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Jul 5, 2014

नदियाँ बेचने की तैयारी

नदियाँ बेचने की तैयारी

 डॉ. महेश परिमल
 केंद्र सरकार ने नदियों को जोडऩे की एक विशाल परियोजना तैयार की है। इस पर अमल भी शु डिग्री हो गया है। इस परियोजना में दूरदर्शिता का पूरी तरह से अभाव है। इस परियोजना से सम्बन्धित ऐसे कई सवाल हैंजिस पर केंद्र सरकार खामोश है। उसके पास सवालों के जवाब हैं ही नहीं। इससे ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने यह परियोजना प्रारंभ तो कर दी हैपर इसके दूरगामी परिणामों की उसे चिंता नहीं है। पर्यावरणविदों से भी विस्तार से बात नहीं हो पाई है। न ही इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर गहराई से विचार किया गया है। ऐसे में नई सरकार के सामने यह चुनौती होगी कि इस परियोजना पर किस तरह से अमल किया जाए।
पूर्व में बहती गंगाब्रह्मपुत्र और महानदी जैसी विशाल नदियों पर कुल 250  बाँध बनाकर उनका पानी पश्चिम की तरफ बहती नदियों में डालने और राजस्थान के रेगिस्तानी प्रदेश तक ले जाने की एक विशाल परियोजना केंद्र सरकार के प्रयासों से आकार ले रही है। इस योजना पर अरबों रुपये खर्च होने हैं। इसे साकार करने के लिए केंद्र सरकार के पास पूँजी नहीं होगीतो इस बहाने देश की तमाम बड़ी नदियों को बेचना होगा। इससे लाखों हैक्टर जंगलों का नाश होगा। इस परियोजना का लाभ सबसे अधिक सीमेंट और स्टील उद्योगोंठेकेदारों और नेताओं को होगा। इससे संभवत: पानी की आपूर्ति को संतोषप्रद बनाया जा सकता है। पर गरीबों के लिए पीने के पानी की समस्या का हल नहीं होगाक्योंकि यह पानी इतना महँगा होगा कि गरीब लोग इस पानी की कीमत नहीं चुका पाएँगे। सबसे खतरनाक बात यह है कि इस परियोजना का असर वर्षा चक्र पर भी पड़ेगा और भारतीय महाद्वीप में पूरा वर्षा चक्र ही गड़बड़ा जाएगा।
अगस्त 2005 में  उत्तर प्रदेश सरकार और मध्य प्रदेश सरकार के बीच एक समझौता हुआ। इसमें यह तय हुआ कि बेतवा नदी के पानी का ट्रांसफर किया जाएगा। पूरे देश की कुल 37 नदियों को जोडऩे की दिशा में यह पहला प्रयास था। नदियों के रास्ते पर बाँध बनाकर उनके पानी को समुद्र में जाने से रोकना इसका मुख्य उद्देश्य है। अब इसे दूसरी तरह से देखें। यदि नदियों का पानी समुद्र में नहीं जाएगातो उसके किनारे तेज़ी से फैलने लगेंगे। इसका उदाहरण गोदावरी नदी में देखा गया। इसके रास्ते पर कई बाँध बनाए गएजिससे नदी के मुहाने का 18 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र समुद्र में डूब गया। इसी तरह यदि अन्य नदियों पर बाँध बनाए गएतो ज़मीन पर समुद्र के अतिक्रमण की प्रबल आशंका है।
कुछ समय पहले ही बैंगलोर में आयोजित एक बैठक में देश के प्रख्यात वैज्ञानिक शामिल हुए। इस बैठक में देश की नदियों को जोडऩे और उसके पर्यावरणीय असर के संभावित परिणामों पर चर्चा की गई। इस बैठक में जो मुद्दे उठाए गएउन पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया है। इसके अनुसार बंगाल की खाड़ी में हर वर्ष बारिश का 4700 अरब घनमीटर पानी और विभिन्न नदियों का 3000 अरब घनमीटर पानी आता है। इसके एवज में यहीं से वाष्पन के माध्यम से 3600 अरब घनमीटर पानी भाप के रूप में उड़ जाता है। इस तरह से बंगाल की खाड़ी में मीठे पानी का वाष्पन होता है। इससे कहीं अधिक मीठा पानी उसे हिमालय की नदियों और बारिश के द्वारा प्राप्त होता है। इस कारण अरब महासागर और हिंद महासागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में खारापन बहुत ही कम है। अब यदि नदियों को जोडऩे की योजना द्वारा बंगाल की खाड़ी में आने वाली नदियों के जल को पश्चिम की नदियों में जाने दिया जाएगातो इसका असर भारत की बारिश पर होगा। बारिश के चार महीनों में बंगाल की खाड़ी में मीठे पानी की आवक बहुत बढ़ जाती है। अक्टूबर महीने तक जब बारिश का मौसम खत्म होता हैतब यह पानी पूरे देश का चक्कर काटता हुआ श्रीलंका से होता हुआ अरब सागर में पहुँच जाता है। इसके बाद वह वहाँ के पानी को उष्णता प्रदान करता है। इस तरह से बारिश का पानी पहले के महीनों में पहुँचने से अरब सागर का तापमान बढ़ता है। अरब सागर में यदि बारिश के बादल पैदा होते हैंतो इसमें बंगाल की खाड़ी से आने वाले गर्म पानी के प्रवाह की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे देश में कुल जितनी बारिश होती हैउसका 70 प्रतिशत भाग दक्षिण-पश्चिमी हवाओं (मानसून) के कारण होता है। इस वर्षा का मुख्य आधार बंगाल की खाड़ी में पैदा होने वाला खारेपन का आवरण है। पूर्वी भारत की नदियों का पानी पश्चिमी भारत में ले जाया जाएगातो हमारे देश में वर्षा का चक्र गड़बड़ाना अवश्यंभावी है। केंद्र सरकार ने एक तरफ नदियों को जोडऩे की योजना पर अमल शुरू कर दिया हैतो दूसरी तरफ उसके पास इस योजना के सम्बंध में कोई आधारभूत जानकारी माँगी जाएतो वह नहीं मिल रही है। इस योजना के अनुसार कुल कितने बांध बनाए जाएँगेइस पर कितना खर्च आएगा। इतनी अधिक धनराशि आएगी कहाँ सेइसमें कितनी खेती और कितनी जंगल की ज़मीन कब्ज़े में ली जाएगीकितने वृक्षों का संहार होगाकितने लोग बेघरबार हो जाएँगेउन्हें कहाँ बसाया जाएगाउनके लिए क्या हमारे देश में ज़मीन हैकितना पानी बंगाल की खाड़ी से निकालकर दूसरी नदियों में डाला जाएगाइसका समुद्रतट की इकॉलॉजी पर असर क्या होगाइस योजना के लिए क्या कोई विदेशी सहायता ली जा रही हैयदि ली जा रही हैतो किन शर्तों पर ली जा रही हैक्या किसी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी को बाँध और नहर बनाकर पानी के वितरण के अधिकार दिए जाएँगेउसके कारण क्या गरीबों को पानी मुफ्त में मिलेगा या उसकी कीमत चुकानी होगीविदेशी कंपनियाँ  हमारे ही देश की नदियों का पानी हमें ही बेचेंगीतो उससे होने वाला मुनाफा क्या अपने देश भेज देंगीया हमारे देश में खर्च करेंगीइस योजना में नेताओं की क्या भूमिका होगीइस तरह के अनेक सवाल ऐसे हैंजिसका जवाब देश को चाहिएपर सरकार इस बारे में खामोश है। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा है। यही हाल रहातो देश की नदियाँ  विदेशी हाथों में बिक जाएँगी और हम देखते रह जाएँगे। 

प्रेरक

   उपयोगिता


कहीं किसी किसान के पास बहुत बड़ा उद्यान था जिसमें अनेक फलदार वृक्ष लगे थे। इन वृक्षों में आम का एक वृक्ष फलहीन हो गया। इसमें आम आने बंद हो गए लेकिन अनेक पक्षियों ने इसपर अपने घोंसले बनाए थे।
किसान ने फलहीन वृक्ष को देखा और इसे काट देने का निश्चय कर लिया। वह अपनी कुल्हाड़ी लेकर उद्यान में आया और वृक्ष को काटने की तैयारी करने लगा।
वृक्ष पर बैठे पक्षियों ने किसान से वृक्ष को न काटने की प्रार्थना की। वे बोलेइस वृक्ष को मत काटिए। यदि यह न रहा तो हमें किसी दूसरी जगह आसरा ढूँढना पड़ेगा। हमारे चले जाने पर आपको काम करते समय हमारी मधुर चहचहाहट भी सुनने को नहीं मिलेगी।
लेकिन किसान ने उनकी एक न सुनी और कुल्हाड़ी से वृक्ष पर प्रहार करने लगा। कुछ प्रहार करने के बाद उसने पाया कि वृक्ष का तना खोखला था और उसमें शहद से लबालब मधुमक्खियाँ का एक विशाल छत्ता था। इस खोज से किसान बहुत प्रसन्न हो गया। उसने कुल्हाड़ी किनारे रख दी और स्वयं से कहायह तो बहुत उपयोगी वृक्ष है। इसे गिराने की कोई आवश्कता नहीं है।  अधिकतर व्यक्ति इस किसान की ही भाँति वस्तुओं की उपयोगिता आँकते हैं। (हिन्दी ज़ेन से)

बारिश बाढ़

           बारिश बाढ़

                 
 - डॉ. सुधा गुप्ता
1
बहार आई
खुबानी नासपाती
बौर से लदे।
2
बाँका सजीला
सावन-घर आया
मेघ-पाहुना।
3
बाँसों के वन
मनचली हवा ने
बजाई सीटी।
4
बाग़ का ब्याह
मची रेलमपेल
अगवानी की।
5
बादर कारे
जल भरे गुब्बारे
फूटेबरसे।
6
बादल छाए
मोरों की पुकार से
गूँजती घाटी।
7
बादल फटा
विनाश का ताण्डव
मृत्यु नाचती।
8
बादल-बाँह
थामे नाचती रही
कुँआरी हवा।
9
बादल-सीप
सँजोये है भीतर
चन्दा का मोती।
10
बादलों बीच
आकाश पर उगा
हँसिया चाँद।
11
बादाम वृक्ष
मधुमास आते ही
फूलों से लदे।
12
बाराती मेघ
आकाश मण्डप में
इतरा बैठे।
13
बारिश ख़फ़ा
धरती को दे सज़ा
रही है रुला।
14
बारिशबाढ़
हाहाकारी यमुना
डुबाती दिल्ली।
15
बारिश-बूँदें
तार पर लटकीं।
मोती लडिय़ाँ।
16
बाल बिखेरे
पर्वत के कन्धे पे
मचली घटा।
17
बावरी घटा
सूरज-संग डोले
ओट में होले।
18
बिखर गए
हेमन्त के बादल
हल्की हवा से।
19
बिटौड़े चढ़ी
पीले फूलों से भरी
तुरई-बेल।
20
बिना चाँद के
नींद उड़ी रात की
काटे जाग के।
21
बीजुरी हँसी
बादलों के गाँव में
बसने चली।
22
बुत- सी खड़ी
‘पैडी’ पकडऩे को
कीड़ेमछली।
23
बुरूँस-फूल
पूरे निखार पर
चटख़ लाल।
24
बुलबुल गा
उड़ गईसमझा
कोई न अर्थ।

( ‘डॉ सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति’ से साभार )

सम्पर्क:  'काकली’ 120 बी/2, साकेत मेरठ-250 003 मो. 9410029500

कुछ नहीं बस कूड़ा- कचरा

कुछ नहीं बस कूड़ा- कचरा

       - गोपालकृष्ण गाँधी

मेरी उमर रही होगी कोई दस बरस। हमारा घर औसत मध्यम वर्ग में भी मध्यम दर्जे का रहा होगा। इतना ऊँचा दर्जा नहीं था कि आज की तरह चमचमाते आधुनिक रसोई घर जैसा चौका होता हमारा और न इतना नीचा दर्जा था कि हम शुद्ध घी में पराठे भी न बना पाते। कुल मिलाकर उस चौके में दिन भर में जो कुछ भी बनतारात तक कचरा लायक कुछ जमा होता नहीं था।

  मुझमें कुछ द्वेष-सा भरा होगा। तभी तो ऐसा हुआ कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुझसे पिछले छह दशक में हुई उन्नति के बारे में कुछ विचार माँगे गए थे और मैं लिख बैठा कचरा। मुझे लिखना तो चाहिए था कि हमने इस अवधि में क्या और कैसी उन्नति की हैहमारा लोकतंत्र कितना खुला हैहमारे खेतों में जो हरित क्रांति हुई हैमछलियों से भरे हमारे समुद्र मेंनदियों में जो नीली क्रांति हुई हैदुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में जो श्वेत-क्रांति हुई और इन सबके ऊपर फिर सूचना और संचार की तकनीक के क्षेत्र में जो अदभुत क्रांति हुई है।
लेकिन नहीं। जब मैं इस बारे में कुछ सोचने बैठा तो मेरे मन में ये विषय आए ही नहीं। सामने आया कचरा। बस शुद्ध कचरा। इस बारे में आगे बढऩे से पहले थोड़ा विषयान्तर हो जाने दें।
जब हम मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में सोचते हैं तो हमें यही तो याद आता है और ठीक ही याद आता है कि वे दो देश सिद्धान्त के प्रवर्त्तक थेपाकिस्तान के जनक थे और पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल थे। लेकिन इससे पहले अविभाजित भारत के आकाश में वे एक तारे की तरह चमकते थे और बंबई में वे एक अजेयदुर्जेय सफल वकील की तरह प्रसिद्ध हुआ करते थे। किसी एक मुकदमे के दौरान वे जिरह कर रहे थे और न्यायाधीश उनकी दलीलों को 'कचरा’, 'कचरा’  कह कर उन्हें रोकते-टोकते जा रहे थे। ऐसा हुआ तीन बार। तब जिन्ना ने मुड़कर उनसे कहा थाकुछ नहींबस कचरा ही निकला है आपके मुँह से आज दिन भर! तो कुछ नहींबस कचरा ही मिलेगा अब आगे इस लेख में!
एक देश की जीवन शैली भला क्या होती है सिवाय इसके कि उसके विभिन्न समुदाय कैसी जीवन शैली अपनाते हैं और फिर इन समुदायों की जीवन शैली भी तो उसके सदस्यों की शैली पर ही तो निर्भर होती है। एक व्यक्ति की जीवन शैली पर ही निर्भर होती है। एक व्यक्ति की जीवन शैली का सबसे ज्यादा ईमानदार उदाहरण है उसके घर के चौके में हर रोज लगने वाला कचरे का ढेर और अगले दिन उसका निपटारा।
मेरी उमर रही होगी कोई दस बरस। हमारा घर औसत मध्यम वर्ग में भी मध्यम दर्जे का रहा होगा। इतना ऊँचा दर्जा नहीं था कि आज की तरह चमचमाते आधुनिक रसोई घर जैसा चौका होता हमारा और न इतना नीचा दर्जा था कि हम शुद्ध घी में पराठे भी न बना पाते। कुल मिलाकर उस चौके में दिन भर में जो कुछ भी बनतारात तक कचरा लायक कुछ जमा होता नहीं था।
महीने के शुरू में जो आटादालचावलनमक और चीनी पनसारी की दुकान से आता थाउसे ठीक से बर्नी और डिब्बों में रख दिया जाता था। इन चीजों के लिफाफे कागज के होते तो उन्हें मोड़कर फिर से इस्तेमाल के लिए रख लेतेकपड़े की थैलियाँबोरियाँ होतीं, तो उन्हें भी फिर से किसी और काम में लगा दिया जाता था। चौके में कचरा फेंकने के लिए बस एक छोटा-सा टीन का डिब्बा था। वह भी पुराने किसी आटे के कनस्तर से काट कर बनाया गया था। इसमें बस सब्जी भाजी के छिलके और कुछ छोटी-मोटी चीजें डाली जाती थीं। होता ही कितना था भला फेंकने।
आज मध्यम वर्ग के एक मध्यम से घर के चौके में कचरे के एक नहीं प्राय: दो डिब्बे रखे रहते हैंठसाठस भरे पड़े और ये वो टीन कनस्तर काट कर बनाए गए डिब्बे नहीं।
आधुनिक कचरा पेटी हैं ये। पैडल से ढक्कन खुल जाए वैसी। इनमें तरह-तरह के आकार और मोटे-पतले प्लास्टिक पैकटो को लगातार फेंका जाता रहता है। फिर अनगिनत किस्म से बनी उन थैलियों की भी गिनती नहींजिनमें भरे दूधचीनीनमक- बेशक सभी जरूरी चीजें हैं- आदि का खाली कर इन कचरा पेटियों के हवाले किया जाता है। इस तरह के कचरे की सूची लम्बी है। अब बारी आती है उन निहायत गैरजरूरी चीजों की जिनसे अब बच पाना मुश्किल हो गया है। पास्ताफ्रोजन मटर और न जाने क्या-क्या। फिर पीने का पानी। वह तो हमारे नलों से आना चाहिएपर आता नहीं। तो उसे देते हैं भूजल दुह कर बाँटने वालों के प्लास्टिक के बड़े-बड़े बम्बे या फिर प्यारी दुलारी छोटी-छोटी बोतलें- यह सब भी कचरे के ढेर में समा जाता है।
और फिर यह स्वाभाविक ही है कि ऐसे रसोईघरजिसमें हम जैसे दम्पती खुद ही काम करते हैंसुबह की पहली किरण के साथ इन डिब्बों में कचरा फेंकने लगते हैं। दिन की शुरुआत के लिए बनने वाली कॉफी में जो प्राणदायी सफेद दूध डलने वाला हैवह बेहद सुविधाजनक प्लास्टिक के पैकेट में ही आता है। काटोदूध निकालो और पैकेट फेंको।
शायद इस दमघोटू बाजारवाद की दुनिया में कुछ चीज से भरा वह मेरा स्वभाव ही होगा कि मैं सुबह उठते ही पहला काम तो यही करता हूँ कि अपने अखबार को झकझोरता हूँ ,ताकि बीच के पन्नों में छिपी तरह-तरह के रंगबिरंगे विज्ञापनों की पर्चियाँ मेरे रास्ते में न आएँ। मैं चाहता हूँ कि आघात देने वाली ये सुबह की खबरें मैं बिना ध्यान बटाए पढ़ सकूँ। तीसरा काम इतना शारीरिक नहींबल्कि मानसिक होता है। दुनिया की इन खबरों पर भला क्या विलाप करना। ये खबरें तो यों भी तरह-तरह के विज्ञापनों में गायब हो जाती हैं- पूरे पृष्ठ के विज्ञापनपहले पृष्ठ के विज्ञापन और अब तो कई बार ऐसे भी विज्ञापन जो पन्नों को बड़े पक्के इरादे से चिपकाए रखना चाहते हैं। ये विज्ञापन अखबार से अलग होने को तैयार नहीं। जो अलग होने से पहले इन पन्नों  को फाड़ तक जाते हैं। फिर इसके बाद थोड़ा सुबह घूमने के लिए निकलता हूँतब बाहर मुझे अपने चौके के कचरे का डिब्बा कुछ गुना होकर बड़े आकार में दिखता है।
डाक के डिब्बे की तरफ चलूँ या किसी दवा की दुकान की ओर या फिर परचून वाले की तरफ या फिर समुद्र किनारे- सुबह घूमूँ या शाम को घूमूँ तो सीधे अपने पिछले दिन फेंके गए कचरे में चला जाता हूँ! कचरे से उफनते हुए इन ढेरों में मुझे हर चीज पहचान में आ जाती है। ये सब हमारी ही फेंकी हुई चीजें जो हैं। हर चीज चाहे वह पूरी होअखंडित होटूटी होखंडित होमुड़ी-तुड़ी होतोड़ी-मरोड़ी होदचकी-पचकी हो- होगी वह मेरी ही या फिर मेरे ही जैसे लोगों की।
मैं उन चालीस करोड़ शहरी लोगों में से हूँ जो इस फलते-फूलते कचरे के एक अमर पहाड़ के जनक बन गए हैं। पिछले दिनों मुझे एक आँकड़ा मिलाहो सकता है यह बहुत सही न हो। फिर भी यह कुछ तो बताता ही है। हमारे सारे शहर कोई 38 करोड़ टन कचरा पैदा करते हैं। इसमें से कोई 30 करोड़ टन कचरा ही निपटान के लिए जमा किया जाता हैउठाया जाता है। इसका मतलब क्या हुआइसका मतलब तो यह हुआ कि इस कचरे में फेंकी गई 38 चीजों में से कोई 30 चीजें उठाई जाती हैं। तो क्या उठाए गए कचरे की यह मात्र ठिकाने लगा दी जाती हैनहीं। उठाया गया यह कचरा भी कहीं ठिकाने नहीं लगाया जाता। यह सब वहीं रहता है। हमारी इस प्यारी जमीन के किसी खाली हिस्से में उसका ढेर लग जाता है और ऐसी जमीन भी हर दिन सिकुड़ती जा रही हैकम से कम होती जा रही है। इस ढेर में से जितना कचरा हटाया जाता हैवह किसी एक जगह से हटाकर दूसरी किसी जगह ढेर लगा दिया जाता है। यह भी नहीं देखा जाता कि उसे निरापद बना दिया जाए। उसका नुकसान कम कर दिया जाए।
मुझे तो लगता था कि कचरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर उसे निथारा जाता होगाउसकी खाद बनाई जाती होगी। लेकिन मुझे डर है कि ऐसा कुछ भी नहीं होता। कुछ शहरों मेंअन्य कुछ शहरों से थोड़ा बेहतर निपटारा हो जाता होलेकिन कुल मिलाकर कचरे के निपटान की यह शहरी कहानी जरा भी सुखांत नहीं है। कचरे का यह ढेर शहरों से निकलकर उनकी सीमा पर पहुँच जाता हैसीमा पार भी हो जाता है और फिर से उन जगहो में डाल दिया जाता हैजो किसी और काम के लिए बनी थीं। ये जगहें किसी तालाब की होंगीदलदल होगाखेत होंगे- इन सब जगहों में शहर का कचराहमारा शहरी भारत एक घाव की तरह अपनी मवाद छोड़ आता है।
और फिर ये वो जगहें हैं शायद जिनके नीचे या जिनके पास भूजल के वो भंडार हैंजिनसे हमारे प्लास्टिक के बंबों का पानी खिंचकर आता है। उसे हम पैसा देकर खरीदते हैं। यही पानी हमारी उन रंग-बिरंगी बोतलों मेंगहरे भूरे रंग की बोतलों में भरा जाता हैजिसे हम आराम से बैठकर पीते हैं।
उसे विद्रोह करना ही चाहिए। यह बात अलग है कि धरती के विद्रोह का तरीका अलग होगा। वह मरकर यह विद्रोह करेगी। जमीन के नीचे का पानी लगातार नीचे जा रहा है। भूजल का स्तर गिर रहा है तो दूसरी तरफ कचरे के पहाड़ खड़े होते जा रहे हैंऊँचे होते जा रहे हैं। हम भला किस चीज का इंतजार कर रहे हैं। इसी गति से यह सब चलता रहाभूजल गिरता रहा और बिना सुरक्षित निपटारे के कचरे का ढेर पहाड़ बनता गया तो क्या होगाहमें यह भी बताया जा रहा है कि हमारा शहरी भारत अगले 15 वर्षों में आज के 40 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगा और इस दौरान एक औसत शहरी की आमदनी भी चार गुना हो जाएगी। हम में से बहुत से लोग इस उपलब्धि को देखने के लिए यहाँ होंगे ही। लेकिन हमारी वैसी तरक्की के कई अर्थ होंगे। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग अर्थ। उपभोक्ताओं के लिए प्लास्टिक की तरह-तरह की चीजें बनाने वाले उत्पादकों के लिए तो आने वाला ऐसा दौर 'भगवान’ भेजा ही होगा। इसका मतलब होगा तरक्की। और इसका एक मतलब होगा इतना ऊँचा मुनाफा कि अंतरिक्ष में भेजे गए हमारे चंद्रयान की ऊँचाई भी बौनी पड़ जाए। हमारी यह धरती इस सबको कब तक सहेगीकभी न गल सकने वाले इस कचरे और उससे जुड़ी और भी बेमतलब की चीजें कब तक सहेगी यह।
अपनी एक पुस्तक में लेखक एम. डगलस मीक्स यों दर्शन से जुड़ी पर आज की दुनिया में वास्तविक बन गई एक बात लिखते हैं कि यह धरती संकट में है... यह धरती निर्जीव नहीं है। उसमें संवेदना है पूरी। इसलिए वह घायल भी हो सकती है। वह अक्षुण नहीं हैअटूट नहीं है तो वह टूट भी सकती हैखुट भी सकती है। यह धरती अमर नहीं हैइसलिए मर भी सकती है। इस धरती का दुरुपयोग करोगेउसे बिना सोचे समझे लूटते-खसोटते जाओगे तो वह विद्रोह तो करेगी ही। उसे विद्रोह करना ही चाहिए। यह बात अलग है कि धरती के विद्रोह का तरीका अलग होगा। वह मरकर यह विद्रोह करेगी।
हम अपनी इस धरती को मरने नहीं देंगे। बहुत से लोगों ने और इस समस्या से जुड़े अधिकारियोंविभागों तक ने इसकी उपेक्षा की है। लेकिन हम देखते हैं कि दूसरी तरफ इसकी चिंता करने वालों की संख्या भी रोज-रोज बढ़ चली है। वर्षा जल संग्रह जैसे नए शब्द हमारी भाषा में जुड़ चले हैं। लेकिन इतना ही काफी नहीं है। यह तो बहुत कम है।
समुद्र में आठ हाथों वाला एक जीव रहता हैउसका नाम है- ऑक्टोपस। आज हमारा नित नया फलता-फूलता बाजार इस ऑक्टोपस जैसा ही हो गया है। इसलिए उससे पूछा जाना चाहिए कि अरे ऑक्टोपस तुम जिस समुद्र में रहते हो यदि उसमें रोज-रोज जहर घुलता जाएप्रदूषण होता जाए और फिर वह एक दिन सूख भी जाए तो क्या तुम्हारे ये आठ हाथ तुम्हें बचा पाएँगे?
लेखक के बारे में- गोपालकृष्ण गांधी प्रशासक रहे हैं। कुछ समय तक उन्होंने विभिन्न देशों में राजनयिक भूमिकाओं का भी निर्वाह किया है। वे श्रीमती रुक्मणि देवी अरुंडेल द्वारा स्थापित कला क्षेत्र संस्था और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीजशिमला के अध्यक्ष हैं। (अंग्रेजी से हिंदी में अ.मि. द्वारा। हिन्दुस्तान टाइम्स से साभार) इंडिया वाटर र्पोटल से

असंग्रह है अनमोल

असंग्रह है अनमोल

- विजय जोशी
 आचरण में आवश्यकता से अधिक के संग्रह की प्रवृति अनुचित और अनर्थकारी है। लोभ पर यात्रा का यह मार्ग अंतत: पतन के द्वार पर दस्तक का प्रथम चरण है। कहा ही गया है- सांई इतना दीजिएजामे कुटुम्ब समायमैं भी ना भूखा रहूँ  साधु न भूखा जाय। महात्मा गाँधी ने भी कहा है- धरती पर मनुष्य की आवश्यकता से कई गुना अधिकपर उसके लालच के मुकाबले बहुत कम है। संग्रह की प्रवृत्ति आरंभ में असुरक्षा के भाव के सामने आत्मरक्षा का उद्घोष बनती हैलेकिन धीमे-धीमे आदत का अंग बन जाती हैं।
बायजीद एक बहुत प्रसिद्ध सूफी संत थे। वे हज की यात्रा पर निकले तो साथ में एक पैसा रख लिया। उन दिनों एक पैसे का भी बड़ा मह्त्त्व था। एक पैसे में सारे दिन का खर्च निकल आता था। एक भक्त ने पूछा- आप यह क्या कर रहे हैं। मात्र एक पैसे के साथ हज की यात्रा पर निकल रहे हैं और उन्हें अशर्फियों से भरी एक थैली राह खर्च हेतु दे दी।
बायजीद ने कहा- रख तो लूँगा पर पहले यह भरोसा दिला कि मैं एक दिन से अधिक तक अवश्य जियूँगा।
धनपति ने कहा- मैं कैसे आश्वासन दे सकता हूँ। कल का किसे भरोसा है।
तब बायजीद ने कहा- तो यह एक पैसा ही काफी है। जब कल का भरोसा ही नहीं तो इंतजाम क्या करना।
पास ही एक फकीर बैठा था। वह हँसते हुए भीड़ से उठ गया। बायजीद उसके पीछे दौड़े  और पूछा कि तुम क्यों हँसे।
फकीर ने कहा- यदि एक दिन का भरोसा है तो फिर कल के भरोसे में क्या कष्ट है। जब एक पैसा रख सकते हो तो फिर एक करोड़ भी। क्या अंतर पड़ता है। क्या आज का भरोसा है।
कहते हैं बायजीद ने वह पैसा वहीं गिरा दिया। यह भी कहा जाता है कि उसी पल से बाजयीद को  ज्ञान प्राप्त हुआ और वे आगे चलकर प्रसिद्ध सूफी संत कहलाए।
बात का सारांश सिर्फ इतना सा है कि खुद पर और जिसने धरती पर भेजा है उसका भरोसा रखो। भूख से मरने वाले की तुलना अधिक खाकर मरने वालों का प्रतिशत कई गुना अधिक है। लोभमोह,  लालचलालसा इनका कोई ओर या छोर नहीं होता। ये तो आदमी को एक बंधुआ मजदूर बनाकर ताउम्र अपना बंधक बनाकर रखती हैं।
इनसे मुक्ति के बाद ही जीवन में आगे का मार्ग सुलभ और सुगम हो सकता है।

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