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Mar 10, 2017

…और हर साल गाँव पहुँच जाता हूँ...

और हर साल गाँव पहुँच जाता हूँ...
- संजीव तिवारी
छत्तीसगढ़ सहित भारत के सभी गाँवों में होली का पहले जैसा माहौल अब नहीं रहा, विकास की बयार गाँवों तक पहुँच गई है किन्तु उसने समाज में स्वाभाविक ग्रामीण भाईचारा को भी उड़ा कर गाँवों से दूर फेंक दिया। इसके बावजूद रंगों के इस त्यौहार का अपना अलग मजा है और गाँव में तो इस पर्व का उल्लास देखने लायक रहता है। गाँव मेरे रग-रग में बसा हैं इसलिए मेरे 13 वर्षीय पुत्र के ना-नुकुर के बावजूद हम छत्तीसगढ़ के शिवनाथ नदी के तीर बसे अपने छोटे से गाँव में चले गये होली मनाने ।
मुझे अपने बीते दिनों की होली याद आती है जब हम सभी मिलजुल कर गाँव के चौपाल में होली के दिन संध्या नगाड़े व मांदर के थापों के साथ फाग गाते हुए होली मनाते थे। समूचा गाँव उड़ते रंग-अबीर के साथ नाचता था। तब न ही हमारे गाँव में बिजली के तारों नें प्रवेश किया था और न ही ध्वनिविस्तारक यंत्रों का प्रयोग होता था। गाँव में प्रधान मंत्री पक्की सडक के स्थान पर गाडा रावनव एकपंइया (पगडंडी) रास्ता ही गाँव पहुचने का एकमात्र विकल्प होता था फिर भी इलाहाबाद, आसाम, जम्मू, कानपूर, लखनऊ और पता नहीं कहाँ कहाँ से कमाने खाने गए गाँव के मजदूर होली के दिन गाँव में एकत्रित हो जाते थे। अद्भुत भाईचारे व प्रेम के साथ एक दूसरे के साथ मिलते थे और फागगाते हुए रंग खेलते थे। नशा के नाम पर भंग के गिलास बँटते थे और अनुशासित उमंग व मस्ती छाये लोगों का हूजूम मिलजुलकर होली खेलता था।
अब गाँव में वो बात नहीं रही, आधुनिकता नें परंपराओं को पछाड़ दिया, बडे बुजुर्ग अपने गिर चुके दाँतों और ढ़ीली पड़ गई लगाम का रोना रोते हुए इसे त्यौहार के रूप में स्थापित करने पर तुले हुए हैं पर गाँवों में गली-गली खुले शराब के अवैध दुकान के प्रभाव से गाँव के लोगों को अब यह लगने लगा है कि होली, शराब के बिना अधूरी है। शराब से मदमस्त गाँव में होली का मतलब सिर्फ हुडदंग रह गया है। रंग में सराबोर गिरते-पड़ते, उल्टियाँ करते, लड़ते-झगड़ते लोगों का अमर्यादित नाट्य प्रदर्शन ।
इन सब का दंश झेलते होली के दिन संध्या तीन बजे मेरे चौपाल पहुँचने से अंधेरे घिर आने तक तीन जोड़ी सार्वजनिक नगाड़े फूट चुके थे। शराब में धुत्त लोग फागके नाम पर नगाड़ों पर, अपनी शक्ति आजमाइश कर रहे थे। शिकायतों व लड़ाईयों में समय सरकता जा रहा था। सार्वजनिक चौपाल में फागसुनने को उद्धत मन को तब सुकून मिला जब मित्रों नें मौखिक शक्ति प्रदर्शन किया और ईश्वर नें भी शराबियों को पस्त किया। और सभी रंजों को भुलाकर धुर ग्रामीण 'फागका मजा हमने लिया ।
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला अब गोरि के
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल...
पवन चले अलबेला अब गोरि के
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल...
(बसंत में गोरी के बाल कंधों से उड़-उड़ रहे हैं क्योंकि अलबेला पवन चल रहा है)
पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष बहुत इंतजार व उदासी के बाद प्राप्त इन्हीं क्षणों से बार-बार साक्षातकार के बाद सोचता हूँ कि अब अगले साल गाँव नहीं आउँगा। पर जड़ों को पकड़े रहना पता नहीं क्यूँ अच्छा लगता है और हर साल गाँव पहुँच जाता हूँ।
Email- tiwari.sanjeeva@gmail.com

दूसरे लोक में ले जाने की यात्रा

दूसरे लोक में 
ले जाने की यात्रा 
- साधना मदान
मंदिर में ज़ोर से बजती घंटियाँ और प्रभु समक्ष दंडवत प्रणाम ये सब जैसे भक्त को भावनाओं की नाव में बैठाकर एक दूसरे ही लोक में ले जाने की यात्रा है।
मंदिर, भजन, करताल, ढोलक और मूरत का सुमिरन ये सब भक्त और भगवान का अलौकिक मिलन है। हृदय का तार जब निरंतर नाम स्मरण में जुड़ जाता है तो चेहरा रोशन हो जाता है। मंत्र का वरदान तो अटूट विश्वास के सागर का मंगल स्नान जैसा होता है।
     सोचती हूँ भक्ति बचपन में संतों का परिचय या भावमयी कथा सुनने का नाम है। युवाकाल में भक्ति भगवान से सरूर का नाम है और बुढ़ापे में भक्ति नियम,सहारे और सकून का बल है। भक्ति कीर्तन की शहनाई है,भक्ति कर्ण रस का माधुर्य है,भक्ति मगन हो लगन की शक्ति है। केसरिया रंग और माथे पर तिलक प्रभु संग रहने का संदेश है। भक्ति छप्पन व्यंजन का भोग है। भंडारे में भजन गाते- गाते प्रभु प्रसाद की चाहना है।
  साथियों! भक्ति का यह राग नया नहीं है। हवन, कथा प्रवचन, प्रभात फ़ेरी और जलूस सब देखते देखते हम सब बड़े हुए हैं। पर फिर भी अंतर्मन क्यों निराशा, उदासी, अलबेलेपन के कटघरे में उलझा हुआ है? क्यों मन और बुद्धि एक नूर से दूर है। चिंता का चिंतन कठिन परिस्थितियों में हमें खोखला कर देता है। चाहिए-चाहिए की ललक भगवान को चंद रूपयों का प्रलोभन देने की किस प्रवृत्ति का नाम है? कहते हैं भगवान भक्ति का भूखा है। चावल के दाने लेकर महल देता है।गोपियों की ललक और तड़प देख सबके साथ रास रचाने की रीति को पूर्ण करता है। पर मेरा यह बोझिल मन और तर्कमयी बुद्धि क्यों कोई परिवर्तन को महसूस नहीं कर पाती। एक विचार उठती गिरती लहरों की तरह मुझसे पूछता है भक्ति का रंग और संग तेरे चेहरे और चलन से दूर क्यों है।
  अकसर लोग कहते हैं हमें भक्ति का दिखावा पसंद नहीं। हमें ढोंगी गुरु नहीं भाते। कोई नियम नहीं,कोई रीति नहीं, कोई पौराणिक प्रसंगों से सरोकार नहीं। ऐसी जीवन शैली में भक्ति से पल्ला झाड़ते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि चित्त की खाली स्लेट पर कौन से रंग भरूँ। कौन सी ऐसी मिट्टी से चित्त के चौके को लीपूँ। ऐसे कौन से सुर सजाऊँ कि मन की वीणा लयबद्ध हो जाए। ऐसी कौन सी समझ आवे कि वक्ता नहीं वक्तव्य समझ में आ जाए। ऐसा कौन सा अभ्यास करुँ कि बुढ़ापे मे अपने किए कार्यो का गाना मैं न गाऊँ तब कोई अपने चंद प्रियजन संगी सहयोगी बन मेरे अकेलेपन को भर दें।
           ये सब प्रश्न मानस पटल पर हिलोरे ले ही रहे थे कि कबीर साहब की यह साखी मुझसे मिलने आ गई…..
   हम घर जाल्या आपणा लिया मुराड़ा हाथि ।
   अब घर जाल्यां तास का जो चले हमारे साथि ।

ऐसे ही कबीर और नानक से जब जब मिलती हूँ तो मन के इकतारे से भक्ति के सुर ज्ञान की हुंकार में बदल जाते हैं। भक्ति भावना का प्रवाह है और ज्ञान इस प्रवाह को संतुलन और सामर्थ्य प्रदान करता है। कहा जाता है भक्ति का फल ज्ञान और ज्ञान का फल भगवान है।
भावना, संवेदना, करुणा, सहानुभूति और समर्पण की रसधारा तभी बहेगी जब आत्मशक्ति का दीपक साथ साथ जलेगा। आत्मत्राण के लिए ज्योति-पुञ्ज से सान्त्वना,सहायता या तसल्ली नहीं बल-पौरुष,आत्मिक शक्ति का ज्वाला कण लेने का अधिकार रखेंगे। जिस दिन आस्था में सत्यता झलकेगी उस दिन प्रभु प्रेम में सिक्त मन कह उठेगा….मनुष्य मात्र बंधु है...यही बड़ा विवेक है।  कई बार सोचती हूँ जब भक्ति में उमंग उत्साह के पंख लग जाते हैं तो उड़ान मेरे कर्म को दिव्यलोक तक ले जाती है।तब एक झंकार सुनाई देती है ,एक चेतना का आभास होता है कि अपने ऊपर आप ही कृपा करनी है। शुभ भावना का चँवर जब डुलेगा तो मनसा, वाचा कर्मणा का सौरभ आत्मशक्ति के शंख के साथ साथ प्रभु सुमिरन का भजन बन जाएगा।  
    एक प्रयास का अभ्यास कर रही हूँ कि अकेले भक्ति का रास्ता नहीं पूरा चल पाऊँगी जब तक ज्ञान की पगडंडी पर स्नेह,सहयोग और सामर्थ्य की पौध नहीं लगाऊँगी। सिर्फ़ भक्ति से स्वपरिवर्तन संभव नहीं और सिर्फ़ ज्ञान से प्रेम पूर्ण नहीं होता। यदि सूर का सखा भाव वात्सल्य का ओस कण है तो कबीर की साखी आत्म चिंतन का ज्वाला कण है। भक्ति अश्रु है तो ज्ञान शक्ति है। भक्ति कर्ण रस है तो ज्ञान आत्मबल है। भक्ति गुहार है तो ज्ञान हुंकार है।भक्ति आस्था है तो ज्ञान अंतरैक्य-मिलन है। भक्ति स्वाद है और ज्ञान प्रसाद है। भक्ति स्वमान है तो ज्ञान कल्याण है। भक्ति जय-जयकार है और ज्ञान स्वयं का उद्घोष है। अतः इस कर्म क्षेत्र में स्वयं सितारा बन अपनी ऊर्जा से प्रेम की रश्मि का प्रसार करें। अतः यह तो स्पष्ट हो ही रहा है कि सिर्फ़ भजन, कीर्तन या कथा श्रवण से संपूर्ण प्राप्ति संभव नहीं जब तक अपने आप से मुख़ातिब न हों। अपने आप को टटोलना और बदलना यही ज्ञान की गूँज है तब कोई तो अवश्य कहेगा……
       तेरे चेहरे से उसकी रोशनी का पता चल गया

प्रवक्ता हिन्दी, कुलाची हंसराज मॉडल स्कूल, अशोक विहार दिल्ली -1100052

ग़म की हाला

 ग़म की हाला 
- शशि पुरवार

होठों पर मुस्कान सजाकर
हमने, ग़म की पी है हाला

ख्वाबों की बदली परिभाषा
जब अपनों को लड़ते देखा
लड़की होने का ग़मउनकी
आँखों में है पलते देखा

छोटे भ्राता के आने पर
फिर ममता का छलका प्याला

रातो-रात बना है छोटा
सबकी आँखों का तारा
झोली भर-भर मिली दुआएँ
भूल गया घर हमको सारा

छोटे के लालन - पालन में
रंग भरे सपनो की माला

बेटे - बेटी के अंतर को
कई बार है हमने देखा
बिन माँगे, बेटा सब पा
बेटी माँगे तब है लेखा

आशाओ का गला घोटकर
अधरो, लगा लिया है ताला

होठों पर मुस्कान सजाकर
हमने, ग़म की पी है हाला

सम्पर्क: क/ ३० , गुलमोहर आवास, ७ क्वीन गार्डनअल्पबचत भवन के पीछे  कैंप, पुणे, महाराष्ट्र - ४११००१ , Mobile no. – 09420519803

अफ़सर करे न चाकरी

अफ़सर करे न चाकरी 
- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
'अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम। दास मलूका कह गए सबके दाता राम।'
राम सबके दाता हैं - अजगर के भी, पंछी के भी और आज के हालात में अफ़सर के भी। हम यह मानते कि अफ़सर भी नौकरी करता है, पापी पेट के लिए या यों कहें कि जो कुछ भी अफ़सर करता है केवल पापी पेट के लिए करता है, अपने पेट के लिए। दूसरों के भी पेट में कौर पहुँचे, इस बात का उसको अहसास नहीं होना चाहिए। वैसे यह अहसास उसे तब ज़रूर हो जाता है, जब उससे भी बड़े पेटवाला उसका पेट काटने के लिए आ धमकता है। ऐसी विषम परिस्थिति आने पर छोटे पेट में दर्द होना ज़रूरी है। जब तक खाने को मिले तब तक ही पेट-दर्द से मुक्ति मिल सकती है। जहाँ खाने के अवसर नगण्य होते हैं, वहाँ असली अफ़सर रहना नहीं चाहता। वह पराए माल पर ही मस्त रह सकता है। पराया माल खाए बिना उसके पेट में मरोड़ शुरू हो जाती है। वह जब चाहे जहाँ चाहे जिस समय खड़ेखड़े देश को बेच सकता है। भला यदि अफ़सर नहीं खाएगा तो क्या किसी मन्दिर में बैठकर शंख बजाएगा? अपना खाकर कोई कितने दिन ज़िन्दा रह सकता है!
     अफ़सर बनना एक खुशी का अवसर है। जैसे हर कोई डाकू नहीं बन सकता वैसे ही हर कोई अफ़सर नहीं बन सकता। अफ़सर बनने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है, उनमें ये तीन चीज़े सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं - समझदारी, संवेदना और दूरदृष्टि। समझदारी से काम करनेवाला व्यक्ति अफ़सर नहीं बन सकता। यदि दुर्भाग्य से बन भी गया, तो बहुत दिनों तक चल नहीं सकता। वह अफ़सर भी किस काम का, जिसके किए गए कार्यों पर लोगों को माथा न पीटना पड़े, छाती न कूटनी पड़े, हाय-हाय! न करनी पड़े। वह बेसिर -पैर की बात करता है, बेसिर-पैर के काम करता है। लोग जब उसकी करतूतों से दु:खी होकर कपड़े फाड़ने, बाल नोंचने को मजबूर होने लगते हैं, उस समय वह वातानुकूलित कक्ष में बैठकर मेज़ पर पैर रखकर आराम करता है या कैण्टीन वाले की मुफ़्त की चाय पीकर काजू-बादाम खाकर खुद को हल्का महसूस करता है।
संवेदना से उसका कोई लेना-देना नहीं होता है। संवेदनशील व्यक्ति तुरन्त द्रवित हो जाता है। अफ़सर अगर द्रवित हो जाएगा ,तो ग्लेशियर की तरह पिघलकर विलीन हो जाएगा। उसे तो 'बोलहिं मधुर वचन जिमि मोरा, खायहिं महा अहि हृदय कठोरा' जैसा होना चाहिए। कोई मर भी जाए तो उसे द्रवित नहीं होना चाहिए। उसके द्वारा ख़रीदी बुलेट्प्रूफ़ जैकेट से अगर गोली भी पार हो जाए तो उसकी सेहत पर असर नहीं पड़ता ;क्योंकि जिसको मरना है, वह तो तो मरेगा ही, चाहे दुश्मन की गोली से मरे ,चाहे डॉक्टर द्वारा दी गई दवाई की नकली गोली से। जनता पर उसका उसी तरह का अधिकार होता है, जिस तरह गरीब की जोरू पर सभी पड़ोसियों का अधिकार होता है। दान-पुण्य की बीमारी से उसे दूर रहना चाहिए। पूजा-पाठ दो-तीन घण्टे ज़रूर करना चाहिए। चाहे ऑफ़िस छूटे,चाहे ऑफ़िस का काम छूटे, इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अधीनस्थ कर्मचारी के साथ उसे 'यूज़ एण्ड थ्रो' का सिद्धान्त अपनाना चाहिए। प्रेम से रहने वाले लोग अफ़सरों के लिए सिरदर्द बनते हैं। भला वह अफ़सर किस काम का जो दूसरों के सिर-दर्द का ताज़ खुद पहनकर घूमता फिरे। सच्चा अफ़सर, तो वह है जो सिर-दर्द को मन्दिर के प्रसाद की तरह सब मातहतों में बाँटता रहता है।      
परफ़ैक्ट अफ़सर वही है,जिसमें दृष्टि का अभाव हो। अफ़सर अगर हर बात को तुरन्त समझने की मशक्कत करेगा, तो सक्रिय होना पड़ेगा। सक्रियता से अफ़सरशाही पर बट्टा लगता है। हर काम को पेचीदा बनाकर इतना उलझा दो कि कोई माई का लाल उसे सुलझाने की हिमाक़त न करे, जो कोशिश करे वह भी उसी में फँसा रह जाए। फँसे हुए लोग ही अफ़सर के पास आते हैं। जो फँसते नहीं, वे अफ़सर के दिल में बसते नहीं।
    निकम्मापन किसी भी अफ़सर की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि लोगों का काम समय पर होता रहे ,तो कोई किसी को घास डालनेवाला नहीं। जहाँ कर्मठ अफ़सर होगा, वहाँ के सभी काम समय पर होते रहेंगे। सभी को काम करना पड़ेगा। किसी का काम फ़ाइलों में दबा नहीं रहेगा। इस कर्मठता के चलते पूरा दफ़्तर अपना महत्त्व खो देगा। बड़े बाबू को कोई सलाम क्यों करेगा? छोटे बाबू तो बेचारे वैसे ही कम पाते हैं। इनके पेट पर लाठी मारना भला कहाँ का न्याय है? भूखे लोगों के चेहरे की आभा महीने भर में खत्म हो जाती है। अपना पैसा खाने से चेहरे की सारी रौनक चली जाती है। लोग काम के लिए सिर पर सवार रहने लगते हैं। कर्मठ अफ़सर की छूट मिलने पर तो वे सिर पर चौकी बिछाकर जगराता करने के लिए बैठ जाएँगे।

   हर धार्मिक कार्यक्रम के समापन पर तथा पार्टी के जलसों के बाद कुछ जैकारे गूँजा करते हैं, जैसे -जो बोले सो अभय। इसका अर्थ बहुत गम्भीर है। चालीस साल बाद इसका अर्थ समझ में आ पाया है कि जो भी बोला जाए ,एकदम निर्भीक होकर बोला जाए, बेखटके होकर। मैं समझता हूँ कि केवल बेसिर-पैर की बातें ही बेखटके बोली जा सकती हैं। बाते ऐसी हों कि उनका जब चाहे जो अर्थ निकाल लिया जाए। अपने नेताओं को ही देखिए -बड़ी से बड़ी बेहूदी बात को भी कितने आत्मविश्वास से बोल लेते हैं। यह महारत बड़ी तपस्या के बाद हासिल होती है। सरकार की रेल को फ़ेल करने में अधिकारी का बहुत बड़ा हाथ है। बड़े अफ़सर की बड़ी चोरी पर सरकार से पूछे बिना कार्यवाही नहीं होती, उसको चरने और विचरने की पूरी छूट होती है। लोकतन्त्र में ऐसी सुविधा नहीं होगी, तो आधे अफ़सर तो जेल में मिलेंगे। इनके लिए जेल नहीं है। जेल केवल छुटभैये लोगों के लिए है।
   निकम्मे अफ़सर का अपना विशेष महत्त्व है ई-मेल खोलने के लिए जब एक तपस्वी अफ़सर से उनका पासवर्ड पूछा गया, तो बड़ी ही मासूमियत से बोले, 'भई वो तो सब पुराने ऑफ़िस में ही छूट गया। वहाँ जाऊँगा, तब लेकर आऊँगा। देखो बड़े बाबू! इस दफ़्तर का भी इण्टरनेट नहीं चल रहा है। लगता है पहलेवाले अधिकारी चाबी ले उड़े। आप मँगवा लो, नहीं तो कैसे काम चलेगा?
''ठीक है साहब,'' बड़े बाबू ने समर्थन में गर्दन हिलाई। मन ही मन मुस्कराए भी-अब मौका हाथ लगा है माल छीलने का। तीन चार-बरस दफ़्तर हम लोगों के लिए कालाहाँडी बना रहा।
''हाँ साहब, कुछ भी हो सकता है।'' छोटे बाबू ने हामी भरी, ''जो करते थे, वे ही करते थे, ई-मेल-फ़ीमेल पता नहीं क्या-क्या! हम लोग तो यहाँ 'ड्राई डे' मनाते रह गए। साहब आपने आकर हमको बचा लिया।
''देखो भाई! कुछ काम तो करना चाहिए। काम भले ही कम करो, काम करने का प्रचार ज़्यादा करो। बेईमानी करो, लेकिन बातें ईमानदारी की करो। पचास प्रतिशत से ज़्यादा खाने वाले को बेईमान कहा जा सकता। दुनिया में फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी का ही महत्त्व है।''
   ''पचास प्रतिशत!'' बगल में खड़े एक मातहत ने अफ़सर के पैर छू लिये, ''धन्य है साहब, इस कलयुग में भी आप जैसे लोग हैं, तभी तो यह धरती टिकी हुई है, वर्ना न जाने कब की डूब गई होती।
इस भागवत-कथा का यही सारांश निकलता है कि...
अफ़सर-अजगर दोऊ खड़े, काके लागों पाँय।
बलिहारी अफ़सर करौं, अजगर दियो बताय।
सम्पर्कः जी-902, जे एम अरोमा, सेक्टर-75 , नोएडा-201301 (उत्तर प्रदेश)

खेलूँगी कभी न होली...

              खेलूँगी कभी न होली...
                -प्रो. अश्विनी केशरवानी
फागुन का त्योहार होली हँसी-ठिठोली और उल्लास का त्योहार है। रंग गुलाल इस त्योहार में केवल तन को ही नहीें रंगते बल्कि मन को भी रंगते हैं। प्रकृति की हरीतिमा, बासंती बहार, सुगँध फैलाती आमों के बौर और मन भावन टेसू के फूल होली के उत्साह को दोगुना कर देती है। प्रकृति के इस रूप को समेटने की जैसे कवियों में होड़ लग जाती है। देखिए कवि सुमित्रानंदन पंत की एक बानगी:
      चंचल पग दीपशिखा के घर
       गृह भग वन में आया वसंत।
    सुलगा फागुन का सूनापन
     सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सैरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर उर में मधुर दाह
आया वसंत, भर पृथ्वी पर
 स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह।
प्रकृति की इस मदमाती रूप को निराला जी कुछ इस प्रकार समेटने का प्रयास करते हैं:
सखि वसंत आया
भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया।
किसलय बसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिय उर तरू पतिका
मधुप वृन्द बंदी पिक स्वर नभ सरसाया
लता मुकुल हार गँध मार भर
बही पवन बंद मंद मंदतर
जागी नयनों में वन
यौवनों की माया। 
आवृत सरसी उर सरसिज उठे
केसर के केश कली के छूटे
स्वर्ण शस्य अंचल, पृथ्वी का लहराया।
मानव मन इच्छाओं का सागर है और पर्व उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम होते हैं। ये पर्व हमारी भावनाओं को प्रदर्शित करने में सहायक होते हैं। इसीलिए हमारी संस्कृति में शौर्य के लिए दशहरा, श्रद्धा के लिए दीपावली, और उल्लास के लिए होली को उपयुक्त माना गया है। यद्यपि हर्ष हर पर्व और त्योहार में होता है मगर उन्मुक्त हँसी-ठिठोली और उमंग की अभिव्यक्ति होली में ही होती है। मस्ती में झूमते लोग फाग में कुछ इस तरह रस उड़ेलते हैं:
फूटे हैं आमों में बौर
भौंर बन बन टूटे हैं।
होली मची ठौर ठौर
सभी बंधन छूटे हैं।
फागुन के रंग राग
बाग बन फाग मचा है।
भर गये मोती के झाग
जनों के मन लूटे हैं।
माथे अबीर से लाल
गाल सिंदूर से देखे
आँखें हुई गुलाल
गेरू के ढेले फूटे हैं।
ईसुरी अपने फाग गीतों में कुछ इस प्रकार रंगीन होते हैं:
झूला झूलत स्याम उमंग में
कोऊ नई है संग में।
मन ही मन बतरात खिलत है
फूल गये अंग अंग में।
झोंका लगत उड़त और अंबर
रंगे हे केसर रंग में।
ईसुर कहे बता दो हम खां
रंगे कौन के रंग में।
ब्रज में होली की तैयारी सब जगह जोरों से हो रही है। सखियों की भारी भीड़ लिये प्यारी राधिका संग में है। वे गुलाल हाथ में लिए गिरधर के मुख में मलती है। गिरधर भी पिचकारी भरकर उनकी साड़ी पर छोड़ते हैं। देखो ईसुरी, पिचकारी के रंग के लगते ही उनकी साड़ी तर हो रही है। ब्रज की होली का अपना ढंग होता है। देखिए ईसुरी द्वारा लिखे दृश्य की एक बानगी:
ब्रज में खेले फाग कन्हाई
राधे संग सुहाई
चलत अबीर रंग केसर को
नभ अरूनाई छाई
लाल लाल ब्रज लाल लाल बन
वोथिन कीच मचाई।
ईसुर नर नारिन के मन में
अति आनंद अधिकाई।
सूरदास भी भक्ति के रस में डूबकर अपने आत्मा-चक्षुओं से होली का आनंद लेते हुए कहते हैं:
ब्रज में होरी मचाई
इतते आई सुघर राधिका
उतते कुंवर कन्हाई।
हिल मिल फाग परस्पर खेले
शोभा बरनिन जाई
उड़त अबीर गुलाल कुमकुम
रह्यो सकल ब्रज छाई।
कवि पद्माकर की भी एक बानगी पेश है:
फाग की भीढ़ में गोरी
गोविंद को भीतर ले गई
कृष्ण पर अबीर की झोली औंधी कर दी
पिताम्बर छिन लिया, गालों पर गुलाल मल दी।
और नयनों से हँसते हुए बाली-
लला फिर आइयो खेलन होली।
होली के अवसर पर लोग नशा करने के लिए भांग-धतुरा खाते हैं। ब्रज में भी लोग भांग-धतूरा खाकर होली खेल रहे हैं। ईसुरी की एक बानगी पेश है:
भींजे फिर राधिका रंग में
मनमोहन के संग में
दब की धूमर धाम मचा दई
मजा उड़ावत मग में
कोऊ माजूम धतूरे फाँके
कोऊ छका दई भंग में
तन कपड़ा गए उधर
ईसुरी, करो ढाँक सब ढँग में।
तब बरबस राधिका जी के मुख से निकल पड़ता है:
खेलूँगी कभी न होली
उससे नहीं जो हमजोली।
यहाँ आँख कहीं कुछ बोली
यह हुई श्याम की तोली
ऐसी भी रही ठिठोली।
यूँ देश के प्रत्येक हिस्से में होली पूरे जोश-खरोश से मनाई जाती है। किंतु सीधे, सरल और सात्विक ढंग से जीने की इच्छा रखने वाले लागों को होली के हुड़दंग और उच्छृंखला से थोड़ी परेशानी भी होती है।  फिर भी सब तरफ होली की धूम मचाते हुए हुरियारों की टोलियाँ जब गलियों और सड़कों से होते हुए घर-आँगन के भीतर भी रंगों से भरी पिचकारियाँ और अबीर गुलाल लेकर पहुँचते हैं, तब अच्छे से अच्छे लोग, शरीफ और बच्चे-बूढ़े सभी की तबियत होली खेलने के लिए मचल उठती है। लोग अपने परिवारजनों, मित्रों और यहाँ तक कि अपरिचितों से भी होली खेलने लगते हैं। इस दिन प्राय: जोर जबरदस्ती से रंग खेलने, फूहड़ हँसी मजाक और छेड़ छाड़ करने लगते हैं जिसे कुछ लोग नापसंद भी करते हैं। फिर भी 'बुरा न मानो होली है...' के स्वरों के कारण बुरा नहीं मानते। आज समूचा विश्व स्वीकार करता है कि होली विश्व का एक अनूठा त्योहार है। यदि विवेक से काम लेकर होली को एक प्रमुख सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठान के रूप में शालीनता से मनाएँ तो इस त्योहार की गरिमा अवश्य बढ़ेगी।
सम्पर्क: 'राघव' डागा कालोनी, चाम्पा-495671 (छत्तीसगढ़)