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Jul 20, 2015

छत्तीसगढ़ की नाचा शैली को विश्व में मशहूर करने वाले

छत्तीसगढ़ की नाचा शैली को विश्व में मशहूर करने वाले

हबीब तनवीर
रंगमंच को एक नई शक्ल देने वाले प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। 1 सितंबर 192३ को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्मे हबीब को उनके बहुचर्चित नाटकों चरणदास चोर और आगरा बाजार के लिए हमेशा याद किया जाएगा जो उनके सबसे यादा लोकप्रिय और प्रभावशाली नाटक माने जाते हैं।
उनका पूरा नाम हबीब अहमद खान था ;लेकिन जब उन्होंने कविता लिखनी शुरू की तो अपना तखल्लुस तनवीर रख लिया और उसके बाद से वह हबीब तनवीर के नाम से लोगों के बीच मशहूर हो गए। उनके पिता हफीज अहमद खान पेशावर (पाकिस्तान) के रहने वाले थे।
हबीब ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा रायपुर के लौरी म्युनिसिपल स्कूल से पास की थी तथा बीए नागपुर के मौरिश कालेज से किया। हबीब की एमए प्रथम वर्ष की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हुई। केवल 22 साल की उम्र में वह 1945 में मुंबई चले गए जहाँ उन्होंने आकाशवाणी में काम किया। इसके बाद उन्होंने कुछ हिन्दी फिल्मों के लिए गीत लिखे और कुछ में काम भी किया।
हबीब ने एक पत्रकार की हैसियत से अपने कॅरियर की शुरुआत की और रंगकर्म तथा साहित्य की अपनी यात्रा के दौरान कुछ फिल्मों की पटकथाएँ भी लिखीं तथा उनमें काम भी किया।
 मुंबई में हबीब ने प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्यता ली और इप्टा का प्रमुख हिस्सा बने। एक समय ऐसा आया जब इप्टा के प्रमुख सदस्यों को ब्रिटिश राज के खिलाफ काम करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और तब इप्टा की बागडोर हबीब को सौंप दी गई। वर्ष 1954 में वह दिल्ली आ गए जहाँ उन्होंने कुदेसिया जैदी के हिन्दुस्तान थिएटर के साथ काम किया। इस दौरान वह बच्चों के थिएटर से भी जुड़े रहे और उन्होंने कई नाटक लिखे।  दिल्ली में तनवीर की मुलाकात अभिनेत्री मोनिका मिश्रा से हुई जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। यहीं उन्होंने अपना पहला महत्त्वपूर्ण नाटक आगरा बाजार किया।
हबीब साहब के नाम से मशहूर हबीब ने 1945 में ही चरणदास चोर नाम का नाटक लिखा जो कि 18वीं सदी के शायर नजीर अकबराबादी पर आधारित था। नजीर मिर्जा गालिब की पीढ़ी के शायर थे। इस नाटक के लिए उन्होंने पहली बार दिल्ली के पास ओखला गाँव में रहने वाले जामिया मिलिया इस्लामिया के विद्यार्थियों से काम करवाया और यही पहला अवसर था जब यह नाटक बंद जगह की बजाय खुले बाजार में मंचित किया गया।
1955 में तनवीर इग्लैंड गए और रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक्स आर्ट्स (राडा) में प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब उन्होंने यूरोप का दौरा करने के साथ वहाँ के थिएटर को करीब से देखा और समझा। दो साल तक यूरोप का दौरा करते रहे। इस दौरान उन्होंने नाटक से संबंधित बहुत-सी बारीकियाँ सीखीं।
अनुभवों का खजाना लेकर तनवीर 1958 में भारत लौटे और तब तक खुद को एक पूर्णकालिक निर्देशक के रूप में ढाल चुके थे। इसी समय उन्होंने शूद्रक के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक मृछकटिका पर केंद्रित नाटक मिट्टी की गाड़ी  तैयार किया। इसी दौरान नया थिएटर की नींव तैयार होने लगी थी और छत्तीसगढ़ के छह लोक कलाकारों के साथ उन्होंने 1959 में भोपाल में नया थिएटर की नींव डाली।
नया थिएटर ने भारत और विश्व रंगकर्म के मंच पर अपनी अलग छाप छोड़ी। लोक कलाकारों के साथ किए गए प्रयोग ने नया थिएटर को नवाचार के एक गरिमापूर्ण संस्थान की छवि प्रदान की। चरणदास चोर उनकी कालजयी कृति है। यह नाटक भारत सहित दुनिया में जहाँ भी हुआ, सराहना और पुरस्कार अपने साथ लाया।
हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी बोली को लेकर जो प्रयोग किया उसपर अशोक बाजपेयी कहते हैं कि-  पिछले पचास वर्ष में किसी का नाम लिया जा सकता है - जिसने छत्तीसगढ़ को अस्मिता दी, पहचान दी और छत्तीसगढ़ पर जिद करके अड़ा रहा और यह जिद सारे संसार में उन्हें ले गई तो वह हबीब तनवीर है। एक तो हिन्दी में ही नाटक करना कठिन है ऐसे में हम कभी नहीं सोचते थे एक बोली और वो भी हिन्दी की एक उपबोली में नाटक करें और उस नाटक को इस हद तक ले जाएँ , इतने बरस तक ले जाएँ- बोली जो निपट स्थानीय है और प्रभाव और लक्ष्य जो सार्वभौमिक है।  हबीब तनवीर ने एक तो पहली बार ये सिद्ध कर दिया बोली में भी समकालीन होना न केवल संभव है बल्कि बोली भी समकालीनता का ही एक संस्करण है। 
छत्तीसगढ़ की बोली को लेकर एक क्रांतिकारी काम हबीब तनवीर ने किया है जिन्होंने सिर्फ बोली ही नहीं बोली के साथ जो समूची जातीय स्मृति है, जो समूची लोक संपदा है जो उसके बिंब हैं जो उसकी मुद्राएँ है उन सबको गूंथकर कुछ ऐसा करना जो स्थानीय भी है और जो स्थानीयता से भी आगे जाता है। अधिकांश लोगों को छत्तीसगढ़ी ममझ में नहीं आती थी हिन्दी वालों को भी नहीं आती  है तो गैर हिन्दी वालों को क्या आती । लेकिन इससे उनके नाटक के प्रभाव में कभी कोई क्षति नहीं हुई कोई हानि नहीं हुई।
छत्तीसगढ़ की नाचा शैली में 1972 में किया गया उनका नाटक गाँव का नाम ससुराल मोर नाम दामाद ने भी खूब वाहवाही लूटी।
हबीब साहब पहली बार विवादों में उस समय आए जब 90 के दशक में उन्होंने धार्मिक ढकोसलों पर आधारित नाटक पोंगा पंडित बनाया। उन्होंने 2006 में रवीन्द्र नाथ टैगोर के उपन्यास राज ऋ षि और नाटक विसर्जन पर आधारित फिल्म राजरक्त का निर्माण और निर्देशन किया। उन्होंने मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल के साथ मिलकर नाटक चरणदास चोर  पर एक हिन्दी फिल्म का निर्माण भी करवाया जिसमें स्मिता पाटिल ने मुख्य भूमिका निभाई। अपने जीवन में उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ऑस्कर विजेता फिल्म गाँधी सहित कई अन्य फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया।
इसी दौरान उन्होंने पंडवानी गायकी पर भी नाटकों के कई प्रयोग किये। इसी दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ के नाचा का प्रयोग करते हुये गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामादकी रचना की। बाद में शयाम बेनेगल ने स्मिता पाटिल और लालूराम को लेकर इस पर फिल्म भी बनायी थी।
हबीबजी के नाटक चरणदास चोर से लेकर, पोंगा पंडित, जिन लाहौर नहिं देख्या, कामदेव का सपना, बसंत रितु का अपना जहरीली हवा, राजरक्त समेत अनेक नाटकों में उनकी प्रतिभा दिखायी देती है जिसे दुनिया भर के लोगों ने पहचाना। 2005 में संजय महर्षि और सुधन्वा देशपांडे ने उन पर एक डाक्यूमेंटरी बनायी जिसका नाम रखा गाँव का नाम थियेटर, मोर नाम हबीब। यह टाइटिल उनके बारे में बहुत कुछ कह देता है, पर दुनिया की इस इतनी बड़ी सख्सियत के बारे में आप कुछ भी कह लीजिये हमेशा ही कुछ अनकहा छूट ही जाएगा।

हबीब तनवीर को 1969 में और फिर 1996 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। 1983 में पद्श्रमी और 2002 में पद्मभूषण मिला। 1972 से लेकर 1978 तक वे उच सदन रायसभा के सदस्य भी रहे। (संकलित)

मनोरंजन और जागरूकता का संगमः नाचा

मनोरंजन और जागरूकता का संगमः नाचा
- नारायण लाल परमार
लोकनृत्यों की दृष्टि से छत्तीसगढ़ी अंचल बहुत समृद्ध है, चाहे दक्षिणवर्ती बस्तर का माडिय़ा नृत्य हो अथवा घोटुल के हुलकी और मांदरी नृत्य हो, इन सबकी अपनी-अपनी जीवंत परम्पराएँ हैं। नित नवीन उल्लास के साथ-साथ इन गीत बहुल नृत्यों का एक मात्र श्रेय और प्रेय यही है कि ये जन जातियों के समाजिक संबंधों को उजागर करें।

करमा और सुवा, छत्तीसगढ़ जनपद के प्रमुख नृत्य हैं। गोंड़ और बैगा जाति के लोक करमा को बहुत अधिक महत्व देते हैं, कुल मिलाकार यह एक नृत्य मय उत्सव भी है। सुवा गीत अथवा नृत्य का महत्व भी लोक परक संगीत की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण  होता है। यह पारिवारिक प्रसंगों और प्रेम के विविध अनुभवों पर आधारित होता है। कहना होगा कि जातियाँ जितना ही अधिक नाचतीं और गाती हैं, उनमें जीवन संघर्षो को झेलने की क्षमता  उतनी ही अधिक होती है। इनके सहारे सामाजिक सम्बन्धों में माधुर्य, दृढ़ता और शालीनता आती है।
इन पारंपरिक नृत्यों के अतिरक्ति भी छत्तीसगढ़ के जन मनोरंजन के लिए सर्वसुलभ एक माध्यम है नाचा। इससे बढक़र सामाजिक भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए और कोई साधन दृष्टिपथ में नहीं आता। इसकी आडम्बरहीनता मन को मुग्ध किये बिना नहीं रहती। भावमयता का इसमें आधिक्य होता है इसका कथानक दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होता है। ये कथानक प्राय: सामाजिक हुआ करते हैं। इनसे समाज में प्रचलित मान्यताओं एवं प्रवृत्तियों पर अछा प्रकाश पड़ता है।
नाचा के आयोजन के लिए कोई विशेष तैयारी नहीं करनी पड़ती गाँवों में अक्सर नाचा मंडली पाई जाती है। इनके कलाकार कुछ तो शौकिया होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्होंने इसे जीविकोपार्जन का साधन बना लिया है। विवाह, मड़ई, गणेशोत्सव अथवा किसी भी अवसर पर सामान्य पारिश्रमिक पर सामान्य से मंडप में नाचा का आयोजन सहज ही हो जाता है। नाचा के अंतर्गत गम्मत का विशेष महत्व होता है। गम्मतों में हास्य व्यंग्य का पुट निश्चित रूप से पाया जाता है। प्रहसनात्मक शैली में रचित इन गम्मतों में हजारों लोगों को खुले आसमान के नीचे रात-रात भर आनंद देने की शक्ति होती है। इनमें स्त्रियों का अभिनय आज भी पुरुष ही करते हैं। नाचा के अंतर्गत अभिनीत इन गम्मतों का उद्देश्य विशुद्ध ही नहीं होता बल्कि इनमें अपने परिवेश की ईमानदार अभिव्यक्ति भी मिल जाती है। अछूतोद्धार, अंधविश्वास, अनमेल विवाह और शोषण जैसी सामाजिक बुराइयों को इन गम्मतों के कथानक जिस बेलौस तरीके से उघाड़ते हैं, वह देखते ही बनता है।
इसमें संदेह नहीं कि नाचा अपने प्रारंभिक चरण में विशुद्ध मनोरंजन ही देता रहा किन्तु धीरे-धीरे सिनेमा के प्रभाव से यह कई अर्थो में पतनशील भी हुआ। वेशभूषा, गीत और द्विअर्थी संवादों के कारण यह अतिशय व्यावसायिक हो गया। लोग भूल गये कि इसका कुछ सामाजिक दायित्व भी है। निराशा के इस व्यूह का भेदन करने वालों में प्रमुख हैं श्री रामचन्द्र देशमुख, जिन्होंने आजादी के तत्काल बाद नाचा के परिष्कार और उसे सामाजिक दायित्वबोध से जोडऩे का सफल प्रयास किया। छत्तीसगढ़ अंचल में फैले कलाकारों को पकडक़र उन्होंने नाचा का आदर्श रूप प्रस्तुत किया। उन दिनों जो संस्था उन्होंने बनाई थी उसका नाम था छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मण्डल। इस संस्था द्वारा प्रस्तुत नाचा कार्यक्रम स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा से भी भरपूर हुआ करते थे। सन् 1951 में प्रस्तुत किये गये कार्यक्रम कुछ इस प्रकार थे- काली माटी’ ‘बंगाल का अकाल’ ‘सरग अऊ नरक’ ‘जनम अऊ मरन’ ‘मिस मेया का डांसतथा बेगुनाह को फाँंसी। ये शीर्षक बताते हैं कि नाचा के अंतर्गत प्रदर्शित इन प्रहसनों का उद्देश्य राष्ट्रीय भावना को जाग्रत करने के सिवा और कुछ नहीं था। यही नहीं, उन दिनों हास्य व्यंग्य युक्त कामेडी भी प्रस्तुत की जाती थी। जिनके नायक अक्सर अंग्रेजी शासन की जी हुजूरी करने वाले शैली शाह हुआ करते थे। मसलन राय साहब मिस्टर भोंदू या फिर खान साहब नालायक अली खाँ आदि। आज छत्तीसगढ़ी नाचा का प्रभाव सिर्फ इसी बात से आँका जा सकता है कि यह श्री हबीब तनवीर के माध्यम से दिल्ली तथा देश के अन्य अनेक नगरों में प्रशंसित हुआ है।
विकास यात्रा के प्रारंभिक चरण में नाचा के प्रति सभ्य नागरिकों की दृष्टि उपहासजनक ही रही थी परन्तु आज अनेकानेक लोक सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से संभ्रान्त समाज में प्रतिष्ठित हो चुका है। नृत्य और गीतों में जो परिष्कार आया है सर्वत्र उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की जा रही है। इस कला के उत्थान की शुरूआत का श्रेय श्री रामचन्द्र देशमुख को ही दिया जा सकता है। नाचा के अंतर्गत प्रस्तुत की जाने वाली गम्मतों की कथावस्तु के संदर्भ में पहले कोई आदर्शपरक दृष्टि थी ऐसा नहीं कहा जा सकता। परंतु अब यह देखा जा रहा है कि इसमें सामाजिक अवस्था और दर्शकों की रूचियों के अनुसार नये-नये कथानकों का समावेश होता ही रहता है। इस प्रकार यह पारंपरिक नाट्य शैली इस अंचल की सामाजिक और राजनैतिक जागरूकता का परिचय भली भाँति देती है।
छत्तीसगढ़ी नाचा में व्यंग्य, विद्रूप और सामाजिक परिवर्तन की भूख का एक कारण और भी है। जिस तरह निर्गुण परम्परा के संत कवि निम्र जातियों से ही आये थे और उन्होंने अभिजात कहे जाने वाले समाज के आडम्बरों का भंडा फोड़ किया था ठीक उसी प्रकार नाचा पार्टियों में भी निम्न वर्ग के लोगों का ही बाहुल्य होता है। विशेष रूप से देवार नामक घुमक्कड़ जाति के योगदान को किसी भी तरह भुलाया नहीं जा सकता। इस जाति के लोग निरन्तर संघर्ष की जिन्दगी जीते हैं। समाज में इनका कोई स्थान नहीं होता। हर दृष्टि से इनका शोषण किया जाता है।
समाज विशेष के लोग इनकी मेहतन के बल पर ऐश करते हैं। वर्ग भेद की यह खाई आज भी उतनी ही चौड़ी है जितनी पहले थी। यही कारण है कि नाचा के माध्यम से समाज में पैसे के बल पर आतंक जमाये रखने वाले लोगों की गलत जिन्दगी का पर्दाफाश किया जाता है।
दुख इस बात का है कि अभी तक नाचा के कलाकारों का कोई रचनात्मक संगठन नहीं है। यह काम इतना विस्तृत है कि बिना शासकीय सहयोग के इसमें कोई संतोषजनक स्वरूप दे पाना कठिन है। छत्तीसगढ़ का यह एक दुर्भाग्य है कि यहाँ के कलाकार अपनी शक्ति और संगठन क्षमता से अपरिचित हैं, वर्ना आज उनकी स्थिति सामान्य मजदूरों से भी बदतर न होती। इन कलाकारों में से कइयों के पास रहने को घर नहीं है। जब ये बीमार पड़ते हैं तो कोई भी इनके उपचार के लिए आगे नहीं आता। यही कारण है कि ये कलाकार जीवन की विद्रूपताओं को प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करने में समर्थ होते हैं।
सामाजिक संबंधों में आज भी विकृतियाँ है। अनमेल विवाह होते ही रहते हैं। अंधविश्वासों से भी मुक्ति नहीं मिल सकी है। ऊपर से बदलते हुए समाज में रिश्वत, बेइंसाफी का खुले आम बोलबाला है। शोषण के नये आयाम खुल रहे हैं। जहाँ पैसा ही सामाजिक प्रतिष्ठा का मापदण्ड हो वहाँ किसी कला प्रतिभा के लिए स्थान ही कहाँ रह जाता है?
फिर भी नाचा के कलाकार जागरूक हैं। अपनी रुग्ण सामाजिकता से वे अच्छी तरह परिचित हैं इधर सुपरठित लोगों का ध्यान नाचा की ओर गया है। उसमें अच्छे गीतों तथा कथानाकों का समावेश हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में नाचा से बढक़र लोक शिक्षण का माध्यम और कोई नहीं हो सकता। यदि सरकार चाहती है कि गाँव-कस्बे के लोगों को समाजवादी संस्कार मिले तो नाचा को योजनाबद्ध किया जा सकता है। कलाकारों को समुचित  सहायता दी जा सकती है। और अगर इस कला को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है तो होगा यह कि कोई पंडित  हरिजन कन्या से प्रणय निवेदन तो कर देगा, किन्तु उसके घर जाकर सत्यनारायण की कथा नहीं पढ़ेगा। कोई ठग किसी विधवा को सहज ही नीलामी में पाँच  रुपये देकर खरीद सकेगा। गाँवों में नकली साधु आते जाते रहेंगे और शोषण की प्रक्रिया अबाध रूप से चलती रहेगी।
छत्तीसगढ़ी नाचा के कलाकारों में चाहे ठाकुर राम हो अथवा भुलवा, मदन हो अथवा लालू, किस्मत बाई हो अथवा बासंती, महत्त्वपूर्ण प्रश्न इनके व्यक्तिगत जीवन का नहीं बल्कि समूचे कला जगत का है। जिन पीड़ाओं से ये गुजर रहे हैं, वह तकलीफ इस अंचल की रग-रग में पैठी हुई है। इसका उपचार होना ही चाहिए, तब जाकर यह धरती हरी-भरी हो सकेगी। जीवन और समाज सार्थक हो सकेगा।

नाचा, पूर्णरूपेण एक जीवन केन्द्रित लोक विधा है। जिस प्रामाणिकता से यह सामाजिक जीवन को प्रस्तुत करता है, उसमें कहीं किसी ठौर बनावट की कोई गुंजाइश नहीं रहती। मनोरंजन और शिक्षा का जैसा मणि कांचन संयोग इसमें मिलता है, ऐसा अन्यत्र संभव नहीं है। समाज के उत्थान पतन को रेखांकित करने वाली यह एक आरसी है। इसके सत्याचरण को चुनौती दे पाना मुश्किल है, बल्कि कहना होगा कि छत्तीसगढ़ की यह पारंपरिक लोक कला भविष्य में भी नई सामाजिकता के लिए अपने निर्मम कत्र्तव्यों को पूरा करती रहेगी।

रहस का रहस्य


रहस का रहस्य
-श्यामलाल चतुर्वेदी 
भगवान की भक्ति को धूरी बनाकर संसार-चक्र में घूमते हुए भी अर्थ धर्म काम से अन्तत: मोक्ष पाने की अभिलाषा को पूर्ण करने का प्रयास धर्म प्राण भारत के मानव समाज में हम पाते हैं। सांसारिक भौतिकता के भंवर जाल से बचाने के लिए, व्यष्टि को समष्टिगत संस्कार से संस्कारित कराने में संलग्र मनीषियों ने, रमता जोगी बनकर भक्ति भावना को न केवल व्यापकता प्रदान की बल्कि उसे सर्व सुलभ बनाने के लिए नवधा भक्ति के रूप में व्याख्यायित किया ताकि लोग उसके किसी एक मार्ग का अवलम्बन करके भक्ति भाव से जुड़े रह सकें।
श्रवणं कीर्तनं विष्णों, स्वरणं पाद सेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं, सख्य मात्म निवेदनम्।।
इनमें कीर्तन अधिक लोकप्रिय हुआ क्योंकि गायन वादन और नर्तन तीनों का समावेश होने से भागीदारी का क्षेत्र विस्तृत बनता है। गा, बजा और नाचकर जुडऩे के साथ ही श्रवण करके भी हिस्सेदार बनने की गुंजाइश बनती है उनके अन्य आकर्षणों के कारण कीर्तन की व्यापकता सर्वत्र देखने को मिलती है।
भगवान के नाना रूपों  में राम और कृष्ण, नर लीला करने के करण जन-मन में ज्यादा जमे फलस्वरूप इनकी भक्ति के अनेक उपक्रम उपजते गये। मंदिर बने किन्तु आराधना के माध्यम तो कीर्तन ही रहे। कुछ आगे बढक़र उनकी लीलाओं का अभिनय भी आरंभ हो गया। राम लीला रास लीला रहस आदि तत्सम रूप सभी कीर्तन के ही परिवार से प्रकटे हैं।
कीर्तन अत्यन्त प्राचीन है। श्रीमद्भागवत माहात्म्य में इसकी उत्पत्ति का प्रमाण मिलता है। वर्णित अंशों को पढक़र मिलान कीजिए उस स्वरूप को न्यूनाधिक यथावत् रखने में महासंकीर्तन (रहस का कितना प्रामाणिक योगदान है। श्री मद्भागवत महात्म्य के 6 वें अध्याय का संदर्भित अंश-
एवं बृवाणे सति वादरायणां, मध्य समायां हरि राविरासीत्।
प्रहलाद वल्युदव फाल्गुनादिभि:, वृत्ति सुरर्षिस्तम् पूजयञ्च तान्।।
शुकदेव जी कह हि रहे थे कि सभा के बीच प्रहलाद, उद्वव, अर्जुन, बली आदि पार्षदों सहित भगवान प्रकट हो गये तब देवर्षि नारद ने भगवान की तथा उनके भक्तों की यथोचित पूजा की।
दृष्ट्वा प्रसन्नं महदासने हरिं ते चक्रिरे कीर्तन मग्र तस्तदा।
भवो भवान्यां कमलासनस्तु तत्रा गमत्कीर्तन दर्शनाय।।
भगवान को प्रसन्न देखकर नारद जी ने उन्हें सिंहासन पर बैठाया और सब लोग भगवान के सामने कीर्तन करने लगे। उस कीर्तन को देखने के लिए पार्वती जी के सहित शिवजी तथा ब्रह्माजी भी आये।
प्रहलाद स्ताल धारी तरल गति तथा योद्धव: कांस्य धारी।
वीणाधारी सुरर्षि: स्वर कुशल तया, राग कर्ताऽर्जुनो भूत।।
इन्द्रो वादिन्मृदंग जय जय सुकरा: कीर्तन ते कुमारा:।
यत्राग्रे भाव वक्ता सरल रचनया, व्यास पुत्रो वभूव।।
उस महासंकीर्तन में प्रहलाद जी दु्रतगति से ताल वाद्य बजा रहे थे और उद्धव जी मंजीरा तथा नारद जी वीणा वादन कर रहे थे। उत्तम स्वर ज्ञाता अर्जुन राग आरंभ करते इन्द्र सनक सनन्दन सनातन तथा सनत्कुमार राग को दुहराते तथा जय हो जय हो कहकर तालियाँ बजाते फिर गाये गये पद की व्याख्या सरस रचना एवं भाव प्रवणता के साथ श्री सुकदेव जी करने लगते।
ननर्तमध्ये त्रिकमेव तत्र, भक्त्यादि कानां नट वत्सु तेजसाम्।
अलौकिकं कीर्तनमेंत दीक्ष्य, हरि प्रसन्नोति वचोब्रवीत।।
उनके आगे भक्ति ज्ञान और वैराग्य नटो की भाँति नृत्य करते जा रहे थे। इस अलौकिक कीर्तन को देखकर भगवान हरि प्रसन्न होकर बोले:-
आप लोग वर माँगिये- तब कीर्तन कारी ने कहा कि जो भी सप्ताह पर्यन्त श्री कृष्ण लीला प्रधान इस तरह महाकीर्तन का अयोजन करें वहाँ आप इसी प्रकार प्रकट हो और उनके मनोरथों को पूर्ण करें। भगवान तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गये।
यह आश्चर्य जनक तथ्य है कि उपयुक्त वर्णन से सभी सदस्य बिलासपुर जिले में वर्षो से प्रचलित रहँस में यथावत् विद्यमान है। वर्णित देवताओं की मूर्तियाँ बनाने, उन्हीं वाद्यों को बजाने उसी शैली में गाने और नाचने की परम्परा अभी भी कायम है।
भगवान के वर माँगने के लिए कहने पर कीर्तनकारों ने ऐसे आयोजनकर्ताओं के मनोरथी को पूर्ण किये जाने की याचना करके सर्वे सुखिन: सन्तु... का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है। कई गाँवों में रहँस का आयोजन अभी भी किसी कामना के प्रत्यर्थ किया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कितनों की कामनाओं की पूर्ति होते रहने से ही तो ये फलद विश्वास अभी भी कायम है।
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले को सांस्कृतिक दृष्टि से अधिक समृद्ध माना जाता है इस मान्यता की छाप तन मन में छोडऩे के पीछे संभव है रहँस जैसे आयोजनों की व्यापकता हो। इस अंचल में रहँस की लोकप्रियता का जीवन्त प्रमाण इससे मिलता है कि सवर्णो के आयोजनों से अत्यधिक प्रभावित होकर जिले के आबादी बहुल हरिजनों ने इसे अपना लिया। पूर्व में स्पृश्य भाव  के होते हुए भी हरिजनों ने देखकर सुनकर और कतिपय सहृदयों से कुछ पूछकर इस विधा को अत्यन्त आत्मीयता से अंगीकृत किया। एकलव्य की साधना का अनुमान हरिजनों द्वारा अपनाये गये रहस की शैली में हम पाते हैं। हरिजन मंडलियों में और उनके आयोजनों में रहस के प्रति श्रद्धा की भावना औरों से अधिक है। इस आयोजन में परिजनों को आमंत्रित करना आनन्द को अधिकाधिक लोगों में वितरित करने की भारतीय भावना का दिव्य दर्शन है। राष्ट्रकवि स्व. श्री मैथिलीशरण गुप्त ने कहा भी तो है (दुख घट जाता सुख बढ़ जाता जब वह है बँट जाता) अनपढ़ों द्वारा इसका आचरण आमतौर पर किया जाना सांस्कृतिक ऊँचाइयों का मानदंड है। छत्तीसगढ़ के जन जीवन में अतिथि सत्कार के सद्भाव को सहजता से स्वीकारने की सामूहिक संस्कार और कहाँ देखने को मिलता है। लगता है रहँस में भी इस संस्कार के रहस्यात्मक बीज निहित है जो कि अनजाने ही पीढिय़ों को पवित्र परिपाटी की जड़ी चढ़ाते-चढ़ाते पगडंडी को राजमार्ग विकसित करते अग्रण्य हो रहे है।
रहस की परम्परा बहुत प्राचीन होते हुए भी इसका प्रचलन अटूट बना रहा यह एक अलग विशद विषय है किन्तु वर्तमान स्वरूप को स्थापित करने में प्राचीन राजधानी रतनपुर के बहुभाषा विज्ञ कायस्थ कुलोढ़मव बाबू रेवाराम मील के पत्थर साबित हुए है। 
भोसलों के राजत्वकाल में करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व राजाश्रय प्राप्त कविवर रेवाराम ने रहस की गुटका का सम्पादन किया। उनके गुटका के आधार पर रहँस की एक पद्धति प्रारंभ की, पदों को स्वर दिया। इस पद्धति का प्रचार भोंसलों के राज्य में व्यापक रूप से हुआ। कई बड़े-बूढ़ों से पता चला की अब से सत्तर अस्सी वर्ष पूर्व रहँस की मंडलियों के कर्ताधर्ता अब दिवंगत हो गये है किन्तु उनके कुछ शिष्ट गण अभी सीमित संख्या में ही सही, उनकी धरोहर की रक्षा कर रहे हैं, बहेरहा के लक्ष्मण पंडित 18 वर्ष की उम्र से 90 वर्ष की उम्र तक करीब साढ़े तीन सौ रहँस वे कर चुके हैं। उनके गुरु पांफा वाले स्व. पं. दुखूराम दुबे थे। लक्ष्मण पंडित रायगढ़ और रीवा तक रहस करने जाया करते थे। कुदुसदा के मिट्ठू पंडित भी रहँस किया करते है। देवरी वाले श्री नत्थुसिंह का नाम भी उल्लेखनीय है, सम्प्रति लकवा पीडि़त होने पर भी जहाँ कहीं रहस होने की जानकारी मिलती वे पहुँच जाया करते थे। चमुकवाँ वाले मालिकराम एवं मस्तराम, भटगाँव परसदा के श्री निर्मलकर का नाम भी चर्चित है। वर्तमान में श्री दादूसिंह गउद (जाँजगीर) की रहस मंडली बहुत प्रशंसित है। हरिजनों के रहस की भी कई मंडलियाँ है जिनमें नवापारा रतनपुर निवासी भूतपूर्व संसदसदस्य श्री गोंदिल प्रसाद अनुरागी, रानी गाँव के श्री ननका के सिवाय डाडग़ाँव की मंडली प्रसिद्ध है। जिले में व्यवस्थित और अस्त- व्यस्त कम से कम बीस मंडलियाँ अभी अस्तित्व में होना चाहिए।
मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद ने प्राचीन राजधानी रतनपुर के समीपस्थ रानीगाँव में रहँस का आयोजन किया इसकी प्रतिक्रिया प्रेरणाप्रद हुई है।
इस आयोजन ने रहस की अवनतौन्मुख लोकप्रियता को झकझौर कर पुर्नप्रतिष्ठित किये जाने के विचार को विस्तार दिया है। जन मानस में जो फिल्मी फैलाव तथा भक्ति भावना पर हो रहे, जाने और अनजाने प्रहार के परिणाम स्वरूप रहँस के प्रति आकर्षण में आ रही न्यूनता की नवोस्थायी दिशा देने में इस उपक्रम उपलब्धि मानी जायगी।
रहस को चिरकालीन लोक प्रियता का कारण उसका सहज स्वरूप है वह सबकी रुचि अनुरूप है। वण्र्य विषय सब रास के है लेकिन अभिव्यक्ति के आधार उनके अपने खास के है।
रहस के पात्र गायक वादक नर्तक सभी होते है स्थानीय या समीपवर्ती गाँव के रहने वाले सुर मीरा आदि पदावलियों के गायक कुछ पढ़े लिखे व्याज जी।
चिकारा वाद्य उसकी खासियत, जिसे सारंगी का लघु संस्करण समझिये। तमशहा या विदूषक है हास्य रस संचारी कौतुकी प्रदर्शन के साथ संवाद में प्रत्युत्पन्न मति का वैशिष्ट्य पचास वर्ष पूर्व तो रहस स्थल की प्रकाश व्यवस्था पंक्ति बद्ध सैकड़ों दीपकों से किया जाता रहा। गाँव के तेली की घानी से पैरे गये तिली के शुद्ध तेल की मीठी रोशनी। दो ढाई रुपये के तेल से रात भर प्रकाश का पर्याप्त प्रबंध।
पारी-पारी से व्यय वहन करने की विभाजित जिमेदारी सब कुछ उनका अपना सौहाद्र्र और सहकार का सुन्दर स्वरूप हुआ करता था।
शाम से ही रहस के बाहर तीनों दिशाओं में दर्शकों द्वारा स्थानों का आरक्षण। जिसका बोरा बिछ गया उसका वह स्थान-घर के बच्चों का स्वयं स्फूर्ति से स्पर्धा में किया जाने वाला जगह जमाने का काम। जो पहले पहुँचा चटाई, बारदाना या दरी बिछा दिया। सूर्यास्त होते ही चिडिय़ों को चहचहाहट के साथ बाल गोपालों का चिल्लमपों। बेड़ा से कुछ दूर पर खटिया मचौली में पान बिड़ी माचिस की एकाध दुकान, जहाँ कंडील या चिमनी की टिमटिमाहट। चना मूर्रा, लाडू, मूँगफली, भजिया का भी पसरा। पीने के पानी का संभव हुआ तो प्रबंध। रहस का ऐसा रहा करता था माहौल। विशाल जन समूह लेकिन कोलाहल की कोई समस्या नहीं। क्यों न हो? हर एक का अपना कार्यक्रम जो है।
परिषद के द्वारा अब तक किये गये प्रयास प्रशंसनीय है। भविष्य में रहस के मूल और सहज स्वरूप को सुधार या परिष्कार के अथवा ग्राम्य जीवन में पालित घोषित प्राकृतिक परिवेश को संक्षिप्तता के नाम पर कतर ब्यौत करने का विचार न लाते हुए जिस रूप में है उसी रूप में रहने देने, रखे जाने की सद्भावना को व्यापक बनाये जाने का प्रयास किया जाना लोक मंगलकारी उपक्रम होगा।
(नवम्बर 2003 में प्रकाशित श्यामलाल चतुर्वेदी की पुस्तक-मेरे निबंध से साभार) 

लोकनाट्य नाचा में साखी परंपरा

लोक नाट्य नाचा में साखी परंपरा
- डॉ. पीसी लाल यादव
छत्तीसगढ़ के लोकजीवन को करीब से देखें तो हम यह पाते हैं कि छत्तीसगढ़ की लोककला और लोक संस्कृति ने वैश्विक प्रसिद्धि पाई है। चाहे वह पंडवानी हो या भरथरी, पंथी हो या नाचा। छत्तीसगढ़ी लोककलाओं के रूप विविध हैं और रंग भी अनेक। लोक का आचार-विचार, सम्यता-संस्कार, कार्य और व्यवहार लोक कलाओं में प्रतिबिंबित होता है। जीवन का हास-परिहास, पतझर-मधुमास, आशा और विश्वास सब लोक संस्कृति में ही मुखरित होते हैं। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन का जो सर्वाधिक लोकप्रिय कलारूप है, वह है लोक नाट्य नाचा।
पहले नाचा रात्रि नौ-दस बजे से शुरू होकर सुबह तक चलता है। चार बांसों से बना साधारण मंच, न कोई तामझाम न कोई सजावट बिना परदे का। सब कुछ सहज और सरल ठीक यहाँं के लोगों के जीवन की तरह। न दम्भ, न दिखावा न कोई प्रपंच न छलावा। जैसा बाहर वैसा ही भीतर यही तो है विशेषता यहाँ के भोले-भाले लोगों की और नाचा की।
नाचा के अनेक पक्ष है। अनेक रंग है। नाचा के पूर्व रंग के अंतर्गत साखी परंपरा की चर्चा इस लेख का विषय है। नाचा में स्त्री पक्ष की भूमिका पुरुष द्वारा ही अदा की जाती है। नाचा के पूर्व रंगमंच में नचकारिन (परी) के गीत नृत्य  के बाद जोक्कड़ों (गम्मतिहा) का प्रवेश होता है। जोक्कड़ नाचा गम्मत के मेरूदंड हैं। ये जितने कला प्रवीण और दक्ष होंगे वह नाचा मंडली उतनी ही प्रसिद्ध होगी। जोक्कड़ (जोकर) प्रारंभ में नचौडी नृत्य कर साखी व पहेली के माध्याम से नाचा में गम्मत का माहौल तैयार करते हैं। नृत्य गीत में मग्न दर्शक को यह आभास हो जाता है कि अब गम्मत की प्रस्तुति होगी। साखी की परंपरा नाचा में खड़े साज से प्रारंभ होकर आज भी बैठक साज में विद्यमान है। ऐसा भी नहीं है कि साखी की यह परंपरा नाचा में ही है।
छत्तींसगढ़ी गीत गायन में साखी (दोहा) परंपरा हमें फाग गीतों में भी मिलती है। ये साखियाँ कबीर, तुलसी की साखियों, दोहों से भिन्न नहीं है। कबीर ने मानव मूल्यों की रक्षा के लिए जिन साखियों को रचा। आत्मा परमात्मा के एकाकार के लिए जिन साखियों को गढ़ा। जीवन के आडम्बरों और पाखंडों पर प्रहार के लिए जिन साखियों को अस्त्र के रूप में प्रयुक्त किया। ये सब वही साखियाँ हैं, वही दोहे। फागगीतों में साखी की एक बानगी-
सराररा सुनले मोर कबीर...
बनबन बाजे बांसुरी, के बनबन नाचे मोर।
बनबन ढूंढे राधिका, कोई देखे नंदकिशेर।।
इस तरह छत्तीसगढ़ी फाग गीतों का गायन साखी के बाद ही प्रारंभ होता है। जहाँ तक पहेलियों की बात है, वह तो लोकजीवन में मनोरंजन और ज्ञानरंजन का पर्याय है। पहेली को छत्तीसगढ़ी में -जनौला- कहा जाता है। यही साखियाँं, यही पहेलियाँ नाचा में मनोरंजन का द्वार खोलती है और दर्शकों को ज्ञान- विज्ञान और हास परिहास में गोते लगवाती है। नाचा के पूर्व रंग का रंग ही अनोखा और चोखा है। यही है नाचा का वह अछूता पक्ष है जिसकी चर्चा नहीं हो पाती। नाचा के जोक्कड़ गीत-गायन, नृत्यक और संवाद अदायगी में बड़े कुशल होते हैं। वे बात से बात पैदा करने में माहिर होते हैं। कहा भी जाता है-
जईसे केरा के पात पात में पात।
तईसे जोक्कड़ के बात बात में बात।।
अर्थात जिस प्रकार केले के पौधे में पत्ते ही पत्ते होते हैं, उसी प्रकार जोक्कड़ की बातों से बातें ही पैदा होती है। चश्मा लगाया हुआ जोक्कड़ कहता है- हां...हां...हां...हां..चार आँखी दू बाँहा जी। कैसी अनोखी बात है? आँखे चार है और भुजाएँ दो। सुनने वाले तो आवाक् और हतप्रभ रह जाते हैं। तब दूसरे ही क्षण वह जोक्कड़ अपना चश्मा निकालकर फिर कहता है- चार आँखी दू बाँहा जी-  तब दर्शक कठल (बहुत ज्यादा हँसना) जाते हैं। जोक्कड़ के वाक् चातुर्य की दाद देते हैं और हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते हैं। देखिये एक जोक्कड़ बात में किस तरह से बात पैदा करता है। वह अपनी व्युत्पन्नमति से बड़े-बड़े विद्वानों की बातों को भी झूठा साबित कर देता है। एक लोकोक्ति है या कहें किसी विद्वान का कथन है कि- पानी पियो छान के, गुरु बनाओ जान के- अर्थात पानी को छानकर पीना चाहिए और गुरु को जान समझकर बनाना चाहिए। सीधी सी बात है लेकिन नाचा का कलाकार दूसरा जोक्कड़ तर्क प्रस्तुत करता है और कहता है- नहीं -पानी पियो जान के, गुरु बनाओ छान के- यदि कोई तुम्हारे सामने डबरे का पानी छानकर दे, तो क्या तुम उसे पी लोगे? नहीं। इसलिए पानी को जानकर पियो और गुरु को छानकर अर्थात चुनकर जाँच परख कर बनाओ।
नाचा में रात भर में तीन चार गम्मत प्रस्तुत किये जाते हैं। प्रत्येक गम्मत के पूर्व में इस तरह की साखियाँ और पहेलियाँ प्रस्तुत करने की परंपरा है। जीवन व जगत से जुड़़ी हुई ये साखियाँ और पहेलियाँ जहाँ लोगों का मनोरंजन करती हैं, वहीं उनके ज्ञानार्जन में सहायक सिद्ध होती है। लोक के इस प्रयोजन में लोक की अनुभूति ही अभिव्यक्त होती है।
नाचा में प्रयुक्त होने वाली साखियों और पहेलियों को  कई वर्गों में विभाजित कर सकते हैं जैसे- देवी-देवता संबंधी साखियाँ, नीति संबंधी साखियाँं, मानवीय संबंधी साखियाँ, कृषि संस्कृति संबंधी साखियाँ, पशु-पक्षी, प्रकृति संबंधी साखियाँ, द्विअर्थी संबंधी साखियाँ, आदि
देवी-देवता संबंधी साखियाँ
लोक जीवन धार्मिकता से ओतप्रोत होता है। धर्म पर लोक जीवन की आस्था अधिक रहती है। राम-सीता, कृष्ण-राधा, शंकर-पार्वती आदि देवी-देवताओं के साथ-साथ लोकांचल के अपने और भी भिन्नि-भिन्न देवी-देवता होते हैं। नाचा में इन्हीं देवी-देवताओं से संबंधित धर्म विषयक साखियाँ व पहेलियाँ गम्मत के प्रारंभ में जोक्कड़ प्रस्तुत करते होते हैं-
घर निकलत तोर ददा मरगे, अधमरा होगे तोर भाई।
बीच रद्दा म नारी के चोरी होगे, काम बिगाड़े तोर दाई।।
उपरोक्त साखी में श्रीराम से संबंधित कथा को पहेली के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भावार्थ यह कि- घर से तुम्हारे निकलते ही तुम्हारे पिताजी ने प्राण छोड़ दिये। तुम्हारा भाई मूच्र्छित हो गया। बीच रास्ते में तुम्हारी पत्नी की चोरी हो गई ये सारे कार्य तुम्हारी माँ ने बिगाड़े हैं। जाहिर है उक्त घटनाएँ श्रीराम के साथ ही घटित हुई थी।
 नीति संबंधी साखी
राजा के मरगे हाथी, देवान के मरगे घोड़ा।
रांडी के मरगे कुकरी, त एक बराबर होय।
यदि राजा का हाथी मर गया, मंत्री का घोडा मर जाये और किसी गरीब विधवा स्त्री की मुर्गी मर जाये तो इन तीनों की हानि बराबर आँकी जायेगी।
मैं मरेंव तोर बर, तैं झन मर मोर बर।
तैं मरबे मोर बर, त ऊपर खड़े हे तोर बर।।
इस साखी में केंचुआ (जिसे मछली फँसाने के लिए कांटे में लगाया जाता है) मछली से कहता है- मुझे तुम्हें फँंसाने के लिए मारा गया है, अच्छा होगा कि तुम मुझे खाने के लिए मत दौड़ो। यदि तुम मुझे खाओगे तो बंशी के काँटे में फँस कर मारे जाओगे। क्योंकि तुम्हें मारने के लिए ऊपर आदमी खड़ा है। इस साखी में लालच न करने की शिक्षा सन्निहित है।
मानवीय संबंध संबंधी साखियाँ
सम्बंधों की प्रगाढ़ता मानव जीवन का माधुर्य है। जहाँ मानवीय सम्बंधों में मिठास होगा, वही परिवार समुन्नत और सम्पन्न होगा। नागर जीवन में लोग संयुक्त परिवार से कट रहे हैं, और एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। पर गाँवों में हमें आज भी संयुक्त परिवार देखने को मिलते हैं। परस्पर प्रेम, अनुशासन, साहचर्य, सहयोग और समरसता संयुक्त परिवार व मानवीय सम्बंधों के रक्षा कवच हैं। लोक जीवन की यह विशेषता नाचा की साखी परंपरा से पृथक नहीं है। एक बानगी-
एक बाप के बारा बेटा, छै झन बहू बिहाय।
एक लुगरा पहिरा के ओला, खारन खार कुदाय।
इसका उत्तर है बैलगाड़ी का चक्का। जिसमें बारह आरे, छह पुठा और एक बाँठ होता हैस्थूल रूप में इसमें संयुक्त परिवार का दृश्य प्रतिबिंबित होता है।
कृषि संबंधी साखियाँ
गाँव के लोगों का प्रमुख कार्य कृषि ही है, नाचा के कलाकार भी कृषक होते हैं। तब भला अपने कृषि कर्म में काम आने वाली वस्तुओं को वे कैसे भूल सकते हैं? कृषक जीवन की दिनचर्या और कृषि कर्म भी साखी और पहेली की विषय सामग्री बनते हैं-
आगू डाहर सुल्लु, पाछू डाहर चकराय।
आँही-बाँही गोल गोल, बीच म ठडिय़ाय।।
इस साखी में बैलगाड़ी का चित्रण है, जिसका सामने भाग नुकीला और पिछला भाग चौड़ा होता है। आजू-बाजू गोल-गोल दो चक्के होते हैं। बीच में लोहे की पोटिया लगी होती हैं।
पशु-पक्षी, प्रकृति संबंधी साखियाँ
 लोक मानस प्रकृति का पुजारी है, प्रकृति ही उसका सर्वस्व है। इसलिए वह प्रकृति से तादात्यबनाकर चलता है। प्रकृति से कटना जैसे जीवन से कटना है। प्रकृति ही लोक के लिए ऊर्जा का स्रोत है और उसका जीवन भी। जंगल, जल और जमीन, लोक के प्राण तीन। प्रकृति पुत्र नाचा का कलाकार भला प्रकृति का अनादर कैसे कर सकता है? उसके रोम-रोम और साँस-साँस में प्रकृति के प्रति अनन्यन प्रेम है इसलिए लोक कलाकार प्रकृति का प्रेमी होता है। प्रकृति भी उसकी कला की अभिव्यक्ति में मुखरित होती है। नाचा की साखियाँ प्रकृति के विविध रंगों से रंगी हुई है-
एक सींग के बोकरा, मेरेर-मेरेर नरियाय जी।
मुँह डाहर ले चारा चरे, बाखा डाहर ले पगुराय जी।।

विचित्र बात यह कि बकरे का एक ही सींग है। वह में-में बोलता है। मुँह से चारा चरता है किंतु जुगाली बाजू से करता है। 

बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा

बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा
सात आगर सात कोरी
 - डी.पी. देशमुख
रानी दुर्गावती, लक्ष्मीबाई और रजिया सुल्तान भारत की वे वीरांगनाएँ हैं, जिनके शौर्य और साहस की गाथा विश्व इतिहास में अमर है। छत्तीसगढ़ में बहादुर कलारिन की गाथा-शौर्य और साहस का पाठ पढ़ाती है। आज विभिन्न मंचों के माध्यम से इस वीरांगना के साहस और त्याग की अभिव्यक्ति भी जनमानस में होने लगी है। नारी जाति पर हुए अत्याचार के लिए इस कलार जाति की महिला ने जिस साहस और त्याग का परिचय दिया था। उसका लेसमात्र भी आज की महिलाओं में होता तो पुरुषों में नारी के प्रति सम्मान की भावना अधिक होती। प्रस्तुत गाथा दुर्ग जिले के गुरूर से बाहर कि.मी. दूर पश्चिम में स्थित सोरर गाँव की है, जिसका प्राचीन नाम सरहगढ़ था। इसका एक नाम बुजुर्गो के अनुसार सोरढ़ भी है। यहाँ प्राप्त शिलालेख और प्राचीन मंदिर तथा अन्य अवशेष बरबस कलचुरी शासन की याद ताजा करते हैं। उपलब्ध सामग्रियों से ज्ञात होता है कि बहादुर कलारिन की स्मृतियाँ सोरर सरहरगढ़ के साथ जुड़ी हुई हैं।
एक बार रतनपुर का कलचुरी राजा शिकार करते सरहरगढ़ के बीहड़ जंगल में आया। कहा जाता है कि तब शिकार के लिए शिकारी अपने साथ एक बाज पक्षी रखा करता था और बाज की दिशा में शिकार तलाशते हुए राजा आगे बढ़ता था। जंगल इतना घना था कि राजा को बाज दिखाई नहीं दिया, एक तरह से वह दिशा भ्रमित हो गया। सैनिक पीछे रह गये। सूर्यास्त का समय था। जंगल की घनी छाया के कारण अँधेरा गहराने लगा था। रास्ते भी लुप्त प्राय हो गये। जंगल  में राजा को आश्रय की तलाश थी, तभी घने जंगल में कुछ दूरी पर एक टिमटिमाती हुई मशाल दिखाई दी। राजा के थके-हारे पाँव उस दिशा में चल पड़े।
घने जंगल के बीचों-बीच एक कुटिया थी, जहाँ कलारिन जाति की अति सुन्दर युवती अपनी वृद्ध माँ के साथ निवास करती थी। युवती प्रतिदिन मचौली में बैठकर जीवकोपार्जन के लिए शराब बेचती थी। उन दोनों के भरण-पोषण का वही एकमात्र साधन था। गाँव के बाहर खुले मैदान में स्थित पत्थरों की नक्काशीदार विशाल मचौली अतीत के साक्ष्य रुप में आज भी विद्यमान है। कुटिया पहुँचकर राजा ने अपना परिचय दिया और अन्य साथियों से बिछुड़ जाने की आप बीती सुनाई। रात्रि भर विश्राम के लिए उसने युवती से जगह माँगी। राजा को आश्रय मिल गया। राजा युवती के रूप सौन्दर्य को देख मंत्रमुग्ध हो गया। राजा अपना होशोहवाश खो बैठा और युवती को पाने की लालसा में उसने उसकी वृद्ध माँ के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। गंधर्व विवाह के साथ राजा व युवती दाम्पत्य सूत्र में बँध गये। एक सुबह राजा को अपने राज्य एवं परिवार की सुधि आई। राजपाट की मुश्किलें बताकर तथा पुन: वापस आने का बहाना कर राजा वहाँ से चला गया और फिर वह कभी सरहरगढ़ नहीं आया।
समय बीतता गया। कुछ महीनों के पश्चात् युवती ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। राजा की याद में बालक का नाम छछानछाडू रखा गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है- बाज को छोड़ दिया। बाल्यकाल से छछानछाडू अन्य बालकों से भिन्न था। जिज्ञासावश कभी-कभी सोचता कि आखिर उसका पिता कौन है? कहाँ है? लेकिन माँ से पूछने  का साहस वह नहीं कर पाता था। धीरे-धीरे वह किशोरावस्था की सीमा लाँघने लगा। पिता को लेकर मित्रों में उसकी खिल्ली उड़ाई जाती। इसी बात पर एक हम उम्र साथी से झगड़ा हो गया। छछान बहुत दुखी हुआ और ठान लिया कि  घर जाकर माँ से सारी बातें पूछकर रहेगा। उसने माँ के आगे प्रश्नों की बौछार लगा दी। उसके तेवर देख विवश माँ ने सारी बातें सिलसिलेवार बता दीं। माँ पर हुए अत्याचार को सुन छछान क्रोधाग्नि में जल उठा। अपने पिता से तथा समस्त राज-परिवार से ही उसे घृणा हो गई। प्रतिशोध की अग्नि में वह जलने लगा। विद्रोही मन तरह-तरह की योजनाएँ बनाता। बलिष्ठ और ताकतवर तो वह था ही, बुद्धि से भी तेज था। योजनाबद्ध तरीके से हमउम्र युवाओं की उसने एक टोली बनायी। कलाबाजी और युद्ध कौशल के प्रशिक्षण द्वारा उसने एक सशक्त फौज भी तैयार कर ली। दिन-रात केवल एक ही बात वह सोचता कि माँ पर हुए अत्याचार का बदला कैसे लिया जाए? डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने छछानछाडू की इस स्थिति का जिक्र करते हुए लिखा है कि प्रकृति ने उसे पुरुषार्थ प्रदान किया, वहीं परिस्थिति ने उसे उद्दंड भी बनाया।
छछानछाडू ने सुनियोजित ढंग से अपनी फौज के साथ छत्तीसगढ़ एवं अन्य राज्यों के 147 राजकुमारियों का अपहरण किया। सरहरगढ़ में उन्हें बन्दी बनाकर रखा गया। उन्हें कू्रर यातनाएँ दी गई। उसने 147 ओखलियाँ बनाई और राजकुमारियों को धान कूटने की आज्ञा दी। गाँव में आज भी सात आगर सात कोरी अर्थात् 147 ओखलियों के अवशेष हैं। इस इलाके से सात आगर सात कोरी लोकोक्ति भी बहुत प्रचलित है। छछानछाडू  के आदेश पर राजकुमारियाँ महीनों-महीनों तक अनाज कूटती थीं। राजकुमारियों पर छछानछाडू का कठोर जुल्म माँ को अच्छा नहीं लगा। उसकी नजरों में यह नारी जाति का अपमान था। निरपराध राजकुमारियों को जुल्म से मुक्त कराने का उसने भरसक प्रयास किया, लेकिन छछानछाडू ने उसकी एक न सुनी और यातनाओं का क्रम चलता ही रहा। अंतत: बहादुर कलारिन ने अपने ही बेटे के लिए ऐसा कार्य किया जो सामान्यत: एक माँ के लिए असंभव था।
धूर का त्योहार था। सम्पूर्ण गाँव गुलालमय हो गया। नगाड़ों की थाप से गाँव गूँज रहा था। उस दिन घर में छछानछाडू के लिए छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाये गये थे। छदान रंग-गुलाल से सराबोर और मदिरा में मदहोश होकर घर पहुँचा। भूखा तो था ही घर में तरह-तरह के पकवान देख उसकी भूख अधिक बढ़ गई। भोजन करने के बाद उसने माँ से पानी माँगा, लेकिन घर में पानी का एक बूँद भी न था। सुनियोजित ढंग से घर के नौकरों को छुट्टी दे दी गई थी। पास-पड़ोस के घरों के दरवाजे भी बंद थे। मिठाई खाने से छछानछाडू की प्यास और अधिक बढऩे लगी। माँ उसे पानी पिलाने बावली ले गई। छछान जैसे ही बावली में पानी निकालने को झुका, माँ ने धक्का दे उसे बावली में गिराकर मार डाला। उसकी मृत्यु के पश्चात् बंदी राजकुमारियों को छोड़ दिया गया और यातनाओं का क्रम समाप्त हुआ। लेकिन पुत्रमोह से वशीभूत माँ इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकी और पुत्र वियोग में बहादुर कलारिन ने एक धारदार कटारी से अपनी ही इहलीला समाप्त कर ली।
नारी अत्याचार के विरुद्ध किसी महिला द्वारा अपने ही बेटे के बलिदान की यह गाथा अपने आप में बेजोड़ है। जनमानस के बीच कलारिन के इस साहसिक कार्य ने उसे बहादुर कलारिन बना दिया। जिसकी गाथा सम्पूर्ण इलाके में मुँह-जबानी आज भी सुनने को मिलती है। कटार लिये वीरांगना की मूर्ति ग्राम सोरर के प्रांगण में आज भी स्थित है।

जिस बावली में छछानछाडू की मृत्यु हुई थी कलांतर में वहाँ एक विचित्र वृक्ष उगा। कहते हैं उस वृक्ष में प्रतिदिन सात रंग के फूल खिलते थे। आज से तीन-चार दशक पूर्व इस सत्य को वहाँ के लोगों ने देखा भी है। छछानछाडू ने परिस्थितिवश अपहृत राजकुमारियों को बदनियती का शिकार बनाया, उन्हें शारीरिक एवं मानसिक यातनाएँ दीं। इसे नैसर्गिक नियति की परिणति मानकर आसपास के ग्रामवासी आज भी माँ-बेटे की स्मृतियों को श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। कहा जाता है कि छछानछाडू की पुण्य स्मृति को आदर देते हुए गाँव सोरर में आज भी धूर का त्योहार प्रतिबंधित है।