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Oct 20, 2015

भोजली

देवी गंगा, देवी गंगा लहर तुरंगा,
अहो देवी गंगा... 
- प्रो. ए. केशरवानी
श्रावण मास में जब प्रकृति अपने हरे परिधान में चारों ओर हरियाली बिखेरने लगती है तब कृषक अपने खेतों में बीज बोने के पश्चात् गांव के चौपाल में आल्हा के गीत गाने में मगन हो जाते हैं। इस समय अनेक लोक पर्वो का आगमन होता है और लोग उसे खुशी- खुशी मनाने में व्यस्त हो जाते हैं। इन्हीं त्योहारों में भोजली भी एक है। कृषक बालाएं प्रकृति देवी की आराधना करते हुए भोजली त्योहार मनाती हैं। अपने अपने घरों में वे टोकनी में मिट्टी भरकर भोजली उगाती हैं।  जिस प्रकार भोजली एक सप्ताह के भीतर खूब बढ़ जाती है, उसी प्रकार हमारे खेतों में फसल दिन दूनी रात चौगुनी हो जाये... कहते हुए जैसे वे भविष्यवाणी करती हैं कि इस बार फसल लहलहायेगी। और वे सुरीले स्वर में गा उठती हैं - 
अहो देवी गंगा ! देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा,
हमर भोजली दाई के भीजे आठों अंगा।
अर्थात् हमारे प्रदेश में कभी सूखा न पड़े। वे आगे कहती हैं-
आई गईस पूरा, बोहाइ गइस कचरा।
हमरो भोजली दाई के, सोन सोन के अचरा।।
 गंगा माई के आगमन से उनकी भोजली देवी का आंचल स्वर्ण रूपी हो गया। अर्थात् खेत में फसल तैयार हो रही है और धान के खेतों में लहलहाते हुए पीले-पीले बाली आंखों के सामने नाचने लगती है। कृषक बालाएं कल्पना करने लगती हैं-
आई गईस पूरा, बोहाइ गइस मलगी।
हमरो भोजली दाई के सोन सोन के कलगी।।
यहां पर धान के पके हुए गुच्छों से युक्त फसल की तुलना स्वर्ण की कलगी से की गई है। उनकी कल्पना सौष्ठव की पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है। फसल पकने के बाद क्या होता है देखिये उसकी एक बानगी -
कुटी डारेन धाने, छरी डारेन भूसा।
लइके लइके हवन भोजली झनि होहा गुस्सा।।
अर्थात् खेत से धान लाकर कूट लिए, इससे हरहर चांवल और भूसा अलग अलग कर लिए हैं। चंूकि यह नन्ही-नन्ही बालिकाओं के द्वारा किया गया है, अत: संभव है कुछ भूल हो गई हो? इसलिए नम्रता पूर्वक वे क्षमा मांग रही हैं। 'झनि होहा गुस्सा' (गुस्सा मत होना) और यह भी कि बांस के कोठे में रखा हुआ अनाज कैसा है इसके बारे में वे कहती हैं-
बांसे के टोढ़ी मा धरि पारेन चांउर,
महर महर करे भोजली के राउर।
समस्त फसलों के राजा धान को बालिका ने बांस के कोठे में रख दिया है जिसके कारण उनकी सुंदर महक चारों ओर फैल रही है। छत्तीसगढ़ में कृषकों का जीवन धान की खेती पर ही अवलंबित होता है अत: यदि फसल अच्छी हो जाये तो वर्ष भर आनंद ही आनंद होगा अन्यथा दुख के सिवाय उनको कुछ नहीं मिलेगा। फिर धान केवल वस्तु मात्र तो नहीं है, वह तो उनके जीवन में देवी के रूप में भी है। इसीलिए तो भोजली देवी के रूप में उसका स्वागत हो रहा है -
सोने के कलसा, गंगा जल पानी,
हमरों भोजली दाई के पैया पखारी।
सोने के दिया कपूर के बाती,
हमरो भोजली दाई
के उतारी आरती।।
अर्थात सोने के कलश और गंगा के जल से ही कृषक बाला उनके पांव पखारेंगी। जब जल कलश सोने का है तो आरती उतारने का दीपक भी सोने का होंना चाहिए। कल्पना और भाव की उत्कृष्टता पग पग पर छलछला रही है... देखिये उनका भाव-
जल बिन मछरी, पवन बिन धान,
सेवा बिन भोजली के तरथते प्रान।
जब भोली देवी की सेवा-अर्चना की है तो वरदान भी चाहिये लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि अपने भाई और भतीजों के लिए, देखिये एक बानगी -
गंगा गोसाई गजब झनि करिहा,
भइया अऊ भतीजा ला अमर देके जइहा।
भारतीय संस्कृति का निचोड़ मानों यह कृषक बाला है,
भाई के प्रति सहज, स्वाभाविक, त्यागमय अनुराग की प्रत्यक्ष मूर्ति! 'देवी गंगा देवी गंगा' की टेक मानों वह कल्याणमयी पुकार हो जो जन-जन, ग्राम ग्राम को नित 'लहर तुरंगा' से ओतप्रोत कर दे। सब ओर अच्छी वर्षा हो, फसल अच्छी हो और चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली हो...!
छत्तीसगढ़ में भोजली का त्योहार रक्षा बंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन संध्या 4 बजे भोजली लेकर गांव की बालिकाएं गांव के चौपाल में इकट्ठा होती हैं और बाजे गाजे के साथ वे भोजली लेकर जुलूस की शक्ल में पूरे गांव में घूमती हैं।
वे गाँव का भ्रमण करते हुए गाँव के गौंटिया/ मालगुजार के घर जाते हैं जहां उसकी आरती उतारी जाती है फिर भोजली का जुलूस नदी अथवा तालाब में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। नदी अथवा तालाब के घाट को पानी से भिगोकर धोया जाता है  फिर भोजली को वहां रखकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है और तब उसका जल में विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर ग्रामीण बालाएँ नये-नये परिधान धारण कर भोजली को हाथ  अथवा सिर में टोकनी में रख कर लाती हैं। वे मधुर कंठ से भोजली गीत गाते हुए आगे बढ़ती हैं। भोजली की बालियों को मंदिरों में चढ़ाया जाता है।
 इस दिन की खास बात यह है कि वे अपनी समवयस्क बालाओं के कान में भोजली की बाली (खोंचकर) लगाकर 'भोजली' अथवा 'गींया' (मित्र) बदने की प्राचीन परंपरा है। जिनसे भोजली अथवा गींया बदा जाता है उसका नाम वे जीवन भर अपनी जुबान से नहीं लेते और उन्हें भोजली अथवा गींया संबोधित करके पुकारते है। माता-पिता भी उन्हें अपने बच्चों से बढ़कर मानते हैं। उन्हें हर पर्व और त्योहार में आमंत्रित कर सम्मान देते हैं।

मित्रता के इस महत्त्व के अलावा वे घर और गाँव में अपने से बड़ों को भोजली की बाली देकर उनका आशीर्वाद लेती हैं तथा अपने से छोटों के प्रति अपना स्नेह प्रकट करती हैं। भोजली, छत्तीसगढ़ में मैत्री का ऐसा सुंदर और पारंपरिक त्योहार है, जिसे आज के युवाओं द्वारा मनाए जाने वाले फ्रेंडशिप डे के मुकाबले कई सौ गुना बेहतर कहा जा सकता है। भोजली बदकर की गई दोस्ती मरते दम तक नहीं टूटती जबकि फे्रंडशिप डे मात्र एक दिन के लिए मौज- मस्ती करने वाली दिखावे की दोस्ती होती है।

बस्तर का दशहरा

    रावण वध का पर्व नहीं है 
  - लाला जगदलपुरी
बस्तर अंचल में आयोजित होने वाले पारम्परिक पर्वों में बस्तर दशहरा सर्वश्रेष्ठ पर्व है। इसका संबंध सीधे महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा से जुड़ा है। पौराणिक वर्णन के अनुसार अश्विन शुक्ल दशमी को माँ दुर्गा ने अत्याचारी महिषासुर को शिरोच्छेदन किया था। इसी कारण इस तिथि को विजयादशमी उत्सव के रूप में लोक मान्यता प्राप्त हुई। जाहिर है कि बस्तर अंचल का दशहरा पर्व रावण वध से संबंध नहीं रखता। बस्तर दशहरा की परम्परा और इसकी जन स्वीकृति इतनी विस्तृत एवं व्यापक है कि निरंतर 75 दिन चलता है। यह अपने प्रारंभिक काल से ही जगदलपुर नगर में अत्यंत गरिमा एवं सांस्कृतिक वैभव के साथ मनाया जाता रहा है।

बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का ही प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई। आदिवासियों ने इसके प्रारंभिक काल से ही बस्तर के राजाओं को हर प्रकार से सहयोग प्रदान किया। जिसका यह परिणाम निकला कि बस्तर दशहरा का विकास एक ऐसी परम्परा के रूप में हुआ जिसका सिर्फ़ आदिवासी समुदाय ही नहीं समस्त छत्तीसगढ़वासी गर्व करते हैं। इस पर्व में अन्नदान पशुदान और श्रमदान की जो परम्परा विकसित हुई उससे साबित होता है कि हमारे समाज में सामुदायिक भावना की बुनियाद अत्यंत मज़बूत है। भूतपूर्व बस्तर राज्य में परगनिया माझी, माँझी मुकद्दम और कोटवार आदि ग्रामीण दशहरे की व्यवस्था में समय से पहले ही मनोयोग से ही जुट जाया करते थे। प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के लिए परगनिया माझी अपने अपने परगनों से सामग्री जुटाने का प्रयत्न करते थे। सामग्री जुटाने का काम दो तीन महीने पहले से होने लगता था। इसके लिए प्रत्येक तहसील का तहसीलदार सर्वप्रथम बिसाहा पैसा बाँट देता था, जिससे गाँव-गाँव से बकरे सुअर भैंसे चावल दाल तेल नमक मिर्च आदि बड़ी आसानी से जुटा लिए जाते थे। सामग्री के औपचारिक मूल्य को बिसाहा पैसा कहते थे। एकत्रिक सामग्री मंगनी चारडरदसराहा बोकड़ा कहलाती थी। सारी सहयोग सामग्री जगदलपुर स्थित कोठी के कोठिया को सौंप दी जाती थी। भूतपूर्व बस्तर रियासत में टेंपिल व्यवस्था के तहत पूर्णत: सार्वजनिक दशहरा मनाया जाता था। समय बदला परिस्थितियाँ बदलीं, समाज बदला और इसके साथ ही मनुष्य का जीवन भी बदला। शासन ने जन भावनाओं का सम्मान करते हुए, इसमें अपनी रचनात्मक भूमिका निर्धारित की। ऐसी भूमिका कि यह परम्परा लगातार विकसित होती रहे।
एक अनुश्रुति के अनुसार बस्तर के चालुक्य नरेश भैराजदेव के पुत्र पुरुषोत्तम देव ने एक बार श्री जगन्नाथपुरी तक पदयात्रा कर मंदिर में एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ तथा स्वर्ण भूषण आदि सामग्री भेंट में अर्पित की थी। इस पर पुजारी को स्वप्न हुआ था। स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी ने राजा पुरुषोत्तम देव को रथपति घोषित करने हेतु पुजारी को आदेश दिया था। कहते हैं कि राजा पुरुषोत्तम देव जब पुरी धाम से बस्तर लौटे तभी से गोंचा और दशहरा पर्वों में रथ चलाने की प्रथा चल पड़ी। राजा पुरुषोत्तम देव ने फागुन कृष्ण चार दिन सोमवार संवत 1465 को 25 वर्ष की आयु में शासन की बागडोर सँभाली थी।
काछिनगादी
बस्तर दशहरा का प्रथम चरण है। काछिनगादी का अर्थ होता है काछिन देवी को गद्दी देना। काछिनदेवी की गद्दी होती है काँटों की। काछिन देवी रणदेवी भी कहलाती हैं। काँटों की गद्दी पर बैठकर काँटों को जीतने का संदेश देती हैं। काछिन देवी बस्तर के मिरगानो की कुलदेवी हैं। अश्विन मास की अमावस्या के दिन काछिनगादी का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस कार्यक्रम के लिए राजा अथवा राजा का प्रतिनिधि संध्या समय धूमधाम के साथ जुलूस लेकर जगदलपुर के पथरागुड़ा मार्ग पर स्थिन काछिनगादी में पहुँच जाता था। आज दंतेश्वरी के पुजारी द्वारा इस कार्यक्रम की अगुवाई की जाती है। मान्यता के अनुसार काछिन देवी धन-धान्य की वृद्धि एवं रक्षा करती हैं। एक परमभक्त सिरहा आवाहन करता है। देवी के आगमन पर झूलेपर सुलाकर उसे झुलाते हैं। फिर देवी की पूजा अर्चना की जाती है और उससे दशहरा मनाने की स्वीकृति प्राप्त की जाती है। काछिन देवी से स्वीकृति सूचक प्रसाद मिलने के पश्चात बस्तर का पारम्परिक दशहरा समारोह बड़ी धूमधाम के साथ प्रारंभ हो जाता है।
नवरात्र जोगी बिठाई
आश्विन शुक्ल 1 से बस्तर दशहरा अपना नवरात्रि कार्यक्रम आरंभ करता है। इस अवसर पर प्रात: स्थानीय दंतेश्वरी मंदिर में सर्वप्रथम कलश स्थापन होता है। इसके अंतर्गत संकल्प पाठ होता है। चंडी हनुमान बगलामुखी और विष्णु आदि देवी देवताओं के जप और पाठ नवरात्र भर चलते रहते हैं। इसी दिन सिरासार प्राचीन टाउन हॉल में जोगी बिठाई की प्रथा पूरी की जाती है। कहा जाता है कि पहले कभी दशहरे के अवसर पर एक कोई वनवासी दशहरा निर्विघ्न संपन्न होने की कामना लेकर अपने ढंग से योग साधना में बैठ गया था। तभी से बस्तर दशहरा के अंतर्गत जोगी बिठाने की प्रथा चल पड़ी है। जोगी बिठाने के लिए सिरासार के मध्य भाग में एक आदमी की समायत के लायक एक गड्ढा बना है। जिसके अंदर हलबा जाति का एक व्यक्ति लगातार 9 दिन योगासन में बैठा रहता है। जोगी इस बीच फलाहार तथा दुग्धाहार में रहता है। जोगी बिठाई के समय पहले एक बकरा और 7 माँगुर मछली काटने का रिवाज था। अब बकरा नहीं काटा जाता केवल माँगुर माछ ही काटे जाते हैं।
रथ परिक्रमा
जोगी बिठाई के दूसरे दिन से रथ चलना शुरू हो जाता है। अश्विन शुक्ल 2 से लेकर लगातार अश्विन शुक्ल 7 तक चार पहिए वाला यह रथ पुष्प सज्जा प्रधान होने के कारण फूलरथ कहलाता है। इस रथ पर आरुढ़ होने वाले राजा के सिर पर फूलों की पगड़ी बँधी होती थी। राजा रथ पर केवल देवी दंतेश्वरी का केवल छत्र ही आरुढ़ रहता है। साथ में देवी का पुजारी रहता है। रथ प्रतिदिन शाम एक निश्चित मार्ग को परिक्रम करता हाँ और राजमहलों के सिंहद्वार के सामने खड़ा हो जाता है। पहले-पहले 12 पहियों वाला एक विशाल रथ किसी तरह चलाया जाता था। परंतु चलाने में असुविधा होने के कारण एक रथ को आठ और चार पहियों वाले दो रथों में विभाजित कर दिया गया। क्योंकि जन श्रुति है कि राजा पुरुषोत्तम देव को जगन्नाथ जी ने बारह पहियों वाले रथ का वरदान दिया था। दशहरे की भीड़ में गाँव-गाँव से आमंत्रित देवी देवताओं के साज बाज आज भी देखने को मिल जाते हैं। उनके छत्र डंगइयाँ घंटे बैरक घंटे शंख तोडिय़ाँ आदि सब अपनी अपनी जगह ठीक ठाक हैं, आज भी लोग श्रद्धा भक्ति से प्रेरित होकर रथों की रस्सियाँ खींचते हैं। रथ के साथ-साथ नाच गाने भी चलते रहते हैं। मुंडा लोगों के मुंडा बाजे बज रहे होते हैं। उनका 'मारÓ (लोक-नृत्य) धमाधम चल रहा होता है। नाइक पाइक माझी कोटवार आदि तो आज भी चल रहे होते हैं, पर पहले सैदार बैदार पडिय़ार और राजभवन के नौकर चाकर भी अपने अपने राजसी पहनावे में चलते रहते हैं। रथ चालन के समय व्यवस्था में अनेक लोग साह के साथ हिस्सा लेते हैं। पहले रथ प्रतिदिन सीरासार चौक से ठीक समय पर चलकर शाम को एक निश्चित समय पर सिंह द्वार के सामने पहुँच जाता है। पहले बस्तर दशहरा में इस रथयात्रा के दौरान हल्बा सैनिकों का वरचस्व रहता था। आज भी उनकी भूमिका उतनी ही जीवंत एवं महत्त्वपूर्ण है। अश्विन शुक्ल 7 को चार पहियों वाले रथ की समापन परिक्रमा चलती है। तत्पश्चात दूसरे दिन दुर्गाष्टमी मनाई जाती है। दुर्गाष्टमी के अंतर्गत निशाजात्रा का कार्यक्रम होता है। निशाजात्रा का जलूस नगर के इतवारी बाज़ार से लगे पूजा मंडप तक पहुँचता है।
जोगी उठाई मावली पर घाव
मावली पर घाव का अर्थ है देवी की स्थापना। अश्विन शुक्ल 9 को संध्या समय लगभग 5 बजे जगदलपुर स्थित सिरासार में बिठाए गए जोगी को समारोह पूर्वक उठाया जाता है। फिर जोगी को भेंट देकर सम्मानित करते हैं। इसी दिन लगभग 9 बजे रात्रि में मावली पर घाव होता है। इस कार्यक्रम के तहत दंतेवाड़ा से श्रद्धापूर्वक दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत किया जाता है। मावली देवी को दंतेश्वरी का ही एक रूप मानते हैं। नए कपड़े में चंदन का लेप देकर एक मूर्ति बनाई जाती है और उस मूर्ति को पुष्पाच्छादित कर दिया जाता है। यही है मावली माता की मूर्ति। मावली माता निमंत्रण पाकर दशहरा पर्व में सम्मिलित होने जगदलपुर पहुँचती हैं। पहले इनकी डोली को राजा कुँवर राजगुरु और पुजारी कंधे देकर दंतेश्वरी मंदिर तक पहुँचाते थे। आज भी पुजारी राजगुरु और राजपरिवार के लोग श्रद्धा सहित डोली को उठा लाते हैं।
विजयादशमी भीतर रैनी
विजयादशमी तथा अश्विन शुक्ल 11 को जगदलपुर में दशहरे की भीड़ पहले अपनी चरमावस्था को पहुँच जाती थी। पर भीड़ अब उतनी नहीं होती। विजयादशमी के दिन भीतर रैनी तथा एकादशी के दिन बाहिर रैनी के कार्यक्रम होते हैं। दोनों दिन आठ पहियों वाला विशाल रथ चलता है। भीतर रैनी अर्थात विजयादशमी के दिन यह रथ अपने पूर्ववर्ती रथ की ही दिशा में अग्रसर होता है। इस रथ पर झूले की व्यवस्था रहती है। जिस पर पहले रथारुढ़ शासक वीर वेश में बैठा झूला करता था। विजयदशमी की शाम को जब रथ वर्तमान नगर पालिका कार्यालय के पास पहुँचता था तब रथ के समक्ष एक भैंस की बलि दी जाती थी। भैंसा महिषासुर का प्रतीक बनकर काम आता था। तत्पश्चात जलूस में उपस्थित राजमान्य नागरिकों को रुमाल और बीड़े देकर सम्मानित किया जाता था। विजयादशमी के रथ की परिक्रमा जब पूरी हो चुकती है तब आदिवासी आठ पहियों वाले इस रथ को प्रथा के अनुसार चुराकर कुमढ़ाकोट ले जाते हैं।
बाहिर रैनी
कुमढ़ाकोट राजमहलों से लगभग दो मील दूर पढ़ता है। कुमढ़ाकोट में राजा देवी को नया अन्न अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते थे। बस्तर दशहरे की शाभा यात्रा में कई ऐसे दृश्य हैं जिनके अपने अलग-अलग आकर्षण हैं और जनसे पर्याप्त लोकरंजन हो जाता है। राजसी तामझाम के तहत बस्तर दशहरे के रथ की प्रत्येक शोभायात्रा में पहले सुसज्जित हाथी घोड़ों की भरमार रहती थी। मावली माता की वह घोड़ी याद आती है जिसे चाँदी के जेवरों से सजाया जाता था। उसके पावों में चाँदी के नूपुर बजते रहते थे और माथे पर चाँदी की झूमर झूलता था। उसकी पीठ के नीचे तक एक ज़रीदार रंगीन साड़ी झिलमिलाती रहती थी। विगत दशहरे में एक सुसज्जित घोड़े पर सवार मगारची नगाड़े बजा- बजा कर यह संकेत देता चलता था कि पुजारी समेत देवी दन्तेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ होने या उतारने में कितना समय और शेष है। पहले भीतर रैनी और बाहिर रैनी के कार्यक्रमों में धनु काँडेया लोगों की धूम मची रहती थी। भतरा जाति के नवयुवक धनुकाँडेया बनते थे। उनकी वह पुष्प सज्जित धधारी देह सज्जा देखते ही बनती थी। धनु काँडेया रथ खींचने के लिए आदिवासियों को पकड़ लाने के बहाने उत्सव की शोभा बढ़ाते थे। वे रह-रह कर आवाज़ करते, इधर उधर भागते फिरते नजऱ आते थे। बाहिर रैनी का झूलेदार रथ कुम्हड़ाकोट से चलकर धाने की ओर से सदर रोड होते हुए सदर प्राथमिक शाला के निकट के चौराहे से गुज़रता है। सिंह द्वार तक पहुँचते पहुँचते उसे रात हो जाती है।
मुरिया दरबार
अश्विन शुक्ल 12 को प्रात: निर्विघ्न दशहरा संपन्न होने की खुशी में काछिन जात्रा के अंतर्गत काछिन देवी को काछिनगुड़ी के पासवाले पूजामंडप पर पुन: सम्मानित किया जाता है। इसी दिन शाम को सीरासार में लगभग 5 बजे से ग्रामीण तथा शहराती मुखियों की एक मिली जुली आसंभा लगती थी। जिसमें राजा प्रजा के बीच विचारों का आदान प्रदान हुआ करता था। विभिन्न समस्याओं के निराकरण हेतु खुली चर्चा होती थी। इस सभा को मुरिया दरबार कहते थे। बस्तर दशहरे का यह एक सार्थक कार्यक्रम था। वैसे आदिवासी दरबार आज भी चल रहा है। इसी के साथ गाँव-गाँव से आए देवी देवताओं की विदाई हो जाती है।
ओहाड़ी
और अंत में अश्विन शुक्ल 13 को प्रात: गंगा मुणा स्थित मावली शिविर के निकट बने पूजा मंडप पर मावली माई के विदा सम्मान में गंगा मुणा जात्रा संपन्न होती है। इस कार्यक्रम को ओहाड़ी कहते हैं। पहले बस्तर दशहरा के विभिन्न जात्रा कार्यक्रमों में सैकड़ों पशुमुंड कटते थे जात्रा का अर्थ होता है यात्रा अर्थात महायात्रा (बलि)। बस्तर अंचल शाक्तों (शक्तिपूजकों) का अंचल है। पर आज यह प्रथा बंद हो गई है।
बस्तर दशहरा बहु आयामी है। धर्म, संस्कृति, कला, इतिहास और राजनीति से इसका प्रत्यक्ष संबंध तो जुड़ता ही है साथ-साथ परोक्ष रूप से बस्तर दशहरा समाज की उच्च एवं परिष्कृत सांस्कृतिक परम्परा का साक्षी भी बनता है। आज का बस्तर दशहरा पूर्णत: दंतेश्वरी का दशहरा है। बस्तर दशहरे की यह एक तंत्रीय पर्व प्रणाली आज के बदलते जीवन मूल्यों में भी दर्शकों को आकर्षित करती चल रही है। यह इसकी एक बड़ी बात है। कहना न होगा आज का जो बस्तर दशहरा हम देख रहे हैं वह हमें अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ता है। एक ऐसा अतीत जो बस्तर के आदिवासियों की अमूल्य धरोहर है किंतु जिस पर संपूर्ण भारतवासी गर्व करते हैं।

मितान बधई

 मित्रता की 
अनूठी परम्परा

- डॉ. कौशलेन्द्र
आज जिसे आप छत्तीसगढ़ राज्य के नाम से जानते हैं, पहले वह मध्यप्रदेश का एक भाग हुआ करता था, और उससे भी पहले, त्रेतायुग में यही राज्य दक्षिणकोशल के नाम से विख्यात था। राज्यों की सीमाएँ तो बनती-मिटती रहती हैं किंतु उस भूभाग पर रहने वाले समाज की भाषा और संस्कृति अमिट होती है। उथल-पुथल करने वाली विविध घटनाओं से भरे इस परिवर्तनशील जगत में समाज ने न जाने कितने चोले बदले हैं किंतु समाज है कि हर बार अपनी परम्पराओं के सहारे उठकर खड़ा हो जाता है आगे... और आगे की यात्रा के लिये। पुराने परिधानों का स्थान नये परिधान ले लेते हैं, आत्मा वही बनी रहती है।
लम्बे समय तक अक्षुण्ण बनी रहने वाली परम्पराओं का सीधा संबन्ध मानव समाज की उन कोमल भावनाओं से होता है जो पुष्प की तरह अपनी सुगंध दूर-दूर तक बिखेरती रहती हैं। हमारी आस्थाएँ इन परम्पराओं को कालजयी दृढ़ता प्रदान करती हैं। परम्पराएँ न होतीं तो समाज कब का बिखर गया होता। ये परम्पराएँ ही हैं जो सात समन्दर पार भी देश की माटी के सोंधेपन से हमें बाँधे रखती हैं। जीवन में सुख हो या दु:ख विविध रंग अपने में समेटे ये परम्पराएँ हमारे जीवन को ऊर्जा से भर देती हैं और नाना व्यवधानों के बाद भी जीवन को आगे बढ़ाती रहती हैं।
 मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की माँ कौशल्या की जन्मस्थली होने केर श्रेय से गौरवान्वित इस छत्तीसगढ़ में सदियों से प्रचलित एक ऐसी परम्परा भी है जो पूरे विश्व में अपने तरह की अनूठी, अद्भुत और अतुलनीय है। विश्व मानवसमाज के इतिहास में ऐसी श्रेष्ठ परम्परा का उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता। दक्षिण कोशल की यह सनातन धरोहर है जो जातिभेद, धर्मभेद और वर्गभेद को भेदती हुयी अनेक अवरोधों को धराशायी करती हुयी हृदय को हृदय से जोड़ती है। आर्य समूह के राम की वनवासी समूह के सुग्रीव के साथ मित्रता इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। समाजवाद का इससे अच्छा स्वरूप देखने को अन्यत्र कहाँ मिलेगा!  पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेम और सद्भाव की पवित्र गंगा बहाने वाली यह वही श्रेष्ठतम परम्परा है जिसे 'मितान बधई' के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ की यह परम्परा यहाँ के ग्राम्य एवं वनांचलाश्रित उस सच्चे सीधे समाज की व्यवस्था है जिसे लोग अत्यंत पिछड़े समाज के रूप में जानते हैं किंतु आश्चर्य है कि इस पिछड़े समाज की अनेक परम्पराएँ सभ्य समाज की परम्पराओं से कहीं अधिक उत्कृष्ट, व्यावहारिक, पवित्र और वैज्ञानिक हैं। विश्व के सभ्य समाज को अभी इस पिछड़े समाज से बहुत कुछ सीखना होगा।
संवत 2064... यांत्रिक उपलब्धियों एवं चमत्कारों की पराकाष्ठा की ओर बढ़ते कलियुग के चरण का एक और काल। दिक् और काल को अपने नियंत्रण में करता सा प्रतीत होता मनुष्य अपने विजय अभियान की ओर अग्रसर है। आर्थिक समृद्धि ने विलासिता के विभिन्न द्वार खोल दिये हैं। तीव्रगति वाहनों के कारण सिमटती दूरियों ने सुदूर देशों को भी पास-पास ला खड़ा किया है। आदान-प्रदान और भी सुगम हो गया है। आपसी स्पर्धाएँ एक प्रकार के युद्ध में परिणित होती जा रही हैं। यह युद्ध भारत की प्राचीन संस्कृति पर अपसंस्कृति के दुष्प्रभाव का ही परिणाम है। इस युद्ध में सांस्कृतिक मूल्यों की बलि चढ़ती है, मानवता पर यांत्रिक दानवता प्रभावी हो जाती है और विलासिता में डूबा समाज पतन की ओर अग्रसर होने लगता है। आज हम इसी के प्रभाव में आकर अपने आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों को खोते जा रहे हैं। वैचारिक युद्ध घमासान हो उठा है और हमें अपने आपको तथा अपनी पीढ़ी को बचाना है।
 वृहत्तर भारत की भौगोलिक सीमाएँ बीसवीं शताब्दी में देश की स्वतंत्रता के साथ ही सिमट गयीं और सीमांत प्रदेशों का अस्तित्व संकटों से घिर गया। इससे भी अधिक संकट हमारी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और भाषा पर छाया हुआ है। पिछले साठ वर्षों में भारतीय समाज को अपने सांस्कृतिक मूल्यों, सभ्यता और भाषा की भारी क्षति उठानी पड़ी है। विश्व में ऐसे अनेक मानव समुदाय रहे हैं जो अपनी संस्कृति और भाषा की रक्षा नहीं कर सके और इस धरती से सदा-सदा के लिये लुप्त हो गए। हमें इनके दूरगामी परिणामों पर गम्भीर मनन करना होगा। अस्तित्व की रक्षा के इस प्रयास में हमें पीछे लौटना होगा ..अपने अतीत की ओर। उन सांस्कृतिक मूल्यों को अपना कर पुनर्जीवित करना होगा जिनके कारण हमारा अतीत गौरवशाली रहा है और हम श्रेष्ठ कहलाने के अधिकारी बन सके। हमारे अतीत में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का सन्देश है, 'अतिथि देवो भव' का संदेश है, 'यत्र पूज्यते नारी, रमंते तत्र देवता' का संदेश है, 'सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवाव है'... का सन्देश है।
 इसी वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओतप्रोत है छत्तीसगढ़ की 'मितान बधई' परम्परा। आज इसकी प्रासंगिकता और उपादेयता और भी महत्तवपूर्ण हो गयी है। आधुनिक फ्रेंडशिप-डे और वैलेंटाइन-डे ने मितान परम्परा का कलेवर लेने का असफल प्रयास किया है किंतु उसके पवित्र भाव को, उसकी आत्मिक सुगन्ध की व्यापकता को अपने में समाहित नहीं कर सके। मितान बधई का कोई एक निश्चित दिन नहीं होता, यह तो पूरे वर्ष भर चलने वाला पर्व है जिसमें निरंतर बहने वाली नदी के प्रवाह जैसा भाव है, जिसके निर्मल जल को पीकर कभी भी तृप्त हुआ जा सकता है।
'मितान' शब्द प्रेम के छलकते प्याले सा प्रतीत होता है जिसका आकर्षण ही अपने आप में विशिष्ट है। आज के युग में सच्चा मित्र मिलना दुर्लभ है किंतु मितान तो सदा-सदा के लिये आपका घनिष्ठ सम्बन्धी हो जाता है, यही इस परम्परा की दुर्लभ विशिष्टता है। यदि आप द्वापरयुग के कृष्ण और सुदामा की मित्रता की खुश्बू का अनुभव करना चाहते हैं तो एक बार छत्तीसगढ़ आकर किसी को अपना 'मितान' बना लीजिये और पीढिय़ों तक निश्ंिचत होकर इस दुर्लभ खुश्बू से सराबोर होते रहिये। ग्राम्य संस्कृति की यही देन कालांतर में पूरे छत्तीसगढ़ समाज की सांस्कृतिक धरोहर बन गयी। आवश्यकता तो इस बात की है कि अब यह पूरे विश्व मानव की सांस्कृतिक धरोहर बन जाये।
कलियुग के वर्तमान कालखण्ड में भौतिक प्रगति के साथ-साथ स्वार्थपरता ने मानव समाज को न जाने कितने खण्डों में बाँट रखा है। सहजता का स्थान कृत्रिमता ने और सुकोमल भावनाओं का स्थान भावशून्य औपचारिकताओं ने ले लिया है। दुर्भाग्य से देवस्थान हिमालय से उद्गमित पवित्र नदियों के अस्तित्व पर घिर आये संकट की तरह हमारी मितान परंपरा पर भी लुप्त होने का संकट घिर आया है। हमें इस प्रेमासिक्त धरोहर को किसी भी तरह बचाना ही होगा। आज पूरा विश्व आतंकवाद के साये में जीने को विवश है। कब कोई मानव बम हमारे प्राण ले लेगा, कब कोई भयानक विस्फोट हमारी निजी और राष्ट्रीय संपत्तियों को नष्ट कर धूल-धूसरित कर देगा, हममें से कोई नहीं जानता। हम सब कितनी दु:खद त्रासदी में जीने के लिये बाध्य हो गये हैं। विभिन्न सुख-सुविधायें और विलासिता के साधन कितने अर्थहीन हो जाते हैं जब अनायास किसी भयानक विस्फोट में यात्रियों से भरी किसी ट्रेन के वीभत्स और कारुणिक दृश्य पूरी मानवता को हिलाकर रख देते हैं। बड़ी-बड़ी सरकारें आतंकवाद के सामने असहाय सी प्रतीत होती हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि संप्रभुता संपन्न बड़ी-बड़ी सरकारों को अपने प्रचार माध्यमों से अपने नागरिकों को आते-जाते, उठते-बैठते संभावित अनिष्ट से बचने के लिये सतर्क रहने का आग्रह करना पड़ रहा है। लोग अपने ही देश की धरती पर भयमुक्त होकर जी पाने से वंचित हो गये हैं। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि अपने नागरिकों के प्राणों और संपत्तियों की रक्षा का जो स्वाभाविक दायित्व शासन का होता है वह अब स्वयं हमें ही उठाना होगा। अराजकता और असहायता की यह अत्यंत भयावह स्थिति है जो समाज को किसी अनिष्ट की दिशा में भी मोड़ सकती है। सरकारी उपाय सफेद हाथी बनकर रह जाते हैं और आतंकी घटनायें मानवता को तार-तार करती रहती हैं। इस सब चीत्कार के मध्य जब हम सहायता के लिये इधर-उधर ताकते हैं तो आशा की एक सशक्त किरणपुंज के रूप में छत्तीसगढ़ की मितान परंपरा समाधान के रूप में प्रस्तुत हो हमें अभिभूत कर जाती है। यह वह उदार परंपरा है जो जाति नहीं देखती, धर्म नहीं देखती, छोटा-बड़ा नहीं देखती... देखती है तो बस कोमल अंतस का सहज प्रेम जो निर्झर सा बहते रहने को भरा बैठा है। प्रेम की यह धार अनेक सामाजिक बंधनों को तोड़ती हुयी, अनेक अन्य संबन्धों को जोड़ती हुयी पीढिय़ों तक बहती रहती है। एक बार मितान बंधन में बंध जाने के बाद फिर कोई पराया नहीं रह जाता। मितान संबन्ध इतने घनिष्ठ होते हैं कि एक पक्ष के संबन्धी भी दूसरे पक्ष के संबन्धी बन जाते हैं। यह व्यष्टि से समष्टि की प्रेमपूर्ण यात्रा है। आश्चर्य जनक रूप से रक्त संबन्धों से भी अधिक घनिष्ठ होते हैं मितान संबन्ध। दो मितान कई पारिवारिक संबन्धों को प्रेमसूत्र में पिरोकर उत्कृष्ट मानवीय संबन्धों का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यहाँ कोई साक्षी नहीं होता, कोई वचन लिपिबद्ध नहीं होते, कोई बाध्यता नहीं होती फिर भी निष्छल प्रेम की ऊर्जा सामाजिक संबन्धों को घनिष्ठतम् एवं सुदृढ़तम् बना देने के लिये पर्याप्त होती है। ये संबन्ध ब्रिटेन के अलिखित संविधान की तरह सहज भाव से चलते रहते हैं। न्यायालयों में साक्षियों की उपस्थिति में बनने वाले संबन्ध न्यायिक बाध्यताओं के बाद भी प्रेम के स्थायित्व को सुनिश्चित नहीं करते, किंतु मितान संबन्ध किसी भी बाध्यता के बंधनों से मुक्त केवल प्रेम की अजस्र धारा बहाते रहने के लिये चिरप्रतिज्ञ है। आधुनिक संबन्धों के खोखलेपन और अस्थिरता के इस युग में छत्तीसगढ़ की यह सांस्कृतिक धरोहर और भी प्रासंगिक हो गयी है।
   आइये, माता कौशल्या की इस जन्मभूमि को कोटि-कोटि प्रणाम करते हुये हम उसी प्राचीन सांस्कृतिक-सामाजिक धरोहर को संरक्षित करने का संकल्प लेकर मितान परंपरा को पुनर्जीवित करने के साथ ही यह संदेश देकर पूरे विश्व का आह्वान करें कि आतंकवाद से जूझने का उपाय छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में है। वे यहाँ आयें, स्वयं इससे अभिभूत हो जायें और यदि पायें कि हृदय में कोई स्पन्दन उठने लगा है तो विश्व के कोने-कोने में फैला दें इस पवित्र संदेश को। छत्तीसगढ़ की धरोहर पूरे विश्व में मानवता की पवित्र धरोहर बन जाये और आतंकवाद अतीत का दु:स्वप्न बनकर किसी कृष्णविवर में खो जाये। हमें अपने अतीत को स्मरण करते हुये वर्तमान को गढऩा है ताकि भविष्य के भय से मुक्त हो अपनी जीवन यात्रा सफल बना सकें।                                
सम्पर्क: शासकीय कोमलदेव जिला चिकित्सालय
कांकेर उत्तर-बस्तर छ.ग. 494334,
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लछमी जगार

       लोक गायन का महापर्व
- हरिहर वैष्णव
प्राय: धान की फसल कटने के साथ ही शीत ऋतु में किसी भी समय आरम्भ हो कर अधिकतम 11 दिनों तक चलने वाला लोक महापर्व लछमी जगार विभिन्न संस्कारों से आबद्घ अनुष्ठान है जो यद्यपि महिलाओं द्वारा पूरे किये जाते हैं, किन्तु पूरी तरह महिलाओं द्वारा कहा जाना समीचीन नहीं होगा। कारण, पुरुष भी इस आयोजन में सहभागी होते हैं और अपवाद स्वरूप जगार-गायक भी। यह आयोजन यों तो सप्ताह के किसी भी दिन आरम्भ हो सकता है किन्तु समाप्ति गुरुवार को ही होती है। इस दिन सारी रात गायन होता है। लोक महाकाव्य लछमी जगार का गायन इस महापर्व का प्रमुख आकर्षण होता है जिसे दो गुरुमाँयें गाती हैं।
जगार शब्द हिन्दी के जागरण (और संस्कृत के यज्ञ) शब्द से प्रादुर्भूत है। देवताओं को निद्रा से जगाना और अन्न की उपज इसके मूलभूत अभिप्राय हैं। यह आयोजन उत्सव-धर्मी होता है। विशेष रूप से अन्तिम दिन जब अनुष्ठान अपने चरम पर होता है और माहालखी यानी धान (महालक्ष्मी) का विवाह नरायन राजा के साथ सम्पन्न होता है। यह विवाह सांकेतिकता के साथ नहीं अपितु वास्तविकता के साथ सम्पन्न होता है। नृत्य और गायन की छटा देखते ही बनती है। लछमी जगार का आयोजन किसी समुदाय अथवा व्यक्ति विशेष के द्वारा भी हो सकता है। इसमें आयोजक अपनी पत्नी के साथ गाथा के अनुरूप पात्रों की भूमिका भी निभाते देखे गये हैं। इसके आयोजन के विषय में लोगों का कहना है कि यह प्राय: सुख-समृद्घि की कामना से आयोजित किया जाता है।
लछमी जगारज् का आयोजन छत्तीसगढ़ प्रान्त के अन्तर्गत अविभाजित बस्तर जिले के जगदलपुर एवं कोंडागाँव तहसील तथा नारायणपुर, दन्तेवाड़ा और बीजापुर तहसील के कुछ भागों में किया  जाता है। यह अनुष्ठान बस्तर की मौखिक परम्पराओं का ही एक अंग है जिसमें अन्य चीजों के साथ ही वर्षा ऋतु में सम्पन्न होने वाला एक अन्य मौखिक लोक महाकाव्य तीजा जगार (धनकुल) भी सम्मिलित है। इसी तरह पूर्व दिशा में, ओडि़सा प्रान्त में, हमें च्बाली जगारज् नामक एक मौखिक लोक महाकाव्य मिलता है जिसका आयोजन ग्रीष्म ऋ तु में होता है। हमने इसका आयोजन नवरंगपुर में होना पाया है।  नृतत्वशास्त्री टीना ओटेन  कोरापुट (ओडि़सा) में प्रचलित बाली जगार के एक भिन्न संस्करण की जानकारी देती हैं। यद्यपि इन लोक महाकाव्यों की कथा-वस्तु आदि में पर्याप्त भिन्नता है तथापि इनकी आपस में समानता का बिन्दु है इनका गायन महिलाओं द्वारा किया जाना, और धनकुल नामक वाद्य, जिसका वे वादन करती हैं।  इस परम्परा का विस्तार दण्डकारण्य के प्राय: उस मैदानी भू-भाग में पाया जाता है जो इन्द्रावती नदी के तट पर है तथा जिसे दण्डकारण्य का हृदय-स्थल कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि धान और अन्य गौण अनाज इस भू-भाग की प्रमुख उपज हैं, और जैसा कि हम यहाँ देखेंगे, यह पूरा क्षेत्र धान-उत्पादक पूर्वी भारत तथा गौण अन्न-उत्पादक पचिमी भारत की सीमा पर स्थित है। न केवल यह अपितु दण्डकारण्य का यह विस्तृत पठार द्रविड़ भाषा-भाषी दक्षिण भारत एवं भारोपीय भाषा-भाषी उत्तर भारत की भी सीमा पर स्थित है, किन्तु सांस्कृतिक रूप से यह उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं दिखलायी पड़ता क्योंकि बाली जगार भारोपीय भाषाओं (ओडि़या एवं देसया) तथा द्रविड़ भाषा-परिवार की लोक-भाषा (पेंगो या जानी) में भी गाया जाता है।
बहरहाल, लछमी जगार लोक महापर्व में गाये जाने वाले लोक महाकाव्य लछमी जगार का गायन प्रमुखत: महिलाओं द्वारा किया जाता है। प्रमुख गायिका पाट गुरुमाँय कहलाती है। उसकी एक या दो सहायिकाएँ होती हैं, जिन्हें चेली गुरुमाँय कहा जाता है। प्राय: पाट गुरुमाँयें दादी या नानी की उम्र की होती हैं जबकि चेली गुरुमाँयें माँ की उम्र की। ये गुरुमायें प्राय: 30 वर्ष की आयु से, जब उनके बच्चे बड़े हो चुकते हैं तथा घर-गृहस्थी के उनके उत्तरदायित्व प्राय: कम हो जाया करते हैं, गायन सीखना आरम्भ करती हैं। यहां यह उल्लेख अनिवार्य होगा कि जगार-गायन किसी समुदाय या जाति विशेष की विशेषज्ञता नहीं होती। ये गायिकाएँ किसी भी समुदाय या जाति से हो सकती हैं। उदाहरण के तौर पर: जगदलपुर क्षेत्र में धाकड़, मरार, केंवट, बैरागी और कलार, कोंडागाँव क्षेत्र में गांडा, घड़वा, बैरागी, मरार, कलार आदि जातियों की गुरुमाँयें जगार गायन करती दिखलायी पड़ती हैं। इन गुरुमाँओं को उनके गायन के लिये कोई धनराशि नहीं दी जाती अपितु उसकी जगह आयोजक द्वारा जगार की समाप्ति पर सामथ्र्यानुसार ससम्मान भेंट दी जाती है। यह भेंट कपड़ों एवं चावल-दाल आदि की शक्ल में होती है।
प्रमुख जगार गायिकाओं में से एक सुकदई गुरुमाँय संगीतकार/ ग्राम प्रहरी (कोटवार) समुदाय से सम्बद्घ हैं और कोंडागांव कस्बे के सरगीपालपारा नामक मोहल्ले में रहती हैं। यह समुदाय यहां का मूल निवासी है। संगीत-साधना (वादन) इस समुदाय के पुरुषों को विरासत में मिली है और उन्हीं तक सीमित भी है। वे तीन से पांच के समूह में होते हैं तथा विवाह और अन्य धामिर्क अनुष्ठानों के अवसर पर वादन करते हैं। पहला व्यक्ति मोहरी (शहनाईनुमा वाद्य), दूसरा निसान या नगाड़ा, तीसरा टुड़बुड़ी (ताल वाद्य), चौथा ढोल तथा पाँचवां ढपरा (ढपली) बजाता है। इस समुदाय के लोग, जैसा कि ऊपर कहा गया है, कोटवार तथा चरवाहे के रूप में भी अपनी सेवाएं समाज को देते आ रहे हैं। इस समुदाय के लोगों के पास अपनी कृषि-भूमि थी किन्तु धीरे-धीरे इनमें से अधिकांश लोगों ने अपनी भूमि बाहर से यहाँ आ बसे लोगों के हाथों बेच डाली। यह स्थिति प्राय: गाँव से कस्बे और शहरों में परिवर्तित होते स्थानों में, उदाहरण के तौर पर, कोंडागाँव (सरगीपालपारा), जगदलपुर, नारायणपुर आदि में बनती गयी है। आज इनकी आजीविका का साधन दैनिक मजदूरी रह गयी है। जहां तक जगार गायन से जुडऩे का सवाल है, अपवाद स्वरूप ही सुकदई जैसी महिलाएँ गायिकाएँ बन पाती हैं। कारण, पितृसत्तात्मक समाज में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कि महिलाएँ अपने किसी ज्ञान या विज्ञान को धरोहर के रूप में आगे ले जा सकें। हाँ, विवाह में महिलाएँ अपने पति के कौटुम्बिक क्रिया-कलापों में अवश्य सहभागी होती हैं। सुकदई के परिवार में उनके पिता की बहिन दुआरी  के पहले कोई भी जगार गायिका नहीं हुई थी। दुआरी ने जगार-गायन निकटस्थ गाँव बम्हनी की पनका जाति की एक महिला से सीखा था। सुकदई और उनकी तीन चचेरी बहिनों ने दुआरी से। सुकदई की चाची आयती ने भी दुआरी से ही जगार-गायन की शिक्षा ली तथा अपनी बहिन की तीन बेटियों को सिखाया। इस तरह सुकदई और उनकी निकट सम्बंधी जगार गायिका बनीं। गुरुमाँय सुकदई लछमी जगार एवं तीजा जगार (धनकुल) दोनों ही लोक महाकाव्यों का गायन करती हैं; साथ ही अनेकों लोक गीत और लोक गाथाएँ भी गाती हैं, जिनका सम्बन्ध पूरी तरह मनोरंजन से है। वे कोंडागाँव की शीर्षस्थ जगार-गायिकाओं में गिनी जाती हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से कोंडागाँव की दर्जन भर से अधिक गुरुमाँओं को जानता हूं, किन्तु संभवत: इनकी सही गणना कर पाना बहुत ही कठिन होगा। कारण, बस्तर के जन-जीवन में लोक गीत का गायन सहज एवं स्वाभाविक है और प्राय: प्रत्येक महिला किसी न किसी स्तर पर लोक गायिका है।
 कोंडागाँव एवं इसके आसपास धनकुल नामक इस वाद्य-यन्त्र के विभिन्न उपकरणों यथा, धनुष को धनकुल डांडी, डोरी को झिकन डोरी, बाँस की कमची को छिरनी काड़ी, हण्डी को घुमरा हांडी, हण्डी के मुँह पर ढंके जाने वाले सूपा को ढाकन सुपा, हण्डी के आसन को आंयरा या बेंडरी तथा मचिया को माची कहा जाता है। घुमरा हांडी आंयरा या बेंडरी के ऊपर तिरछी रखी जाती है। आंयरा या बेंडरी धान के पैरा (पुआल) से बनी होती है। तिरछी रखी घुमरा हांडी के मुँह को ढाकन सुपा से ढंक दिया जाता है। इसी ढाकन सुपा के ऊपर धनकुल डांडी का एक सिरा टिका होता है तथा दूसरा सिरा जमीन पर। धनकुल डांडी की लम्बाई लगभग 2 मीटर होती है। इस के दाहिने भाग में लगभग 1. 5 मीटर पर 8 इंच की लम्बाई में हल्के खांचे बने होते हैं। गुरुमाँयें दाहिने हाथ में छिरनी काड़ी से धनकुल डांडी के इसी खांचे वाले भाग में घर्षण करती हैं तथा बायें हाथ से झिकन डोरी को हल्के-हल्के खींचती हैं। घर्षण से जहां छर-छर-छर-छर की ध्वनि नि:सृत होती है वहीं डोरी को खींचने पर घुम्म-घुम्म की ध्वनि घुमरा हांडी से निकलती है। इस तरह ताल वाद्य और तत वाद्य का सम्मिलित संगीत इस अद्भुत लोक वाद्य से प्रादुर्भूत होता है। यद्यपि इसके विपरीत ओडि़सा के नवरंगपुर जिले में प्रयुक्त धनकुल वाद्य का धनुष अपेक्षाकृत बड़ा होता है तथा इसके वादन में भी भिन्नता है, किन्तु यह अतिरंजित नहीं कि दण्डकारण्य के पठार में प्रचलित यह वाद्य अपने आप में मौलिक एवं अनूठा है।
दक्षिण तमिलनाडु में भी यद्यपि धनुर्संगीत का प्रचलन पाया जाता है किन्तु वहाँ इसका स्वरूप भिन्न है। भारत में धनुर्संगीत के अन्य रूपों की भी थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है किन्तु उदाहरण कम ही देखने में आये हैं।
प्रत्येक गायिका की अपनी अलग गायन-शैली है जिससे वे अलग से ही पहचानी जाती हैं। ऑस्ट्रेलियन नेानल यूनिवर्सिटी में संगीत विलेषक डॉ. पीटर टोनर सुकदई गुरुमायं के गायन की अलग-अलग दो पंक्तियों में चार प्रकार की लय पाते हैं। लम्बी लय-युक्त पंक्तियों में 40 थाप की समयावधि से युक्त लय तथा छोटी लय-युक्त पंक्तियों में 20 थाप की समयावधि से युक्त लय। एक अन्य प्रकार की पंक्ति में वे अन्तिम चार थापों को सुसुप्त पाते हैं। ये गीत-पंक्तियाँ सुनियोजित हैं। प्रत्येक 20 थाप से युक्त पंक्ति सुनियोजित छंद के एक चरण का आभास देती है जबकि 40 थाप-युक्त पंक्ति दो का। काव्यत्व की दृष्टि से इस लोक महाकाव्य में अनेक रुझानों की सहज ही पहचान की जा सकती है यथा : खिला कमल का फूल बाबा/ खिला कमल का फूल में सामान्य पुनरावृत्ति; जलराशि में है ओ बाबा/ क्षीर-समुद्र में है में समतुल्यता तथा दोनों भाई हैं ओ बाबा/ दोनों को बाढ़ बहा ले जातीज में प्रस्तुति अथवा कल्पना वैविध्य। इस गीत की काव्यात्मकता और संगीतात्मकता के कारण कथा का विकास अत्यंत मन्थर किन्तु रसमय गति से होता है।
अन्य मौखिक महाकाव्यों की बुनावट में जहाँ हम घटनात्मकता पाते हैं वहीं लछमी जगार की बुनावट में अनूठी विवरणात्मकता और इतिवृत्तात्मकता। गुरुमाँय सुकदई द्वारा गाया गया च्लछमी जगारज् चार स्पष्ट खण्डों में संयोजित है। पहला खण्ड आरम्भिक है (अध्याय 1) जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति की कथा है। अन्य दो खण्ड कथा-वस्तु को सामने रखते हैं। इन दोनों खण्डों में मूल कथा प्रवाहित एवं व्याख्यायित होती है। खण्ड 2 (अध्याय 2 से 12) में मेंगइन रानी की कथा है जबकि खण्ड 3 (अध्याय 13 से 16) में पारबती रानी की। अन्तिम खण्ड (खण्ड 4: अध्याय 17 से 36) में कथा-वस्तु का विकास, चरमोत्कर्ष, निर्गति तथा परिणाम या फलागम सम्मिलित हैं। इन्हें संक्षेप में इस तरह देखा जा सकता है:
1. व्याख्या : मेंगराजा (शाब्दिक अर्थ मेघ) अपनी पत्नी मेंगइन रानी के हठ के कारण मेंगइन रानी के साथ अपने लोक उपरपुर (ऊर्ध्व लोक) से मंजपुर (मर्त्य लोक) अर्थात् धरती पर आते हैं। यहाँ आने पर धरती के लोग न केवल उनका सम्मान करते हैं अपितु उन्हें अपना राजा-रानी भी बनाते और उनके लिये प्रासाद का भी निर्माण करते हैं। इसी समय कैलासपुर नामक एक अन्य नगर में माहादेव (महादेव, शिव) अपनी पत्नी पारबती (पार्वती) के हठ के वाशीभूत हो कृषि-कार्य में संलग्न होते हैं और धान बोते हैं। किन्तु एक भ्रान्ति के कारण वे सारी की सारी फसल में आग लगा देते हैं। फसल में लगी आग का धुआँ जब ऊपर उठ कर ऊर्ध्व लोक तक जा पहुंचता है तब देव गण आ कर उसे बुझाते हैं। आग बुझाने पर जो धान बचा रह जाता है उसी से धान की अनेक किस्में बन जाती हैं।
2. विकास : मेंगइन रानी सन्तान-प्राप्ति के लिये आतुर हो कर अपने पति मेंगराजा को माहादेव के पास आम के लिये भेजती हैं। माहादेव मेंगराजा को इस शर्त के साथ कि यदि उनके यहाँ पुत्री का जन्म होता है तो वे उसका विवाह उनके छोटे भाई नरायन के साथ करेंगे, मेंगराजा को आम का फल देते हैं। मेंगराजा उनकी शर्त मान कर घर वापस होते हैं और फल रोप देते हैं। कालान्तर में फल अंकुरित हो कर पेड़ होता है और यथा समय उसमें फल आता है। मेंगइन रानी उस फल का सेवन करती हैं और इसके फलस्वरूप उन्हें गर्भाधान होता है। यथा समय एक कन्या का जन्म होता है, जिसे माहालखी (लछमी, लखी और हिन्दी में लक्ष्मी या महालक्ष्मी) नाम दिया जाता है। माहालखी युवावस्था को प्राप्त होने पर मंजपुर से गोपपुर चली जाती हैं और वहीं  रहने लगती हैं।
3.चरमोत्कर्ष: नरायन, जिनकी पहले से ही इक्कीस रानियाँ हैं, माहालखी से विवाह करने की जिद ठान बैठते हैं। माहालखी नरायन से विवाह करने की इच्छुक नहीं होतीं। कारण, उन्हें भय है कि नरायन राजा की इक्कीस रानियाँ उन्हें दु:ख देंगी। किन्तु मेंगराजा माहालखी को विवाह के लिये सहमत करते हैं और यह निश्चित होता है कि विवाह के बाद नरायन राजा और माहालखी इक्कीस रानियों से अलग माहादेव और पारबती के साथ कैलासपुर में रहेंगे।
4. निर्गति : नरायन अपनी नयी पत्नी माहालखी के साथ अपने बड़े भाई माहादेव के घर (कैलासपुर) में रहने लगते हैं किन्तु कुछ ही समय बाद वे अपनी शेष पत्नियों का अभाव महसूस करने लगते हैं। तब वे उनके पास वापस लौट आते हैं किन्तु पुन: उन्हें माहालखी का अभाव खटकता है और वे एक रात उन्हें उठा कर ले आते हैं। वे उन्हें अपनी आँखों से एक पल के लिये भी ओझल नहीं होने देते। इस प्रकार वे सभी सुख पूर्वक रहने लगते हैं। कुछ ही समय पश्चात् जब नरायन को इस बात का निश्चय हो जाता है कि अब उनकी इक्कीस रानियां माहालखी को किसी प्रकार का कष्ट नहीं देंगी, वे अपने राज-काज की ओर ध्यान देने लगते हैं। किन्तु थोड़े ही समय बाद इक्कीस रानियां माहालखी को तरह-तरह के कठिन कार्य करने को कह कष्ट देने लगती हैं। माहालखी उन कठिन कार्यों को पशु-पक्षियों की सहायता से पूरा करती हैं। फिर उन्हें भोजन पकाने का काम सौंपा जाता है। जब वे भोजन तैयार कर रही होती हैं तब उनकी सौतनें भोजन में तरह-तरह के अखाद्य डाल देती हैं, जिससे नरायन माहालखी पर कुपित हो जाते हैं और उन्हें प्रताडि़त करते हैं। माहालखी उन प्रताडऩाओं को सहन कर लेती हैं किन्तु जब नरायन उन पर पाद-प्रहार करने लगते हैं तब माहालखी बहुत अधिक दुखी और अपमानित महसूस करती हैं और चूहे द्वारा खोदी गयी सुरंग के रास्ते नरायन राजा का घर छोड़ कर इन्दरपुर चली जाती हैं।
5. फलागम : माहालखी द्वारा घर छोड़ जाने के बाद नरायन के परिवार पर दुखों के पहाड़ टूट पड़ते हैं। वे और उनकी इक्कीस रानियां भूख से व्याकुल हो जाती हैं। तब राजा माहालखी की खोज में जाते हैं और अनेक प्रयासों के बाद माहालखी को खोज कर घर वापस लाते हैं। इक्कीस रानियाँ अपनी भूल पर पश्चात्ताप करती हुई माहालखी की सेवा करती हैं। माहालखी अपने पति और इक्कीस सौतनों के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती है।
चूंकि कथा की भाव-भूमि का सम्बन्ध धान उत्पादन-प्रक्रिया के विस्तारित प्रसंग से है अत: इसका गठन उसी के अनुरूप अद्भुत है। मेंग का अर्थ वर्षा है तो माहालखी हैं धान और इक्कीस रानियां हैं कोदो, कोसरा, उड़द, मूंग, अरहर, चना, मटर, सरसों, तिल, राई, बदई, कांदुल, मंडिया आदि विभिन्न दलहनी-तिलहनी और अन्य गौण अनाज। इस कथा के नायक नरायन की तुल्यता सूर्य से की जा सकती है जबकि माहादेव (शिव) को बीज-पुरुष के रूप में देखना चाहिये।
यहां यह जानना भी आवश्यक होगा कि दण्डकारण्य का पठार धान उत्पादक पूर्व एवं गौण अन्न उत्पादक पश्चिम की सीमा पर स्थित है। गौण अन्न का उत्पादन पहाड़ी भूमि पर तो किया जा सकता है किन्तु धान के उत्पादन के लिये सम एवं सिंचित भू-भाग का होना आवयक है। इसलिये धान उत्पादन ने अपने आप को मुख्य भूमि में स्थापित किया जबकि गौण अन्न गांव की सीमा पर चले गये। नरायन का विवाह पहले गौण खाद्यान्नों (इक्कीस रानियों) के साथ हुआ और उसके बाद धान (माहालखी) के साथ। मिथकीय दृष्टि से यह कथा इस क्षेत्र का जनपदीय इतिहास सिद्घ होती है। और जैसे ही हम कथा के इस बिन्दु को आत्मसात् कर लेते हैं वैसे ही इस कथा में आये पत्नी-पीड़क प्रसंगों और धान की मिजाई के प्रसंग के बीच के अन्तर्सम्बन्धों को भी पकडऩे में सफल हो सकते हैं।      
यह कथा इस की गायिकाओं के जीवन-मूल्यों का उद्घोष करती है किन्तु इन मूल्यों को उनकी सम्पूर्णता में जानने के लिये मूल संस्करण का विश्लेषण अत्यन्त आवश्यक है। इस महाकाव्य में स्त्री एवं भूमि की फलदायकता (उत्पादकता) एवं फलहीनता या अनुत्पादकता (बांझपन) के बीच का संघर्ष केन्द्रीय मूल्य के रूप में उभर कर सामने आया है।  ये मूल्य कुछ एक स्थितियों में अखिल भारतीय परिदृश्य पर देवी लक्ष्मी के साथ जुड़े मूल्यों से भिन्न प्रतीत होते हैं। प्रमुख भिन्नता तो यही है कि इस महाकाव्य का आकार ही असाधारण रूप से बड़ा है तथा दूसरा यह कि इसे महिलाओं द्वारा गाया जाता है।
यह जानना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होगा कि इस महाकाव्य का आयोजन बस्तर की महिलाओं के लिये एक पवित्र अनुष्ठान है। वस्तुत: लछमी जगार चर्चा की नहीं अपितु महसूस करने की ची$ज है। यह महसूसना इसके भीतर के विभिन्न संस्कारों और उनसे जुड़े विश्वास; जो विभिन्न संस्कारों में सन्निहित भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में देखे जा सकते हैं, के साथ एकात्म हो कर सहभागी होने में है। कथा में वणिर्त कुछ एक घटनाओं का सजीव चित्रण उनकी साभिनय प्रस्तुति के साथ किया जाता है, जिन की मुख्य भूमिकाओं में स्वयं आयोजक ही होते हैं। इन अनुष्ठानों/ संस्कारों को मुख्य एवं गौण, दो श्रेणियों में बांट कर देखा जा सकता है। भिमा-विवाह (अध्याय 14), आम-विवाह (अध्याय 19) एवं माहालखी का विवाह (अध्याय 30) इस महाकाव्य की प्रमुख घटनाएं हैं जो विपुल जन समुदाय को आकर्षित करती हैं। परवर्ती एवं अन्तिम अनुष्ठान होता है माहालखी का विवाह, जो इस सम्पूर्ण अनुष्ठान का चरम है। यह अनुष्ठान सर्वान्तिम दिन होता है, जो सदैव गुरुवार होता है। अन्य घटनाओं में माहादेव द्वारा भूमि की सफाई (अध्याय 13) और माहालखी के जन्म (अध्याय 22) को रखा जा सकता है। ये घटनाएँ भी कुछ लोगों द्वारा अभिनीत की जाती हैं। उदाहरण के लिये, माहादेव द्वारा काटे जाने वाले वृक्ष के प्रतीक-स्वरूप एक छोटी सी लकड़ी तथा नवजात माहालखी के प्रतीक के रूप में केला का उपयोग किया जाता है।
चरित्र के अनुरूप उनकी पहचान हो, इसके लिये अभिनेता/ अभिनेत्री के पहचान-माध्यम अलग-अलग होते हैं। जहाँ कुछ संस्कारों में लोग सामान्यत: आनन्द लेते हैं वहीं कुछ चरित्रों की भूमिकाओं में अभिनेता/ अभिनेत्री पर सम्बन्धित चरित्र की आत्मा का प्रभाव भी दिखलायी पड़ता है। उदाहरणार्थ, जब गायिकाएँ गुरुमाँओं के आगमन का प्रसंग (अध्याय 11) गा रही होती हैं तब प्रमुख गायिका एवं कई बार उसकी सहायिकाओं पर भी उन गुरुमांओं की आत्मा का प्रभाव होने लगता है, जिनका वे आह्वान कर रही होती हैं। एक अन्य उदाहरण मेंगइन रानी और माहालखी का भी देखने में आता है। जगार-गायन की अवधि में कुछ महिलाएँ ऐसे प्रभाव में दिखलायी पड़ती हैं किन्तु माहालखी के विवाह के दिन तो यह प्रभाव विभिन्न आयु-वर्ग की बहुत सी महिलाओं पर दिखलायी पड़ता है।
इस आयोजन के सभी संस्कारों में प्राय: महिलाएँ ही सहभागी होती हैं। पुरुष संगीतकार, पुजारी और केन्द्रीय भूमिका निभाने वाले पात्रों के रूप में सहभागी होते हैं। इनमें से कुछ विवाह- संस्कार के समय देवी के प्रभाव में आते देखे जाते हैं।
बस्तर के धनकुल गीत
हरिहर वैष्णव की पुस्तक बस्तर के धनकुल गीतज् का प्रकाशन संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार के नागपुर स्थित दक्षिण-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा किया गया है। यह पुस्तक बस्तर के लोक चित्रकार तथा छायाकार खेम वैष्णव के 32 रंगीन छायाचित्रों से सुसज्जित है। पुस्तक में धनकुल लोक वाद्य एवं इसकी संगत में गाये जाने वाले विभिन्न गीतों के बारे में भी विस्तृत जानकारी है। उल्लेखनीय है कि धनकुल नामक लोक वाद्य की संगत में बस्तर में चार महाकाव्यों का गायन किया जाता है। लछमी जगार, आठे जगार, बाली जगार और तीजा जगार। उल्लेखनीय है कि हरिहर वैष्णव बस्तर अंचल की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत के संरक्षण, उन्नयन की दिशा में पिछले कई वर्षों से प्रयासरत हैं तथा इस संदर्भ में उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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