मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Feb 23, 2018

छत्तीसगढ़ का राजिम कुम्भ : आस्था और सभ्यता का संगम


राजिम का स्थान छत्तीसगढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में आता है। यह महानदी के तट पर स्थित है। प्राचीन समय से राजिम अपने पुरातत्त्वों  और प्राचीन सभ्यताओं के लिए प्रसिद्ध है।  राजिम मुख्य रूप से भगवान श्री राजीव लोचन जी के मंदिर के कारण प्रसिद्ध है। राजीवलोचन मंदिर में भगवान विष्णु की प्रस्तर प्रतिमा प्रतिष्ठित हैं। राजिम का यह मंदिर आठवीं शताब्दी का है। यहाँ कुलेश्वर महादेव जी का भी मंदिर है जो संगम स्थल पर विराजमान है।
 राजिम में प्रति वर्ष होने वाले कुम्भ मेले का स्वरूप पहले ऐसा नहीं था।  कुछ वर्ष पहले तक यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक पंद्रह दिनों का मेला लगता था।2001 से राजिम मेले को राजीव लोचन महोत्सव के रूप में मनाया जाता था। 2005 से इसे कुम्भ के रूप में मनाया जाने लगा है जो राजिम कुम्भ के नाम से जाना जाता है।  प्रतिवर्ष राजिम कुम्भ का आयोजन छत्तीसगढ़ शासन के धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व तथा पर्यटन एवं संस्कृति विभाग करता है। प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक चलने वाले राजिम कुम्भ का मेले में प्रशासन द्वारा विविध सांस्कृतिक व धार्मिक आयोजन आदि होते रहते हैं।
 कुम्भ की शुरुआत कल्पवाश से होती है पखवाड़े भर पहले से श्रद्धालु पंचकोशी यात्रा प्रारंभ कर देते है पंचकोशी यात्रा में श्रद्धालु पटेश्वर, फिंगेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर तथा चम्पेश्वर नाथ के पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धुनी रमाते हैं, 101 कि.मी. की यात्रा का समापन होता है और माघ पूर्णिमा से कुम्भ का आगाज होता है। राजिम कुम्भ में अब विभिन्न स्थानों से हजारों साधु- संतों का आगमन होता है, प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में नागा साधू, संत आदि आते हैं। शाही स्नान तथा संत समागम में भाग लेते है, इस महाकुम्भ में विभिन्न राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते है और भगवान श्री राजीव लोचन, तथा श्री कुलेश्वर नाथ महादेव जी के दर्शन करते हैं।  मान्यता है की भनवान जगन्नाथपुरी जी की यात्रा तब तक पूरी नही मानी जाती जब तक भगवान श्री राजीव लोचन तथा श्री कुलेश्वर नाथ के दर्शन नहीं कर लिए जाते।
राजिम तीन नदियों का संगम है। महानदी, पैरी और सोंढुर नदी। त्रिवेणी संगम होने के कारण राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहलाने का भी गौरव प्राप्त है। संगम में अस्थि विसर्जन तथा संगम किनारे पिंडदान, श्राद्ध एवं तर्पण किया जाता है। संगम के बीचोबीच कुलेश्वर महादेव का विशाल मन्दिर बना हुआ है। किंवदन्ती है कि त्रेता युग में अपने वनवास काल के समय भगवान श्री राम ने इस स्थान पर अपने कुलदेवता महादेव जी की पूजा की थी इसलिये इस मन्दिर का नाम कुलेश्वर हुआ।
प्राचीनकाल में राजिम को कमलक्षेत्र के नाम से जाना जाता था। माना जाता है कि शेषशैय्या पर सोये हुए भगवान विष्णु के नाभि से निकला कमल, जिससे ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई थी, यहीं पर स्थित था जिससे इसका नाम कमलक्षेत्र पड़ा। ब्रह्मा जी ने राजिम से ही सृष्टि की रचना की थी।
इस प्राचीन नगरी का नाम राजिम क्यों पड़ा, इस संबंध में किंवदंती है कि राजिम नामक तेलिन महिला को भगवान विष्णु की आधी मूर्ति मिली, दुर्ग नरेश रत्नपुर सामंत वीरवल जयपाल को स्वप्न हुआ, तब एक विशाल मंदिर बनवाया। तेलिन ने नरेश को इस शर्त के साथ मूर्ति दिया कि भगवान के साथ उनका भी नाम जुडऩा चाहिए। इसी कारण इस मंदिर का नाम राजिमलोचन पड़ा, जो बाद में राजीव लोचन कहलाने लगा।
एक स्थानीय दंतकथा के अनुसार इस स्थान का नाम 'राजिवया 'राजिमनामक एक तैलिक स्त्री के नाम से हुआ था। मन्दिर के भीतर 'सतीचैराहै, जिसका संबंध इसी स्त्री से हो सकता है। मंदिर के अहाते में आज भी एक स्थान राजिम के लिए सुरक्षित है। वह भगवान को देखते सती हो गई थी।
राजीवलोचन मन्दिर
इस मन्दिर में बारह स्तम्भ हैं। आयताकार क्षेत्र के मध्य स्थित मंदिर के चारों कोण में अष्ट भुजा वाली दुर्गा, गंगा-यमुना और विष्णु के विभिन्न अवतारों, जैसे- राम, वराह अवतार, वामन अवतार, नृसिंह अवतार तथा बद्रीनाथ जी आदि के चित्र बने हुए हैं।
गर्भगृह में पालनकर्ता लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की श्यामवर्णी चतुर्भुजी मूर्ति है जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है। 12 खंबों से सुसज्जित महामंडप में श्रेष्ठ मूर्तिकला का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। आसन लगाकर बैठे भगवान श्री राजीवलोचन की प्रतिमा आदमकद मुद्रा में सुशोभित है। शिखर पर मुकुट, कर्ण में कुण्डल, गले में कौस्तुभ मणि के हार, हृदय पर भृगुलता के चिह्नांकित, देह में जनेऊ, बाजूबंद, कड़ा व कटि पर करधनी का सुअंकन है। राजीवलोचन का स्वरूप दिन में तीन बार बाल्यकाल, युवा व प्रौढ़ अवस्था में समयानुसार बदलता रहता है।
यहाँ से प्राप्त दो अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इस मन्दिर के निर्माता राजा जगतपाल थे। इनमें से एक अभिलेख राजा वसंतराज से सम्बन्धित है, किंतु लक्ष्मणदेवालय के एक दूसरे अभिलेख से विदित होता है कि इस मन्दिर को मगध नरेश सूर्यवर्मा (8वीं शती ई.) की पुत्री तथा शिवगुप्त की माता 'वासटाने बनवाया था। राजीवलोचन मन्दिर के पास 'बोधि वृक्षके नीचे तपस्या करते बुद्ध की प्रतिमा भी है।
मन्दिर के स्तंभ पर चालुक्य नरेशों के समय में निर्मित नरवराह की चतुर्भुज मूर्ति उल्लेखनीय है। वराह के वामहस्त पर भू-देवी अवस्थित हैं। शायद यह प्रदेश से प्राप्त प्राचीनतम मूर्ति है।
राजिम से पांडुवंशीय कोसल नरेश तीवरदेव का ताम्रदानपट्ट प्राप्त हुआ था, जिसमें तीरदेव द्वारा 'पैठामभुक्तिमें स्थित पिंपरिपद्रक नामक ग्राम के निवासी किसी ब्राह्मण को दिए गए दान का वर्णन है। यह दानपट्ट तीवरदेव के 7वें वर्ष श्रीपुर (सिरपुर) से प्रचलित किया गया था। फ़्लीट के अनुसार तीवरदेव का समय 8वीं शती ई. के पश्चात् माना जाना चाहिए।
कुलेश्वर महादेव मन्दिर
राजिम में 'कुलेश्वर महादेव मन्दिरभी प्रमुख है, जो की नौवीं शताब्दी में स्थापित हुआ था। यह मन्दिर महानदी के बीच में द्वीप पर बना हुआ है। इसका निर्माण बड़ी सादगी से किया गया है। मन्दिर के पास 'सोमा’ , 'नालाऔर कलचुरी वंश के स्तम्भ भी पाए गए हैं।
 बरसात के दिनों में बाढ़ का पानी कई-कई दिनों तक मंदिर को डुबोए रखता है। मंदिर का आकार 37.75 गुना 37.30 मीटर है। इसकी ऊंचाई 4.8 मीटर है। मंदिर का अधिष्ठान भाग तराशे हुए पत्थरों से बना है। रेत एवं चूने के गारे से चिनाई की गई है। इसके विशाल चबूतरे पर तीन तरफ से सीढिय़ाँ बनी है। इसी चबूतरे पर पीपल का एक विशाल पेड़ भी है। चबूतरा अष्टकोणीय होने के साथ ऊपर की ओर पतला होता गया है। मंदिर निर्माण के लिए लगभग 2 कि.मी. चौड़ी नदी में उस समय निर्माताओं ने ठोस चट्टानों का भूतल ढूंढ निकाला था।
मामाभांजे का  मंदिर
नदी के किनारे पर एक और महादेव मंदिर है, जिसे मामा का मंदिर कहा जाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर को भांजे का मंदिर कहते हैं। किवदंती है कि बाढ़ में जब कुलेश्वर महादेव का मंदिर डूबता था तो वहाँ से आवाज आती थी, मामा बचाओ। इसी मान्यता के कारण यहाँ आज भी नाव पर मामा-भांजे को एक साथ सवार नहीं होने दिया जाता है। नदी किनारे बने मामा के मंदिर के शिवलिंग को जैसे ही नदी का जल छूता है उसके बाद बाढ़ उतरनी शुरू हो जाती है।

प्रेरक

ज़िंदगी को मुश्किल बनाने वाले 
सात अचेतन विचार
हम लोगों में से बहुत से जन अपने मन में चल रहे फालतू के या अतार्किक विचारों से परेशान रहते हैं जिसका हमारे दैनिक जीवन और कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ये विचार सफल व्यक्ति को असफल व्यक्ति से अलग करते हैं। ये प्रेम को नफऱत से और युद्ध को शांति से पृथक करते हैं, ये विचार सभी क्लेशों और युद्धों की जड़ हैं क्योंकि अचेतन एवं अतार्किक विचारधारा ही सभी युद्धों को जन्म देती है।
इस पोस्ट में मैं ऐसे 7 अतार्किक व अचेतन विचारों पर कुछ दृष्टि डालूँगा और आशा करता हूँ कि आपको इस विवेचन से लाभ होगा (यदि आप इनसे ग्रस्त हों, तो)
1. यदि कोई मेरी आलोचना कर रहा है तो मुझमें अवश्य कोई दोष होगा।
लोग एक-दूसरे की अनेक कारणों से आलोचना करते हैं। यदि कोई आपकी आलोचना कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपमें वाकई कोई दोष या कमी है। आलोचना का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि आपके आलोचक आपसे कुछ भिन्न विचार रखते हों। यदि ऐसा है तो यह भी संभव है कि उनके विचार वाकई बेहतर और शानदार हों। यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि बिना किसी मत-वैभिन्य के यह दुनिया बड़ी अजीब जगह बन जाएगी ।
2. मुझे अपनी ख़ुशी के लिए अपने शुभचिंतकों की सुझाई राह पर चलना चाहिए।
बहुत से लोगों को जीवन में कभी--कभी ऐसा विचार आता है हालाँकि यह विचार तब घातक बन जाता है जब यह मन के सुप्त कोनों में जाकर अटक जाता है और विचलित करता रहता है। यह तय है कि आप हर किसी को हर समय खुश नहीं कर सकते इसलिए ऐसा करने का प्रयास करने में कोई सार नहीं है। यदि आप खुश रहते हों या खुश रहना चाहते हों तो अपने ही दिल की सुनें। दूसरों के हिसाब से ज़िंदगी जीने में कोई तुक नहीं है पर आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आपके क्रियाकलापों से किसी को कष्ट न हो। दूसरों की बातों पर ध्यान देना अच्छी बात है पर उन्हें खुश और संतुष्ट करने के लिए यदि आप हद से ज्यादा प्रयास करेंगे तो आपको ही तकलीफ होगी।
3. यदि मुझे किसी काम को कर लेने में यकीन नहीं होगा तो मैं उसे शुरू ही नहीं करूँगा।
इस विचार से भी बहुत से लोग ग्रस्त दिखते हैं। जीवन में नई चीजों करते रहना बढऩे और विकसित होने का सबसे आजमाया हुआ तरीका है। इससे व्यक्ति को न केवल दूसरों के बारे में बल्कि स्वयं को भी जानने का अवसर मिलता है। हर आदमी हर काम में माहिर नहीं हो सकता पर इसका मतलब यह नहीं है कि आपको केवल वही काम हाथ में लेने चाहिए जो आप पहले कभी कर चुके हैं। वैसे भी, आपने हर काम कभी--कभी तो पहली बार किया ही था।
4. यदि मेरी जिंदगी मेरे मुताबिक नहीं चली तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है।
मैं कुछ कहूँ? सारी गलती आपकी है। इससे आप बुरे शख्स नहीं बन जाते और इससे यह भी साबित नहीं होता कि आप असफल व्यक्ति हैं। आपका अपने विचारों पर नियंत्रण है इसलिए अपने कर्मों के लिए भी आप ही जवाबदेह हैं। आपके विचार और कर्म ही आपके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। यदि आप अपने जीवन में चल रही गड़बडिय़ों के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराएँगे तो मैं यह समझूँगा कि आपका जीवन वाकई दूसरों के हाथों में ही था। उनके हाथों से अपना जीवन वापस ले लें और अपने विचारों एवं कर्मों के प्रति जवाबदेह बनें।
5. मैं सभी लोगों से कमतर हूँ।
ऐसा आपको लगता है पर यह सच नहीं है। आपमें वे काबिलियत हैं जिन्हें कोई छू भी नहीं सकता और दूसरों में वे योग्यताएँ हैं जिन्हें आप नहीं पा सकते। ये दोनों ही बातें सच हैं। अपनी शक्तियों और योग्यताओं को पहचानने से आपमें आत्मविश्वास आएगा और दूसरों की सामर्थ्य और कुशलताओं को पहचानने से उनके भीतर आत्मविश्वास जगेगा। आप किसी से भी कमतर नहीं हैं पर ऐसे बहुत से काम हो सकते हैं जिन्हें दूसरे लोग वाकई कई कारणों से आपसे बेहतर कर सकते हों इसलिए अपने दिल को छोटा न करें और स्वयं को विकसित करने के लिए सदैव प्रयासरत रहें।
6. मुझमें ज़रूर कोई कमी होगी तभी मुझे ठुकरा दिया गया।
यह किसी बात का हद से ज्यादा सामान्यीकरण कर देने जैसा है और ऐसा उन लोगों के साथ अक्सर होता है जो किसी के साथ प्रेम-संबंध बनाना चाहते हैं। एक या दो बार ऐसा हो जाता है तो उन्हें लगने लगता है कि ऐसा हमेशा होता रहेगा और उन्हें कभी सच्चा प्यार नहीं मिल पायेगा। प्यार के मसले में लोग सामनेवाले को कई कारणों से ठुकरा देते हैं और ऐसा हर कोई करता है। इससे यह साबित नहीं होता कि आप प्यार के लायक नहीं हैं बल्कि यह कि आपका उस व्यक्ति के विचारों या उम्मीदों से मेल नहीं बैठता, बस इतना ही।
7. यदि मैं खुश रहूँगा तो मेरी खुशियों को नजऱ लग जाएगी।
यह बहुत ही बेवकूफी भरी बात है। आपकी ज़िंदगी को भी खुशियों की दरकार है। आपका अतीत बीत चुका है। यदि आपके अतीत के काले साए अभी भी आपकी खुशियों के आड़े आ रहे हों तो आपको इस बारे में किसी अनुभवी और ज्ञानी व्यक्ति से खुलकर बात करनी चाहिए। अपने वर्तमान और भविष्य को अतीत की कालिख से दूर रखें अन्यथा आपका भावी जीवन उनसे दूषित हो जाएगा और आप कभी भी खुश नहीं रह पायेंगे। कोई भी व्यक्ति किसी की खुशियों को नज़र नहीं लगा सकता।
इन अचेतन विचारों से कैसे उबरें?
यह बहुत आसान है। जब भी आपके मन में कोई अचेतन या अतार्किक विचार आये तो आप उसे लपक लें और अपनी विचार प्रक्रिया का अन्वेषण करते हुए उसमें कुछ मामूली फेरबदल कर दें,कुछ इस तरह-
सोचिये कि आप किसी शानदार दिन अपनी प्रिय शर्ट पहनकर जा रहे हैं और एक चिडिय़ा ने उसपर बीट कर दी। ऐसे में आप सोचेंगे-
-'ये हमेशा मेरे साथ ही क्यों होता है!?’
इसकी जगह आप यह कहें-
-अरे यार, 'अब तो इस शर्ट को धोना पड़ेगा
अपनी बातों में 'हमेशाको खोजें, जो कि अमूमन सही जगह प्रयुक्त नहीं होता। यदि वाकई आपके ऊपर चिड़ियाँ'हमेशाबीट करतीं रहतीं तो कल्पना कीजिए आप कैसे दिखते। अबसे आप इस तरह की बातें करने से परहेज़ करें। एक और उदाहरण-
'मैं हमेशा ही बारिश में फँस जाता हूँ’ (यदि यह सच होता तो आप इंसान नहीं; बल्कि मछली होते)
'मैं/मुझे, कभी नहींउदाहरण- 'मुझे पार्किंग की जगह कभी नहीं मिलती’ (यदि यह सच होता ,तो आप अपनी गाड़ी के भीतर ही कैद सुबह से शाम तक घूमते रहते)
'मैं, नहीं कर सकताउदाहरण- 'मैं दो मील भी पैदल नहीं चल सकता’- (कभी कोशिश की?)
'मुझसे, करते नहीं बनताउदाहरण- 'मुझसे कई लोगों के सामने बोलते नहीं बनता’- (ऐसा आप अपने परिजनों/दोस्तों यानी कई लोगों के सामने ही बोलते हैं)
'कितनी बुरी बात है कि- उदाहरण- 'कितनी बुरी बात है कि सुबह से बारिश हो रही है’ (छोड़िए भी, इतनी भी बुरी बात नहीं है)
इसी तरह के और भी अचेतन व अतार्किक विचार हो सकते हैं जिनकी हमें पहचान करनी है और समय रहते ही उन्हें सकारात्मक विचार से बदल देना है। मुझे आशा है कि इस पोस्ट से आपको अपने जीवन में बदलाव/रूपांतरण लाने के कुछ सूत्र अवश्य मिले होगे। कोई भी बदलाव सहज नहीं होता बल्कि उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है। यदि पोस्ट में लिखी बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद आप उन्हें अपने जीवन में उतरने का प्रयास करेंगे तो आपको कुछ सफलता ज़रूर मिलगी। (हिन्दी ज़ेन से)

चार कविताएँ

1. ले आए बगिया से 
- अनुभूति गुप्ता     
ले आए बगिया से
फूलों को नोंचकर,
बगिया को चिन्तित
होने को छोड़कर।
अब-
क्या करोगे इनका
सुगन्ध से इनकी
अभिभूत होगे?
फिर, कुछ मिनटों बाद
गैलरी में हाथों से
मसलकर फेंक दोगे।

क्या मिलता है
तुम्हें ये सब करके?
बगिया के हृदय को
दु:खों से भरके।

बड़ा मदमाते हो
हँसते हो अभिमान से,
स्तर में हीन हो
तुम तो
ड्योढ़ी पर पड़े
पायदान-से।
 2. अनाम यात्राएँ

 हाँ,
तुम्हीं हो:
हृदय में लिए हुए
सम्भावनाएँ-असम्भावनाएँ अपनी
नई-नई युक्तियाँ
सुझाते हुए-
हँसते-गाते, उन्मादी जगत के
क्रिया-कलाप को
समझाते हुए।
समझ लेती हूँ तुम्हें
नएपन से, अपनेपन से,
दिए हुए
अनगिनत सुझावों में,
मुख पर छाए
हुए उलझे हुए तुम्हारे भावों में।
क्या समझा भी
पाती हूँ तुम्हें मैं ?
नए अर्थो में, सुन्दर पंक्तियों में,
शब्दों की कौंधायी आँखों में,
शब्दों की देह पर
गिरती-उठती मात्राओं में,
सरल भाषाओं में,
यह रहस्य-
जीवन की अनाम यात्राओं का।
 3. घडिय़ाँ नहीं सोचती
घडिय़ाँ नहीं
सोचती हैं
टिक-टिक करने से पहले
उनकी नियति में हैं
हर किसी को
सही समय बतलाना
वे,
नहीं देखती हैं
अमीरी-गऱीबी को।
जिस क्षण
चुप्पी भर लेंगे
इन घडिय़ों के काटे
उसी क्षण
समझ जाना
रातों रात-
जि़न्दगी बदल जाएगी
सबकुछ
उथल-पुथल हो जाएगी ।
हरी-भरी धरती
त्रास से भर जाएगी ।
घाटियाँ
चीखेंगी
चिल्लाएँगी,
पक्षियों का रुदन सुनाई देगा।
समुद्र के गले से
चीखें
ऊपर की ओर उठेगी,
ज्वालामुखी
आक्रोश से फटेगा।
नदियाँ बाढ़ ले आएँगी।
शहर के टॉवर
सभी मीनारें
गाँव के खेत-खलियान
सब डूब जाएँगे।
माहमारी से
लोग मरने लगेंगे।
और
मन को समझाना
कठिन होगा
कि-
दुनिया का अन्त
बहुत नज़दीक होगा।
 4. गन्तव्य
मैं
अनन्त यात्रा
पर हूँ
पग-पग पर
काँटे बिछे हुए हैं।
पैरों के छाले
नजऱअंदाज़ करती हुई
बढ़ रही हूँ-
अपने गन्तव्य की ओर।
अँधेरी गुफाओं के,
मुँह से होते हुए
आ रही हूँ
चट्टानों की ओर।
दूरी से चट्टानें
स्वभाव की
सख्त लगती हैं।
पास से,
लाचार-बेबस
खुरदरे तन को लिये खड़ी हैं।
बीच-बीच में
काले-काले बादलों का गरजना
तेज़-तेज़ हवाओं का बहना
यात्रा में बाधाएँ
उत्पन्न करना
मन को विचलित सा करता है,
परन्तु-
एक ओर से
बढ़ता हुआ प्रकाश
उम्मीद की
किरण लाया है,
पर्वतों के मुख पर-
चमकीली
गहराती धूप का
खिलता हुआ साया है।


सम्पर्कः 103, कीरतनगर, निकट, डी.एम. निवास, लखीमपुर खीरी- 262701 उ.प्र., मो. 9695083565, Email- ganubhuti53@gmail.com

स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है झपकी

स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है
 झपकी
- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
साठ साल पहले एला फिट्ज़गैराल्ड गाया करती थी: परिंदे करते हैं, मधुमक्खियाँ करती हैं। हालांकि उनका आशय प्यार करने से था, मगर हम इस पंक्ति में प्यार की जगह नींद भी रख सकते हैं। नींद सभी प्राणियों के दैनिक जीवन का एक ज़रूरी पहलू है। यह न केवल आराम और आरोग्यता देती है बल्कि स्वयं मस्तिष्क को व्यवस्थित करने में भी मदद करती है।
और तो और, मछलियाँ भी सोती हैं, हालांकि खुली आंखों के साथ। डॉल्फिन जैसी बड़ी मछलियाँ भी रोज़ाना 10 घंटे से ज़्यादा सोती हैं। नींद की भूमिका की समझ जंतुओं, खासकर स्तनधारियों और अंतत: हम मनुष्यों के विकास के सुराग प्रदान करती है। कुत्ते एक दिन में 12-14 घंटे सोते हैं लेकिन इस दौरान बहुत चौकन्ने रहते हैं। इसे देखकर ही भारतीय मुनियों ने छात्रों के लिए कुत्तों जैसी नींद (श्वान-निद्रा) की सलाह दी है। जैव विकास की सीढ़ी में उससे ऊपर चलें तो बोनट बंदर 12 घंटे या उससे भी ज़्यादा की नींद लेता है। चिंम्पैज़ी (मानव के निकटतम जीव) भी 10 घंटे की नींद लेते हैं जबकि हम मनुष्य दिन में 8 घंटे ही सोते हैं।
दिलचस्प बात है कि बोनट बंदर तो कहीं भी सो जाता है जबकि चिम्पैंज़ी सोने के लिए पेड़ पर बिस्तर (पत्तियों और शाखाओं को इकट्ठा करके) बिछाता है और 10 या ज़्यादा घंटे या उससे ज़्यादा आराम फरमाता है। ओरांगुटान बंदर भी इसी तरह से अपना बिस्तर बिछाता है लेकिन वह रोज़ाना नया बिस्तर बिछाता है और अपने आपको पत्तियों, टहनियों से ढक लेता है ताकि शिकारियों और रक्त चूसने वाले कीटों से सुरक्षा हो सके। ड्यूक युनिवर्सिटी के डॉ. डेविड आर. सैमसन ने सावधानीपूर्वक इन विकसित वानरों के नींद के घंटे और पैटर्न देखे और उनकी तुलना अफ्रीका के शिकारी-संग्रहकर्ता मनुष्यों और यूएस के आधुनिक मनुष्यों से की।
उन्होंने जंतुओं, वनमानुषों और मनुष्यों की नींद (कितनी लंबी और कितनी गहरी) और संज्ञान क्षमता के बीच सम्बन्ध बताया। यह तथ्य कि ओरांगुटान और चिम्पैंज़ी बिस्तर बिछाते हैं और अपने आपको सुरक्षित रूप से ढक लेते हैं ताकि लंबी और गहरी नींद सो सकें, उनकी सोचने, नवाचार करने और स्वयं की रक्षा करने की क्षमता की ओर इशारा करता है। जब सैमसन ने उनके सोने के पैटर्न को देखा तो पाया कि वे नींद के दौरान रेपिड आई मूवमेंट (आरईएम) वाली निद्रा सिर्फ 18 प्रतिशत समय ही सोते हैं। आरईएम निद्रा इंगित करती है कि इस दौरान सपने देखने, यादों को संग्रहित करने और पुनरावृत्ति करने से मस्तिष्क और शरीर को ऊर्जा मिलती है और याददाश्त, सीखना और दूसरे संज्ञानात्मक कार्य होते हैं। और बाकी 10 घंटों की 82 प्रतिशत गहरी और आरामदायक नींद होती है। इसकी तुलना में बोनट बंदर में आरईएम नींद केवल 12 प्रतिशत होती है और बाकी 88 प्रतिशत गैर-आरईएम नींद होती है।
सभी प्रजातियों में आरईएम नींद का प्रतिशत मौटे तौर पर संज्ञान, मस्तिष्क के विकास और उसकी गतिविधि से देखा गया है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण नवजात मनुष्य शिशु में देखा जा सकता है। आरईएम नींद सबसे ज़्यादा बढ़ते नवजातों में होती है (अक्सर 50 प्रतिशत से ज़्यादा) जो यह इंगित करती है कि उनका मस्तिष्क जानकारी के संग्रहण, समेकन, व्यवस्थित करने और उपयोग करने में लगा हुआ है। उम्र के साथ आरईएम नींद कम होती जाती है और 65 की उम्र तक 22 प्रतिशत बच जाती है। (जापानी प्राइमेट वैज्ञानिकों ने आरईएम में उम्र-आधारित ऐसा ही पैटर्न चिम्पैंज़ी में भी देखा है)
उस समय क्या हुआ होगा जब आदिमानव शिकारी-संग्रहकर्ता समूह गांवों में बसने लगे और आग जलाना, रहने के लिए घर बनाना, खेतीबाड़ी करना आदि तकनीकों की खोज की। सचमुच, इसी के साथ सोने-जागने के पैटर्न भी बदले। डॉ. सैमसन और उनके साथी तंज़ानिया की शिकारी जनजातियों (हाडज़ास का एक समूह जो आज भी अस्तित्व में है) के सोने-जागने के पैटर्न की तुलना यूएस के पश्चिमी आधुनिक मनुष्यों से करने में कामयाब हुए हैं। इससे सम्बंधित पर्चा हाल ही में अमेरिकन जर्नल ऑफ फिज़ियोलॉजी एंड एंथ्रोपोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। ये आदिवासी प्राकृतिक रूप से जीते हैं और इनके शरीर की दैनिक घड़ी सूरज और चाँद जैसे रोशनी के स्रोतों से जुड़ी है। इसके विपरीत हम आधुनिक मनुष्य कृत्रिम रोशनी का उपयोग करते हैं और बंद कमरे में सोते हैं और मनुष्य-निर्मित दिनचर्या को जीते हैं। इस प्रकार हमारे शरीर की घड़ी प्राकृतिक नहीं रही है।
डॉ. सैमसन और डॉ. नन ने इवॉल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी में 2015 के अपने पर्चे में लिखा था कि जब उन्होंने नींद पैटर्न की तुलना की तो पाया कि हाडज़ास प्रतिदिन केवल 6.25 घंटों की नींद ही ले पाते हैं और उसकी कार्यक्षमता मात्र 69 प्रतिशत होती है। इसकी तुलना में आधुनिक मानव 8 घंटों की लंबी और गहरी नींद सोते हैं, जिसकी कार्यक्षमता 90-94 प्रतिशत होती है। शिकारी शिकारी संग्रहकर्ता चौकन्ने होकर सोते हैं। किसी भी गड़बड़ी के प्रति सचेत, जैसे जानवरों से खतरा, आसपास का शोर, मौसमी उतार-चढ़ाव वगैरह। जबकि आधुनिक मनुष्य अपने सुरक्षित परिवेश की बदौलत इन सबसे मुक्त आराम से सोते हैं।
एक मायने में ये आदिमानव श्वान-निद्रा लेते हैं, चौकन्ने और तैयारी के साथ लेकिन जितना हम सोचते हैं उससे बहुत कम समय के लिए। हालांकि वे दोपहर में 90 मिनिट या अधिक की झपकी ले कर इसकी पूर्ति कर लेते हैं। यह एक बात है जिसे हम आधुनिक मनुष्यों को सीखने की ज़रूरत है। शुक्र है कि दोपहर की यह झपकी या स्पेनिश में सिएस्टा अब भी युरोप के कुछ हिस्सों में प्रचलन में है। स्लीप फाउंडेशन संस्था दोपहर की झपकी का गुणगान करती है। उनका कहना है कि झपकी सतर्कता को बहाल करती है, कार्य निष्पादन को बेहतर बनाती है और गलतियों और दुर्घटनाओं को कम करती है। नासा द्वारा फौजी पायलटों और अंतरिक्ष यात्रियों पर किए गए अध्ययन में पाया गया है कि 40 मिनट की झपकी उनके प्रदर्शन को 34 प्रतिशत और सतर्कता को 100 प्रतिशत तक बढ़ा देती है। अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सही है तो हमारे लिए भी सही होगा। (स्रोत फीचर्स)
नींद की कमी कोशिकाओं को बूढ़ा करती है
नींद की कमी या अनिद्रा हम सभी के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती है। इसकी वजह से चिड़चिड़ापन, हाथ-पैरों में दर्द वगैरह पैदा होते हैं; किंतु बच्चों में कुछ अन्य प्रभाव होते हैं।
बच्चों में अनिद्रा की वजह से उनकी कोशिकाएँ जल्दी बूढ़ी होती हैं जिसका स्वास्थ्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। दरअसल कोशिका की उम्र का सम्बंध उसके गुणसूत्रों पर पाई जाने वाली रचना टीलोमीयर से है।
गुणसूत्रों के अंत में टोपी समान संरचना टीलोमीयर कहलाती है। कोशिकाओं के प्रत्येक विभाजन पर यह छोटी होती जाती है और जब यह बहुत छोटी हो जाती है तो वह कोशिका विभाजन नहीं कर सकती। वयस्कों पर किए गए अध्ययन से लगता है कि टीलोमीयर की लंबाई का सम्बन्ध नींद से है।
प्रिंसटन युनिवर्सिटी की सारा जेम्स और डेनियल नोटरमैन ने अपनी टीम के साथ मिलकर यूएस के 9 वर्ष की उम्र के 1567 बच्चों की नींद की अवधि का डैटा इकट्ठा किया। इसके अलावा उन्होंने बच्चों की लार के सेम्पल इकट्ठा किए। इस लार के सेम्पल से डीएनए को अलग करके टीलोमीयर की लंबाई का आकलन किया।
उन्होंने पाया कि जो बच्चे कम सोते हैं उनका टीलोमीयर छोटा था। दी जर्नल ऑफ पिडियाट्रिक्स में प्रकाशित शोध पत्र के मुताबिक जो बच्चे कम सोते थे ,उनके टीलोमीयर की लंबाई नींद में प्रत्येक घंटे की कमी से 1.5 प्रतिशत छोटी होती है बजाय पूरी रात सोने वाले बच्चों के।
टीलोमीयर के छोटे आकार का सम्बन्ध कैंसर, हृदय सम्बन्धी बीमारियों और संज्ञान में गिरावट से देखा गया है ;लेकिन इन बच्चों की कम उम्र के चलते उनमें ऐसी किसी भी बीमारी के संकेत तो दिखाई नहीं दिए। जेम्स का कहना है कि अनिद्रा की वजह से बाद की उम्र में इन बीमारियों के जोखिम ज़्यादा हो सकते हैं।
कुछ अध्ययनों से पता चला है कि वयस्कों के लिए अनिद्रा के साथ-साथ ज़्यादा सोना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लेकिन इस अध्ययन में प्रतिभागी बच्चों में ज़्यादा सोने का सीधा सम्बन्ध टीलोमीयर की अधिक लंबाई के साथ देखा गया है।
हालांकि शोधकर्ता अभी यह नहीं जानते कि इन बच्चों को ज़्यादा नींद मिले तो टीलोमीयर दुबारा ठीक हो सकते हैं या नहीं;  लेकिन इस उम्र के बच्चों के लिए यह ज़रूरी है कि वे 9 से 11 घंटों की नींद लें। (स्रोत फीचर्स)