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Jan 20, 2016

पहला पाठ

नर हो न निराश
करो मन को

पहला पाठ

- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

सन् 1973 की बात है। मैं कलसिया ( सहारनपुर) के एक हाई स्कूल में शिक्षण कार्य के साथ अपनी एम ए की पढ़ाई भी कर रहा था। जब भी कोई खाली क्लास होतामैं अपने अध्ययन में जुट जात। छोटा स्कूलछोटी जगह। सबको सबके बारे में छोटी-मोटी जानकारी रहती। मेरे छात्र भी मेरी पढ़ाई के बारे में अवगत थे। सभी छात्रों को कक्षा से बाहर भी कुछ समझ में न आए तो पूछने की छूट थी। सबसे युवा शिक्षक होने के कारण  और हर समय छात्रों की समस्याओं का निवारण करने के कारण छात्रों को उल्लू गधा आदि विशेषण देने वाले अपने साथियों की आँखों  में खटकता था। सीधा-सपाट बोलने की आदत भी इसका कारण थी। छात्रों में मेरी लोकप्रियता ने इस ईर्ष्या को और बढ़ावा दिया था। अपनी ईर्ष्या के कारण एक दो साथी कुछ न कुछ खुराफ़ात करते रहते, जिसके कारण मैं आहत होता रहता था। इसी कारण स्कूल के खाली समय में मेरी पढ़ाई बाधित होने लगी। कई दिन तक ऐसा हुआ कि मैं पढ़ाई न करके चुपचाप बैठा रहता। मुझे नहीं पता था कि मेरे छात्रों की नजऱ मेरी इस उदासीनता पर है। स्कूल की छुट्टी के समय कुछ छात्र-छात्राएँ मुझे नमस्कार करने के लिए आते और कुछ पाँव छूकर (मेरे मना करने पर भी) जाते ।कक्षा आठ की  अनिता माहेश्वरी भी उनमें एक थी। वह मेरा बहुत सम्मान करती थी । एक दिन नमस्कार करने के बाद वह रुक गई । आसपास किसी को न देखकर बोली- 'गुरु जीआपसे एक बात कहना चाहती हूँ। आप मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे।
'कहिए मैं बुरा नहीं मानूँगा।
'मैं कई दिन से देख रही हूँ कि आप खाली पीरियड में चुपचाप बैठे रहते हैं। अपनी एमए की तैयारी नहीं करते हैं। मैं यह भी जानती हूँ कि हमारे कुछ शिक्षक आपके खिलाफ़ दुष्प्रचार करते रहते हैं। शायद इसीलिए आपका मन पढ़ाई में नहीं रहता।
'हाँतुम्हारी यह बात सही है।
'आपके इस तरह पढ़ाई छोड़ देने से किसका नुकसान हैसिर्फ़ आपका! आप नर हो न निराश करो मन को’ कविता हमको पढ़ाते रहे हैं और सबकी हिम्मत बढ़ाते रहे हैंलेकिन आप खुद क्या कर रहे हैं’- कहकर वह उसने सिर झुका लिया ।
मेरा चेहरा तमतमा गया। किसी विद्यार्थी की इतनी हिम्मत ! मैंने अपने आवेश को सँभाला और अनिता से कहा-'आज के बाद तुम मुझे खाली समय में चुपचाप बैठा नहीं देखोगी।’
उसने हाथ जोड़े –'मेरी बात बुरी लगी हो तो माफ़ कर देंगे! कहकर वह चली गई ।
अप्रैल का महीना था। स्कूल की छुट्टी 12 बजे हो जाती। मैं उसके बाद घर न जाकर पढ़ाई में जुट जाता। नोट्स बनाने शुरू कर दिए। छह बजे शाम के बाद घर  की तरफ़ चल देता। छह किलोमीटर का रास्ता कुछ न कुछ पढ़ते हुए पूरा करता। अब तक जो मेरे नम्बर आए थे वे कम थे। प्रथम श्रेणी लाने के लिए  इस सेमेस्टर में 70 प्रतिशत अंक लाने ज़रूरी थे।  कालिज में पढऩे वाले मेरे साथियों का कहना था कि प्राइवेट में क्या, नियमित छात्रों की भी हिन्दी में प्रथम श्रेणी नहीं मिलती। मैंने साथियों की इस अवधारणा को झटक दिया। मेरे ऊपर भूत सवार था अपनी पूरी शक्ति से मेहनत करने का। मई में परीक्षाएँ हुईं। इस सत्र में जयशंकर प्रसाद  तथा प्राकृत-अपभ्रंश भाषाएँ मेरे विशिष्ट विषय थे। सत्तर प्रतिशत अंक आ गए और मुझे प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में प्रथम श्रेणी मिल गई। इस श्रेणी के कारणबी एड में प्राथमिकता में पहला नम्बर होने के कारण प्रवेश मिला। केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक और प्राचार्य के रूप में इस उपलब्धि ने मेरा मार्ग सरल किया।
अनिता माहेश्वरी के इस योगदान को मेरा रोमरोम  आज भी महसूस करता है। मैं उस गुरु के दिए इस पहले  पाठ को कभी नहीं भूला। जब भी कोई संकट आयामेरी इस छात्रा का वह पाठ- ‘नर हो न निराश करो मन को मुझे चट्टान जैसे मज़बूती दे गया। ऐसे गुरु को मेरा कोटिश: नमन !

लेखक परिचय: 19 मार्च 1949बेहट जिला सहारनपुर जन्मएम.ए.( हिन्दी)बी.एडकेन्द्रीय विद्यालय हजऱतपुरफ़ोरोज़ाबाद (उ.प्र.) में प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्तमाटीपानी और हवाअंजुरी भर आसीसकुकड़ कूँहुआ सवेरा, मैं घर लौटा (कविता संग्रह), मेरे सात जनम, माटी की नाव (हाइकु-संग्रह), झरे हरसिंगार (ताँका-संग्रह), धरती के आँसू (उपन्यास) दीपादूसरा सवेरा(लघु उपन्यास), खूँटी पर टँगी आत्मा (व्यंग्य-संग्रह), भाषा-चन्द्रिका (व्याकरण), असभ्य नगर(लघुकथा संग्रह) रोचक बालकथाएँ,  फुलिया और मुनिया (बालकथा-हिन्दी–अंग्रेज़ी), 30 पुस्तकों का सम्पादनब्लॉग- सहज साहित्यवेब- लघुकथा डॉट कॉम। सम्पर्क: टॉवर एफ़, 305 छठातलमैक्सहाइट, सैक्टर-62, डाकघर– पी एस राई131029, सोनीपत (हरियाणा)  मो.09313727493Email - rdkamboj49@gmail.com

अबूझमाड़ की वह पद यात्रा

भुलाए नहीं भूलती

अबूझमाड़ की 

वह पद यात्रा

-गिरीश पंकज

ज़िंदगी भर न भूल पाने वाली सौ किलोमीटर की पद यात्रा है वो. 26  जनवरी से शुरू हुई और 30जनवरी को ख़त्म हुई. सन 2014 की बात है। बस्तर का अबूझमाड़जहाँ  आम लोग घुसने की हिम्मत नहीं करते। पुलिस को भी बड़ी तैयारी के साथ जाना पड़ता है। कई बार वो भी विफल हो जाती है। अबूझमाड़ हजारों एकड़ में फैला हुआ है। और अब तक उसे बूझने की कोशिश जारी है। वहीं  छिप कर रहते हैं नक्सली। क्योंकि उनके लिए वह सुरक्षित जगह है। कहीं नाले हैकही गड्ढे हैं, कही चढ़ाई है। कोई बड़ी गाड़ी तो वहाँ जा ही नहीं सकती। मेरे सुझाव पर कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ल ने कुछ पत्रकारों को राजी किया कि वे अबूझमाड़ के घने जंगल में जाकर नक्सलियों से बात करें कि  आखिर वे निर्दोष लोगो की हत्याएँ क्यों कर रहे हैंउस समय तक नक्सलियों ने दो पत्रकारों की हत्याएँ भी कर दी थीं। फेस बुक में जब कमल ने अबूझमाड़ जाने के लिए देश भर के पत्रकारों को निमंत्रित किया तो शुरू-शुरू में सौ से ज्यादा लोगों ने उत्साह दिखाया। पर जब जंगल में जाने का दिन आया तो बड़ी मुश्किल से पंद्रह लोग राजी हुए। पटना से आए एक युवा पत्रकार ने रात को मुझसे कहा-''पहले  मैं जाने से डर रहा थापर आपको देखा तो हिम्मत जागी. मैं भी चलूँगा आपके साथ''. मुझे  खुशी हुई। लग रहा थाइन पत्रकारों में मैं ही सबसे बड़ा हूँ मगर नारायणपुर में हरी सिंह सिदार भी हमारे साथ शामिल हो गएउनकी उम्र सत्तर पार कर गयी थी; वे सामाजिक कार्यकर्ता हैं.सारे पत्रकारों ने उनका स्वागत किया। और बड़ा आश्चर्य यह रहा कि रास्ते में वे ही सबसे आगे नज़र आते थे। मैं चढ़ाई में थक जाता थातो मेरे साथ दो-चार साथी रुक जाया करते थेमगर सिदार जी सबसे आगे नज़र आते थे।
25 जनवरी 2014 की शाम सब नारायणपुर सीमा में रुके।  पुलिस ने हमें रोकाऔर समझाया कि अंदर जाना खतरे से खाली नहींलेकिन हम लोग सर पर कफ़न बाँध कर आए थे।  नक्सलियों से मिलेंगे और उनसे पूछेंगे कि पार्टनरतुम ही बताओं कि तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है? 26 जनवरी की सुबह हम पैदल निकल पड़े अबूझमाड़ के जंगल में. अभी ने अपनी-अपनी पीठ पर अपने-अपने बैग लादे और बढ़ चले आगे। मुझे सुविधा मिल गई कि मेरा बैग किसी अन्य साथी ने उठा लिया। हमारे साथ बस्तर के ही दो-तीन सहयोगी थे। दो युवा आदिवासी ऐसे भी थे जो भीतर के रास्ते से भलीभाँति परिचित थे. उनके मार्ग दर्शन में हम आगे बढ़ते गए.हम सब घंटो पैदल चलते और शाम होने के पहले किसी गाँव में विश्राम करते। स्कूल हमारी शरणस्थली थे। कच्चे स्कूल. पक्के भवनो को नक्सलियों ने विस्फोट से उड़ा दिया था। उसकी जगह झोपड़ीनुमा घरों में स्कूल चल रहे थे। हम लोग वही रुक जाते। वहीं स्कूल के शिक्षक दाल- भात का इंतजाम  सब्जी भी नहींबस दाल-भात और वही हमे पंचतारा जैसा स्वादिष्ट भोजन लगता।
हम लोगों की पदयात्रा की भनक फेसबुक आदि माध्यमों से नक्सलियों को लग चुकी थी। हमको  ये संकेतभी  मिल रहे थे कि आगे किसी गाँव में माओवादी हमसे  मिलेंगे और  बात करेंगे. यह भी पता चला कि वे कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश कर सकते हैंमगर वह दिन नहीं आया. पाँच दिन की हमारी यात्रा खत्म हो गई मगर अबूझमाड़ में छिप कर रहने वाले नक्सली हमसे नहीं मिले; तो नहीं मिले। हालाँकि हमारे अनेक मित्रों के मन में भय था कि कहीं नक्सली हमारा अपहरण न कर लेएक ने कहा- ''कहीं दूर से ही हमे गोली मार दी तो?'' मैंने मुस्कराते हुए कहा- ''एक  दिन तो सबको मरना है. यहाँ मरे तो शायद शहीद ही कहलाएँगे।'' लेकिन इसकी नौबत नहीं आयी। वैसे  मैंने तो यह मान ही लिया था कि अब शायद वापसी संभव नहीं इसलिए मैंने अपनी समस्त जमापूँजी के बारे में एक जानकारी घर की डायरी में लिख दी थी. कुछ हो गया तो घर वालों को वे पैसे मिल जाएँ। लेकिन हम लोगोंने अबूझमाड़ की पाँच दिनों की यात्रा बिना किसी व्यवधान के पूर्ण कर ली।
 पहली बार मैंने अबूझमाड़ की इतनी लम्बी यात्रा की. वहाँ मैंने नक्सलियों के कथित शहीदस्तम्भ देखे; जिन्हें तोड़ा न  जा सका था। वहाँ हमने घोटुल देखा। यानी वह जगह जहाँ अविवाहित युवक-युवतियाँ मिलजुलकर रतजगा करते हैं और आनन्द मनाते हैं। अगर कोई युवा-युवती आपस में शादी कर लेते हैं, तो वे घोटुल में नहीं आते.घोटुल की संस्कृति आज भी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। हमे आगे जाना थावरना हो सकता हैहम घोटुल को भी जीवंत देख पाते। पैदल चलते-चलते सभी थक  जाते थेपर मैं कुछ ज्यादा ही थक जाता था। एक दिन हम चलते रहे और शाम हो गयीकोई गाँव ही नहीं मिला. साथ चल रहे आदिवासी युवको ने कहा,''बस थोड़ी दूर बाद एक गाँव पडेगा'' हम लोग थक चुके थे फिर भी रुके नहींक्योंकि गाँव पहुँचकर ही आराम करेंगे. रात घनी हो गयी थी। चारों तरफ भयावह सन्नाटा था। हमारे पास सर्च लाइट थी। उसके सहारे आगे बढ़ रहे थे। कहीं नाला पार करतेतो कहीं झाड़ियाँ  हटाकर रास्ता बनाते। लेकिन गाँव का नामोनिशान नहीं था। हालत ये हुई कि मेरी हिम्मत ज़वाब दे गयी. मैंने कहा,'' भाईअब यही रुक जाते हैं। अब चलना मुश्किल हो रहा है।''  मुझे देखकर कुछ और साथी भी जमीन पर ही  बैठ गएलेकिन इस बार फिर दोनों युवको ने कहा, ''अब कुछ ही देर बाद हम गाँव में होंगे।'' मुझमें हिम्मत तो नहीं थीमगर उनके के कहने पर मैं खड़ा हो गयाबाकी साथी भी आगे बढ़े और आधे घंटे बाद दूर रौशनी नज़र आई. सब खुशी से झूम उठे की गाँव आ गया। गाँव क्या दो-चार घर थे बस। हम जहाँ  पहुँचेवो एक स्कूल ही था. झोपड़ी नुमा। ठण्ड का समय थापर कई घंटो की पदयात्रा के कारण पूरा शरीर गर्म हो चुका था। इसलिए ठण्ड का अहसास ही नहीं हो रहा था। स्कूल में कुछ बच्चे पढ़ते थेवे वही रहते भी थेइसलिए  वहा गद्दे-चादरो को व्यवस्था थीदो-तीन खटिया भी नज़र आ गई. मैं चावल-दाल खाकर सीधे खटिया पर  पसर गया। एक-दो घंटे बाद ठण्ड लगने लगी तो अपनी ऊनी चादर निकाल  ली.जिसे जहाँ जगह मिलीवहीं चादर बिछा कर लेटगया। सुबह उठा तो मैं देख कर दंग रह गया कि जिस झोपड़ी में मैं सोया थाउसकी तो छत ही नहीं थी। गहरी थकान के कारण खुली छत से आने वाली ठण्ड का बिलकुल ही अहसास  न हुआ।
चौथा दिन भी खत्म हो गया,मगर  नक्सली नहीं मिले। हम निराश हुए। लगा अपना आना बेकार गया. लेकिन संतोष था कि उस अबूझमाड़ को हमने देखा ;जिसे देखने के लिए लोग तरसते हैं। वहाँ  किसी को जाने की इज़ाज़त ही नहीं मिलती। हमने अबूझमाड़ के गाँव देखे, आदिवासी भाई-बहनो को देखा। वे लोग अपने खाने-पीने के सामान की व्यवस्था करने के लिए सौ-सौ किलोमीटर पैदल चलते हैं। घर से निकलते  हैं और रात होने पर किसी गाँव में रुक जाते हैं। यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी हमारा बस्तर-अबूझमाड़ इस हालत में है। खैरमेरे जीवन का एक रोमांचक संस्मरण है अबूझमाड़ की पद यात्रा।  बहुत-सी बाते हैंविस्तार से बता पाना अब सम्भव नहीं क्योंकि पत्रिका की जगह सीमित हैऔर स्मृति की भी अपनी सीमा है। हम पत्रकार साथी 30 जनवरी को दोपहर इन्द्रावती नदी को पार कर बीजापुर पहुंचेवहाँ  हमारी यात्रा सम्पन्न हुई। लौटते वक्त मैं सोच रहा थाकाशनक्सली भाई मिल जाते, तो उनसे कुछ बात करते। हिंसा का रास्ता छोड़ने का निवेदन करते। मगर वे नहीं मिले। उन्हें सामने आना ही चाहिएबात करना था। वे अपना पक्ष भी रखतेमगर वे नहीं  आए.खैरइसी बहाने हमने आदिवासी बंधुओं के जीवन को निकट से देखा.किन विषम परिस्थितियों में वे रह रहे हैइसे समझा. नक्सल समस्या का समाधान हो तो अबूझमाड़ को सड़कों से जोड़ा जाए। जंगल में जो गाँव बसे हैंवहा अनाज की दुकाने खुलेताकि वहाँ  रहने वालों को सौ-सौ किलोमीटर पैदल  न चलना पड़े। वहाँ से  लौटने  के बाद  मेंने रायपुर सांध्य दैनिक  तक यात्रा-वृत्तांत लिखा। संस्मरण लिखने के बाद फ़ौरन एक संस्मरण यह भी जुड़  गया  कि उसे पढ़कर सबसे  पहला फोन मुझे जो आया, वह था मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का, उन्होंने इस साहसिक यात्रा के लिए मेरी प्रशंसा की और बताया कि ''हमने  भी कईबार अबूझमाड़ की यात्रा की कोशिश की थीपर सफल  न हो  सके। क्योंकि नक्सलियों ने हमारे साथ चल रहे टॉवर दूर हमला करके नष्ट कर दिया था।''  उन्होंने मेरे विश्वास केसाथ अपने विश्वास को भी शामिल किया कि बहुत जल्दी नक्सल समस्या ख़त्म होगी।

लेखक परिचय: एम.ए (हिन्दी)पत्रकारिता (बी.जे.) में प्रावीण्य सूची में प्रथमलोककला संगीत में डिप्लोमापैतीस सालों से साहित्य एवं पत्रकारिता में समान रूप से सक्रिय। पूर्व सदस्यसाहित्य अकादमीनई दिल्ली (2008-2012), उपन्यास, 14 व्यंग्य संग्रह सहित 44 पुस्तकें। सम्प्रति- सद्भावना दर्पण (भारतीय एवं विश्व साहित्य की अनुवाद-पत्रिका का सम्पादन) 
सम्पर्क: जी-31, नया पंचशील नगररायपुर-492001 छत्तीसगढ़, 
मोबाइल-09425212720, Email- girishpankaj1@gmail.com

धोबी-धोबिन का संसार

धोबी-धोबिन 

का संसार

-सुधा भार्गव

जब मैं छोटी थी धोबी गंदे कपड़े लेने आता था और धोबिन उन्हें देने आती। वे दादी-बाबा के समय से कपड़े धोते थे। दोनों ताड़ की तरह लंबे और काले थे। पर कालू होने पर भी मुझे बहुत अच्छे लगते थे।
मुझे अच्छी तरह याद है -धोबी कान में चाँदी के कुंडल और हाथ में कड़ा पहने रहता था। धोबिन के तो क्या कहने--- चमकदार छींट का घेरदार लहँगा –ओढ़ना पहने , चाँदी के गहनों से लदी फदी जब आती तो मैं उसके पैरों की तरफ देख गिनती गिनना शुरू कर देती 1—2—3-लच्छे,पायजेब ,बिछुए। फिर हाथों को देखती और शुरू हो जाती 1—2—3—चूड़ी,कड़े,पछेली। कभी गले को देख बुदबुदाती –हँसली,मटरमाला नौलड़ीबताशे वाला हार! घूँघट के कारण उसके कान- नाक नहीं देख पाती थी।हाँ माथे पर बँधा बोर(एक गहना) उठा -उठा सा देखने से उसका पता लग जाता था। भारी से लहँगे पर भारी सी तगड़ी पहनकर चलती तो कमर लचक -लचक जाती । एक हाथ से हल्का सा घूँघट सँभालती और दूसरे हाथ से सिर पर रखी कपड़ों की गठरी --धीरे धीरे आती,अम्मा से कहती –बहूरानी राम राम। वह तो मुझे सच में बहुत-बहुत अच्छी लगती थी।
कमरे में दादी की एक बड़ी सी फोटो थी। मैंने उन्हें देखा तो नहीं था पर वे तो  धोबिन से भी ज्यादा जेवर पहने हुए थीं। दादी ने चार जगह से कानों को छिदा रखा था । उनमें लम्बे- लम्बे- झुमके बालियाँ पहने थीं । नाक में भी तीन तीन जगह छेदन—दोनों तरफ दो लौंग और बीच में मोती वाली झुमकी। धोबिन में मुझे दादी की झलक मिलती थी; इसलिए आसानी से कल्पना कर बैठी कि हो न हो धोबिन ने भी दादी की तरह कान -नाक में पहन रखा होगा। पर हाय राम नाक -कान में इतने छेद कराने में तो बड़ा दर्द हुआ होगा। मैंने तो एक छेद कराने में आसमान सिर पर उठा लिया था। एक बार नायन काकी ने सुई में काले धागे को पिरोकर मेरे कानों में आर -पार उसे भोंक दी थी। कितना रोई चिल्लाई थी। सरसों का तेल और हल्दी से सेक करकर मुझे परेशान कर दिया था। बहुत दिनों तक जैसे ही मैं घर में उस काकी को देखती कुटकुटाती– माँ, इसे क्यों बुलाती हो।
एक दिन अम्मा बोलीं-मुन्नी तू हमेशा धोबिन को घूरती रहती है यह आदत ठीक नहीं।
-माँ उसे देख मुझे दादी की याद आती है। वह दादी की तरह ही हाथों-पैरों में खूब सारे जेवर पहनती है।
-बेटा तुम्हारी दादी तो सोने के पहनती थीं और धोबिन चाँदी के पहनती है। चाँदी के जेवर छोटी जात के पहनते हैं। हम लोगों में नहीं पहनते है।
-क्यों माँ?
क्योंकि सोना महँगा होता है । इसे छोटी जात नहीं खरीद नहीं सकती। 
-क्यों माँ!
क्योंकि ये गरीब बेपढ़े- होते है ,इनके पास ज्यादा पैसा नहीं होता।  
-ये पढ़ते –लिखते क्यों नहीं माँ?
-क्यों की बच्ची! भाग यहाँ से मेरा खोपड़ा खाली कर दिया।
मैं माँ के डर के मारे चुप हो गई।पर मुझे लगा –माँ मुझसे कुछ छिपा रही है। बहुत समय तक अपने सवाल का जबाव ढूँढती रही। एक दिन मेरे सवाल का जबाव मिल ही गया।
जग्गी, धोबी का बेटा  कभी कभी अपनी माँ के साथ हमारे घर आया करता था। उसकी माँ ज्यादतर अपनी परेशानियाँ माँ को बताने बैठ जाती । ऐसे में मैं और जग्गी बतियाने लगते। वह भी कल्लू था मगर कपड़े पहनता एकदम झकाझक सफेद।
एकदिन मैंने पूछा –जग्गी इतने सफेद कपड़े पहनता है । गंदे हो जाते होंगे । माँ से खूब डाँट पड़ती होगी।  
-हँसकर बोला-ये मेरे कपड़े थोड़े ही हैं,दूसरों के हैं।
मैं पूछती-जग्गी तेरे बाल हमेशा खड़े रहते है। तेल लगाकर काढ़ता क्यों नहीं?
वह फिर हँसता और कहता-मैंने आजतक कभी तेल नहीं लगाया।
-तेरे पास तेल लगाने को पैसे नहीं हैं क्या?मैं तुझे तेल ला दूँगी।
-वह फिर हँसता-मुझे तेल से बू आती है।
उसकी बात पर मैं भी हँस देती।
हम दोनों के बीच ऊँच–नीच की कोई तलवार नहीं लटकती थी । बस दो मासूम दिल खोलकर हँसते थे।
लेकिन उस दिन जब जग्गी आया मुझ पर अपने सवाल का जवाब खोजने का भूत सवार था। उस पर  बंदूक सी दाग बैठी-ओ जग्गी तू स्कूल पढ़ने क्यों नहीं जाता? तू गरीब है क्या?
एकाएक वह उदास हो गया । बोला-इतना गरीब भी नहीं हूँ कि स्कूल की फीस न दे सकूँ। पर कोई पढ़ने दे तब न !
-तू मुझे बता कौन है वह, मैं उसकी शिकायत पिता जी से कर दूँगी।
-मैं छोटी जात का हूँ ; इसलिए स्कूल में कोई घुसने नहीं देगा। उसने बहुत घीरे से मरियल -सी आवाज में कहा।
उसकी जात वाली बात तो मैं नहीं समझ सकी ,पर मैंने उसे दुखी कर दिया था यह सोचकर मैं भी दुखी हो गई। 
धोबी के मरने के बाद धोबिन का रूप-रंग बदल गया। उसने सारे जेवर उतारकर रख दिए। मैंने सोचा गहने चोरी हो गए हैं। मेरा दुख और बढ़ गया। लेकिन एक दिन मैंने उसे माँ से कहते सुना –बहू,सारे गहने उतारकर घर में ही कच्चे फर्श के नीचे दबा दिए थे। न जाने कब -कब में बड़ा छोरा तगड़ी निकालकर ले गया और बेच खाई। उसे कपड़े धोना पसंद नहीं। निठल्ले ने बाप की कमाई पर नजर रखने की कसम खा ली है। तीन -तीन बच्चों की शादी करनी है।अब तो ये गहने ही मेरा सहारा है। बड़े से तो कोई उम्मीद नहीं। 
माँ ने क्या कहा यह तो नहीं मालूम पर अगले दिन वह आई और एक मिट्टी की हाँडी माँ के हवाले करके चली गई। मुझमें कौतूहल जागा- इसमें क्या हैअम्मा से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। कमरे से लगी एक कोठरी थी, जिसमें बड़ी सी लकड़ी की अलमारी थी। उसी में अम्मा ने हाँडी रख दी। यह तो अंदाज लग गया कि इसमें कीमती सामान है,पर क्या है?पहेली ही बनकर रह गया। इस पहेली को सुलझाने की कतरब्योंत दिमाग में चलती रहती। आते जाते कोठरी में ताक- झाँक बनी रहती कब चुपके से अंदर जाऊँ और हाँडी में झाँकूँ।
एक दिन मैं दबे पाँव कोठरी में घुस गई। अंदर अँधेरा था लेकिन आपजानकर लाइट नहीं जलाई। जरा -सा शक होने पर माँ आ धमकतीं और मेरी  खोज अधूरी रह जाती। चोरों की तरह धीरे से अलमारी खोली –कहीं चूँ –चूँ न कर पड़े,हाँ डी में हाथ डाला। अँगुलियों की टकराहट से खनखन करके सिक्के बज उठे। हिम्मत करके उँगलियाँ गहराई में घुसाई। मुट्ठी में भरकर सिक्के हाथ ऊपर किए। मुट्ठी खोली- चाँदी की चमक से सिक्के अँधेरे में साफ नजर आ गए-बाप रे इतने सारे सिक्के ---अरे यह तो विक्टोरिया का हैजार्जपंचम– एडवर्ड! इन्हीं के बारे में तो पिताजी बातें करते हैं। पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की सैर मिनटों में कर ली।
नन्हें से दिमाग ने अँगड़ाई ली –धोबिन कितनी तकदीर वाली है इसके समय चाँदी के सिक्के चलते थे। न जाने अब सब कहाँ गए। मेरे पास तो एक भी सिक्का नहीं है। बस पीतल,ताँबे के हैं।हाँडी में सिक्कों की तो भरमार है। अरे, यह तो अठन्नी है। यह चुहिया- सी है चवन्नी! अपना हाथ और नीचे घुसाया-लो मिल गई हँसली—जरा पहनकर देखूँ ।ओह यह तो मेरे गले में घुसती ही नहीं। पायल- यह तो बड़ी भारी है।धोबिन तो बड़ी अमीर है। फिर कपड़े न जाने क्यों धोती है। मेरी अँगुलियाँ मटकी में घूमती रहीं और सिक्के मेरे दिमाग को घुमाते रहे। न जाने कब तक यह चलता अगर ज़ोर से खट की आवाज न हुई होती। मैं भागी कोठरी से कि अम्मा आ गई। तभी सामने से मोटे से चूहे को भागते देखा हँसी फूट पड़ी –धत तेरे की –चूहे से डर गई मैं तो ।  
अपने बापू के मरने के बाद जग्गी ही गंदे कपड़े लेकर जाता। ढेर से कपड़ों की गठरी सिर पर रखता तो उसका चेहरा दिखाई ही नहीं देता था। मुझसे पहले की तरह बातें भी नहीं करता और हँसता भी नहीं था। हमेशा जल्दी में रहता।
एक दिन मैंने पूछा –जग्गी तुझे बहुत काम रहता है?
-हाँमाँ अकेली पड़ गई है।उसको तो देखना ही होगा। धीरे धीरे बापू का काम मैं करने लगूँगा। उसे कुछ नहीं करने दूँगा।
जग्गी मेरे बराबर का था पर मुझे लगा वह मुझसे बहुत बड़ा हो गया है।
उसके बापू के मरने का दुख अम्मा –पिताजी को भी बहुत था।  उन्होंने कपड़ों की धुलाई के पैसे भी बढ़ा दिए थे। पर जग्गी  पिताजी से बहुत डरता था। कभी मैंने उसे सिर उठाकर बात करते नहीं देखा। हमेशा नजर नीचे किए खड़ा रहता या जमीन पर बैठता। पिताजी सफेद कमीज और सफेद धोती पहनते और शानदार रूमाल रखते। एक बार कमीज के कॉलर पर ठीक से प्रेस नहीं हुईबस उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। ज्वालामुखी से फट पड़े- और जड़ दिया  उसके चाँटा। मुझे बहुत बुरा लगा। अपने बच्चे को तो डाँटते- मारते मैंने देखा था पर पिता जी तो दूसरे के बच्चे को मार रहे थे। न उसने अपना बचाव किया और न पिताजी ने अपना हाथ रोका। बस सिर नीचा किए आँसू बहाने लगा। ऐसा लगा मानो पिताजी को मारने का अधिकार था और चोटें सहना जग्गी का काम।
जग्गी को मैं बहुत दिनों तक नहीं भुला पाई और माँ की बात बहुत दिनों के बाद समझ में आयी कि वह छोटी जात का है और हम है ऊँच जात के इसी कारण उन्हें सताने की हिम्मत होती थी।पढ़ लिखकर कहीं छोटे लोग ऊँच जात से आगे न बढ़ जाएँ इसीकारण उनके बच्चों को स्कूल  में पढ़ने नहीं दिया जाता था। जग्गी तभी अनपढ़ रहा।
अब भी जब अखवार की सुर्खियों में दलित -दलनदलित- दहन  के बारे में पढ़ती हूँ, तो जग्गी की याद ताज़ा हो उठती है। न जाने कब ऊँच-नीच का भेद भाव मिटेगा। भारत देश तो उनका भी है फिर उनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार क्यों?

लेखक परिचय: जन्म 8 मार्च1942 को अनूपशहरबुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) में। बी.ए.बी.टी.विद्याविनोदिनीविशारद की उपाधियाँ ।  हिन्दी भाषा के अतिरिक्त अंग्रेजीसंस्कृत और बांग्ला पर भी अच्छा अधिकार।  बिरला हाईस्कूलकोलकाता में 22 वर्षों तक हिन्दी शिक्षक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। परिषद भारतीकविता सम्भव- 1992कलकत्ता-1996 आदि संग्रहों में भी आपकी रचनायें संगृहीत हैं। बाल कहानियों पर तीन पुस्तकें- अंगूठा चूसअहंकारी राजा व जितनी चादर उतने पैर पसार।  काव्य-संग्रह- रोशनी की तलाश में। रचनायें रेडियो से भी प्रसारित।  डॉ. कमला रत्नमराष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान तथा प.बंगाल के राष्ट्र निर्माता पुरस्कार से सम्मानित।
सम्पर्क: जे.703स्प्रिंग फील्ड्स17/20 अम्बालिपुरा विलेजबल्लान्दुर गेटसर्जापौरा रोडबंगलौर 560102,
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डॉ. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी

डॉ. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी

तब नहीं पता था 
उनसे वह
अंतिम भेंट होगी

-सुधेश

 शान्ति निकेतन के विश्वभारती विश्व विद्यालय के हिन्दी भवन में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्षडा शैलेन्द्र त्रिपाठी का निधन 27 जनवरी 2015 को गोरखपुर में हो गया। यह दु:खद समाचार पाकरमेरा दुखी होना स्वाभाविक थाक्योंकि वे मेरे अच्छे मित्र थे। वे विगत एक वर्ष से रक्त कैन्सर सेपीड़ित थे। इलाज के बावजूद उन को बचाया नहीं जा सका। अब क्या किया जा सकता है उन्हें श्रद्धांजलि देने के सिवा और उन की यादों में खो जाने के सिवा।
  उन से मेरा परिचय लगभग एक दशक पहले उन के द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका सरयू धाराके माध्यम से हुआ। न जाने कैसे सरयू धारा का कोई अंक मेरे हाथ लग गया। उसमें अन्य सामग्रीके साथ कविताएँ प्रचुर मात्रा में थीं और कुछ श्रेष्ठ कविताएँ थीं। मुझे लगा कि कविता को हाशियेपर धकेले जाने के युग में बंगाल से एक पत्रिका निकल रही है, जो मुझे कविता प्रधान लगी। मैं नेअपनी कुछ कविताएँ उन्हें भेज दींजो अगले अंक में सम्पादक की टिप्पणी के साथ छपीं। फिरत्रिपाठी जी से पत्राचार का सिलसिला शुरू हो गया।
एक पत्र में उन्होंने लिखा कि वे लोक साहित्य पर विशेषांक निकालना चाहते हैं और उस केलिए मैं कोई लेख भेजूँ। उन दिनों मैं कुल्लियाते नज़ीर अकबराबादीजो उर्दू लिपि में हैपढ़ रहाथा। सोचा कि नज़ीर की कविता में लोकतत्त्व या लोकचेतना पर लिखूँ। मैं ने नज़ीर पर वह लेखलिखकर उन्हें भेज दिया। एक दो महीनों के बाद त्रिपाठी जी का टेलीफ़ोन आया। उन्होंने कहाकि लोकसाहित्य पर सामग्री पर्याप्त मात्रा में एकत्र नहीं हो पाईलोकसाहित्य विशेषांक बादमें निकालेंगे अगला अंक प्रेमचन्द पर होगाजिसके लिए काफी सामग्री उनके पास आ गई है। उनका सुझाव था कि मैं प्रेम चन्द के किसी पक्ष पर एक लेख उन्हें भेज दूँ। मैंने गोदान कोदूसरी या तीसरी बार पढ़ा और उस में दलित चेतना की खोज की। दलित लेखक प्रेम चन्द कोअपना लेखक नहीं मानते; लेकिन मैंने गोदान में दलित पात्र और दलित चेतना को पाया। अन्ततः गोदान में दलित चेतना शीर्षक एक लेख लिखकर त्रिपाठी जी को भेज दिया। वह विशेषांकमेरे लेख के साथ छपा जिसमें अनेक आलोचकों के लेख भी थे। लगभग दो सौ या ढाई सौपृष्ठों का विशेषांक निकालना आसान नहीं था।
   सन् 2007 के किसी महीने उनका फ़ोन आया कि विश्वभारती से मुझे कोई पत्रमिला होगाजिस के द्वारा आप को यहाँ मेरे शिष्य दुष्यन्त कुमार की मौखिक परीक्षा के लिएबुलाया गया है। शीघ्र अपनी स्वीकृति भेजिए। मैं उस शोधप्रबन्ध पर अपनी रिपोर्ट पहले भेजचुका था और उन का फ़ोन सुनकर मैं ने मौखिक परीक्षा के लिए अपनी स्वीकृति भी भेज दी।औपचारिकताओं के बाद मैं मार्च 2007 के अन्तिम सप्ताह में दिल्ली से कोलकाता के लिएएयर सहारा के विमान से सवेरे वहाँ  के हवाई अड्डे पर उतरा। मेरी हवाई यात्रा का प्रबन्ध त्रिपाठीजी के प्रयत्न से हो गया था। हावड़ा के रेलवे स्टेशन से एक एक्सप्रेस गाड़ी लेकर मैं  शाम कोलगभग साढ़े छह बजे के लगभग बोलपुर स्टेशन पर उतरा। विचित्र लगा कि स्टेशन का नामबोलपुर है शान्ति निकेतन क्यों नहीं; लेकिन तब बोलपुर ही था। स्टेशन पर गाड़ी से उतरते हीलाउडस्पीकर  पर घोषणा सुनी कि डा सुधेश अमुक जगह पर आ जाएँ ,जहाँ आप को दुष्यन्तमिलेंगे। मैं उनके साथ रिक्शा द्वारा विश्वभारती के अतिथि गृह में पहुँचा, जहाँ दुष्यन्त औरउन के मित्र अनिल कुमार सिंह मुझे सीधे कैन्टीन में ले गए जहाँ चायपान के बाद वे चले गएऔर यह कह कह गए- आपके रात के भोजन का प्रबन्ध भी इसी कैन्टीन में है।
  अगले दिन सवेरे त्रिपाठी जी कैन्टीन में आए । तब उनसे मेरी पहली भेंट हुई। नाश्ते केबाद वे मुझे पहले अपने आवास पर ले गएजो हिन्दी भवन के पास ही है। बातचीत में पताचला कि वे उसी आवास में रहते हैं,जहाँ कभी हज़ारी प्रसाद द्विवेदी रहते थे। आवास के पीछेएक बग़ीचा हैजिसमें अनेक फूल वाले पौधों के साथ एक अशोक वृक्ष भी हैजिस परलाल फूल आते हैं। यह वही अशोक वृक्ष है जिस के लाल फूलों पर मुग्ध होकर द्विवेदी जी नेअशोक के फूल नामक प्रसिद्ध  निबन्ध लिखा था। द्विवेदी जी का लगाया एक नीम का पेड़भी त्रिपाठी जी ने मुझे दिखाया।
पता चला कि द्विवेदी जी पर जब कोई वृत्तचित्र दिल्ली के एन सी आर टी द्वारा बनाया जारहा थातो प्रोड्यूसर और कैमरा टीम के साथ उन के पुत्र मुकुन्द द्विवेदी भी उस घर कोफ़िल्माने आए थेजिसमें तब शैलेन्द्र जी रह रहे थे। मैं ने उनसे चुटकी ली कि आप एकऐतिहासिक घर मे हैंजहाँ हज़ारी प्रसाद जी की स्मृतियाँ बसी हुई हैं। शैलेन्द्र जी का उत्तर था-तो मैं भी एक ऐतिहासिक व्यक्ति हूँ। तब बात हँसी में उड गई थीपर अब तो सचमुच वे इतिहास कीवस्तु होगए हैंजब उन के मित्र और प्रशंसक उन के दुखद वर्तमान के साथ उन के प्रकाशमानइतिहास की भी खोज करेंगे।
   कुछ देर बाद शैलेन्द्र जी मुझे डिप्टी रजिस्ट्रार के दफ़्तर में ले गये, जहाँ कुछ काग़ज़ों परमेरे हस्ताक्षर लिये गये। औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद हम दोनों उस कमरे में गए जोमौखिक परीक्षा के लिए था। शोधार्थी दुष्यन्त कुमार वहाँ पहले से बैठे थे। मैंने उन से जो प्रश्नपूछे उन के उत्तर सन्तोषजनक थेजिनसे मुझे लगा कि वे अपने विषय में पारंगत हैं। उन्होंने गोविन्द मिश्र की कहानियों पर अपना शोधप्रबन्ध लिखा था।
  उस दिन दोपहर के भोजन के लिए दुष्यन्त बोलपुर के एक होटल रसना में ले गए। उनसे मित्र अनिल सिंह भी वहाँ आए। हम तीनों ने वहाँ शाकाहारी भोजन किया। उस के बाद दुष्यन्त जी ने मुझे अपनी मोटर साइकिल द्वारा अतिथि गृह में छोड़ा।
लगभग  चार बजे वे दोनों मित्र फिर वहाँ आये और मुझे उत्तरायणसंगीत भवन और कला भवन दिखाने के लिए ले गये।उस दिन मुझे विश्वभारती के परिसर में घूमने काअवसर मिला। वहाँ विश्वविद्यालय के विभाग को भवन कहा जाता है, जैसे हिन्दी भवन, कला भवनअंग्रेज़ी भवनइतिहास भवन आदि। कला भवन बड़ा रोचक और कलात्मक लगा। अनेक मूर्तियाँऔर कलात्मक दृश्य मेरे सामने थे। एक वृक्ष की उलझी हुई डालियों को इसतरह जोड़ा गया था कि उस में कोई आकृति झाँकनें लगी थी। एक किनारे पर विशाल पत्थरको इस तरह तराशा गया था कि उस में डाँडी में नमक सत्याग्रह के लिए मार्च करते महात्मागाँधी की प्रतिमा नज़र आती है । इस प्रकार की आकृतियाँ वहाँ के वातावरण को कलात्मकबना रही हैं। शान्तिनिकेतन की यात्रा पर मैं ने दिल्ली लौटकर एक लेख लिखा थाजोदिल्ली की पत्रिका साहित्य अमृत  में छपा। वही लेख महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग द्वारासंचालित स्कूल बोर्ड की आठवीं कक्षा के हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया।उस की रायल्टी मुझे कई वर्षों तक मिलती रही। इस का श्रेय मैं शैलेन्द्र त्रिपाठी जी को देता हूँ क्योंकि उन्हीं के कारण मेरी वहाँ की यात्रा हुई थी।
   उस दिन रात को त्रिपाठी जी मुझे भोजन के लिए अपने आवास पर ले गये। उनसे खूब बातेंहुईं। पता चला कि वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे पढ़े थे और वहीं से उन्होंने डीफिल उपाधि प्राप्तकी थी। वे जगदीश गुप्त और सत्य प्रकाश मिश्र के शिष्य रहे। वहाँ की छात्र राजनीति में भी वे सक्रिय रहे । तब वे वामपन्थी थे पर बाद में वाम पन्थियों से उन का मोह भंग हो गया । किस कारणउन का वाम पन्थियों से मोह भंग हुआ यह उन्हों ने नहीं बताया । इस विषय में उन्हें कुरेदना मैंने उचित नहीं समझा। हाँ मुझे यह आभास अवश्य हुआ कि त्रिपाठी जी एक चिन्तन शील और सक्रियव्यक्ति थे।
  उन्होंने बताया कि शान्तिनिकेतन में उन की नियुक्ति तत्कालीन विभागाध्यक्ष सिया रामतिवारी की इच्छा के विरुद्ध हो गई थी। उन्होंने कई प्रसंग सुनाए जिनसे यह प्रकट होता है किवे तिवारी जी की विद्वत्ता के प्रति आश्वस्त नहीं थे। फिर भी तिवारी जी की अध्यक्षता के कालमें उन्होंने तिवारी जी को अपना पूर्ण सहयोग दिया। इस से प्रकट होता है कि त्रिपाठी जी झगड़ालू क़िस्म के व्यक्ति नहीं थे। वे अध्ययनशील व्यक्ति थे और अपने कर्तव्य के प्रति सचेत थे।
त्रिपाठी जी ने शान्तिनिकेतन में रहते हुए स्वाध्याय से बंगला सीखी और उस में इतनाकौशल प्राप्त कर लिया कि बंगला से हिन्दी में अनुवाद करने लगे। वे हिन्दी और भोजपुरी में  कविताएँ लिखते थे और हिन्दी का एक त्रैमासिक सरयू धारा नाम से कई वर्षों तक सम्पादित एवं प्रकाशितकरते रहे। यह उन की सृजनशीलता और कर्मठता का परिचायक है ।उनकी बातों से मुझे लगा कि वे शान्ति निकेतन से सन्तुष्ट नहीं हैं और वाराणसी के हिन्दूविश्वविद्यालय मे प्रोफ़ेसर हो कर जाना चाहते हैं। उनकी असन्तुष्टि के कारण का मुझे पतानहीं चला पर अनुमान कर सकता हूँ कि शायद उन्हें लगता था कि वहाँ उन की पदोन्नति नहीं हो सकेगी। अगले दिन शान्तिनिकेतन से मैं रेलगाड़ी द्वारा कोलकाता गया,जहाँ दो दिनों तक रुकने के बाद दिल्ली लौट आया।
शैलेन्द्र जी ने विश्वभारती विश्वविद्यालय से मेरे पास एक दूसरा शोधप्रबन्ध भिजवाया,जो मोती बीए के भोजपुरी साहित्य को योगदान पर केन्द्रित था। मैं ने उसे जाँचकर उस पर अपनी रिपोर्ट समयानुसार विश्वविद्यालय को भेज दी। कुछ समय बाद त्रिपाठी जी ने फ़ोन पर कहाकि दूसरे शोधार्थी की मौखिक परीक्षा के लिए यदि आप को बुलाया जाए, तो अपनी स्वीकृतिभेज दीजियेगा। संयोग ऐसा हुआ कि मुझे नहीं बुलाया गया अन्यथा शान्तिनिकेतन की दूसरी यात्रा हो जाती
  शैलेन्द्र जी से मेरी दूसरी भेंट ओडिसा के ब्रह्मपुर नगर में 20जून सन 207 में हुई, जहाँ के  विश्वविद्यालय में वे मेरी एक शिष्या निवेदिता साहू की मौखिक परीक्षा लेने गये थे और मैंदिल्ली सेब्रह्मपुर गया था। मैं ब्रह्म पुर के भुवनेश्वरी लाज में ठहरा था। उस दिन मेरी शिष्या निवेदिता साहू मुझे होटल में नाश्ता कराकर शैलेन्द्र त्रिपाठी की अगवानी के लिए स्टेशन चली गई।उन्हों ने वहाँ के विश्वविद्यालय के कार्यालय में जा कर निवेदिताकी मौखिक परीक्षा ली।उस दिन एक होटल में भोजनकरते हुए त्रिपाठी जी से अनेक विषयों पर बात हुई। उन्होंने बतायाकि विदिशा (म प्र) के राम कृष्ण प्रकाशन ने उन की कई पुस्तकें छपी हैं। वे बंगला से हिन्दी मेंकिए गए अपनेअनुवाद छपवाना चाहते थे। उन के बाबा एक स्वतन्त्रता सेनानी थेजिन  के अनेक संस्मरण त्रिपाठी जी ने लिखे थे। उन्हें वे पुस्तक रूप में छपवाना चाहते थे। वे कहने लगे कि अपनी कुछ कविताएँ भेजिए। वे सरयू धारा का कविता विशेषांक निकालनाचाहते थे। उन्होंने उसका कहानी विशेषांक भी निकाला था। वे स्वयम् हिन्दी और भोजपुरी मेंकविताएँ लिखते थे। उनकी कुछ हिन्दी  और भोजपुरी कविताएँ मैंने फेसबुक पर देखी हैं । कहनहीं सकता कि उन की कविताओं का संकलन प्रकाशित हुआ या नहीं। पर उन के पास कईयोजनाएँथी। एक योजना थी  सरयू धारा का लोकसाहित्य विशेषांक निकालनाजिसके लिए मैं ने उन्हें नज़ीर अकबराबादी की शायरी में लोक तत्त्व विषय पर एक लेख भेजा था।
  उन्हें उसी दिन शाम की गाड़ी से कोलकाता लौटना था। वे स्टेशन जाने की तैयारी करनेलगे। मै ने उन्हें अपनी दो पुस्तकें भेंट कीं और शान्तिनिकेतन के पुस्तकालय के लिए भेंट स्वरूपअपनी सात पुस्तकें दीं। उसी दिन किसी गाड़ी से वे ब्र्ह्मपुर से कोलकाता वापस चलेगए। मैंदिल्ली लौट आया। उस दिन क्या पता था कि वह मेरी उन से अन्तिम भेंट होगी।

लेखक परिचय:  जन्म- 6जून 1933दिल्ली में सन् 1975 से निवास। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी के प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्त। 11 काव्य कृतियाँ11 आलोचनात्मक पुस्तकें3 यात्रा वृत्तान्त2 संस्मरण संग्रह1 उपन्यास1 व्यंग्य संग्रह1 आत्म कथा। अनेक पुरस्कार एवं सम्मान- मध्यप्रदेश  साहित्य अकादमी का भारतीय कविता पुरस्कार  2006भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय का भारतेन्दु हरिश्चन्द़ पुरस्कार 2000लखनऊ के राष्ट़्रधर्म प्रकाशन का राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान 2004आगरा की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा सार्वजनिक अभिनन्दन  2004दिल्ली की संसदीय हिन्दी परिषद विविधभारती परिषद परिचय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में वर्ष 2015 का राष्ट्रगौरव सम्मान।
सम्पर्क: 314 सरल अपार्टमैन्ट्सद्वारिकासैक्टर 10, दिल्ली 110075, 
फोन- 09350975120Email- dr.sudhesh@gmail.com

शेक्सपियर को खेलते और पढ़ते हुए

शेक्सपियर को 
खेलते और पढ़ते हुए
- विनोद साव
वर्ष 1966 से 1972 के बीच हम शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला, पाटन के छात्र थे और हमारे पिता अर्जुन सिंह साव वहाँ  के प्राचार्य थे। पिता ने हमें शेक्सपियर के नाटकों को खेलना सिखाया था। पिता में रंगमंच की कला नागपुर से आई थी। दुर्ग में जनमें और स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण किये पिता ने नागपुर से बी.टी. और रायपुर से पी.जी.बी.टी. किया था। वे पूरी तरह से शहरी, कलाप्रेमी और आधुनिक विचारों से संपन्न व्यक्ति थे।  तब पाटन दुर्ग जिले में बसा पूरी तरह से ग्राम्य बोध से भरा एक गाँव था। उस गाँव के स्कूल में छात्रों से अंग्रेजी के नाटकों को खेलवाया जाना प्राचार्य पिता का एक क्रांतिकारी कदम था और स्कूल से संस्कारित होने वाले गाँव के दर्षकों को ये नाटक देखते समय एकबारगी अंग्रेजों के किसी गाँव में होने का अहसास हुआ था। वे अपने गाँव के बच्चों को शेक्सपियर के नाटक मर्चेन्ट ऑफ वेनिसके शैलाक, एँ टोनी और पोर्टियों जैसे चरित्रों में ढलकर उन्हें धड़ -धड़ अंग्रेजी बोलते हुए किंकर्तव्य-विमूढ़ होकर देख रहे थे।
तब पाटन स्कूल में हर साल होने वाले सोशल गेदरिंग में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच हिन्दी, अंग्रेजी के कुछ नाटकों का भी मंचन करवाया जाता था। इनमें शेक्सपियर का नाटक मर्चेन्ट ऑफ वेनिसऔर नार्मन मेकनिल का द बिशप्स केंडल स्टिक्सको हम छात्रोंने खेला था। द बिशप्स केंडल स्टिक्सविक्टर ह्यूगो के प्रसिद्ध उपन्यास ले मिजरेबलपर आधारित था। इसका नाट्य रुपांतर नार्मन मेकनिल ने किया था। ले मिजरेबलहमारे अंग्रेजी स्नातक के पाठ्यक्रम में था। ये दोनों नाटक उस समय स्कूल में चलने वाली किताब इंग्लिशप्रोज एवं वर्समें शामिल थे और ग्यारहवीं कक्षा के अंग्रेजी विषय को जब हमारे प्राचार्य पढ़ाया करते थे, तब शेक्सपियर के नाटकों के संवादों को वे पूरी तरह ड्रामेटिक-कॉमेडी स्टाइल में पढ़ाया करते थे और कक्षा को मंच मानकर इधर उधर तेजी से चहलकदमी करते हुए नाटक के अलग- अलग पात्रों के संवादों को मुँह घुमाकर चेहरे की भाव-भंगिमा बदलते हुए बोला करते थे। इससे अंग्रेजी विषय और शेक्सपियर को पढ़ते-सुनते समय हम सब छात्र एक अलग वायावी दुनिया में पहुँच जाते थे। प्राचार्य की इन्हीं भंगिमाओं ने छात्रों को अंग्रेजी के नाटकों को खेलने और उनके पात्रों को अभिनीत करने की साहसिक प्रेरणा दी थी।
हिन्दी और दूसरी कई भाषाओं के साहित्य में नाटक ,जहाँ  एक दरिद्र विधा रही ,वहीं अंग्रेजी में यह सबसे समृद्ध विधा रही और अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में जो दो सबसे बड़े लेखक जाने माने गए वे शेक्सपियर और बर्नार्ड शॉ थे और ये दोनों लेखक दर्जनों की संख्या में लिखे गए अपने विलक्षण नाटकों के कारण जाने गये। बर्नार्ड-षॉ के व्यक्तित्व और जीवन शैली पर उनकी महिला सेक्रेटरी ब्लांश पैच की किताब थर्टी इयर्स विद शॉपढ़ने को मिली थी जो बेहद रोचक थी। यह मानी हुई बात है कि दुनिया की कोई दूसरी भाषा शेक्सपियर और शॅा पैदा नहीं कर सकी। यहाँ  यह उल्लेखनीय है कि बीसवीं सदी में हमारे देश में मराठी भाषा के साहित्य में जो शीर्ष स्थान के लिए नाम दिखा वह नाटककार विजय तेंदुलकर का है और उनका यह स्थान भारत की समग्र भाषाओं में रचित आधुनिक नाटकों के बीच बरकरार है।
अपने छात्र जीवन में खेले गए और टेक्स्ट बुक में पढ़े नाटकों के कारण शेक्सपियर से एक जुड़ाव तो हो ही गया था और जहाँ  भी उनकी कृतियों पर कोई चर्चा होती हम उनमें जरूर शामिल होते या कोई फिल्म बनती तो हम उन्हें जरुर देखते थे। मुझे निजी तौर पर शेक्सपियर के दो नाट्य उपन्यासों से रू--रू होने का मौका मिला - इनमें से एक द ट्वेल्थ नाइटथा और दूसराएज यू लाइक इट। ये दोनों नाटक सुखान्त नाटकों की श्रेणी में आते हैं जबकि शेक्सपियर की शख्सियत उनके दुखान्त नाटकों से है। इनमें द ट्वेल्थ नाइटकी किताब अंग्रेजी के दो रूपों में थी। उसका बॉया पृष्ठ शेक्सपियर की मूल भाषा में था जिसे शेक्सपियराना इंग्लिश कहते हैं और दाहिना पृष्ठ इंडियन इंग्लिश में रुपांतरित था।
दूसरा उपन्यास एज यू लाइक इटका हिन्दी रुपांतर पढ़ने को मिला। इसका रुपांतर प्रसिद्ध उपन्यासकार रांगेय राघव ने किया है। नाटक का मूल स्रोत फ्रांसीसी उपन्यास से लिया गया है जिसमें उपदेशात्मक रूप में बताया गया है कि भाग्य की देवी सद्गृहिणी मानी जाती थी, और वह एक चक्र निरंतर घुमाती रहती थी ; क्योंकि वह अंधी थी।यह एक प्रेमकथा है जिसमें कहा गया है कि प्रतिकार से संधि भली है और भलाई की अंत में जीत होती है।
नाटकों की सफलता उनके व्यंग्य की तीक्ष्णता में होती है। अगर संवादों में गहरे व्यंग्य हैं; तो वह जल्दी संप्रेषित होता है और दर्शकों पर गहरे प्रभाव छोड़़ता है। यह शेक्सपियर और बर्नार्ड शॉ के संवादों में खूब देखा जा सकता है। शेक्सपियर के कई नाटकों में एक विदूषक (क्लाउन) होता है जो उनके नाटक को विनोद-प्रियता से भर देता है। इस विदूषक की खासियत यह होती है कि वह मूर्खतापूर्ण हरकतों को करते समय भी बड़ी -बड़ी बातों को सहजता से कह जाता है। द ट्वेल्थ नाइटका विदूषक तो पूरे समय पाठकों- दर्शकों को बाँधे रखता है। इस नाटक का एक संवाद याद आ रहा है कि जब विदूषक अपनी अवहेलना होते देख कह उठता है बैटर ए विटी फूल दैन ए फुलिश विट।प्रेम के मामले में अपने दर्शन बघारते हुए वह एक भावुक पात्र से कहता है कि अभी मिलने वाले आनंद को भोग लो - तुम्हारे प्रेम का भविष्य अन्धकारमय है।
इस कॉमेडी नाटक के सभी पात्र मजेदार संवाद बोलते हैं। नाटक की नायिका वायला जब एक धनी सामन्त ओलिवा से मिलती है तब अपना सन्देश देना चाहती है। उसे सामन्त पूछता कि इज इट सीक्रेट?’ तब वायला बोल उठती है यस... माय मैसेज आर सीक्रेट्स लाइक द वर्जिनिटी ऑफ मेडन (मेरा संदेश उतना ही गुप्त है जितना किसी किशोरी का कौमार्य)। शेक्सपियर के इस नाटक में भारतीय रत्न की महिमा भी एक संवाद से प्रकट होती है जिसमें एक सुन्दरी को इस उपमा के साथ उत्साहित किया जाता है, ‘हाउ नाउ! माई मेटल ऑफ इण्डिया (क्या खबर लाई हो मेरी हिन्दुस्तानी सोनपरी)!
मेरे द्वारा पढ़े गए शेक्सपियर के दूसरे नाटक एज यू लाइक इटमें जो विदूषक है उसका नाम टच स्टोनहै। कोरिन नाम का चरवाहा टच स्टोन से कहता है कि सुनो! जिसे राजदरबार में शिष्टाचार माना जाता है वैसा व्यवहार गाँव वालों के बीच हास्यास्पद माना जाता है।’ (चरवाहा अंग्रेजी काव्य में ग्रीक काव्य की परंपरा की भाँति रोमांस का द्योतक है। उसका जीवन आनंदमय, चिंताहीन समझा जाता है। संभवतः यह बात दुनिया के सभी चरवाहों पर लागू होती है)।
इस नाटक में टच स्टोन अपनी राजकुमारी रोजालिंड की महिमा गाते हुए उसकी विशेषता बताता है कि वह बिल्ली की तरह अपनी स्त्री जाति की सहेलिया ही पसंद करती है। वह सुन्दर गुलाब है - जो इसे चाहता है वह उसके काँटों के लिए भी तैयार रहे।विदूषक का पात्र इस नाटक में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह वास्तव में बड़ा चतुर व्यक्ति है। हास्य में शेक्सपियर ने दो अर्थी वाले शब्दों का प्रयोग भी किया है।
इस नाटक में राजकुमारी अपने पिता ड्यूक फ्रैडरिक के दुश्मन के पुत्र ऑरलेंडो से प्यार करती थी। पिता फ्रैडरिक उस युवक के शौर्य से बड़े प्रभावित थे ,पर जब पता चलता है कि वह उनके दुश्मन का बेटा है तो नि:श्वास भरते हुए दु:खी मन से कहते हैं कि काश... तुम किसी दूसरे पिता के पुत्र होते।तब ऑरलेंडो का मित्र आदम उससे कहता है कि कभी कभी मनुष्य के सद्गुण उसके शत्रु बन जाते हैं। आपके सराहनीय सद्गुण ही आपके साथ विश्वासघात कर रहे हैं।इस तरह शेक्सपियर के नाटकों के सिचुएशनअपने मार्मिक संवाद खुद तय कर लेते थे।
एज यू लाइक इटमें रोजालिंड ऑरलेंडों से एक जगह पूछती है सुनो... इस समय घड़ी मे क्या बजा है?’ (तब आलोचकों ने यह प्रश्न उठाया था कि जिस कालखण्ड की यह कहानी है उस समय घड़ी का आविष्कार हुआ था क्या?)। आज तो ये दशा है कि हम कितने ही पौराणिक और ऐतिहासिक धारावाहिकों में रोज रोज कालखण्डों को खण्डित होते देख रहे हैं और आज के समयानुसार उनके गहनों, वस्त्रों, केश-विन्यासों और सर्व-सुविधायुक्त महलों को दिखा रहे हैं, जिनकी हजारों साल पहले कोई प्रामाणिक उपस्थिति नहीं थी। अतः किसी ऐतिहासिक नाटक में किसी वस्तु को लेकर इस तरह से उँगली उठाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है।
सोलहवीं सदी में जब शेक्सपियर थे, तब यह महारानी एलिजाबेथ का शासन काल था। उस समय हिन्दी  साहित्य का भक्ति काल जायसी, सूर और तुलसीदास से जगमगा रहा था। शेक्सपियर का उपहास करने वाले उनके समकालीन आलोचक सब लुप्तप्राय हो गए, पर शेक्सपियर आज भी दैदीप्यमान हैं। यह दुनिया की हर भाषा के लिए एक चुनौती रही कि अगर किसी भाषा में शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद नहीं हुआ ,तो इसका यह आशय है कि वह भाषा उन्नत भाषा नहीं है। उनके नाटक राजकुमारी रोजालिंड एक संवाद में यह कहती है, इसे शेक्सपियर के नाटकों के सन्दर्भ में भी देखा जा सकता है: यदि यह सत्य है कि एक अच्छी शराब के लिए किसी सिफारिश की जरुरत नहीं होती, तो यह भी सत्य है कि एक अव्छे नाटक के लिए किसी उपसंहार की आवश्यकता नहीं रहती।
रवींद्रनाथ त्यागी कहते हैं कि रूप, प्रणय और सौन्दर्य के सर्वश्रेष्ठ कवि कालिदास व जयदेव ही हैं ,पर नाटकों की दुनिया में हमारा कोई भी नाटककार विलियम शेक्सपियर की बराबरी नहीं करता। इसका कारण हमारे नाट्य-शास्त्र के वे सिद्धांत हैं; जिनके अनुसार यह अनिवार्य था कि नाटक सुखान्त ही हों; जबकि शेक्सपियर अपने दु:खान्त नाटकों में ही सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ कर बाजी मार ले जाते हैं।

लेखक परिचय: 20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जन्म। समाजशास्त्र विषय में एम.ए. हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं। हिन्दी व्यंग्य के क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान बनाई बाद में उपन्यास, कहानियाँ और यात्रा वृतांत लिखकर चर्चा में रहे।  उनके दो उपन्यास- चुनाव, भोंगपुर-30 कि.मी.तीन व्यंग्य संग्रह- मेरा मध्यप्रदेशीय हृदय, मैदान-ए-व्यंग्य और हार पहनाने का सुख, संस्मरण- आखिरी पन्नायात्रा-वृत्तांत- मेनलैंड का आदमी व कहानियों के संग्रह सहित अब तक कुल बारह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। सम्पर्क: मुक्त नगर, दुर्ग मो. 9407984014, Email- vinod.sao1955@gmail.com