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Jun 7, 2017

मुद्दा

    पर्यावरण संरक्षण के खोखले वादे कब तक ?

                - सुनीता नारायण

हमारा संसदीय लोकतंत्र इंग्लैंड के लोकतंत्र की नकल है जो किसी भी प्रकार से वास्तविक मुद्दों को राष्ट्रीय बनने से रोकता है। मसलन, जर्मनी में न केवल ग्रीन पार्टी की स्थापना होती है बल्कि वह गठबंधन के जरिए सत्ता में भी पहुँच जाती है। वहीं बगल के ब्रिटेन में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। ब्रिटेन में पिछले चुनावों में ग्रीन पार्टी को ठीक-ठाक वोट मिले थे। लेकिन आज भी ब्रिटेन में उसे कोई महत्त्व नहीं मिलता है। ग्रीन पार्टी की जरूरत तो ब्रिटेन में महसूस की जाती है लेकिन वहाँ की चुनाव-प्रणाली ऐसी है जो उसे सत्ता तक पहुँचने से रोकती है। जाहिर- सी बात है मुद्दे संसद तक सफर कर सकें, यह ब्रिटेन की संसदीय-प्रणाली में अनिवार्य नहीं है।
लेकिन आप यहाँ यह भी ध्यान रखिए कि यूरोप में अलग से ग्रीन पार्टी बनाना ही पर्यावरण की दिशा में उठा एकमात्र राजनीतिक कदम नहीं है। वहाँ हर पार्टी के एजेंडे में पर्यावरण अहम मुद्दा रहा है। बदलता मौसम, धुएँ की मात्रा से जुड़े वादे, लो-कार्बन टेक्नालॉजी, पर्यावरण की रक्षा आदि विषयों पर हरेक पार्टी को अपना रुख साफ करना होता है। उन्हें जनता को बताना होता है कि यदि वे चुनाव जीत कर सत्ता में आईं तो वे कैसी पर्यावरण नीति का पालन करेंगी। केवल वादा ही नहीं बल्कि सत्ता में आने के बाद वे उन वादों को निभाने की भी कोशिश करती हैं। भले ही इसके लिए उन्हें कितने भी लोहे के चने चबाने पड़े।
ऑस्ट्रेलिया में भी पर्यावरण के नाम पर चुनाव लड़े और जीते गए हैं। वहाँ लेबर पार्टी सत्ता में आई- यह कहते हुए कि तत्कालीन सत्ताधारी दल पर्यावरण के मुद्दों को सूली पर टाँग रही है। लेकिन सत्ता में आने के बाद लेबर पार्टी पहले की सरकार से भी बुरे तरीके से पर्यावरणीय मुद्दों के साथ एक तरह से खिलवाड़ ही कर रही है। साफ है कि घोषणाएँ करने से पर्यावरण को नहीं बचाया जा सकता।
फिर सवाल उठा है कि ऐसे कौन से काम हैं जिनके कारण पर्यावरण संकट में है? अपने यहाँ देखें तो सभी राजनीतिक दलों ने इस बार के चुनाव में पर्यावरण की बात तो की है। भाजपा, कांग्रेस, सीपीआईएम सभी कह रहे हैं कि वे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाएँगे।
भाजपा कह रही है कि बाघों को बचाने के लिए वह टास्क फोर्स का गठन करेगी और यही टास्क फोर्स अन्य सभी प्रकार के वन्य जीवन के संरक्षण की दिशा में भी काम करेगी। पानी और बिजली की बात सभी राजनीतिक दल करते हैं; लेकिन इन बातों से अलग हम देख रहे हैं कि पर्यावरण कहीं मुद्दा नहीं है।
पर्यावरण अभी भी इस देश में मुद्दा इसलिए नहीं है ; क्योंकि हमारा पर्यावरण के प्रति जो दृष्टिकोण है, वह ही हमारा अपना नहीं है। जब हम पर्यावरण की बात करते हैं ,तो हमें आर्थिक नीतियों के बारे में सबसे पहले बात करनी होगी। हमें यह देखना होगा कि हम कैसी आर्थिक नीति पर काम कर रहे हैं। अगर हमारी आर्थिक नीतियाँ ऐसी हैं ,जो पर्यावरण को अंतत: क्षति पहुँचाती हैं , तो फिर बिना उन्हें बदले पर्यावरण संरक्षण की बात का कोई खास मतलब नहीं रह जाता है। हमें ऐसी नीतियाँ चाहिए, जो लोगों को उनके संसाधनों पर हक देती हों।
जल, जंगल और जमीन पर जब तक वहीं रहने वाले लोगों का स्वामित्व नहीं होगा, पर्यावरण संरक्षण के वादे केवल हवाई वादे ही होंगे। हमें ऐसी पर्यावरण नीति को अपनाना होगा, जो प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के बजाय बढ़ाने वाली हो। हम जब पर्यावरण के बारे में सोचें तो केवल पर्यावरण के बारे में न सोचें, बल्कि उन लोगों के बारे में भी सोचें जो पर्यावरण स्रोतों पर निर्भर हैं।
लेकिन जो राजनीतिक पार्टियाँ पर्यावरण संरक्षण की अच्छी-अच्छी बातें अपने घोषणापत्र में लिख रही हैं, उनके एजेंडे में आर्थिक विकास की वर्तमान नीतियाँ और पर्यावरण संरक्षण दोनों को बढ़ावा देने का प्रावधान है। यह विरोधाभासी है। अगर हम सचमुच अपने देश के पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं तो हमें स्थानीय जीवन-पद्धतियों को ही नहीं स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देना होगा।
एक ऐसा राजनीतिक ढाँचा तैयार करना होगा जो स्थानीय स्वशासन और प्रशासन को मान्यता प्रदान करता हो। हमें नदियों के बारे में बहुत ही देसी तरीके से सोचना होगा। अगर हम वर्तमान औद्योगिक नीतियों को ही बढ़ावा देते रहे तो हमारी नदियों को कोई नहीं बचा सकता, फिर हम चाहे कितने भी वादे करें।
इस देश का दुर्भाग्य ही है कि पर्यावरण के इतने संवेदनशील मसले को भी हम अपने तरीके से हल नहीं करना चाहते। हम जिन तरीकों की बात कर रहे हैं, वे सब उधार के हैं। इसी का परिणाम है कि हम अति उत्साह में ग्रीन पार्टी की बात करते-करते ग्रीन रिवोल्यूशन को भी बढ़ावा देने लगते हैं! (गांधी मार्ग से, साभार)

वर्षा जल की साझेदारी

           वर्षा जल की साझेदारी 

                 - अनुपम मिश्र

कुण्ड या टाँका
(गतांक से आगे)
परम्परागत जल संग्रह में तालाब आदि के निर्माण में जो जगह आगोर की यानी जलागम क्षेत्र की होती है वही जगह समाज ने मरुभूमि के शहरों और गाँवों में घर की छतों पर भी ढूँढ निकाली थी। वर्षा का पानी जैसे भूमि पर गिरकर एक जगह एकत्र हो सकता है, तो उसी तरह छोटी या बड़ी छत या आँगन में गिरने वाला पानी क्यों न एकत्र किया जाए। वर्षा के ऐसे मीठे या पालर पानी का महत्त्व तब और बढ़ जाता है जब हमें पता चलता है कि उन क्षेत्रों में भूजल बिल्कुल खारा हैं और वह पीने के लायक नहीं है।
प्राय: हर घर की छत एक हल्का-सा ढाल लिए बनाई जाती है। वहाँ से एक नाली के जरिए पानी नीचे आता है। नाली में रेत के कण और कचरे को छानने का प्रबन्ध रखा जाता है। उस क्षेत्र में गिरने वाली वर्षा के माप या आँकड़े के अनुसार नीचे जमा करने का टाँका बनाया जाता है। मोटे तौर पर ऐसे टाँकों की क्षमता 50 हजार लीटर से लेकर पाँच लाख लीटर तक रहती है। पुराने समय में इन्हें घड़ों के नाप से देखा जाता और ऐसे घड़ों का आकार एक निश्चित मानक से तय होता था।
राजस्थान ने अनेक शहरों में, कस्बों में कोई 25-30 साल पहले से नगरपालिकाओं ने नलों की व्यवस्था बना दी है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि समय के साथ-साथ पानी की उपलब्धता में लगातार गिरावट आई है और जो नल कभी दिनभर चलते थे, अब बड़ी मुश्किल से उनमें एकाध घंटे पानी आ पाता है। ऐसे क्षेत्रों में छतों और आँगनों से भरने वाले टाँकों की व्यवस्था आज भी बहुत व्यावहारिक और आधुनिक सिद्ध हो रही है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे क्षेत्र कम वर्षा वाले क्षेत्र हैं।
ऐसे कुण्ड, टाँके सब जगह हैं। ऊँचे पहाड़ों में बने किलों में, मंदिरों में, पहाड़ की तलहटी में बसे गाँव में, गाँव के बाहर निर्जन क्षेत्रों में, और तो और खेतों में भी सब जगह हमें अलग-अलग आकारों के कुण्ड या टाँके मिलते हैं।
जहाँ जितनी भी जगह मिल सके, वहाँ गारे-चूने से लीपकर एक ऐसा ‘आँगन’ बना लिया जाता है, जो थोड़ी ढाल लिये रहता है। यह ढाल एक तरफ से दूसरी तरफ भी हो सकता है और यदि ‘आँगन’ काफी बड़ा है तो ढाल उसके सब कोनों से बीच केंद्र की तरफ भी आ सकता है। ‘आँगन’ के आकार के हिसाब से, उस पर बरसने वाली वर्षा के हिसाब से इस केंद्र में एक कुण्ड बनाया जाता है। कुण्ड के भीतर की चिनाई इस ढंग से की जाती है कि उसमें एकत्र होने वाले पानी की एक बूँद भी रिसे नहीं, वर्ष भर पानी सुरक्षित और साफ-सुथरा बना रहे।
जिस आँगन में कुण्ड के लिए वर्षा का पानी जमा किया जाता है, वह आगोर कहलाता है। आगोर संज्ञा अगोरने क्रिया से बनी है। अगोरना यानी बटोर लेना के अर्थ में। आगोर को खूब साफ-सुथरा रखा जाता है, वर्ष भर। वर्षा से पहले तो इसकी बहुत बारीकी से सफाई होती है। जूते, चप्पल आगोर में नहीं आ सकते। समाज ने कड़े नियम बनाए थे, पानी को सरल ढंग से साफ रखने के लिए।
आगोर की ढाल से बहकर आने वाला पानी कुण्ड के मंडल, यानी घेरे में चारों तरफ बने ओयरों यानी सुराखों से भीतर पहुँचता है। ये छेद कहीं-कहीं झुंड भी कहलाते हैं। आगोर की सफाई के बाद भी पानी के साथ आ सकने वारी रेत, पत्तियाँ रोकने के लिए ओयरों में कचरा छानने के लिए जालियाँ भी लगती हैं। कहीं-कहीं बड़े आकार के कुण्डों में एकत्र होने वाले पानी की शुद्धता के लिए आगोर ठीक किसी चबूतरे की तरफ ऊँचा उठा रहता है।
बहुत बड़ी जोतों के कारण मरुभूमि में गाँव और खेतों की दूरी और भी बढ़ जाती है। खेतों पर दिन-भर काम करने के लिए भी पानी चाहिए। खेतों में भी थोड़ी-थोड़ी दूर पर छोटी-बड़ी कुण्डियाँ बनाई जाती हैं। इनमें एकत्र कर लिया गया पानी कृषक समाज के निस्तार और पीने के काम में आ जाता है।
राजस्थान में जल संरक्षणककुण्ड बनते ही ऐसे रेतीले इलाकों में हैं, जहाँ भूजल सौ-दो सौ हाथ से भी गहरा और प्राय: खारा मिलता है। बड़े कुँड बीस-तीस हाथ गहरे बनते हैं और वह भी रेत में । भीतर बूँद-बूँद भी रिसने लगे तो भरा-भराया कुण्ड खाली होने में देर नहीं लगे।
इसलिए कुण्ड के भीतरी भाग में सर्वोत्तम चिनाई की जाती है। आकार छोटा हो या बड़ा, चिनाई तो सौ टका ही होती है। चिनाई में पत्थर या पत्थर की पट्टियाँ भी लगाई जाती हैं। साँस यानी पत्थरों के बीच जोड़ते समय रह गई जगह में फिर से महीन चूने का लेप किया जाता है। मरुभूमि में तीस हाथ पानी भरा हो पर तीस बूँद भी रिसन नहीं होगी-इसका पक्का और पुख्ता इंतजाम किया जाता रहा है।
आगोर की सफाई और भारी सावधानी के बाद भी कुछ रेत कुण्ड में पानी के साथ चली जाती है। इसलिए कभी-कभी वर्ष के आरंभ में, चैत्र में कुण्ड के भीतर उतर कर इसकी सफाई भी करनी पड़ती है। नीचे उतरने के लिए चिनाई के समय ही दीवार की गोलाई में एक-एक हाथ के अंतर पर जरा सी बाहर निकली पत्थर की एक-एक छोटी-छोटी पट्टी बिठा दी जाती है। नीचे कुण्ड के तल पर जमा रेत आसानी से समेट कर निकाली जा सके, इसका भी पूरा ध्यान रखा जाता है। तल एक बड़े कढ़ाव जैसा ढालदार बनाया जाता है। इसे खमाड़ियाँ या कुण्डलियाँ भी कहते हैं। लेकिन ऊपर आगोर में इतनी अधिक सावधानी रखी जाती है कि खमाडिय़ों में से रेत निकालने का काम पाँच से दस बरस में एकाध बार ही करना पड़ता है। एक पूरी पीढ़ी कुण्ड को इतने सँभाल कर रखती है कि दूसरी पीढ़ी को ही उसमें सीढ़ियों से उतरने का मौका मिल पाता है।
पिछले दौर में सरकारों ने अनेक स्थानों पर अनेक गाँवों में पानी का नया प्रबंध किया है। पेयजल की नई योजनाएँ आई हैं। हैंडपंप या ट्यूबवेल लगे हैं। इंदिरा गाँधी नहर से भी शहरों, गाँवों को पीने का पानी दिया जाने लगा है। ऐसे इलाकों में कुण्ड, टाँकों की रखवाली की, देखरेख की मजबूत परम्परा जरूर कमजोर हुई है। यहाँ के कुण्ड टूट-फूट चले हैं, आगोर में झाड़ियाँ उग आई हैं। लेकिन कहीं-कहीं पानी की नई व्यवस्था अकाल आदि के दौर में फिर से लडख़ड़ा गई है और तब ऐसी जगहों पर लोगों ने टूटे कुण्डों की फिर से मरम्मत की है। राजस्थान में ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ समाज ने पानी के नए साधन आने पर भी अपने पुराने तरीके कायम रखे हैं।
कुण्ड निजी भी है और सार्वजनिक भी। निजी कुण्ड घरों के सामने, आँगन में, अहाते में और पिछवाड़े बाड़ों में बनते हैं। सार्वजनिक कुण्ड पंचायती भूमि में या प्राय: दो गाँव के बीच बनाए जाते हैं। बड़े कुण्डों की चारदीवारी में प्रवेश के लिए दरवाजा भी होता है। इसके सामने प्राय: दो खुले हौज रहते हैं। एक छोटा, एक बड़ा। इनकी ऊँचाई भी कम ज्यादा रखी जाती है। ये खेल, थाला, हवाड़ों या उबारा कहलाते हैं। इनमें आसपास से गुजरने वाले भेड़-बकरियों, ऊँट और गायों के लिए पानी भर कर रखा जाता है। पशुओं को बाहर ही पानी मिल जाता है और इनके भीतर जाने से जो गंदगी हो सकती है, वह भी रुक जाती है।
सार्वजनिक कुण्ड भी लोग ही बनाते हैं। पानी का काम पुण्य का काम माना जाता है। किसी भी घर में कोई अच्छा प्रसंग आने पर गृहस्थ सार्वजनिक कुण्ड बनाने का संकल्प लेते हैं और फिर इसे पूरा करने में गव के दूसरे घर भी अपना श्रम देते हैं। कुछ सम्पन्न परिवार सार्वजनिक कुण्ड बनाकर उसकी रखवाली का काम एक परिवार को सौंप देते थे। कुण्ड के बड़े अहाते में आगोर के बाहर इस परिवार के रहने का प्रबंध कर दिया जाता था। यह व्यवस्था दोनों तरफ से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। कुण्ड बनाने वाले परिवार के मुखिया अपनी सम्पत्ति का एक निश्चित भाग कुण्ड की सार-संभाल के लिए अलग रख देते थे। बाद की पीढ़ियाँ भी इसे निभाती थीं। आज भी राजस्थान में ऐसे बहुत से कुण्ड हैं, जिनको बनाने वाले परिवार नौकरी, व्यापार के कारण यहाँ से निकल कर असम, बंगाल, मुंबई जा बसे हैं पर रखवाली करने वाले परिवार अभी भी कुण्ड पर ही बसे हैं। ऐसे बड़े कुंड आज भी वर्षा के जल का संग्रह करते हैं और पूरे बरस भर आसपास की आबादी को किसी भी नगरपालिका से ज्यादा शुद्ध पानी देते हैं। ऐसे कुण्डों या टाँकों की क्षमता एक लाख लीटर से ऊपर होती है।
कई कुण्ड टूट-फूट भी गए हैं, कहीं-कहीं उनमें एकत्र पानी भी खराब हुआ है पर यह सब समाज की टूट-फूट के अनुपात में ही मिलेगा। इसमें इस पद्धति का कोई दोष नहीं है। यह पद्धति तो नई खर्चीली और अव्यावहारिक योजनाओं के दोष भी ढँकने की उदारता रखती है। इन इलाकों में पिछले दिनों जल संकट हल करने के लिए जितने भी नलकूप और ‘हैंडपंप’ लगे, उनमें पानी खारा ही निकला। पीने लायक मीठा पानी इन कुण्ड, कुण्डियों में ही उपलब्ध था। इसलिए बाद में अकाल आने पर कहीं-कहीं कुण्डों के ऊपर ही हैंडपंप लगा दिए गए हैं।
चुरू क्षेत्र में ऐसे कई कुण्ड मिल जाएँगे,जो नई पुरानी रीत एक साथ निभाते हैं। बहुप्रचारित इंदिरा गाँधी नहर से ऐसे कुछ क्षेत्र में पीने का पानी पहुँचाया गया है और इस पानी का संग्रह कहीं तो नई बनी सरकारी टंकियों में किया गया है और कहीं-कहीं इन्हीं पुराने कुण्डों में।
हम सभी जानते हैं कि राजस्थान में रंगों के प्रति एक विशेष आकर्षण हैं। लहँगे ओढ़नी और चटकीले रंगों की पगड़ियाँ जीवन के सुख और दुख में अपने रंग बदलती हैं। पर इन  कुण्डियों का केवल एक ही रंग मिलता है - बस सफेद। तेज धूप और गर्मी के इस इलाके में यदि कुण्डियों पर कोई गहरा रंग हो तो बाहर की गर्मी सोख कर भीतर के पानी पर भी अपना असर छोड़ेगा। इसलिए इतने रंगीन पहनावे वाला समाज कुण्डियों को सिर्फ सफेद रंग में रंगता है। सफेद परत तेज धूप की किरणों को वापस लौटा देती है।
इन कुण्डों ने पुराना समय भी देखा है, नया भी। इस हिसाब से वे समय सिद्ध हैं। स्वयंसिद्ध इनकी एक और विशेषता है। इन्हें बनाने के लिए किसी भी तरह की सामग्री कहीं और से नहीं लानी पड़ती। मरुभूमि में पानी का काम करने वाले विशाल संगठन का एक बड़ा गुण है - अपनी ही जगह उपलब्ध चीजों से अपना मजबूत ढाँचा खड़ा करना। किसी जगह कोई एक सामग्री मिलती है, पर कहीं और वह नहीं-लेकिन कुण्ड वहाँ भी मिलेंगे।
जहाँ पत्थर की पट्टियाँ निकलती हैं, वहाँ कुण्ड का मुख्य भाग उसी से बनता है। कुछ जगह ये उपलब्ध नहीं है। पर वहाँ फोग नाम की झाड़ी खड़ी है साथ देने। फोग की टहनियों को एक दूसरे में गूँथ कर फँसा कर कुण्ड के ऊपर का गुम्बदनुमा ढाँचा बनाया जाता है। इस पर रेत, मिट्टी और चूने का मोटा लेप लगाया जाता है। गुम्बद के ऊपर चढ़ने के लिए भीतर गुथी लकड़ियों का कुछ भाग बाहर निकाल कर रखा जाता है। बीच में पानी निकालने की जगह बनाई जाती है। यहाँ भी वर्षा का पानी कुण्ड के मंडल में बने ओयरों, छेद से जाता है। पत्थर वाले कुण्ड में ओयरों की संख्या एक से अधिक होती है लेकिन फोग की कुण्डियों में सिर्फ एक ही रखी जाती है। कुण्ड का व्यास कोई सात-आठ हाथ, ऊँचाई कोई चार हाथ और पानी लेने वाले छेद प्राय: एक बित्ता बड़े होते हैं। वर्षा का पानी भीतर कुण्ड में जमा करने के बाद बाकी दिनों इसे कपड़े या टाट आदि को लपेट कर बनाए गए एक डाट से ढक कर रखते हैं। फोग वाले कुण्ड थोड़े छोटे होते हैं इसलिए प्राय: कुण्डी कहलाते हैं।
फोग की टहनियों से बना गुंबद भी इस तेज धूप में गरम नहीं होता। उसमें चटक कर दरारें नहीं पड़तीं और भीतर का पानी इन सब बातों के साथ-साथ रेत में रमा रहने के कारण ठंडा बना रहता है।
मरुभूमि में जहाँ कहीं भी जिप्सम या खड़िया पट्टी मिलती है, ऐसे क्षेत्रों में इसी कुण्ड का उपयोग कुण्डी बनाने के लिए किया जाता है। खड़िया के बड़े-बड़े टुकड़े खदान से निकाल कर लकड़ी की आग में पका लिए जाते हैं। एक निश्चित तापमान पर ये बड़े डले यानी टुकड़े टूट-टूट कर छोटे-छोटे नरम टुकड़ों में बदल जाते हैं। फिर इन्हें कूटते हैं। आगोर का ठीक चुनाव कर कुण्डी की खुदाई की जाती है। फिर भीतर की चिनाई और ऊपर का गुम्बद भी इसी खड़िया के चूरे से बनाया जाता है। पाँच-छ: हाथ के व्यास वाला यह गुम्बद कोई एक बित्ता मोटा रखा जाता है। इस पर दो महिलाएँ खड़े होकर पानी निकालें तो भी यह टूटता नहीं।
मरुभूमि में कई जगह चट्टाने हैं। इनमें पत्थर की पट्टियाँ निकलती हैं। इन पट्टियों की मदद से बड़े-बड़े कुण्ड तैयार होते हैं। ये पट्टियाँ प्राय: दो हाथ चौड़ी और चौदह हाथ लम्बी रहती है। जितना बड़ा आगोर हो, जितना अधिक पानी एकत्र हो सकता हो, उतना ही बड़ा कुण्ड इन पट्टियों से ढक कर बनाया जाता है।
घर छोटे हों, बड़े हों या पक्के- कुण्ड तो उनमें पक्के तौर पर बनते ही हैं। मरुभूमि में गाँव दूर-दूर बसे हैं। आबादी भी कम है। ऐसे छितरे हुए गाँवों को पानी की किसी केंद्रीय व्यवस्था से जोड़ने का काम सम्भव ही नहीं है। इसलिए समाज ने यहाँ पानी का सारा काम बिल्कुल विकेंद्रित रखा, उसकी जिम्मेदारी को आपस में बूँद-बूँद बाँट लिया। यह काम एक नीरस तकनीक, यांत्रिक, न रह कर एक संस्कार में बदल गया। ये कुण्डियाँ कितनी सुंदर हो सकती हैं, इसका परिचय दे सकते हैं जैसलमेर की सीमा पर बसे अनेक गाँव।
ये इलाके वर्षा के आँकड़ों में भी सबसे कम हैं और आबादी के घनत्व में भी। आबादी का घनत्व यहाँ पर पाँच, सात व्यक्ति प्रति किलोमीटर है। दस-बीस घरों या ढाणियों के गाँव रेत के विस्तार में एक दूसरे से बहुत दूर-दूर बसे हैं। ऐसी बसावट के लिए पीने का पानी घर-घर के लिए जुटाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती रही है। लेकिन हमारे परम्परागत समाज में इसको बहुत व्यावहारिक ढंग से हल करके दिखाया है। ऐसे गाँव में हरेक घर के आगे एक बड़ा-सा चबूतरा बनाया जाता है। इसे जमीन से ऊपर कोई दो फुट रखा जाता है और जमीन से नीचे कोई दस फुट गहरा कुण्ड होता है। इनमें घर की छत और आँगन से वर्षा का पानी छानकर एकत्र किया जाता है। जिस घर की सदस्य संख्या ज्यादा होगी उस घर का आकार भी बड़ा होगा और उसी हिसाब से उस घर की छत, उसका आँगन और उसका कुण्ड भी बनाया जाता है। इन कुण्डों के भीतर बहुत सफाई से ऐसी प्लास्ट्रिंग की जाती है कि उसमें एकत्र पानी रिस कर रेत में गायब न हो जाए।
राजस्थान में जल संरक्षण
आज देश के बहुत सारे बड़े शहरों में - दिल्ली चेन्नई, बैंगलोर आदि में सरकारों ने वर्षा के जल का संग्रह करने के लिए नए कानून बनाए हैं। इन कानूनों के कारण अब हर घर को अपनी छत पर बरसने वाले पानी को अनिवार्य रूप से एकत्र करना है या उससे भूजल को रिचार्ज करना है।
लेकिन सर्वे बताते हैं कि ज्यादातर घरों में यह कानून प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हो पाया है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि रेगिस्तान के अनपढ़ और पिछड़े माने गए गाँव और कस्बों में लोगों ने सैकड़ों बरस से इस पद्धति को अपने जीवन का एक अनिवार्य अंग बना लिया था। उन्होंने यह सब किया तो इसीलिए नहीं कि कानून उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करता है। उन्होंने इसे बाध्य नहीं साध्य माना है। मरुभूमि के लोगों ने अपने पुरखों को ऐसा करते देखा, ऐसा करते सुना। उनकी स्मृति और श्रुति उन्हें इस व्यावहारिक पद्धति की तरफ ले गई। इस स्मृति और श्रुति से यह रीति बन गई और फिर कानून के बराबर बनते रहने वाली कृति भी बन गई।
इन टाँकों के भीतर का डिजाइन भी समाज ने लगातार उन्नत किया है। इनमें भीतर रेत या गाद न जमे, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। इसकी पहली सावधानी छत या आँगन में बरती जाती है - जहाँ से पानी एकत्र होता है। दूसरी सावधानी टाँके में प्रवेश से ठीक पहले बनाई जाने वाली संरचना में देखने को मिलती है। अधिकांश रेत या कचरा इन दोनों जगहों पर रोक लिया जाता है। लेकिन फिर भी यदि कुछ रेत कण मुख्य टाँके में चले जाएँ,  तो उनको सरलता से एकत्र कर निकालने का भी पुख्ता इंतजाम इन टाँकों में देखने को मिलता है। भीतर से टाँके गोल हों या चौकोर उनका तल दीवार या परिधि से नब्बे डिग्री के कोण से नहीं जुड़ता। वह हल्की-सी गोलाई लिए रहता है। फिर यह तल भी पूरी तरह समतल नहीं रहता। कुण्ड के आकार के अनुसार इसके बीच में थोड़ी ढाल के साथ एक कढ़ाईनुमा ढाँचा और बनाया जाता है। इसमें पानी के साथ आए हुए रेत के कण धीरे-धीरे जमा हो जाते हैं। दो-चार वर्षों के अंतर पर इसका निरीक्षण किया जाता है और फिर कुण्ड में नीचे उतरकर आसानी से रेत को अलग कर लिया जाता है। कहीं कोण से उतरती हुई सीढिय़ाँ होती हैं तो कहीं खड़ी सीढ़ियाँ। जगह कम हो तो केवल पंजे रखने लायक खाँचे बनाये जाते हैं।
मरुभूमि में कहीं-कहीं छोटे तालाबों के साथ उनके जलग्रहण क्षेत्र में भी टाँके मिलते हैं। इनको बनाने के पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक कारण रहा है। पानी का काम करने वाले नए लोगों को, संस्थाओं को और शासन को भी ऐसी अनोखी बातों को समझने का प्रयत्न करना चाहिेए।
इन क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है कभी-कभी इतनी कम कि छोटे जलग्रहण के तालाब पूरी तरह से भर नहीं सकते। इनमें जो थोड़ा पानी आएगा, वह मटमैला होगा और फिर यहाँ की तेज गर्मी और धूप में कीचड़ में बदल सकता है। इसलिए ऐसे छोटे आगोर वाले तालाबों में हमें कहीं-कहीं तालाब में बहकर आने वाले पानी के रास्ते में छोटे कुण्ड या टाँके भी बने मिलते हैं। इनको बनाने का एक ही कारण है - खुले तालाब में जाने से पहले पानी को इन ढके कुण्डों में रोक लेना। ऐसे सभी टाँकों की क्षमता बीस से पचास हजार लीटर तक ही होती है। पक्का बना ढका हुआ टाँका थोड़ी-सी मात्रा में आए पानी को अगले कुछ महीनों तक साफ-सुथरे ढंग से पीने के लिए सुरक्षित रखता है।
पानी का काम करने वाले नए संगठनों को, स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने समाज में चारों तरफ बिखरी ऐसी अनोखी समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध रचनाओं को बनाने का, फैलाने का पूरा ध्यान रखना चाहिए। इससे उनका काम बहुत कम खर्च में कम पैसे में अधिक से अधिक जगहों में फैल सकता है।
छत से वर्षा के जल का संग्रहण
रेगिस्तानी क्षेत्रों के अनेक भागों और विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में जहाँ अच्छी किस्म का भूजल उपलब्ध नहीं है, अथवा सतही जल संसाधन बहुत दूरी पर अवस्थित है, आने वाले समय में भी घरेलू जल आपूर्ति का वर्षाजल ही एक मात्र स्रोत है। इन क्षेत्रों मे घर की छत पर बरसने वाले जल को वर्षा ऋतु के बाद में उपयोग हेतु अच्छी प्रकार से बनी नालियों एवं पाइपों के द्वारा नियंत्रित कर भंडारण हेतु सतह के ऊपर अथवा अधोसतही पक्के टैंक अथवा टाँकों में एकत्र किया जाता है। यदि भंडारित जल का उपयोग पीने हेतु करना है तो नाली के सामने ही जल के साथ आ सकने वाले कचरे को रोकने का उचित प्रबंध किया जाता है इससे जल छनकर नीचे टाँके में जमा होता है। टाँके का आकार मुख्य रूप से छत के नाप पर आधारित होता है। यथायोग्य टाँकों में जल की इतनी मात्रा भरी जा सकती है, जो आगामी वर्षा के पूर्व तक यथोचित लंबी अवधि हेतु पर्याप्त जल आपूर्ति सुनिश्चित कर सकें और लोगों को मान्य रूप में राहत पहुँचा सके। इस प्रकार से एकत्र और संचित जल से उन क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई हेतु जल की प्राप्ति कठिन हो, छोटे भूमि के टुकड़ों में जैसे गृह वाटिकाओं और सब्जी उत्पादन के लिए सिंचाई भी की जा सकती है।
लोहे की चद्दरों केवलू अथवा खपरैल और अन्य सभी प्रकार की पक्की छतें जो चिकनी, कठोर एवं घनी हों, छतों से वर्षा के जल का संग्रहण करने के उद्देश्य से सर्वाधिक उपयुक्त हैं।
इस पद्धति का वास्तविक आकार विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। टाँके के आकार मुख्य रूप से पद्धति की लागत, एकत्रित किए जाने वाले वर्षा के जल की मात्रा, टाँके के मालिकों की आकांक्षाएँ एवं जरूरतें और बाहरी मदद के स्तर से प्रभावित होंगी।
छत से प्राप्त हो सकने वाले जल की मात्रा की गणना इस सूत्र से कर सकते हैं-
एकत्रित जल (लीटर में) = छत का क्षेत्रफल (वर्ग मी.) x वर्षा (मि.मी.)। टैंक अथवा टाँके के आयतन की गणना निम्नांकित सूत्र से की जा सकती है :
V = (t x n x q) + et
जहां V = टाँके का आयतन (लीटर में) t = सूखे मौसम की अवधि (दिनों में) n = उपभोक्ताओं की संख्या, q = उपभोग प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (लीटर में, ) और et = सूखे मौसम में वाष्पन द्वारा जल ह्रास।
क्योंकि बंद टैंक से वाष्पन लगभग नगण्य होता है, अतः वाष्पन में होने वाले जल के ह्रास (et) को नजरअंदाज (= शून्य) किया जा सकता है।
राजस्थान में जल संरक्षण आकांक्षित जल ग्रहण क्षेत्र का क्षेत्रफल (यानी छत का क्षेत्रफल) ज्ञात करने हेतु टैंक के आयतन (कुल भराव क्षमता) में पिछले मानसूनों में एकत्रित हुए औसत वर्षाजल की कुल मात्रा (लीटर में) प्रति इकाई क्षेत्र (वर्ग मी.) से भाग देने के बाद उसे अपवाह गुणांक से गुणा कर दें (अपवाह गुणांक, यानी वर्षा का वह भाग जिसका वास्तव में संग्रहण किया जा सकता है, जो 0.8केवलू अथवा खपरैल की छतों से 0.9 लोहे की चद्दरों वाली छतों के अनुसार है)। (समाप्त) जल संग्रहण एवं प्रबंध पुस्तक से साभार

दो कविताएँ:

 - डॉ. सरस्वती माथुर
1. नि:शब्द नींद!

पौधे की तरह
उग जाता है
एक सपना
जब आँखों में
तो देर तक मैं
नैन तलैया में
गोते लगाती हूँ
नि:शब्द नींद
चिड़िया की तरह
उड़ती हुई जब
थक जाती है तो
रूह- सी उड़
मेरी देह पर एक
दंश छोड़ जाती है
मेरे जीवन को
नए मोड़ पर
छोड़ जाती है।

2. निरंतर बहो!

लहरो! तुम
मन सागर में
सिहरता स्पर्श हो
हरहराते हुए जब भी 
गहराई में उतर मैं
नदी-सी तुम्हारे
भीतर के सागर से
मिल जाती हूँ तो
उसके अमृत रस में
मेरा अस्तित्व भी
समाहित हो जाता है
मुझे नव संदेश देता है कि
निरंतर बहो- बहती रहो
सच लहरो ! तुम तो
गति देने वाला
चक्रशील एक संघर्ष हो
तुम्ही  ने सिखाया है
तूफानों से जूझ कर
शांत होना
अपने दर्द को
किसी से ना कहना !

पर्यावरण

            कटते जंगल,पटते तालाब,
                     प्रदूषित नदियाँ 
                और बंजर होती जमीन

                            -प्रो. अश्विनी केशरवानी
गाँव अब शहर में तब्दिल होते जा रहे हैं। आज यहाँ बड़ी बड़ी इमारतें, मोटर-गाड़ी देखे जा सकते हैं। गाँव का गुड़ी/ चौपाल और अमराई आज देखने को नहीं मिलता... नई पीढ़ी के लोगों को मालूम भी नहीं होगा कि गाँवों में ऐसा कुछ रहा भी होगा। हमारे पूर्वजों ने गाँव में अमराई लगाना, कुँआ खुदवाना और तालाब खुदवाना पुण्य कार्य समझा और उसे करवाया। रसीले और पक्के आम का स्वाद भी हमने चखा। आज नई पीढ़ी के बच्चे बोतल में बंद मेंगो जूस, फ्रूटी और आमरस का जेली आदि को सर्वोत्तम भले मान ले लेकिन पलाई आम को चूसने और आम का अमसरा खाने का मजा कुछ और ही था।
मुझे मेरे घर में हमारे पूर्वजों के द्वारा कुँआँ और खुदवाने सम्बन्धी कागजात मिले हैं जिसके एवज में डिप्टी कमिश्नर, रायपुर के द्वारा प्रशस्ति पत्र दिये गये हैं। अर्थात! उस काल में कुँआँ और तालाब खुदवाना अत्यंत पुण्य कार्य था। तालाबों के किनारे बरगद, पीपल और नीम के पेड़ लगवाये गए थे जिसकी छाँव में हमारा बचपन गुजरा था। मेरी दादी बताती है कि उनका 5-6 वर्ष का बच्चा खत्म हो गया जिसकी याद में उनके ससुर ने छुइया तालाब के किनारे पाँच पेड़ लगवाए थे जिसकी छाया आज भी सबको मिलती है। प्राय: सभी गाँवों में अनेक तालाब, तालाब के किनारे पेड़ और शिव मंदिर अवश्य होते थे। इसी प्रकार धर्मार्थ कुँएँ खुदवाए जाते थे। तालाब ‘वाटरहार्वेस्टिंग’ का बहुत अच्छा माध्यम था।
आज गांवों की तस्वीर बदली हुई है। लोगों ने घरों के फर्नीचर के लिए अमराई के पेड़ों को कटवा डाला है। आज वहाँ पेड़ों के ठूँठ ही शेष हैं। अमराई के आमों की बातें किस्से कहानियों जैसे लगता है। तालाब अब जाना नहीं होता क्योंकि घरों में बोरिंग हो गया है, पंचायत द्वारा पानी सप्लाई भी की जाती है... अर्थात् घर बैठे पानी की सुविधा हो गयी है। इसलिए तालाब की उपयोगिता या तो मछली पालन के लिए रह गयी है या फिर उसे पाटकर इमारत बनाये जा रहे हैं। गाँव से शहर बन रहे कस्बों के तालाबों में घरों का गंदा पानी डाला जा रहा है। रतनपुर, मल्हार, खरौद और अड़भार में कभी 120 से 1400 तालाब होने की बात कही जाती है। रायगढ़ में इतने तालाब थे कि उसे ‘खइया गाँव‘ के नाम से संबोधित किया जाने लगा था। लेकिन आज वहाँ कुछ ही तालाब शेष हैं बाकी सबको पाटकर बड़ी बड़ी इमारतें, स्कूल-कालेज और सिनेमा हाल बना दिया गया है। कहना न होगा कि तालाब और नदियों के किनारे लगे पेड़ों के जड़ मिट्टी को बांधे रखता था, जिसके कटने से नदियों का कटाव बढ़ते जा रहा है और आने वाले समय में समूचे गाँव के नदी में समा जाने का खतरा बनने लगा है।
 गाँव के बाहर प्राय: सभी छोटे-बड़े किसानों का ‘घुरवा‘ होता था जिसमें गाय और भैंस का गोबर डाला जाता था। भविष्य में यही उत्तम खाद बन जाता था और बरसात के पहले उसे खेतों में डाला जाता था जिससे खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती थी और पैदावार अच्छी होती थी। तब दुबराज चावल की खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। आज गाँवों में ऐसा कुछ नहीं होता क्योंकि आज हल की जगह ट्रेक्टर, गोबर खाद की जगह यूरिया खाद ले लिया है। पानी नहीं बरसा तो नहर से लिया जाता है जब नहर से पानी नहीं मिला तो ट्यूबबेल खोदकर पानी खींचकर सिंचाई की जाती है। फसल में कीड़े हो जाते हैं तो कीट नाशक दवाइयाँ डाली जाती है। भले ही अब दुबराज चावल में खुशबू नहीं है लेकिन सरकार द्वारा कम समय में अधिक पैदावार वाले धान के बीज उपलब्ध करा दिया जाता है। 
किसानों की  चिन्ता  है कि उनके बच्चे खेतों में जाना नहीं चाहते। वे तो पान ठेला, होटल और अन्य दुकान खोलकर जीने के आदी होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी के खेती-किसानी के प्रतिअरुचि से खेत बंजर होते जा रहे हैं, यह  चिन्ता  की बात है। घर में खाने को कुछ हो या न हो लेकिन एक मोटर साइकल अवश्य होना चाहिये। इसके लिए बैंक और फ़ाइनेंसिंगकंपनियाँ लोन देने को तैयार बैठे हैं। लोन के कर्ज में घर भले ही डूब जाए, इससे किसी को कुछ लेना देना नहीं होता। लोगों का मानना है कि कर्ज में हम जन्म लेते हैं, कर्ज में जीते हैं और कर्ज लिये मर जाते हैं...।

खुशी की बात है कि नदी किनारे वाले गाँवों में औद्योगिक प्रतिष्ठान लगते जा रहे हैं। लोगों को उम्मीद है कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लगने से उन्हें रोजगार मिल जाएगा, व्यापारियों का व्यापार बढ़ जायेगा, मकान मालिकों को किरायेदार मिल जायेगा.....। छत्तीसगढ़ शासन औद्योगिक समूहों को प्रतिष्ठान लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है, यहाँ उन्हें भूमि मुहैया करा रही है तो स्वाभाविक है कि यहाँ औद्योगिक प्रतिष्ठान लगेंगे ही... लगते जा रहे हैं। अकेले रायगढ़ जिले के आसपास लगभग 150 आयरन और पावर प्लांट लग चुके हैं। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिंदल स्पंज और स्टील प्लांट लग चुका है और जल्द ही उनका पावर प्लांट लगने वाला है। इसके लिए केलो नदी में उनका पावर प्लांट लगने वाला है। इसी प्रकार अनेक औद्योगिक प्रतिष्ठान लग चुके हैं और लगते जा रहे हैं। स्वाभाविक रूप से इन सभी प्रतिष्ठानों को पानी की आवश्यकता होगी जिसकी पूर्ति नदियों के ऊपर बने बाँधों से की जा रही है। बाँध के बनने से नदियों में पानी ही नहीं है और है भी तो औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकला रासायन युक्त गंदा पानी है जिससे नदियाँ प्रदूषित हो गईहै।
प्रदेश में औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लगने से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विकास का ग्राफ अवश्य बढ़ा है। लेकिन विकास के साथ साथ अनेक प्रकार की बुराइयाँ भी आती हैं जिसे प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकला धुँआँ जहाँ पेड़ों के चक्रीय जीवन को प्रभावित कर रहा है, वहीं उसके धुएँ से खेत की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है और खेत बंजर होते जा रहे हैं। अधिकतर नदियों में बाँध बनाये जा चुके हैं जिससे नदियाँ सूख गयी है। उसमें जो थोड़ा बहुत जल है उसमें औद्योगिक प्रतिष्ठानों का रसायन युक्त गंदा पानी प्रवाहित हो रहा है। इससे जन जीवन अस्त व्यस्त होते जा रहा है।
आज फसल चक्र की बात की जाती है... फ सल चक्र तो नहीं बदला लेकिन जलवायु परिवर्तन अवश्य हो गया है। एक ही नगर में कहीं बरसात होती है तो कहीं नहीं होती। जल का चक्र के प्रभावित होने से ऐसा होता है। जलवायु परिवर्तन विकसित और विकासशील देशों के बीच वाद विवाद का विषय जरूर बना है लेकिन सच्चाई यह है कि हवा, पानी, भोजन, स्वास्थ्य, खेती, आवास आदि सभी के ऊपर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाला है। समुद्री जल स्तर केबढ़ने से प्रभावित होते तटीय क्षेत्र के लोग हों या असामान्य मानसून अथवा जल संकट से त्रस्त किसान, विनाशकारी समुद्री तूफान का कहर झेलते तटवासी हों अथवा सूखे से त्रस्त और असमान्य मौसम से जनितअजीबो-गरीब बीमारियां झेलते लोग या फिर विनाशकारी बाढ़ में अपना सब कुछ गवाँ बैठे और दूसरे क्षेत्रों में पलायन करते तमाम लोग जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं।
प्रकृति के तीन उपकार: मिट्टी पानी और बयार
  औद्योगिक क्रांति की भट्ठी में हमने अपना जंगल झोंक दिया है। पेड़ काट डाले और सडक़ें बना डालीं। कुल्हाड़ी-आरी से जंगल काटने में देर होती थी, तो पावर से चलने वाली आरियाँ गढ़ डालीं। सन् 1950 से 2000 के बीच 50वर्षो में दुनिया के लगभग आधे जंगल काट डाले, आज भी बेरहमी से काटे जा रहे हैं। जल संग्रहण के लिए तालाब बनाये जाते थे जिससे खेतों में सिंचाई भी होती थी। लेकिन आज तालाब या तो पाटकर उसमें बड़ी बड़ी इमारतें बनायी जा रही है या उसमें केवल मछली पालन होता है। मछली पालन के लिए कई प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है जिसका तालाबों का पानी अनुपयोगी हो जाता है। इसी प्रकार औद्योगिक धुँएँ से वायुमंडल तो प्रदूषित होता ही है, जमीन भी बंजर होती जा रही है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़नेलगा है और दुष्परिणाम हम भुगत रहे हैं। आखिर जंगल क्यों जरूरी है? पेड़ हमें ऐसा क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है? पेड़ हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी, भोजन, इंधन, इमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और तमाम दुनिया के अद्भुत रसायन देते हैं। इसलिए हमने उसका दोहन (शोषण) तो किया, पर यह भूल गये कि वृक्षों के नहीं होने से यह धरती आज वीरान बनती जा रही है। वनों के इस उपकार का रुपयों में ही हिसाब लगायें तो एक पेड़ 16 लाख रुपये का फायदा देता है। घने जंगलों से भाप बनकर उड़ा पानी वर्षा बनकर वापस आता है और धरती को हरा भरा बनाता है। पेड़ पौधों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रहती है। पेड़ों की कटाई से धरती की हरियाली खत्म हो जाती है। धरती की उपजाऊ मिट्टी को तेज बौछारों का पानी बहा ले जाती है। पेड़ों की ढाल के बिना पानी की तेज धाराएँपहाड़ों से उतर कर मैदानों को डुबाती चली जाती है। हर साल बाढ़ का पानी अपने साथ 600 करोड़ टन मिट्टी बहा ले जता है। मिट्टी के इस भयावह कटाव को रोकने का एक ही उपाय है-वृक्षारोपण। मिट्टी, पानी और बयार, ये तीन उपकार हैं वनों के हम पर। इसलिए हमारे देश में प्राचीन काल से पेड़ों की पूजा होती आयी है।                           
सम्पर्क: राघव, डागा कालोनी, चाम्पा (छ.ग.)         

उदास है नदी

उदास है नदी 

- गोर्वधन यादव

(1)
सूख कर काँटा हो गई नदी
पता नहीं, किस दुख की मारी है बेचारी?
न कुछ कहती है, न कुछ बताती है।
एक वाचाल नदी का -
इस तरह मौन हो जाने का -
भला, क्या अर्थ हो सकता है?
(2)
नदी क्या सूखी
सूख गए झरने
सूखने लगे झाड़-झंखाड़
उजाड़ हो गए पहाड़
बेमौत मरने लगे जलचर
पंछियों ने छोड़ दिए बसेरे
क्या कोई इस तरह
अपनों को छोड़ जाता है?.
(3)
उदास नदी
उदासी भरे गीत गाती है
अब कोई नहीं होता
संगतकार उसके साथ
घरघूले बनाते बच्चे भी
नहीं आते अब उसके पास
चिलचिलाती धूप में जलती रेत
उसकी उदासी और बढ़ा देती है
(4)
सिर धुनती है नदी अपना
क्यों छोड़ आयी बाबुल का घर
न आयी होती तो अच्छा था
व्यर्थ ही न बहाना पड़ता उसे
शहरों की तमाम गन्दगी
जली-अधजली लाशें
मरे हुए ढोर-डंगर
(5)
नदी-
उस दिन
और उदास हो गई थी
जिस दिन
एक स्त्री
अपने बच्चों सहित
कूद पड़ी थी उसमें
और चाहकर भी वह उन्हें
बचा नहीं पाई थी।
(6)
नदी-
इस बात को लेकर भी
बहुत उदास थी कि
उसके भीतर रहने वाली मछली
उसका पानी नहीं पीती
कितनी अजीब बात है
क्या यह अच्छी बात है?
(7)
घर छोडक़र
फिर कभी न लौटने की टीस
कितनी भयानक होती है
कितनी पीड़ा पहुँचाती है
इस पीड़ा को
नदी के अलावा
कौन भला जान पाता है?
(8)
दुखियारी नदी
अपना दु:ख बतलाने से पहले ही
मनमसोसकर रह जाती है, कि
जब लोग-
देश की ही कद्र नहीं करते
तो फिर भला कौन-
उसकी कद्र करेगा?
(9)
नदी
महज इसलिए दु:खी नहीं है,
कि लोग उसमें कूड़ा डालते हैं
महिलाएँ गंदे कपड़े धोती है,
और विसर्जित की जाती हैं
आदमकद प्रतिमाएँ
फूल मालाएँ और
न जाने क्या-क्या
वह दु:खी होती है
तो इस बात पर, कि
लोग यह जानना ही नहीं चाहते,
कि किस बात का
दु:ख है नदी को?
(10)
बैठकर नदी के किनारे
कितने ही ग्रंथ रच डाले थे
अनाम ऋषि-मुनियों ने।
नदी तो अब भी बह रही है-
जैसे की कभी बहा करती थी
क्या कोई यह बता सकता है
आज किसने क्या लिखा -
कब लिखा और
कितना सार्थक लिखा?
(11)
नहीं जानती नदी
अपना जनम दिन
और न ही जानती वह
किसी तिथि और वार को
जनमी थी वह।
वह तो केवल
इतना भर जानती है, कि
उसे बहते ही रहना है-
हर हाल में।