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Nov 19, 2017

प्रदूषण से बढ़ती मौतें

प्रदूषण से बढ़ती मौतें 
-प्रमोद भार्गव
लैंसेट मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट को मानें तो भारत की आबोहवा इतनी दूषित हो गई है कि सर्वाधिक मौतों का कारण बन रही हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में भारत में करीब 25 लाख लोगों की मौत प्रदूषणजनित बीमारियों की वजह से हुई है। विश्व के अन्य किसी देश में इतनी मौतें प्रदूषण के कारण नहीं हुई हैं। भारत के बाद चीन का स्थान है जहाँ 18 लाख लोग प्रदूषण से मरे हैं।
अध्ययन से पता चला है कि प्रदूषण से हुई मौतों में से अधिकांश मौतें हृदय आघात, मधुमेह, रक्तचाप, दमा और फेफड़ों में कैंसर जैसे रोगों से हुई हैं। प्रदूषण जनित बीमारियों की देख-रेख का खर्च भी बहुत अधिक है। विश्व में हर साल करीब 46 खरब डॉलर का नुकसान इसके कारण होता है। आई.आई.टी., दिल्ली व इकहान स्कूल ऑफ मेडिसिन के अध्ययन के अनुसार 92 प्रतिशत मौतें भारत व अन्य निम्न व मध्य आमदनी वाले देशों में होती हैं। 
इसके पहले अमेरिकी संस्था हेल्थ इफेक्टस इंस्टीट्यूट (एचईआई) के शोध के अनुसार दुनिया में वायु प्रदूषण के चलते 2015 में लगभग 42 लाख लोग अकाल मौत मरे थे। इनमें से 11 लाख भारत के और इतने ही चीन के थे। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया की करीब 92 प्रतिशत आबादी प्रदूषित हवा में साँस ले रही है। नतीजतन वायु प्रदूषण दुनिया में मौत का पाँचवाँ सबसे बड़ा कारण बन गया है। चिकित्सा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि वायु प्रदूषण कैंसर, हृदय रोग, क्षय रोग, दमा और साँस सम्बन्धी बीमारियों का प्रमुख कारक है। चीन ने इस समस्या से निपटने के लिए देशव्यापी उपाय शुरू कर दिए हैं, वहीं भारत का पूरा तंत्र केवल दिल्ली की हवा शुद्ध करने में लगा है। उसमें भी सफलता नहीं मिल रही है। न्यायालय ने वायु और ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए दिल्ली एवं एनसीआर क्षेत्र में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई थी, लेकिन इस पर कार्यपालिका शत-प्रतिशत अमल नहीं कर पाई।
आआईटी, कानपुर के एक अध्ययन के अनुसार 30 प्रतिशत प्रदूषण देश भर में डीज़ल-पेट्रोल से चलने वाले वाहनों से होता है। इसके बाद 26 प्रतिशत कोयले के कारण हो रहा है। दिवाली पर चलने वाले पटाखों से 5 फीसदी तक प्रदूषण होता है। देश के 168 शहरों के आंकड़ों के आधार पर ग्रीनपीस का मानना है कि 12 लाख भारतीय हर साल वायु प्रदूषण के कारण मरते हैं। सबसे ज़्यादा हानिकारक वाहनों से निकलने वाला धुँआ होता है। इससे निकली गैसें और कण वातावरण में प्रदूषण की मात्रा को 40 से 60 प्रतिशत तक बढ़ा देते हैं।
भारत में ध्वनि प्रदूषण के लिए जिम्मेदार भी भारी और हल्के वाहनों की बड़ी संख्या है। ध्वनि प्रदूषण का सामान्य स्तर 50 डेसिबल होता है। लेकिन भारत में इसका स्तर 100 डेसिबल तक है। दिन में यह प्रदूषण 75 डेसिबल बना रहता है, जो कान और मस्तिष्क के लिए बेहद खतरनाक है। कार का हॉर्न 110 डेसिबल ध्वनि उत्पन्न करता है। 130 से 135 डेसिबल की ध्वनि शरीर में दर्द, घबराहट और उल्टी की शिकायत पैदा करती है। लंबे समय तक 150 डेसिबल ध्वनि तरंगें यदि शरीर से टकराती हैं तो ये धड़कनें बढा़ देती हैं। इससे रक्तचाप बढ़ने का खतरा रहता है।
वाटर एड नामक संस्था के मुताबिक भारत में उपलब्ध 80 प्रतिशत जल  प्रदूषित है। पानी में इस प्रदूषण का कारण देश में बढ़ता शहरीकरण व औद्योगीकरण है। आबादी का घनत्व भी जल प्रदूषण को बढ़ाने का काम कर रहा है। वर्ल्ड इकानॉमिक फोरम के मुताबिक मुंबई में प्रति वर्ग कि.मी. 31,700 लोग रहते हैं। शहरों पर इस तरह से आबादी का बोझ बढ़ना विकास के असंतुलन को दर्शाता है। इस कारण अपशिष्ट पदार्थ नदियों, नहरों, तालाबों व अन्य जल स्रोतों में बहाए जा रहे हैं। इससे जल में रहने वाले जंतुओं और पौधों पर तो बुरा प्रभाव पड़ता ही है, इन स्रोतों का जल पीने योग्य भी नहीं रह जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का मानना है कि जल प्रदूषण में 75-80 फीसदी भूमिका मल-मूत्र की है।  
केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड देश के 121 शहरों में वायु प्रदूषण का आकलन करता है। इसकी एक रिपोर्ट के मुताबिक देवास, कोझिकोड व तिरुपति को अपवाद स्वरूप छोड़कर बाकी सभी शहरों में प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। इस प्रदूषण की मुख्य वजह तथाकथित वाहन क्रांति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का दावा है कि डीज़ल और कैरोसिन से पैदा होने वाले प्रदूषण से ही दिल्ली में एक तिहाई बच्चे साँस की बीमारी की जकड़ में हैं। 20 फीसदी बच्चे मधुमेह जैसी लाइलाज बीमारियों की चपेट में हैं। इसके बावजूद दिल्ली व अन्य राज्य सरकारें ऐसी नीतियाँ अपना रही हैं, जिनसे प्रदूषण को नियंत्रित किए बिना औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिलता रहे। यही कारण है कि डीज़ल वाहनों का चलन लगातार बढ़ रहा है।
राष्ट्र संघ द्वारा 31 अक्टूबर 2016 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 30 करोड़ बच्चे बाहरी वातावरण की इतनी ज़्यादा विषैली हवा के सम्पर्क में आते हैं कि उन्हें गंभीर शारीरिक दुष्प्रभाव झेलने पड़ते हैं। उनके विकसित हो रहे मस्तिष्क पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। दुनिया में 7 में से 1 बच्चा ऐसी बाहरी हवा में साँस लेता है, जो अंतरराष्ट्र्रीय मानकों से कम से कम 6 गुना अधिक दूषित है। इस रिपोर्ट के मुताबिक यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक एंथनी लेक ने दावा किया है कि हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के 6 लाख बच्चों की मौत वायु प्रदूषण से हो जाती है। प्रदूषणकारी तत्व न केवल बच्चों के फेफड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं, बल्कि उनके मस्तिष्क को भी स्थाई नुकसान पहुंचा सकते हैं। यूनिसेफ ने सेटेलाइट तस्वीरों का हवाला देकर लगभग 2 अरब बच्चों के ऐसे दूषित क्षेत्रों में रहने का दावा किया है, जहाँ बाहरी वातावरण की हवा विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों से कहीं अधिक खराब है। रिपोर्ट में बताया गया है कि वाहनों से निकलने वाला धुआँ, जीवाश्म ईंधन, धूल, जली हुई सामग्री के अवशेष और अन्य वायु व जलजनित प्रदूषक तत्वों के कारण हवा ज़हरीली होती है। ऐसे प्रदूषित वातावरण में रहने को मजबूर सर्वाधिक बच्चे दक्षिण एशिया के हैं। इनकी संख्या लगभग 62 करोड़ है। इसके बाद अफ्रीका में 52 करोड़ और पश्चिम एशिया व प्रशांत क्षेत्र में प्रदूषित इलाकों में रहने वाले बच्चों की संख्या 45 करोड़ है।
यूनिसेफ के शोध में घरों के भीतर वायु प्रदूषण की भी पड़ताल की गई है। भोजन पकाने और गरम करने के लिए कोयला, कैरोसिन और लकड़ी के जलाने से घर के भीतर यह प्रदूषण फैलता है। इसके बच्चों के सम्पर्क में आने से निमोनिया और साँस सम्बंधी रोग पैदा होते हैं। 5 साल से कम उम्र के 10 में से एक बच्चे की मौत की वजह यही प्रदूषण होता है। घरेलू वायु प्रदूषण से बच्चे ज़्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि इस समय उनके फेफड़े, मस्तिष्क और रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकासमान होते हैं और उनका श्वसन तंत्र कमजोर होता है।

दुनिया अब तक यह मानकर चल रही है कि वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने में पेड़-पौधे अहम भूमिका निभाते हैं, क्योंकि ये अपने भोजन बनाने की प्रक्रिया में कार्बन डाईऑक्साइड सोखते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। यह बात अपनी जगह सही है, लेकिन नए शोध से जो तथ्य सामने आया है वह चौंकाने वाला है। दरअसल बढ़ते वायु प्रदूषण से पेड़-पौधों में कार्बन सोखने की क्षमता घट रही है। वाहनों की अधिक आवाजाही वाले क्षेत्र में कार्बन सोखने की पेड़ों की क्षमता 36.75 फीसदी रह गई है। यह हकीकत देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के ताज़ा अध्ययन से सामने आई है। जलवायु परिवर्तन व पर्यावरण प्रभाव आकलन के वैज्ञानिक डॉ हुकूम सिंह के मुताबिक वाहनों के प्रदूषण से पेड़-पौधों पर पड़ रहे असर को जानने के लिए कार्बन सोखने की स्थिति का पता लगाया गया है। इससे पता चला कि पौधों की पत्तियाँ अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों में प्रदूषणकारी पदार्थों  से ढंक गई हैं। ऐसी स्थिति में पत्तियों के छिद्र, जिनके माध्यम से पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, बंद पाए गए। ऐसे में जंगलों का घटना वायु प्रदूषण को और बढ़ाने का काम करेगा। दरअसल भारत को प्रदूषण मुक्त बनाना है तो विकास का ग्रामों की ओर विकेंद्रीकरण करना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

पेड़ नहीं तो हम नहीं

 पेड़ नहीं तो हम नहीं 
-विशाल दुबे
संधारणीय विकास (टिकाऊ विकास) का लक्ष्य तय हो जाने के बाद विश्वभर में बड़े-बड़े सम्मेलनों से पर्यावरण संरक्षण के गीत गाए जाने लगे। ब्राजील के पहले पृथ्वी सम्मेलन से लेकर मिलेनियम डेवलपमेंट गोल से होते हुए इन सम्मेलनों ने पेरिस समझौते तक का सफर तय किया। ऐसी कई नीतियाँ निर्धारित की गईं जिनमें दावा किया गया कि अब विश्वभर के विकासक्रम में आने वाली पीढ़ी के बारे में भी ध्यान रखा जाएगा। कार्बन उत्सर्जन पर लगाम लगाई जाएगी। पेड़ लगाए जाएँगे। विश्व को टिकाऊ ऊर्जा की ओर ले जाया जाएगा। ये सब वादे मंच पर पैदा होते हैं और वहीं दफन हो हो जाते हैं। इन्हें भी वैश्विक राजनीति का हथियार बना लिया जाता है।
हाल ही में जारी नेचर जर्नल की रिपोर्ट पर नज़र  फिराएँ तो आपको अन्दाजा लग जाएगा कि हम जिस टिकाऊ विकास की बात करते हैं वो सब निरर्थक और निष्फल है। रिपोर्ट का दावा है कि हम हर साल लगभग 15.3 अरब पेड़ खो रहे हैं। प्रतिवर्ष एक व्यक्ति पर सन्निकट दो पौधे का नुकसान हो रहा है। इन सबके मुकाबले विश्वभर में मात्र 5 अरब पेड़ लगाए जाते हैं। सीधे तौर पर हमें 10 अरब पेड़ों का नुकसान हर साल उठाना पड़ता है।
हाल ही में नासा ने साउथ एशियन देशों की एक सैटेलाइट तस्वीर जारी की, जिसमें भारत समेत पाकिस्तान के कई हिस्सों पर साफ-साफ जहरीली धुन्ध का नजारा देखा जा सकता है। दिल्ली में प्रदूषण का कहर किसी से छिपा नहीं है। धुआँसे की ए स्थिति आगे आने वाली पीढ़ी के लिए बेहद खतरनाक है।
उसी रिपोर्ट में भारत के हिस्से के आँकड़ों पर नज़र  डालें तो और भी हैरान कर देने वाले तथ्य सामने आते हैं। विश्व में प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या 422 है जबकि भारत के एक व्यक्ति के हिस्से मात्र 8 पेड़ नसीब होते हैं। 35 अरब पेड़ों वाला भारत कुल पौधों की संख्या के मामले में बहुत नीचे है। सबसे ज्यादा 641 अरब पेड़ों के साथ रशिया है। कनाडा में 318 अरब तो ब्राजील में 301 अरब पेड़ हैं। वहीं अमेरिका 228 अरब पेड़ों के साथ चौथे पायदान पर काबिज है। भारत में स्थिति भयावह है। यहाँ तमाम कार्यक्रमों में वृक्षारोपण का सन्देश दिया जाता है। बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन उनके रख-रखाव की ओर कोई ध्यान नहीं देता। पिछले साल उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार ने एक योजना के तहत 24 घंटे में पाँच करोड़ पेड़ लगाये थे। कहा गया था कि इन पेड़ों का रख-रखाव सैटेलाइट सिस्टम से किया जाएगा, लेकिन सारी बातें हवा-हवाई निकलीं।
भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के समग्र वन क्षेत्र का एक चौथाई हिस्सा उत्तरपूर्वी इलाकों में मौजूद है। पिछले मूल्यांकन की तुलना में देखें तो यहाँ के 628 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में कमी आई है। भारत के कुल क्षेत्रफल का 24.16 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र में आता है, जो लगभग 749245 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।
कम होता वन क्षेत्र पर्यावरण के लिए कैंसर की तरह है। जिसका नजराना हर साल हम दिल्ली में देख ही रहे हैं। यहाँ कार्बन डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, फ्लोराइड, धूल आदि की मात्रा में वृद्धि हुई है। पर्यावरण में इन प्रदूषकों की मात्रा बढ़ने से मानव जीवन गम्भीर रूप से दुष्प्रभावित होता है। इस समस्या का समाधान करने में पेड़ बहुत उपयोगी हैं। ये पर्यावरण प्रदूषण रूपी विष का पान कर मानव जाति को दीर्घजीवी बनाने में
महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़-पौधे वायु को छानते हैं और इस प्रकार टनों धूल अपने ऊपर रोककर उसे मनुष्यों की श्वास नलिकाओं में जाने या आँखों में पड़ने की सम्भावना कम कर देते हैं। पेड़ वायुमण्डल में कार्बन मोनोऑक्साइ़ड व अन्य हानिकारक गैसों की सान्द्रता को कम कर पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। मेडिकल जर्नल द लांसेट में प्रकाशित एक लेख के अनुसार 2015 में प्रदूषण से होने वाली दुनिया भर की 90 लाख मौतों में भारत में अकेले 28 प्रतिशत लोगों को जान गँवानी पड़ी। प्रदूषण से हो रही मौतों के मामले में 188 देशों की सूची में भारत पाँचवें पायदान पर आता है।
सच कहें तो ये पीढ़ी जैसे-तैसे गन्दगी में अपना जीवनयापन कर ले, पर आने वाली जनरेशन को अगर साफ हवा मुहैया करानी होगी। उनके रख-रखाव का जिम्मा भी हमें ही लेना पड़ेगा। मैं तो कहता हूँ कि मूर्ति पूजा छोड़ पेड़ों की उपासना शुरू होनी चाहिए, क्योंकि मूर्तियाँ ऑक्सीजन नहीं छोड़तीं।(स्रोत- प्रयुक्ति)

पर्यावरण

कहीं पर्यावरण विरोधी तो नहीं
कचरे से बिजली?
  -मनोज निगम
पर्यावरण मंत्रालय की जानकारी (अप्रैल 2016) के अनुसार देश में प्रति वर्ष 620 लाख टन कचरा उत्पन्न होता है, इसमें 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा, 1.7 लाख टन जैव चिकित्सा अपशिष्ट, 79 लाख टन खतरनाक अपशिष्ट और 15 लाख टन ई-कचरा निकलता है। नगर निगम और पालिकाएँ इन अपशिष्ट का केवल 75 से 80 प्रतिशत ही एकत्र कर पाती हैं, और 22-28 प्रतिशत हिस्सा ही संसाधित किया जाता है।
कचरा प्रबन्धन एक देशव्यापी समस्या है, देश भर में कचरा निपटारे के कई प्रयोग किए जा रहे हैं। इनमें से एक है कचरे का भस्मीकरण एवं बिजली उत्पादन। सार्वजनिक अपशिष्टों के भस्मीकरण और उससे बिजली उत्पादन के 100 प्लांट्स बनाने के नीति आयोग के प्रस्ताव को तमाम तबकों द्वारा तीखी आलोचना मिल रही है। कहा जा रहा है कि यह योजना वायु प्रदूषण को कम करने और ऊर्जा के साफ-सुथरे स्रोतों की ओर बढ़ने के राष्ट्रीय प्रयासों में बाधक होगी।
नीति आयोग की तीन सालाना (2017-18 से 2019-20) कार्य-योजनाओं पर बनाए व्यापक मसौदे के अनुसार देश की 8000 नगर पालिकाओं में प्रतिदिन उत्पन्न 1,70,000 टन कचरे के प्रबन्धन का उद्देश्य है। कहा गया है कि इस कचरे से निपटने के लिए कचरे से ऊर्जा बनाने वाले प्लांट ही एकदम सही विकल्प हैं। योजना में इस कचरे को एक गंभीर लोक स्वास्थ्य खतरा बताया गया है। सार्वजनिक ठोस अपशिष्ट की सफाई की प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिए भारतीय कचरा ऊर्जा  निगम (waste to energy corporation of India)की स्थापना का सुझाव दिया गया है। संयंत्रों को बनाने का काम पब्लिक-प्रायवेट पार्टनरशिप के तहत किया जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार इस निगम का मुख्य दायित्व 2019 तक बनाए जाने वाले 100 स्मार्ट शहरों में अपशिष्ट से ऊर्जा बनाने वाले संयंत्र निर्माण के काम की निगरानी का होगा। योजना में कल्पना की गई है कि ये संयंत्र पर्यावरण के लिए लाभकारी होंगे और इनसे 2018 तक 330 मेगावाट और 2019 तक 511 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो सकेगा। यहाँ  यह जानकारी भी महत्वपूर्ण  है कि कोयले पर आधारित बिजली संयंत्र साल में लगभग 500 मेगावाट बिजली का उत्पादन करता है।
ठोस कचरा प्रबन्धन के नियमों में यह स्पष्ट है कि कचरे को घरेलू स्तर पर गीला, सूखा और घरेलू खतरनाक कचरे की तीन श्रेणियों में बांटा जाना चाहिए, यह व्यवहारिक रूप से नहीं हो पा रहा है। अधिकांश कचरे में तीनों श्रेणियों के कचरे मिल ही जाते हैं। अलग-अलग करने के लिए सरकारी और सामजिक प्रयास भी करने होंगे। नियम में यह भी है कि कचरे से ऊर्जा पैदा करने वाले संयंत्रों में मिश्रित कचरा नहीं जलाना चाहिए, और कचरे को निपटाने का आखरी विकल्प ज़मीन के भराव का होना चाहिए।


फायनेंशियल एक्सप्रेस अखबार के मुताबिक नीति आयोग यह बताने में असफल रहा कि जब इन संयंत्रों में मिला-जुला अपशिष्ट जलेगा तो फिर इनसे विषैली गैसों का उत्सर्जन भी होगा और ये हवा में गैर ज़िम्मेदाराना रूप से प्रदूषण फैलाएँगी। यदि इस विषाक्त उत्सर्जन की निगरानी का प्रभावी तंत्र न हो तो स्वास्थ्य सम्बंधी खतरे और भी चुनौतिपूर्ण होंगे। कचरे के पृथक्करण के लिए कई सारी सामजिक, आर्थिक व व्यवहारिक चुनौतियाँ  तो होंगी ही।
यह जानकारी भी गौरतलब है कि हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली के ओखला स्थित एक संयंत्र पर पेनल्टी लगाई है क्योंकि वहाँ  पर उत्सर्जन के मानकों का पालन नहीं किया गया। और वहाँ  के रहवासियों ने सुप्रीम कोर्ट में इस संयंत्र को किसी अन्य जगह ले जाने के लिए जनहित याचिका दायर की है। नीति आयोग के इस ड्राफ्ट एजेंडा में न तो दिल्ली स्थित संयंत्रों से कोई सबक लिया है न ही कुछ शहरों में बायोमेथीनेशन के सफल परिणामों का ज़िक्र है।
कई भारतीय पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अवधारणा ही दोषपूर्ण है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल की मूल्यांकन समिति के तकनीकी विशेषज्ञ इंजीनियर अनंत त्रिवेदी के अनुसार अपशिष्टों को जलाना सबसे खराब विकल्प है। यह विश्वास करना कि अपशिष्टों से साफ-सुथरी ऊर्जा बनाई जा सकेगी भी गलत साबित होगा।
भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलु डिग्री के विशेषज्ञ टी.वी. रामचंद्र का कहना है कि घरेलू कचरे में 80 प्रतिशत तक नमी वाले जैविक पदार्थ होते हैं, इनका भस्मीकरण उचित नहीं है। बेहतर उपाय यही है कि इस कूड़े की खाद बना कर या इसका किण्वन करके इससे बायोगैस बनाई जाए।
अमन लूथरा का अध्ययन भारत में शहरीकरण और अपशिष्ट प्रबन्धन का है। इनका कहना है कि भस्मीकरण (इंसीनरेशन) की तकनीक में लगातार कम नमी और अधिक कैलोरी के अपशिष्टों की ज़रूरत होती है। भारतीय अपशिष्ट जलाने के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि इसमें नमी की मात्रा अधिक होती है और इसको जलाने के लिए भी अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होगी। सी.एस.ई. (सेंटर फार एन्वायरमेंट एजूकेशन) के अध्ययन के अनुसार भी भारतीय अपशिष्ट 800-1000 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम का होता है और इसको जलाने के लिए लगभग 2000 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम की ज़रूरत होगी।
कचरे को जलाने की सिफारिश अन्य सरकारी नीतियों से भी जुदा है। हाल ही में प्रदूषण पर भारत सरकार के श्वेत पत्र के अनुसार ठोस अपशिष्ट को ठिकाने लगाने के भस्मीकरण जैसे थर्मल उपचार  के तरीके कचरे के निम्न ऊष्मा मूल्य के कारण संभव नहीं हैं। आलोचकों का तर्क है कि फिलहाल भारत के पास बिजली उत्पादन की पर्याप्त क्षमता है, तो कचरे से बिजली बनाने की आवश्यकता ही क्या है?
अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि सरकार के लिए यह ड्राफ्ट प्लान कितना व्यावहारिक होगा। राज्य और स्थानीय निकाय ड्राफ्ट प्लान की सिफारिशों को देख रहे हैं। नीति आयोग के ड्राफ्ट प्लान के अनुसार तेज़ी से बढ़ती समृद्धि के चलते शहरों में बड़ी मात्रा में ठोस अपशिष्ट पैदा होगा। शहरों में कचरे को प्रभावी तरीके से समाप्त करने की प्रक्रिया बहुत ही धीमी होने के कारण शहरों के आसपास कचरे के ढेर देखे जा सकते हैं। इस सदी के कई महत्वपूर्ण सवालों में से एक कचरे को प्रभावी तरीके से निपटाने का भी होगा, जिसके लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक इच्छाशक्ति ज़रूरी होगी। (स्रोत फीचर्स)

मेहंदी रंजित पाँव धरे

 मेहंदी रंजित पाँव धरे 
शशि पाधा
प्रकृति कितनी दयालु है, कितनी ममतामयी। हर मौसम में, हर ऋतु में वो धरती के लिए नये-उपहार, नए–नए परिधान लेकर आती है। हर मौसम का अपना एक भिन्न रूप, भिन्न रंग होता है। अब देखिए न, वसंत ऋतु में धरती अपने पूरे यौवन पर होती है, नई-नवेली दुल्हन की तरह हरी चूड़ियाँ, धानी चुनरी, सतरंगी फूलों का घाघरा, बेल बूटों के आभूषण। धरती का यह रूप कवियों को, रचनाकारों को, चित्रकारों को बहुत लुभाता है। धरती के इस अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन करते हुए अनेक रचनाएँ लिखी गई  हैं और अनेक चित्र बनाए गए है। विभिन्न देशों में वसंत ऋतु से जुड़े कई  त्योहार मनाए जाते हैं। और गीतों में भी तो उस सौन्दर्य को शब्दबद्ध किया गया है। यानी जितनी भी कलाएँ हैं उनमें किसी न किसी रूप में वसंत के सौन्दर्य का  वर्णन मिलता है। संगीत के रागों में भी राग वसंत, राग बहार नाम के राग हैं। तो यह कोई हैरान कर देने की बात नहीं है कि वसंत ऋतु अपने इस अनुपम, अप्रतिम सौन्दर्य वाली रूप राशि को देख कर इठलाती भी है और गर्वित भी होती है। सृष्टि का एक नियम है। कोई भी चीज़ शाश्वत नही हो सकती । कहीं न कहीं हर वस्तु का अवसान होता है। वैसे ही ऋतुएँ भी बदलती हैं। इस नियम से वसंत ऋतु भी नहीं बचती और उसका भी अवसान होता है।
किन्तु, दानवीरा–ममतामयी प्रकृति की गठरी में उपहारों की, सौन्दर्य प्रसाधनों की, आभूषणों की कोई कमी नहीं रहती। जैसे ही धरती का वासन्ती रूप क्षीण होने लगता है, प्रकृति घोलने लगती है नए रंग, गढ़ने लगती है नए गहने, सीने लगती है नए रंगों के घाघरे, बुनने लगती है नए रंगों की चुनरी। और, अपनी पिटारी में सब कुछ बांध कर ले आती है अपनी प्रिय पुत्री धरती के लिए। अब वो अपनी बेटी को जिस रूप में सजाती है, उसे एक नया नाम भी देती है –पतझड़।
आ---SSSS, आप नाम पर मत जाइए। नाम से लगेगा ‘झरते हुए पत्ते’। है न? नहीं, अगर आप इसे मेरी आँखों से देखें तो धरती का पतझड़ी रूप और भी लुभावना, और भी सुंदर होता है। दुनिया के बहुत से देशों में पतझड़ की छटा निराली होती है। अमेरिका में इस के रूप-सौन्दर्य की जो आकृति मेरी आँखों में बसती है आज मैं आप सब को उससे परिचित कराती हूँ।
वसंत ऋतु के जाते ही केवल कुछ दिन ही यहाँ ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। लेकिन शीघ्र ही पतझड़ अपने रूप सोंदर्य की पिटारी ले कर आ जाती है। इस ऋतु में यहाँ का मौसम अपना चोला बदलने लगता है। यानी धूप थोड़ी-थोड़ी ठंडी होने लगती है, दिन भी सिकुड़ने लगते हैं और रातों का कद बढ़ने लगता है। बसंत ऋतु की भरमाई अल्हड़ योवना हवा अब प्रोढ़ा स्त्री के समान कुछ गर्व से चलने लगती है। क्या आपने पतझड़ की हवा का गान सुना है? वृक्षों की पीली-पीली डालियाँ धीमे-धीमे नृत्य करती हुई आने वाली शिशिर ऋतु के स्वागत में मधुर गीत गाती हैं। उनके गीतों में ग्रीष्म ऋतु के अवसान की पीड़ा भी है और शिशिर के आने की झंकार भी है । वास्तव में यह मौसम न सर्द है न गर्म। यह तो गुनगुनी धूप और सरसराती हवाओं का मौसम है। सुनहरी धूप कभी पेड़ों के शिखरों पर देर तक सुस्ताती है और कभी नीचे उतर कर आँख- मिचौली खेल लेती है। धरती की हथेलियों में रच जाती है मेहंदी और पाँव में महावर। यानी प्रकृति अपनी स्वर्ण पिटारी बस यहीं पर उढ़ेल देती है । जीवन के चार दशक पार करती हुई बेटी को वो निराश नहीं होने देती। उसे नए रूप में, नए रंगों में सजाती है।
यहाँ पर इस मौसम का प्रभाव अधिकतर वृक्षों पर दिखाई देता है। पेड़ों के पत्ते हरे से पीले हो जाते हैं, कहीं कहीं तो सुर्ख भी। डालियाँ सोने की चूड़ियाँ पहन कर डोलती हैं। अमेरिका में पतझड़ का सोने जैसा रंग सैलानियों को भाव विभोर कर देता है । ‘मेपल’वृक्षों पर पत्ते कुछ दिन तो सुनहरे-पीले होते हैं, और फिर धीरे-धीरे सुर्ख होने लगते हैं। सड़कों के दोनों ओर पेड़ों की कतारें केवल लाल-पीले रंगों की छटा ओढ़े दिखाई देती हैं। मीलों तक सड़क पर और कोई रंग दिखाई नहीं देता। लोग दूर-दूर तक इस सौन्दर्य को निहारने अपनी-अपनी गाड़ियों में निकल जाते हैं । एक उत्सव का वातावरण-सा बन जाता है। कोई चित्रकारी करने बैठ जाता है और कोई फोटोग्राफ़ी। कहीं किसी एकांत स्थान पर बैठा कोई कवि रचना लिखने लगता है और बच्चे अभी अभी झरे पीले पत्तों को एकत्र करने में जुट जाते हैं।
अमेरिका में पतझड़ के दो महीनों में दो मुख्य त्योहार बड़े उत्साह और उल्लास से मनाए जाते हैं। दोनों ही त्योहार फसलों की कटाई से सम्बन्धित हैं।  खेतों से उस वर्ष की फसल की कटाई के बाद लोग अब चैन से, आराम से वर्ष के आने वाले शीत केमहीने बिताने की तैयारी करते हैं। अक्टूबर माह के अंतिम शुक्रवार को ‘हेलोवीन’ का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लोग अपने घरों के आगे कद्दू की कतारें सजा देते हैं। उन्हें काट कर भी विभिन्न रूप दिए जाते हैं। हर स्टोर में कद्दू ऐसे बिकते हैं जैसे और कुछ बचा ही न हो। कद्दू के कई प्रकार के व्यंजन भी बनते हैं और पड़ोसी आपस में इन व्यंजनों का आदान-प्रदान करते हैं।
पतझड़ की लाल-पीली, सुनहरी छटा के उल्लास में यहाँ के विभिन्न नगरों में सामूहिकत्योहारों का आयोजन किया जाता है जिसे ‘फेस्टिवल ऑफ़ ग्लोरी ऑफ़ फॉल’ का नाम दिया गया है। यानी ‘शरद ऋतु की महिमा त्योहार’। जिस क्षेत्र में पतझड़ अपने पूरे यौवन पर हो उस क्षेत्र के किसी मैदान में इस महासंगम का आयोजन किया जाता है। कई प्रकार की नुमाइशें लगाई जाती हैं, विभिन्न बैंड समूह अपनी गायन शैली का प्रदर्शन करते हैं। देर शाम तक सामूहिक नृत्य का आयोजन भी किया जाता है। कला और संस्कृति के इस महासमागम का उत्सव लगभग चार दिन तक चलता रहता है। स्थानीय सड़कों पर रंग- बिरंगी पोशाक पहने दूर-दूर से आए विभिन्न बैंड के सदस्य अपनीं वाद्य कला का प्रदर्शन करके लोगों का मनोरंजन करते हैं। खाद्य पदार्थों से भरी दुकानों पर भीड़ लगी रहती है। ऐसा अनुभव होता है जैसे जितने रंगों में पेड़ और पत्ते रंगे हैं उतने ही रंगों में लोगों के मन और परिधान भी उस सौन्दर्य को और बढ़ा देते हैं। पतझड़ को विदा करने की यह रीत अन्य देशों के लिए भी अनुकरणीय है।
पतझड़ का अंत आते-आते यानी नवम्बर के अंतिम सप्ताह के गुरूवार को ‘थैंक्स गिविंग’ का त्योहार भी मनाया जाता है। यह एक सामजिक एवं पारिवारिक त्योहार है जिसमें सभी परिवार –सम्बन्धी मिल कर भोजन करते हैं। भगवान को धन्यवाद देते हुए वे सब परस्पर भी धन्यवाद देते हैं। इन दिनों यहाँ के निवासी अपने आप को सर्दी और बर्फबारी के लिए तैयार करने लग जाते हैं।
धरती की यह अलौकिक छटा लगभग दो महीने रहती है और फिर प्रकृति पुन: अपनी छड़ी घुमाती हुई आती है। जीवन के चार दशक पार करती हुई बेटी को वो निराश नहीं होने देती। दूर से उसका सौन्दर्य निहारती है और चली जाती है क्षितिज के उस पार चाँदी बटोरने। क्यों कि फिर भी तो उसे आना है अपनी बेटी के लिए चाँदी जड़े गहने लेकर, शीत ऋतु में।
 कुछ भी तो शाश्वत नहीं होता किन्तु कुछ तो है जो चिर स्मरणीय है।  जैसे धरती की यह स्वर्णिम आभ।

तरक्की के नए रास्ते पर छत्तीसगढ़ के किसान

 तरक्की के नए रास्ते पर
 छत्तीसगढ़ के किसान
-स्वराज्य कुमार

सिर्फ सोलह साल के किशोर छत्तीसगढ़ राज्य के किसान अपनी मेहनत से आज तरक्की के नए रास्ते बनाकर समृद्धि और खुशहाली की नई मंजिलों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। राज्य में धान का उत्पादन सिर्फ दस साल के भीतर दोगुने से भी ज्यादा हो गया, वहीं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर राज्य में किसानों की आमदनी वर्ष 2022 तक दोगुनी करने के लिए भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने योजनाबद्ध रणनीति के साथ एक व्यापक रोड मैप बनाकर काम शुरू कर दिया है। खेती को अधिक से अधिक लाभदायक बनाने के लिए इसमें कृषि उत्पादन, रेशम उत्पादन, उद्यानिकी फसलों की खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और मछलीपालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई उपाय और कई लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। रोड मैप में बाजार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने, कृषि वानिकी के तहत बांस और अन्य लघु वनोपजों के उत्पादन और विपणन तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिए भी इसमें कई महत्वपूर्ण उपायों की घोषणा की गई है। खेती-किसानी की दशा और दिशा में लगातार एक सकारात्मक बदलाव आ रहा है। इससे छत्तीसगढ़ के किसान समृद्धि और खुशहाली के नए रास्ते पर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
रमन सरकार ने विगत तेरह साल में प्रदेश के किसानों की बेहतरी के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। ब्याज मुक्त ऋण सुविधा, कृषक जीवन ज्योति योजना के तहत तीन हॉर्स पावर से पांच हार्स पावर तक सिंचाई पम्पों के लिए सलाना 6000 यूनिट से 7500 यूनिट तक मुफ्त बिजली, सौर सुजला योजना के तहत अत्यंत किफायती मूल्य पर सोलर सिंचाई पंप, विद्युत कनेक्शन वाले सिंचाई पंपों की संख्या 94 हजार से बढ़ाकर तीन लाख 70 हजार तक पहुंचाना, सिंचाई योजनाओं का विकास और विस्तार, समर्थन मूल्य नीति के तहत सहकारी समितियों में वर्ष 2003-04 से 2015-16 तक छह करोड़ 22 लाख मीटरिक टन धान की खरीदी और किसानों को लगभग 65 हजार करोड़ रुपये  का भुगतान, इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के अनुसार किसानों की समृद्धि उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। वर्ष 2007 की तुलना में 2016-17 में राज्य में एक करोड़ 20 लाख टन फसलों की पैदावार मिली है, जो वर्ष 2007 की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है। 
ब्याज मुक्त ऋण सुविधा से किसानों में नए उत्साह का संचार
किसानों की बेहतरी के लिए राज्य शासन द्वारा तैयार रोड मैप के अनुसार एकीकृत कार्ययोजना में किसानों के लिए ब्याज मुक्त अल्पकालीन कृषि ऋणों की वर्तमान राशि 3800 करोड़ रुपये  से बढ़ाकर पाँच वर्ष में 5772 करोड़ रुपये  तक ले जाने का लक्ष्य है। हमें इस बात को भी याद करना चाहिए कि राज्य-निर्माण के प्रारंभिक तीन वर्षो में किसानों को सहकारी बैंकों के जरिए से सहकारी समितियों में 13 से 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर ऋण मिलता था। डॉ. रमन सिंह की सरकार ने इन ब्याज दरों को वर्ष 2004-05 में 9 प्रतिशत, वर्ष 2006-07 में 7 प्रतिशत, वर्ष 2007-08 में 6 प्रतिशत, वर्ष 2008-09 में 9 प्रतिशत और 2012-13 में 1 प्रतिशत कर दिया। रमन सरकार ने किसानों के लिए ब्याज दर को वर्ष 2013-14 से शून्य प्रतिशत कर दिया। कृषि ऋणों की ब्याज दरों में भारी कमी होने और बाद में ब्याज मुक्त ऋण सुविधा मिलने पर किसानों में नए उत्साह का संचार हुआ है और सहकारी समितियों से ऋण लेने वाले किसानों की संख्या भी लगातार बढ़ने लगी है। वर्ष 2001-02 में जब यह ब्याज दर 13 से 15 प्रतिशत थी, उस समय सिर्फ तीन लाख 96 हजार किसानों ने इस सुविधा का लाभ लिया था, जबकि वर्ष 2012-13 में ब्याज दर एक प्रतिशत होने पर ऋण लेने वाले किसानों की संख्या बढ़कर 9 लाख 45 हजार से ज्यादा हो गई और आज की स्थिति दस लाख से अधिक किसानों को ब्याज मुक्त ऋण सुविधा का लाभ मिल रहा है।
रमन सरकार ने इस वर्ष एक हजार 333 प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के जरिए खरीफ़ मौसम में 3200 करोड़ रुपये  और रबी मौसम में 600 करोड़ रुपये  का ब्याज मुक्त ऋण वितरण का लक्ष्य है। इस बार खरीफ में अब तक इस लक्ष्य के विरूद्ध 1500 करोड़ रुपये  से ज्यादा ऋण वितरित किया जा चुका है। यह राशि उन्हें 60 प्रतिशत वस्तु (खाद और बीज) तथा 40 प्रतिशत नगद के रूप में दी जा रही है। पिछले साल 2016 में खरीफ मौसम के दौरान किसानों को 2800 करोड़ रुपये  के लक्ष्य के विरुद्ध 2855 करोड़ 26 लाख रुपये  का ऋण दिया गया था। वर्तमान में ब्याज मुक्त ऋण सुविधा का लाभ ले रहे लगभग दस लाख से ज्यादा किसानों के अलावा समितियों में अगले पांच साल में कम से कम पांच लाख नए किसानों को भी सदस्य के रूप में जोड़ने का लक्ष्य है, जिन्हें नए किसान क्रेडिट कार्ड दिए जाएँगे। यह रोड मैप कृषि और जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा तैयार किया गया है। कृषि मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने अधिकारियों को इस रोड मैप के सभी प्रावधानों पर अमल के लिए तत्परता से कार्य शुरू करने के निर्देश दिए हैं। श्री अग्रवाल ने समय-समय पर स्वयं इसकी विस्तृत समीक्षा भी कर रहे हैं।
किसानों के लिए अलग से कृषि बजट
छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जिसने वर्ष 2012-13 से राज्य के मुख्य बजट के साथ किसानों के लिए अलग से कृषि बजट की शुरूआत की है। उसमें कृषि और सम्बद्ध क्षेत्रों में किसानों की सुविधा के लिए छह हजार 244करोड़ रुपये  का प्रावधान किया गया था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 10 हजार 676 करोड़ रुपये  तक पहुंच गया। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2017-18 में भी राज्य सरकार ने कृषि बजट में दस हजार करोड़ रुपये  से ज्यादा राशि का प्रावधान किया है। इसमें सिंचाई सुविधाओं के लिए 5242 करोड़ रुपये , कृषि विकास योजनाओं के लिए 2279 करोड़ रुपये , पशुपालन के लिए 517 करोड़ रुपये , सहकारिता के लिए 298 करोड़ रुपये  और मछलीपालन के लिए 100 करोड़ रुपये  की धन राशि निर्धारित की गई है। इस वर्ष के कृषि बजट के अनुसार 32 लाख से ज्यादा किसानों के लिए प्रति किसान लगभग 28 हजार रुपये  का औसत बजट प्रावधान है।
प्रदेश को अब तक चार कृषि कर्मण पुरस्कार
राज्य को वर्ष 2011 से 2016 की अवधि में भारत सरकार की ओर से चार बार कृषि कर्मण पुरस्कारों से नवाजा गया है। इनमें से तीन कृषि कर्मण पुरस्कार सर्वाधिक चावल उत्पादन के लिए और एक पुरस्कार दलहन के क्षेत्र में दिया गया है। राज्य में विगत 12 साल में चावल उत्पादन में 39 प्रतिशत, गेहूँ के उत्पादन में 24 प्रतिशत और दलहन-तिलहन के उत्पादन में लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
खेती-किसानी की शिक्षा पर भी विशेष जोर
 प्रदेश की नयी पीढ़ी को आधुनिक खेती से जोड़ने के लिए कृषि शिक्षा पर भी विशेष रूप से जोर दिया जा रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर केे अंतर्गत वर्ष 2003-04 में जहाँ  सिर्फ चार सरकारी कृषि महाविद्यालय थे, वहीं इनकी संख्या वर्ष 2016-17 तक बढ़कर 12 हो गई । इस अवधि में शासकीय उद्यानिकी कॉलेजों की संख्या शून्य से बढ़कर दो और शासकीय कृषि इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या भी शून्य से बढ़कर दो हो गई । पशुधन खेती का मुख्य आधार हैं। इसे ध्यान में रखकर प्रदेश के युवाओं को पशुपालन और पशु चिकित्सा के क्षेत्र में उच्च शिक्षा की सुविधा दिलाने के लिए रमन सरकार द्वारा वर्ष 2012 में दुर्ग जिले के ग्राम अंजोरा में कामधेनु विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है, जिसका संचालन सफलतापूर्वक हो रहा है। खेती के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश में 20 कृषि विज्ञान केन्द्र भी संचालित हो रहे हैं।
राज्य तीन जलवायु क्षेत्रों में सीमांकित
 किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए राज्य सरकार के रोड मैप में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ प्रदेश को तीन अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्रों में सीमांकित करते हुए स्थानीय जलवायु विविधता के अनुरूप फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने की मंशा प्रकट की गई है। उत्तरी छत्तीसगढ़ पहाड़ी इलाकों में फैला हुआ है।  कृषि विशेषज्ञों के अनुसार वहाँ  की भौगोलिक परिस्थितियाँ  और शीतल जलवायु गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों के लिए काफी अनुकूल है। इसी तरह राजनांदगांव से मुंगेली तक काली मिट्टी वाले क्षेत्रों को रबी मौसम में चना और खरीफ मौसम में सोयाबीन उत्पादन क्षेत्र के रूप में चिह्नांकित किया गया। बस्तर और सरगुजा के सूदूरवर्ती इलाके परपंरागत रूप से जैविक खेती के लिए पहचाने जाते हैं। दंतेवाड़ा जिले में जैविक खेती के लिए शुरू की गई मोचोबाड़ीपरियोजना को अच्छी सफलता मिल रही है। राज्य में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की सर्वोत्तम व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और प्रशंसा मिली है। किसानों की आमदनी दोगुनी करने के रोड मैप में इन बातों को ध्यान में रखकर रणनीति तय की गई है। इसमें यह भी ध्यान रखा गया है कि राज्य में धान को छोड़कर अन्य फसलों के लिए पर्याप्त प्रसंस्करण उद्योगों की कमी है। दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए समर्थन मूल्य पर उपार्जन की व्यवस्था को भी व्यापक बनाने की जरूरत है। प्रदेश के दो तिहाई से ज्यादा इलाकों में वर्षा आधारित खेती को भी रोड मैप में एक चुनौती के रूप में लेकर सिंचाई संसाधनों में वृद्धि पर भी जोर दिया गया है। रोड मैप में कहा गया है कि राज्य के प्रत्येक गांव के नजदीक से छोटे अथवा मँझोले बरसाती नाले गुजरे हैं, जो खेती के लिए वरदान साबित हो सकते हैं।
साढ़े तीन लाख से ज्यादा वन अधिकार
मान्यता पत्र धारकों को भी मिलेगा फायदा
अधिकारियों ने बताया कि राज्य में वन अधिकार मान्यता पत्र धारक तीन लाख 57 हजार से ज्यादा वनवासी परिवारों को तीन लाख 14 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्रों में खेती के लिए व्यक्तिगत पट्टे दिए गए हैं, वहीं आठ हजार 866 सामुदायिक पट्टे एक लाख 52 हजार हेक्टेयर रकबे में दिए गए हैं। वन अधिकार मान्यता पत्र धारक इन वनवासियों को खेती के लिए खाद और बीज, भूमि समतलीकरण तथा कृषि उपकरणों के लिए सहायता दी गई है। रोड मैप में उनकी आमदनी को भी दोगुनी करने के लिए विशेष प्रयासों पर बल दिया गया है और कहा गया है कि उन्हें उन्नत खेती से जोड़कर उद्यानिकी, कृषि वानिकी, पशुपालन और मुर्गीपालन योजनाओं का भी लाभ दिलाया जाएगा।
लगभग 37.46 लाख किसानों के खेतों में हो रहा मिट्टी परीक्षण
 राज्य के लगभग 37 लाख 46 हजार किसानों के खेतों में ग्रिड आधार पर मिट्टी परीक्षण भी किया जा रहा है। इस वर्ष 2017 तक सभी किसानों को मिट्टी स्वास्थ्य पत्रक (स्वायल हेल्थकार्ड) देने का अभियान भी चलाया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी परीक्षण कार्डो में की गई अनुशंसाओं के अनुसार खाद के उपयोग में दस प्रतिशत की बचत होगी और पैदावार में पाँच प्रतिशत की वृद्धि होगी।
कतार बोनी को बढ़ावा
रोड मैप में बताया गया है कि राज्य में वर्तमान में सिर्फ दो लाख 60 हजार हेक्टेयर में कतार बोनी से धान की बोआई की जाती है। अगले पांच साल में इसे पाँच लाख हेक्टेयर तक पहुँचाने के लिए विशेष अभियान चलाने का लक्ष्य है। इससे 60 हजार क्विंटल बीजों की बचत होगी। जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रदेश के सभी बीस हजार गांवों में एक-एक चिमनी खाद गढ्ढों का निर्माण किया जाएगा। इससे लगभग दो लाख मीटरिक टन कम्पोस्ट खाद मिलेगी। जैविक खाद तैयार करने के लिए प्रदेश भर में ग्राम पंचायतों के स्तर पर पांच लाख वर्मी कम्पोस्ट टांके/नाडेप टांके बनवाए जाएँगे, जिनमें कम से कम 15 लाख मीट्रिक टन जैविक खाद का उत्पादन हो सकेगा। प्रदेश में इस समय खेतों की मेड़ों पर अरहर, तिल, अरण्डी और रामतिल जैसी फसलों का वर्तमान रकबा सिर्फ दो लाख 02 हजार हेक्टेयर है, जिसे अगले पांच साल में पांच लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
करीब 3.60 लाख हेक्टेयर में होगी स्प्रिंकलर-ड्रिप सिंचाईरोड मैप के अनुसार अगले पांच साल में किसानों को लघु सिंचाई सुविधा देने के लिए तीन लाख 60 हजार हेक्टेयर में स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई प्रणाली को बढ़ावा देने का लक्ष्य है। किसानों को सरकारी अनुदान पर स्प्रिंकलर सेट दिए जाएँगे।
साढ़े चार लाख सिंचाई नलकूपों की होगी रिचार्जिंग
इसके अलावा राज्य में स्थापित चार लाख 50 हजार सिंचाई नलकूपों की रिर्चाजिंग पर भी इसमें जोर दिया गया है। इस उद्देश्य से बारिश के पानी को एकत्रित करने के लिए मनरेगा के तहत स्थानीय बरसाती नालों और छोटी नदियों में अगले पांच साल में दस हजार भूमिगत बंधारा बनवाए जाएँगे। इससे भूजल स्तर बढ़ेगा।
छोटे-बड़े नालों में हर एक किलोमीटर पर बनेगा चेकडेम
रोड मैप के अनुसार राज्य के छोटे-बड़े नालों में शृंखलाबद्ध तरीके से चेकडेम भी बनवाए जाएँगे। हर साल ऐसे नालों के किनारे 700 किलोमीटर की लंबाई में 700 से 725 चेकडेमों के निर्माण का लक्ष्य है। अर्थात हर एक किलोमीटर एक चेकडेम बनेगा। इनका निर्माण प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और राज्य पोषित योजना के जरिए किया जाएगा। जल संसाधन विभाग द्वारा राज्य में 495 एनीकट और स्टॉप डेम बनवाए गए हैं। अगले पाँच साल में इनके किनारों पर बिजली लाईन विस्तार करते हुए 44 हजार हेक्टेयर में उदवहन सिंचाई को बढ़ावा दिया जाएगा। शाकम्भरी योजना के तहत एक लाख दस हजार किसानों को सिंचाई पंप 75 प्रतिशत अनुदान पर देने का भी लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
बाजार व्यवस्था को मजबूत बनाने कई बड़े निर्णय
किसानों को फसलों का उचित मूल्य दिलाने के लिए राज्य सरकार के रोड मैप में कृषि विपणन व्यवस्था को मजबूत बनाने की दृष्टि से भी कई बड़े निर्णय लिए गए हैं। इसके अंतर्गत प्रदेश की चिन्हांकित 14 कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ने, फल और सब्जी उपमंडियों की स्थापना, किसान उपभोक्ता बाजारों की स्थापना जैसे कई कदम उठाए जा रहे हैं। वनौषधियों और हर्बल प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जा रहा है। लाख कृमि पालन और लाख उत्पादन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ देश में दूसरे स्थान पर है। वर्ष 2022 तक प्रदेश के 54 हजार से ज्यादा किसानों को लाख की खेती से जोड़ने का लक्ष्य है। इसकी खेती 12 लाख से अधिक कुसुम, पलाश और बेर के वृक्षों में की जाएगी। राज्य के वनो में 19 प्रतिशत बांस के जंगल हैं। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में 50 हजार नोशनल टन बांस का उत्पादन होता है, जबकि मांग 60 हजार नोशनल टन की है। रोड मैप में इसकी पूर्ति के लिए वनो के साथ-साथ किसानों की नीजि भूमि पर भी बांस रोपण को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य घोषित किया गया है। तेंदूपत्ता, साल बीज, हर्रा, महुआ, बहेड़ा, जैसी लघु वनोपजों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए भी रोड मैप में रणनीति तय की गई है।
लगभग 12 लाख हेक्टेयर तक पहुंचेगा उद्यानिकी फसलों का रकबा
 राज्य में उद्यानिकी फसलों का वर्तमान रकबा सात लाख 41 हजार हेक्टेयर है। इसे वर्ष 2021-22 तक बढ़ाकर 11 लाख 93 हजार हेक्टेयर तक पहुँचाने का लक्ष्य है। रणनीति में फलों की खेती को दो लाख 25 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर 6 लाख 62 हजार हेक्टेयर, सब्जियों की खेती को चार लाख 14 हेक्टेयर से बढ़ाकर चार लाख 14 हजार हेक्टेयर, मसालों की खेती को 51 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर एक लाख 46 हजार हेक्टेयर और फूलों की खेती को 11 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर 18 हजार हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। रोड मैप में उद्यानिकी किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और नर्सरियों के आधुनिकीकरण का भी लाभ दिलाने की रणनीति घोषित की गई है।