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Mar 15, 2016

अमेरिका प्रवास से जुड़े अनुभव

               सोच में दम है तो..

                                               - सुभाष लखेड़ा

बचाव  उपचार से  बेहतर है।”यह वाक्य मैं बचपन से सुनता आया हूँ।  बहरहाल, हम भारतीय लोग  इस वाक्य का अनुकरण करने में अमेरिकियों से  पीछे हैं यह मुझे तब पता चला ,जब मैं इस  पाँच माह अमेरिका में रहा। यद्यपि मेरे लिए अमेरिका जाने का यह पाँचवा  मौका था, इस बार  मैंने  वहाँ के लोगों के जीवन पद्धति को समझने का प्रयास किया। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि शोर हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है। बावजूद इसके हम जाने-अनजाने कोई ऐसा मौका नहीं गँवाते, जब हम शोर पैदा कर अपने आसपास ध्वनि- प्रदूषण को बढ़ाने में योगदान न देते हों। शादी-जागरण के समय ही नहीं, हम अपने घरों- दफ्तरों में भी ऊँची आवाज में बातचीत अथवा बहस कर इस कार्य में अपना योगदान देते रहते हैं। यहाँ यह बताना उचित होगा कि शोर से केवल हमारी सुनने की क्षमता ही नहीं घटती है, यह हमारे रक्तदाब को भी बढ़ाता है। शोर नींद में खलल डालकर हमारे मानसिक स्वास्थ्य को भी चौपट करता है। हम शोर पैदा करना अपना मौलिक अधिकार मानते हैं जबकि शोर का दिल की बीमारियों से  रिश्ता पाया गया है।
बहरहाल, मैंने अपने अमेरिका प्रवास के दौरान देखा है कि वहाँ लोग बहुत हल्की आवाज में बतियाते हैं।  आपको यह पता होगा कि वहाँ किसी घर में  यदि शोर हो  रहा है तो आजू- बाजू के लोग आनन फानन में पुलिस बुला देते हैं।  बारात में ढोल- नगाड़े पीटने का रिवाज भी वहाँ नहीं है। यूँ शोर पैदा करने में खर्चा आता है, किन्तु  हम गरीब भारतीय लोग  ऐसे खर्चे करने में गुरेज नहीं करते हैं।  शोर बीमारियों को जन्म देता है, यह जानते हुए भी हम शोर- शराबा करने से बाज नहीं आते हैं। नई कार  खरीदने की सूचना हम अपने आस- पड़ोस में रहने वालों को वक्त बेवक्त हॉर्न बजाकर देते रहते हैं। अमेरिका में हॉर्न की आवाज नहीं के बराबर सुनने में आती  है। वहाँ बेमतलब होर्न बजाने वाले को असभ्य माना जाता है।
 हम यह भी जानते हैं कि स्वच्छता का हमारे स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है ,किन्तु सिर्फ जानने से कुछ नहीं होता है। गन्दगी फैलाने में  हम निरंतर  योगदान देते रहते हैं। यहाँ अमेरिकी लोग हमारे से बहुत पीछे हैं। मैंने वहाँ किसी को भी सड़क पर थूकते, नाक साफ करते, केले या मूँगफली के छिलके फेंकते नहीं देखा है। वहाँ रहने वाले भारतीय भी ऐसा नहीं करते हैं। वहाँ कोई केले के छिलके पर कभी नहीं फिसल सकता ,क्योंकि वहां सड़क पर कोई छिलका होता ही नहीं।
भारत में टीबी अथवा दूसरी संक्रामक रोगों का प्रसार इसलिए भी होता है कि यहाँ के मरीज जहाँ- तहाँ थूकते - मूतते  रहते हैं। यदि आस- पास कूड़ा- कचरा हो तो बीमारियों की रोकथाम  करना कैसे  सम्भव  है ? अमेरिका में रहने वाले  लोग ऐसा नहीं करते।  वे खुले सार्वजनिक  स्थानों पर मल- मूत्र का त्याग नहीं करते। वहाँ दूर-दूर के निर्जन स्थानों पर भी शौचालय उपलब्ध हैं। हमारे यहाँ अक्सर समाज को वैज्ञानिक ढंग से सोचने की सलाह दी जाती है। हम यह भूल जाते हैं कि वैज्ञानिक ढंग से वही सोच सकता है ,जो वैज्ञानिक ढंग से जीना जानता है। हम लोग अक्सर पैसों का रोना रोते रहते हैं ,किन्तु क्या कोई यह बता सकता है कि शोर न करने पर क्या खर्च आता है? गन्दगी न फैलाने पर क्या खर्च आता है? जबकि  शोर युक्त गंदे वातावरण से  तरह- तरह के रोग फैलते हैं और उनके उपचार पर लाखों- करोड़ों का खर्च आता है।
हमारे यहाँ लोग यह विश्वास करते हैं कि अमेरिकी लोग शराब पीने- पिलाने के शौकीन होते हैं।  यह सही है कि वहाँ शराब को लेकर उस तरह के सामाजिक निषेध नहीं हैं ,जैसे अपने यहाँ।  बहरहाल, न्यू जर्सी में हडसन नदी के किनारे देर रात तक घूमते हुए हमें कभी कोई ऐसा आदमी नहीं दिखा जो शराब पीकर शांति भंग कर रहा हो अथवा  लडख़ड़ाते  हुए यह सन्देश दे रहा हो कि उसने शराब पी हुई है। वहाँ सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान  करते हुए भी मैंने किसी को नहीं देखा है।  हमारे यहाँ लोगों के मन में  अमेरिका को लेकर बहुत सी भ्रांतियाँ  हैं और इनका निराकरण होना जरूरी है। खेद की बात है कि खाने- पीने और पहनावे में हम पश्चिम की नकल करते हैं, किन्तु उनकी अच्छी आदतों को अपनाने में हमें तकलीफ होती है। दरअसल, हम बिना सोचे समझे बॉलीवुड को हॉलीवुड  बनाने  के सपने देखते रहते हैं किन्तु भूल जाते हैं कि केवल कपड़े उतारने से ऐसा नहीं हो सकता है। 'हम होंगे कामयाब एक दिनमें यकीन रखना अच्छी बात है किन्तु उस कामयाबी को पाने के लिए पसीना बहाना पड़ता है। आखिर, विज्ञान हमें यही सब तो बताता है कि 'राष्ट्र का निर्माण सपनों से नहीं, लहू और लौह से होता है।’
अमेरिकी लोगों के बारे में इधर  अपने यहाँ अधिकांश लोग  यह मानते हैं कि वे आत्मके्न्द्रित  होते हैं और सिर्फ  अपने बारे में सोचते  हैं। मेरा अनुभव है कि वे जरूरत पड़ने पर दूसरों की सहायता करने के लिए तत्परता से आगे आते हैं। वहाँ आपको कोई भी ऐसा कुत्ता या बिल्ली नज़र नहीं आएगी, जिसका  कोई मालिक न हो। सान डियागो (कैलिफोर्निया) में  हमें  ऐसे  इश्तिहार अथवा  विज्ञापन  देखने को  मिले, जिनमे वहाँ किसी वजह से अनाथ हुए कुत्ते- बिल्लियों को गोद लेने के लिए  नागरिकों से अनुरोध किया गया था।  हमारे यहाँ लोग अपने कुत्तों को सड़कों पर इसलिए घुमाते हैं ,ताकि वे उनके घरों के बजाय सड़कों पर टट्टी- पेशाब करें।  अमेरिकी लोग भी ऐसा ही करते हैं ,किन्तु जैसे ही उनके कुत्ते ऐसा करते हैं, वे तपाक से  उस जगह की सफाई कर अपने कुत्ते के मल को प्लास्टिक की थैली में भरकर समीप के कचरे के डिब्बे में फेंकते हैं।  मैं इसे जीने का वैज्ञानिक तरीका मानता हूँ।  वैज्ञानिक सोच यही है कि आप अपने घर और आस-पास  के सार्वजनिक स्थानों को साफ सुथरा रखें। हमने वहाँ किसी को किसी जानवर  पर पत्थर अथवा डंडा - लाठी मारते नहीं देखा है।  वहाँ प्रात:काल सड़कों पर घूमते लोग सामने पड़ने वाले लोगों का मुस्कराकर अभिवादन करते हैं। अभिवादन करते समय वे यह नहीं देखते कि आप उनसे आयु  में बड़े हैं या छोटे अथवा  अमीर हैं या गरीब। दिन की शुरुआत करने का यह तरीका भी एक वैज्ञानिक सोच का परिणाम है। मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए मुस्कराना  कितना जरूरी है, ऐसा हम हिन्दुस्तानी भी जानते हैं किन्तु अपने से छोटों के सामने मुस्कराना हमें गँवारा नहीं;क्योंकि हम सोचते  हैं कि उससे हमारा रुतबा घट सकता है।
यहाँ अमेरिकी लोगों में वे सब लोग शामिल हैं ,जो वहाँ रहते हैं। उनमे भारतीय मूल के लोग भी शामिल हैं। हमारे यहाँ आयुर्वेद में माना गया है कि भोजन खाने के दौरान पानी नहीं पीना चाहिए; किन्तु हम लोग खाना खाते समय बीच- बीच में पानी पीते रहते हैं। अमेरिकी लोग भोजन के साथ या तुरंत बाद जूस पीते हैं। मैंने वहाँ किसी अमेरिकी को खाना खाते समय बीच- बीच में पानी पीते नहीं देखा है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी पानी खाना खाने के लगभग एक घंटे बाद पीना चाहिए।
हमें अमेरिका में ऐसे लोगों को देखने का मौका मिला ,जो सैकड़ों वर्षों से वहाँ रह रहे हैं; किन्तु अभी भी रोशनी के लिए  लालटेन का इस्तेमाल करते हैं; कपड़े हाथ से धोते हैं; यात्रा के लिए घोड़ा- गाड़ी रखते हैं और अपने हाथों से सिले वस्त्र पहनते हैं। ये लोग मैंने अरबाना (शिकागो  के समीप का एक उपनगर) में देखे, ये लोग तथाकथित 'आमिषसमुदाय से सम्बन्ध रखते हैं और आज भी जीने के उन तरीकों को अपनाते हैं, जो प्रकृति के अनुकूल माने गए हैं। बीमार पडऩे पर ये अपना उपचार प्राकृतिक पद्धतियों से करते हैं यानी जहाँ तक  सम्भव  है, प्रकृति के साथ तालमेल से रहते हैं। बाद में मालूम हुआ कि इस समुदाय के लोग अमेरिका के कई नगरों के आसपास रहते हैं और जीविका- उपार्जन के लिए खेती और पशुपालन करते हैं। ये स्वावलम्बीबी लोग आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर और शारीरिक- मानसिक रूप से चुस्त- दुरुस्त होते हैं। अमेरिका की तथाकथित 'आधुनिकताउन्हें आज तक प्रभावित नहीं कर पायी है।  इससे यह साबित होता है कि यदि सोच में दम है तो मनुष्य अपनी शर्तों पर भी जी सकता है!  

सम्पर्क: सी- 180 , सिद्धार्थ कुंज, सेक्टर- 7,  प्लाट नंबर- 17
द्वारका, नई दिल्ली  - 11007

छत्तीसगढ़ में फाग

 राधे बिन होरी न होय

                                         - संजीव तिवारी

लोक गीत किसी भी भौगोलिक क्षेत्र की संस्कृति का ऐसा अभिन्न अंग हैं जिनमें हमारी प्रकृति व परम्पराओं की स्पष्ट झलक नजर आती है।
 छत्तीसगढ़ में लोकगीतों की समृद्ध परम्परा कालांतर से लोक मानस के कंठ कठ में तरंगित है। करमा, ददरिया जैसे सदाबहार गीत एवं भोजली, गौरा, जस व फाग गीत जैसे त्यौहारों पर गाये जाने लोक गीतों का अपना अपना महत्त्व है। वाचिक परम्परा के रूप में सदियों से यहाँ के किसान- मजदूर पारम्परिक लोकगीतों को गाते आ रहे हैं जिसमें प्यार है, चुहलबाजी है, शिक्षा है और समसामयिक जीवन का प्रतिबिम्ब भी है क्योंकि लोकगीत जन के मन में उल्लास व आनंद के साथ ही अपनी परम्पराओं को भी जीवंत रखने व लोक-शिक्षण का काम करती है। लोक-जीवन की स्पष्ट झलक लोक-गीतों में ही मुखरित होती है जिससे किसी क्षेत्र विशेष की सामाजिक जीवन को परखा व समझा जा सकता है। ऐसे सभी तत्वों को समेटा हुआ, ॠतुराज बसंत के आगमन में गाए जाने वाला, हमारा लोकगीत फाग है।
भारत के कोने कोने में फागुन में फाग गीत गाये जाते हैं एवं सभी स्थानों के फाग गीतों की विषय वस्तु राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंगों ही होते हैं । छत्तीसगढ़ के भी गली- गली में नगाड़े की थाप के साथ राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंग भरे फाग गीत जन- जन के मुँह से बरबस फूटने लगते हैं। बसंत पंचमी को गाँव के बईगा द्वारा होलवार में पूजा करने के बाद शुरू फाग गीत प्रथम पूज्य गणेश के आह्वान से साथ स्फुटित होता है-
गनपति को मनाव, गनपति को मनाव / प्रथम चरण गनपति को / काखर पुत गनपति ये, काखर हनुमान / काखर पुत भैरव हैं, काखर भगवान / प्रथम चरण गनपति को / गौरी पुत गनपित है, अंजनी के हनुमान / देवी सतालिका पुत भैरव हैं, / कौसिल्या के हैं राम / प्रथम चरण गनपति को ।
पद- राग और सुर- ताल के साथ फाग का आगाज होता है-
 'सुरू से पद अउ रागन मैं गावव, मैं गांववन सिरि रे गनेस’फाग तो आरंभ हो गया किन्तु राधा- कृष्ण नहीं आये हैं, वे मित्रों के साथ कुंजन में होरी खेल रहे है, राधा के बिना होली अधूरी है, जाओ मित्र उसे बुला लाओ, क्योंकि राधा के पीछे- पीछे कान्हा दौड़ै चले आयेंगें-
दे दे बुलउवा राधे को, / सुरू से दे दे बुलउवा राधे को / राधे बिन होरी न होय, / राधे बिन होरी न होय, दे दे बुलउवा राधे को।
फाग अपने यौवन में है नगाड़ा धड़क रहा है, राधा के आते ही उत्साह चौगुना हो जाता है। राधा किसन होरी खेलने लगते हैं, गायक के साथ मस्ती में डूबे वादक दो जोड़ी, तीन जोड़ी फिर दस जोड़ी नगाड़े को थाप देता है-  बजे नगाड़ा दस जोड़ी, राधा किसन खेले होरी। कृष्ण के शरारती प्रसंगों को गीतों में पिरो कर छत्तीसगढ़ का फाग जब नगाड़े से सुर मिलाता है तो बाल- युवा- वृद्ध जोश के साथ होरी है... होरी है.... कहते हुए नाचने लगते हैं, रंगों की बरसात शुरू हो जाती है -
छोटे से श्याम कन्हैया हो, / छोटे से श्याम कन्हैया मुख मुरली बजाए, / मुख मुरली बजाए छोटे से श्याम कन्हैया ! / छोटे मोटे रूखवा कदंब के, डारा लहसे जाए डारा लहसे जाए/ ता उपर चढके कन्हैंया, मुख मुरली बजाए मुख मुरली बजाए / छोटे से श्याम कन्हैया / सांकूर खोर गोकुल के, राधा पनिया जाए राधा पनिया जाए / बीचे में मिलगे कन्हैया, गले लियो लपटाए तन लियो लपटाए, छोटे से श्याम कन्हैया।
छत्तीसगढ़ में फागुन के लगते ही किसानों के घरों में तेलई चढ़ जाता है अईरसा, देहरौरी व भजिया नित नये पकवान, बनने लगते हैं । युवा लड़के राधा किसन के फाग गीतों में अपनी नवयौवना प्रेमिका को संदेश देते हैं तो साथ में गा रहे बुजुर्ग फागुन के यौवन उर्जा से मतवारी हुई डोकरी को उढ़रिया भगा ले जाने का स्वप्न सजाते हैं-
तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया, / तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया / फागुन के रे तिहार, तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया / कउने हा मारे नजरिया, कोने सीटी रे बजाए / कउने भगा गे उढरिया, फागुन के रे तिहार ... / टूरी हा मारे नजरिया, टूरा सीटी रे बजाए / डोकरी भगा गे उढ़रिया, फागुन के रे तिहार ....
छत्तीसगढ़ में लड़कियाँ  विवाह के बाद पहली होली अपने माता पिता के गाँव में ही मनाती है एवं होली के बाद अपने पति के गाँव में जाती है इसके कारण होली के समय गाँव में नवविवाहित युवतियों की भीड़ रहती है । इनमें से कुछ विवाह के बाद पति से अनबन के चलते अपने माता पिता के गाँव में बहुत दिनों से रह रही होती हैं । विवाहित युवा लड़की किसी अन्य लड़के से प्रेम करती है जिसके साथ रहना चाहती है पर गाँव के लड़के उसकी अल्हड़ता व चंचलता से जलते है वे उस लड़की की दादी से कहते हैं -
ये टूरी बड़ा इतरावथे रे, / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना / येसो गवन येला दे देते बूढ़ी दाई, / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना/ कहंवा हे मईके कहवां ससुरार हे / कहंवा ये जाही भगा के ओ बूढ़ी दाई / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना / रईपुर हे मईके दुरूगा ससुरार हे / भेलई ये जाही बना के ओ बूढ़ी दाई / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना।
फाग गीतों के प्रेम में चुहलबाजी भी है, केदार यादव के गाये ददरिया गीत को भी नगाड़े के चोट पर फाग का रूप दिया जाता है और मोहनी खाये टूरा मन नाचने लगते हैं-
का तै मोला मोहनी डार दिये गोंदा फूल / का तै मोला मोहनी डार दिये ना / रूपे के रूखवा म चढि़ गये तैं हा / मन के मोर मदरस ला झार दिये गोंदा फूल / का तै मोला मोहनी डार दिये ना।
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला अब गोरि के उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल / पवन चले अलबेला अब गोरि के
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल / (बसंत में गोरी के बाल कंधों से उड़- उड़ रहे हैं क्योंकि अलबेला पवन चल रहा है)
फाग में प्रेम प्रसंग के साथ प्रेमिका को पाने के लिए शौर्य प्रदर्शन के प्रतीक रूप में जन जन के आदर्श आल्हा- उदल भी उतर आते हैं। खांडा पखाडते हुए आल्हा, उदल की प्रमिका सोनवा को लाने निकलता है, मस्ती से झूमते युवक गाते हैं -
उदल बांधे हथियार, उदल बांधे तलवार / एक रानी सोनवा के कारन / काखर डेरा मधुबन में, / काखर कदली कछार / काखर डेरा मईहर में, उदल बांधे तलवार ..... / आल्हा के डेरा मधुबन में, उदल कदली कछार / सोनवा के डेरा मईहर में, उदल बाँधे तलवार .....
प्रेम रस से सराबोर इस लोकगीत में बाल- युवा- वृद्ध सब पर मादकता छा जाती है पर उन्हें अपने प्रदेश व देश पर नाज है । राष्ट्रपिता के अवदान स्वरूप प्राप्त आजादी का मतलब उन्हें मालूम है, अंग्रेजों के छक्के छुडाने वाले गाँधी बबा भी फाग में समाते हैं -
गाँधी बबा झंडा गढ़ा दिये भारत में / अगरेज ला चना रे चबाय, अंगरेज के मजा ला बताए / गाँधी बबा झंडा गढा दिये भारत में / गडवईया गडवईया, गडवईया जवाहर लाल / गाँधी बबा झंडा गढा दिये भारत में ।
वाचिक परम्परा में सर्वत्र छाये इस लोकगीत में समय काल व परिस्थिति के अनुसार तत्कालीन विचार व घटनाएँ भी समाती रही हैं । चीन के आक्रमण के समय गाँवों में गाये जाने वाले एक फाग गीत हमें पोटिया गाँव के देवजी राम साहू से सस्वर सुनने को मिला आप भी देखें -
भारत के रे जवान, भारत के रे जवान / रक्षा करव रे हमर देस के / हमर देसे ला कहिथें सोनेकर चिरिया / चीनी नियत लगाए, चीनी नियत लगाए / मुह फारे देखे पाकिस्तान ह, येला गोली ले उडाव
येला गोली ले उडाव, नई रे ठिकाना हमर देश के / भारत के रे जवान, भारत के रे जवान .....
आजादी की लड़ाई, गांधी जी के सत्याग्रह, आल्हा उदल की लड़ाई के साथ समसामयिक विषयों का भी समावेश समयानुसार फाग में होता है -
अरे खाड़ा पखाड़ो दू दल में, आल्हा खाड़ा पखाड़ो दू दल में / उदल के रचे रे बिहाव, आल्हा खाड़ा पखाड़ो दू दल में।
रेलगाड़ी मजा उड़ा ले टेसन में / तोर धुआं उडय़ रे अकास,/ रेलगाड़ी मजा उड़ा ले टेसन में ।
फाग गीतों में आनंद रस घोलने का काम आलाप एवं कबीर से होता है। बीच बीच में अरे रे रे ..... सुन ले मोर कबीर से शुरू कबीर के दोहों को उच्च स्वर में गाया जाता है एवं पद के अंतिम शव्दों को दोंहों में शामिल कर फाग अपने तीव्र उन्माद में फिर से आ जाता है । कभी कभी राधा- कृष्ण के रास प्रसंग तो कभी प्रेम छंद भी कबीर के रूप में गाए जाते हैं। आलाप फाग शुरू करने के पहले उच्च स्वर में विषय वस्तु से सम्बन्धित छोटे छंद या पदों के रूप में किसी एक व्यक्ति के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है यथा-
लाली उड़य चुनरिया गोरी, लाली लाली बाती / रंग तो मैं हर लगाहूँ रंगरेली, जाबे केती केती हो...
 प्राय:  उसी के द्वारा उस गीत को उठाया, अर्थात शुरू किया जाता है । सरररा.... रे भाई सुनले मोर कबीर... के साथ चढ़ाव में बजते मादर में कुछ पलो के लिए खामोशी छा जाती है गायक- वादक के साथ ही श्रोताओं का ध्यान कबीर पढऩे वाले पर केन्द्रित हो जाती है। वह एक दो लाईन का पद सुरीले व तीव्र स्वर में गाता है। यह कबीर या साखी फाग के बीच में फाग के उत्साह को बढ़ाने के लिए किसी एक व्यक्ति के द्वारा गाया जाता है एवं बाकी लोग पद के अंतिम शब्दों को दुहराते हुए साथ देते हैं। इसके साथ ही कबीर के दोहे या अन्य प्रचलित दोहे, छंद की समाप्ति के बाद पढ़े जाते है पुन-  वही फाग अपने पूरे उर्जा के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुच जाता है। उतार चढ़ाव के बीच प्रचलित कबीर कुछ ऐसे प्रस्तुत होते हैं -
बिन आदर के पाहुना, बिन आदर घर जाए कि यारों बिन आदर घर जाए ।
मुँहु मुरेर के पानी देवय, अउ कुकुर बरोबर खाय कि यारों कुकुर बरोबर खाय।।
आधा रोटी डेढ़ बरी, सब संतन मिल खाय, कि यारों सब संतन मिल खाय।
आधा रात को पेट पिरावय, त कोलकी डहर जाए कि यारों कोलकी डहर जाए ।।
ललमुही टूरी बजार में बईठे, हरियर फीता गुथाय कि यारों हरियर फीता गुथाय।
वो ललमुही टूरी ला देख के, भइया सबके मुह पंछाय कि यारों सबके मुह पंछाय।।
पातर पान बम्भूर के, केरा पान दलगीर कि यारों केरा पान दलगीर।
पातर मुँह के छोकरी, बात करे गंभीर कि यारों बात करे गंभीर।।
होली की रात, होली जलने पर गाँव के होलवार में होले डांड तक यानी होलिका की सीमा तक, अश्लील फाग भी गाया जाता है ।यह अश्लील गीत होलिका के प्रति विरोध का प्रतीक है, होलिका को गाली देने के लिए सामूहिक स्वर में नारे लगाए जाते हैं , इसीलिए यहां किसी को गंदी गंदी गाली देने पर 'होले पढ़त हसकहा जाता है। होलिका के जलने से लेकर सुबह तक ये गीत चलते हैं फिर होलिका के राख को एक दूसरे पर उड़ाते हुए फाग गाते हुए गाँव तक आते हैं गाँव में आते ही इसकी अश्लीलता समाप्त हो जाती है । गोरी ओ तोर बिछौना पैरा के”साथ कुछ चुहलपन साथ रहती है -
मेछा वाले रे जवान, पागा वाला रे जवान / मारत हे अंखियाँ कच ले बान / कहंवा ले लानबोन लुगरा पोलका, / कहंवा ले लाबो पान / रईपुर ले लानबोन लुगरा पोलका, / दुरुग ले पान/ कहंवा ले लानबोन किसबिन, / कहंवा के रे जवान कहंवा के जवान / मारत हे अंखियां कच ले बान ।
छत्तीसगढ़ में फाग के लिए किसबिन यानी नर्तकी को बुलाया जाता था पूर्व में फागुन में नाच गान करने वाली किसबिनो का पूरा का पूरा मुहगा किसी किसी गांव में होता था जहां से किसबिन को निश्चित पारिश्रमिक पर लगा कर फाग वाले दिनो के लिए लाया जाता था । किसबिने मांदर की थाप पर नृत्य पेश करती थी -आमा के डारा लहस गे रे.... और जवान उस पर रंग गुलाल उडाते थे। कालांतर में यह प्रथा कुछ कुत्सित रूप में सामने आने लगी थी , अत: अब किसबिन नचाने की प्रथा लगभग समाप्त हो गई है । आधुनिक प्रयोगों में पुरुषों के साथ ही महिलाओं के द्वारा भी फाग गाया जा रहा है । सीडी- कैसेटों के इस दौर में फाग के ढेरों गीत बसंत पंचमी के साथ ही छत्तीसगढ़ में गूंजने लगा है मेरा मन भौंरा भी रुनझुन नाचता गाता हुआ फाग में मदमस्त है।
बसंत पंचमी से धड़के नगाड़े और उड़ते गुलालों की रम्य छटा होली के दिन अपने पूरे उन्माद में होता है। गाँव के चौक- चौपाल में गुंजित फाग होली के दिन सुबह से देर शाम तक अनवरत चलता है।  रंग भरी पिचकारियों से बरसते रंगों एवं उड़ते गुलाल में मदमस्त छत्तीसगढ़ अपने फागुन महराज को अगले वर्ष फिर से आने की न्यौता देता है-
अब के गये ले कब अईहव हो, अब के गये ले कब अईहव हो / फागुन महराज, फागुन महराज, / अब के गए ले कब अईहव / कामे मनाबो हरेली, कामे तीजा रे तिहार / कामे मनाबो दसेला, कब उडे रे गुलाल। अब के गये ले कब अईहव हो.../ सावन मनाबो हरेली, भदो तीजा रे तिहार/ क्वांर मनाबो दसेला, फागुन उड़े रे गुलाल। अब के गये ले कब अईहव हो.....
छत्तीसगढ़ का फाग इतना कर्णप्रिय है कि इसे बार बार सुनने को मन करता है । आजकल पारम्ंपरिक फाग गीतों सहित नये प्रयोगों के गीतों के ढेरों कैसेट- सीडी बाजार में उपलब्ध हैं जिससे हमारा यह लोकगीत समृद्ध हुआ है । पूर्व प्रकाशनों में फील्ड सांग्स आफ छत्तीसगढ़ व इसका हिन्दी अनुवाद छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का अध्ययन-  श्यामा प्रसाद दुबे, लोक गाथा-  सीताराम नायक, छत्तीसगढ़ के लोकगीत-  दानेश्वर शर्मा व फोक सांग्स आफ छत्तीसगढ़-  वेरियर एल्विन सहित छत्तीसगढ़ी लघु पत्रिकाओं में झांपी-  जमुना प्रसाद कसार, लोकाक्षर-  नंदकुमार तिवारी, छत्तीसगढ़ी -  मुक्तिदूत आदि एवं छत्तीसगढ़ के समाचार पत्रों के फीचर पृष्ठों में पारंपरिक छत्तीसगढ़ी फाग संगृहीत हैं ;किन्तु जिस तरह से ददरिया व जस गीतों पर कार्य हुआ है वैसा कार्य फाग पर अभी भी नहीं हो पाया है इसके संकलन व संर्वधन एवं संरक्षण की आवश्यकता है।

सम्पर्क:  Email- tiwari.sanjeeva@gmail.com, aarambha.blogspot.com, gurturgoth.com, मो. 9926615707

चम्बल में है संसद


                 चम्बल में है संसद

                                           - लोकेन्द्र सिंह

अतुलनीय भारत का दिल बेहद खूबसूरत है। घुमक्कड़ी के शौकीनों के लिए मध्यप्रदेश में कई ठिकाने हैं। यह अलग बात है कि कई शानदार पर्यटन स्थल अब भी पर्यटको की बाट जोह रहे हैं। मुरैना जिले के मितावली गाँव में स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर अपनी वास्तुकला और गौरवशाली परम्परा के लिए आसपास के इलाके में तो प्रसिद्ध है ; लेकिन मध्यप्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर जगह नहीं बना सका है। अपने क्रियेटिव विज्ञापनों को लेकर चर्चित मध्यप्रदेश का पर्यटन विभाग चौसठ योगिनी शिवमंदिर की मार्केटिंग ढंग से नहीं कर सका है। आप यदि मितावली आएँगे और नौवीं सदी के इस मंदिर को निहारेंगे ,तो हैरत से भर उठेंगे। जमीन से करीब 300 फीट ऊँचाई पर एक पहाड़ी पर बने गोलाकार शिवमंदिर को देखकर अनायास ही आपको मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस की याद आएगी। सर लुटियंस, जिन्होंने दिल्ली को एक नया रूप, रंग और आकार दिया था। भारत के खूबसरत संसद भवन की रचना के लिए आज भी उन्हें तहेदिल से याद किया जाता है। मितावली में इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाला चौसठ योगिनी शिवमंदिर हू-ब-हू हमारी संसद के जैसा दिखता है। मंदिर परिसर में आकर दिमाग की कुछ खिड़कियाँ खुलने लगती हैं और हवा के साथ कुछ प्रश्न इन खिड़कियों से होकर भीतर घुस आते हैं। क्या वाकई हमारी संसद के भवन की परिकल्पना लुटियंस की मौलिक सोच थी? 12 फरवरी 1921 को दिल्ली में जिस संसद भवन की आधारशिला रखी गई, क्या उसके वास्तु की प्रेरणा लुटियंस को चम्बल के चौसठ योगिनी शिवमंदिर से मिली थी? ये कुछ सवाल हैं जो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय तो बनते ही हैं। गहन शोध के जरिए ही इन सवालों के सही जवाब भी हमारे सामने आएँगे। तब ही हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात भारतीय संसद की इमारत की परिकल्पना सर लुटियंस के दिमाग की उपज नहीं बल्कि गौरवशाली भारतीय वास्तुकला का ही एक नायाब नमूना है।
मितावली का यह चौसठ योगिनी शिवमंदिर मुरैना जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर की दूर पर स्थित है। यहां तक पहुँचने के लिए सिंगललेन सड़क है, कई जगह जिसकी हालत खराब है। यहाँ तक पहुँचने में पर्यटकों को थोड़ी मुश्किल का सामना जरूर करना पड़ता है;लेकिन यहाँ आने के बाद उन्हें महसूस होगा कि यदि वे इस मंदिर को न देखते तो देखने के लिए बहुत कुछ छूट जाता। नौवीं सदी में शिवमंदिर का निर्माण तत्कालीन प्रतिहार राजवंश ने कराया था। मंदिर गोलाकार है, ठीक भारतीय संसद के भवन की तरह। मंदिर की गोलाई में चौसठ कमरे हैं। प्रत्येक कमरे में एक-एक शिवलिंग है। कभी इन कमरों में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियाँ भी थीं। देवी योगिनी की चौसठ मूर्तियों के कारण ही इसका नाम चौसठ योगिनी शिवमंदिर पड़ा। देवी योगिनी की काफी मूर्तियाँ ग्वालियर किले के संग्रहालय में रखी हैं। परिसर के बीचों-बीच एक बड़ा गोलाकार शिवमंदिर भी है। मुख्य मंदिर में 101 खम्भे कतारबद्ध खड़े हैं, जो संसद भवन के गलियारे की याद दिलाते हैं। मंदिर के निर्माण में लाल-भूरे बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है, जो मितावली और उसके आसपास के इलाके में पाए जाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि प्राचीन समय में मंदिर में तांत्रिक साधना की जाती थीं। यह तांत्रिक अनुष्ठान का बड़ा केन्द्र था।
भव्य शिवमंदिर को देखने के लिए जनवरी-फरवरी के माह में हम घुमक्कड़ मित्रों की टोली ने योजना बनाई थी। इस टोली में मेरे साथ युवा पत्रकार हरेकृष्ण दुबोलिया, महेश यादव और गिरीश पाल भी शामिल थे। हम ग्वालियर से किराए की टैक्सी से मितावली की ओर निकले। मितावली के नजदीक पहुँचकर जब कुछ स्थानीय लोगों से हमने मंदिर तक पहुँचने के रास्ते के बारे में पूछा ,तो उन्होंने कहा- चम्बल की संसद देखने जा रहे हो। इस कथन से स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोगों के लिए देश में दो संसद भवन हैं। एक दिल्ली में तो दूसरा उनके गाँव मितावली में। वैसे रास्ता बताने में गूगल मैप ने भी हमारी खूब मदद की। आखिर गूगल मैप और ग्रामवासियों की मदद से हम जल्द ही चौसठ योगिनी शिवमंदिर पहुँच गए। टैक्सी नीचे छोड़कर पैदल ही करीब 200 सीढिय़ाँ चढ़कर पहाड़ी के ऊपर मंदिर के सामने पहुँचे। पर्यटकों की ज्यादा संख्या नहीं थी। किसी दूसरे शहर से आए करीब पांच-छह और लोग वहाँ मौजूद थे। मंदिर को लेकर उनसे काफी देर तक बातचीत हुई। वे भी आश्चर्यचकित थे चम्बल में संसद भवन का प्रतिरूप देखकर। पर्यटकों के उस समूह में एक बुजुर्ग धोती-कुर्ता पहने हुए थे। बातचीत में पता चला कि वे पंडित हैं और मुम्बई से आए हैं। उनके साथ अप्रवासी भारतीय थे, जो उनके यजमान थे। पंडितजी भारत के गौरव से रू-ब-रू कराने के लिए अपने यजमानों को कुछ चिह्नित जगहों पर घुमाने निकले थे। उनकी भारत दर्शन की योजना में चम्बल का यह हिस्सा भी शामिल था, यह जानकर सुखद अनुभव हुआ।
मितावली के आसपास बिखरा पड़ा है सांस्कृतिक इतिहास - मध्यप्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार चाहे तो चम्बल में पर्यटकों की संख्या को आसानी के साथ बढ़ाया जा सकता है। इसका फायदा यहां के ग्रामवासियों को तो होगा ही साथ ही सरकारों के राजकोष में भी इजाफा हो सकेगा। आगरा का ताजमहल और ग्वालियर का किला तो दुनिया के लोगों को आकर्षित कर अपने पास बुलाता ही है। अगर सरकार थोड़े से प्रयास करे तो आगरा और ग्वालियर आने वाले इन मेहमानों को डकैतों-बागियों के लिए कुख्यात चम्बल की खूबसूरत और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध तस्वीर भी दिखाई जा सकेगी। ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र पर्यटन के नजरिए से काफी समृद्ध है। मुरैना से सिहोनिया गाँव (ककनमठ), मितावली, पडावली, बटेश्वर होते हुए नूराबाद तक के बेल्ट में गौरवशाली इतिहास के दर्शन होते हैं। मुरैना शहर से उत्तर-पूर्व दिशा में करीब 20 किलोमीटर दूर सिहोनिया गाँव में आठवीं सदी का ककनमठ मंदिर है। ककनमठ मंदिर खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर से भी विशाल है। ककनमठ मंदिर से पश्चिम की दिशा में करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर स्थित है। मितावली से दक्षिण-पश्चिम दिशा में करीब चार किलोमीटर ही आगे बढऩे पर पडावली आता है। पडावली में विशाल विष्णु मंदिर है। मंदिर के मण्डप की चार दीवारों पर चार युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग में मनुष्य की प्रवृत्ति को दिखाने का प्रयास किया गया है। इसके लिए सेंड स्टोन पर खूबसूरती से सम्भोग से लेकर समाधि में लिप्त आकृतियाँ उकेरी गई हैं। पडावली में शानदार नक्काशी को देखकर करीब एक किलोमीटर ही आगे बढ़ना होगा कि शिवमंदिरों का खजाना हमारी प्रतीक्षा कर रहा होता है। कहते हैं आठवीं शताब्दी में कभी यहाँ 300-400 शिवमंदिरों का समूह था। एक समय में ये सभी मंदिर जमींदोज हो गए थे। पुरातत्व विभाग के प्रयासों से यहाँ फिर से आधा सैकड़ा से अधिक मंदिर पुनर्जन्म ले चुके हैं। यहाँ आकर पर्यटकों को अलौकिक शांति का अनुभव होता है। अब यहाँ से उत्तर-पूर्व की दिशा में करीब आठ किलोमीटर आगे बढऩे पर शनिश्चरा मंदिर के दर्शन होते हैं। यह भारत का दूसरा शनिमंदिर है। यह पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहाँ से ग्वालियर की दूर 27 किमी रह जाती है। पर्यटन के नजरिए से इस बेल्ट पर ध्यान दिया जाए तो ग्वालियर-चम्बल को डकैत, बीहड़, बंदूक के अलावा उसकी खूबसूरती, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि के लिए भी पहचाना जाएगा।

सम्पर्क: गली-1, किरार कॉलोनी, कम्पू, लश्कर, ग्वालियर (म. प्र.) 474001,  मो. 09893072930, 

प्रेरक

अपनी खुशी

एक सेमिनार में लगभग 50 व्यक्ति भाग ले रहे थे। सहसा वक्ता ने लोगों से एकग्रुप-एक्टिविटी में भाग लेने के लिए कहा। उसने हर व्यक्ति को एक गुब्बारा दे दिया और मार्कर पेन से उसपर व्यक्ति का नाम लिखने के लिए कहा। फिर सारे गुब्बारे एकत्र करके दूसरे कमरे में रख दिए गए।
फिर वक्ता ने सभी को कमरे में जाकर दो मिनट के भीतर अपना नाम लिखा गुब्बारा खोजकर लाने के लिए कहा। यह सुनते ही सभी लोग एक दूसरे में गुत्थमगुत्था होकर अपना गुब्बारा खोज लाने के लिए दौड़ पड़े। उस कमरे में घोर अव्यवस्था फैल गई। वे सभी एक-दूसरे से टकरा रहे थे, एक-दूसरे के ऊपर गिर रहे थे।
किसी भी व्यक्ति को दो मिनटों के भीतर अपना नाम लिखा गुब्बारा नहीं मिला।
फिर वक्ता ने उनसे कहा कि वे एक-एक करके कमरे में जाएँ और कोई भी एक गुब्बारा उठाकर ले आएँ और उसे उस व्यक्ति को दे दें जिसका नाम गुब्बारे पर लिखा हो। ऐसा करने पर दो मिनटों के भीतर हर व्यक्ति को उसका नाम लिखा गुब्बारा मिल गया।
वक्ता ने कहा, जीवन में भी यही नज़र आता है कि लोग पागलों की तरह अपने इर्द-गिर्द खुशियों की तलाश कर रहे हैं लेकिन वह उन्हें नहीं मिल रही। असल में दूसरों की खुशी में ही हमारी खुशी है। आप उन्हें उनकी खुशियाँ सौंप दें, फिर आपको अपनी खुशी मिल जाएगी। 

शाम के वक्त कभी...

                                
                     शाम के वक्त कभी...

- सूर्यभानु गुप्त

शाम टूटे हुए दिलवालों के घर ढूँढ़ती है,
शाम के वक्त कभी घर में अकेले न रहो!

शाम आयेगी तो जख्मों का पता पूछेगी,
शाम आयेगी तो तस्वीर कोई ढूँढ़ेगी।
इस कदर तुमसे बड़ा होगा तुम्हारा साया,
शाम आयेगी तो पीने को लहू माँगेगी।

शाम बस्ती में कहीं खूने- जिगर ढूँढ़ती है,
शाम के वक्त कभी घर में अकेले न रहो!
याद रह- रह कर कोई सिलसिला आयेगा तुम्हें,
बार- बार अपनी बहुत याद दिलायेगा तुम्हें।

न तो जीते ही, न मरते ही बनेगा तुमसे,
दर्द बंसी की तरह लेके बजायेगा तुम्हें।
शाम सूली-चढ़े लोगों की खबर ढूँढ़ती है,
शाम के वक्त कभी घर में अकेले न रहो!

घर में सहरा का गुमां इतना जियादा होगा,
मोम के जिस्म में रौशन कोई धागा होगा।
रुह से लिपटेंगी इस तरह पुरानी यादें,
शाम के बाद बहुत खूनखराबा होगा।

शाम झुलसे हुए परवानों के पर ढूँढ़ती है,
शाम के वक्त कभी घर में अकेले न रहो!
किसी महफिल, किसी जलसे, किसी मेले में रहो,
शाम जब आए किसी भीड़ के रेले में रहो।

शाम को भूले से आओ न कभी हाथ अपने,
खुद को उलझाए किसी ऐसे झमेले में रहो।
शाम हर रोज कोई तनहा बशर ढूँढ़ती है,
शाम के वक्त कभी घर में अकेले न रहो!


लेखक के बारे में: जन्म- 22 सितम्बर, 1940, नाथूखेड़ा (बिंदकी), जिला- फतेहपुर (उ.प्र.)। बचपन से ही मुंबई में। 12 वर्ष की उम्र से कविता लेखन की शुरुआत। कवि सूर्यभानु गुप्त ऐसे श्रेष्ठ ग़ज़लकार हैं जिन्होंने जिंदगी और समाज की समस्याओं के बरकस हिन्दी ग़ज़ल को भाषा, भावशैली और अभिव्यक्ति का नया तेवर दिया। पिछले 50 वर्षों के बीच विभिन्न काव्य-विधाओं में 600 से अधिक रचनाओं के अतिरिक्त 200 बालोपयोगी कविताएँ प्रमुख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। समवेत काव्य-संग्रहों में संकलित एवं गुजराती, पंजाबी, अंग्रेजी में अनूदित।  गोधूलि (निर्देशक गिरीश कर्नाड) एवं आक्रोश तथा संशोधन (निर्देशक गोविन्द निहलानी) जैसी प्रयोगधर्मा फिल्मों के अतिरिक्त कुछ नाटकों तथा आधा दर्जन दूरदर्शन- धारवाहिकों में गीत शामिल। एक हाथ की ताली (1997) काव्य संकलन- वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली- 110002, पुरस्कार- 1. भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर। 2. परिवार पुरस्कार (1995), मुम्बई।  संप्रति-  सम्प्रति स्वतंत्र लेखन।  मो. 090227 42711