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Mar 8, 2020

माश्की काका

सुधियों के पन्नों से….
माश्की काका
-शशि पाधा
मन के किसी कोने में रखी पिटारी में कई छोटी छोटी गुथलियाँ सम्भाल के रखी हैं।  हर गुथली में उन दिनों की मधुर स्मृतियाँ हैं जिन्हें बाँटने में संकोच भी होता है और कोई सुनने वाला भी नहीं मिलता। किन्तु मैं उन्हें कभी कभार अपने एकांत पलों में खोल लेती हूँ, उनसे बतियाती हूँ, उनसे खेलती हूँ और फिर बड़ी रीझ से उन्हें फिर से उनकी गुथली में बाँध के रख देती हूँ। यह मेरे बचपन की धरोहर है जिससे मुझे अपने होने का अहसास हो जाता है। मैं हूँ –यह मैं जानती हूँ पर जो मैं बचपन में थी मैं उसे भी खोना नहीं चाहती। इसीलिए वो पिटारी मेरी सब से प्रिय निधि है।
तब मैं छोटी थी.... बहुत ही छोटी। उन दिनों घर गली मोहल्लों में होते थे और हर बड़ी गली किसी बड़ी सड़क से जुड़ी होती थी। हमारी गली का नाम था–पंजतीर्थी। जम्मू शहर के बिलकुल उत्तर में ‘तवी’ नदी बहती है और इसी नदी के ऊँचे किनारे पर बनी चौड़ी सड़क के अंदर थी पंजतीर्थी। महाराजा हरी सिंह का राज महल इस सड़क के एक छोर पर था और दूसरे छोर पर थी ‘मुबारक मंडी’। इसी मंडी में बड़ी शान से खड़े थे पुराने महल जो इस पीढ़ी के पुराने राजाओं के वैभव का प्रतीक था। मंडी के बीचो- बीच संगमरमर की सीढ़ियों वाला एक सुन्दर सा बाग़ था। इस बाग़ में कई तरह के फ़व्वारे लगे थे। चारों ओर खुश्बूदार पेड़ भी थे। इन सभी पेड़ों में से मुझे मौलश्री का पेड़ बहुत पसंद था क्यूँकि उसके फूलों की खुश्बू सब से अलग थी। इसकी खुश्बू के आगे मुझे सारे इत्र फीके लगते हैं।
इस मंडी और राजमहल को आस- पास थे दो बाज़ार। एक का नाम था धौन्थली और दूसरा था पक्का डंगा। इन दोनों बाज़ारों की एक विशेषता थी। दोनों पत्थर के बने थे। यानी सड़कें तो तारकोल की थी किन्तु जम्मू के सारे बाज़ारों में पत्थर लगे हुए थे। गाड़ियाँ तो चलती नहीं थी इन बाज़ारों में और उन दिनों न तो स्कूटर थे न धुआँ छोड़ने वाले अन्य वाहन। फिर भी दिन में दो बार इन बाज़ारों के पत्थरों पर पानी का छिड़काव होता था और वो छिड़काव करने वाले थे हमारे प्यारे ‘माश्की काका’।
उनका नाम क्या था, मैं नहीं जानती। थोड़े से भारी शरीर वाले माश्की काका अपनी मश्क में पानी भर कर बाज़ार के बीचोबीच चलते जाते और दोनों और मश्क के मुँह से पानी फेंकते जाते। अमूमन उस समय हम या तो स्कूल जा रहे होते या आ रहे होते। मुझे याद है काका सब बच्चों के साथ खिलवाड़ भी करते रहते। इधर-उधर पानी छिड़कते-छिड़कते वो मश्क को इतनी जोर से गोल गोल घुमाते की बच्चों पर छींटे पड़ते। सारे बच्चे खिलखिला कर हँस देते और उनके पीछे पीछे चलते हुए यही कहते, “ काका! पानी फेंको न और, अभी मज़ा नहीं आया।”
मुझे याद है कभी-कभी काका खड़े हो जाते बीच बाज़ार और हम बच्चों से कहते, “ देखो, पानी बहुत मूल्यवान है, इसे व्यर्थ में नहीं गंवाना चाहिए। नहीं तो बादल, नदिया और समन्दर सब हमसे रूठ जाएँगे और फिर सूख जाएँगे।”
हमें उनकी बातों की समझ तो आती नहीं थी। भला बादल या नदिया कैसे सूख सकते हैं? और समन्दर तो हमने देखा ही नहीं था तो उसके विषय में हम क्या निर्णय ले सकते थे। हाँ, उनकी बातों से एक बात झलकती थी कि उनको पानी से बहुत लगाव था। शायद वे शहर के उत्तरी किनारे में बहती ‘तवी’ नदी का पानी अपनी मश्क में भर कर लाते थे। और उस नदी तक पहुँचने के लिए नीचे ढल कर जाना पड़ता था। या वे हम सब को जल संकट के विषय से अवगत कराना चाहते थे।
जब मैं बहुत छोटी थी तो मश्क का आकार और मुँह देख कर थोड़ा डर सी जाती थी। एक बार भिश्ती काका से पूछ ही लिया था मैंने, “ काका आपने किस चीज़ का थैला बनाया है? ’’  (मुझे उनकी मश्क थैले जैसी ही लगती थी)
हँसते हुए काका ने बताया था कि ‘जब कोई बकरी बूढ़ी होकर मर जाती है तो उसकी खाल से हम यह थैला बना लेते हैं। फिर इसमें पानी भर कर बाज़ार के पत्थरों पर छिड़काव करते हैं।’ उन दिनों यह बातें समझ नहीं आती थी। पर अब लगता है कि पत्थरों पर पड़ी धूल-मिट्टी न उड़े, इसी लिए छिड़काव होता होगा। राज महल से मंडी तक आने वाली बड़ी सड़क पर तो दिन में तीन- चार बार काका इधर से उधर आते-जाते अपनी मश्क से पानी छिड़कते रहते।
 काका मुस्लिम थे, यह मेरे पिता ने मुझे बताया था। बहुत बाद में मुझे पता चला था की उनकी कोई अपनी सन्तान नहीं थी। वो  हम सब बच्चों के साथ ही खिलवाड़ करके अपना जी बहला लेते थे। कभी- कभी वो हम बच्चों में संतरी रंग की गोलियाँ (टॉफियाँ) बाँटते थे। शायद तब उनकी ईद होती थी। हाँ, एक बात और याद आती है कि बाज़ार के कृतज्ञ दुकानदार उन्हें कुछ पैसे देते थे जिसे आज के समय में ‘टिप’ कहा जा सकता है।
 उनका नाम मुझे याद नहीं। वो मेरा नाम कैसे जानते थे, मुझे पता नहीं । पर जब भी वो मुझे देखते तो मुस्कुराते हुए कहते, “ गुड्डी!  तुसाँ दूर उड्ड जाना, फेर असाँनेई मिलना”। ( गुड़िया! तूने बहुत  दूर उड़ जाना और फिर हमने नहीं मिलना) शायद उन्हें पता था की मेरे माता पिता शहर से दूर एक नया घर बनवा रहे थे और वो हम से बिछुड़ने का दर्द इसी तरह ब्यान करते थे।
हम जम्मू का पुराना शहर छोड़ कर नई जगह ‘गाँधीनगर’ आकर बस गए। इस बीच वो बाज़ार भी तारकोल के बन गए। अब सड़कों पर पानी का छिड़काव शायद मयुन्स्पैलिटी की गाड़ियाँ करने लगीं। या इसकी आवश्यकता ही नहीं होती होगी। समय जो इतना बदल गया था।कुछ चीज़ों का कोई महत्त्व नहीं रह गया था।
मेरे बड़े होते-होते माश्की काका कहाँ खो गए, मुझे पता ही नहीं चला। लेकिन मेरी सुधियों की किसी पिटारी में वो सदा रहे। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरा और उनका सम्बन्ध भी रविन्द्र नाथ टैगोर की कहानी ‘काबुली वाला’ की ‘मिनी’ और ‘काबुली वाला’ की तरह था। वे ठीक ही तो कहते थे.... गुड्डी तुसाँ उड्ड जाना....
मैं तो हूँ, किन्तु मेरे माश्की काका समय के पंख लगा कर कहीं उड़ गए। अब कभी कभी नभ में उड़ते बादलों में उनको देख लेती हूँ । वो वहीं होंगे, अपनी मश्क के साथ, धरती पर जल का छिड़काव करते हुए....-
·         मैंने इस रचना में ‘भिश्त’ के स्थान पर ‘मश्क’ शब्द का प्रयोग किया है। जम्मू में हम सब लोक भाषा में ‘भिश्त’ को ‘मश्क’ ही कहते थे और भिश्ती को कहते थे ‘माश्की’।
shashipadha@gmail.com

निंजू भिया का भाँग-भंडारा

निंजू भिया का 
भाँग-भंडारा 
-जवाहर चौधरी
नाम उनका निरंजन पहलवान था, लेकिन लोग  उन्हें निंजू भिया कहते थे। निंजू भिया का एक निराला शौक था। वे होली पर सबको निःशुल्क भाँग पिलाया करते थे। जैसे इन दिनों राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव से पहले, यानी दो चार महीने पहले से भोजन भंडारा किया करती हैं। आस-पास के लोग, माता-बहनें, बच्चे वगैरह पूरी-सब्जी, रायता और एक आध मीठा खाते मस्त रहते हैं। छुटके नेताओं को इससे अपनी नेतागिरी चमकाने का मौका मिलता है और चंदे की खासी रकम भी। अंदर ही अंदर यह धारणा भी है कि  लोगों को नमक खिला देने से वे वफादार होने लगते हैं। हालांकि चचा गालिब क्या खूब कह गए हैं जिनको हमसे है वफा की उम्मीद, वे नहीं जानते वफा क्या है  आज होते तो उनको भी को चार भंडारे खिलाकर उनकी शायरी को शीर्षासन करवा देने की कोशिश होती। खैर, निंजू भिया की बात चल रही थी। छह महीने पहले से वे होली के भाँग-भंडारे की तैयारी में लग जाते थे। उन्हें भाँग का नशा इतना नहीं चढ़ता था जितना भाँग पिलाने का। इस आयोजन का वे किसी से पैसे नहीं लेते थे। सारा खर्च खुद ही उठाते थे। भाँग के अलावा सबसे महँगा सामान ड्राई फ्रूट्स का हुआ करता था । बादाम-काजू वगैरह इसमें प्रमुख थे। आप सोच रहे होंगे की किलो दो किलो में काम हो जाता होगा तो आपको बता दें शुरू शुरू में वे एक कोठी भाँग बनाते थे। यानी करीब दो सौ लीटर। लेकिन बाद में जब भक्तजनों की आमद बढ़ी  प्रसाद तो दो कोठी तक का इंतजाम होने लगा। इसके लिए काफी सारा मेवा लगता था। उन्होंने कभी अपनी भाँग की समृद्धि से कभी कोई समझौता नहीं किया।
भाँग वे पूरे मनोयोग से खुद ही पीसते थे। और हर आधे घंटे में आगंतुकों को बताते जाते थे कि  भाँग पीसना हर किसी के बस की बात नहीं है। इसमें भोले की भक्ति, लोढ़ा चलाने की कला और सतत साधना व धैर्य की जरूरत होती है। इस काम के लिए उनके पास एक बड़ा सा सिलपत्थर था। निंजू भिया जिस समय भाँग पीसते माहौल किसी आरती आराधना का सा हो जाता। किसी ने कहा है –“मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ आते गए कारवां बनता गया।  जिस रात होली जलना होती उस रात लोग निंजू भिया के साथ भाँग निर्माण में जुटे रहते। जैसे किसी समारोह के लिए हलवाइयों की टोली रसोई के काम में लगा करती है । सैकड़ों संतरे और खूब सारे अंगूरों का रस तैयार किया जाता। दूध-मिश्री, बादाम, काजू, खसखस, और मगज की खूब घुटाई होती और फिर इन सब का ढेर सारा पेस्ट भाँग में घोला जाता इसके अलावा कुछ मसाले भी होते थे।
धुलेंडी के दिन यानी जिस दिन रंग खेला जाता है, भाँग का वितरण शुरू होता। पहले भोले बाबा को भोग लगाया जाता। सुबह नौ बजे से पहले वे वितरण शुरू नहीं करते। हर एक को एक एक गिलास आग्रह से  देते।  कोई चाहता तो दो भी। आपस में शर्त लगा कर पीने वाले सात, आठ, नौ तक पी जाते। निंजू भिया मना तो नहीं करते  लेकिन चार दिनों तक औंधे पड़े रहने की चेतावनी अवश्य देते।  अगर भंग की तरंग का डर नहीं हो तो मन करता कि पेट जितनी जगह है उससे ज्यादा पी लें। उनके आयोजन से होली रंग से ज्यादा भंग का त्यौहार होती थी।
होली हो जाने के बाद महीनों तक निंजू भिया आयोजन के खुमार में रहते। साथी लोग भी उनके इस आनंद को खूब ऊंचाई देते। अगले साल की योजनाएँ भी बनतीं। महीनों निकाल जाते, दिवाली के बाद फिर होली का इंतजार होने लगता।
पचास साल में बहुत कुछ बदल गया। निंजू भिया नहीं रहे। पेड़ों से आच्छादित उनका कार्यक्रम स्थल अब कॉलोनी में बदल गया है। लेकिन जिन्होंने निंजू भिया की भाँग पी है वे होली पर वहाँ से गुजरते हैं तो उनके मुँह से बरबस जय भोलेनाथअवश्य निकल जाता है ।

सम्पर्कः 16 कौशल्यापुरी, चितावद रोड़, इन्दौर – 452001, 9826361533, 9406701670, jc.indore@gmail.com, Blogs-  hindivyangya.blogspot.com

युद्ध कर


युद्ध कर
 -सुधा राजे

हो लिया जितना दुखी होना था रोना रो लिया,
भाग्य जैसा है सो है तू उठ स्वयं को सिद्ध कर
जन्म से है मृत्य निश्चित मध्य  दूरी रुद्ध कर,
 कृष्ण भी तू पार्थ भी तू जीत है तय युद्ध कर ,

१.अब न मुड़कर देखना पीछे कि  किसका क्या हुआ 
शक्ति गह चुपचाप मत रह ,है  मनुज या केंचुआ !!
कुछ न कुछ तो खोज खुद में, गुन अलग सबसे अलग 
सीख ले हुई  देर कितनी भी ,उसे फिर शुद्ध कर 
कृष्ण भी तू पार्थ भी तू जीत है तय युद्ध कर 

२. मानता है ईश को तो ईश पर विश्वास कर 
नास्तिक है तो स्वयं की शक्ति का अहसास कर 
खो गया जो वो तो आने से रहा जितना भी रो 
पर जो पा सकना अभी भी शेष है वो बीज बो 
तू स्वयं का मित्र तो बन आंक निज को बुद्ध कर
कृष्ण भी तू पार्थ भी तू जीत है तय युद्ध कर। 

३.जो भी होना है अनिश्चित है तो किसका भय तुझे 
संकलित संग्रह सभी खोना यहीं ये तय तुझे 
भोगवादी हो कि  हो तू हो त्यागवाला तय तो कर 
आक्रमण है श्रेष्ठ बचने से तू निज बल क्रुद्ध कर 


मूल निवासी- 'दतिया मध्य प्रदेश', सम्प्रति- सीनियर एडमिनिस्ट्रेशन ऑफिसर , लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी , फगवाड़ा , पंजाब पिन १४४४११,  
सम्पर्कः 41 -c , ऑफिसर्स रेजिडेंस अप्पार्टमेंट , सेक्टर , एल पी यू

रचना प्रकाशन के सोलह संस्कार

रचना प्रकाशन के सोलह संस्कार
-बी.एल.आच्छा          
रचना प्रसव पीड़ा का उपहार है। जीवंत है तो संस्कार होंगे ही। यह  मनुस्मृति नहीं, शास्रीय तर्ज पर रचना-प्रसूति के संस्कारों का नामकरण। पुराने हों या सोशल मीडिया के एल्बमी प्रसंस्करण हों। शास्त्रीय भाषा में बिना व्यंग्य -लक्षणा -व्यंजना के।
रचनाधान - लेखक के भीतर एक फ्लैश, ट्रांसफार्मर उड़ने की सी अंतर्ध्वनि,फड़कता बिंब और चेहरे की पुलक। जैसे  मितली के बाद अस्पताल से पॉजिटिव का संकेत।  भावगर्भ संस्कार -कई दिशाओं में परिंदे उड़ान भरने  लगते हैं ,चोंच में कुछ उड़ेल देते हैं; दर्शन और मसाले । शिराओं में झनझनाहट , सोते हुए जागते सपने। शब्दप्राशन संस्कार - अन्नप्राशन की तरह भाव का शब्दप्राशन। ये ही कला के तीन क्षण। भाव -संवेदना से शब्द -संवेदना की रचनाप्रक्रिया।
     प्रथम- पाठक -श्रवण संस्कार- पत्नी मित्र या किसी रचनाकार के समक्ष पाठ। सुनाते ही पूछ लेते हैं , मालवी मानुष की तरह-कैसे बने लड्डू -बाफले! पत्र-पत्रिकार्थ प्रेषण संस्कार -फेसबुक पर नये व्यंग्य के शुरुआती  सौ शब्द ... और संभव हो तो अनुबंधित पत्रिका का नाम या उपन्यास के दस हजार शब्द लिख लेने की सूचना। और रचना ई-मेल से  अनछपे रहने तक फिर फिर  ईमेल। गोष्ठी -सुनावन संस्कार- रचनाकार  द्वारा आतुरता से  टटकी- ताजी कली बता कर रचना पाठ और वाह वाह के लिए कातर नयन और श्रवण। आकाशवाणी -दूरदर्शन- प्रदर्शन संस्कार -आकाशवाणी केंद्र पर रिकॉर्डिंग के पहले चित्र खिंचवाकर  फेसबुक पर दुर्लभ अनिर्वचनीय क्षणों का फेसबुक पोस्टिंग। भूमिका लिखावन संस्कार - पुस्तक की भूमिका और फ्लैप किसी पुरस्काराना कदकाठी वाले, अकादमिक पुरुष , साहित्यिक राजनेता  या पहुँच वाले नामवर व्यक्तित्व के दो शब्द । पुस्तक-छपावन संस्कार- फेसबुक पर अनुबंध... बधाई ..बधाई, कवर ग्राफिक्स ...सुंदर ..सुंदर..., पुस्तक प्रकाशित ....वाह वा... बधाई.. बधाई। संतानोत्पत्ति का -सा बधावन संस्कार। विमोचन -लोकार्पण संस्कार- सदाबहार अतिथि से ,जो अखबार की सुर्खी बन जाए। नरमदिल समीक्षक, जो सूरजमुखी की तरह किताबमुखी-लेखकमुखी हो। अखबारों में सचित्र प्रकाशन के जुगाड़ । सोशल मीडिया पर इस  वैश्विक घटना का  ताबड़तोड़ सचित्र समाचार। जैसे चंद्रयान दो , धरती की कक्षा पार कर गया हो। कुछेक का मत  है-अनाम पाठक पढ़ ले तो स्वयमेव विमोचन । पर घोड़े पर बैठकर बिंदोली के बगैर  कैसी शादी ? समीक्षा- लिखावन संस्कार- अपने ही लक्ष्मीयुक्त रक्तचंदन से छपी पुस्तकों का पत्रिकाओं को  समीक्षार्थ प्रेषण। प्राप्त समीक्षा पुस्तक सहित इमेल। प्रकाशित होते ही फेसबुक पर।  बधाइयों की भ्रमर गुंजन। अर्ध-मूल्यपावन संस्कार- विमोचन के दिन आधे मूल्य पर पुस्तक- विक्रय, श्रोताओं के संकोच से जुड़ी विक्रय कला। बधाई पावन संस्कार- सोशल मीडिया पर , इंस्टाग्राम -फेसबुक व्हाट्सएप समूहों में चित्रात्मक रपट। प्रशंसा ,बधाई ग्रहण और सामूहिक या व्यक्तिशःआभार । इतनी कि गूगल भी बधाइयों से मितलाने लगे। पुस्तक पहुँचावन संस्कार - जैसे विवाह के बाद लड्डू घर -घर, वैसे ही किताबें मित्रों लेखकों को हाथों-हाथ या रजिस्टर्ड। कोर्स लगावन संस्कार- सधे लेखक और प्रकाशक द्वारा रचना को पाठ्यक्रम में लगाने की जुगाड़ -तकनीक। पुरस्कार हथियावन संस्कार - अकादमियों- संस्थानों, निजी प्रतिष्ठानों की विज्ञप्ति और प्रविष्टियाँ। पुरस्कार के लिए  कद-काठी वाले के साथ पर-जन्य यज्ञ। यों छोटी मोटी संस्थाओं  के पुरस्कारों पर चौकस नजर।
प्रिय पाठक! ये सोलह संस्कार अनुभवजन्य हैं। अंतिम भी नहीं। अलबत्ता रचना को अक्षर ब्रह्म मानते हुए पुरस्कार के बाद के संस्कारों को विराम दे दिया है। संस्कारों के नामकरण की भाषा संशोधनाधीन है।
सम्पर्कः  36 , क्लेमेंट्स रोड सरवना स्टोर्स के पीछेपुरुषवाकम् ,  चेन्नई (तमिलनाडु)- 600007, मोबा. 94 250 -83335  

मैं लेखक कैसे बना ?


मैं लेखक कैसे बना ?(आत्मकथा से )
-अमृतलाल नागर
अपने बचपन और नौजवानी के दिनों का मानसिक वातावरण देखकर यह तो कह सकता हूँ कि अमुक-अमुक परिस्थितियों ने मुझे लेखक बना दिया, परंतु यह अब भी नहीं कह सकता कि मैं लेखक ही क्‍यों बना। मेरे बाबा जब कभी लाड़ में मुझे आशीर्वाद देते तो कहा करते थे कि "मेरा अमृत जज बनेगा।" कालांतर में उनकी यह इच्‍छा मेरी इच्‍छा भी बन गई। अपने बाबा के सपने के अनुसार ही मैं भी कहता कि विलायत जाऊँगा और जज बनूँगा।

हमारे घर में सरस्‍वती और गृहलक्ष्‍मी नामक दो मासिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से आती थीं। बाद में कलकत्‍ते से प्रकाशित होने वाला पाक्षिक या साप्‍ताहिक हिन्दू-पंच भी आने लगा था। उत्तरभारतेंदु काल के सुप्रसिद्ध हास्‍य-व्‍यंग्‍य लेखक तथा आनंद के संपादक पं. शिवनाथजी शर्मा मेरे घर के पास ही रहते थे। उनके ज्‍येष्‍ठ पुत्र से मेरे पिता की घनिष्‍ठ मैत्री थी। उनके यहाँ से भी मेरे पिता जी पढ़ने के लिए अनेक पत्र-पत्रिकाएँ लाया करते थे। वे भी मैं पढ़ा करता था। हिन्दी रंगमंच के उन्‍नायक राष्‍ट्रीय कवि पं. माधव शुक्‍ल लखनऊ आने पर मेरे ही घर पर ठहरते थे। मुझे उनका बड़ा स्‍नेह प्राप्‍त हुआ। आचार्य श्‍यामसुंदरदास उन दिनों स्‍थानीय कालीचरण हाई स्‍कूल के हेडमास्‍टर थे। उनका एक चित्र मेरे मन में आज तक स्‍पष्ट है - सुबह-सुबह नीम की दातुन चबाते हुए मेरे घर पर आना। इलाहाबाद बैंक की कोठी (जिसमें हम रहते थे) के सामने ही कंपनी बाग था। उसमें टहलकर दातून करते हुए वे हमारे यहाँ आते, वहीं हाथ-मुँह धोते फिर चाँदी के वर्क में लिपटे हुए आँवले आते, दुग्‍धपान होता, तब तक आचार्य प्रवर का चपरासी 'अधीन' उनकी कोठी से हुक्का, लेकर हमारे यहाँ आ पहुँचता। आध-पौन घंटे तक हुक्का गुड़गुड़ाकर वे चले जाते थे। उर्दू के सुप्रसिद्ध कवि पं. बृजनारायण चकबस्‍त के दर्शन भी मैंने अपने यहाँ ही तीन-चार बार पाया। पं. माधव शुक्‍ल की दबंग आवाज और उनका हाथ बढ़ा-बढ़ाकर कविता सुनाने का ढंग आज भी मेरे मन में उनकी एक दिव्‍य झाँकी प्रस्‍तुत कर देता है। जलियाँवाला बाग कांड के बाद शुक्‍लजी वहाँ की खून से रँगी हुई मिट्टी, एक पुड़िया में ले आए थे। उसे दिखाकर उन्‍होंने जाने क्‍या-क्‍या बातें मुझसे कही थीं। वे बातें तो अब तनिक भी याद नहीं पर उनका प्रभाव अब तक मेरे मन में स्‍पष्‍ट रूप से अंकित है। उन्‍होंने जलियाँवाला बाग कांड की एक तिरंगी तस्‍वीर भी मुझे दी थी। बहुत दिनों तक वो चित्र मेरे पास रहा। एक बार कुछ अंग्रेज अफसर हमारे यहाँ दावत में आनेवाले थे, तभी मेरे बाबा ने वह
चित्र घर से हटवा दिया। मुझे बड़ा दुःख हुआ था। मेरे पिता जी आदि पूज्‍य माधव जी के निर्देशन में अभिनय कला सीखते थे, वह चित्र भी मेरे मन में स्‍पष्‍ट है। हो सकता है कि बचपन में इन महापुरुषों के दर्शनों के पुण्‍य प्रताप से ही आगे चलकर मैं लेखक बन गया होऊँ। वैसे कलम के क्षेत्र में आने का एक स्‍पष्‍ट कारण भी दे सकता हूँ।

सन 28 में इतिहास प्रसिद्ध साइमन कमीशन दौरा करता हुआ लखनऊ नगर में भी आया था। उसके विरोध में यहाँ एक बहुत बड़ा जुलूस निकला था। पं. जवाहर लाल नेहरू और पं. गोविंद बल्‍लभ पंत आदि उस जुलूस के अगुवा थे। लड़काई उमर के जोश में मैं भी उस जुलूस में शामिल हुआ था। जुलूस मील डेढ़ मील लंबा था। उसकी अगली पंक्ति पर जब पुलिस की लाठियाँ बरसीं तो भीड़ का रेला पीछे की ओर सरकने लगा। उधर पीछे से भीड़ का रेला आगे की ओर बढ़ रहा था। मुझे अच्‍छी तरह से याद है कि दो चक्‍की के पाटों में पिसकर मेरा दम घुटने लगा था। मेरे पैर जमीन से उखड़ गए थे। दाएँ-बाएँ, आगे पीछे, चारों ओर की उन्‍मत्‍त भीड़ टक्‍करों पर टक्‍करें देती थी। उस दिन घर लौटने पर मानसिक उत्‍तेजनावश पहली तुकबंदी फूटी। अब उसकी एक ही पंक्ति याद है : कब लौं कहो लाठी खाया करें, कब लौंकहौं जेल सहा करिये।

वह कविता तीसरे दिन दैनिक आनंद में छप भी गई। छापे के अक्षरों में अपना नाम देखा तो नशा आ गया। बस मैं लेखक बन गया। मेरा खयाल है दो-तीन प्रारंभिक तुकबंदियों के बाद ही मेरा रुझान गद्य की ओर हो गया। कहानियाँ लिखने लगा। पं. रूपनारायण जी पांडेय कविरत्‍नमेरे घर से थोड़ी दूर पर ही रहते थे। उनके यहाँ अपनी कहानियाँ लेकर पहुँचने लगा। वे मेरी कहानियों पर कलम चलाने के बजाय सुझाव दिया करते थे। उनके प्रारंभिक उपदेशों की एक बात अब तक गाँठ में बँधी है। छोटी कहानियों के संबंध में उन्‍होंने बतलाया था कि कहानी में एक ही भाव का समावेश करना चाहिए। उसमें अधिक रंग भरने की गुंजाइश नहीं होती।

सन 1929 में निराला जी से परिचय हुआ और तब से लेकर 1939 तक वह परिचय दिनोंदिन घनिष्‍ठतम होता ही चला गया। निराला जी के व्‍यक्तित्‍व ने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया। आरंभ में यदा-कदा दुलारेलालजी भार्गव के सुधा कार्यालय में भी जाया-आया करता था। मिश्र बंधु बड़े आदमी थे। तीनों भाई एक साथ लखनऊ में रहते थे। तीन-चार बार उनकी कोठी पर भी दर्शनार्थ गया था। अंदरवाले बैठक में एक तखत पर तीन मसनदें और लकड़ी के तीन कैशबाक्‍स रक्‍खे थे। मसनदों के सहारे बैठे उन तीन साहित्यिक महापुरुषों की छवि आज तक मेरे मानस पटल पर ज्‍यों की त्‍यों अंकित है। रावराजा पंडित श्‍यामबिहारी मिश्र का एक उपदेश भी उन दिनों मेरे मन में घर कर गया था। उन्‍होंने कहा था, साहित्‍य को टके कमाने का साधन कभी नहीं बनाना चाहिए। चूँकि मैं खाते-पीते खुशहाल घर का लड़का था, इसलिए इस सिद्धांत ने मेरे मन पर बड़ी छाप छोड़ी। इस तरह सन 29-30 तक मेरे मन में यह बात एकदम स्‍पष्‍ट हो चुकी थी कि मैं लेखक ही बनूँगा।

काशी में उन दिनों अनेक महान साहित्यिक रहा करते थे। वहाँ भी जाना-आना शुरू हुआ। साल में दो चक्‍कर लगा आता था। शरतचंद्र चट्टोपाध्‍याय के दर्शन पाकर मैं स्‍फूर्ति से भर जाता था। शरत बाबू हिन्दी मजे की बोल लेते थे। मुझसे कहने लगे, ‘स्‍कूल कॉलेज में पढ़ते समय बहुत से लड़के कविताएँ-कहानियाँ लिखने लगते हैं, लेकिन बाद में उनका यह अभ्‍यास छूट जाता है। इससे कोई लाभ नहीं। पहले यह निश्‍चय करो कि तुम आजन्म लेखक ही बने रहोगे। मैंने सोत्‍साह हामी भरी। शरत बाबू ने अपना एक पुराना कि़स्‍सा सुनाया। 18-19 वर्ष की आयु में उन्‍होंने लेखक के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त कर ली थी। क्रमशः उनकी दो-तीन किताबें छपीं और वो चमत्‍कारिक रूप से प्रसिद्ध हो गए... तब एक दिन रास्‍ते में शरत बाबू को अपने कॉलेज जीवन के एक अध्‍यापक मिल गए। उनका नाम बाबू पाँच कौड़ी (दत्त, दे या बनर्जी) था। वे बांग्‍ला साहित्‍य के प्रतिष्ठित आलोचक भी थे। अपने पुराने शिष्‍य को देखकर उन्‍होंने कहा : शरत, मैंने सुना है कि तुम बहुत अच्‍छे लेखक हो गए हो लेकिन तुमने अपनी किताबें पढ़ने को नहीं दी। शरत बाबू संकुचित हो गए, विनयपूर्वक बोले : वे पुस्‍तकें इस योग्‍य नहीं कि आप जैसे पंडित उन्‍हें पढ़ें। पाँच कौड़ी बाबू बोले : खैर, पुस्‍तकें तो मैं कहीं से लेकर पढ़ लूँगा, पर चूँकि अब तुम लेखक हो गए हो इसलिए मेरी तीन बातें ध्‍यान में रखना। एक तो जो लिखना सो अपने अनुभव से लिखना। दूसरे अपनी रचना को लिखने के बाद तुरंत ही किसी को दिखाने, सुनाने या सलाह लेने की आदत मत डालना। कहानी लिखकर तीन महीने तक अपनी दराज में डाल दो और फिर ठंडे मन से स्‍वयं ही उसमें सुधार करते रहो। इससे जब यथेष्ठ संतोष मिल जाए, तभी अपनी रचना को दूसरों के सामने लाओ। पाँच कौड़ी बाबू का तीसरा आदेश यह था कि अपनी कलम से किसी की निंदा मत करो।

अपने गुरु की ये तीन बातें मुझे देते हुए शरत बाबू ने चौथा उपदेश यह दिया कि यदि तुम्‍हारे पास चार पैसे हों तो तीन पैसे जमा करो और एक खर्च। यदि अधिक खर्चीले हो तो दो जमा करो और दो खर्च। यदि बेहद खर्चीले हो तो एक जमा करो और तीन खर्च। इसके बाद भी यदि तुम्‍हारा मन न माने तो चारों खर्च कर डालो, मगर फिर पाँचवा पैसा किसी से उधार मत माँगो। उधार की वृत्ति लेखक की आत्‍मा को हीन और मलीन कर देती है।
मैं यह तो नहीं कह सकता कि इन चारों उपदेशों को मैं शतप्रतिशत अमल में ला सकता हूँ, फिर भी यह अवश्‍य कह सकता हूँ कि प्रायः नब्‍बे फीसदी मेरे आचरण पर इन उपदेशों का प्रभाव पड़ा है।

सन 30 से लेकर 33 तक का काल लेखक के रूप में मेरे लिए बड़े ही संघर्ष का था। कहानियाँ लिखता, गुरुजनों से पास भी करा लेता परंतु जहाँ कहीं उन्‍हें छपने भेजता, वे गुम हो जाती थीं। रचना भेजने के बाद मैं दौड़-दौड़कर पत्र-पत्रिकाओं के स्‍टॉल पर बड़ी आतुरता के साथ यह देखने को जाता था कि मेरी रचना छपी है या नहीं। हर बार निराशा ही हाथ लगती। मुझे बड़ा दुख होता था, उसकी प्रतिक्रिया में कुछ महीनों तक मेरे जी में ऐसी सनक समाई कि लिखता, सुधारता, सुनाता और फिर फाड़ डालता था। सन 1933 में पहली कहानी छपी। सन 1934 में माधुरी पत्रिका ने मुझे प्रोत्‍साहन दिया। फिर तो बराबर चीजें छपने लगीं। मैंने यह अनुभव किया है कि किसी नए लेखक की रचना का प्रकाशित न हो पाना बहुधा लेखक के ही दोष के कारण न होकर संपादकों की गैर-जिम्‍मेदारी के कारण भी होता है, इसलिए लेखक को हताश नहीं होना चाहिए।

सन 1935 से 37 तक मैंने अंग्रेजी के माध्‍यम से अनेक विदेशी कहानियों तथा गुस्‍तावफ्लाबेर के एक उपन्‍यास मादाम बोवेरी का हिन्दी में अनुवाद भी किया। यह अनुवाद कार्य मैं छपाने की नियत से उतना नहीं करता था, जितना कि अपना हाथ साधने की नीयत से। अनुवाद करते हुए मुझे उपयुक्‍त हिन्दी शब्‍दों की खोज करनी पड़ती थी। इससे मेरा शब्‍द भंडार बढ़ा। वाक्‍यों की गठन भी पहले से अधिक निखरी।
दूसरों की रचनाएँ, विशेष रूप से लोकमान्‍य लेखकों की रचनाएँ पढ़ने से लेखक को अपनी शक्ति और कमजोरी का पता लगता है। यह हर हालत में बहुत ही अच्‍छी आदत है। इसने एक विचित्र तड़प भी मेरे मन में जगाई। बार-बार यह अनुभव होता था कि विदेशी साहित्‍य तो अंग्रेजी के माध्‍यम से बराबर हमारी दृष्टि में पड़ता रहता है, किंतु देशी साहित्‍य के संबंध में हम कुछ नहीं जान पाते। उन दिनों हिन्दीवालों में बांग्‍ला पढ़ने का चलन तो किसी हद तक था, लेकिन अन्‍य भारतीय भाषाओं का साहित्‍य हमारी जानकारी में प्रायः नहीं के बराबर ही था। इसी तड़प में मैंने अपने देश की चार भाषाएँ सीखीं। आज तो दावे से कह सकता हूँ कि लेखक के रूप में आत्‍मविश्‍वास बढ़ाने के लिए मेरी इस आदत ने मेरा बड़ा ही उपकार किया है। विभिन्‍न वातावरणों को देखना, घूमना, भटकना, बहुश्रुत और बहुपठित होना भी मेरे बड़े काम आता है। यह मेरा अनुभवजन्‍य मत है कि मैदान में लड़ने वाले सिपाही को चुस्‍त-दुरुस्त रखने के लिए जिस प्रकार नित्‍य की कवायद बहुत आवश्‍यक होती है, उसी प्रकार लेखक के लिए उपरोक्त अभ्‍यास भी नितांत आवश्‍यक है। केवल साहित्यिक वातावरण ही में रहनेवाला कथा लेखक मेरे विचार में घाटे में रहता है। उसे निस्‍संकोच विविध वातावरणों से अपना सीधा संपर्क स्‍थापित करना ही चाहिए।
(1962, टुकड़े-टुकड़े दास्‍तान में संकलित)