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Dec 18, 2015

ठेस

कलाकार मन को टटोलती
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी
फणीश्वरनाथ रेणु एक ऐसे कथाकार थे जिन्होंने आजादी के बाद स्वप्न-भंग पर सर्वाधिक चर्चित कृतियों का सृजन किया है। मैला आंचल जैसे प्रख्यात और दुर्लभ उपन्यास के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने अभावों में जीने वाले मन के कुबेरों की कथा की अनोखी परंपरा को समृद्ध किया। नव- सामंतवाद, जातिप्रथा, राजनीतिक षडयंत्र और निरंतर शोषण के वीभत्स चेहरों की पहचान रेणु के पाठकों ने किया। इनकी लेखन- शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। पात्रों का चरित्र- निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य- सरल मानव मन (प्राय:) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। प्रस्तुत है कलाकार के मन को टटोलती उनकी यह कहानी ठेस- 
ठेस
खेती- बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते..  लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगारसमझते हैं। इसलिए, खेत- खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा, उसको बुलाकर? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक- तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा। पगडण्डी पर तौल- तौल कर पाँव रखता हुआ, धीरे- धीरे..  मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।
...आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था, जबकि उसकी मड़ैया के पास बड़े- बड़े बाबू लोगों की सवारियाँ बंधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे...  ‘.. अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गयी है सारे इलाके में। एक दिन समय निकालकर चलो। कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से- सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवा कर भेज दो।
मुझे याद है..  मेरी माँ जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, ‘भोग क्या- क्या लगेगा? ‘
माँ हँस कर कहती, ‘जा-  जा, बेचारा मेरे काम में पूजा- भोग की बात नहीं उठाता कभी।
ब्राह्मण टोली के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को एक बार मेरे सामने ही बेपानी कर दिया था सिरचन ने-  तुम्हारी भाभी नाखून से खांट कर तरकारी परोसती है। और इमली का रस साल कर कढ़ी तो हम कहार- कुम्हारों की घरवाली बनाती है। तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनायीं!
इसलिए सिरचन को बुलाने से पहले मैं माँ को पूछ लेता...
सिरचन को देखते ही माँ हुलस कर कहती, ‘आओ सिरचन! आज नेनू मथ रही थी, तो तुम्हारी याद आई। घी की डाड़ी (खखोरन) के साथ चूड़ा तुमको बहुत पसंद है न... और बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है, उसकी ननद रूठी हुई है, मोथी की शीतलपाटी के लिए।
सिरचन अपनी पनियायी जीभ को सम्हाल कर हँसता-  घी की सुगँध सूँघ कर आ रहा हूँ, काकी! नहीं तो इस शादी ब्याह के मौसम में दम मारने की भी छुट्टी कहाँ मिलती है? ‘
सिरचन जाति का कारीगर है। मैंने घंटों बैठ कर उसके काम करने के ढंग को देखा है। एक- एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जातां से उसकी कुच्ची बनाता। फिर, कुच्चियों को रंगने से लेकर सुतली सुलझाने में पूरा दिन समाप्त... काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी कि गेंहुअन सांप की तरह फुफकार उठता-  फिर किसी दूसरे से करवा लीजिये काम। सिरचन मुँहजोर है, कामचोर नहीं।
बिना मजदूरी के पेट- भर भात पर काम करने वाला कारीगर। दूध में कोई मिठाई न मिले, तो कोई बात नहीं, किन्तु बात में जरा भी झाल वह नहीं बर्दाश्त कर सकता।
सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं... तली- बघारी हुई तरकारी, दही की कुढ़ी, मलाई वाला दूध, इन सबका प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ, दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा। खाने- पीने में चिकनायी की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म! काम अधूरा रखकर उठ खड़ा होगा-  आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा-  सा रह गया है, किसी दिन आ कर पूरा कर दूँगा।’...  ‘किसी दिन’-  माने कभी नहीं!
मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बांस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी- चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े- बड़े जाले, हलावाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी- टोपी तथा इसी तरह के बहुत से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गाँव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग- बेकाम का काम, जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई जरुरत नहीं। पेट- भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना- धुराना कपड़ा दे कर विदा करो। वह कुछ भी नहीं बोलेगा...।
कुछ भी नहीं बोलेगा, ऐसी बात नहीं। सिरचन को बुलाने वाले जानते हैं, सिरचन बात करने में भी कारीगर है... महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी सिरचन की बात सुन कर तिलमिला उठी थी-  ठहरो! मैं माँ से जा कर कहती हूँ। इतनी बड़ी बात!
बड़ी बात ही है बिटिया! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है।  नहीं तो दो- दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिलाकर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है बबुनी! सिरचन ने मुस्कुरा कर जवाब दिया था।
उस बार मेरी सबसे छोटी बहन की विदाई होने वाली थी।
पहली बार ससुराल जा रही थी मानू। मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को खत लिख कर चेतावनी दे दी है- मानू के साथ मिठाई की पतीली न आये, कोई बात नहीं। तीन जोड़ी फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतलपाटियों के बिना आएगी मानू तो.. ।  भाभी ने हँस कर कहा, ‘बैरंग वापस! इसलिए, एक सप्ताह से पहले से ही सिरचन को बुला कर काम पर तैनात करवा दिया था माँ ने-  देख सिरचन! इस बार नयी धोती दूँगी, असली मोहर छाप वाली धोती। मन लगा कर ऐसा काम करो कि देखने वाले देख कर देखते ही रह जाएँ।
पान- जैसी पतली छुरी से बांस की तीलियों और कमानियों को चिकनाता हुआ सिरचन अपने काम में लग गया। रंगीन सुतलियों से झब्बे डाल कर वह चिक बुनने बैठा। डेढ़ हाथ की बिनाई देख कर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनी।
मँझली भाभी से नहीं रहा गया, परदे के आड़ से बोली, ‘पहले ऐसा जानती कि मोहर छाप वाली धोती देने से ही अच्छी चीज बनती है तो भैया को खबर भेज देती।
काम में व्यस्त सिरचन के कानों में बात पड़ गयी। बोला, ‘मोहर छापवाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया। मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है..  मानू दीदी का दूल्हा अफसर आदमी है।
मँझली भाभी का मुँह लटक गया। मेरी चाची ने फुसफुसा कर कहा, ‘किससे बात करती है बहू? मोहर छाप वाली धोती नहीं, मूँगिया- लड्डू। बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी। देखती है न।
दूसरे दिन चिक की पहली पाँति में सात तारे जगमगा उठे, सात रंग के। सतभैया तारा! सिरचन जब काम में मगन होता है तो उसकी जीभ जरा बहार निकल आती है, होठ पर। अपने काम में मगन सिरचन को खाने- पीने की सुध नहीं रहती। चिक में सुतली के फंदे डाल कर अपने पास पड़े सूप पर निगाह डाली-  चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला। मैंने लक्ष्य किया, सिरचन की नाक के पास दो रेखाएं उभर आयीं। मैं दौड़ कर माँ के पास गया। माँ, आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है, सिर्फ चिउरा और गुड़? ‘ 
माँ रसोईघर में अन्दर पकवान आदि बनाने में व्यस्त थी। बोली, ‘मैं अकेली कहाँ- कहाँ क्या- क्या देखूं!..  अरी मँझली, सिरचन को बुँदिया क्यों नहीं देती? ‘
बुँदिया मैं नहीं खाता, काकी!सिरचन के मुँह में चिउरा भरा हुआ था। गुड़ का ढेला सूप के किनारे पर पड़ा रहा, अछूता।
माँ की बोली सुनते ही मँझली भाभी की भौंहें तन गयीं। मुट्ठी भर बुँदिया सूप में फेंक कर चली गयी।
सिरचन ने पानी पी कर कहा, ‘मँझली बहूरानी अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोल कर बाँटती है क्या? ‘
बस, मँझली भाभी अपने कमरे में बैठकर रोने लगी। चाची ने माँ के पास जा कर लगाया-  छोटी जाति के आदमी का मुँह भी छोटा होता है। मुँह लगाने से सर पर चढ़ेगा ही... किसी के नैहर- ससुराल की बात क्यों करेगा वह? ‘
मँझली भाभी माँ की दुलारी बहू है। माँ तमक कर बाहर आई-  सिरचन, तुम काम करने आये हो, अपना काम करो। बहुओं से बतकुट्टी करने की क्या जरूरत? जिस चीज की जरुरत हो, मुझसे कहो।
सिरचन का मुँह लाल हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बांस में टंगे हुए अधूरे चिक में फंदे डालने लगा।
मानू पान सजा कर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। चुपके से पान का एक बीड़ा सिरचन को देती हुई बोली, इधर- उधर देख कर कहा-  सिरचन दादा, काम- काज का घर! पाँच तरह के लोग पाँच किस्म की बात करेंगे..  तुम किसी की बात पर कान मत दो।
सिरचन ने मुस्कुरा कर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया। चाची अपने कमरे से निकल रही थी। सिरचन को पान खाते देख कर अवाक हो गयी। सिरचन ने चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देखकर कहा-  छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया का गमकौआ जर्दा खाते हो?... चटोर कहीं के! मेरा कलेजा धड़क उठा..  यत्परो नास्ति!
बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए। मानो, कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा पान को मुँह में घुलाता रहा। फिर, अचानक उठ कर पिछवाड़े पीक थूक आया। अपनी छुरी, हंसियाँ वैगरह समेट सम्हाल कर झोले में रख...  टंगी हुई अधूरी चिक पर एक निगाह डाली और हनहनाता हुआ आँगन के बाहर निकल गया।
चाची बड़बड़ाई-  अरे बाप रे बाप! इतनी तेजी! कोई मुफ्त में तो काम नहीं करता। आठ रुपये में मोहरछाप वाली धोती आती है।... इस मुँहझौंसे के मुँह में लगाम है, न आँख में शील। पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चिक मिलेगी। बांतर टोली की औरतें सिर पर गट्ठर लेकर गली- गली मारी फिरती हैं।
मानू कुछ नहीं बोली। चुपचाप अधूरी चिक को देखती रही... सातो तारें मंद पड़ गए।
माँ बोली, ‘जाने दे बेटी! जी छोटा मत कर, मानू। मेले से खरीद कर भेज दूँगी।
मानू को याद आया, विवाह में सिरचन के हाथ की शीतलपाटी दी थी माँ ने। ससुरालवालों ने न जाने कितनी बार खोल कर दिखलाया था पटना और कलकत्ता के मेहमानों को। वह उठ कर बड़ी भाभी के कमरे में चली गयी।
मैं सिरचन को मनाने गया। देखा, एक फटी शीतलपाटी पर लेट कर वह कुछ सोच रहा है।
मुझे देखते ही बोला, बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं... मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा? कौन पहनेगा?..  ससुरी खुद मरी, बेटे बेटियों को ले गयी अपने साथ। बबुआजी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है। इस शीतलपाटी को छू कर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा..  गाँव- भर में तुम्हारी हवेली में मेरी कदर होती थी..  अब क्या? ‘
मैं चुपचाप वापस लौट आया। समझ गया, कलाकार के दिल में ठेस लगी है। वह अब नहीं आ सकता।
बड़ी भाभी अधूरी चिक में रंगीन छींट की झालर लगाने लगी- यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू?’
मानू कुछ नहीं बोली। ..बेचारी! किन्तु, मैं चुप नहीं रह सका- चाची और मँझली भाभी की नजर न लग जाए इसमें भी।
मानू को ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था।
स्टेशन पर सामान मिलाते समय देखा, मानू बड़े जातां से अधूरे चिक को मोड़ कर लिए जा रही है अपने साथ। मन- ही- मन सिरचन पर गुस्सा हो आया। चाची के सुर- में- सुर मिला कर कोसने को जी हुआ... कामचोर, चटोर.. ।!
गाड़ी आई। सामान चढ़ा कर मैं दरवाजा बंद कर रहा था कि प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हुए सिरचन पर नजर पड़ी-  बबुआजी! उसने दरवाजे के पास आ कर पुकारा।
क्या है? ‘ मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर झिड़की के स्वर में कहा। सिरचन ने पीठ पर लादे हुए बोझ को उतार कर मेरी ओर देखा-  दौड़ता आया हूँ... दरवाजा खोलिए। मानू दीदी कहाँ हैं? एक बार देखूं!
मैंने दरवाजा खोल दिया।
सिरचन दादा! मानू इतना ही बोल सकी।
खिड़की के पास खड़े हो कर सिरचन ने हकलाते हुए कहा, ‘यह मेरी ओर से है। सब चीज है दीदी! शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी, कुश की।
गाड़ी चल पड़ी।
मानू मोहर छापवाली धोती का दाम निकाल कर देने लगी। सिरचन ने जीभ को दांत से काट कर, दोनों हाथ जोड़ दिए।
मानू फूट- फूट रो रही थी। मैं बण्डल को खोलकर देखना लगा- ऐसी कारीगरी, ऐसी बारीकी, रंगीन सुतलियों के फंदों को ऐसा काम, पहली बार देख रहा था।

वह क्षण

जैनेन्द्र कुमार की
कहानी कला
 जैनेन्द्र कुमार प्रेमचंद युग के महत्त्वपूर्ण कथाकार माने जाते हैं। उनकी प्रतिभा को प्रेमचंद ने भरपूर मान दिया। वे समकालीन दौर में प्रेमचंद के निकटतम सहयात्रियों में से एक थे मगर दोनों का व्यक्तित्व जुदा था। प्रेमचंद लगातार विकास करते हुए अंतत: महाजनी सभ्यता के घिनौने चेहरे से पर्दा हटाने में पूरी शक्ति लगाते हुए कफनजैसी कहानी और किसान से मजदूर बनकर रह गए।  होरी के जीवन की महागाथा गोदान लिखकर विदा हुए। जैनेन्द्र ने जवानी के दिनों में जिस वैचारिक पीठिका पर खड़े होकर रचनाओं का सृजन किया जीवन भर उसी से टिके रहकर मनोविज्ञान, धर्म, ईश्वर, इहलोक, परलोक पर गहन चिंतन करते रहे। समय और हम उनकी वैचारिक किताब है।
प्रेमचंद के अंतिम दिनों में जैनेन्द्र ने अपनी आस्था पर जोर देते हुए उनसे पूछा था कि अब ईश्वर के बारे में क्या सोचते हैं। प्रेमचंद ने दुनिया से विदाई के अवसर पर भी तब जवाब दिया था कि इस बदहाल दुनिया में ईश्वर है ऐसा तो मुझे भी नहीं लगता। वे अंतिम समय में भी अपनी वैचारिक दृढ़ता बरकरार रख सके, यह देखकर जैनेन्द्र बेहद प्रभावित हुए। वामपंथी विचारधारा से जुड़े लेखकों के वर्चस्व को महसूस करते हुए जैनेन्द्र जी कलावाद का झंडा बुलंद करते हुए अपनी ठसक के साथ समकालीन साहित्यिक परिदृश्य पर अलग नजर आते थे। गहरी मित्रता के बावजूद प्रेमचंद और जैनेन्द्र एक दूसरे के विचारों में भिन्नता का भरपूर सम्मान करते रहे और साथ- साथ चले।
प्रस्तुत कहानी जैनेन्द्र की विशिष्ट कहानी है जिसमें उनकी विशिष्ट कला हम देख पाते हैं। प्राय: कथा के माध्यम से जैनेन्द्र अपनी विचारधारा का जिस तरह प्रचार करते थे उसे हम इस कहानी में बखूबी समझ सकते हैं। हिन्दी के इतिहास निर्माता कथाकारों की पीढ़ी के कहानीकारों में बेहद महत्वपूर्ण रचानाकार जैनेन्द्र की कहानी वह क्षणप्रस्तुत है। आशा है आप पसंद करेंगे।
वह क्षण 
पैसा पात्र- कुपात्र नहीं देखता। क्या यह सच है?
राजीव ने यह पूछा। वह आदर्शवादी था और एम.ए. और लॉ करने के बाद अब आगे बढऩा चाहता था। आगे बढऩे का मतलब उसके मन में यह नहीं था कि वह घर के कामकाज को हाथ में लेगा। घर पर कपड़े का काम था। उसके पिता, जो खुद पढ़े लिखे थे, सोचते थे कि राजीव सब संभाल लेगा और उन्हें अवकाश मिलेगा। घर के धंधे पीटने में ही उमर हो गई है। चौथापन आ चला है और वह यह देखकर व्यग्र हैं कि आगे के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया है। इस लोक से एक दिन चल देना है यह उन्हें अब बार- बार याद आता है। लेकिन उस यात्रा की क्या तैयारी है? सोचते हैं और उन्हें बड़ी उलझन मालूम होती है। लेकिन जिस पर आस बंधी थी वह राजीव अपनी धुन का लड़का है। जैसे उसे परिवार से लेना- देना ही नहीं। ऊंचे ख्यालों में रहता है, जैसे महल ख्याल से बन जाते हों।
राजीव के प्रश्न पर उन्हें अच्छा मालूम हुआ। जैसे प्रश्न में उनकी आलोचना हो। बोले- नहीं, धन सुपात्र में ही आता है। अपात्र में आता नहीं है पर, आये तो वहां ठहरता नहीं। राजीव, तुम करना क्या चाहते हो?’
राजीव ने कहा- आपके पास धन है। सच कहिये, आप प्रसन्न हैं?’
पिता ने तनिक चुप रहकर कहा- धन के बिना प्रसन्नता आ जाती है, ऐसा तुम सोचते हो तो गलत सोचते हो। तुममें लगन है। सृजन की चाह है। कुछ तुम कर जाना चाहते हो। क्या इसीलिए नहीं कि अपने अस्तित्व की तरफ से पहले निश्चित हो। घर है, ठौर ठिकाना है। जो चाहो कर सकते हो। क्योंकि खर्च का सुभीता है। पैसे को तुच्छ समझ सकते हो, क्योंकि वह है। मैं तुमसे कहता हूं राजीव कि पैसे के अभाव में सब गिर जाते हैं। तुमने नहीं जाना, लेकिन मैंने उस अभाव को जाना है। तुमने पूछा है और मैं कहता हूं कि हां, मैं प्रसन्न नहीं हूं। लेकिन धन के बिना प्रसन्न होने का मेरे पास और भी कारण न रहता। तुम्हारी आयु तेईस वर्ष पार कर गई है। विवाह के बारे में इंकार करते गये हो। हम लोगों को यहां ज्यादा दिन नहीं बैठे रहना है। तब इस सबका क्या होगा। बेटियाँ पराये घर की होती हैं। एक तुम्हारी छोटी बहन है, उसका भी ब्याह हो जाएगा। लड़के एक तुम हो। सोचना तुम्हें है कि फिर इस सबका क्या होगा। अगर तुम्हारा निश्चय हो कि व्यवसाय में नहीं जाना है तो मैं इस काम- धाम को उठा दूं। अभी तो दाम अच्छे खड़े हो जाएंगे। नहीं तो मेरी सलाह यही है कि बैठो, पुश्तैनी काम संभालो, घर- गिरस्ती बसाओ और हमको अब परलोक की तैयारी में लगने दो। सच पूछो तो अवस्था हमारी है कि देखें जिसे धन कहते हैं वह मिट्टी है। पर तुममें आकांक्षा है। चाहे उन्हें महत्वाकांक्षी कहो। महत्व की हो या कैसी भी हो, आकांक्षा के कारण धन- धन बनता है। इसलिए तुमको घर से विमुख मैं नहीं देखना चाहता। विमुख मैं स्वयं अवश्य बनना चाहता हूं क्योंकि आकांक्षा अब शरीर के वृद्ध पड़ते जाने के साथ हमें त्रास ही दे सकेगी। आकांक्षा इसी से अवस्था के आने पर बुझ सी जाती है। तुमको आकांक्षाओं से भरा देखकर मुझे खुशी होती है। अपने में उनके बीज देखता हूं तो डर होता है, क्योंकि उमर बीतने पर जिधर जाना है उधर की सम्मुखता मुझमें समय पर न आएगी तो मृत्यु मेरे लिए भयंकर हो जाएगी। तुम्हारे लिए आगे जीवन का विस्तार है मुझे उसका उपसंहार करना है और तैयारी मृत्यु की करनी है। संसार असार है, यह तुम नहीं कह सकते। हां, मैं यदि वहां सार देखूं तो अवश्य गलत होगा। तुम समझते हो। कहो, क्या सोचते हो।
राजीव पिता का आदर करता था। वह चुपचाप सुनता रहा। पिता की वाणी में स्नेह था, पीड़ा थी, उसमें अनुभव था। लेकिन जितने ही अधिक ध्यान से और विनय से पिता की बात को उसने सुना, उसके मन से अपने सपने दूर नहीं हुए। अनुभव अतीत से संबंध रखता है। वह जैसे उसके लिए था ही नहीं। वह जानता था कि कमाई का चक्कर आने वाले कुछ वर्षों में खत्म हो जाने वाला है। यह बुर्जुआ समाज आगे रहने वाला नहीं। समाजवादी समाज होगा जहां अपने अस्तित्व की भाषा में सोचने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। आप सामाजिक होने और समाज स्वत: आपका वहन करेगा। आपका योग-क्षेम आपकी अपनी चिंता का विषय ना होगा। राजीव पिता की बात सुनते हुए भी देख रहा था कि धनोपार्जन जिनका चिंतन सर्वस्व है, ऐसा वर्ग क्रमश: मान्यता से गिरता जा रहा है। कल करोड़ो में जो खेलता था आज चार सौ रुपए पाने वाले मजिस्ट्रेट के हाथों जेल भेज दिया जाता है। वह वर्ग शोषक है, आसामाजिक है। इसके अस्तित्व का आधार है कम दो, ज्यादा लो। हर किसी के काम आओ, इस शर्त के साथ कि अधिक उससे अपना काम निकाल लो। यह सिद्धांत सभ्यता का नहीं है, स्वार्थ का है, पाप का है। इस पर पलने- पूसने वाले वर्ग को समाज कब तक सहता रह सकता है? असल में यह घुन है जो समाज के शरीर को खाकर उसे खोखला करता रहता है। उस वर्ग की खुद की सफलता समाज के व्यापक हित को कीमत देने में होती है। यह ढोंग अब ज्यादा नहीं चल सकता है। इस वर्ग को मिटाना होगा और फिर समाज वह होगा जहां हर कोई अपना हित निछावर करेगा, फुलाए और फैलाएगा नहीं। स्थापित स्वार्थ, संयुक्त परिवार, जाति का, सब लुप्त हो जाएगा। स्वार्थ एक होगा और वह परमार्थ होगा। हित एक होगा और वह सबका हित होगा।
पिता की बात सुन रहा था और राजीव का तन इन विचारों के लोक में रमा हुआ था। पिता की बात पूरी हुई तो सहसा वह कुछ समझा नहीं, कुछ देर चुप ही बना रह गया। कारण बात की संगति उसे नहीं मिल रही थी।
पिता ने अनुभव किया कि बेटा वहँं नहीं, कहीं और है। उन्हें सहानुभूति हुई और वह भी चुप रहे। राजीव ने उस चुप्पी का असमंजस्य अनुभव किया। हठात बोला- तो आप मानते है कुपात्र के पास धन नहीं होगा। फिर इंजील में यह क्यों है कि कुछ भी हो जाए धनिक का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं हो सकता। उससे तो साबित होता है कि धन कुपात्र के पास ही हो सकता है।पिता की ऐसी बातों पर रोष आ सकता था पर इस बार वह गंभीर हो गए। मंद वाणी में बोले- ईसा की वाणी पवित्र है, यथार्थ है। वह तुम्हारे मन में उतरी है तो मैं तुमको बधाई देता हूं और फिर मुझे आगे नहीं कहना है।
राजीव को तर्क चाहिए था। बोला- आप तो कहते थे कि...।
पिता और आर्द्र हो आए, बोले - मैं गलत कहता था। परम सत्य वह ही है जो बाइबिल में है। भगवान तुम्हारा भला करें।कहकर वह उठे और भीतर चले गए। राजीव विमूढ़ सा बैठा रह गया। उसकी कुछ समझ में ना आया। जाते समय पिता की मुद्रा में विरोध या प्रतिरोध ना था। उसने सोचा कि मेरे आग्रह में क्या इतना बल भी नहीं है कि प्रत्याग्रह उत्पन्न करें? या बल इतना है कि उसका सामना हो नहीं सकता। उसे लगा कि वह जीता है। लेकिन जीत में स्वाद उसे बिल्कुल नहीं आया। वह आशा कर रहा था कि पैसे की गरिमा और महिमा सामने से आएगी और वह उसको चकनाचूर कर देगा। उसके पास प्रखर तर्क थे और प्रबल ज्ञान था। उसके पास निष्ठा थी और उसे सवर्था प्रत्यक्ष था कि समाजवादी व्यवस्था अनिवार्य और अप्रतिरोध्य होगी। पूंजी की संस्था कुछ दिनों की है और वह विभीषिका अब शीघ्र समाप्त हो जाने वाली है। उसको समाप्त करने का दायित्व उठाने वाले बलिदानी युवकों में वह अपने को गिनता था। वह यह भी जानता था कि नगर के मान्य व्यवसायी की पुत्र होने के नाते उसका यह रूप और भी महिमान्वित हो जाता है। उसे अपने इस रूप में रस और गौरव था। वह निश्शंक था कि भवितव्यता को अपने पुरुषार्थ से वर्तमान पर उतारने वाले योद्धाओं की पंक्ति में वह सम्मिलित है। उसमें निश्चित धन्यता का भाव था कि वह क्रांति का अनन्य सेवक बना है। वह तन- मन के साथ धन से भी उस युग निर्माण के कार्य में पढ़ा था और उसकी वर्चस्व की प्रतिष्ठा थी। मानो उस अनुष्ठान का वह अध्वर्यु था।
लेकिन पिता जब संतोष और समाधान के साथ अपनी हार को अपनाते हुए उसकी उपस्थिति से चुपचाप चले गए तो राजीव को अजब लगा। मानो कि उसका योद्धा का रूप स्वयं उसके निकट व्यर्थ हुआ जा रहा हो। उसका जी हुआ कि आगे बढ़कर कहे कि सुनिए तो सही, पर वह स्वयं न सोच सका कि सुनाना अब उसे शेष क्या है। पिता उसे स्वस्ति कह गए हैं, मानो आशीर्वाद और अनुमति दे गए हों। पर यह सहज सिद्धी उसे काटती सी लगी। वह कुछ देर अपनी जगह ही बैठा रहा। तुमुल द्वंद्व उसके भीतर मचा और वह कुछ निश्चय न कर सका।
चौबीस घंटे राजीव मतिभूला- सा रहा। अगले दिन उसने पिता से जाकर कहा - आज्ञा हो तो मैं कल से कोठी पर जाकर काम देखने लग जाऊं।
पिता ने कहा- क्यों बेटा?’
जी, और कुछ समझ नहीं आता।
पिता ने कहा- तुमने अर्थशास्त्र पढ़ा है। मैंने अर्थ पैदा किया है, शास्त्र उसका नहीं पढ़ा। शास्त्र धर्म का पढ़ा है। ईसा की बात इस शास्त्र की ही बात है। अर्थशास्त्र भी वही कहता है तुम जानो। मैं बीए से आगे तो गया ही नहीं और अर्थशास्त्र की बारहखड़ी से आगे जाना नहीं। फिर भी वहाँ शायद मानते हैं कि अर्थ काम्य है। राजीव बेटा, धर्म ने उसे काम्य नहीं माना है। इसलिए उसकी निंदा भी नहीं है, उस पर करूणा है। तुम शायद मानते होगे, जैसे कि और लोग मानते हैं कि तुम्हारा पिता सफल आदमी है। वह सही नहीं है। ईसा की बात जो कल तुमने कही बहुत ठीक है। मैं उसको सदा ध्यान में नहीं रख सका। तुमसे कहता हूंँ कि निर्णय तुम्हारा है। निर्णय यही करते हो कि कोठी के काम को संभालो तो मुझे उसमें भी कुछ नहीं है। तुम्हारी आत्मा तुम्हारे साथ रहेगी। मैं तो उसे सांत्वना देने पहुंँच सकंूगा नहीं। उसके समक्ष तुम्हें स्वयं ही रहना है इसलिए मैं तुम्हारी स्वतंत्रता पर आरोप नहीं लगा सकता हूं। पर बेटे, मैं भूल रहा तो भूल रहा, धर्म की ओर इंजील की बात को तुम कभी मत भूलना। इतना ही कह सकता हूंँ। समाजवादी हो, साम्यवादी हो, पूंजीवादी हो, व्यवस्था कुछ भी हो, धर्म के शब्द का सार कभी खत्म नहीं होता। न वह शब्द कभी मिथ्या पड़ता है। उसे मन से भूलोगे नहीं तो शायद कहीं से तुम्हारा अहित नहीं होगा। हो सकता है समाज का भी अहित न हो। राजीव, बहुत दिनों से सोचता रहा हूंँ। अब पूछता हूँ कि हम लोग दोनों, तुम्हारी माँ और मैं, अब जा सकते हैं कि नहीं। अपनी बहन सरोज के विवाह को तो ठीक- ठाक तुम कर ही दोगे। 

एक टोकरी भर मिट्टी

पं.माधवराव सप्रे की कालजयी कहानी
19 जून 1871 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले में स्थित गांव पथरिया में जन्में पं. माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ में साहित्य, पत्रकारिता एवं शिक्षा के क्षेत्रों में वंदनीय कार्य किया है। बिलासपुर में मिडिल तक की पढ़ाई के बाद मेट्रिक शासकीय विद्यालय रायपुर से उत्तीर्ण किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय  से बीए की डिग्री लेने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजों की चाकरी कुबूल नहीं की वे राष्ट्रभक्त एवं सेवाव्रती समाजसेवी बनकर जिये और अपनी साहित्य साधना एवं देश सेवा के लिए पूजित हुए। सप्रे जी ने 1921 में रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय तथा प्रथम कन्या विद्यालय जानकी देवी महिला पाठशाला की भी स्थापना की।
1900 में जब समूचे छत्तीसगढ़ में प्रिंटिंग प्रेस नहीं था तब उन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से गांव पेंड्रा से छत्तीसगढ़ मित्र नामक मासिक पत्रिका निकालकर मध्य भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत की। इसी पत्रिका में छपी उनकी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी  हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी के रूप में चर्चित हुई। सप्रेजी ने इस कहानी के लिए लोकजीवन में प्रचलित कथा- कंथली से मिट्टी लेकर उसे अभिनव स्वरूप दिया। छत्तीसगढ़ में प्रचलित डोकरी अर्थात वृद्धा से जुड़ी कथाओं का विपुल भंडार रहा है। हर कहानी में केंद्रीय चरित्र के रूप में उपस्थित वृद्धा अपनी समझदारी से विध्नों पर नकेल कसती है और आततायी को पराजित कर देती है। इस कहानी की वृद्धा भी बुद्धि- कौशल से जमींदार को झुका देती है। बुढिय़ा का व्यक्तित्व भावना से परिचालित है। भावाकुलता और चातुर्य के साथ वैराग्य के छत्तीसगढ़ी गुण को भी इस कहानी में बखूबी रेखांकित किया गया है। छत्तीसगढ़ की बूढ़ी दाई अपनी समग्र गरिमा के साथ इस कहानी में उपस्थित है।
 पढि़ए कहानी एक टोकरी भर मिट्टी।  इस कहानी को साहित्य अकादमी के लिए कमलेश्वर जी ने हिन्दी की कालजयी कहानियाँ शृंखला में प्रथम कहानी के रूप में छापकर इसके महत्त्व को रेखांकित किया है।

एक टोकरी भर मिट्टी
किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोपड़ी हटा ले। पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी।
उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट- फूट कर रोने लगती थी। और जबसे उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना, तब से वह मृतप्राय हो गई थी।
उस झोपड़ी में उसका मन ऐसा लग गया था कि बिना मरे वहाँ से वह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए। तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत में उस झोपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया। बेचारी अनाथ तो थी ही, पास- पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।
एक दिन श्रीमान उस झोपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ पहुँची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहाँ से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, ‘महाराज, अब तो यह झोपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ। महाराज क्षमा करें तो एक बिनती है।
जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, ‘जब से यह झोपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना- पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊँगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं।श्रीमान ने आज्ञा दे दी। विधवा झोपड़ी के भीतर गई। वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। अपने आन्तरिक दु:ख को किसी तरह सम्हालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठा कर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी, ‘महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइये जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ।
जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए, पर जब वह बार- बार हाथ जोडऩे लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गई। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्योंही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी वहाँ से वह एक हाथ- भर भी ऊँची न हुई। तब लज्जित होकर कहने लगे, ‘नहीं यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।
यह सुनकर विधवा ने कहा, ‘महाराज! नाराज न हों। आप से तो एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी हैं। उसका भार आप जन्म भर क्यों कर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए!
जमींदार साहब धन- मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गये थे, पर विधवा के उक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गईं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोपड़ी वापस दे दी।

कालजयी कहानी

युगप्रवर्तक साहित्यकार          गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर
विलक्षण व्यक्तित्व के धनी, बहुआयामी कलाकार और युगप्रवर्तक साहित्यकार हैं गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर। देश और विदेश में उनके मूल्यवान साहित्य पर लगातार चर्चा, परिचर्चा, शोध, संगोष्ठी के माध्यम से उन्हें पुन: जानने का प्रयास उनके पाठक कर रहे हैं। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार हैं। उनकी कृतियों को हिन्दी जगत ने कुछ इस तरह आत्मसात किया है कि वे हिन्दी के महान लेखक लगते हैं। काबुलीवाला उनकी बेहद चर्चित कहानी है। इस कहानी पर यादगार फिल्म भी बनी। गुरुदेव को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए हम यादगार कहानियों में उनकी अमर कहानी काबुलीवाला प्रकाशित कर रहे हैं। आशा है हमारे सुधि पाठक हमारे इस प्रयास को पसंद करेंगे।

      काबुलीवाला
मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से पल- भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में आने के बाद भाषा सीखने में उसे सिर्फ एक ही वर्ष लगा होगा। उसके बाद से जितनी देर सो नहीं पाती हैं, उस समय का एक पल भी वह चुप्पी में नहीं खोती। उसकी माता बहुधा डाँट- फटकार कर उसकी चलती हुई जबान बन्द कर देती हैं, लेकिन मुझसे ऐसा नहीं होता। मिनी का मौन मुझे ऐसा अस्वाभाविक- सा प्रतीत होता है कि मुझसे वह अधिक देर तक नहीं सहा जाता और यही कारण हैं कि मेरे साथ उसके भावों का आदान- प्रदान कुछ अधिक उत्साह के साथ होता रहा है।
सवेरे मैंने अपने उपन्यास के सत्रहवें अध्याय में हाथ लगाया ही था कि इतने में मिनी ने आकर कहना आरम्भ कर दिया - बाबूजी! रामदयाल दरबान काकको कौआकहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।विश्व की भाषाओं की विभिन्नता के विषय में मेरे कुछ बताने से पहले ही उसने दूसरा प्रसंग छेड़ दिया-  बाबूजी! भोला कहता था, आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न? खाली बक- बक किया करता हैं, दिन- रात बकता रहता है।
इस विषय में मेरी राय की तनिक भी राह न देख करके, चट से धीमें स्वर में एक जटिल प्रश्न कर बैठी- बाबूजी! माँ तुम्हारी कौन लगती हैं?’
फिर उसने मेरी मेज के पाश्र्व में पैरों के पास बैठकर अपने दोनों घुटने और हाथों को हिला-  हिलाकर बड़ी शीघ्रता से मुँह चलाकर अटकन- बटबन दही चटाकनकहना आरम्भ कर दिया। जबकि मेरे उपन्यास के अध्याय में प्रताप सिंह उस समय कंचन माला को लेकर रात्रि के प्रगाढ़ अंधकार में बंदीगृह के ऊँचें झरोखे से नीचे कलकल करती हुई सरिता में कूद रहे थे।
मेरा घर सड़क के किनारे पर था। अचानक मिनी अपने अटकन- चटकन को छोड़कर खिड़की के पास दौड़ गई और जोर- जोर से चिल्लाने लगी, ‘काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!
मैले- कुचले ढीले कपड़े पहने, सिर पर कुल्ला रखे, उस पर साफा बाँधे कँधे पर सूखे फलों की झोली लटकाए, हाथ में चमन के अँगूरों की कुछ पिटारियाँ लिए, एक लम्बा- तगड़ा सा काबुली मन्द चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देख कर मेरी छोटी- सी बेटी के हृदय में कैसे भाव उदय हुए यह बताना असम्भव हैं। उसने जोर से पुकारना शुरु किया। मैंने सोचा - अभी झोली कन्धे पर डाले, सिर पर एक मुसीबत आ खड़ी होगी और मेरा सत्रहवाँ अध्याय आज अधूरा रह जाएगा।
किन्तु मिनी के चिल्लाने पर ज्यों ही काबुली ने हँसते हुए उसकी ओर मुँह फेरा और घर की ओर बढऩे लगा, त्यों ही मिनी भय खाकर भीतर भाग गई। फिर पता ही नहीं लगा कि कहाँ छिप गई? उसके छोटे से मन में यह अन्धविश्वास बैठ गया था कि उस मैली- कुचैली झोली के अंदर ढूढऩे पर उस जैसी और भी जीती जागती बच्चियाँ निकल सकती हैं।
इधर काबुली ने आकर मुस्कराते हुए, मुझे हाथ उठाकर अभिवादन किया और खड़ा हो गया। मैंने सोचा- वास्तव में प्रताप सिंह और कंचन माला की दशा अत्यन्त संकटापन्न हैं, फिर भी घर में बुलाकर इससे कुछ न खरीदना अच्छा न होगा।
कुछ सौदा खरीदा गया। उसके बाद मैं उससे इधर- उधर की बातें करने लगा। रहमत, रूस, अंग्रेज, सीमान्त रक्षा के बारे में गप- शप होने लगी।
अन्त में उठकर जाते हुए उसने अपनी मिली- जुली भाषा में पूछा-  बाबूजी! आप की बच्ची कहाँ गई?’
मैंने मिनी के मन से व्यर्थ का भय दूर करने के अभिप्राय से उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे बिल्कुल लगकर काबुली के मुख और झोली की ओर सन्देहात्मक दृष्टि डालती हुई खड़ी रही। काबुली ने झोली से किशमिश और खुबानी निकालकर देनी चाही, परन्तु उसने न ली और दुगने सन्देह के साथ मेरे घुटनों से लिपट गई। उसका पहला परिचय इस तरह हुआ।
इस घटना के कुछ दिन बाद एक दिन सवेरे मैं किसी आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था। देखूँ तो मेरी बिटिया दरवाजे के पास बैंच पर बैठकर काबुली से हँस- हँस कर बातें कर रही है और काबुली उसके पैरों के समीप बैठा- बैठा मुसकराता हुआ, उन्हें ध्यान से सुन रहा है। और बीच- बीच में अपनी राय मिली- जुली भाषा में व्यक्त करता जाता हैं। मिनी को अपने पाँच वर्ष के जीवन में बाबूजी के सिवाय, ऐसा धैर्य वाला श्रोता शायद ही कभी मिला हो। देखो तो उसकी फ्रॉक का अग्रभाग बादाम- किशमिश से भरा हुआ था। मैंने काबुली से कहा, ‘इसे यह सब क्यों दे दिया? अब कभी मत देना।
यह कहकर कुर्ते की जेब में से एक अठन्नी निकालकर उसे दी। उसने बिना किसी हिचक के अठन्नी लेकर अपनी झोली में रख ली।
कुछ देर बाद, घर लौटकर देखता हूँ कि उस अठन्नी ने बड़ा उपद्रव खड़ा कर दिया हैं।
मिनी की माँ एक सफेद चमकीला गोलाकर पदार्थ हाथ में लिए डाँट- फटकार कर मिनी से पूछ रही थी- तूने यह अठन्नी पाई कहाँ से, बता?’
मिनी ने कहा- काबुली वाले ने दी हैं।
काबुली वाले से तूने अठन्नी ली कैसे, बता?’
मिनी ने रोने का उपक्रम करते हुए कहा-  मैने माँगी नहीं थी, उसने आप ही दी हैं।
मैंने जाकर मिनी की उस अकस्मात मुसीबत से रक्षा की और उसे बाहर ले आया। मालूम हूआ कि काबुली के साथ मिनी की यह दूसरी ही भेंट थी, सो कोई विशेष बात नहीं। इस दौरान वह रोज आता रहा। और पिस्ता- बादाम की रिश्वत दे- देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर बहुत अधिकार कर लिया था।
देखा कि इस नई मित्रता में बँधी हुई बातें और हँसी ही प्रचलित हैं। जैसी मेरी बिटिया, रहमत को देखते ही, हँसते हुए पूछती- काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली के भीतर क्या है?’
काबुली जिसका नाम रहमत था। एक अनावश्यक चन्द्र- बिन्दु जोड़कर मुस्कराता हुआ कहता, ‘हाथी।
उसके परिहास का रहस्य क्या हैं? यह तो नहीं कहाँ जा सकता, फिर भी इन नये मित्रों को इससे तनिक विशेष खेल- सा प्रतीत होता है और जाड़े के प्रभात में एक सयाने और एक बच्ची की सरल हँसी सुनकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगता।
उन दोनों मित्रों में और भी एक- आध बात प्रचलित थी। रहमत मिनी से कहता, ‘तुम ससुराल कभी नहीं जाना, अच्छा?’
हमारे देश की लड़कियाँ जन्म से ही ससुरालशब्द से परिचित रहती हैं, लेकिन हम लोग तनिक कुछ नई रोशनी के होने के कारण तनिक- सी बच्ची को ससुराल के विषय में विशेष ज्ञानी नहीं बना सके थे, अत: रहमत का अनुरोध वह स्पष्ट नहीं समझ पाती थी। इस पर भी किसी बात का उत्तर दिए बिना चुप रहना उसके स्वभाव के बिल्कुल विरुद्ध था। उलटे वह रहमत से ही पूछती, ‘तुम ससुराल कब जाओगे?’
रहमत काल्पनिक ससुर के लिए अपना जबरदस्त घूँसा तानकर कहता, ‘हम ससुर को मारेगा।
सुनकर मिनी ससुरनामक किसी अनजाने जीव की दुरावस्था की कल्पना करके खूब हँसती।
देखते- देखते जाड़े की सुहावनी ऋतु आ गयी। पूर्व युग में इसी समय राजा लोग दिग्विजय के लिए कूच करते थे। मैं कोलकाता छोड़कर कभी कहीं नहीं गया। शायद इसीलिए मेरा मन ब्राह्मांड में घूमा करता था। यानी, कि मैं अपने घर में ही चिर प्रवासी हूँ। बाहरी ब्रह्मांड के लिए मेरा मन सर्वदा आतुर रहता था। किसी विदेश का नाम आगे आते ही मेरा मन वहीं की उड़ान लगाने लगता हैं। इसी प्रकार किसी विदेशी को देखते ही तत्काल मेरा मन सरिता- पर्वत- बीहड़ वन के बीच में एक कुटीर का दृश्य देखने लगता हैं और एक उल्लासपूर्ण स्वतंत्र जीवनयात्रा की   बात कल्पना में जाग उठती हैं।
इधर देखा तो मैं ऐसी प्रकृति का प्राणी हूँ, जिसका अपना घर छोड़कर बाहर निकलने में सिर कटता हैं। यही कारण हैं कि सवेरे के समय अपने छोटे- से कमरे में मेज के सामने बैठकर उस काबुली से गप- शप लड़ाकर बहुत कुछ भ्रमण कर लिया करता हूँ। मेरे सामने काबुल का पूरा चित्र खिंच जाता। दोनों ओर ऊबड़- खाबड़, लाल- लाल ऊँचे दुर्गम पर्वत हैं और रेगिस्तानी मार्ग, उन पर लदे गुए ऊँटों की कतार जा रही हैं। ऊँचे- ऊँचे साफे बाँधे हुए सौदागर और यात्री कुछ ऊँट की सवारी पर हैं तो कुछ पैदल है जा रहे हैं। किसी के हाथों में बरछा हैं तो कोई बाबा आदम के जमाने की पुरानी बन्दूक थामें हुए हैं। बादलों की भयानक गर्जन के स्वर में काबुल लोग अपनी मिली- जुली भाषा में अपने देश की बातें कर रहें हैं।
मिनी की माँ बड़ी वहमी स्वभाव की थी। राह में किसी प्रकार का शोर- गुल हुआ नहीं कि उसने समझ लिया कि संसार- भर के सारे मस्त शराबी हमारे ही घर की ओर दौड़े आ रहे हैं? उसके विचारों में यह दुनिया इस छोर से उस छोर तक चोर- डकैत, मस्त, शराबी, साँप, बाघ, रोगों, मलेरिया, तिलचट्टे और अंग्रेजों से भरी पड़ी हैं। इतने दिन हुए इस दुनिया में रहते हुए भी उसके मन का यह रोग दूर नहीं हुआ।
रहमत काबुली की ओर से भी वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी। उस पर विशेष नजर रखने के लिए मुझसे बार- बार अनुरोध करती रहती। जब मैं परिहास के आवरण से ढकना चाहता तो मुझसे एक साथ कई प्रश्न पूछ बैठती- क्या अभी किसी का लड़का नहीं चुराया गया? क्या काबुल में गुलाम नहीं बिकते? क्या एक लम्बे- तगड़े काबुली के लिए एक छोटे बच्चे को उठा ले जाना असम्भव हैं?’ इत्यादि।
मुझे मानना पड़ता कि यह बात नितांत असम्भव हो सो बात नहीं, परन्तु भरोसे के काबिल नहीं। भरोसा करने की शक्ति सब में समान नहीं होती, अत: मिनी की माँ के मन में भय ही रह गया, परन्तु केवल इसीलिए बिना किसी दोष के रहमत को अपने घर में आने से मना न कर सका।
हर वर्ष रहमत माघ महीने में अपने देश लौट जाता था। इस समय वह अपने व्यापारियों से रुपया- पैसा वसूल करने में तल्लीन रहता। उसे घर- घर, दुकान- दुकान घूमना पड़ता था, मगर फिर भी मिनी से उसकी भेंट एक बार अवश्य हो जाती हैं। देखने में तो ऐसा प्रतीत होता हैं कि दोनों के मध्य किसी षड्यंत्र का श्रीगणेश हो रहा हो। जिस दिन वह सवेरे नहीं आ पाता, उस दिन देखूँ तो वह संध्या को हाजिर हैं। अन्धेरे में घर के कोने में उस ढीले- ढाले जामा- पाजामा पहने, झोली वाले लम्बे- तगड़े आदमी को देखकर सचमुच ही मन में अचानक भय- सा पैदा हो जाता है।
लेकिन, जब देखता हूँ कि मिनी ओ काबुलीवालापुकारते हुए हँसती- हँसती दौड़ी आती है और दो भिन्न आयु के असम मित्रों में वही पुराना हास- परिहास चलने लगता है, तब मेरा सारा हृदय खुशी से नाच उठता है।
एक दिन सवेरे मैं अपने छोटे कमरे में बैठा नई पुस्तक के प्रूफ देख रहा था। जाड़ा विदा होने से पूर्व, आज दो- तीन दिन से खूब जोर से अपना प्रकोप दिखा रहा है। जिधर देखो, उधर इस जाड़े की ही चर्चा हो रही है। ऐसे जाड़े- पाले में खिड़की में से सवेरे की धूप मेज के नीचे मेरे पैरों पर आ पड़ी। उसकी गर्मी मुझे अच्छी प्रतीत होने लगी। लगभग आठ बजे का समय होगा। सिर से मफलर लपेटे ऊषा चरण सवेरे की सैर करके घर की ओर लौट रहे थे। ठीक उसी समय एक बड़े जोर का शोर सुनाई दिया।
देखो तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। उसके पीछे बहुत से तमाशाई बच्चों का झुंड चला आ रहा है। रहमत के ढीले- ढीले कुरते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से लथपथ छुरा। मैंने द्वार से बाहर निकलकर सिपाही को रोक लिया और पूछा-  क्या बात है?’
कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक रामपुरी चादर खरीदी थी। उसके कुछ रुपए उसकी ओर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने साफ इनकार कर दिया। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई और रहमत ने उसे छुरा निकालकर घोंप दिया। रहमत उस झूठे बेईमान आदमी के लिए भिन्न- भिन्न प्रकार के अपशब्द सुना रहा था। इतने में काबुलीवाला, काबुलीवाला’, पुकारती हुई मिनी घर से निकल आई।
रहमत का चेहरा क्षण- भर में कौतुक हास्य से चमक उठा।  उसके कन्धे पर आज झोली नहीं थी, अत: झोली के बारे में दोनों मित्रों की अभ्यस्त आलोचना न चल सकी। मिनी ने आते ही पूछा-  तुम ससुराल जाओगे?’
रहमत ने प्रफुल्लित मन से कहा-  हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।
रहमत ताड़ गया कि उसका यह जवाब मिनी के चेहरे पर हँसी न ला सकेगा और तब उसने हाथ दिखाकर कहा- ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।
छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई वर्ष का कारावास मिला।
रहमत का ध्यान धीरे- धीरे मन से बिलकुल उतर गया। हम लोग अब अपने घर में बैठकर सदा के अभ्यस्त होने के कारण, नित्य के काम- धन्धों में उलझे हुए दिन बिता रहे थे, तभी एक स्वाधीन पर्वतों पर घूमने वाला इंसान कारागर की प्राचीरों के अन्दर कैसे वर्ष पर वर्ष काट रहा होगा, यह बात हमारे मन में कभी उठी ही नहीं। और चंचल मिनी का आचरण तो और भी लज्जाप्रद था। यह बात उसके पिता को भी माननी पड़ेगी। उसने सहज ही अपने पुराने मित्र को भूलकर पहले तो नबी सईस के साथ मित्रता जोड़ी, फिर क्रमश: जैसे- जैसे उसकी वयोवृद्धि होने लगी, वैसे- वैसे सखा के बदले एक के बाद एक उसकी सखियाँ जुटने लगी। और तो क्या, अब वह अपने बाबूजी के लिखने के कमरे में भी दिखाई नहीं देती। मेरा तो एक तरह से उसके साथ नाता ही टूट गया हैं।
कितने ही वर्ष बीत गए? वर्षो बाद आज फिर शरद ऋतु आई हैं। मिनी की सगाई की बात पक्की हो गई। पूजा की छुट्टियों में उसका विवाह हो जाएगा। कैलाशवासिनी के साथ- साथ अबकी बार हमारे घर की आनन्दमयी मिनी भी माँ- बाप के घर में अंधेरा करके सुसराल चली जाएगी।
सवेरे दिवाकर बड़ी सज- धज के साथ निकले। वर्षों के बाद शरद ऋतु की यह नई धवल धूप सोने में सुहागे का काम दे रही हैं। कोलकाता की संकरी गलियों से परस्पर सटे हुए पुराने ईटझर गन्दे घरों के ऊपर भी इस धूप की आभा ने इस प्रकार का अनोखा सौन्दर्य बिखेर दिया है।
हमारे घर पर दिवाकर के आगमन से पूर्व ही शहनाई बज रही है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे यह मेरे हृदय की धड़कनों में से रो- रोकर बज रही हो। उसकी करुण भैरवी रागिनी मानो मेरी विच्छेद पीड़ा को जाड़े की धूप के साथ सारे ब्रह्मांड़ में फैला रही है। मेरी मिनी का आज विवाह है।
सवेरे से घर में बवंडर बना हुआ है। हर समय आने- जाने वालों का ताँता बँधा हुआ है। आँगन में बाँसों का मंडप बनाया जा रहा है। हरेक कमरे और बरामदे में झाड़- फानूस लटकाए जा रहे हैं और उनकी टक- टक की आवाज मेरे कमरे में आ रही है। चलो रे!’, ‘जल्दी करो!’, ‘इधर आओ!की तो कोई गिनती ही नहीं हैं।
मैं अपने लिखने- पढऩे के कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत आया और अभिवादन करके एक ओर खड़ा हो गया।
पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न पहले जैसे लम्बे- लम्बे बाल और न चेहरे पर पहले जैसी दिव्य ज्योति ही थी। अंत में उसकी मुस्कान देखकर पहचान सका कि यह तो रहमत है।
क्यों रहमत कब आए?’ मैंने पूछा।
कल शाम को जेल से छूटा हूँ।उसने कहा।
सुनते ही उसके शब्द मेरे कानों में खट से बज उठे। किसी खूनी को अपनी आँखों से मैंने कभी नहीं देखा था। उसे देखकर मेरा सारा मन एकाएक सिकुड़- सा गया! मेरी यही इच्छा होने लगी कि आज के इस शुभ दिन में वह इंसान यहाँ से टल जाए तो अच्छा हो।
मैंने उससे कहा- आज हमारे घर में कुछ आवश्यक काम है, सो मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।
मेरी बातें सुनकर वह उसी क्षण जाने को तैयार हो गया, परन्तु द्वार के पास आकर कुछ इधर- उधर देखकर बोला, ‘क्या, बच्ची को तनिक नहीं देख सकता?’
शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। उसने सोचा हो कि मिनी अब भी पहले की तरह काबुलीवाला, ओ काबुलीवालापुकारती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों के पहले हास- परिहास में किसी प्रकार की रुकावट न होगी। यहाँ तक कि पहले की मित्रता की याद करके वह एक पेटी अंगूर और एक कागज के दोने में थोड़ी- सी किसमिश और बादाम, शायद अपने देश के किसी आदमी से माँग- ताँगकर लेता आया था। उसकी पहले की मैली- कुचैली झोली आज उसके पास न थी।
मैंने कहा, ‘आज घर में बहुत काम है। सो किसी से भेंट न हो सकेगी।
मेरा उत्तर सुनकर वह कुछ उदास- सा हो गया। उसी मुद्रा में उसने एक बार मेरे मुख की ओर स्थिर दृष्टि से देखा। फिर अभिवादन करके दरवाजे के बाहर निकल गया।
मेरे हृदय में न जाने कैसी एक वेदना- सी उठी। मैं सोच ही रहा था कि उसे बुलाऊँ, इतने में देखा कि वह स्वयं ही आ
रहा है।
वह पास आकर बोला-  ये अंगूर और कुछ किशमिश, बादाम बच्ची के लिए लाया था, उसको दे दीजिएगा।
मैंने उसके हाथ से सामान लेकर पैसे देने चाहे, लेकिन उसने मेरे हाथ को थामते हुए कहा-  आपकी बहुत मेहरबानी बाबू साहब! हमेशा याद रहेगी, पैसा रहने दीजिए।थोड़ी देर रूककर वह फिर बोला-  बाबू साहब! आपकी जैसी मेरी भी देश में एक बच्ची है। मैं उसकी याद करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ी- सी मेवा हाथ में ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।
यह कहते हुए उसने ढीले- ढाले कुरते के अन्दर हाथ डालकर छाती के पास से एक मैला- कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला और बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनों हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया।
देखा कि कागज के उस टुकडे पर एक नन्हें से हाथ के छोटे- से पंजे की छाप है। फोटो नहीं, तेल चित्र नहीं, हाथ में थोड़ी- सी कालिख लगाकर, कागज के ऊपर उसी का निशान ले लिया गया है। अपनी बेटी के इस स्मृति-  पत्र को छाती से लगाकर, रहमत हर वर्ष कोलकाता की गली- कूचों से सौदा बेचने के लिए आता है और तब वह कालिख चित्र मानो उसकी बच्ची के हाथ का कोमल स्पर्श, उसके बिछड़े हुए विशाल वक्ष:स्थल में अमृत उड़ेलता रहता हैं।
देखकर मेरी आँखें भर आई और फिर मैं इस बात को बिल्कुल ही भूल गया कि वह एक मामूली काबुली मेवा वाला है, मैं एक उच्चवंश का रईस हूँ। फिर मुझे ऐसा लगने लगा जो वह है, वही मैं भी हूँ। वह भी एक बाप हैं और मैं भी। उसकी पर्वतवासिनी छोटी बच्ची की निशानी मेरी ही मिनी की याद दिलाती है। मंैने तत्काल ही मिनी को बुलाया, हालाँकि इस पर अन्दर घर में आपत्ति की गई, परन्तु मैंने उस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। विवाह के वस्त्रों और अलंकारों में लिपटी हुई बेचारी मिनी मारे लज्जा के सिकुड़ी हुई- सी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
उस अवस्था में देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में हँसते हुए बोला-  लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?’
मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी, अत: अब उससे पहले की तरह उत्तर देते न बना। रहमत की बात सुनकर मारे लज्जा के उसके कपोल लाल- सुर्ख हो उठे। उसने मुँह फेर लिया। मुझे उस दिन की याद आई, जब रहमत के साथ मिनी का प्रथम परिचय हुआ था। मन में एक पीड़ा की लहर दौड़ गई।
मिनी के चले जाने के बाद, एक गहरी साँस लेकर रहमत फर्श पर बैठ गया। शायद उसकी समझ में यह बात एकाएक साफ हो गई कि उसकी बेटी भी इतनी ही बड़ी हो गई होगी और उसके साथ भी उसे अब फिर से नई जान- पहचान करनी पड़ेगी। सम्भवत: वह उसे पहले जैसी नहीं पाएगा। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? सवेरे के समय शरद की स्निग्ध सूर्य किरणों में शहनाई बजने लगी और रहमत कोलकाता की एक गली के भीतर बैठा हुआ अफगानिस्तान के मेरु- पर्वत का दृश्य देखने लगा।
मैंने एक नोट निकालकर उसके हाथ में दिया और बोला-  रहमत! तुम देश चले जाओ, अपनी लड़की के पास। तुम दोनों के मिलन- सुख से मेरी मिनी सुख पाएगी।
रहमत को रुपए देने के बाद विवाह के हिसाब में से मुझे उत्सव- समारोह के दो- एक अंग छाँटकर काट देने पड़े। जैसी मन में थी, वैसी रोशनी नहीं करा सका। अंग्रेजी बाजा भी नहीं आया। घर में औरतें बड़ी बिगडऩे लगीं। सब कुछ हुआ, फिर भी मेरा विचार है कि आज एक अपूर्व ज्योत्स्ना से हमारा शुभ समारोह उज्जवल हो उठा।