहे...’ ये शब्द उसके मुँह में ही रह ग। विनय को लिम्का में कुछ अतिरिक्त मिठास लगी।
“अनुष्का! सेम इज हेयर, वो मेरी कुलीग नेहा है न... बिलकुल बकवास है... एकदम लापरवाह... कहते हुए विनय का मुँह का स्वाद कसैला हो गया,‘पर... तुम तो बहुत केयरिंग... सब काम समय पर टिपटॉप रखने वाली,’ ये शब्द उसके मुँह में रह गये। अबकी अनुष्का को कॉफ़ी का घूँट मीठा लगा।
“वीनू ! (विनय के लिए अनुष्का का प्यार का सम्बोधन) पापा कह रहे थे कि...”
“हाँ अन्नू! (अनुष्का के लिए विनय का प्यार का सम्बोधन) मेरी मम्मी कह रही थी कि...
“चलो! फिर साथ घर चलें...” एक साथ सहमति के स्वर प्रस्फुटित हुए । सिने गार्डन के बराबर में खड़ी पुरानी बिल्डिंग की आभा द्विगुणित हो गई थी ।
2.अंतिम यात्रा
        मित्र के देहांत की सूचना से रोहन को गहरा धक्का लगा। उसे किसी तरह यकीन ही नहीं हो रहा था- “बिलकुल तंदुरुस्त था वह...कोई बीमारी नहीं...कोई हर्ट ब्लाकेज नहीं...फिर भी डॉक्टर कहते हैं हार्ट फेल हो गया... सब झूठ बोलते हैं... अरे! बहुत बड़े दिल वाला था मेरा दोस्त।”
पत्नी ने दिलासा देते हुए उनके यहाँ चलने को कहा। कुछ देर बाद वह सदमे से उबरा। उनका घर करीब चार किलोमीटर की दूरी पर था। पीछे बैठी उमा ने स्कूटी की इतनी धीमी चाल देख कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर रुक गई। वह हैरान थी... हमेशा तो ये स्कूटी इतनी तेज चलाते थे कि वह पीछे बैठी टोकती रहती थी- ‘थोड़ा धीरे चलाओ जी... ध्यान से चलाओ... आगे स्पीड ब्रेकर है जी, पर आज रोहन कभी स्कूटी के साइड वाले शीशे ठीक करने लग जाए... कभी स्पीड ब्रेकर नजदीक आते ही बिलकुल डैड स्लो स्पीड कर दे... अपने में खोया हुआ रोहन चले जा रहा था। उसके समक्ष मित्र के साथ बिताया एक-एक क्षण चित्रित हो उठा –“भाभी जी के साथ बस अभी की अभी आ जाओ और हाँ रास्ते से सेवकराम के यहाँ से पकोड़े लाना मत भूलना।” कोई भी ख़ुशी की बात होती तो वह पार्टी लेने वाली सूची में जोड़ता जाता और कहता, “ दस पार्टियाँ जमा। एक-एक करके बोझ उतारते जाओ वरना भार बढ़ जायेगा। चलो कुछ भार मैं तुम्हारा कम कर देता हूँ, जगह तुम्हारी और मेन्यु हमारा।” रूमाल निकाल कर उसने नम हो आई आँखों को पोछा। रास्ते में पड़े पोलिटेक्निक कालेज, मालगोदाम, रेल की पटड़ी एक-एक को रोहन ऐसे निहार रहा था जैसे अंतिम बार दर्शन कर रहा हो।
     उसे पता है कि मित्र का भरा-पूरा परिवार है। दो लड़कियाँ अपने-अपने घरबार की हो गई हैं। बेटा-बहू बेंगलूर में जॉब करते हैं। शहर से दूर यहाँ मियाँ-बीबी खुली और बड़ी कोठी में अकेले रहते हैं। कोठी का नाम भी क्या खूब रखा है-‘अपनी कोठी’। हर आने वाले को यह अहसास कराती कि यह उनकी अपनी ही कोठी है...यारों का ऐसा ही यार था वो, आत्मीयता से भरा। अब भाभी जी भी बेटे के पास चली जायेंगी। यह सोच कर उसका दिल बैठा जा रहा था।
पन्द्रह मिनट का वही रास्ता आज काटे नहीं कट रहा था। आखिर उमा से रहा न गया, “थोड़ी जल्दी करो जी, अंतिम यात्रा की तैयारी हो चुकी होगी, ले जाने का समय हो रहा है।”
“ मेरा दोस्त ही नहीं रहा तो मैं क्या करूँगा? इस रास्ते पर मेरी भी यह अंतिम यात्रा है उमा।” सारा दर्द उमड़ कर आँखों से बहने लगा हो जैसे...वह फूट-फूट कर रोने लगा।
3.खेल
पूर्वोत्तर क्षेत्र में यह माता का एक सुप्रसिद्ध मन्दिर है। भक्तों और दर्शनार्थियों की भीड़ से बेखबर आठ से दस वर्ष आयु की वे तीन लड़कियाँ मन्दिर के विशाल प्राँगण में छुपम-छुपाई खेल रही थीं। तभी गेरुआ वस्त्रधारी पण्डितजी ने आवाज लगाई, ‘सिया, इधर आ!
 ‘पापा! अभी थोड़ी देर में आती हूँ, खेलकर।
 ‘नहीं, अभी इधर आ, यजमान तेरी पूजा करने के लिए इन्तजार में बैठे हैं।पण्डितजी ने कड़ककर कहा।
  दोनों सहेलियों की ओर निहारती सिया पण्डितजी की ओर चल दी। उसकी आँखों से बेबसी झलक रही थी। उसकी दोनों सहेलियाँ भी खेल छोड़कर उसके पीछे हो लीं।
सिया पटड़े पर बैठ चुकी थी। उसके सामने बैठे नि:सन्तान दम्पती ने सर्वप्रथम उसके पाँवों को गंगाजल से धोया, साड़ी के पल्लू से पोछा, पैरों में आलता लगाया और हाथों में चूड़ियाँ पहनाकर माथे पर बिन्दी लगा सिर पर चुन्नी ओढ़ाई। उसकी गोद में वस्त्र, फल, मिठाई के साथ ही पाँच सौ का एक नोट रखा। इस बीच पण्डितजी निरन्तर मन्त्रोच्चार कर रहे थे। इन सब क्रियाओं से बेखबर माता का रूप धरे सिया कभी अपनी सहेलियों की ओर देखकर मुस्कराती रही और कभी इशारों में उनसे बतियाती रही। उन तीनों का मूक वार्तालाल जारी था।
 पूजा अब अन्तिम चरण में थी।
सिया उठने को अधीर हो उठी। उसने स्वचालित यन्त्र की तरह अपने गले से मालाएँ उतारकर उस दम्पती के गले में पहनाई... दोनों की झुकी पीठ पर आशीर्वाद की थपकी लगाई... गोद में रखे वस्त्र, फल, मिठाई और रुपये पिता की गोद में पटककर जल्दी से अपनी सहेलियों के साथ मन्दिर के प्राँगण में खेलने दौड़ गई।
 ‘बेटी, जल्दी आ, पूजा के लिए यजमान आए हैं...तभी दूसरी बच्ची मुन्नी के बापू की आवाज ने उनके खेलते पैरों पर ब्रेक लगा दिए।
4. हाईटेक रिश्ते
“दीदी इस महीने की 22 तारीख को आपकी भतीजी की रिंग सेरेमनी तय हुई है। प्रोग्राम लखनऊ में होना है, आप और जीजा जी तैयार रहना।” शिल्पा की भाभी ने फोन पर सूचित किया ।
“ठीक है।”
“देख लो दीदी! एक दिन पहले यहाँ घर आना पड़ेगा और यहाँ से इक्कीस को दिल्ली से सभी की एक साथ रिजर्वेशन होगी । इस तरह आपको चार-पाँच दिनों की छुट्टियों का इन्तजाम करना पड़ेगा।” भाभी ने खोल कर बताया।
“ठीक है।” शिल्पा ने सहज भाव से कहा।
फोन उधर से डिसकनेक्ट हो गया।
शिल्पा सोचने लगी भैया के घर में उनकी बिटिया की पहली शादी है, उन्हें तो आग्रहपूर्वक और हक से कहना चाहिए था कि आपको और जीजाजी को अवश्य चलना है। अभी से अपनी छुट्टियों का प्रबंध कर लो और तैयारी शुरू कर दो। लगता है भाभी बस ऊपर के मन से औपचारिकतावश ही जाने के लिए कह रही थीं...
तो हम भी कौन से जाने को तैयार बैठे हैं? इस गर्मी के मौसम में दो दिन का सफर... चार-पाँच छुट्टियाँ बेकार करना और फिर रितेश के बिजनेस का भी नुकसान होगा।
थोड़ी देर बाद फिर भाई का फोन आया, “तो आप दोनों का आना पक्का समझूँ? राजधानी में टिकट बुक करानी है, अभी तय करना होगा।”
“हाँ भाई, हमारे लायक और कोई काम हो तो वह भी बता देना।”
प्रत्युत्तर में दूसरी ओर से कोई आवाज़ न सुन कर शिल्पा बोली, “देख भाई क्यों बोझ मर रहे हो, नहीं ले जाना तो बेशक मत ले जाना। रही बात लोगों की, रिश्तेदारों की तो कह देना, हमने तो सादर बुलाया था... टिकट भी करा दी थी... जीजाजी को कोई जरूरी काम आन पड़ा।” यह कह कर शिल्पा ने सुख की साँस ली।
“हाँ यही ठीक रहेगा दीदी! आप लोग नहीं शामिल हो सकते, तो कोई बात नहीं... आपको रिंग सेरेमनी की वीडियो भेज देंगे।”
मोबाइल डिसकनेक्ट होते ही दोनों ही के सिर से जैसे मन का भार उतर गया हो।
 5.फेफड़ों की वर्कशॉप
रामकृष्ण दो दिन पहले ही गाँव से शहर अपनी पत्नी का इलाज कराने आया था। वह अपने दोस्त मधुदीप के यहाँ ठहरा था। गाँव में नित्य सवेरे खेतों में घूमने के आदी रामकृष्ण को यहाँ घुटन महसूस होने लगी। वह सुबह जल्दी उठा और इस पाश कालोनी में सैर करने निकल पड़ा। पर उसे ताजगी का अहसास न हुआ। तभी उसने एक ताजगी भरी हवा का झोंका महसूस किया और वह उस ओर बढ़ चला। उसे कुछ दूरी पर भिन्न-भिन्न प्रकार के पेड़ों का झुरमुट दिखाई पड़ा। वह उनके समीप गया। चारों तरफ ऊँची दीवार और गेट देख कर ठहर गया लगता है। “यह तो कोई बड़ा पार्क है।” वह खुश हो गया। गेट के पास लगे बोर्ड को देख कर वह चौंका –“ हैं! ‘फेफडों की वर्कशॉप,’ मोटर-गाड़ी की वर्कशॉप तो सुनी है पर ये फेफडों...”
तभी एक आदमी हाथ में रजिस्टर लिए दौड़ कर आया, “ये लो साहब एंट्री भर दो।”
“एंट्री भर दो! मतलब।”
“एंट्री नहीं भरोगे तो पता कैसे चलेगा कि आप किस समय अंदर आए और कितनी देर पार्क में रहे?”
“क्यों! पाबंदी है क्या? जितनी मर्जी देर तक यहाँ रहूँ मैं! पार्क तो सार्वजनिक यानी सबके लिए होते हैं।”
“नहीं साहब! यहाँ ऐसा नहीं है, प्रत्येक मिनट के हिसाब से पैसा चुकाना पड़ता है।” 
“अजीब नियम है यह।” परस्पर उनकी बहस सुन कर एक सूटेड-बूटेड आदमी जो पार्क का मालिक लग रहा था, आया और बोला,
“ इसमें अजीब क्या है भाई! बच्चे स्कूल बैग के साथ आक्सीजन सिलेंडर ले जाते हैं, वह क्या मुफ़्त आता है?”
“बस रहने दो! ये शहर के चोचले हमें समझ नहीं आते, हमें ज्ञान मत दो, हम अज्ञानी ही भले।” यह कह कर वह पलटा और बुदबुदाया- हूँ...! ‘फेफड़ों की दुकान!’        

तीन लघुकथाएँ

1.ज़रूरत

महेश शर्मा
दीवाली की सफाई धूम- धाम से चल रही थी। बेटा-बहू, पोता-पोती, सब पूरे मनोयोग से लगे हुए थे।
वे सुबह से ही छत पर चले आये थे। सफाई में एक पुराना फोटो एल्बम हाथ लग गया था, सो कुनकुनी धूप में बैठे, पुरानी यादों को ताज़ा कर रहे थे।
ज़्यादातर तस्वीरें उनकी जवानी के दिनों की थीं, जिसमें वे अपनी दिवंगत पत्नी के साथ थे। तकरीबन हर तस्वीर में पत्नी किसी बुत की तरह थी, तो वे मुस्कुराते हुए, बल्कि ठहाका लगाते हुए कैमरा फेस कर रहे थे। उन्हें सदा से ही खासा शौक था तस्वीरें खिंचवाने का। वे पत्नी को अक्सर डपटते फ़ोटो खिंचवाते समय मुस्कुराया करो। हमेशा सन्न सी खड़ी रह जाती हो- भौंचक्की सी !!!”
चाय की तलब चलते, जब वे नीचे उतर कर आये तो देखा, घर का सारा पुराना सामान इकट्ठा करके अहाते में करीने से जमा कर दिया गया है, और पोता अपने फ़ोन कैमरा से उसकी तस्वीरें ले रहा है।
यह उनके लिए नई बात थी। पता चला कि, आजकल पुराने सामान को ऑनलाइन बेचने का चलन है।
वे बेहद दिलचस्पी से इस फोटोसेशन को देख रहे थे कि, एकाएक उनके शरीर में एक सिहरन सी उठी- और ठीक उसी वक़्त, पोते ने शरारत से मुस्कुराते हुए, कैमरा उनकी तरफ करके क्लिक कर दिया – “ग्रैंडपा, स्माइल!!!”
कैमरा की फ्लेश तेज़ी से उनकी तरफ लपकी, – और वे पहली बार तस्वीर खिंचवाते हुए सन्न से खड़े रह गए।
2.नेटवर्क
कुछ दिनों से सोशल नेटवर्क पर न ज्यादा लाइक मिल रहे थे, न कमेंट्स। हर पोस्ट औंधे मुहँ गिर रही थी। सो, आज छुट्टी के दिन ब्रह्मास्त्र चलाया और स्टेटस अपडेट किया – “डाउन विद हाई फीवर!!”
पहले नाश्ता, फिर किराये के इस वन रूम सेट की सफाई, कुछ कपड़ों की धुलाई, उसके बाद लंच तैयार किया और फिर जम कर स्नान।
इस बीच, लाइक्स और कमैंट्स की रिसिविंग टोन बार-बार बजती रही। तीर निशाने पर लग चुका था।
लंच के बाद, अपना फोन लेकर वो इत्मीनान से बिस्तर में लेट गया।
-“गेट वेल सून”, -”ओ बेबी ख्याल रखो अपना”, – “अबे क्या हो गया कमीने”- वगैरह-वगैरह-!!
एक-एक कमेंट को सौ-सौ बार पढ़ते, गिनते और इस बीच टीवी देखते-देखते कब आँख लग गई, पता ही नहीं चला।
चौंककर उठा तो देखा कि शाम गहरा गयी है, और कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है।
-“ जी, कहिए?” उसने उलझन भरे स्वर में पूछा।
-“..  नहीं, कुछ खास नहीं ” दरवाज़े पर खड़े उस अधेड़ उम्र के शख्स ने कहा, “वो तुम आज सुबह से बाहर नहीं निकले, तो सोचा पूछ लूँ! – मैं सामने वाले वन रूम सेट में ही तो रहता हूँ...”
3.डर
माँ सुबह बाबूजी को टोकती है – “ये दूसरी चाय है, अब और नहीं मिलेगी। अखबार चाटना बंद करो और गुड्डू को स्टैंड तक छोड़ कर आओ। उसकी स्कूल बस आती ही होगी।”
फिर ऑफिस के लिए तैयार हो रहे बेटे के सामने से अस्फुट स्वर में बड़बड़ाती हुई निकल जाती है – “रिटायर होने का ये मतलब तो नहीं कि हाथ पैर हिलाना ही बंद कर दो, और हमसे तीमारदारी करवाओ!”
बाबूजी, गुड्डू को लेकर जाने लगते हैं तो माँ तेज़ आवाज़ में फिर टोकती है, “लौटते में कोई अच्छी -सी दवाई लेते आना, रात से बहू के सिर में दर्द है…खाली हाथ हिलाते मत चले आना।”
दोपहर के भोजन में कुर्सी पर ऊँघ रहे बाबूजी पर माँ झुंझलाती है, “इस कुर्सी पर रहम करो, खाना खाकर सीधे चारपाई ही तोड़ना…थोड़ा सब्र कर लो..रोटियाँ सेक कर ला रही हूँ..” – फिर , बिस्तर पर लेटी बहू के सामने से उसी तरह बड़बड़ाती हुई निकल जाती है, “तंग आ गई हूँ…पेट है या कोठार? अभी दो घंटे पहले ही तो डटकर नाश्ता किया है।”
शाम की चाय के साथ पकोड़ों की बाबूजी की फरमाइश को माँ, पूरी निर्ममता से खारिज कर देती है,”तुम्हें बुढौती में स्वाद सूझ रहे हैं!”
और जब बाबूजी खाली चाय पीकर टहलने निकलते हैं , तो फिर वही टोक, “ये झोला ले जाओ। लौटते में सब्जियाँ लेते आना… खाली हाथ हिलाते...”
रात के भोजन के बाद, टीवी से मन बहला रहे बाबूजी, माँ द्वारा फिर से टोके जाते हैं, “क्यों ये सब फालतू की चीजें देख कर अपना भेजा पचाते हो? इससे तो अच्छा है, गुड्डू को होमवर्क ही करवा दो।”
फिर जब बाबूजी, दोनों हाथ अपने सीने पर रखे गहरी नींद में सोए होते हैं, तो माँ उन्हें एकटक देखती रहती है…फिर टोकने के से अंदाज़ में उनके हाथ सीने से हटाती है कि – “ऐसे मत सोया करो- डरावने सपने आते हैं…”

फिर  आँखें मूंदकर अस्फुट स्वर में बुदबुदाती है,” ईश्वर करे, तुम्हारे जीवन में कभी ऐसा पल न आए कि बेटा -बहू तुम्हें किसी भी बात के लिए टोक दें… मुझसे सहा नहीं जाएगा

इबादत

इबादत

सतीशराज पुष्करणा

रमजान का पवित्र माह चल रहा था । उसी दौरान मुजफ्फरपुर से पटना आने वाली बस में एक सज्जन इत्मीनान से बैठ गए। उनकी बगल में लगभग पाँच-छह वर्ष का एक बच्चा अपनी मस्ती में मस्त था । एक अधपकी दाढ़ी वाले प्रौढ़, हाथ में बधना (मुसलमानी लोटा) लिए बराबर वाली सीट की ओर आए, जहाँ उनका झोला पहले से ही रखा हुआ था । अपनी सीट पर उस बालक को बैठे देखकर आग-बबूला हो गए और उन्होंने आव देखा न ताव, उसे एक तरफ धकेल दिया । उस मासूम को कोई ख़ास चोट तो नहीं आयी, फिर भी कुछ-न-कुछ तो लग ही गयी । वह बहुत ही बेचारगी से रोने लगा । उसकी माँ ने , जो फटी साड़ी से झाँकते बदन को बार-बार ढँकने का असफाल प्रयास कर रही थी, और सीट के अभाव में खड़ी थी, अपने लाल को ममता के आँचल में ढक लिया। उसकी सहमी नज़रे स्वतः चारो  ओर घूम गयीं। उस औरत से उसके मासूम बच्चे को अपनी गोद में लेते हुए वहाँ बैठे सज्जन, प्रौढ़ की ओर मुखातिब होते हुए बोले, “मोहतरम ! मैं भी मुसलमान हूँ।”
क...क...क्या मतलब ?” कुछ हकलाते हुए प्रौढ़ बोले।
मतलब क्या होगा । शक्ल से तो आप शरीफ, नेक और बादस्तूर रोजेदार मालूम होते हैं और मैं रोजेदार न होते हुए भी उस अल्लाह-ताला, की नज़र में आपसे ज्यादा रोजेदार हूँ।”
क्या कुफ्र बकते हैं, आप  !” वे लगभग चिल्लाए।
चिल्लाने की जरूरत नहीं है जनाब! उसके बनाए बन्दों, खासकर बच्चों से मुहब्बत करना ही उस परवरदिगार की सच्ची इबादत है, सच्चा अकीदा है।” उस सज्जन ने प्रौढ़ महाशय को बहुत शालीनता से समझाया।
उस महाशय की बात सुनते ही प्रौढ़ व्यक्ति की गर्दन झुक गयी । तब तक वह बच्चा इन सारी बातों से बेखबर उनकी गोद से उतरकर प्रौढ़ की गोद में बैठा उनके “बधने” में हाथ डाल-डालकर पानी सुड़क रहा था।