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Oct 20, 2014

शान्ति की साझा विरासत

 बचपन और बालिका शिक्षा के लिए नोबेल
कैलाश सत्यार्थी और मलाला को नोबेल के बहाने भारत-पाकिस्तान की शान्ति की साझा विरासत
                        - आकांक्षा यादव
बचपन एक ऐसी अवस्था है, जो हर किसी का भविष्य निर्धारित करती है।  आज जरूरत इस बचपन को बचाने की है। बचपन का न तो कोई जाति होती है, न धर्म और न ही इसे देशों की परिधि से बाँधा जा सकता है।  तभी तो नोबेल समिति ने जब इस साल के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा की तो बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले भारत के कैलाश सत्यार्थी और बालिकाओं की शिक्षा के लिए कार्य करने वाली पाकिस्तान की सामाजिक कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई को संयुक्त रूप से चुना। बचपन बचाओ आन्दोलन से जुड़े सत्यार्थी ने कयों का बचपन बचाने के लिए कार्य किया वहीं मलाला ने बचपन के कटु अनुभवों और हादसे का शिकार होने के बावजूद लकियों की शिक्षा के लिए अलख जगाई रखी। सत्यार्थी नोबेल शान्ति पुरस्कार पाने वाले दूसरे और नोबेल पाने वाले सातवें भारतीय हैं। इससे पहले मदर टेरेसा को यह अवॉर्ड मिला था। वहीं 17 साल की मलाला सबसे कम उम्र में यह अवॉर्ड पाने वाली शख्सियत बनी हैं। यह अजब संयोग है कि भारतीय और पाकिस्तानी को संयुक्त रूप से शान्ति के नोबेल की घोषणा ऐसे वक्त में हुई है ,जब दोनों देशों की सीमा पर भारी तनाव है। पुरस्कार समिति के जूरी ने कहा, 'नार्वे की नोबेल समिति ने निर्णय किया है कि 2014 के लिए शान्ति का नोबेल पुरस्कार कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ उनके संघर्ष तथा सभी बच्चों की शिक्षा के अधिकार के लिए उनके प्रयासों के लिए दिया जाए। नोबेल समिति ने कहा कि एनजीओ 'बचपन बचाओ आंदोलनचलाने वाले सत्यार्थी ने महात्मा गांधी की परंपरा को बरकरार रखा और 'वित्तीय लाभ के लिए होने वाले बच्चों के गंभीर शोषण के खिलाफ विभिन्न प्रकार के शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है।समिति ने कहा कि वह 'एक हिंदू और एक मुस्लिम, एक भारतीय और एक पाकिस्तानी के शिक्षा और आतंकवाद के खिलाफ साझा संघर्ष में शामिल होने को महत्त्वपूर्ण बिंदु  मानते हैं।
      कैलाश सत्यार्थी का नोबेल के लिए नाम भारत में भले ही कयों को चौंका गया हो पर विदेशों में उनके कार्यों की अक्सर चर्चा और सराहना होती रहती है। वस्तुत: यह पुरस्कार बच्चों के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष की जीत है। सत्यार्थी ने  नोबेल कमेटी  का आभार व्यक्त करते हुए कहा भीहैकि उसने आज के आधुनिक युग में भी दुर्दशा के शिकार लाखों बच्चों की दर्द को पहचाना है। मूलत: मध्य प्रदेश के विदिशा जनपद के  निवासी कैलाश सत्यार्थी ने वर्ष 1983 में बालश्रम के खिलाफ बचपन बचाओआंदोलन की स्थापना की थी। उनका यह संगठन अब तक 80,000 से ज्यादा बच्चों को बंधुआ मजदूरी, मानव तस्करी और बालश्रम के चंगुल से छुड़ा चुका है। गैर-सरकारी संगठनों तथा कार्यकर्ताओं की सहायता से कैलाश सत्यार्थी ने हजारों ऐसी फैक्टरियों तथा गोदामों पर छापे पड़वाए, जिनमें बच्चों से काम करवाया जा रहा था। मूलत: कैलाश सत्यार्थी एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे, जो 26 वर्ष की आयु में बाल अधिकारों के लिए काम करने लगे। कैलाश सत्यार्थी ने श्रगमार्कश् (त्नहउंता) की भी शुरुआत की, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि तैयार कारपेट (कालीनों) तथा अन्य कपड़ों के निर्माण में बच्चों से काम नहीं करवाया गया है। उनकी इस पहल से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करने में काफी सफलता मिली। कैलाश सत्यार्थी ने विभिन्न रूपों में प्रदर्शनों तथा विरोध-प्रदर्शनों की परिकल्पना और नेतृत्व को अंजाम दिया, जो सभी शान्तिपूर्ण ढंग से पूरे किए गए। इन सभी का मुख्य उद्देश्य आर्थिक लाभ के लिए बच्चों के शोषण के खिलाफ काम करना था।
       पूरी दुनिया में सबसे कम उम्र  में नोबेल पुरस्कार हेतु चयनित होने वाली मलाला यूसुफजई भी पाकिस्तान में बच्चों की शिक्षा से जुड़ी हैं। मलाला का जीवन संघर्ष और साहस की दास्तां है। 17 वर्षीय मलाला तब सुर्खियों में आईं जब  बालिकाओं की शिक्षा की हिमायत करने को लेकर अक्टूबर, 2012 में पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर इलाके में स्कूल से घर जाते समय तालिबान के बंदूकधारियों ने मलाला को गोली मार दी थी। हमले के बाद उन्हें  विशेष इलाज के लिए ब्रिटेन भेजा गया था। मलाला  इस पुरस्कार को पाने वाली प्रथम पाकिस्तानी और सबसे कम उम्र की होंगी। उन्होंने यह पुरस्कार उन बच्चों को समर्पित किया जिनकी आवाज सुने जाने की जरूरत है।  मलाला की मासूमियत और शिक्षा के प्रति अनुराग को इसी से समझा जा सकता है कि उन्हें भले ही दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया हो, लेकिन उनकी मुख्य चिंता आने वाले समय में उनकी स्कूली परीक्षाओं को लेकर बनी हुई है।  उन्हें इस बात की चिंता है कि पुरस्कार ग्रहण करने के वक्त की उनकी पढ़ाई छूट जाएगी। सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता के रूप में मलाला ने बर्मिंघम के मकान में अपनी पहली शाम अपने पिता के साथ पाकिस्तानी टीवी देखते हुए बिताया। उन्होंने कहा, ‘मुझे जुकाम हो गया है और अच्छा महसूस नहीं हो रहा है।इस पाकिस्तानी किशोरी के लिए दुनिया भर से संदेशों का अम्बार लग गया, जिन्हें तालिबान हमले के बाद मस्तिष्क की सर्जरी के लिए विमान से बर्मिंघम लाया गया था, ताकि उनकी जान बच सके। मलाला ने कहा, ‘मैं बहुत सम्मानित महसूस कर रही हूँऔर खुश हूँ। लोगों के प्रेम ने सचमुच में मुझे गोलीबारी से उबरने में और मजबूत होने में मदद की। इसलिए मैं वह सब कुछ करना चाहती हूँ जिससे समाज को योगदान मिल सके।
       मलाला इस बात से अवगत थीं कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल सकता है। पुरस्कार की घोषणा होने के बाद उनके रसायन विज्ञान के क्लास में शुक्रवार को सुबह 10 बजे के बाद शिक्षक के आने की व्यवस्था की गई थी। उन्होंने बताया, ‘हम ताँबे की इलेक्ट्रोलाइसिस के बारे में पढ़ रहे हैं। मेरे पास मोबाइल फोन नहीं है, इसलिए मेरी शिक्षक ने कहा था कि अगर ऐसी कोई खबर होगी तो वह आएगी। लेकिन सवा दस बज गए और वह नहीं आई। इसलिए मैंने सोचा कि मुझे पुरस्कार नहीं मिला। मैं बहुत छोटी हूँ और मैं अपने काम के शुरुआती दौर में हूँ।पर कुछ ही मिनट बाद शिक्षक आ गईं और यह खबर दी। मलाला ने बताया, ‘मुझे लगता है कि मेरे शिक्षक मुझसे ज्यादा उत्साहित थे। उनके चेहरों की मुस्कान मुझसे ज्यादा थी। मैं फिर अपने भौतिक विज्ञान की क्लास के लिए गई।
       एक तरफ बचपन और बालिका शिक्षा को लेकर दुनिया  का सबसे बड़ा पुरस्कार, वहीं दोनों देशों के सम्बन्धों की बिसात पर कुछ लोग इसे कूटनीतिक नजरिये से भी देखते हैं। पर इसके बावजूद  सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई दोनों देशों के बीच मजबूत सम्बन्ध बनाने के लिए संयुक्त रूप से काम करने को राजी हैं। मलाला ने कहा, ‘हम साथ काम करेंगे और भारत एवं पाकिस्तान के बीच मजबूत सम्बन्ध बनाने की कोशिश करेंगे। लड़ाई के बजाय प्रगति और विकास के लिए काम करना जरूरी हैफिलहाल लोगों की निगाहें एक बार फिर से बचपन पर हैं और साथ ही भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों पर।  सत्यार्थी और मलाला की संयुक्त मुहिम इसमें कितना रंग लाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा पर इन दोनों को सम्मान मिलने से एक बार फिर लोगों का ध्यान बाल श्रम, बाल दासता, बच्चों के यौन शोषण, बालिका शिक्षा जैसे अहम मुद्दों पर गया है। वाकई आज जरूरत बचपन को सहेजने की है और यही इस पुरस्कार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

सम्पर्क: टाइप 5  निदेशक बंगला, जी.पी.ओ कैम्पस, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद (उ.प्र.) 211001,kk_akanksha@yahoo.com, http:// shabdshikhar.blogspot.in

परम्परा

 शिवरीनारायण
   में तांत्रिक परम्परा
       -प्रो. अश्विनी केशरवानी

महानदीशिवनाथ और जोंक नदी के त्रिधारा संगम के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी के नाम से विख्यात शिवरीनारायण अप्रतिम सौंदर्य और चतुर्भुजी विष्णु की मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे श्री पुरुषोश्रम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है। हर युग में इस नगर का अस्तित्व रहा है और सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर और द्वापरयुग में विष्णुपुरी तथा नारायणपुर के नाम से विख्यात यह नगर मतंग ऋषि का गुरुकुल आश्रम और शबरी की साधना- स्थली भी रहा है। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर यहीं खा थे और उन्हें मोक्ष प्रदान करके इस घनघोर दंडकारण्य वन में आर्य संस्कृति के बीज प्रस्फुटित कि थे। शबरी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए शबरी-नारायण नगर बसा है। भगवान श्रीराम का नारायणी रूप आज भी यहाँ गुप्त रूप से विराजमान हैं। कदाचित् इसी कारण इसे गुप्त तीर्थधाम कहा गया है। याज्ञवल्क्य संहिता और रामावतार चरि में इसका उल्लेख है। भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्तियों को यहीं से पुरी (उड़ीसा) ले जाया गया था। प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को भगवान् जगन्नाथ यहाँ विराजते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। शिवरीनारायण की महत्ता जगन्नाथपुरी से किसी प्रकार कम नहीं है। कदाचित् इसी कारण इस दिन यहाँ अपार भीड़ होती है। इसी दिन से यहाँ मेला लगता है।
स्कंदपुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को श्रीसिंदूरगिरिक्षेत्र कहा गया है। प्राचीन काल में यहाँ शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में शापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बाँस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र -मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर नीलमाधव कहा गया। इसी नीलमाधव को 14 वीं शताब्दी के उडिय़ा कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर  स्थापित करने की बात कही है। डॉ. जे. पी. सिंहदेव और डॉ. एल. पी. साहू ने कल्ट ऑफ जगन्नाथ और कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला में लिखते हैं-भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाले पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे; बल्कि उन्हें तांत्रिक इंद्रभूति सँभल पहाड़ी की एक गुफा में ले जाकर उसके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करता था। यहीं उन्होंने वज्रयान बुद्धिज्म की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की थी। बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मीकरा ,जिसने बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह किया, वह इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के वंशज तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र -मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान् जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि गुरु शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया।

इधर जरा अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा और अन्न जल त्यागकर मृत्यु का वरण करने के लिए उद्यत हो गया तभी भगवान नीलमाधव ने अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहाँ गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिया। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा, वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकुंठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम के रूप में पाँचवा धाम कहलाया। आज भी यहाँ भगवान नारायण का मोक्षदायी स्वरूप विद्यमान है और उनके चरण को स्पर्श करता 'रोहिणी कुंडविद्यमान है जिसकी महिमा अपार है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह ने रोहिणी कुंड को एक धाम माना है- 'रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर जबकि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शबरीनारायण माहात्म्य में मुक्ति पाने का एक साधन बताया है:
रोहिणि कुंडहि स्पर्श कर चित्रोत्पल जल न्हाय।
योग भ्रष्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।
तथ्य चाहे जो हो, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शबरीनारायण मंदिर में बहुत कुछ समानता है। दोनों मंदिर तांत्रिकों के कब्जे में था, जिसे क्रमश: आदि गुरु शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके ताँत्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। चूँकि शबरीनारायण से होकर जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग था। पथिकों को यहाँ के तांत्रिकों शेर बनकर डराते और अपने प्रभाव से मारकर खा जाते थे। इसलिए इस मार्ग में जाने में यात्रिगण भय खाते थे। एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन के लिए घूमते हुए रतनपुर पहुँचे। उनकी विद्वत्ता और पांडित्य से रतनपुर के राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें शबरीनारायण के मंदिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा। स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुँचे तब वहाँ के तांत्रिक उन्हें भी डराने के लिए शेर बनकर झपटे लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ कि शेर के रूप में तांत्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तांत्रिकों के गुरु कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ ,जिसमें कनफड़ा बाबा को पराजय का सामना करना पड़ा और डर के मारे वे जमीन के भीतर प्रवेश कर ग। इस प्रकार शबरीनारायण के मठ और मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुआ, जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तांत्रिकों के भय से मुक्ति मिली और यहाँ रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णवों का बीजारोपण हुआ। यहाँ के मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महन्त हुए और तब से आज तक इस वैष्णव मठ में 14 महन्त हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक धार्मिक, ध्यात्मिक और ईश्वर भक्त हुए। उनकी प्रेरणा से अनेक मंदिर, महानदी के किनारे घाट और मंदिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में देकर कृतार्थ ही नहीं हुए; बल्कि इस क्षेत्र में भक्ति भाव की लहर फैलाने में मदद भी की। जिस स्थान पर कनफड़ा बाबा जमीन के भीतर प्रवेश किये थे उस स्थान पर स्वामी दयाराम दास ने एक गाँधी चौरा का निर्माण कराया। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल तेरस और अश्विन शुक्ल दसमी (दशहरा) को शिवरीनारायण के महन्त इस गाधी चौरा में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रतीकात्मक रूप से यह प्रदर्शित करते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तांत्रिकों के प्रभाव से बहुत पर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे से मन्दिर के भीतर तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है और बस्ती के बाहर एक नाथ गुफा के नाम से एक मन्दिर है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।

सम्पर्क: राघव, डागा कालोनी, चाम्पा-495671 (छ.ग.) Email- ashwinikesharwani@gmail.com

लोक साहित्य में पर्यावरण चेतना

            लोक साहित्य में         
   पर्यावरण चेतना
                 - गोवर्धन यादव

लोकसाहित्य पढऩे-लिखने में एक शब्द है, पर वह वस्तुत: यह दो गहरे भावों का गठबन्धन है। लोक और साहित्य एक दूसरे के सम्पूरक, एक दूसरे में संश्लिष्ट जहाँ लोक होगा, वहाँ उसकी संस्कृति और साहित्य होगा। विश्व में कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ लोक हो और वहाँ उसकी संस्कृति न हो।
मानव मन के उद्गारों व उसकी सूक्ष्मतम अनुभूति का सजीव चित्रण यदि कहीं मिलता है तो वह लोकसाहित्य में ही मिलता है। यदि हम लोकसाहित्य को जीवन का दर्पण कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लोक सहित्य के इस महत्त्व को समझा जा सकता है कि लोककथा को लोकसाहित्य का जनक माना जाता है और लोकगीत को काव्य की जननी। लोकसाहित्य में कल्पना प्रधान साहित्य की अपेक्षा लोकजीवन का यथार्थ सहज ही देखने में मिलता है।     
लोकसाहित्य हम धरतीवासियों का साहित्य है, क्योंकि हम सदैव ही अपनी मिट्टी, जलवायु तथा सांस्कृतिक संवेदना से जुड़े रहते हैं। अत: हमें जो भी उपलब्ध होता है वह गहन अनुभूतियों तथा अभाव के कटु सत्यों पर आधारित होता है, जिसकी छाया में वह पलता और विकसित होता है। इसीलिए लोकसाहित्य हमारी सभ्यता का संरक्षक भी है।  
साहित्य का केन्द्र लोकमंगल है। इसका पूरा ताना-बाना लोकहित के आधार पर खड़ा है। किसी भी देश अथवा युग का साहित्यकार इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकता। जहाँ अनिष्ठ की कामना है, वहाँ साहित्य नहीं हो सकता। वह तो प्रकृति की तरह ही सर्वजनहित की भावना से आगे बढ़ता है।
संत शिरोमणि तुलसीदास की ये पंक्तियाँ 'कीरत भनित भूरिमल सोई-सुरसरि के सम सब कह हित होई ' अमरत्व लिए हुए है। गंगा की तरह ही साहित्य भी सभी का हित सोचता है। वह गंगा की तरह पवित्र और प्रवाहमय है, वह धरती को जीवन देता है। श्रृंगार देता है और सार्थकता भी। प्रकृति साहित्य की आत्मा है। वह अपनी मिट्टी से, अपनी जमीन से जुड़ा रहना भी साहित्य की अनिवार्यता समझता है। मिट्टी में सारे रचनाकर्म का अमृतवास रहता है। रचनाकर उसे नए-नए रुप देकर रुपायित करता है। गुरु-शिष्य परम्परा हमें प्रकृति के उपादान के नजदीक ले आती है। जहाँ कबीर का कथन प्रासंगिक है- 'गुरु कुम्हार सिख कुम्भ गढ़ी-गढ़ी काठै खोट- अन्तर हाथ सहार दे बाहर वाहे खोट' संस्कारों से दीक्षित व्यक्ति सभी प्रकार के दोष-खोट से मुक्त रहता है। इसमें लोकहित की भावना समाहित है। मलूकदास भी इन्सानियत की परिभाषा अपने शब्दों में यूँ देते हैं-'मलुका सोई पीर है, जो जाने पर पीर-जो पर पीर न जानई, सो काफ़िर बेपीर' दूसरों की पीड़ा समझने वाला इन्सान पशु-पक्षी का भी अहित नहीं सोच सकता। उसे वनस्पति के प्रति मैत्री का वह विस्तार साहित्य ही तो है।
जिज्ञासु व्यक्ति कुछ न कुछ सोचने की चेष्टा करता है। इस प्रकृति के सहचर्य से उसने बहुत कुछ सीखा है। उस काल के वेदज्ञ ब्राहमण चौदह विद्दाओं का अध्ययन करना अपना अभीष्ठ  मानते थे। सोलह कलाओं और चौदह विधाओं के अलावा वे संगीत, सामुद्रिक, ज्योतिषि, वेदाध्ययन काव्य, भाषाशास्त्र, पशुभाषा ज्ञान, तैरना, धातु विज्ञान, रसायन, रत्न परख, चातुर्य एवं अंग विज्ञान आदि अनेक विषयों में गहरी रूचियाँ रखते थे। इस बात के साक्षी है पुरातन भारतीय- ग्रंथ जो समय की सीमा को पार कर चुके हैं। मनुष्य के संचित ज्ञान और अनुभव के पहले पुस्तकाकार स्वरुप की याद आते ही दृष्टि स्वमेव ही वेदों की ओर चली जाती है। वेद वे वाड्मय जो ज्ञान कोष के रुप में सदियों से हमारा साथ देते आए हैं। ऋगवेद को सृष्टि विज्ञान की प्रथम पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। जल, अग्नि, वायु, मृदा, चारों वेदों की रचना के पीछे ये ही तत्व प्रमुख रुप से काम करते हैं। ऋगवेद मे अग्नि के रुपान्तरण कार्य और गुण की व्याख्या है, तो यजुर्वेद में विविध रुपों और गुण धर्मों की। सामवेद का प्रधान तत्व जल है, तो अथर्वेद पृथ्वी (मृदा) पर केन्द्रित है। पांचव तत्व आकाश तत्व है। सृष्टि की रचना करने वाले उस महान कुंभकार ने इन्हीं पांचों तत्वों के कच्चे माल को मिलाकर एक ऐसी ही रचना की, जो बेजोड़ है।
हमारी धरती के अस्तित्व का जो आधार है जिसे भारतीय मेधा ने भूमि माँ कहकर अभिनन्दन के स्वर अर्पित किए- माताभुमि: पुत्रोव्है पृथिव्या। अर्चन-अभिनन्दन के इन स्वरों में बहुत ही सार्थक भावभीना स्वर है। यह वैदिक पृथ्वी समूह माँ पृथ्वी की स्तुति का पावन सूत्र, प्रकृति प्रेम की अद्भुत मिसाल, पर्यावरण विमर्श का महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र, पर्यावरण प्रतिष्ठा का सारस्वत अनुष्ठान और उसके संरक्षण के लिए समर्पित शिव संकल्प, आसुरी वृत्तियों के अस्वीकार तथा दैवी वृत्तियों के स्वीकार का घोषणा-पत्र है। यह पृथ्वी की समस्त निधियों के विवेक सम्मत प्रयोग का आग्रही है। यह प्रेम के लिए नहीं, श्रेय के लिए समर्पित शोध का पक्षधर है। यह सामाजिकता, मंगलमयता में लीन हो जाने का आव्हान है। आज के पर्यावरण संकट की समस्त युक्तियों का एक सूत्रिय समाधान है। बीस कांड? ', इकतीस सूत्रों और पांच हजार नौ सौ इकहत्तर मंत्रों का महाकोष है। व्यक्ति सुखी रहे, दीर्घायु प्राप्ति करे। सदनीति पर चले, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों एवं जीव जगत के साथ साहचर्य रहे, इन्हीं कामनाओं से ओत-प्रोत यह अद्भुत ग्रंथ है।
लोक चेतना तो संस्कृति और साहित्य की परिचालक शक्ति मानी जाती है। किन्तु वर्तमान मशीनी और कम्प्युटरी समाज से लोक चेतना शून्य होती जा रही है। आज जरुरी है कि साहित्य का मूल्यांकन लोकजीवन, लोक संस्कृति की दृष्टि से किया जाना चाहिए। जो लोकसाहित्य लोकजीवन से जुड़ा होगा वही जीवन्त होगा। माना भूमि: प्रयोग है पृथीव्या: अथर्ववेद कि ऋचा का महाप्राण है। लोकजीवन इस ऋ चा के आशय का प्रतिनिधित्व युगों से करता आ रहा है। यही लोक साहित्य की आधार शिला है। लोकसाहित्य परम्परा पर आधारित होता है। अत: अपनी प्रकृति मे विकाश-शील है। इसमें नित्यप्रति परिवर्तन की संभावना बनी रहती है। इसका सृजन युगपीडा एवं सामाजिक दवाब को भी निरन्तर महसूस करता रहता है।       
सांस्कृतिक परिस्थितियों का निर्वहन ही सभ्यता कहलाती है। कुछ विद्वान सभ्यता और र्संस्कृति को एक ही मानते हैं और उसके विचार में सभ्यता और संस्कृति का विकास समान रुप से होता है। का$फी गहराई से चिंतन करें तो सभ्यता का ज्यों-ज्यों विकास होता है, त्यों-त्यों संस्कृति का ह्रास होता है। खान-पान, पहनावा सब बदलता जाता है और उसका प्रत्येक पर प्रभाव पड़ता है।
लोकसाहित्य में लोककथा- लोकनाटक तथा लोकगीतों के रखा जा सकता है। जिसमें जनपदीय भाषाओं का रसपूर्ण-कोमल भावनाओं से युक्त साहित्य होता है। भारतीय लोक साहित्य के मर्मज्ञ आर.सी, टेम्पुल के मतानुसार लोक साहित्य कि साहित्यिक दृष्टिकोण से विवेचना करना उसी सीमा तक करना उचित होगा, जिस सीमा तक उसमें निहित सुन्दरता और आकर्षण को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे। यदि लोक साहित्य की वैज्ञानिक विवेचना की जाती है तो मूल विषय नीरस और बेजान हो जाएगा। लोक के हर पहलू में संस्कृति के दिव्य दर्शन होते हैं। जरुरत है तीक्ष्ण दृष्टि और सरल सोच की। लोक साहित्य के उद्भट विद्वान देवेन्द्र सत्यार्थी ने साहित्य के अटूट भंडार को स्पष्ट तौर पर स्वीकार करते हुए कहा था- मैं तो जिस जनपद में गया, झोलियाँ भरकर मोती लाया।परलोक की धारणाएँ भी इन्हीं से जुडी है। सभी कर्मकाण्ड, पूजा-अनुष्ठान तथा उन्नत सांस्कृतिक समाज में मनुष्य के आचरण का निर्धारण इसी लोक में होता है। लोक हमारी सामाजिकता की गंगोत्री है और सभ्यता का प्रवेश द्वार भी। भारतीय जनमानस को श्रीमद् भगवद्गीता ने जितना प्रभावित किया उतना शायद किसी अन्य पुस्तक ने नहीं किया। वैष्णवी तंत्र ने गीता की जो व्याख्या की है, उसमें प्रतीक के रूप में पशु जीवन का महत्त्व प्रतिपादित होता है।
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दन:         
पार्थो वत्स सुधीर्भ?क्ता दुग्धं गीतामृतं महत।!
अर्थात उपनिषद गाय है , कृष्ण उनको दुहने वाले है, अर्जुन बछड़ा है और गीता दूध है। गीता मे प्रकृति को ईश्वर की माया के रूप में दर्शाया है। गीता के कुछ स्लोकों को (अर्थ) रेखांकित किया जा सकता है। जो तेज सूर्य और चन्द्रमा में है, उसे मेरा ही तेज मानों। मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके सभी भूत-प्राणियों के धारण करता हूँ। चन्द्रमा बनकर औषधियों का पोषण करता हूँ। जठ-राग्नि बनकर प्राणियों की देह मे प्रविष्ठ हूँ। प्राणवायु- अपानवायु से संयुक्त होकर चारों प्रकार से भोजन किए हुए प्राणियों के अन्न को पचाता हूँ। संपूर्ण भूतों (प्राणियों) के ह्रदय करता हूँ। (अध्याय।15)  
श्रीकृष्ण ने अपनी प्रकृति को अष्टकोणी बताया है। इसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश के साथ-साथ मन-बुद्धि एवं अहंकार की गणणा कि गई है। अपनी बाल-लीलाओं के माध्यम से उन्होंने जो दिव्य संदेश दिया उसका व्यापक प्रभाव लोकजीवन तथा लोकपरम्पराओं पर पड़ा। उस दिव्य संदेश के पीछे तात्पर्य यह था की वनस्पति, नदियाँ, पहाड, पशु-पक्षी, गौवें, जलचर और मनुष्य सभी इस प्रकृति के अंगीभूत स्वरुप हैं और सबका रक्षण, पोषण और विकास जरुरी है।     
पर्व और त्योहारों के इतिहास में हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास सृष्टि वस्तुत: सारे त्योहार ऐसे हैं जो प्रकृति की गोद में और प्रकृति के संरक्षण में मनाए जाते हैं। जैसे गोवर्धन पूजा, आवंला पूजन, गंगा सप्तमी, माह कार्तिक मे तुलसी पूजन आदि। ये सभी पर्व हमें अपनी प्राकृतिकता से सह संबंधो की परम्पराओं की याद दिलाते हैं ऐसे पर्व जो प्रकृति के विभिन्न घटक- को पूजने के दिन के रुप में मनाए जाते है, उसी पर्व के अवसर पर सम्पन्न क्रिया-कलाप और समारोह प्रकृति-प्रेम एवं प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का नया वातावरण हमें प्रदान कर पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए उत्प्रेरित करते हैं। प्रकृति घटकों के सहसम्बन्ध हमें नई उमंग और प्रकृति प्रेम के नए उत्साह का अनुभव कराता है। भौतिक, सांस्कृतिक एवं लोभ मानसपटल पर नहीं होंगे तो स्वार्थमय भौतिक संस्कृति जैसे प्रदूषण प्रकट नहीं होंगे और पर्यावरण शुद्ध बना रहेगा।
विभिन्न तथ्यों एवं लोकजीवन की शैली के आधार पर निष्कर्ष में कह सकते हैं कि वृक्ष हमारी संस्कृति के विभिन्न अंग रहे हैं । भारत कृषि प्रधान देश है। अत: मृदा का संरक्षण आवश्यक है। प्राकृतिक अवस्था में मैदानी एवं पहाड़ी स्थानों पर लगे वृक्षों की जड़ जमीन को पकड़े रहती है, जिससे पानी का प्रवाह एवं हवा संतुलित रहती है। वृक्षों के अभाव में हवा एवं पानी पर नियंत्रण नहीं रहने से भूमि के रेगिस्थान में परिवर्तन होने की प्रबल संभावनाएँ बनती जा रही है। वनों की कटाई न करने के प्रति जन चेतना फ़ैलाने के उद्देश्य से आंदलनों को शुरु किया जाना चाहिए।
मनुष्य की प्रदूषित मानसिकता प्रकृति को किसी न किसी रुप में प्रदुषित करती है। अस्तु प्रकृति के प्रदूषण को रोकने के लिए संस्कृति की आत्मा, जिसमें प्रकृति की गूँज है, से अनुप्राणित होकर शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। अत: शिक्षण संस्थाओं में अध्ययनरत बालक-बालिकाओं को परम्परागत भारतीय शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।            
पूर्व की पीढिय़ों ने अपने समय में प्रकृति का पूर्ण विकास कर उनको भौतिक संपत्ति के रुप में बदलकर अगली पीढियों को प्रदान किया जाना है और यह माना है कि आने वाली पीढ़ी उन पूर्वजों का उपकार मानेगी, लेकिन वर्तमान पीढ़ी की तो भावी मानव के लिए जटिल समस्याएँ और प्रकृति के विध्वंस का आधार छोड़ कर जाने की संभावनाएँ बन रही है। आज रेगिस्थान बढ़ रहे हैं। जीव-जंतुओं की बहुत सी प्रजातियाँ लुप्त हो रही है। प्रकृति के वर्तमान दोहन के भविष्य की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर ही अपनी योजनाओं का निर्माण करना चाहिए।

सम्पर्क: 103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001, goverdhanyadav44@gmail.com

परंपरा

छत्तीसगढ़ में राउत नाचा 

छत्तीसगढ़ के राउत नाचा अपनी बहुरंगी नृत्य छटा एवं नयनाभिराम छवि की वजह से छत्तीसगढ़ में नहीं अपितु देश भर में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह महज पर्व ही नहीं अपितु जीवन की प्रमाणिक अभिव्यक्ति है जो वर्ष भर सपुत्र के रुप में बंधी रहती है और वर्षांत में अपने सामूहिक उल्लास का प्रकटीकरण गली-गली, घर-घर और बाजार के चौपालों में देख पाते हैं।
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में जहाँ टीवी प्रिंट मीडिया व सायबर युग में सिमटकर लोक संस्कृति अपनी अस्मिता व अस्तित्व के लिए संघर्षरत है वहीं अनेक लोक परम्पराएँ अपने जीवंतरूप में आज भी विद्यमान हैं। वहीं लोकनृत्य में पंडवानी, गम्मत व राउत नाचा जीवन में नया प्राण फूंक रहा जिनमें रावत नाच, शौर्य और संस्कृति को अपने में समेट कलात्मकता का परिचय दे रहा है।
सिर में धोती का पागा उसमें लगे मोर पंख की कलगी मुँह में पीली मिट्टी, आंखों में काजल, गाल में डिठौनी माथे पर चंदन का टीका और कपड़े के रंगीन जूते मोजे बंधी गोटिस और घुँघरु घुटने के ऊपर तक कसा हुआ चोलना व उस पर फुंदरीकमीज की जगह पूरे आस्तीन का रंगीन सलमा सितारा युक्त आस्किट जिसके ऊपर कौडिय़ों से बनी पेटी एवं बाहों में कौडिय़ां बाँधे, तेंदू की लाठी एक हाथ में दूसरे हाथ में सुरक्षा रूपी लोहे या तांबे की फरी जब रावत चलता है तो ऐसा लगता है मानो युद्ध के लिए श्रीकृष्ण की सेना रथ पर चल पड़ी हो। उनके थिरकते पांव से सारा जहाँ रूक जाता है। वे नृत्य में अपनी लाठी द्वारा शौर्य प्रदर्शन करते हैं और अपने आंगन में देवउठनी एकादशी के दिन से दस्तक देते है।
राउत नाचा की उत्पत्ति का कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है लेकिन पौराणिक गाथाओं के आधार पर जो धारणा प्रचलित है उसके अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन श्री कृष्ण ने कंस के अत्याचार से पीडि़त जनता को मुक्ति दिलाई तब से यदुवंशियों ने मुक्ति का पर्व मनाते हुए उत्सव का आयोजन किया। सम्भवत: तभी से रावत नाच की शुरुआत हुई।
श्रीमद्भागवत कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने यमुना के तट पर बालुका लिंग की स्थापना की, उसी अवसर पर यदुवंशियों ने 7 दिन तक नृत्य किया। रावत नाच उद्भव के मूल में पुराण सम्मत यह घटना ही सर्वमान्य हैं रावत नाच अपने प्रारंभिक रूप से अब तक जीवित है परंतु आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से अछूता नहीं है। गाँव में जब गोवर्धन पूजा मनाते है उसी दिन राउत नाचा पर्व की शुरुआत होती है। इस अवसर पर सभी ग्रामवासी गोवर्धन पर्वत की मूर्ति पवित्र गोबर से बनाकर उसे सिलयारी घास गेंदाफूल व धान से सजाते संवारते हैं और पूजा अर्चना करते है । जिस बात का प्रतीक श्रीकृष्ण के नेतृत्व में अन्यायी शासक घमण्डी इन्द्र का विद्रोह कर पहाड़ मैदान व चारागाह की पूजा की अपनी इसी पशुधन पर्वत व चारागाह के लिए यादव ने इन्द्र व क्रूर शासक कंस से युद्ध किया। यह युद्ध किन्हीं दो शासकों के मध्य न होकर अन्यायी शासक के खिलाफ (विरुद्ध) सामाजिक युद्ध था जो कि शोषण व अत्याचार के विरुद्ध था।
यादव ही संघर्ष गाथा अनुत्पादक तथ्य और सामाजिक श्रम की उपयोगिता से जुड़ी है। यह संघर्ष किसी एक विशेष जाति का नहीं अपितु सभी वर्गों की मुक्ति के लिए था।
आज यह नाच छत्तीसगढ़ की संस्कृति का अभिन्न अंग है। जब भी कभी रावत नाच हमारे गली मुहल्ले से गुजरता है तब उनकी पारम्परिक वेशभूषा जो कि सिर से पैर तक आकर्षित नैनाभिराम वस्त्र धारण किये गुरदुम बाजा के  थाप पर उनके पैर थिरकते व एक लय में ऊपर उठते हैं। जिनके हाथों में ढाल सुरक्षा रूपी फरी तथा दूसरे हाथ में तेंदूसार की लाठी 40 या 80 के समूह में लोग रहते हैं के समूह में लोग रहते है तथा एक या दो नर्तक भी हाते है। बाजों की आवाज से संयुक्त रूप से जोश एवं आवेश साहस व उत्सव न केवल रावत के मन में अपितु दखने वाले के मन में उत्सव का संचार होता है।
राऊत नाच के समय बोलने वाले दोहे हास्य व्यंग्य एवं विभिन्न रसों के अलावा सूर, तुलसी, कबीर के ज्ञानमार्ग शामिल हैं।
राऊत नाचा के दोहे में नीति धर्म एवं ज्ञान से संबंधी दोहे शामिल हैं इसके अलावा इनके पारम्परिक एवं मौलिक दोहों की भी संख्या फिर भी कम नहीं है। इनके दोहों हास्य, व्यंग्य, करुण, रौद्र शांत तथा देवी देवताओं से संबंधित एवं देश प्रेम तथा जन सामान्य के प्रति विशेष नीति एवं ज्ञान से परिपूर्ण होता है। जिसके माध्यम से जनता को अपनी ओर आकर्षित करने तथा जोर से तेन्दुसार की लाठी ऊपर किये हुए दोहे को उच्चारित करके बोलते है।
इस प्रकार रावत नाच में इन विभिन्न प्रकार के दोहे का समन्वय कर नाच को रोचकता एवं चमत्कृत प्रदान करने के लिए रावत लोग  ने विभिन्न प्रकार के दोहे का सृजन किया है जिससे दर्शक के मन को उत्साह वर्धन कर रस मग्न कर दे साथ ही उसमें व्यंग्य के छींटे भी होते है जिसके माध्यम से बच्चों के मन में खुशी का संचार होता है और वे रावत नाच में अपनी भागीदारी का निर्वहन करते है।
दोहे के द्वारा व्यक्ति के एक नए ज्ञान का आभास होता है एवं मन में तर्क वितर्क भी पनपते है वास्तव में यदि गहराई से देखा जाए तो रावत नाच में दोहे  के माध्यम से नाच में सेाने पर सुहागा का कामकरती है जो जन सामान्य को अपनी ओर सहज ही ढंग से खिंचता चला जाता है इसकी प्रासंगिकता का वर्णन करना साहित्यकारों के बस की बात नहीं है।
गाँव में अन्य जातियों की तरह रावत जाति संस्कृति की अपनी अलग विशेषता है, वेदों में उल्लेख होने के कारण इन्हें वैदिक जाति कहते है ये कला प्रेमी, लोकसंस्कृति के माध्यम से पौराणिक संस्कृति को जीवित रखे हुए है।
अहीरों के गौरवशाली परंपरा रीरिवाज के सुनहरे पन्ने के इतिहास में गो-पालन प्रमुख रहा, इनके अराध्य देव श्रीकृष्ण थे। यदुवंशी अपनी गाय भैंसों को विभिन्न रोग व बाधाओं से सर्वथा मुक्त रखने के लिए दूल्हा देव, ठाकुर देव, सड़हा देव, गोसाई देव व अपने पूर्वजों से जनित भूत प्रेत, बैताल, अखरादेव, छट कमानिय को प्रमुख श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। अहीरों में पूजा का विशेष प्रचलन है, पुत्र की शादी या संतान उत्पत्ति पर बकरे या मुर्गे की मान्य देवों की दुगुनी संख्या में बलि दी जाती है, घर की किसी कोने में गड्ढा खोदा जाता है जिसे सगरी कहते हैं किसी विशेष दिवस पर समाज के लोग एकत्रित होकर पूजा पाठ कर बलि देते हैं।
हरेली के दिन गाय भैंस को स्नान करा पूजा करते है रावत लोग जिनकी गाय-भैंस चरानी होती है उनके द्वारा देशमुख की शाख या नीम की पत्ती खोंच का प्रचलन है ये जन्माष्टमी को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाते है। श्रीकृष्ण की पूजा भक्ति भाव से विभोर होकर करते है। मटकी फोडऩा मंदिर जाना व दही व हल्दी एक दूसरे पर खुशियों से मस्त होकर डालते हैं। दीपावली के पर्व के पश्चात का कार्तिक एकादशी, कार्तिक पूर्णिमा, कार्तिक पुत्री, देवउठनी, जेठानी, छेरछेरा, यदुवंशियों के संस्कृति के विशेष महत्त्व को प्रतिपादन करते हैं। देवारी शौर्य वीरता का प्रतीक है। देवारी के समय अपने कुल देवता को घर के भीतर पूजते हैं। देव उन लोगों को आशीर्वाद देने आते हैं तो उन पर काछन चढ़ता है सिर पर साज श्रृंगार की पगड़ी मोर पंख धारण करते हैं। रावत संस्कृति सिर्फ चरवाही और देवारी पर नाचने कूदने की संस्कृति मात्र नहीं है। राजनीति में राजा के बाद दूसरा राजा या सेना का सेनापति को रावत कहा जाता है। इन्हें चरवाहा बताकर व मजदूर बताकर उनकी संस्कृति की गरिमा को आघात पहुंचाया जा रहा है।
रावत लोग अपनी ही बिरादरी में उत्सव व त्यौहार में खान-पान का प्रचलन चलता है। जिससे सामाजिक व्यवहार बना रहे। कृष्ण युगनी इतिहास में पशु बलि प्रथा का विधान मिलता है। इस प्रकार इनके खान-पान में सामाजिक सद्भावना जुड़ी रहती है। रावत समाज में मुख्यत: निम्न रिवाज व संस्कार है-  जन्म से क्षीर कर्म, छट्ठी मनाना, मुंडन, नामकरण, अन्नप्रासन, अक्षरज्ञान, स्कूल भेजना, अस्त्र-शस्त्र संचालन, नृत्य कला, विवाह, गौना कराना, धार्मिक पर्व, आरती पूजा, विवाह भोज, मृत्यु भोज इत्यादि प्रमुख रीति रिवाज व संस्कार है।

इस संस्कृति की गरिमा एवं स्वयं भगवान कृष्ण है जिसने गाय चराई, कंसवध, शिशुपाल किया महाभारत के द्वारा पूंजीवादी शासन का अंत और गीता के उपदेश द्वारा दिया। हर धर्म के बच्चे बड़ों में धार्मिक दार्शनिक व समाजवादिता का परिचय दिया ताकि भारत जैसा कृषि प्रधान देश फिर से समृद्ध हो सके। (यादव समाज पर आधारित ब्लॉग यदुवंश से)

प्रेरक

लंबे सफर में ईमानदारी

 शाह अशरफ अली बहुत बड़े मुस्लिम संत थे। एक बार वे रेलगाड़ी से सहारनपुर से लखनऊ जा रहे थे। सहारनपुर स्टेशन पर उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि वे सामान को तुलवाकर ज्यादा वजनी होने पर उसका किराया अदा कर दें।
वहीं पास में गाड़ी का गार्ड भी खड़ा था। वह बोला- सामान तुलवाने कि कोई ज़रूरत नहीं है। मैं तो साथ में ही चल रहा हूँ। वह गार्ड भी शाह अशरफ अली का अनुयायी था।
शाह ने उससे पूछा- आप कहाँ तक जायेंगे।
मुझे तो बरेली तक ही जाना है, लेकिन आप सामान की चिंता नहीं करें- गार्ड बोला।
लेकिन मुझे तो बहुत आगे तक जाना है- शाह ने कहा।
मैं दूसरे गार्ड से कह दूँगा। वह लखनऊ तक आपके साथ चला जाएगा।
और उसके आगे?- शाह ने पूछा।
आपको तो सिर्फ़ लखनऊ तक ही जाना है न। वह भी आपके साथ लखनऊ तक ही जाएगा- गार्ड बोला।
नहीं बरखुरदार, मेरा सफर बहुत लंबा है-  शाह ने गंभीरता से कहा।
तो क्या आप लखनऊ से भी आगे जायेंगे?
अभी तो सिर्फ़ लखनऊ तक ही जा रहा हूँ, लेकिन जि़न्दगी का सफर तो बहुत लंबा है। वह तो खुदा के पास जाने पर ही ख़त्म होगा। वहाँ पर ज्यादा सामान का किराया नहीं देने के गुनाह से मुझे कौन बचायेगा?
यह सुनकर गार्ड शर्मिंदा हो गया। शाह ने शिष्यों को ज्यादा वजनी सामान का किराया अदा करने को कहा, उसके बाद ही वह रेलगाड़ी में बैठे। (हिन्दी ज़ेन से)