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Jul 18, 2016

बोझ

 बोझ
 शशि पाधा

मेरे 98 वर्षीय श्वसुर को अपने बीते कल की बातें सुनाने में जो आनन्द आता है उतना ही हमें सुनने में आता है। मुझे याद है कि जब भी मैं उनसे पूछती- पिता जी, आपको क्या चाहिएउत्तर में वो हँसते हुए कहते- आपका थोड़ा समय बेटा। हम सब यह प्रयत्न करते हैं कि उनके पास बैठ कर उनसे उनकी बातें सुने।
भूतपूर्व सैनिक होने के कारण द्वीतीय विश्व युद्ध के दौरान भारत के पूर्व में स्थित बर्मा देश में घटित ब्रिटिश सेना और जापानी सेना के बीच हुए युद्ध से सम्बंन्धित उनके पास अनेकों संस्मरण थे। कभी कभी अपने बहादुर सैनिक मित्रों के बलिदान की गाथाएँ सुनाते हुए वे अत्यंत भावुक हो जाते और उनकी आँखें नम हो जातीं।
एक दिन संध्या समय घर के लॉन में बैठे वे मुझे अपने विद्यार्थी जीवन में घटी रोचक घटनाओं के विषय में बता रहे थे।  उस दिन उन्होंने जो घटना सुनाई ,उसे मैं आपने पाठकों के समक्ष उनके ही शब्दों में प्रस्तुत कर रही हूँ -
जब मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था तो अपने गाँव डगोड़के पास बसे दूसरे गाँव गुड़ा सलाथियाके स्कूल में पढ़ने के लिए जाया करता था। एक बार हमारे स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ हो रहीं थीं। हम सब लड़कों ने छुट्टी के पहले दिन  शाम को  गाँव के पास बहती देवकनदी के किनारे शीतल रेत पर फ़ुटबाल खेलने की योजना बनाई। हम सब मित्र इस खेल के लिए बहुत उत्साहित थे।
 उस दिन जैसे ही मैं छुट्टी के बाद अपने घर आया, मेरी दादी ने मुझे देखते ही कहा, ‘कृष्णा, आटा समाप्त हो गया है। लो यह गेहूँ की बोरी उठाओ और साम्बा’ (एक गाँव) के घर्राट पर जा कर आटा पिसा लाओ।
 गेहूँ की बोरी देख कर मैं घबरा गया;क्योंकि उसका आकार मेरे शरीर से थोड़ा ज़्यादा ही था। साथ ही फुटबाल के खेल की योजना पूरी ना होने का भी अफसोस था। किन्तु करता तो क्या करता। दादी को नाकहना अपने कुल मर्यादा के नियमों में नहीं था। मैंने चुपचाप बोरी लादी और घर्राट की ओर चल पड़ा। दादी ने साथ में पोटली में रोटी, आम का आचार और कुछ सब्जी आदि भी बाँध दी और नसीहत देते हुए कहा, ‘अकेले मत खाना। घर्राट वालों के साथ मिल बैठ के खाना।
अपने गाँव से कुछ मील दूर गुढ़ा सलाथियाके कच्चे रास्ते से मैं गुजऱ रहा था तब तक शाम हो गयी थी।  तभी किसी ने मेरा नाम लेकर पुकारा।  मैंने देखा कि मेरे स्कूल के हैड मास्टर भी स्कूल का काम काज निपटाकर पैदल अपने गाँव की ओर जा रहे थे।
 उनहोंने पूछा, ‘तुम कहाँ जा रहे हो?’
मैंने नमस्कार करते हुए कहा, ‘आटा पिसानेके लिए  साम्बा गाँव के घर्राट की ओर जा रहा हूँ।
वो कुछ देर मेरे साथ चलते रहे। कुछ ही दूरी पर अचानक उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझसे रुकने को कहा। जैसे ही में रुका, उन्होंने मेरी पीठ पर से गेहूँ की बोरी उतारी और अपनी पीठ पर लाद ली। और कहा, चलो, मैं भी उधर ही जा रहा हूँ।
मैं बच्चा था; इसलिए, या वो हैडमास्टर थे शायद इसलिए, मैं उनकी बात टाल नहीं सका और ना ही उन्हें रोक सका। हम दोनों साथ- साथ चलते रहे। वो रास्ते में मुझसे स्कूल, घर, गाँव और दोस्तों की बातें करते रहे।स्कूल में तो उनका इतना सम्मान और दबदबा था कि उन्हें देख कर ही हम दुबक जाते थे। किन्तु आज उन्हें अपने साथ चलते देख कर मुझे कुछ अजीब सा लग रहा था। लग रहा था जैसे अचानक  मैं भी बड़ा हो गया हूँ।
चलते -चलते शाम हो गई अब घर्राट कोई एक चौथाई मील ही दूर रह गया था। वो चलते- चलते रुक गए। उन्होंने अपनी पीठ पर से बोरी उतारी और मेरी पीठ पर बड़े ध्यान से लाद दी। मेरे कंधे पर हाथ रख कर उन्होंने कहा, ‘घर्राट अब पास ही है, ध्यान से जाना।कुछ कदम चल कर फिर से कहा,' और सुनो, इस बात का किसी के साथ जि़क्र मत करना।’ और वो दूसरी दिशा की ओर मुड़ कर चले गए। उनका गाँव कहाँ था, मैं नहीं जानता था।
पिता जी ने तो यह बात बहुत सहज ढंग से सुनाईकिन्तु बात के अंत तक मेरा मन उन हैडमास्टर जी के प्रति श्रद्धा और सम्मान से भर गया। एक तो अपने शिष्य का बोझ हल्का किया और यह भी चाहा कि लोग इस बात को न जाने। उस शाम बहुत देर तक मैं सोचती रही -
'अपने शिष्यों के प्रति निस्वार्थ प्रेम एवं दया की भावना रखने वाले शिक्षक क्या आज के युग में भी हैं ? अगर हैं तो उन्हें मेरा कोटि-कोटि प्रणाम!’
सम्पर्क: 174/3, त्रिकुटा नगर, जम्मू, सम्प्रति- वर्जिनिया, यू एस, shashipadha@gmail.com

कहानी और किरदार

सिंधी कहानी

कहानी और किरदार 
मूलः डॉ. कमला गोकलानी, 
अनुवाद - देवी नागरानी

गौरव बिस्तर पर करवट बदलता रहा। कोशिश के बावजूद भी उसे नींद नहीं आई। साथ में लेटी सीमा ने फिर से जानने की नाकामियाब कोशिश की।
आखिर क्या हुआ है ? इतने परेशान क्यों हो?’ पर गौरव ने बिना जवाब दिए दूसरी तरफ पलटते हुए परमात्मा को प्रार्थना की कि मानसी ने उसके मुत्तल्लक फैसला लेते समय अपने पुराने स्वभाव से काम लिया हो।
उसके सामने क्लास रूम का मंज़र उभर आया। बीस बरसों की नौकरी में उसने ख़ुद को इतना बौना महसूस कभी नहीं किया । बोर्ड ऑफ एज्यूकेशन की ओर से सेन्सर क्लासेज़ की परीक्षा ज़रूरी है। आज उसकी ड्यूटी रूम नं. 4 में रही। उस कमरे में ड्यूटी करने से हर एक इंचार्ज कतराता है। आजकल आम तौर पर शागिर्द अडिय़ल और गैर जिम्मेदार ही हैं, पर रूम नं. 4 का राकेश, कहकर तौबा कर लो!  उसे नकल करने से रोकने वाले का, वह घर-बार डाँवाडोल कर देता है ; इसलि राकेश के मामले में देखा अनदेखा करना पड़ता है गौरव ईमानदारी और इन्तज़ाम का निबाह करने वाला है ; इसलि घर से निकलते वक्त भी सीमा ताक़ीकरती रही कि जानबूझकर विवेक के गुलाम बनकर अनचाही परेशानी न मोल लेना।
जैसे कि आज बोर्ड से चेकिंग के लि खास पार्टी आ रही है, इसलि प्रिन्सिपल ने जान-बूझकर उसकी ड्यूटी रूम नं. 4 में लगाई।
राकेश बेल बजने के 10 मिनट पश्चात् ही क्लास में आता है। आज भी ऐसा ही हुआ, इसलि गौरव ने यह सोचकर कि और शागिर्द को लिखने में बाधा न हो, उसे बिना तलाशी के परीक्षा लिखने दी और उसने सोचा कि चोर को सुरा के साथ पकडऩे का मौका भी मिलेगा।
अभी पाँ मिनट भी नहीं बीते कि चेकिंग पार्टी आ गई। उसके कमरे में पार्टी की कन्ट्रोलर मिस मानसी पहुँची, जो अपने सख्त मिज़ाज़ के लि मशहूर है। वह अक्सर अख़बार और मैग़ज़ीन्स में मानसी के बारे में पढ़ता था कि वह अपनी मेहनत और मज़बूती के बलबूते पर एक आम टीचर से इस अहम ओहदे पर पहुँची है। पर यह जानकारी फ़क़त गौरव को है, कि मानसी के सख्त दिल होने का ज़िम्मेदार वह ख़ुद है। वह तो हँसती, खिलखिलाती मस्त रहने वाली ईज़ि गोइंग लड़की थी।
'टेक इट ईज़ि उसका तकिया क़लाम रहा। इस क़दर कि ज़िन्दगी के अहम संजीदा मोड़ पर भी उसने किसी फ़ैसले को इतनी संजीदगी से नहीं लिया ।
जैसे बाज़ की तेज़ नज़र शिकार पर होती है, वैसे मानसी भी सीधे राकेश के टेबल के पास आ खड़ी हुई। राकेश बेफ़िक्र होकर कागज़ पर से सवालों का जवाब ढूँढ़ रहा था। मानसी ने गुस्से से गौरव से कहा- मास्टर साहब! इतनी गैर जिम्मेवारी से ड्यूटी दे रहे हो ? आपने इस लड़के की तलाशी ली थी ? तुरन्त इसकी तलाशी ली जाए।और फिर राकेश से मुखातिब होकर सख्ती से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है ?’
राकेश ने शरारती मुस्कान के साथ कहा – ‘533495’
मानसी ने कहा- अपना डमिशन कार्ड दिखाओ।
            राकेश ने जैसे ही जेब से अपना कार्ड निकाला, तो साथ में एक काग़ज़ ज़मीन पर गिर पड़ा। जाँच करने पर उस कागज़ पर नकल करने वाले मैटर की अनुक्रम सूची थी कि कौन-सा मैटर कहाँ है। इस बीच गौरव ने राकेश की जेब से जवाबों के कुछ काग़ज़ निकाले, पर राकेश पर किसी बात का असर ही नहीं हुआ। इत्मीनान से जेब से कंघी निकाली और मानसी की आँखों में देखते हुए बालों को सँवारने लगा। उसे देखकर गौरव कुछ झेंप गए। मानसी को बीस साल पुराने मंज़र याद आए जब गौरव भी ऐसे ही उसकी आँखों में देखकर बाल सँवारते हुए कहता था- मानू बस ऐसे ही उम्र भर तेरे नयनों में निहारता रहूँ... और मानसी गर्दन झुकाकर शर्माती थी। कुछ पलों में मानसी माज़ी की यादों से बाहर आई, जब गौरव चिल्लाया- अरे इसके जुराबों में रामपुरी चाकू!
राकेश के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई का केस तैयार करने का फैसला प्रिन्सिपल और तमाम टीम ने लिया, शायद यह ज़रूरी था, पर जैसे ही इस गैर जिम्मेवार कार्य के लिए  गौरव को दोषी ठहराते हुए उसके खिलाफ़ रिपोर्ट लिखने की शुरुत मानसी ने की तो प्रिन्सिपल ने हाथ जोड़कर बिनती की- मैडम ! ये ना इन्साफ़ी मत करना। गौरव इस स्कूल का निहायत ही ईमानदार और मेहनती शिक्षक है। मैंने इस साल उसका नाम शिक्षक पुरस्कार के लिए  प्रपोज़ किया है। आपकी रिपोर्ट, उसकी की गई सालों की सेवा को दाग़दार बना देगी। दरअसल राकेश बदला लेने के लिए  किसी भी हद तक गिर सकता है।
            ‘हूँमानसी ने सख़्त लहज़े में कहा- वो लड़का तो मेरे खिलाफ़ भी कदम उठा सकता है, इसका मतलब यह तो नहीं कि गुनहगार को गुनाह करने की छूट दे दी जाए, उसके खिला कोई कार्रवाई ही न की जाए ?’
            इतने में पार्ट एपेपर के खत्म होने पर घण्टी बजी और गौरव भी फ़ारिग होकर ऑफिस पहुँचा और अत्यन्त विनम्रता से कहा- मैडम, आइ एम सॉरी।  दरअसल राकेश के क्लास में देर से आने के कारण मेरे मन में ड्यूटी और परिवार के फर्ज़ के बीच में जंग रही और आप आ गई। सीमा ने चलते-चलते भी कहा था- बच्चों की क़सम, जानबूझकर कोई परेशानी मोल न लेना।
हालात देखते हुए मानसी ने फिलहाल काग़ज़ फाइल में रखे। वह एक बार फिर अतीत की ओर लौट गई। इस सीमा ने ही उसे गौरव से जुदा किया था। कुछ दिन तो वह बेहद मायूस रही, पर जल्द ही ख़ुद को सँभालकर सारा ध्यान कैरियर पर लगा दिया। सोचती रही- आज सीमा के एवज़ वही गौरव के बच्चों की माँ होती तो और क्या चाहती?’
उसे याद आया कि वह और गौरव एक ही स्कूल में शिक्षक थे। हमखय़ाल होने के नाते दोनों का उठना-बैठना साथ होता था। रिसेस के वक़्त, फ्री पीरियड  में भी, जब दूसरे शिक्षक गैर ज़रूरी बातों में वक्त जाया करते थे तब ये दोनों चाय पीते-पीते कभी अदब और कला के बारे में बातें, या बहस करते। किसी नई कहानी या नॉवल पढऩे के पश्चात् उसका पोस्ट मार्टम करते, उसके किरदारों की कमजोरियों और खूबियों पर राय पेश करते। गौरव हमेशा उन नाटकों पर अफ़सोस ज़ाहिर करता ,जिसमें नायक अपनी नायिका को अज़ाबों की गर्दिश में छोड़कर, बुज़दिली से मैदान छोड़कर भाग जाते। बहस करते मानसी उसे समझाने की कोशिश करती कि सच्चा प्यार करने वाले नायक के लिए , ज़रूर कोई ऐसी मजबूरी रही होगी और वह बेहद लाचारी की हालत में प्यार को क़ुर्बाकरते हुए उस राह से मुड़ जाता होगा । सच्चा प्यार तो अमर है, कभी ख़त्म होने वाला नहीं। बड़ी बात तो यह है कि शादी और प्यार का इतना गहरा सम्बन्ध नहीं कि बिना उसके दीवानापन छा जाए। विपरीत इसके शादी के बाद फ़र्ज़ और हक़ों की जंग में ग्रहस्ती की ओढ़ी हुई जिम्मेवारियों की वजह से प्यार का नफ़ीस जज़्बा क़ुर्बा हो जाता है।
पागल है वो नायक जो रात-दिन प्यार-प्यार तो करते हैं, पर वक़्त आने पर पीठ दिखाकर नायिका को सारी ज़िन्दगी रोने के लिए  छोड़ जाते हैं...गौरव बेहद संजीदगी से कहता और मानसी खिलखिलाकर जवाब देती – गौरव! टेक इट  ईज़ि, क्यों सब कुछ सीरियसली लेते हो। कहानी के क़िरदार और हकीकी ज़िन्दगी में बहुत फ़र्क है। लेखक कहानी लिखने के पहले अपने किरदार का अंत तय कर लेता है, जो कभी सुखांत तो कभी दुखांत होता है। पर असली जि़न्दगी में इन्सान हालात के बस होकर सुलह करते हुए फ़ैसला करता है। ऐसे फ़ैसले अज़ादेने वाले और दु;खदायी भी होते हैं, और न चाहते हुए भी ग़लतफ़हमियाँ पैदा करने वाले भी, और फिर दोनों के बीच में लम्बी खामोशी छा जाती थी ।
उनकी गुफ़्तगू अब स्टाफ रूम तक सीमित न रही थी । सुनसान वादियाँ, पहाड़ी-झरने, बहती नदियाँपेड़-पौधे उनकी मुलाक़ात के साक्षी रहे । ऐतिहासिक इमारतों की सैर करते वो दोनों भी ख़ुद को किसी राजा रानी से कम नहीं समझते। कभी-कभी मानसी गौरव से कहती- अगर तुम्हारे माँ-बाप हमारे मेल-मिलाप को बर्दाश्त न कर पाए तो ?’ गौरव बिना किसी सोच के बुलंद आवाज़ में मर्दानगी दिखाते कहता- मानू दुनिया की कोई भी ताक़त तुझको मुझसे छीन नहीं सकती। मैं जल्द ही पिताजी को मनाकर इस रिश्ते को सामाजिक मान्यता दिलाऊँगा।
पर, जब गौरव ने मानसी का जिक्र घर में किया तो गोया तूफ़ान उठ खड़ा हो गया। गौरव को यह पता नहीं था कि घर में उसे एक धड़कते दिल वाला इन्सान न मानकर, एक चीज़समझकर उसके पिता ने उसका सौदा एक साहूकार की बेटी से कर दिया था और उनसे दहेज की बातचीत के आधार पर अपनी दो बेटियों के रिश्ते भी तय कर दि थे। गौरव बहुत ही तड़पा, पर उसके पिता ने उसे लिखे हुए परचे दिखाते हुए कहा कि अगर वह इन्कार करेगा तो उसके माँ-बाप दोनों आत्महत्या कर लेंगे । पागलपन की हदों से गुज़रता हुआ गौरव स्कूल से छुट्टी लेकर घर बैठ गया, शायद मानसी से नज़र मिलाने की उसमें क्षमता न थीं।
आखिर मानसी खुद उसके पास आई और गौरव ने आज जैसी ही लाचारगी से कहा था- मानू, मेरे मन में प्यार और फर्ज़ के बीच...।
मानसी ने शांत मन से कहा – टेक इट ईज़ि प्लीज। हम कोई कहानी के क़िरदार नहीं हैं। मेरी चिंता मत करो, मुझमें यह सदमा बर्दाश्त कर पाने का आत्मबल है।
आज सीमा का नाम सुनते मानसी थोड़ी देर के लिए  डाँवाडोल हुई पर फिर सोचा बेचारी सीमा का क्या दोष? यही कि वह एक धनवान की बेटी है और मानसी की गरीब विधवा माँ में दहेज दे पाने की क्षमता नहीं थी। ये नहीं तो कोई और सीमा गौरव की जीवन संगिनी बन जाती थी । कोई भी औरत किसी और का हक़ छीनकर कहाँ चैन पा सकेगी?
मानसी ने उस स्कूल से अपना तबादला करा लिया था । पर सीमा के बारे में स्टाफ से जानकारी मिली थी कि वह निहायत कोमल हृदय वाली नारी थी। उसे अगर पता होता तो वह ख़ुद ही मानसी के रास्ते से हट जाती। ख़ैर, ज़िन्दगी एक हक़ीकत है कोई कहानी नहीं। यह सोचकर मानसी ने गौरव के ख़िलाफ़ लिखी हुई रिपोर्ट फाड़ दी।

 सम्पर्क:  9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050,  फोन: 9987928358, dnangrani@gmail.com

जानकारी

             चम्बल नदी 
                               - डॉ. अर्पिता अग्रवाल

मध्य भारत में चंबल नदी यमुना की प्रमुख सहायिका नदी है। इसकी लम्बाई 960 किलोमीटर है। चंबल मालवा पठार की महत्त्वपूर्ण नदी है। विंध्याचल की श्रेणियों में मध्यप्रदेश के  इंदौर जिले के महू के दक्षिण में 854 मीटर ( लगभग 2800 फ़ीट ) की ऊँचाई से चंबल का उद्गम होता है। अपने उद्गम से उत्तर की ओर आगे बढ़ते  हुए यह मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध जिलों धार, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर से गुजरते हुए राजस्थान में प्रवेश करती है। कोटा शहर से आगे यह उत्तर- पूर्व की ओर मुड़ जाती है। चम्बल करीब 320 किलोमीटर तक मघ्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा बनाती है। उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हुई चंबल मालवा के पठार से निकली काली- सिंध व अन्य सहायिकाओं का जल समेटती हुई मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमा बनाती है। उत्तरप्रदेश में प्रवेश कर चंबल नदी पूर्व को मुड़ कर यमुना के समानांतर बहती है। इटावा के पास चंबल यमुना में मिल जाती है। चंबल नदी को अरावली श्रेणी से निकलने वाली बनास नदी अरावली के जल से समृद्ध करती है। चंबल कई प्रसिद्ध जिलों जैसे बूंदी, सवाई माधोपुर, और धौलपुर से भी गुजरती है।

चंबल का असली नाम 'चर्मण्वती है। यह वैदिक काल की नदी है। चर्मण्वती पारियात्र पर्वत से निकली भारतवर्ष की एक नदी है, जो पितरों को प्रिय है। प्रसिद्ध राजा रन्तिदेव इसी के किनारे राज करते थे। वे बड़े धर्मात्मा और दानी थे। महाभारत और पुराण उनके यश के गीतों से भरे पड़े हैं। उन्होंने अनेक यज्ञ किए थे। यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाती थी। कहा जाता है कि पशुओं के चमड़े सुखाने के लिए नदी के किनारे डाले जाते थे ; इसलिए इसका नाम चर्मण्वती हुआ।
 चम्बल नदी अपनी विस्तृत बीहड़ भूमि और खड्डों के लिए प्रसिद्ध है, जो निचली चम्बल घाटी में नदी द्वारा निर्मित होते हैं। यह बीहड़ डकैतों से ग्रस्त व आशंकित रहते थे। यह डकैतों के पनाहगार थे। चम्बल के डाकू प्रसिद्ध हैं। अब इस क्षेत्र को कृषि, चारागाह तथा सामाजिक- वानिकी के उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है।

चम्बल नदी पर कई बाँध तथा बराज बनाकर सिंचाई और जल विद्युत योजनाओं का विकास किया गया है, जिनमें गाँधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर, तथा कोटा बराज सुप्रसिद्ध हैं। चम्बल के किनारे धौलपुर में राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य है। यहाँ कई तरह के जीव-जन्तु पाए जाते हैं। यहाँ डॅाल्फि न भी पायी जाती है, इसे गांगेय डॅाल्फ़िन कहते हैं। गंगा नदी में पायी जाने वाली यह डॅाल्फ़िन पानी की गुणवत्ता की सूचक है। प्रदूषित पानी में यह जीवित नहीं रह पाती। यह अभ्यारण्य घड़ियालों की भी शरणस्थली है और पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियों की दृश्यस्थली है।

मध्यप्रदेश में मंदसौर जिले में चम्बल नदी पर बनाया गया गाँधी सागर बाँ महात्मा गाँधी जी की स्मृति में बनाया गया था। चम्बल नदी का अपार जल इस बाँध के निर्माण से पहले बिना किसी उपयोग के ही बह जाता था। इसे चम्बल परियोजना के प्रथम बाँध होने का गौरव प्राप्त है। इस बाँध का लाभ मध्यप्रदेश और राजस्थान को मिला है । राजस्थान में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में चम्बल नदी सिंचाई परियोजना द्वारा पानी पहुँचाया जाता है। गाँधी सागर बाँध मछली पालन, मनोरंजन तथा पर्यटन के लिए भी महत्त्वपूर्ण स्थल है।

चम्बल नदी को प्रदूषण मुक्त माना जाता था;लेकिन कुछ स्थानों पर चम्बल नदी के अंदर व किनारों पर लगे ईंट- भट्टों तथा नदी के किनारों पर मिट्टी के अवैध उत्खनन से चम्बल नदी प्रदूषित हो रही है। चम्बल राजस्थान के कोटा शहर से गुजऱती है जहाँ इसमें औद्योगिक अपशिष्ट, बिजली घरों से निकली राख, और कूड़ा -कचरा आदि विभिन्न नालों के माध्यम से गिरा दिया जाता है। कोटा शहर औद्योगिक और शैक्षणिक संस्थाओं का केन्द्र है; जहाँ चम्बल नदी उस शहर को पीने के लिए, घरेलू इस्तेमाल व उद्योगों के और सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराती है, वहीं शहर का निरंतर बढ़ता हुआ कचरा इसमें ही डाल दिया जाता है। इस कारण नदी में जीव-जन्तुओं के मरने की घटनाएं भी होती रहती हैं और नदी में प्रदूषण की मात्रा भी निरंतर बढ़ती जा रही है।
प्रकृति ने हमें शस्य -श्यामला धरती दी,नदियाँ दीं, शुद्ध वायु दी हमने उसके लिए कुछ भी तो खर्च नहीं किया। हमने बदले में प्रकृति को बहुत दु:ख पहुँचाया, उसे नष्ट किया फिर भी प्रकृति हमें दे रही है लेकिन कब तक प्रकृति हमें यूँ ही देती रहेगी? आज हमने जल, थल, वायु सभी को प्रदूषित कर दिया है और अब भी हम नहीं सुधरे तो प्रकृति का दंड भोगने को तैयार रहना होगा।
सम्पर्क: 120 बी/2, साकेत , मेरठ 250003

दो बालकथाएँ

 1. दुनियादारी सीखी गुलाब ने
 - प्रियंका गुप्ता


सुबह की पहली किरण के साथ गुलाब की नन्ही-सी कली ने अपनी आँखें खोल कर धीरे से बाहर झाँका। ओस की बूँ उसकी आँखों में गिर पड़ी तो कली ने गबरा कर अपनी पंखुड़ियाँ फैला दी। अपनी लाल-लाल कोमल पंखुड़ियों पर वह खुद ही मुग्ध हो गई। थोड़ी देर इधर-उधर का नज़ारा देखने के बाद उसे कहीं से बातें करने की आवाज़ सुनाई दी। घूम कर देखा तो जूही और बेला के फूल आपस में बतिया रहे थे। गुलाब ने भी उनसे बातें करनी चाही, बड़े भाइयों, मैं भी आपसे बात करना चाहता हूँ...।
तुम बेटे...अभी बच्चे हो, जूही -बेला के फूलों ने विनोद से झूमते हुए कहा, थोड़ी दुनियादारी सीख लो, तब शामिल होना हमारी मंडली में...।
वे फिर आपस में बातें करने लगे तो गुलाब ने सिर को झटका दिया, हुँ...बच्चा हूँ...। कैसी बोरियत भरी दुनिया है...। क्या मेरा कोई दोस्त नहीं है...? दु:खी होकर उसने सिर झुका लिया।
 दु:खी क्यों होते हो दोस्त, कहीं से बड़ी प्यार-भरी आवाज़ आई, हम तुम्हारे दोस्त हैं न...। तुम्हारे लिए हम पलकें बिछाए हुए हैं। आओ, हमारे दोस्त बन जाओ...।
 गुलाब ने सिर उठाकर चारो तरफ़ देखा। कौन बोला ये? फिर अचानक काँटों को अपनी ओर मुख़ातिब पा उसने मुँह बिचका दिया, दोस्ती और तुमसे...? शक्ल देखी है अपनी...? क्या मुकाबला है मेरा और तुम्हारा? न मेरे जैसा रूप, न कोमलता...और उस पर से मेरे लिए पलकें बिछाए बैठे हो...। न बाबा न, तुम्हारी पलकें तो मेरे नाजुक शरीर को चीर ही डालेंगी।
गुलाब की कड़वी बातों ने काँटों का दिल ही तोड़ दिया। पर उसे बच्चा समझ उन्होंने उसे माफ़ कर दिया और मुस्कराते रहे पर बोले कुछ नहीं।
 पापा, देखो! कितना प्यारा गुलाब है...। तीन वर्षीय बच्चे को अपनी तारीफ़ करते सुन कर गुलाब गर्व से और तन गया।
 ‘ऐसे ही प्यारे लोग मेरी दोस्ती के क़ाबिल हैं,’ गुलाब ने सोचा और काँटों की ओर देख कर व्यंग्य से मुस्करा दिया।
 पापा, मैं तोड़ लूँ इसे? अपनी कॉपी में इसकी पंखुडिय़ाँ रखूँगा। बच्चे की बात सुन गुलाब सहम गया, ओह! कोई तो मुझे तोड़े जाने से बचा लो...। आज ही तो मैंने अपनी आँखें खोली हैं। अभी मैंने देखा ही क्या है? गुलाब ने आर्त्त स्वर में दुहाई दी,मैं क्या बेमौत कष्टकारी मौत मारा जाऊँगा?
नहीं दोस्त! काँटों की गंभीर आवाज़ सुनाई दी, तुम चाहे हमें दोस्त समझो या न समझो, पर हम तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं होने देंगे...।
इससे पहले कि बच्चे का हाथ गुलाब तोड़ पाता, काँटों ने अपनी बाँहें फैला दी। बच्चा चीख मारता हुआ, सहमकर वापस चला गया। गुलाब ने चैन की साँस ली।
  थोड़ी देर बाद बगीचे के फूलों के हँसी-ठहाकों में गुलाब और काँटों की सम्मिलित हँसी सबसे तेज़ थी।
 गुलाब अब दुनियादारी सीख चुका था...।

     2. गोलू की सूझ



कुछ समय पहले की बात है, एक बेहद पिछड़े गाँव में अपने माता-पिता के साथ गोपाल आसरे नाम का एक लड़का रहा करता था। उसके पिता गाँव के कुछ गिने-चुने सम्पन्न लोगों में से एक थे। माता-पिता का कलौता पुत्र होने के कारण उसे सभी सुख-सुविधाएँ हासिल थी, लेकिन वह फिर भी दु:खी रहा करता था। कारण कि उसे पढ़ने का बहुत शौक था, किन्तु गाँव में कोई बड़ा स्कूल न होने की वजह से वह अपनी इच्छानुसार आगे नहीं पढ़ पा रहा था। उसने कई बार अपना यह दु:ख अपने माता-पिता से व्यक्त किया और उनसे शहर जाकर आगे पढ़ने की अपनी इच्छा बताई, परन्तु उसके माँ-बाप इस भय से कि कहीं वह शहर की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपना गाँव ही न भूल जाए, उस की यह इच्छा पूरी करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थे।
माता-पिता के इस इंकार से वह इतना दु:खी रहने लगा कि धीरे-धीरे उसका खाना-पीना, हँसना-बोलना सब कम हो गया था। उसे इतना निराश और परेशान देख कर आखिरकार उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रखकर अपना फैसला बदल ही दिया। एक दिन सुबह गोपाल को पास के शहर ले जाकर उसके पिता ने एक अच्छे स्कूल में उसे दाखिला दिलाया और फिर उसे वहीं हॉस्टल में डाल वे वापस आ कर अपनी खेती-बाड़ी में जुट गए।
 इधर गाँव वालों ने कई दिन तक उसे न देख कर जब उनसे पूछा तो उन्होंने बड़े दु:खी होकर उन सब को सारी बात बताई। गोपाल की उच्च-शिक्षा पाने की इच्छा सुन कर खुश होना तो दूर की बात, उल्टे गाँव वाले दु:खी होकर एक-दूसरे से कहने लगे, बेचारा गोलू! उसके भाग्य में शहर की धूल ही लिखी थी। पता नहीं क्यों वह गाँव का सुख छोड़ कर आँख फोडऩे शहर चला गया...।
 उस एक दिन में गोपाल का नाम बदलकर बेचारा गोलूहो गया। गोपाल ने छुट्टी में गाँव आने पर सब किस्सा सुना तो हँसते-हँसते दोहरा हो गया, पर उसने किसी से कुछ कहा नहीं। पर दो-चार दिनों की छुट्टी भी गाँव में बिताना उसके लिए भारी हो गया। वह जहाँ से भी निकलता, सभी उसे दयनीय नजऱ से देख कर कहते, बेचारा गोलू! शहर में रह कर कैसा कमज़ोर हो गया है।
 अरे, इसकी तो मति मारी गई है...।
 जितने मुँह, उतनी बातें। हर बार का यही हाल होता। इन बातों से परेशान होकर धीरे-धीरे उसने गाँव आना कम कर दिया। उसने सोचा कि जब वह खूब पढ़-लिख कर एक क़ाबिल आदमी बन जाएगा और अपने गाँव के लोगों की सेवा करेगा, तब यह लोग पढ़ाई का महत्त्व समझेंगे और उसकी प्रशंसा करेंगे। तब वह भी आसानी से उन्हें शिक्षा का महत्त्व बताएगा, ताकि ये लोग भी अपने बच्चों को आगे पढ़ाएँ।
गोपाल पढऩे में कुछ इस कदर व्यस्त हुआ कि समय कब फुर्र से आगे निकल गया, वह जान ही नहीं पाया और जब जाना तो पाया कि छात्रवृत्ति पाते हुए उसने बी.ए फर्स्ट क्लास में पास कर लिया है।
 इस बार गोपाल की बड़ी इच्छा हुई गाँव में सबके साथ अपनी सफलता बाँटने की। अत: छुट्टी होने पर वह खुशी-खुशी गाँव पहुँचा। सूटेड-बूटेड गोपाल यह सोच रहा था कि घर वालों के साथ-साथ गाँव वाले भी उसे देख कर फूले नहीं समाएँगे, पर यह क्या? जब वह गाँव पहुँचा ,तो उसे वहाँ बड़ी अजनबीयत महसूस हुई। सब उसे बड़े ही आश्चर्य से देख रहे थे। गोपाल को उनका व्यवहार अजीब तो लगा, पर फिर भी उसने उन्हें अपने व्यक्तित्व से प्रभावित कर शिक्षा का महत्त्व समझाने की कोशिश की। उसने बड़े गर्व से उन्हें गिन-गिनकर बताया कि वह फर्स्ट क्लास में बी.ए पास करने के बाद अब एम.ए करने जा रहा है।
 गोपाल की बात सुन कर उसके मुँह पर तो किसी ने कुछ नहीं कहा, परन्तु जैसे ही वह आगे बढ़ा, खुसर-पुसर शुरू हो गई, बेचारा गोलू, इत्ते बरस शहर की खाक छानी, पर बेचारे की किस्मत तो देखो, अभी तक बी.ए-एम.ए के ही फेर में ही है...मैट्रिक भी नहीं कर पाया।
 गोपाल ने सुना तो गाँव वालों की अज्ञानता से दु:खी होकर सोचने लगा, ये लोग किसी भी तरह मेरी बात समझने की कोशिश ही नहीं करते और मुझे बेचारा कहते हैं...। जब कि इन्हें नहीं मालूम कि असली बेचारे तो ये हैं ,जो जानबूझकर विद्या से दूर रहकर एक अबूझी-सी सज़ा भुगत रहे हैं...अपनी गऱीबी और पिछड़ेपन के रूप में। काश! ये जान पाते कि इस विद्या-विहीन गाँव में असली बेचारा कौन है।
 गाँव वालों की इस अशिक्षा और अज्ञानता को दूर करने के लिए गोपाल ने उसी क्षण वापस शहर जाने का विचार त्याग दिया और गाँव में ही रह कर गाँव वालों को शिक्षित करने की कसम खाई।
सम्पर्क: एम.आई.जी- 292, कैलास विहार, आवास विकास योजना संख्या-एक,  कल्याणपुर, कानपुर- 208017  

ऊँच-नीच

             ऊँच-नीच  
                   - कमला निखुर्पा

उत्तरांचल के कुमाऊँ का सुन्दर सा गाँव, चीड़, बाँज, बुराँश के पेड़ों से घिरी हरी-भरी पहाडिय़ों प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर  घाटी में बसा है कलावती का गाँव। सुबह सूरज की  पहली किरण के साथ सामने ऊँची पहाड़ी पर स्थित नंदा मैया के मंदिर का कलश जगमग करने लगा। घर की छत पर झुक आए आडू के पेड़ पर घुघूती गाने लगी ... घुर घुघूती घुर घुर ....
ईजा (माँ) चिल्लाई- कलावती, अरी ओ कला ! बाबा उठ, इस्कूल नहीं जाना तुझे? ... देख  घाम (धूप) निकल आई, आज फिर आन सिंह मास्टर ने तेरी डंडे से पिटाई करनी है। अरे निहुनी संतान! अब उठ जल्दी से ...
कलावती, थुलमे (ऊनी रजाई) से सर ढकते हुए कुनमुनाई- ईजा बस थोड़ी देर और सोने दे ना
 तू ऐसे नहीं उठेगी-  कहते हुए माँ ने थुलमा खींचकर कला को उठा दिया ।
कला आँखें मलते हुए रसोई में जाकर दादी के गोद में पसर गयी ।
सर पे हाथ फेरती हुई दादी ने दुलार करते हुए कहा -उठ गई मेरी पोथी! चल हाथ-मुँह धो ले देख आज मैंने तेरे लिए क्या बनाया है ? कला ने उनींदी आँखों से देखा लोहे की बड़ी सी कढ़ाई में जम्बू के छौंक लगे आलू के पीले-पीले गुटके ... पीतल की परात में मीठे-मीठे पुए ...
खुशी से किलक कर कला बोली -ओ हो पकवान !! आमा आज कौन सा त्योहार है?
 बाबा! आज श्री पंचमी है, आज से बैठ होली शुरू हो जाएगी प्रधानजी  के ठुल खौल (बड़े आँगन) में, अब तू जल्दी से खेत जौ के तिनके ला ... पूजा के लिए फूल लाने हैं फिर दर्जी के यहाँ से नए कपड़े की कतरन भी लाना है तुझे। जल्दी कर बहुत सारा काम पड़ा है।
मनुहार करती हुई कला बोली - दादी आज मेरी इस्कूल की छुट्टी कर दो ना.. अर्जी देदो परुली के हाथ ... मैं नहीं जाऊँगी इस्कूल आज।
ठीक है मत जा, तेरी ईजा मारेगी तुझे तो मत रोना, अब जल्दी से पूजा की तैयारी कर ... वो डाला (टोकरी)  ले जा बाबा ... फूल तोड़ ला ।
 फूलों की डलिया लेकर सीढ़ीदार खेतों से उतरती कला स्वछन्द पंछी की तरह उड़ रही थी... स्कूल जाती अपनी सहेलियों को हाथ हिलाकर छेड़ती हुई, मंद मंद मुस्कराती सोच रही थी, जाओ, पको तुम दिनभर इस्कूल में , खाओ डंडे ... रमेशचंद मासाब, आन सिंह मास्साब से, मैं तो आज आजाद हूँ ... उसे लगा, खेतों के किनारे खिले प्योंली के फूल भी उसके साथ हँस रहे हैं। वह गुनगुनाने लगी, घाटी के सारे पंछी मिलकर उसके सुर में सुर मिलाने लगे ।
फूलों से भरी डलिया लेकर कला घर पहुँची, देखा  बड़ी सी नथ, सोने की मटर माला .. नौ पाट वाला छींट का घाघरा पहन देवी मैया- सी बनकर दादी पूजा के स्थान पर बैठी है, दादी की नथ को छूकर कला हमेशा की तरह हैरान होकर कहती है, अम्मा! तेरी नाक नहीं दुखती, इतनी बड़ा नथ! कितने तोले का है ये ?
दादी गर्व से कहती, नहीं रे क्यों दुखेगी भला, पूरे पाँच तोले की है, जितना बड़ा खानदान, उतनी बड़ी नथ, तेरी शादी में इससे बड़ी नथ देंगे, पहनेगी ना
-नहीं मैं शादी नहीं करूँगी, मैं तो डॉक्टर बनूँगी।
डाकदर बनने के लिए रोज इस्कूल जाना पड़ेगा। ऐसे छुट्टी करके थोड़े ही डाकदर बनते हैं !
अरे अम्मा, डाकदर नहीं डॉक्टर। मैं कल से रोज इस्कूल जाऊँगी पर शादी नहीं करुँगी।
छोटी सी कलावती भरे-पूरे परिवार का लाड़-दुलार पाकर अव्वल नंबरों से प्रथम श्रेणी से दसवीं पास कर स्कूल से इंटर कालेज में पढऩे जाने लगी ।कालेज दूर था,पाँच किलोमीटर पैदल चलकर कला पढऩे जाती, कंधे पर किताबों का झोला लटकाए ,आसमानी कुरते  सफ़ेद दुपट्टा पहने कला जब अपने कालेज को निकलती तो अक्सर घास काटने के जाती घसियारिने बहुएँ रोक कर कहती...
अरे बाबु कैकी चेली छे तू , कि नाम छ तेरु ? (अरे बिटिया किसकी बेटी है तू ? क्या नाम है तेरा ?)
नाम बताने पर वो हँसने ने लगती- अरे पोथी तेरा नाम कला नहीं गोरी गंगा हुन चैछीजैकी घर माँ जाली, उजाला कर देली (अरे बिटिया तुम्हारा नाम कला नहीं गोरी गंगा होना चाहिए  जिसके घर जायेगी, उजाला कर देगी)
पहाड़ी ऊँचे-नीचे कच्चे रास्ते पर रोज मीलों चलकर कला  थककर चूर होकर कालेज से वापस आती पर उसके सपने कभी नहीं  थकते। छोटे भाई-बहिनों के साथ  प्यार-तकरार, दादी के गोद की गर्माहट, दादा का रौबीला व्यक्तित्व, घर कभी-कभी आने वाले पिताजी सब तो थे  कला के साथ ! कि एक दिन सब कुछ बदल गया । 
    उस दिन, कैमिस्ट्री का प्रेक्टिकल कैंसिल हो गया था , कला के क्लास की जल्दी छुट्टी हो गई, स्कूल से जल्दी वापस आना पड़ा, अकेले पहाड़ियों को पार करते उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे आ रहा है ...चुपके से मुड़कर देखा तो आवारा लड़का शराब के नशे में धुत उसके पीछे चला आ रहा है ..जाने क्यों चेहरा जाना पहचाना-सा लग रहा था , शायद  कहीं न कहीं देखा है, शायद पीछा कर रहा  है, ओह आज मैं अकेली हूँ, वो तेज़ी से कदम बढ़ाने लगी, तो वो भी ते-तेज़ चलने लगा, अपना बस्ता थाम वो दौड़ पड़ी ... हाँफते-हाँफते पहाड़ी  चढ़ने लगी, हे भगवन ! कोई मिल जाए, हे देवी मैया ! किसी को भेज दो, देखा सामने मोड़ पर पड़ोस के गाँव के बुजुर्ग बैठकर सुस्ता रहे थे , बेबस कबूतरी की तरह कला उनके बगल में जाकर दुबककर बैठ गयी ।
-बुबू! आप कसार गाँव रहते हो न ?
-हाँ पोथी! मैं तेरे गाँव आया था, मैं दीबा का काका हूँ।
 -अरे हाँ, दीबा दीदी कहाँ है आजकल?
-लखनऊ गई थी, कल ही घर आई है वो।
-अच्छा!
 काका के साथ बतियाते साथ-साथ चलते हुए कला पीछा करने वाले शराबी को भी तिरछी नजर से देखती हुई सोच रही थी , अगले मोड़ से काका के गाँव का रास्ता अलग हो जाएगा, फिर वो क्या करेगी ?
अच्छा  बेटी!  मैं चलता हूँ ... तू अच्छे से जाना हाँ ।
कला ने शराबी को देखा वह सुरक्षित दूरी बनाकर चल रहा था; ताकि काका को संदेह न हो .. उसकी लाल आँखों को देख कला ने मन में ठान लिया, वो अपने गाँव के बीहड़ रास्ते पर अकेली नहीं जाएगी ...काका से कैसे कहे कि वो शराबी पीछा कर रहा है, शर्म और संकोच ने जुबान पर ताला जड़ दिया। अचानक उसने कुछ सोचा और काका से बोली, -
-काका मैं भी आपके साथ आऊँगी, मुझे भी दीबा दी से मिलना है।
-ठीक है बेटी चल।
शराबी हैरान -सा उसे काका के गाँव की ओर जाते हुए देखता रहा ।
काका के साथ आशंकित मन से कला उस अनजान गाँव की ओर चल पड़ी। गाँव में प्रवेश करते ही दीबा दी मिल गई, उसके रुआँसे चेहरे और उड़े रंग को देख दीबा ने सब कुछ पूछ लिया, दीबा साक्षात् दुर्गा का रूप धर, हाथ में घास काटने वाली बड़ी दरांती लेकर बोली, चल मेरे साथ अभी, मैं अभी तुझे घर छोड़कर आती हूँ।
 -नहीं दीदी अभी नहीं, थोड़ी देर में चलते है अभी वो आसपास ही होगा।
 -तू मत डर, चल मेरे साथ।
 उसका  डर सच था, वो अभी भी कला के गाँव जाने वाले रास्ते पर रुक कर इन्तजार कर रहा था। दीबा के हाथ में हँसिया देखते ही वो रफूचक्कर हो गया॥ घर जाकर उसने रोते-रोते दादी को सब कुछ बताया। दादी उस लड़के पर खूब गुस्सा हुई, क्रोधित दादा कुल्हाड़ी लेकर पूरे दिन आसपास के गाँव में चक्कर लगा उसे ढूँढ़ते रहे, कई दिन तक सारा काम छोड़- छाड़कर दादी उसे स्कूल छोडऩे-लेने जाती रही... पर कब तक?
पास-पड़ोस के लोग ताने मारने लगे
-कब तक पीछे-पीछे जाओगी इसके
-अरे! दसवीं पास हो ग अब शादी कर दो इसकी।
-पर अभी वो पढ़ रही है, उसकी पढ़ाई?                     
-अरे पढाई तो शादी के बाद भी कर सकती है, कहीं कोई ऊँच-नीच हो गयी तो गले में पत्थर बाँध कर  डूब मरना अपनी पोती के साथ।
दादी सोच में डूबी रहती, दादा गुस्से में भुनभुनाते रहते, शादी के लिए रिश्ते आने लगे। लड़के वालों से कहा गया कि बिटिया शादी के बाद पढाई जारी रखेगी, सो चट मंगनी पट ब्याह होगा। ब्याह के दिन कला को रँगीली पिछौड़ी ओढ़ाकर उसकी छोटी सी नाक में बड़ी सी नथ पहनाई गयी, नाक सूज कर लाल हो गयी।  विदा होते समय वह  फूट-फूट कर रोई, जबरदस्ती पहनाई गयी लाल चंदक वाली भारी नथ से दुखती नाक का दर्द, स्कूल छूट जाने का दर्द, ईजा (मां), बौज्यू (पिताजी), बूढ़ी आमा (दादी), बूबू (दादा) छोटे-छोटे  भाई-बहन से बिछुडऩे का दर्द और हाँ गोठ (गौशाला) में धौलीगाय, नन्हीं-सी बछिया बिनुली’,जिसके गले में वह फूलों की माला पहनाती थी; उनसे कभी न मिल पाने का दर्द। आम, अमरूद के बगीचे में डाली में  झूलते हुए  गीत न गा पाने का दर्द। 
दर्द में भीगे सारे जख्मों को अपने आँचल में छुपा परिवार की खातिर कला, बेटी से ब्वारी (बहू) बन गई।
सासू माँ और उनकी भी सास यानी ददिया सास.. दो-दो सासों के बीच अकेली सोलह साल की निरीह अबोध कला ।
भोर होते ही अब कोई पोथी, बाबा पुकार के मनुहार करके नहीं जगाता... अब सुनाई पड़ता -
-ओ ब्वारी! गोरु के लिए घास काट ला।
-ब्वारी! तेरी सास गौशाला की सफाई कर रही है तुझे तो शर्म नहीं ?
-दिनभर घर पे बैठके तूने क्या किया? गाय को भी नहीं दुहा, सारा दूध खुद पी गई होगी।
कैसे कहे कला कि उसे इस तीखे सींग वाली काली मरखनी गाय और हमेशा नारा रहने वाली सास दोनों से बहुत डर लगता है, दूध दुहना तो दूर वह उसे घास भी देने से डरती है ।
गधेरे के उस पार उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलते-चलते पानी के धारे से ताँबे के गागर में पानी भरते-भरते अचानक कला को घुघूती की सुरीली आवाज आती है... घुर घुघूती घुर घुर.. उसके आँखों के सामने नाचने लगते हैं आडू के पेड़, आम के बगीचे, दादी की मीठी पुकार, बाँज (ओक) के जंगलों की ठंडी हवा, लाल बुराँश के फूलों से सजा जंगल, चट्टान के सीने को तोड़ कर  बहता मीठे पानी का सोता-
 उसे लगा, उसके अन्दर भी कुछ टूट कर बहने लगा है.. पलकों से निकल बहते-बहते कपोलों को भिगो गया है... भरी गागर सर पर रख खाली मन से चलते-चलते वह ठिठक गयी देखा, किनारे पर पथरीली जमीन में प्योंली के पीले-पीले फूल खिल गए हैं। चटख रंग के फूलों ने मन को उमंगित कर दिया, ओह वसंत आ गया! पूरा साल बीत गया! फिर से नयी कोंपलें  फूटने लगीं, प्योंली तू फिर खिल गई और मैं? मैं कब खिलूँगी! क्या मैं भी खिलूँगी? कला के सपने जाग उठे, पंख फैलाकर उडऩे  लगे, तभी पदम् के पेड़ पर बैठी न्योली चहक उठी-नीहू नीहू- घाटियाँ गूँजने लगी। कला के मन की घाटियों में भी गूँज रही है ..अधूरे सपनों की पुकार ..वह पढ़ेगी, खुद डॉक्टर नहीं बन पाई, तो क्या, अपने बच्चों को खूब पढ़ाएगी उन्हें डॉक्टर बनाएगी। उन्हें ऊँच-नीच का डर नहीं दिखाएगी, उसकी आँखों में नए सवेरे- सी चमक थी।
 घर आकर उसने पानी से भरा गागर रसोई में रखाबाहर आले पर पड़ी कलम उठाई, पोस्टकार्ड लिया और पत्र  लिखने लगी। कागज पे ढेरों फूल खिलने लगे।
सम्पर्क: प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक 2कृभको, सूरत (गुजरात) 394515