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Apr 16, 2018

उच्च शिक्षा की विसंगतियाँ

उच्च शिक्षा की विसंगतियाँ
 - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
 उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले प्रत्येक शिक्षार्थी को तीन चरणों से गुजरना पड़ता है- प्रवेश, अध्ययन एवम् परीक्षा। केंद्रीय विश्वविद्यालयों या कुछेक महाविद्यालयों को अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाए तो उच्च शिक्षा के ये तीनों चरण विसंगतियों एवम् अराजकता की चपेट में हैं, वस्तुत: तीन चरणों की तरह महाविद्यालय भी तीन कोटि के हैं-राजकीय महाविद्यालय, सहायता प्राप्त अशासकीय महाविद्यालय एव निजी प्रबन्धतन्त्रों द्वारा संचालित महाविद्यालय। इनमे प्रथम दो कोटि के महाविद्यालयों में प्राध्यापकों की नियुक्ति एवम् उनका वेतनमान सरकारों द्वारा निर्धारित एवम् देय होता है जबकि निजी कॉलेजों में प्राध्यापकों की नियुक्ति के मानक तो शासन द्वारा ही निर्धारित होते है किंतु उनका वेतन प्रबंधतंत्र की दया पर निर्भर होता है, प्रबन्धतन्त्रों द्वारा उन्हें सीमित वेतन दिया जाता है, वर्ष पर्यन्त का वेतन नही दिया जाता है। उन्हें पर्याप्त सम्मान भी नहीं दिया जाता, ये एक ऐसी भीषण विसंगति है जिसने सम्पूर्ण उच्च शिक्षा के स्तर को प्रभावित किया है। शासकीय और सहायता प्राप्त कॉलेज सीमित संख्या में है अत: उनमें सीमित छात्रों को ही प्रवेश मिल पाता है, प्राइवेट कॉलेज तो गली -गली में कुकुरमुत्तों की तरह उगे है अतरू उनमे प्रवेश कराने की होड़ लगी रहती है इनके प्रबन्धक से लेकर कर्मचारी तक छात्रों को प्रवेश दिलाने हेतु अनेक प्रलोभन देते रहते हैं।
विद्यार्थी जीवन का दूसरा और मुख्य चरण है अध्ययन। अध्ययन के द्वारा ही ज्ञानार्जन, मेधा का विकास होता है, किन्तु विडम्बना ही है यहाँ भी घोर अराजकता देखने को मिलती है, प्रायवेट कॉलेजों में शिक्षकों को वेतन इतना कम दिया जाता है जो अपर्याप्त भी है और असम्मानजनक भी अत: उनसे अच्छे अध्यापन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है, वैसे भी इन कॉलेजों में नकल के ठेके पर प्रवेश होते है अतरू पढऩे पढाने का माहौल दिखावे के लिए होता है। तीनों प्रकार के महाविद्यालयों में एक विसंगति समान है वह है प्राध्यापकों की कमी, प्राइवेट कॉलेजों में पैसा बचाने के लिये कम अध्यापक रखे जाते है,यद्यपि फाइलों में वे पूरे होते हैं पर धरातल पर बहुत कम होते हैं। राजकीय एवं सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में अनेकानेक कारणों से प्राध्यापकों की संख्या बहुत कम है जिससे अध्ययन प्रभावित होना स्वाभाविक है, इन कॉलेजों में भी कक्षाएँ प्राय: खाली ही रहती हैं अनेक प्राध्यापक इसी समय का सदुपयोग प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने में कर लेते हैं।          
तीसरा चरण परीक्षा का होता है, जब प्रारम्भिक दो चरण विसंगतियों से पूर्ण है तब अंतिम चरण के सहज होने की कल्पना ही हास्यास्पद है। सरकार/ विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय प्रशासन जोर शोर से नकल विहीन परीक्षा के लिये कमर कस लेता है, शायद कोई भी इस समस्या की जड़ को देखना नहीं चाहता, या देख।कर अनदेखी करता ह॥मीडिया भी नकल की खबरों को ले उड़ता है, प्रशासन और नकल माफियाओं के मध्य तू डाल डाल, मैं पात पात का खेल चलता हैप्रशासन की हर व्यवस्था की काट नकल माफियाओ के पास होती है, प्रशासन का दावा होता है कि नकलविहीन परीक्षाएं सम्पादित हुई और नकल कराने वाले दावा करते हैं कि उन्होंने कुछ परेशानियों के बावजूद अपना कार्य चतुराई से कर लिया, निरूसन्देह यह स्थिति राष्ट्र के भविष्य के लिए घातक है यह शिक्षा व्यवस्था एक ऐसी कुपढ़ पीढ़ी तैयार कर रही है, जिसके पास डिग्रियाँ तो हैं ,पर ज्ञान से शून्य है। इस व्यवस्था को जब तक जड़ से नहीं बदला जाएगा, जब तक इन विसंगतियों पर समूल प्रहार नहीं होगा तब तक किसी बड़े परिवर्तन की अपेक्षा व्यर्थ है, यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जो वास्तव में मेधा सम्पन्न हैं, कुछ हासिल करना चाहते है वें हताशा और अवसाद से ग्रस्त हो रहे हैं, जो शुभ नहीं है।
सम्पर्क: 2, विवेक विहार  मैनपुरी-205001

अधिक नम्बर लाने की होड़ में दम तोड़ती रचनात्मकता

अधिक नम्बर लाने की होड़ में
 दम तोड़ती रचनात्मकता 
- कमला निखुर्पा
शिक्षा-व्यवस्था पर चर्चा करने से पहले आइए चलें गाँव की ओर, जर्जर से कमरों में चलती पाठशाला जिसमें सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों को एक ही गुरुजी पढ़ा रहे हैं। एक ओर भोजनमाता खाना बना रही है। बच्चे पढऩे के लिए कम और मध्याह्न भोजन के लिए अधिक उत्सुक दिखाई देते हैं। यहाँ अक्सर छुट्टी हो जाती है। कभी बारिश हो गई तो छुट्टी, क्योंकि पाठशाला की  छत जो टपकती है। कभी गुरुजी की जनगणना या पल्स पोलियो अभियान में ड्यूटी लग गई, तो छुट्टी। आज घर में काम है ,तो अम्मा ने करवा दी छुट्टी। विद्यालय में भी गुरुजी का अधिकांश समय मध्याह्न भोजन के बही खाते का हिसाब लिखने या पशुगणना, मतगणना आदि के प्रपत्र भरने में निकल जाता है। जिसके लिए वह विद्यालय खोला गया था, वही यहाँ सबसे उपेक्षित प्राणी है अर्थात विद्यार्थी।
   दूसरी ओर शहर के पब्लिक स्कूल, चमकती बिल्डिंग, सजा-सँवरा फूलों से महकता लॉन, चिल्ड्रन पार्क, गेट पर वर्दी में सजे गार्ड, प्रोजेक्टर, सी सीटीवी कैमरे से लैस ये स्कूल कम पंचसितारा होटल ज्यादा मालूम होते हैं। जहाँ अभिभावकों की भी परीक्षा ली जाती है। ऊँची फीस भी चुकानी पड़ती है ,यही नहीं, हिन्दी में बोलने पर फाइन भी भरना पड़ता है।
भौतिक विकास की नई ऊँचाइयों को छू लेने की होड़ में दौड़ता आज हमारा समाज जिस दिशा की ओर जा रहा है वहाँ विकास की दौड़ में हमारी शिक्षा-प्रणाली पर लगातार प्रश्न चिह्न लग रहे हैं। कोई शिक्षा पद्यति को दोष देता है, कोई सरकार को कोसता है। कहीं शिक्षकों को शिक्षा की दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराया जाता है तो कहीं नई पीढ़ी के विद्यार्थियों पर ही दोषारोपण कर कर्तव्य की  इतिश्री कर ली जाती है।
वास्तव में शिक्षा, व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करने वाली होनी चाहिए। शिक्षा, प्रकाश के उस स्रोत की तरह हो जो व्यक्ति के चिंतन एवं मनन पर बल दे। मानवीय गुणों का विकास कर समाज का उन्नयन कर सके। दुर्भाग्य से आज चिंतन-मनन के स्थान पर प्रश्नों के उत्तर रटने पर जोर दिया जाता है, अधिक नंबर लाने की होड़ में बालक की सृजनशीलता, कल्पना और रचनात्मकता दम तोड़ती नजर आती है।
हमारी शिक्षा ऐसी हो जो सबके लिए सुलभ हो, जो बालकों को शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाए, मानसिक रूप  से जागरूक, सृजनशील बनाए। चारित्रिक रूप से नैतिक व शिष्ट तथा भावनात्मक रूप से संवेदनशील बनाकर देश का जिम्मेदार नागरिक बनाए, शिक्षा ऐसी हो जो उसे जीवन में आने वाली हर चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाए।
हमारे शिक्षक कैसे हों
जून एडम्स के अनुसार- “शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया है यह क्रिया शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों के सहयोग द्वारा ही संपन्न होती है।” शिक्षक और शिक्षार्थी मिलकर ही शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को सफल बनाते हैं। आज के बदलते परिवेश में शिक्षक की भूमिका भी बदल रही है। नई-नई तकनीकों ने कक्षा-शिक्षण को नए आयाम प्रदान किए हैं। अब छात्र केन्द्रित शिक्षण पर बल दिया जा रहा है। अब कक्षाएं स्मार्ट बोर्ड, प्रोजेक्टर और इन्टरनेट से सुसज्जित है  कहीं-कहीं तो बच्चों के हाथों में प्री लोडेड कंटेंट के साथ टेबलेट भी थमाए गए हैं। इन सब गैजेट्स के बीच भी शिक्षक की भूमिका और शिक्षण- अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।
जो केवल पाठ्यक्रम को पूरा कर अपने विषय में अच्छा परिणाम लाकर संतुष्ट हो जाते हैं ,वे शिक्षक बालक का सर्वांगीण विकास नहीं कर पाते। अध्यापक ऐसे हों, जो बालक के अंतर्मन में झाँककर उसकी चेतना को जगाकर ,उसमें निहित कौशलों का विकास करने में सहायक हों। अपने ज्ञान, गुण और व्यक्तित्व से विद्यार्थियों को प्रभावित कर उनका उत्थान कर सके।
योग्य शिक्षक में अपने विषय का गहरा ज्ञान होने के साथ दूसरे विषयों के साथ अंत:सम्बन्ध जोडऩे की अनूठी कला होती है।
अच्छा शिक्षक सम्प्रेषण कौशल में भी पारंगत होता है। वह रोचक तरीके सेअपने ज्ञान को दूसरों तक पहुँचाता है।
शिक्षकों को मनोविज्ञान की जानकारी भी होनी चाहिए,ताकि वह हर उम्र के विद्यार्थियों की प्रकृति को पहचान कर उनके भावनात्मक और संवेगात्मक समस्याओं का समाधान कर सके।
शिक्षा जगत में सुधार
आज शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव की आवश्यकता महसूस की जा रही है। जिस तरह समाज के हर क्षेत्र में नित नए अनुसन्धान हो रहे हैं ऐसे ही शिक्षा के क्षेत्र में नई खोज होनी चाहिए –क्या पढ़ाया जाना चाहिए्,किसके द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए्, किस विधि से पढ़ाया जाना चाहिए्, पढ़ाने के बाद क्या परिवर्तन दृष्टिगोचर होना चाहिए् इसका व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए इसके लिए शिक्षा जगत की महत्त्वपूर्ण धुरी है शिक्षक, जिनके बारे में अक्सर ये कहा जाता है कि हमारे देश में जिन लोगों को कहीं और नौकरी नहीं मिलती वे अंतत: शिक्षण व्यवसाय से जुड़ते हैं, कुछ हद तक यह बात सही प्रतीत होती है क्योंकि जिस तरह की घटनाएँ आज समाज में घटित हो रही उसने शिक्षण-संस्थाओं और शिक्षकों की छवि को धूमिल किया है जिससे शिक्षक-चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि कुंठाग्रत, संवेदनहीन और अयोग्य लोग इस पेशे में ना आने पाएँ। चयन-प्रक्रिया उच्च स्तर की, लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं के समकक्ष हों। आकर्षक वेतन-भत्तों और सुविधाओं से शिक्षण को सम्मानजनक व्यवसाय का दर्जा दिया जाए ,ताकि विद्वान और योग्य अभ्यर्थी शिक्षण व्यवसाय को अपनाएँ। यदि गुणी लोग शिक्षा जगत से जुड़ेंगे तो स्वयमेव ही शिक्षा का स्तर ऊँचा उठेगा।
पाठ्यक्रम कैसा हो
आज शिक्षा जगत के समक्ष पाठ्यक्रम का निर्धारण एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों पुराने पाठ्यक्रम का अधिकांश भाग आज के दौर में अप्रासंगिक सिद्ध हो रहा है। आज विद्यार्थी निर्धारित पाठ्यक्रम को केवल रट रहा है उसे बस अंक चाहिए जिससे वह किसी व्यावसायिक संस्थान में प्रवेश पा सके, नौकरी पा सके। आज अपने देश में अनुसंधान के क्षेत्र में भारतीयों की संख्या कम हो रही है।
पाठ्यक्रम ऐसा हो, जो बदलते समय के अनुरूप विद्यार्थी की आवश्यकताओं और अभिरुचियों को ध्यान में रखकर बनाया जाए। करके सीखने की प्रवृत्ति पर बल दे। पाठ्यक्रम ऐसा हो, जो विभिन्न विषयों में सहसम्बन्ध स्थापित कर सके। कुल मिलाकर पाठ्यक्रम केवल परीक्षा को ध्यान में रखकर ही ना बनाया जाए बल्कि पाठ्यक्रम ऐसा हो जीवन के उद्देश्यों और मानवीय मूल्यों को भी प्रभावित कर सकें,  प्रेरित कर सके तभी वह शिक्षक और शिक्षार्थी का अभिन्न अंग बन शिक्षा को पूर्णता प्रदान कर पायेगा।
सम्पर्क: प्राचार्या, केन्द्रीय विद्यालय, पिथौरा गढ़ (उत्तराखण्ड)

ऐसे स्कूल जहाँ बच्चे पढ़ाई को बोझ नहीं समझते

ऐसे स्कूल जहाँ बच्चे पढ़ाई को
 बोझ नहीं समझते
हमारे देश का एजुकेशनसिस्टम एक ढर्रे पर चलने लगा है, जहाँ बच्चों पर किताबों और उम्मीदों का बोझ लाद कर स्कूल भेजा जाता है और वे वहाँ से होमवर्क का बोझ लेकर थके मांदे घर वापस लौटते हैं। स्कूलों की फीस में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही है, लेकिन पढऩे-पढ़ाने के तरीके में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है। इससे मुख्यधारा शिक्षा-व्यवस्था के प्रति लोगों में गहरा असंतोष बढ़ रहा है। ऐसा लगता है कि स्कूलों ने बच्चों को किताबों और क्लासरूम के बीच में फँसाकर रख दिया है, जहाँ नया सीखने-सिखाने की जगह ही नहीं बची। इसी सिस्टम के विकल्प में देश में वैकल्पिक स्कूली शिक्षा का जन्म हो रहा है। ऐसे स्कूल आमतौर पर शिक्षण के पारम्परिक तरीकों से हटकर बच्चों को अलग तरीके से सिखाने के साथ-साथ नए तरीके से सोचने का भी मौका देते हैं।
वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था भारत में नई नहीं है। पहले भी गुरुकुल, वैदिक जैसे स्कूल हुआ करते थे, जहाँ पर किताबी ज्ञान की बजाय समाज और प्रकृति के सहारे सीखने-सिखाने का काम होता था। ऐसे माहौल में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक ज्ञान की भी शिक्षा दी जाती थी। ऐसी शिक्षा बच्चों को तर्कसंगत सोच की ओर प्रोत्साहित करती थी।
हमारे देश का एजुकेशन सिस्टम एक ढर्रे पर चलने लगा है, जहाँ बच्चों पर किताबों और उम्मीदों का बोझ लाद कर स्कूल भेजा जाता है और वे वहाँ से होमवर्क का बोझ लेकर थके-माँदे घर लौटते हैं। स्कूलों की फीस में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही है, लेकिन पढ़ने-पढ़ाने के तरीके में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है। औपनिवेशिक युग के बाद हमारा सारा ध्यान अंग्रेजी शिक्षा पर हो गया और हमने बच्चों को एक दायरे में बाँधकर रख दिया। अब बच्चों से सिर्फ ये उम्मीद की जाती है, कि वे किसी भी हाल में सिर्फ अच्छे नंबर हासिल करें। उसके लिए चाहे जो करना पड़ जाए। शायद यही वजह है, कि भारत के कई राज्यों में परीक्षाओं में नकल की समस्या पैदा हो गई।
नंबरों के बोझ के चलते न जाने कितने बच्चे हर साल अपनी जान दे बैठते हैं और हम हमारी शिक्षा व्यवस्था को दोष देते हैं। आइए हम आपको रूबरू करवाते हैं कुछ ऐसे स्कूलों से जहाँ बच्चों को पारम्परिक तरीके से हटकर नये वैकल्पिक माध्यम से पढ़ाई करवाई जाती है...
ईशा होम स्कूल, कोयंबटूर
तमिलनाडु के कोयंबटूर के पास वेल्लियानगिरी पहाडिय़ों के बीच एकदम शांत वातावरण में स्थित इस स्कूल की स्थापना सदगुरू ने 2005 में की थी। इस स्कूल का मेन फोकस इस दर्शन पर होता है कि बच्चों के दिमाग को न केवल तेज और उन्हें सक्षम बनाया जाये बल्कि उनमें किसी भी चीज को गहराई से समझने और समावेशी ज्ञान की ताकत दी जाये। ईशा स्कूल में बच्चों को परीक्षा के दबाव से मुक्त रखा जाता है। इस स्कूल के साथ होम इसलिए जुड़ा है, क्योंकि ये स्कूल और घर का मिश्रण है। जहाँ बच्चों को किताबी ज्ञान के परे मानव स्वभाव के हिसाब से शिक्षा दी जाती है।
सेकमोल, लद्दाख
द स्टूडेंट एजुकेशनल ऐंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की स्थापना उन युवा लद्दाखियों ने की थी, जिन्हें अपनी पढ़ाई के दौरान तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लद्दाख के कई शिक्षित युवाओं ने देखा कि छात्र मॉडर्न एजुकेशन के दबाव में आकर सांस्कृतिक विरासत से दूर होते जा रहे हैं। इसलिए 1988 में सरकारी स्कूलों में सुधार के वास्ते इस संगठन की स्थापना की गई थी। अब यहाँ विडियो और रेडियो के माध्यम से पढ़ाई होती है। इस स्कूल की बिल्डिंग में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होता है। यहाँ ग्रामीण बच्चों को अंग्रेजी के दबाव से मुक्त किया गया और खुद का पाठ्यक्रम तैयार किया गया। पहले जहाँ बच्चों को समझाने के लिए छड़ी का इस्तेमाल किया जाता था वहीं अब यहां बच्चों को प्यार से समझाने के साथ ही उनकी खुशी का भी ध्यान रखा जाता है।
ऋषि वैली स्कूल, आँध्र प्रदेश
इस स्कूल में सिलेबस के परंपरागत विषयों के अलावा पर्यावरण, कला और संगीत और एथलेटिक्स जैसी चीजों पर भी खास ध्यान दिया जाता है। दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति ने दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में इस स्कूल की स्थापना की थी। कृष्णमूर्ति की शिक्षाएँ इस स्कूल का मूल आधार हैं। जहाँ पढ़ाई से ज्यादा एक्स्ट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। ये स्कूल प्राचीन ऋषिकोंडा पहाड़ी के बीच बसा हुआ है जहां कभी ऋषि मुनि तप किया करते थे।
शिबूमि स्कूल, बेंगलुरू
शिबूमि स्कूल भी जिद्दू कृष्णमूर्ति के दर्शन पर आधारित है। जहाँ बच्चों को पढ़ाई के साथ पूरी आजादी दी जाती है। यहाँ उनके पास अच्छा-खासा वक्त होता है, कि वे क्लास के अलावा खुद के बारे में सोच सकें, खुद को जान सकें। साउथ बेंगलुरु में सोमनहल्ली गाँव में बसे इस स्कूल में रहने की सुविधा तो नहीं है, लेकिन कुछ ही दिनों में यहाँ हॉस्टल भी बनाए जाने का प्लान है।
सह्याद्रि स्कूल, पुणे
सह्याद्रि स्कूल समुद्र तल से 770 मीटर की ऊँचाई से तिवई हिल पर स्थित है। यहाँ बच्चों को आपसी कॉम्पिटिशन पर ध्यान देने के बजाय उन्हें साथ मिलकर काम करना सिखाया जाता है। छात्र अध्यापकों के साथ अच्छा टाइम बिता सकें, इसलिए कक्षाएँ छोटी रखी गई हैं। प्रेम, दयाभाव, आपसी सम्मान जैसी चीजें सीखनी हों, तो ये स्कूल बेस्ट है।
मिरंबिका, फ्री प्रोग्रेस स्कूल, नई दिल्ली
यह स्कूल श्री अरविंद घोष की फिलॉस्फी पर चलता है। अरविंद आश्रम में ही ये स्कूल संचालित होता है। स्कूल इस फिलॉस्फी पर चलता है कि हर व्यक्ति आपके जीवन में कुछ सिखाने के उद्देश्य से आता है। इसलिए हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए और यही स्कूल की भावना भी है। यहाँ देशभर के अध्यापकों को भी ट्रेनिंग दी जाती है। मीरांबिका स्कूल में रिसर्च करने के लिए एक अलग से विभाग बनाया गया है।
अभय स्कूल, हैदराबाद
अभय स्कूल की स्थापना जून 2002 में हैदराबाद के रंगारेड्डी जिले में हुई थी। ये स्कूल वाल्ड़ोर्फ के अध्यापन से प्रेरित हैं जहाँ बाल विकास के तीन प्रमुख चरणों के दौरान उम्र के हिसाब से साइंस, आर्ट्स और ह्यूमैनिटी विषयों को पढ़ाया जाता है। स्कूल का मानना है, कि रटने वाली तकनीक की तुलना में दिल और दिमाग से सिखाया जाना ज्यादा प्रभावी होता है।
द हेरिटेज स्कूल, गुडग़ांव, रोहिणी और वसंत कुंज
हेरिटेज स्कूल एक्स्पेरिमेंटल लर्निंग में यकीन रखता है। यहाँ बच्चे बिना रोक टोक अपनी मर्जी से जो मन आता है पढ़ते हैं। स्कूल का मानना है कि जब बच्चे किसी मुश्किल में फँसेंगे और खुद से उसका समाधान करने की कोशिश करेंगे तो उनका दिमाग और तेजी से विकसित होगा। सीखने की प्रक्रिया को इस स्कूल ने काफी मजेदार बना दिया है। इसीलिए यहाँ बच्चों में गजब की क्रिएटिविटी देखी जा सकती है।
मैरुडैम फार्म स्कूल
मैरुडैम फार्म स्कूल को 2009 में दुनिया के अलग-अलग कल्चर और सोशल बैकग्राउंड के छात्रों और अध्यापकों ने स्थापित किया था। यहाँ का पाठ्यक्रम तमिल और अंग्रेजी दोनों भाषाओं को बराबर महत्त्व देता है। यहाँ बच्चों को पर्यावरण के प्रति प्रेम पैदा करने में खास ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा ऑर्गैनिक फार्मिंग और पेड़ पौधों की देखभाल करना भी सिखाया जाता है। आर्ट, क्राफ्ट और स्पोर्ट्स जैसी चीजों में यहाँ के स्टूडेंट्स अव्वल हैं। स्कूल का मकसद है, कि बच्चे हमारे समाज और पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील बनें।
सेंटर फॉर लर्निंग, बेंगलुरु
इस अनोखे स्कूल में प्रयोग के माध्यम से बच्चों को सिखाने का प्रयास किया जाता है। सुबह सात बजे कैंपस में पक्षियों की चहचहाहट दिन की शुरुआत होती है। सारे बच्चों को मॉर्निंग वॉक पर भेजा जाता है। फिर वहाँ से आने के बाद टीचर और स्टूडेंट्स मिलकर सुबह का नाश्ता तैयार करते हैं। यहाँ टीचर-स्टूडेंट एक ही हॉस्टल में रहते हैं। सब मिलकर सारे काम निपटाते हैं। फिर असेंबली के लिए सब इकट्ठे होते हैं। जिसके बाद क्लासेज शुरू होती हैं। कुल मिलाकर बच्चों की खुशी का यहाँ खास ध्यान रखा जाता है।
द स्कूल,KFI, चेन्नई
ये स्कूल चेन्नई के सबसे पुराने और सबसे ज्यादा पॉपुलर स्कूलों में से एक है। 1973 में कृष्णमूर्ति फाउंडेशन ने स्कूल की स्थापना की थी, बाद में ये थियोसोफिकल सोसाइटी के दामोदर गार्डन में शिफ्ट हो गया। स्कूल के छात्र और टीचर्स जे. कृष्णमूर्ति की शिक्षाओं पर बल देते हैं। ये स्कूल ISC बोर्ड से मान्यता प्राप्त है। (साभार- hindi.yourstory.com)