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Apr 8, 2015

हमारे लोक देवता: वृक्ष

हमारे लोक देवता
 वृक्ष
-डॉ. खुशालसिंह पुरोहित

दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताओं का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है। इसी में पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रुप में मनुष्यों, प्राणियों की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी।

वृक्षों का मनुष्य से अलग अपना कोई इतिहास नहीं है। वृक्षों की पूजा दरअसल एक मायने में अपने पूर्वजों को आदर प्रकट करने का माध्यम हैं, जिसकी वजह से आज तक प्रकृति का संतुलन बना रहा है। आज समाज सिर्फ भविष्य की ओर देख रहा है, परन्तु वह यह भूल रहा है कि अंतत: यह प्रकृति ही है जो उसे जिंदा रखेगी।
मानव जीवन के तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रुप से वनों पर ही आधारित है। इसके साथ ही वनों से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियां, फल-फूल, ईधन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा संतुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख है।
जिस पर्यावरण चेतना की बात विकसित देश अब कर रहे है, वह आदिकाल से भारतीय मनीषा का मूल आधार रही है। भारतीय संस्कृति वृक्ष पूजक संस्कृति है। हमारे देश में वृक्षों में देवत्व की अवधारणा और उसकी पूजा की परम्परा प्राचीनकाल से रही है। जहां तक वनस्पतियों के महत्व का प्रश्न है, भारतीय प्राचीन ग्रंथ इनकी महिमा से भरे पड़े है। वृक्षों के प्रति ऐसा प्रेम शायद ही किसी देश की संस्कृति में हो, जहां वृक्ष को मनुष्य से भी ऊंचा स्थान दिया जाता है एवं उनकी पूजा कर सुख और समृद्धि की कामना की जाती है। हमारी वैदिक संस्कृति में पौधारोपण व वृक्ष पूजन की सुदीर्घ परम्परा रही है। प्रयाग का अक्षयवट, अवंतिका का सिद्धवट, नासिक का पंचवट (पंचवटी) गया का बोधिवृक्ष, वृंदावन का वंशीवट जैसे वृक्ष केन्द्रित श्रद्धा के केन्द्रों की परम्परा अनेक शताब्दियों पुरानी है।
वैदिक काल में प्रकृति के आराधक भारतीय मनीषी अपने अनुष्ठानों में वनस्पतियों को विशेष महत्व देते थे। वेदों और आरण्यक ग्रंथों में प्रकृति की महिमा का सर्वाधिक गुणगान है, उस काल में वृक्षों को लोकदेवता की मान्यता दी गयी। वृक्षों में देवत्व की अवधारणा का उल्लेख वेदों के अतिरिक्त प्रमुख रुप से मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, पद्मपुराण, नारदपुराण,रामायण, भगवद्गीता
और शतपथब्राह्मण आदि ग्रंथों में मिलता है। मोटे रुप में देखे तो वेद, पुराण, संस्कृत और सूफी साहित्य, आगम, पंचतंत्र, जातक कथाएं, कुरान, बाईबिल, गुरुग्रंथ साहब हो या अन्य कोई ग्रंथ हों सभी में प्रकृति के लोकमंगलकारी स्वरुप का वर्णन है।
पर्यावरण के प्रति सामाजिक सजगता और पौधारोपण के प्रति सतर्कता हमारे ऋ षियों ने निर्मित की थी, पौधारोपण कब, कहां और कैसे किया जाये उसका लाभ और वृक्ष काटे जाने से होने वाली हानि का विस्तारपूर्वक वर्णन हमारे सभी धर्मो के ग्रंथों
में है।
दुनिया में सभी प्राचीन सभ्यताओं का आधार मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर का रिश्ता है। इसी में पेड़, पहाड़ और नदी का अवतार के रुप में मनुष्यों, प्राणियों की पूजा की परम्परा का प्रचलन हुआ। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय समाज में मूर्ति पूजा के साथ ही पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं की पूजा की परम्परा भी विद्यमान थी। भारतीय साहित्य, चित्रकला और वास्तुकला में वृक्ष पूजा के अनेक प्रसंग मिलते है। अजंता के गुफाचित्रों और सांची के तोरण स्तंभों की आकृतियों में वृक्ष पूजा के दृश्य है। जैन और बौद्ध साहित्य में वृक्ष पूजा का विशेष स्थान रहा है। पालि साहित्य में विवरण है कि बोधिसत्व ने रुक्ख देवता बनकर जन्म लिया था।
हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों में प्रकृति की परमात्मा स्वरुप में स्तुति है। इसके साथ ही वाल्मिकी रामायण, महाभारत और मनुस्मृति में वृक्ष पूजा की विविध विधियों का विस्तार से वर्णन है। नारद संहिता में 27 नक्षत्रों की नक्षत्र वनस्पति की जानकारी दी गयी है। हर व्यक्ति के जन्म नक्षत्र का वृक्ष उसका कु ल वृक्ष है, यही उसके लिये कल्पवृक्ष है, जिसकी आराधना कर मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। सभी धार्मिक आयोजनों एवं पूजापाठ में पीपल, गुलर, पलाश, आम और वट वृक्ष के पत्ते (पंच पल्लव) की उपस्थिति अनिवार्य होती है। नवग्रह पूजा अर्चना के लिये नवग्रह वनस्पतियों की सूची है जिसके अनुसार उन वृक्षों की पूजा-प्रार्थना से ग्रह शांति का लाभ मिल सकता है।
यह धीरे-धीरे बढ़ता है और सैकड़ों वर्षो तक जिंदा रहता है। भारत में समुद्रतटीय प्रदेशों गुजरात, महाराष्ट्र और केरल में कल्पवृक्ष बहुतायत से मिलते है। देश के कुछ चर्चित कल्पवृक्षों में हिमालय में जोशीमठ, राजस्थान में मांगलियावास, बालुन्दा और बांसवाड़ा के कल्पवृक्ष प्रमुख है।
पौराणिक ग्रंथ स्कंदपुराण के हेमाद्रि खंड के अनुसार पांच पवित्र छायादार वृक्षों के समूह को पंचवटी कहा गया है, जिसमें पीपल, बेल, बरगद, आवंला व अशोक शामिल है। पुराणों में दो प्रकार की पंचवटी का वर्णन किया गया हैं। प्रत्येक में इन पांच प्रजातियों की स्थापना विधि, एक नियत दिशा, क्रम व अंतर के स्पष्ट निर्देश है।
भगवान बुद्ध के जीवन की सभी घटनाएं वृक्षों की छाया में घटी। आपका जन्म सालवन में एक वृक्ष की छाया में हुआ। इसके बाद प्रथम समाधि जामुन वृक्ष की छाया में, बोधि प्राप्ति पीपल वृक्ष की छाया में और महानिर्वाण साल वृक्ष की छाया में हुआ। भगवान बुद्ध ने भ्रमणकाल में अनेकों वनों एवं बागों में प्रवास किया था। इनमें वैशाली की आम्रपाली का आम्रवन, पिपिला का सखादेव आम्रवन, नांलदा का पुरवारीक आम्रवन व अनुप्रिय का आम्रवन के नाम उल्लेखनीय है। उसके अतिरिक्त राजाग्रह निम्बिला और कंजगल के वेणु वनों का संबंध भी भगवान बुद्ध से आया है। जैन धर्म में जैन शब्द जिन से बना है, इसका अर्थ है समस्त मानवीय वासनाओं पर विजय करने वाला। तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है नदी पार कराने का स्थान अर्थात घाट। धर्मरुपी तीर्थ का जो प्रवर्तन करते है वे तीर्थंकर कहलाते हैं। तपस्या के रुप में सभी तीर्थकरों को विशुद्ध ज्ञान (कैवल्य ज्ञान) की प्राप्ति किसी न किसी वृक्ष की छाया में हुई थी, इन वृक्षों को कैवली वृक्ष कहा जाता है।
सिख धर्म में वृक्षों का अत्यधिक महत्व है। वृक्ष को देवता रुप में देखा गया हैं गुरुकार्य में उपयोग आने वाले धर्मस्थल के पास स्थित वृक्ष समूह को गुरु के बाग कहा जाता है। इनमें गुरु से जुड़े कुछ वृक्ष निम्न है - नानकमता का पीपल वृक्ष, रीठा साहब का रीठा वृक्ष, टाली साहब का शीशम, और बेर साहब प्रमुख है। इसके साथ ही कुछ बेर वृक्ष भी पूजनीय और प्रसिद्ध है। इनमें दुखभंजनी बेरी, बाबा की बेरी और मेहताबसिंह की बेरी के वृक्ष शामिल है।
पृथ्वी पर पाये जाने वाले जिन पेड़-पौधों का नाम कुरान-मस्जिद में आया है, उन पेड़ों को पूजनीय माना गया है। इन पवित्र पेड़ों में खजूर, बेरी, पीलू, मेहंदी, जैतून, अनार, अंजीर, बबूल, अंगुर और तुलसी मुख्य है। इनमें कुछ पेड़-पौधों का वर्णन मोहम्मद साहब (रहमतुल्लाह अलैहे) ने कुरान मस्जिद में किया हैं इस कारण इन पेड़ पौधों का महत्व और भी बढ़ जाता है। हम सभी धर्मग्रंथ पेड़-पौधों के प्रति प्रेम और आदर का पाठ पढ़ाते है। इसी प्रेम और आदरभाव से वृक्षों की सुरक्षा कर हम अपने जीवन में सुख, समृद्धि प्राप्त कर सकते है।
आज की सबसे बड़ी समस्या वनों के अस्तित्व की है। भोगवादी सभ्यता के पक्षधर सारी दुनिया में पेड़ को पैसे के पर्याय के रुप में देखते है, यही कारण है कि दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा है जहां वृक्ष हत्या का दौर नहीं चल रहा हो। हमारे यहां सुखद बात यह है कि भारतीय संस्कृति की परंपरा वृक्षों के साथ सहजीवन की रही है। पेड़ संस्कृति के वाहक है।
यहां प्रकृति की सुरक्षा से ही संस्कृति की सुरक्षा हो सकती है। इस कारण यहां जंभोजी महाराज की सीख है जिसमें कहा गया है कि सिर साटे रुख रहे तो सस्तो जाण, इसी क्रम में धराड़ी और ओरण जैसी परम्पराओं ने जातीय चेतना को प्रकृति चेतना से आत्मसात कर वृक्ष पूजा और वृक्ष रक्षा से जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की है। आज इसी भावना को विस्तारित कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं।
हमारे प्राचीन साहित्य में जिन पवित्र और अलौकिक वृक्षों का उल्लेख है उनमें कल्पवृक्ष प्रमुख है। कल्पवृक्ष को देवताओं का वृक्ष कहा गया है, इसे मनोवांछित फल देने वाला नंदन वृक्ष भी माना जाता है। भारत में बंबोकेसी कल के अडऩसोनिया डिजिटेटा को कल्पवृक्ष कहा जाता है। इसको फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने 1754 में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अडऩसोनियाडिजिटेटा रखा गया। नश्वर जगत का कोई भी वृक्ष इसकी विशालता, दीर्घजीविता और आराध्यता में बराबरी नहीं कर सकता है।
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प्लास्टिक का कोई विकल्प है?

 प्लास्टिक  का कोई विकल्प है?
- नीरज नैयर
ऐसे वक्त में जब प्लास्टिक के दुष्प्रभाव को लेकर बहस छिड़ी हुई है, यह कहना से यस टू प्लास्टिक किसी के गले नहीं उतरने वाला। वैसे गले उतरने वाली बात भी नहीं है, प्लास्टिक के खतरों से हम सब अच्छी तरह वाकि$फ हैं। आज प्लास्टिक की प्रलय से दुनिया का कोई भी कोना अछूता नहीं है। एक वर्ग किलोमीटर समुद्र में प्लास्टिक के औसतन 46000 टुकड़े तैरते रहते हैं। हिमालय की बर्फ से ढकीं चोटियां भी पर्वतरोहियों द्वारा छोड़े गये मलबों से पट रही हैं। लंदन की टेम्स नदी ही जब भारतीयों द्वारा आस्था के नाम पर फेंके जा रहे प्लास्टिक बैग्स से त्रस्त हैं तो फिर देश की नदियों के बारे में क्या कहना। यमुना ने तो दमतोड़ ही दिया और बाकी कुछ-एक दम तोडऩे के कगार पर हैं। बावजूद इसके ठीक उसी तरह जिस तरह एक सिक्के के दो पहलू होते हैं प्लास्टिक का दूसरा रूप भी है।
पर्यावरणविद भले ही लंबे समय से प्लास्टिक को खतरा मानकर प्रयोग न करने के लिए जागरुकता अभियान चल रहे हों मगर सही मायनों में देखा जाए तो इसके बिना सुविधाजनक जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। प्लास्टिक किसी भी अन्य विकल्प जैसे धातु, कांच या कागज आदि की तुलना में कहीं ज्यादा मुफीद है। आज साबुन, तेल, दूध आदि वस्तुओं की प्लास्टिक पैकिंग की बदौलत ही इन्हें लाना-ले-जाना इतना आसान हो पाया है। प्लास्टिक पैकिंग कार्बन डाई आक्साइड और ऑॅक्सीजन के अनुपात को संतुलित रखती है जिसकी वजह से लंबा सफर तय करने के बाद भी खाने-पीने की वस्तुएं ताजी और पौष्टिक बनी रहती हैं। किसी अन्य पैकिंग के साथ ऐसा मुमकिन नहीं हो सकता। इसके साथ ही वाहन उद्योग, हवाई जहाज, नौका, खेल, सिंचाई, खेती और चिकित्सा के उपकरण आदि जीवन के हर क्षेत्र में प्लास्टिक का ही बोलबाला है। भवन निर्माण से लेकर साज-सज्जा तक प्लास्टिक का कोई सानी नहीं है।
प्लास्टिक को लेकर उठे विवाद के बीच इंडियन पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री के एक शोध ने इसकी मुखालफत करने वालों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। बिजली की बचत में प्लास्टिक की भूमिका को दर्शाने के लिए किए गये इस शोध में कांच की बोतलों के स्थान पर प्लास्टिक की बोतल के प्रयोग से 4 हजार मेगावाट बिजली की बचत हुई। जैसा की पर्यावरणवादी दलीलें देते रहे हैं, अगर प्लास्टिक पर पूर्णरूप प्रतिबंध लगा दिया जाए तो इसका सबसे विपरीत प्रभाव पर्यावरण पर ही पड़ेगा। पैकेजिंग उद्योग में लगभग 52 फीसदी इस्तेमाल प्लास्टिक का ही होता है। ऐसे में प्लास्टिक के बजाए अगर कागज का प्रयोग किया जाने लगें तो दस साल में बढ़े हुए तकरीबन 2 करोड़ पेड़ों को काटना होगा। वृक्षों की हमारे जीवन में क्या अहमियत है यह बताने की शायद जरूरत नहीं। वृक्ष न सिर्फ तापमान को नियंत्रित रखते हैं बल्कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी अहम् किरदार निभाते हैं। पेड़ों द्वारा अधिक मात्रा में कार्बनडाईआक्साइड के अवशोषण और नमी बढ़ाने से वातावरण में शीतलता आती है। अब ऐसे में वृक्षों को काटने का परिणाम कितना भयानक होगा इसका अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है। साथ ही कागज की पैकिंग प्लास्टिक के मुकाबले कई गुना महंगी साबित होगी और इसमें खाद्य पदार्थों र्के सडऩे आदि का खतरा भी बढ़ जाएगा। ऐसे ही लोगों तक पेयजल मुहैया कराने में प्लास्टिक का महत्वूर्ण योगदान है, जरा सोचें कि अगर पीवीसी पाइप ही न हो तो पानी कहां से आएगा। जूट की जगह प्लास्टिक के बोरों के उपयोग से 12000 करोड़ रुपए की बचत होती है। अब इतना जब जानने-समझने के बाद भी प्लास्टिक की उपयोगिता को नजर अंदाज करके यह कहना कि इससे जीवन दुश्वार हो गया है, कोई समझदारी की बात नहीं।
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सवाल प्लास्टिक या इसके इस्तेमाल को खत्म करने का नहीं बल्कि इसके वाजिब प्रयोग का है। यह बात सही है कि प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से इसके कचरे में वृद्धि हुई है। और इसे जलाकर ही नष्ट किया जा सकता है पर अगर ऐसा किया जाता है तो यह पर्यावरण के लिए घातक साबित होगा। ऐसे में इस समस्या का केवल एक ही समाधन है, रिसाईकिलिंग।
कुछ समय पूर्व पर्यावरण मंत्रालय ने प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने के उपाए सुझाने के लिए एक समिति घटित की थी जिसने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया था कि प्लास्टिक की मोटाई 20 की जगह 100 माइक्रोन तय की जानी चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक को रिसाईकिलिंग किया जा सके। वैसे भी भारत में सालाना प्रति व्यक्ति प्लास्टिक उपयोग 0. 3 किलो है, जो विश्व औसत 19 किलो से खासा कम है। इसलिए ज्यादा चिंता की बात नहीं।
सही मायने में देखा जाए तो इस समस्या के विस्तार का सबसे प्रमुख और अहम् कारण हमारी सरकार का ढुलमुल रवैया है। पर्यावरणवादी भी मानते हैं कि सरकार को विदेशों से सबक लेना चाहिए, जहां निर्माता को ही उसके उत्पाद के तमाम पहलुओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इसे निर्माता की जिम्मेदारी नाम दिया गया है। उत्पाद के कचरे को वापस लेकर रिसाईकिलिंग करने तक की पूरी जिम्मेदारी निर्माता की ही होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादित प्लास्टिक में से 45 फीसदी कचरा बन जाती है और महज 45 फीसदी ही रिसाईकिल हो पाती है। मतलब साफ है, हमारे देश में रिसाईकिलिंग का ग्राफ काफी नीचे है। प्लास्टिक को अगर अधिक से अधिक रिसाईकिलिंग योग्य बनाया जाए तो कचरे की समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाएगी। इसके साथ-साथ प्लास्टिक के बेजा उपयोग को लेकर नियम और कायदों को भी सख्त बनाने की जरूरत है।
हमारे देश में पर्यटन स्थलों पर आने वाले सैलानी अपनी मनमर्जी के मुताबिक प्लास्टिक बैग्स को यहां-वहां फैंक जाते हैं। इससे न केवल उस क्षेत्र की खूबसूरती खराब होती है बल्कि उसका खामियाजा पर्यावरण को उठाना पड़ता है। वर्ष 2003 में हिमाचल सरकार ने भारत के पहले राज्य के रूप में इस दिशा में अनूठी पहल की थी। राज्य सरकार ने ऐसा कानून बनाया था जिसके तहत पॉलिथिन बैग का प्रयोग करते पाए जाने पर सात साल की कैद या एक लाख रुपए जुर्माने का प्रावधान था। ठीक ऐसे ही दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने पर्यटन क्षेत्रों में प्लास्टिक बैगों के उपयोग पर दस साल की सजा और आयरलैंड सरकार ने प्लास्टिक बैगों पर टैक्स लगाकर इसके प्रयोग को काबू में किया था। प्लास्टिक में भले ही कितनी खामियां क्यों न हो मगर इसकी उपयोगिता से आंखे नहीं मूंदी जा सकती। लिहाजा सरकार को इस पर प्रतिबंध की बात सोचने के बजाए मौजूद अन्य विकल्पों पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है।

संकट के भूरे बादल

संकट के भूरे बादल
- प्रो. राधाकांत चतुर्वेदी

एशिया के 13 महानगरों जैसे मुम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, बेजिंग, शंघाई, काहिरा, बैंकाक इत्यादि पर तो इन संकट के बादलों का इतना घना जमावड़ा देखा जा रहा है कि इससे सूर्य का प्रकाश भी 25 प्रतिशत तक बाधित हो जाता है।

ये घातक बादल सिर्फ एशिया के लिए ही संकटपूर्ण स्थिति उत्पन्न करते हैं। वास्तविक में तो हवा के बहाव में ये बादल तीन चार दिनों में एशिया जैसा विशाल महाद्वीप लांघकर कभी-कभी अन्य महाद्वीपों पर संकट बरसाने पहुंच जाते हैं। यह भूरे बादल उत्तर और दक्षिण अमरीका, योरप और दक्षिण अफ्रीका के ऊपर मंडराते देखे जाते हैं।
संयुक्त राष्टर द्वारा विश्व के कुछ प्रसिद्ध पर्यावरण वैज्ञानिकों के शोध परिणामों पर आधारित एक रिपोर्ट पिछले दिनों जारी की गई है जिसमें दिए हुए तथ्य हम भारतीयों के लिए रोंगटे खड़े करने वाले हैं।
देखा गया है कि पूर्व में ईरान की खाड़ी से लेकर शेष पूरे एशिया पर गहरे भूरे रंग के घने बादल छाये रहते हैं। ये बादल लकड़ी जलाने से निकले धुएं के साथ फैक्टरियों से निकले तमाम तरह के हानिकारक रासायनिक कणों से मिले धुएं के मिलने से बनते हैं। इनसे पूरे विश्व के विशेषतया एशिया के देशों के पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। इन बादलों की मोटाई तीन किलोमीटर तक होती है। अपनी विशाल जनसंख्या के कारण भारत और चीन इस आकाशीय आपदा से सबसे ज्यादा खतरे में हैं।
एशिया के 13 महानगरों जैसे मुम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, बेजिंग, शंघाई, काहिरा, बैंकाक इत्यादि पर तो इन संकट के बादलों का इतना घना जमावड़ा देखा जा रहा है कि इससे सूर्य का प्रकाश भी 25 प्रतिशत तक बाधित हो जाता है।
इस तरह के बादलों से अनेक तरह की प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियां उत्पन्न होती है। विश्वास किया जाता है कि इसी का परिणाम है कि भारत में मानसून के वर्षाकाल में कमी आई है और धान, गेहूं और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ा है। इस संकटपूर्ण बादलों में कुछ ऐसे कण होते हैं जो सूर्य के प्रकाश को सोख लेते हैं और वायुमंडल का तापमान बढ़ाते हैं। इससे हिमालय के ग्लेशियर, (बर्फ की नदियां) जो कि एशिया की प्रमुख नदियों के स्त्रोत हैं, तेजी से पिघलने लगी हैं।
चीन की विज्ञान अकादमी के अनुसार 1950 से अब तक हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में 5 प्रतिशत की कमी हो चुकी है और सन् 2050 तक इसमें 75 प्रतिशत तक की कमी होने की आशंका है। यह बहुत ही भयावह स्थिति होगी। इससे भारत में ही नहीं बल्कि आसपास के अनेक देशों में पानी का अकाल पड़ जाएगा।

इसी अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है इस प्रदूषण जनित बादलों में कुछ ऐसे विषैले रासायनिक कण होते है जिनसे मानव तथा अन्य सभी जीव जन्तुओं और वनस्पति पर इसका घातक प्रभाव पड़ता है। मानव को श्वास प्रणाली संबंधित बीमारियों से भारत और चीन में प्रत्येक वर्ष लगभग साढ़े तीन लाख मनुष्यों की अकाल मृत्यु होती है।
ऐसा नहीं है कि ये घातक बादल सिर्फ एशिया के लिए ही संकटपूर्ण स्थिति उत्पन्न करते हैं। वास्तविक में तो हवा के बहाव में ये बादल तीन चार दिनों में एशिया जैसा विशाल महाद्वीप लांघकर कभी-कभी अन्य महाद्वीपों पर संकट बरसाने पहुंच जाते हैं। यह भूरे बादल उत्तर और दक्षिण अमरीका, योरप और दक्षिण अफ्रीका के ऊपर मंडराते देखे जाते हैं।
संयुक्त राष्टर संघ द्वारा प्रायोजित वैज्ञानिकों के अंर्तराष्टरीय समूह के सात वर्षों के विस्तृत शोध के उपरोक्त निष्कर्षों से यही चेतावनी मिल रही है कि पर्यावरण का प्रदूषण एक विश्वव्यापी विकराल संकट बन चुका है जिससे मानव समाज के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है।
इस संकट से उभरने के लिए संयुक्त राष्टर संघ, सभी देशों की सरकारों, उद्योगों और फैक्टरियां चलाने वाले औद्योगिक समूहों को इस संकटपूर्ण स्थिति से निपटने के लिए युद्धस्तर पर कारगर कदम उठाने के लिए कह ही रही है, परंतु इस चेतावनी से हम सभी को भी व्यक्तिगत स्तर पर भी इस बात का एहसास होना चाहिए कि अब हम ऐसे युग में पहुंच गए हैं कि पर्यावरण के प्रदूषण के कारण हमारा अस्तित्व ही संकटग्रस्त हो गया है। अतएव हम सभी को निजी स्तर पर भी पर्यावरण को प्रदूषण से बचाए रखने के लिए सक्रिय रहना चाहिए। क्योंकि पर्यावरण की सुरक्षा सर्वोच्च मानवीय धर्म है।

वनों की रक्षक भील महिलाएँ


किस बात ने उन्हें अपने वनों की रक्षक बनने और इतना हरा बनाने के लिए प्रेरित किया- इस एक प्रश्न के जवाब में मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के अट्टा गांव की एक भील महिला, दहेली बाई ने कहा, 'मुझे बहुत गुस्सा आया कि शहरों में लकड़ी की पूर्ति के लिए हमारे सारे जंगलों के काटने के बाद, वन विभाग जगंल के विनाश के लिए हमें दोषी ठहरा रहा है। तो मैंनें अपने गांव की महिलाओं को इकट्ठा किया और इन पहाडि़यों की सुरक्षा करना शुरु किया। अब कोई हम पर आरोप नहीं लगा सकता'।
गुजरात में भड़ौच के मैदानों में प्रवेश करने से पहले विंध्याचल की वृहद आखिरी श्रृंखला को बनाता हुआ अलीराजपुर का सौंदवा ब्लॉक नर्मदा नदी के एक किनारे पर्वतीय इलाका है। ढलानों में पलती लाल मिट्टी के साथ घाटी की संकरी पट्टियों में मध्यम गहराई वाली कुछ काली मिट्टी होती है। खराब भूमिगत जलदायी गुणों के साथ इसके नीचे हैं असिताश्मिी (बसॉल्टिक) सख्त पत्थर। औसत वार्षिक वर्षा 900 मिलीमीटर है, जो बारिश के मौसम (मध्य जून से मध्य अक्तूबर) में होती है। भील आदिवासियों ने इस अर्धशुष्क पर्यावरण तंत्र को घाटी में जैविक कृषि द्वारा अपना लिया है और इसकी पूर्ति वे जंगलों से एकत्रित उत्पादों से करते हैं जिसमें पतझड़ी पेड़ जैसे टीक, शीशम, अंजान तथा सलाई और प्रचुर मात्रा में घास, जड़ी और बूटियां शामिल हैं। नीचे सख्त पत्थर होने के बावजूद, जंगल की हरियाली सुनिश्चित करती है कि पत्थरों की दरारों के माध्यम से बारिश के पानी से पर्याप्त प्राकृतिक पुन: पूर्ति होती रहे। फलस्वरुप, झरनों में पूरे साल पानी रहता था।
1956 में राज्यों के पुनर्गठन और मध्यप्रदेश के गठन से चीजों मेंबहुत अधिक परिवर्तन आया। अलीराजपुर पर पहले एक सामंती युवराज का शासन था, जिसका आदिवासियों पर बहुत अधिक नियंत्रण नहीं था और वे अधिकतर मिलकर श्रम करने की परम्पराओं से काफी नजदीकी से जुड़े समुदाय के रूप में रहते थे। जब यह क्षेत्र वन विभाग को सौंपा गया तब से लकड़ी उत्पादन के लिए इसका वाणिज्यिक शोषण आरंभ हुआ।
इससे नाजुक पर्वतीय पर्यावरण-तंत्र बिगड़ गया और जंगलों के खत्म होने से जल्दी ही मिट्टी की पतली परतें बह गईं और बारिश की प्राकृतिक पुनपूर्ति भी काफी हद तक घट गई, जिसके परिणामस्वरुप झरने सूख गए। हां, सबसे अधिक प्रभाव भीलों की आजीविका पर हुआ चूंकि उनकी जमीनों की उर्वरता के साथ- साथ वन उत्पादों की आपूर्ति भी गंभीर रूप से घट गई। इसके साथ, भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों ने सुनिश्चित किया कि उन्हें उनके ही घर में अपराधी माना जाए और उन्हें जंगल में पहुंच के लिए वन अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए मजबूर होना पड़ा।
फिर 1983 में, आदिवासियों ने अपने अधिकारों, विशेषकर जंगलों की सुरक्षा के अधिकार की मांग करने के लिए स्वयं को संगठित करना आरंभ किया, जो उनका जीवन है। उन्होंने मजदूर चेतना संगठन का गठन किया और जंगलों की सुरक्षा आरंभ की दी, जोकि सौंदवा ब्लॉक के करीब 50 गांवों में निरावृत हो चुके थे। दहेली बाई के नेतृत्व में, अट्टा गांव की महिलाओं ने संघर्ष शुरू किया और जल्द ही पास के गांवों में फैल गया। वेस्ती बाई के साथ दहेली बाई, नदिका के साथ ऊपर की ओर गईं जो उनके गांव से होते हुए गेंद्रा और फदतला गांव को जाती है और वहां महिलाओं को समझाया कि चूंकि यह धारा फदतला से शुरू होती है, मिट्टी, पानी और वन उत्पादों की उपलब्धता के रूप में वन सुरक्षा का पूर्ण लाभ तभी मिलेगा जब वे भी अपने जंगलों की सुरक्षा करना आरंभ करेंगीं। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के कारण अट्टा की नदी गर्मियों में सूखने लगी। इस प्रयास का शुक्र है, 10 वर्षों में- 1990 के आरंभ से- नदी फिर से बाहरमासी हो गई।
इस संरक्षण का अनोखापन है, इसकी भीलों की पारम्परिक मिलकर श्रम करने की प्रथा पर निर्भरता- जो पैसों की अर्थव्यवस्था के अंदर आने और प्राकृतिक संसाधनों के आधार के विनाश से फीकी पड़ती जा रही थी। हालांकि, दहेली बाई के नेतृत्व में, अट्टा की महिलाओं ने पांच या छह का समूह बनाया और जंगल की रखवाली शुरू की ताकि यह सुनिश्चित हो कि जंगलों को चरा नहीं गया और जड़ों का पुनर्जीवित होने दिया जाए। इसके बाद, उन्होंंने सुनिश्चित किया कि कुछ पेड़ों को न काटा जाए। घास केवन मानसून के बाद ही काटी जाए और सुरक्षा करने वाले परिवारों में बराबर बांटी जाए जिसे जानवरों के चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
अपनी सफलता से प्रोत्साहित होकर, अट्टा की महिलाओं ने एक और संरक्षण गतिविधि शुरू की। छोटी टामों ने समूहों में अपने सदस्यों के खेतों में काम करना शुरू किया। खेतों के बीच की गलियों को पत्थरों से भरा ताकि बारिश के पानी के साथ बहने वाली मिट्टी और कुछ पानी को रोका जा सके। डेढ़ दशक की अवधि में, 1990 के मध्य से, सैंकड़ों ऐसी गलियों को भरा गया जिसके परिणाम स्वरूप गहरी मिट्टी के साथ कई सारे छोटे भूमि के टुकड़ों का निर्माण हुआ जिससे गांव की पैदावार में वृद्घि हुई। यह अभ्यास भी अलीराजपुर के कई अन्य गांवों में दोहराया गया।
नर्मदा नदी के किनारे पर बसे ककराना गांव की महिलाओं ने अपने जंगलों की सुरक्षा करते हुए अनुकरणीय हिम्मत दिखाई। चूंकि वे अलीराजपुर की सीमा पर हैं उन्हें गैर कानूनी रूप से उनकी लकड़ी चुराने वालों का लगातार सामना करना पड़ता है। अंतत: उन्हें निर्णय लेना पड़ा किकिसी को स्थायी रूप से जंगल के अंदर ही रहना पड़ेगा ताकि वह लकड़ी चुराने वालों के आते ही सावधान कर सकें। रैजा बाई, और उनके पति डीलू, ने इस चुनौती को उठाने का फैसला किया और उन्होंने जंगल में अपनी झोपड़ी बनाई। वे वहां अकेले अपने बच्चों के साथ रहते हैं।
जब रैजा बाई से जंगल में अकेले रहने के खतरों के बारे में पूछा गया, उन्होंने कहा, 'मैंने जंगल में इस झोपड़ें में एक दशक गुजारा है और जब से मैं यहां आई हूं मेरी जिंदगी गांव से बेहतर रही है'। झनदना, सुगत, ककराना और चमेली गांव के लोगों को भी शुरुआत में अपने गांव की सीमा पर एक अन्य जंगल की सुरक्षा में परेशानी हुई जो कि पहाड़ी पर था। हालांकि, काफी जद्दोजहद के बाद, केएमसीएस के सदस्यों की मदद से वे अपने अंतरों को सुलझाने में सफल रहे। आज, यह जंगल भी देदीप्यमान और दूर से नजर आता है।
राहुल बैनर्जी, जिन्होंने ढाई दशक इस क्षेत्र में रिसर्च और प्राकृतिक संसाधन प्रबंध प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन में बिताया है, उनका मत है कि, 'जंगल, जमीन और पानी के संरक्षण के लिए समुदाय द्वारा सामूहिक कार्यवाही ही एकमात्र दीर्घोपयोगी तरीका है जिसमें देश के पर्वतीय, अर्धशुष्क और सख्त पथरीले क्षेत्रों के नाजुक पर्यावरण-तंत्रों की उत्पादकता को सुनिश्चित किया जा सकता है'।
बैनर्जी, जो भारतीय तकनीकि संस्था, खडग़पुर से सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट हैं, आगे कहते हैं, कि 'इस वर्ष नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वालों में से एक, एलिनोर आस्ट्रॉम, को बिल्कुल इसीलिए, दीर्घोपयोगी प्राकृतिक संसाधन प्रबंध के लिए सामुदायिक सामूहिक कार्यवाही की व्यवहार्यता स्थापित करने के सैद्घांतिक और प्रयोगाश्रित कार्य के लिए सम्मान दिया गया है। इस प्रकार यह अलीराजपुर में केएमसीएस की महिलाओं द्वारा किए गए अनुकरणीय कार्य पर मुद्रण- अनुमति के समान है। बढ़ते जंगल, बहते पानी की अधिक उपलब्धता के परिणामस्वरूप कृत्रिम ऊर्जा की मांग में कमी और जैविक तरीकों से प्राप्त बेहतर कृषि उत्पादकता, ये सभी जलवायु परिवर्तन के समाप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं'।
और जब यह सब सामुदायिक सामूहिक कार्यवाही के माध्यम से किया जाता है, विशेषकर महिलाओं द्वारा, तो सामाजिक न्याय के रूप में लाभ एक अतिरिक्त फायदा होता है। (विमेन्स फीचर सर्विस)

गर्म होती धरती और कम होती फसल


गर्म होती धरती और कम होती फसल
तपती धरती के चलते बढ़ता समुद्र स्तर, पिघलते ग्लेशियर, अंटार्टिक का पिघलता बर्फ वगैरह तो

प्राय: समाचारों में छाए रहते हैं। मगर धरती के गर्म होने का फसल उत्पादन पर सीधा क्या असर होगा इसे लेकर अध्ययन अभी शुरू ही हुए हैं। ये अध्ययन बहुत आशाजनक तस्वीर नहीं बताते। उदाहरण के लिए, कोलंबिया विश्वविद्यालय के वोल्फ्राम श्लेंकर और नॉर्थ कैरोलिना राज्य विश्वविद्यालय के माइकल रॉबट्र्स ने हाल ही में 1950 से 2005 तक के मौसम पैटर्न और यूएस की तीन प्रमुख फसलों- मक्का, कपास और सोयाबीन- की उपज के परस्पर सम्बंधों का अध्ययन किया है। वे बताते हैं कि किसी वर्ष में फसल की उपज कितनी रहेगी इसका सबसे स्पष्ट सम्बंध इस बात से नजऱ आता है कि उस वर्ष कितनी बार तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से ऊपर गया था और ऐसा ऊंचा तापमान कितने दिनों तक रहा था। तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से कम रहे तो जितना गर्म हो उपज उतनी अच्छी होती है। मगर 29 डिग्री से ऊपर यही गर्मी नुकसानदायक साबित होती है। श्लेंकर और रॉबट्र्स ने इस बात का विश्लेषण करने के लिए डिग्री-दिन आंकड़े का उपयोग किया है। इसका मतलब होता है कि तापमान 29 डिग्री से कितना ऊपर गया और कितने समय तक ऊपर रहा। उन्होंने देखा कि फिलहाल यूएस में फसलों को ऐसे कुल 53 डिग्री-दिनों का सामना करना पड़ता है जब तापमान 29 डिग्री से ऊपर रहता है। यदि सब कुछ आज की तरह चलता रहा और वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड वृद्धि को रोकने के कोई उपाय न किए गए तो इस अध्ययन के मुताबिक इस सदी के अंत तक मक्का की उपज में 80 प्रतिशत तक की कमी आएगी। यदि कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन को घटाकर 1991 के स्तर से आधे पर लाया गया, जो लक्षित है, तो भी उपज में 30-46 प्रतिशत की कमी आने की आशंका है। भारत के लिए ऐसे अध्ययन नहीं हुए हैं। मगर गौरतलब बात यह है कि फिलहाल यूएस दुनिया का सबसे बड़ा मक्का व सोयाबीन उत्पादक व निर्यातक है। लिहाज़ा यदि यूएस में इनकी उपज कम होती है तो असर वहीं तक सीमित नहीं रहेगा।