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May 16, 2014

बालकथा, बाल कविता

मुन्ना मेरा दोस्त

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु
जब से जंगल कटने शुरू हुएहमारी तो मुसीबत ही हो गई। जंगल में शिकार नहीं मिलता तो बाघ और भेडि़ए गाँव में घुस आते हैं। जो मिलाउसे ही मारकर खा जाते हैं। चाहे बछड़ा मिले चाहे भेड़-बकरीचाहे कुत्ता बिल्ली। हमारे गाँव में पिछले कई दिनों से कई वारदात हो चुकी हैं। रात में चुपके से बाघ आया और गाय को मारकर खा गया। अगले दिन हमारे पड़ोसी की गाय का बछड़ा मारकर खा गया। भेडि़ए ने एक रात हमारे मालिक सरपंच के कुत्ते टोमी को ही निबटा दिया। गाँव वालों के मन में डर बैठ गया- ये बाघ और भेड़िए किसी दिन किसी आदमी को भी मार डालेंगे। सभी लोग यह समस्या लेकर सरपंच किशन लाल के पास आ गए। सब अपनी-अपनी कह रहे  थे- इस बार बारिश नहीं हुई। सभी तालाब सूख गए हैं।
सरपंच जी बोले-'तभी तो पानी की तलाश में भेड़िए और बाघ गाँव का रुख करने लगे हैं। जंगल भी लगातार कट रहे हैं। छोटे-छोटे जंगली जानवरों का शिकार किया जा रहा है। ऐसे में  बाघ और भेड़िए कहाँ जाएँ ?’ हरिया दुखी स्वर में बोला-'बाघ  ने  मेरी तो गाय  की बछिया को ही मार दिया। कुछ उपाय सोचा जाए।’ चरणसिंह ने कहा-'रामकला लुहार से एक  फंदा  बनवा लेते हैं। जो बाघ या भेड़िया ऊधम मचा रहा हैकिसी तरह वह फँस जाए तो सब चैन से रहा सकेंगे।
चरणसिंह की बात सबको ठीक लगी। रामकला लुहार ने कहा- 'ऐसा फंदा बना दूँगा कि बाघ हो चाहे भेड़िए  पैर रखते ही फँस जाएगा। यह भी तय कर लिया जाए कि इन्हें फँसाने के लिए क्या किया जाएकोई भेड़-बकरी फन्दे के पास बाँधनी पड़ेगीतभी तो बाघ वहाँ आएगा।
'बकरी मैं दे दूँगा’ - सरपंच  किशन लाल  ने कहा।
मैं कुछ दूर खूँटे से बँधी यह सब सुन रही थी। मेरे तो पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई। मेरा सिर चकराने लगा। मुझे सरपंच के ऊपर गुस्सा आने लगा। टोमी ने अपनी जान देकर मेरी जान बचाई थी। वह  ज़ोर-ज़ोर से भौंकता रहा था। किसी ने ध्यान ही नहीं दिया आखिकार भेड़िए ने उसी को अपना शिकार बना लिया।
मुन्ना भी चारपाई पर चुपचाप बैठा लोगों की बातें  सुन रहा था। वह बोल पड़ा-'मैं अपनी बकरी नहीं दूँगा। गाँव में कई लोगों के यहाँ कई-कई बकरियाँ हैं। हम ही क्यों अपनी बकरी दें?’
उसे बीच में इस तरह बोलता देखकर किशनलाल ने  डपटकर कहा-'बच्चे इस तरह बड़ों के बीच में नहीं बोलते।’ कई लोगों ने एक साथ मुड़कर मुन्ना की तर देखा। वह सबकी तरफ़ घूर रहा था।
मुझे बहुत अच्छा लगा- चलो कोई तो है जो मेरे बारे में सोचता है। मेरी जान में जान आई।
मुन्ना जि़द्दी हैवह मेरे लिए कुछ भी कर सकता है। हमारे परिवार में केवल तीन प्राणी हैं- मेरी माँमेरी बहिन छुटकी और मैं। माँ को फन्दे के पास बाँधा जाएगा तो उसे बाघ या भेड़िया खा जाएगा। मेरी बहिन छुटकी अभी घास बहुत कम खाती है। वह सुबह-शाम दूध ज़रूर चूँघती है। माँ के बिना वह पलभर नहीं रह सकती और दूध के बिना एक भी दिन नही।
अब केवल मैं बची थी। रामकला लुहार ने लोहे का फन्दा  बना दिया। गाँव के किनारे वाले रास्ते पर बाँधने के लिए मुझे ले गए। मुन्ना ने बहुत हाय-तौबा मचाई। बहुत रोया भीपर उसकी बात किसी ने नहीं सुनी। मुझे एक खूँटे से बाँध दिया गया। मेरे सामने हरी-हरी पत्तियाँ डाल दी गईं। एक तसले में मेरे पीने के लिए पानी भी रख दिया गया। जिन पत्तियों को मैं चाव से चपर-चपर करके खा जाती थीवे मुझे आज अच्छी नहीं लग रही थी। गला सूखने पर थोड़ा- सा पानी ज़रूर पिया।
रात हो चली थी। जो भी उधर से गुज़रतावही बोलता -सरपंच की यह बकरी तो गई जान से। बाघ इसे चट कर जाएगा। चारों तर सन्नाटा छाने लगा। मेरे तो होश ही उड़ गए। मुझे माँ की याद आने लगी। छोटी बहिन छुटकी मेरे साथ दिनभर फुदकती रहती थी। अब क्या होगाजंगल से तरह-तरह की आवाज़े आ रही थीं। डर के मारे मेरी टाँगे काँपने लगीं। मिमियाकर रोने का मन कर रहा थालेकिन मैं डर के मारे चुप थी। कहीं मेरी आवाज़ सुनकर ही बाघ न आ जाए। तभी पत्तों पर किसी के चलने की आवाज़ आई। मेरी तो साँस ही अटक गई। अरे यह तो उछलू खरगोश है। मुझे बँधा हुआ देखकर वह बिदककर भाग गया। बहुत दूर सियारों के हुआँ-हुआँ करने की आवाज़ आने लगी। डर के कारण मैं बैठ गई।
 रात और गहरी हो गई थी। मुझे लग रहा था कि बाघ अब आया तब आया। मुझे किसी के धीर-धीरे चलने की आहट महसूस हुई। बस अब मेरे प्राण गए। मैंने डर के मारे आँखें बन्द कर लीं। लगा कि बाघ या भेड़िया अब मुझे दबोचने ही वाला है। किसी ने मेरे गले पर हाथ रखा। मैं डर के मारे काँप रही थी। पर यह हाथ तो बहुत मुलायम है-मुन्ना के हाथ जैसा। हाँ यह मुन्ना ही था। वह मेरे गले की रस्सी खोलकर फुसफुसाया- जाघर भाग जा।
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैं ताबड़तोड़ घर की ओर दौड़ी। मेरी माँ मेरे बिना ज़ोर-ज़ोर से मिमिया रही थी। मुझे वापस आया देखकर छुटकी उछलने लगी। मुझे आज पता चला कि मुन्ना मुझसे कितना प्यार करता है।
अगले दिन पता चला-तसले में रखा पानी पीने के चक्कर में एक भेडिय़ा उस फन्दे में फँस गया है। गाँव वालों ने उसे वन -विभाग को सौंप दिया।
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दो बाल कविताएँ

1 अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो
अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो
आसमान में बादल सौ।
सौ बादल हैं प्यारे
रंग हैं जिनके न्यारे।
हर बादल की भेड़ें सौ
हर भेड़ के रंग हैं दो।
भेड़ें दौड़ लगाती हैं
नहीं पकड़ में आती हैं।
बादल थककर चूर हुआ
रोने को मज़बूर हुआ।
आँसू धरती पर आए
नन्हें पौधे हरषाए।
  
2 लाल बुझक्कड़
अक्कड़-बक्कड़
लाल बुझक्कड़
सिर पर लादे
मोटा लक्कड़।
कभी सोचता
कभी दौड़ता।
खूब उड़ाता
धूल व धक्कड़।
हँसकर बोले
सदा प्रेम से।
मौज उड़ाता
बनकर फक्कड़।

 

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दो लोककथाएँ , दो बाल गीत

1. भेड़े की भिड़न्त
 -लाला जगदलपुरी 
  
1      भेड़ा जा रहा था। सियार गूलर के पेड़ पर चढ़ा हुआ था। पेड़ पर बहुत से फल लगे थे। भेड़ा फलों को देख वहाँ रुक गया। उसने सियार से कहा, 'मित्र! एक फल मेरे लिए भी तोड़ कर गिरा दो। मैं गूलर का स्वाद लेना चाहता हूँ। देखूँ तोकैसा लगता है?’
सियार ने भेड़े के लिए एक कच्चा फल तोड़ कर नीचे गिरा दिया। कच्चा फल देख कर सियार की धूर्त्तता पर गुस्सा आयाकिन्तु क्या करता! विवश था। बोला, 'मेरे लिए तूने कच्चा फल गिराया। मैं भी देख लूँगा तुझे।और वहाँ से चल दिया।
समीप के गाँव में कहीं से एक राक्षसी आई। डर के मारे गाँव के लोग बाल-बच्चों सहित प्राण बचाने के लिए जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। राक्षसी ने एक अच्छे से मकान में डेरा जमाया और इधर-उधर से स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ लाकर वहाँ जमा करती गई।
एक दिन की बात। राक्षसी कहीं बाहर घूमने गई  हुई थी। उसके सूने घरमें भेड़ा आया और उसके मकान में घुस गया। भेड़े ने वहाँ स्वादिष्ट वस्तुएँ देखीं। फिर क्या था! भेड़ा खाने में जुट गया। वह चबा-चबाकर चबैने खा रहा था। उसी समय राक्षसी लौटी। उसे घर में किसी के होने की आहट मिली। चबैनों के चबाए जाने की आवाज़ साफ़ सुनाई  दे रही थी। राक्षसी ने जोर से आवाज दी, 'कौन हे रेमेरे मकान में?’
भेड़े ने उत्तर दिया, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार!’ यह सुन कर राक्षसी काँप उठी। तुरन्त भागी वहाँ से। रास्ते में उसे एक नाग मिला। राक्षसी को बेतहाशा भागते देख कर नाग ने उसे रोक कर भागने का कारण पूछा। इस पर राक्षसी ने बताया कि मेरे घर में जाने कौन घुस गया! कहता हैमैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार!’ साँप ने उसे ढाढ़स दिया। कहा, 'घबराने की ज़रूरत नहीं है। चलोमैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। मैं उसे डस लूँगा। उसके प्राण निकल जाएँगे।
फिर दोनों वहाँ से रवाना हुए। पहुँचे। राक्षसी ने दरवाजे पर से ही आवाज़ लगाई, 'कौन हैमेरे मकान में?’ उत्तर मिला, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार! नाग साँप को पकड़ कर छड़ी बनाने वाला भेड़-कुमार!
भेड़े की धमकी का पूरा-पूरा असर दोनों पर हुआ। दोनों भागे वहाँ से। उन्हें भागते देख लिया जंगल के एक बाघ ने। उसने उन्हें रोका। भागने का कारण पूछा। राक्षसी ने उसे भी कारण बतायाक्या बताऊँमेरे घर में पता नहीं कौन घुस गया है। मुझे खदेड़ कर खा जाना चाहता है। अब तुम्हीं बताओ कि अब क्या उपाय करें?’
बाघ यह सब सुन कर जोश में आ गया। बोला, 'चलो तोजरा मैं भी तो देखूँकौन है! नानी याद आ जायेगी उसे।
इस बार तीनों रवाना हुए राक्षसीसाँप और बाघ। दरवाजे के पास खड़े हो कर राक्षसी ने जोर से हाँक लगाई, 'कौन है मेरे मकान में?’
भीतर से फिर उत्तर मिला, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार! नाग साँप को छड़ी बनाने वाला भेड़-कुमार! बाघ की खाल उतारने वाला भेड़-कुमार!
बाघ की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई  और वह भागता नजर आया। उसके साथ-साथ राक्षसी और साँप भी भागे। उनके भागते ही भेड़ अब यह सोच कर बाहर निकल आया कि अधिक समय तक भीतर घुसे रहना खतरे से खाली नहीं है। और वह जंगल की ओर चल पड़ा। वह स्वादिष्ट चबैनों का मज़ा लेता हुआ चला जा रहा था। रास्ते में वही जाना-पहचान सियार मिला। वह लालच में आकर भेड़े से बोला, 'क्या खा रहे होमित्रमुझे नहीं दोगे?’
भेड़े ने तुरन्त जवाब दिया, 'उस दिन तुमने मेरे लिए पेड़ से कच्चा गूलर गिराया थायाद है?’
इतने में सियार ने सफाई दी, 'क्या करता मित्र! बच्चों को गूलर कहीं कम न पड़ जायेंइस बात की चिन्ता थी और इसीलिए मैंने कच्चा गूलर गिरा दिया था। मुझे खेद है।

भेड़ा सियार की दलील सुन कर हँसा और उसने उसे सुझाव दियायहाँ से थोड़ी दूरी पर एक आलीशान मकान है। वहाँ बहुत- सी स्वादिष्ट वस्तुएँ रखी हैं। वहाँ कोई नहीं है। वहीं से मैं खाता आ रहा हूँ। साहस होतो वहाँ घुसकर तुम भी उन वस्तुओं को खाकर तृप्त हो सकते हो। चलोमैं तुम्हें वहाँ तक पहुँचा आऊँ। ऐसा कह सियार को ले कर भेड़ा रवाना हुआ। उसे ठिकाने पर पहुँचा और दूर से मकान को दिखाकर लौट आया। सियार खुशी-खुशी बिना सोचे-विचारे अचानक भीतर प्रवेश कर गया। उस समय राक्षसी मकान में पहुँच गई  थी और भोजन बना रही थी। सियार को देखकर राक्षसी के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसकी ऐसी मरम्मत की कि सियार वहीं ढेर हो गया। राक्षसी ने उस दिन सियार के मांस के साथ भोजन किया।

    2. असत्य का राज्य
एक साँप पिटारी में बंद पड़ा था। एक राहगीर उधर से निकला। उसकी दृष्टि उस पिटारी पर पड़ी। वह पिटारी के करीब पहुँचा। पिटारी के छेद में से साँप ने भी उसे देख लिया और सहायता के लिये चिल्लाया। राहगीर को साँप की स्थिति पर दया आई । उसने सोचा कि इस बेचारे को पिटारी से मुक्त कर दूँताकि यह खुली हवा में साँस ले सके। ऐसा सोच कर उसने पिटारी खोल दी। पिटारी से निकलते ही साँप ने अपनी धूर्त्तता दिखाई । वह उस राहगीर की ओर बढ़ा। मुसाफिर को उसका इरादा समझते देर न लगी। उसने साँप से कहा, 'अरे! भाईमैंने तुम्हें पिटारी से मुक्त किया है और तुम मुझे ही काट खाना चाहते हो?’
साँप ने उत्तर दिया, 'झूठ। तुमने मुझे कहाँ मुक्त किया हैक्या तुम्हें नहीं मालूम कि आजकल दुनिया में झूठ का राज्य चल रहा है?’
राहगीर बोला, 'मैं यह नहीं मानता। झूठ की क्या औकातसत्य का राज्य चल रहा है भाईसत्य का।’ सामने एक बैल चर रहा था। दोनों उस बैल के पास पहुँचे। उससे पूछा, 'बैल भाईइन दिनों में संसार में किसका राज्य चल रहा हैझूठ का अथवा सत्य का?’ बैल ने  जवाब दिया, 'आजकल राज्य चल रहा है झूठ का। विश्वासघाती जिसका मन्त्री है। देखोमैं कितनी मेहनत करता हूँ। जो देते हैंखा लेता हूँ। बात मानता हूँ फिर भी मुझे डंडे पड़ते हैं। सत्य का राज्य होता तो मुझे मेरी नेकी का उचित परिणाम न मिलता?’
बैल के उत्तर से साँप को गर्व हुआ और वह राहगीर को फिर दौड़ाने लगा। राहगीर प्राण लेकर भागा जा रहा था और साँप बेरहमी से उसका पीछा कर रहा था। जाते-जाते एक फलदार पुराना पेड़ मिला। आदमी ने रुककर उससे भी पूछ लिया, 'क्यों भाईपेड़! क्या तुम बता सकते हो कि इन दिनों दुनिया में किसका राज्य चल रहा हैसच का या झूठ का?’
पेड़ ने तपाक से कह दिया, 'झूठ का। क्योंकि लोग मेरे बाल-बच्चों को खुले आम मुझसे छीन लेते हैं। उन्हें तराश-तराश कर खा जाते हैं और मुझे भी काट डालते हैंजला देते हैं। ऐसा अँधेर केवल असत्य के राज्य में ही हो सकता है।
आदमी पेड़ की बात सुन कर फिर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। अन्त में उन्हें एक साधु मिला। उन्हें भागते देख कर बाबाजी ने कहा, 'साँप ठीक ही तो कहता है। असत्य के राज्य में वह सिर क्यों न उठायेमौके का लाभ न उठानाबेवकूफी का सबसे बड़ा सबूत है।’ फिर भी साधू ने दोनों को आश्वासन देते हुए कहा, 'हम इसका न्याय अभी किए देते हैं। किन्तु भाईसाँप! जरा यह तो बताओ कि पिटारी में तुम किस तरह बन्द थे?’ यह सोच कर कि बाबाजी उसके पक्ष में ही फैसला देंगेसाँप फिर से पिटारी में घुस गया। साँप के घुसते ही बाबाजी ने पिटारी का मुँह एक मजबूत रस्सी से बाँध दिया और पास के पेड़ में उसे लटका दिया। राहगीर साधु को प्रणाम करके घर चला गया और साधु भी साँप को यह बताकर चल दिया कि, 'भाई साँप! आजकल असत्य का राज्य चल रहा हैइसमें संदेह नहीं। प्रमाण सामने है।
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बाल गीत
 जा तितली  
 जा तितली आ जा तितली
उडऩा हमें सिखा जा तितली
बुला रहे हैं रम्मू-कम्मू
साथी उन्हें बना जा तितली।
खुली हथेली पर तू क्षण भर
बैठजरा सुस्ता जा तितली
कितने फूल-कटोरों का तू
पी आई रस ताजा तितली
क्या तू उतरी परी-लोक से
हाँतो हाल सुना जा तितली। 


छत्तीसगढ़ी बाल गीत


सुनव-सुनव रे मुसवा मन









सुनव-सुनव रे मुसवा मन
गुन ला गाही जउने मोर,
साद बुताही जउने मोर
सेवा करिहय जउने मोर
तउने पाहय नवाँ अँजोर
म्याऊँ-म्याऊँ मोर बचन
सुनव-सुनव रे मुसवा मन।
कोनो होवयँ सोन मढ़े
कोनो होवयँ रतन जड़े
फेर मोर ले कोन बड़े
बिलवा बोलिस पड़े-पड़े
मोर घरो-घर सिंहासन
सुनव-सुनव रे मुसवा मन।
भूँकिस कुकुर भों-भों-भों
भागिस बिलवा मरों-जियों
फुटिस ढोल घमंडी के
खुल गे पोल घमंडी के
सुन ले भइया मनराखन।
(सुनो-सुनो हे चूहो तुम। जो गाएगा गुण मेरेजो पूरी करेगा मेरी साधजो करेगा मेरी सेवावही पायेगा नया उजियाराम्याऊँ-म्याऊँ मेरे बोलसुनो-सुनो हे चूहो तुम। हो कोई भी सोने से मढ़ाहो कोई भी रत्नों से जड़ातो भी मुझसे कौन बड़ाबिल्ला बोला पड़ा-पड़ाघर-घर में मेरा सिंहासनसुनो-सुनो हे चूहो तुम। कुत्ता भौंका भों-भों-भोंभागा बिल्ला बचाकर प्राणफूट गया ढोल घमंडी काखुल गई  पोल घमंडी कीसुन ले भैया मनराखन।)



  

कहानी सुनाने की कला

विश्व की सर्वश्रेष्ठ किस्सागो थी वह बुढिय़ा

हरिकृष्ण देवसरे
 अपनी बात शुरू करने से पहले एक छोटा-सा किस्सा सुनाता हूँ। अकबर के दरबार में एक बार बीरबल विलम्ब से पहुँचे। अकबर ने बीरबल से विलम्ब का कारण पूछा तो बीरबल ने कहाहुजूरमेरे घर में एक छोटा बच्चा रूठ गया था। उसे मनाने में देर लग गई ।

क्या कहते हो बीरबल। भला बच्चे को मनाना कोई मुश्किल काम हैजो तुम्हे इतनी देर लगी। अकबर ने कहा।
यकीन कीजिए हुजूर बच्चों को मनाना बड़ा मुश्किल काम है। बीरबल ने कहा।
हम नहीं मानते। अकबर ने कहा। तब बीरबल बोलेहुजूर हाथ कंगन को आरसी क्यामैं बच्चा बन जाता हूँ आप मुझे मनाकर देखिए।
बादशाह अकबर सहमत हो गए। बीरबल ने बच्चा बनकर रोना शुरू किया।
अकबर ने पूछाक्यों रोता है?
मुझे गन्ना चाहिए। बीरबल ने कहा।
ठीक है गन्ना पेश किया जाये। अकबर ने आदेश दिया।
गन्ना आया तो बीरबल ने कहाइसकी गंडेरिया काट दो। तुरंत गन्ना छीलकर उसकी गंडेरिया काट दी गईंलेकिन बीरबल फिर रोने लगे।
‘’अब क्या चाहिए?’’- अकबर ने पूछा
इन गंडेरियों को जोड़ दो। बीरबल के यह कहने पर अकबर सचमुच चकरा गए और बोलेमान गए बीरबलतुम ठीक कहते थे। लेकिन अब हम असली बच्चे का मज़ा देखना चाहते हैं।
बीरबल ने तुरंत अपने नाती को बुलवा भेजा। नाती आया तो आते ही मचल गया।
अरे बच्चेक्या चाहिए। अकबर ने पूछा।
एक गिलास पानी चाहिए। बच्चे ने कहा।
तुरन्त पानी पेश किया गया। पानी आने पर बोलाअब नहीं पीना पानी। और रोने लगा।
तो क्या चाहिएबीरबल ने पूछा।
मुझे हाथी चाहिए!
अकबर बोलेबेटे इतना बड़ा हाथीहमारे दरबार में यहाँ कैसे आ सकता हैलेकिन बच्चे ने तो हाथी के लिए जिद पकड़ ली थी। वह रोने लगा।
बीरबल ने कहाहुजूर परेशान न हों। मैं कुछ उपाय करता हूँ। और बीरबल ने छोटा-सा हाथी का खिलौना मँगा दिया,
लेकिन बच्चा फिर रोने लगा। बोलाहाथी को पानी के गिलास में डाल दो।
लो डाल दिया! बीरबल ने कहा।
अब हाथी पर बादशाह को बिठा दो। बच्चे ने जैसे ही यह कहा तो सारे दरबार में हँसी का फौव्वारा छूट पड़ा।
अकबर ने कहाबीरबलहम बिल्कुल मान गए। बच्चे को मनाना बहुत मुश्किल काम है।
बच्चों की रुचि को समझनाउन्हें मनाना और प्रसन्न रखना सरल काम नहीं है। बच्चों को मनाने का पारम्परिक उपाय उन्हें तरह-तरह की कहानियाँ सुनाना भी रहा है। बड़ी उम्र के बच्चों को रात में आराम की नींद सुलाने में भी कहानियों की बड़ी  महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। कहानियाँ बच्चों को सपने में वास्तविकता का आनंद देती हैं। अपने कल्पना-जगत् में उन कहानियों के नायक वे स्वयं बनकर उनके सुख-दुख को अनुभव करते हैं। बच्चों को उन्हीं कहानियों को सुनने में आन्न्द आताजिन पात्रों से उनका तादात्म्य स्थापित हो जाता है। बच्चों को कहानियाँ सुनाने वाले दादा-दादी या नाना-नानी जानते हैं कि ऐसी कहानियों का चयन करना कितना मुश्किल काम है। बच्चों को वे जैसे ही कहानी सुनाना शुरू करते हैं कि बच्चे कह देते हैंये कहानी तो हम पहले सुन चुके हैं। तब हर दादा-दादी  या नाना-नानी के लिए रोज एक नई कहानी सुनाना भी मुश्किल हो जाता हैलेकिन तब भी वो कुछ न कुछ सोचकरकोई न कोई कहानी सुनाते ही हैं। मैंने ऐसे कई लोगों को देखा हैजो पुस्तकालयों में बैठकर कहानियों की किताबें पढ़ते हैं और फिर जाकर अपने पोते-पोतियों को कहानियाँ सुनाते है। लेकिन ऐसे भी लोग मैंने देखे हैंजिनके पास कहानियों का अटूट भंडार हुआ करता था। वे लोककथाओंपंचतंत्रकथा सरित्सागरअरेबियन नाइट्स आदि के अलावा अपने जीवन के अनुभवों के विपुल भंडार हुआ करते थे। ऐसे लोगों से कहानियाँ सुनने वाले बच्चे कभी ऊबते नहीं थेक्योंकि उन्हें उनसे हर बार नई  कहानी ही सुनने को मलती थी।
कहानियों के विपुल भंडार वाले ऐसे दादा-दादी या नाना-नानी की जो श्रोता बाल-मंडली होती थीउसकी स्थिति उल्टी होती थी। उन्हें जो कहानी बहुत पसंद होती थीउसे वे बार-बार सुनने की फरमाइश किया करते थे। उन सुनाने वालों की परेशानी यह होती थी कि उन्हें एक कहानी को कई बार सुनाने में ऊब अनुभव होने लगती थी। फिर भीबच्चों की फरमाइश के सामने उन्हें झुकना पड़ता था। अलीबाबा चालीस चोरसिंदबाद जहाजी के किस्सेकिस्सा चहार दरवेश आदि कुछ ऐसी ही कहानियाँ थीं। इसके अलावा वे सभी कहानियाँ भी बहुत अच्छी लगती थींजिनमें रहस्य-रोमांच होता थाजिनमें कौतूहल होता थाजैसे किस्सा गुलबकावली आदि।
बड़ों द्वारा बच्चों को कहानियाँ सुनाने की इस परम्परा का एक  सबसे बड़ा लाभ यह होता था कि उनसे बच्चों को अपने समाजइतिहासदेशधर्म और संस्कृति की बहुत-सी बातें जानने को मिलती थीं। आज के आधुनिक समाज मेंछोटे परिवारों मेंनौकरी के कारण माता-पिता से दूर रहकर जीवन जीने के लिए विवश परिवारों में यह परम्परा खत्म होती जा रही है। और पठन-पाठन में कम होती हुई रुचि के कारण भविष्य में दादा-दादी बनने वाली आज की पीढ़ी में तो कहानी सुनाने की इस कला का बिल्कुल लोप हो जाएगा। आज कुछ परिवार भले ही मिल जाएँजिनमें बुजुर्ग लोग अपनी भावी पीढ़ी को किस्से-कहानियाँ सुना देते होंलेकिन भविष्य के प्रति आज आशान्वित होना सम्भव नहीं दिखता।
बड़ों द्वारा बच्चों को कहानी सुनाने के कई उद्देश्य होते थे और  उन कहानियों से वे इन निश्चित लक्ष्यों को भी प्राप्त कर लेते थेजिन्हें वे उन कहानियों के माध्यम से पाने का प्रयास करते थे। उनकी लोककथाओं में जीवन के अनुभव हुआ करते थे- समाज व्यवस्थालोकव्यवहारआचार-विचार के साथ-साथ जीवन और समाज के कुछ ऐसे शाश्वत-मूल्यों को वे बच्चों में संप्रेषित करने में सफल होते थेजिन्हें उपदेश देकर समझाना कठिन था। ये शाश्वत- मूल्यउनमें सत्यन्यायईमानदारीआत्म-सम्मानबड़ों का आदर आदि अनेक सद्गुणों के बीच स्वत: ही अंकुरित करा देते थे। सर्दी की लम्बी रात हो या गर्मी की दोपहरऐसे बुजुर्ग लोगअपनी कहानियों के अक्षय भंडार से बच्चों को बाँध लेते थे। इतिहास की कथाओं में जहाँ प्राचीन ऐतिहासिक पात्रों की शूरवीरता की कहानियाँ होती थींवहीं उनमें अपने देश और गौरव की भावना भी जागृत होती थी। रामायणमहाभारतपुराणों की  कहानियाँ उनमें भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूकता लाती थीं। इसके अलावा उनके अपने जीवन की अनेक ऐसी घटनाएँ होती थींजिनसे जीवन के प्रति बच्चों को ऐसे निर्देश मिलते थेजिन्हें वे शायद सहज प्राप्त न कर सकें।

दादा-दादी या नाना-नानी से कहानियाँ सुनने के लिएबच्चों में आकर्षण का एक अन्य कारण भी था। वह थी- उनकी कहानी सुनाने की आकर्षक कला। हमारे यहाँ एक जमाने में किस्सागो हुआ करते थे। ये तो पेशेवर किस्सा सुनानेवाले होते थे। लेकिन घर के दादा-दादी भी कहानी सुनाने की कला में कुछ कम माहिर न हुआ करते थे। वास्तव में कहानी के साथ-साथउसे सुनाने की कलासोने में सुहागे का काम किया करती थी। वे उन कहानियों को बड़े ही नाटकीय और प्रभावशाली अन्दाज में सुनाते थे और बच्चे उन्हें सुनते हुए अपनी कल्पना में उन्हें चित्ररूप में देखने लगते थे। ऐसी कहानियों का संकलन करते हुए एक बार ग्रिम-बन्धु एक गाँव में पहुँचेजहाँ एक बुढिय़ा रहती थी और उसके पास कहानियों का भंडार था। ग्रिम बन्धु उसके पास पहुँचे और उन्होंने उससे कहानियाँ सुनाने का आग्रह किया। उस बुढिय़ा ने एक शर्त रखी कि मेरे सामने कोई श्रोता-बालक होगातभी मैं कहानियाँ सुनाऊँगी। ग्रिम बन्धुओं को भी बात ठीक लगी कि श्रोता  होना ही चाहिए। वे तुरंत गाँव के कुछ मित्रों के पास गएऔर उनके बच्चों को वहाँ ले जाने की बात कहीकिन्तु उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहाजब उन मित्रों ने अपने बच्चों को उस  बुढिय़ा के पास भेजने से साफ इनकार कर दिया। उन लोगों ने कहाजानते होवह बुढिय़ा-जादूगरनी हैडायन हैचुड़ैल है... बच्चों पर ऐसा जादू करती है कि वे रात में डरावने सपने देखकर चीखते-चिल्लाते हैंना बाबाहम ऐसी जादूगरनी के पास अपने बच्चे नहीं भेज सकते। तब ग्रिम- बन्धु दूर किसी गाँव में गए। वहाँ से किसी मित्र के बच्चे को लेकर आए। ग्रिम- बन्धु अपने उस अनुभव में लिखते हैं कि हमने उस बुढिय़ा के सामने बच्चे को बिठा दिया और हम दोनों दूसरे कमरे के द्वार पर पर्दे के पीछे बैठ गए। बुढिय़ा कहानी सुनाने लगी और हम कहानियाँ लिखने लगे। वह बुढिय़ा जब कहानी सुनाने लगी तो हमने अनुभव किया कि वह शायद कहानी-सुनाने की कला में माहिर विश्व की सर्वश्रेष्ठ किस्सागो थी। वह कहानी सुनाने के दौरान आवश्यकतानुसार चिडिय़ों की आवाज निकालती या शेर की तरह गुर्राती। कहने का मतलब यह कि वो वर्षाआँधीजानवरोंचीड़िय़ों आदि के ध्वनि प्रभाव अपने मुँह से पैदा करती और कहानी को अत्यधिक प्रभावशाली बना देती। इसी कहानी-कला का प्रभाव वह जादू थाजो बच्चों के मस्तिष्क पर छा जाता थाऔर उसी के प्रभाव के कारण वे सपनों में उन चित्रों को साकार देखकर डर जाते थे। लोग इस राज को जानते न थे और कहानी-सुनाने की कला में श्रेष्ठता-प्राप्त उस बेचारी बुढिय़ा को जादूगरनी या डायन कहकरउसका तिरस्कार करते थे।

हमारे यहाँ कहानी सुनाने की कला तो लुप्त हो ही गई  हैकहानी सुनाने की परम्परा भी मिटती जा रही है। एक तरफ दादा-दादी के पास कहानियों का अभाव दूसरी ओर जनसंचार माध्यमों का प्रसार और छपाई की सुविधाओं का प्रसार होने से लोग बच्चों को कहानियाँ सुनाने से कतराने लगे और आज दशा ये हो गई  है कि बच्चे शायद यह भी नहीं जानते कि दादा-दादी या नाना-नानी के पास जाने या बैठने का एक अर्थ यह भी हुआ करता था कि उनसे बढिय़ा रोमांचक कहानियाँ सुनने को मिला करती थीं।

प्रसिद्ध बाल कविताएँ

कोकिल

महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिडिय़ा है,
सच कहते हैं अति बढिय़ा है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रंगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊँचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

चाँद एक दिन
रामधारी सिंह 'दिनकर

हठ कर बैठा चाँद  एक दिनमाता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का
बच्चे की सुन बातकहा माता ने-'अरे सलोने’
कुशल करे भगवानलगे मत तुझको जादू टोने
जाड़े की तो बात ठीक हैपर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौड़ाकभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता हैऔर किसी दिन छोटा
घटता-बढ़ता रोजकिसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है
अब तू ही ये बतानाप तेरी किस रोज लिवायें                  
सी दे एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये!

खिलौनेवाला...

सुभद्रा कुमारी चौहान

वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुडिय़ा भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा टी-सेट है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
 मुन्नू ने गुडिय़ा ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला करती है
माँ ने लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है
अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोताबिल्लीमोटररेल
पर माँयह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जाकिसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगेअसुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँबिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसेरूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यार से बिठा गोद में
मनचाही चींज़े देगा।

कोशिश करने वालों की...

सोहनलाल द्विवेदी

लहरों से डर कर
नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब            
दाना लेकर चलती है,    
चढ़ती दीवारों पर,          
सौ बार फिसलती है।  
     
मन का विश्वास
रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना,
गिरकर चढऩा
न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत
बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।
डुबकियाँ सिंधु में
गोताखोर लगाता है,
जा-जा कर खाली हाथ
लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही
मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह
इसी हैरानी में.....।
मुट्ठी उसकी खाली
हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है,
इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई,
देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो,
नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर
मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही
जय -जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।