निष्ठा का चमत्कार
- विजय जोशी
नये साल
के इस अंक से हम एक नया स्तंभ जीवन-दर्शन आरंभ कर रहे हैं। इस स्तंभ के लिए अपने
जीवन भर के अनुभवों को प्रति माह सिलसिलेवार साझा करेंगे भोपाल भेल के पूर्व
ग्रुप महाप्रबंधकश्री विजय जोशी । पहले स्तंभ में निष्ठा का चमत्कार और सहनशीलता
सहेजें शीर्षक के अंतर्गत उन्होंने जीवन के दो पहलुओं पर बड़ी सहजता और सरलता के
साथ हमारे समक्ष रख दिया है। विश्वास है पाठकों को यह नया स्तंभ पसंद आयेगा -
संपादक
जीवन
में किसी भी कार्य के आरंभ से समापन तक जो गुण व्यक्तित्व में आवश्यक हैं उनमें से
एक महत्त्वपूर्ण अवयव है निष्ठा। अवसरवादी समय के अनुसार अपना मुखौटा एवं निष्ठाएँ
बदल लेते हैं और यह उनके अस्थिर मन और स्वार्थपरायणता की सूचक होने के साथ ही साथ
उनके मार्ग से भटककर पतनगामी होने का कारण भी बनती हैं। सिद्धांतप्रिय व्यक्ति न
तो अपने पथ से विचलित होता है और न अपने व्यक्तित्व में अवसरवदिता को अंगीकार करते
हुए अपनी निष्ठा बदलता है।
गोस्वामी
तुलसीदास राम के अनन्य भक्त थे और आजीवन रहे भी। उसी प्रकार सूरदास की निष्ठा अपने
आराध्य कृष्ण के प्रति थी। दोनों एक दूसरे के परम मित्र होने के साथ ही साथ आराध्य
अलग-अलग होने के बावजूद परस्पर पूरा सम्मान, स्नेह और श्रद्धा रखते थे।
एक
बार सूरदास ने गोस्वामी तुलसीदास को वृंदावन आमंत्रित किया। वे उन्हें आरंभिक
आवभगत के पश्चात् कृष्ण दर्शन हेतु बाँके बिहारी मन्दिर में ले गए। वहाँ पर भाव
विभोर सूर भक्ति रस में रम गए; लेकिन तुलसी ने सूर का साथ देने में असमर्थता
व्यक्त की।
तुलसी
जैसे सज्जन संत के संदर्भ में यह बात उपस्थित वृंदजन के लिए आश्चर्यकारी और अनहोनी
थी। पूछे जाने पर गोस्वामी ने भव्य रूपी कृष्ण के समक्ष सम्मान तो पूरा व्यक्त
किया; लेकिन
भक्ति समर्पण में असमर्थता प्रस्तुत करते हुए यह दोहा दोहरा दिया-
कहा
कहो छवि आपकी, भले
पधारो नाथ।
तुलसी
मस्तक तब नमे, धनुष
बाण लो हाथ।।
बात
बहुत मार्मिक और सटीक थी। एक निष्कामकर्मी निस्वार्थ भक्त की बात ने समस्त
उपस्थितजनों को अंदर तक छू लिया।
आगे
की बात बहुत संक्षिप्त है। भक्ति के इस गूढ़ अर्थ को कृष्ण भली भाँति समझ गए और
कहा जाता है कि तभी एक चमत्कार हुआ और उपस्थित भक्तों ने देखा कि एक पल के लिए
बाँके बिहारी की मूरत धनुर्धारी राम के रूप में रूपांतरित हो गई। तुलसी ने सविनय
अपना माथा झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। यह सारी घटना एक क्षण में घटित होकर समाप्त
हो गई। अगले ही पल भगवान कृष्ण पूर्ववत् मोर मुकुट और बाँसुरी के साथ विद्यमान थे।
सूर ने नेत्रहीन होने के बावजूद इस पल को अपनी अंतरात्मा में पूरी शिद्दत और
श्रद्धा के साथ अनुभव किया और उसी पल में उनके मुखारविंद से जो शब्द अचानक निकले
वे कुछ इस प्रकार थे -
कहँ
बँसी, कहँ पीत
पट, कहँ गोपिन
को साथ।
अपने
जन के कारणे कृष्ण बने रघुनाथ।।
अर्थात
सूर की लाज रखने और तुलसी की निर्मल निस्वार्थ भक्ति ने भक्त वत्सल भगवान कृष्ण को
अपना स्वरूप बदलने पर विवश कर दिया।
मित्रों
यही है निष्ठा का चमत्कार। सत्य के मार्ग पर चलते हुए जब आप सिद्धान्तपूर्वक अपने
लक्ष्य के मार्ग पर डटे रहते हैं, तो तमाम कठिनाइयों और बाधाओं के बावजूद आपको
उद्देश्य प्राप्ति से कोई नहीं रोक सकता। बस आवश्यकता है मार्ग की बाधाओं और
प्रलोभन से पार पाने हेतु दृढ़ निश्चय की। इसलिए पथ से भटके नहीं कभी भी।
सहनशीलता
सहेजें
व्यक्तित्व
में सहनशीलता एक ऐसा अद्भुत गुण है जो न केवल उसमें निखार लाता है, अपितु चार चाँद लगा
देता है। इस गुण से व्यक्ति में स्थिरता, शान्ति, सरलता की प्राप्ति के साथ ही साथ यह उसे स्थितप्रज्ञ बना देती
है। वह मान, अपमान
के बोध से ऊपर उठकर- सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का पर्याय बन जाता है।
पूर्ण
नाम के एक शिष्य को जब बुद्धत्व प्राप्त हो गया तो महायान बुद्ध ने उससे कहा- जाओ
और संसार को ज्ञान दो, इन्हें
ज्ञान के मार्ग पर प्रवर्त कर सुख का संसार दो।
पूर्ण
ने कहा- तो हे भगवान मुझे बिहार के उस क्षेत्र में भेजें जहाँ सूखा पड़ा है।
गौतम
ने कहा- वहाँ न जाओ, क्योंकि
वहाँ के लोग बहुत कठिन और कठोर हैं। वे तुम्हें गालियाँ देगें। तुम्हारा अपमान
करेंगे।
पूर्ण-
तब तो मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा। चिकित्सक की भाँति। उन्हें मेरी जरूरत है।
बुद्ध
ने कहा- तो फिर पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो। अगर वे गालियाँ दे, अपमान करें, तो तुम्हें कैसा लगेगा
और क्या होगा।
पूर्ण
ने कहा- मैं कहूँगा भले लोग हैं। सिर्फ अपमान करते हैं। मारते नहीं। मार भी तो
सकते थे।
बुद्ध
ने दूसरा प्रश्न पूछा- अगर वे मारें, पत्थर फेंके। तो फिर तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या
होगी? तुम क्या करोगे?
पूर्ण
ने कहाँ- मैं कहूँगा कितने भले लोग हैं। सिर्फ मारते हैं, मार नहीं डालते।
बुद्ध
का अंतिम प्रश्न था- अगर वे मार ही डालें तो फिर तुम क्या करोगे?
पूर्ण
ने उत्तर दिया- मैं सोचूँगा कितने भले लोग हैं। इस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल चूक हो
सकती थी। किसी का मान अपमान, हित अहित मेरे द्वारा हो सकता था।
बुद्ध
ने कहा- जाओ तुम पूर्ण भिक्षु हो गए।
तात्पर्य
यह कि स्वभाव में सहनशीलता अपनाए बगैर आप कभी सुखी नहीं हो सकते, यह सहनशीलता ही है जो
पग- पग आ रही बाधाओं को पार कर पाने की आपकी क्षमता में अभिवृद्धि करती है। एक
स्थिर, शान्त
मनोवृत्ति के साथ जीवन यात्रा अधिक सुगम है, बनिस्बतन उत्तेजनापूर्ण, अप्रासंगिक एवं अनुचित
व्यवहार के।
यदि
बाधाएँ मिली हमें तो, उन
बाधाओं के ही साथ
जिनसे
बाधा बोध न हो, वह
सहनशक्ति भी आई हाथ।
अपनी
बात: जीवन में सबसे सहज और सरल कार्य है परजन हिताय, परजन सुखाय कुछ सुंदर, सुखद एवं सार्थक लिख
पाना, खास तौर
पर तब जब हमारे अपने आस पास अनेकों सामयिक एवं उपयोगी उद्धरण उपस्थित हों आवश्यकता
है सिर्फ उन्हें यथा समय कागज पर उकेर पाने की
अत:
यह स्वयंसिद्ध है कि बूँद- बूँद विचार रूपी इन संकलनों में नया कुछ भी नहीं है।
बिखरे मोती की माला बनने का सुख भी किसी प्रार्थना से कम नहीं और लेखन के पलों
मैंने उसी सुख को पूरी श्रद्धा और शिद्दत के साथ अनुभव किया है। आमीन।
लेखक
के बारे में: चार दशक के औद्योगिक परिवेश में अंतस् के कोमल भावों को सहेजने की
कोशिश का छोटा मोटा प्रयास करने वाले भेल के पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक विजय जोशी ने यात्रा
की शुरुआत तो कविताओं से की, लेकिन बाद में संगी -साथियों (और खास तौर पर
प्रकाशकों के आग्रह) पर लेखन की नैया प्रबंधन की धारा में छोड़ दी। उनके पहले और
आखिरी कविता संग्रह 'भला
लगता है'पर
श्री गुलज़ार की भूमिका रूपी उपकार के बाद
से वे अनवरत जीवन से लेकर कारपोरेट प्रबंधन पर इसलिए लिख पा रहे हैं, क्योंकि आज के दौर में
वही बिकता है। उनकी इन पुस्तकों की भूमिका पद्मश्री मार्क टुली, गांधीवादी चिंतक डा.
एस. एन. सुब्बाराव, पर्यावरणविद
श्री राजेन्द्र सिंह द्वारा लिखी गई है। इन सबमें नया कुछ भी नहीं, वही सब दुहराया गया है, जो सदियों से उपलब्ध
है।
संप्रति:
कौंसिल मेंबर, इंस्टीट्यूशन
आफ इंजीनियर्स (इंडिया)।
सम्पर्क:8/ सेक्टर- 2, शांति निकेतन (चेतक
सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641