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Aug 14, 2013

विम्बलडन 2013



मैदान में खेल
देखने का आनन्द 
-पल्लवी सक्सेना
यूँ तो मुझे खेलों में कोई खास दिलचसपी नहीं है मगर ऐसा भी नहीं है कि आँखों के सामने कोई खेल चल रहा हो और मुझे बोरियत महसूस होने लगे। सबसे पहले आपको बता दूँ कि विम्बलडन (Wimbledon) लंदन में एक कस्बे का नाम है। वैसे मैंने इससे पहले कभी किसी खेल को उसके मैदान में सीधा नहीं देखा था मगर इस बार किस्मत से हमें विम्बलडन का महिलाओं द्वारा खेला जाने वाला फ़ाइनल मैच देखने को मिल ही गया यहाँ लंदन में रहकर विम्बलडन कोर्ट में जाकर खेल देखना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है। आप को जानकार आश्चर्य होगा कि जुलाई 2014 के खेलों के लिए पब्लिक बेलट  (Public Ballot1 अगस्त 2013 से खुलेगा और आपको दिसम्बर तक फॉर्म भर कर भेजना पड़ेगा, फिर लाटरी प्रक्रिया से जो किस्मत वाले लोगों का नाम निकलेगा उनको फरवरी 2014 तक बताया जाएगा, तब आप उनकी साइट पर जाकर राशि  जमा करें और आपके घर टिकट भेज दिया जाएगा । यह प्रकिया सिर्फ  Centre Court और Court no.1के लिए है। जो लोग किसी कारण नहीं जा पाते हैं वो वापस कर देते हैं क्योंकि टिकट किसी और को नहीं दिया जा सकता। यह टिकट फिर मैच के एक दिन पहले टिकटमास्टर.कॉम पर बेचा जाता है और कुछ मिनट में सारे बिक जाते हैं मगर उसके लिए भी जेब में अच्छे खासे पैसे और किस्मत दोनों का होना ज़रूरी है। यहाँ आपको बता दूँ इस बार पुरुषों के फ़ाइनल खेल का सबसे महँगा टिकिट 80 हजार पाउंड का बिका है। इस बात से ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यहाँ इस खेल को देखने के लिए किस कदर पागल रहते है लोग।
हमें भी हमारे श्रीमान् जी की कृपा से यह सुनहरा और पहला अवसर मिला इस खेले को सीधे कोर्ट में बैठकर  देखने का, जिसका अपना एक अलग ही मज़ा है। हमें दो टिकिट 250 पाउंड के मिले थे तीसरा नहीं मिल सका इसलिए अपने बेटे को मुझे अपनी एक दोस्त के घर छोड़कर जाना पड़ा और किस्मत बहुत अच्छी थी कि टिकट भी वहाँ का मिला जहाँ से खिलाड़ी कोर्ट में आते और जाते हैं, इस कारण हमें दोनों खिलाड़ियों का ऑटोग्राफ भी मिल गया।
खैर खेल के कोर्ट में बड़े-बड़े खिलाडिय़ों को सामने से देखना ऐसा लग रहा था मानो वो इंसान नहीं कोई अजूबे हों। पूरा कोर्ट खचाखच भरा था। आपको यहाँ यह जानकार भी शायद आश्चर्य हो कि टेनिस ही एक मात्र ऐसा खेल हैं जिसमें दूर -दूर तक कहीं भी विज्ञापन का कोई रोल नहीं है, ना ही कोर्ट में और ना ही टीवी पर ही खेल के दौरान आपने कभी कोई विज्ञापन देखा होगा। है ना आश्चर्य की बात! वहाँ हम ने यह भी देखा कि लोग एक खिलाड़ी को ज्यादा और दूसरे को कम बढ़ावा दे रहे थे जबकि दोनों ही खिलाड़ी ब्रिटेन की नहीं थी फिर भी जाने क्यों लोगों ने सबीन को ज्यादा सपोर्ट किया जो कि जर्मनी से है। लेकिन फिर भी जीती वही महिला जिसको जनता का सपोर्ट कम मिला अर्थात Marion जो फ्रांस से है। यद्यपि खेल के दौरान जनता का झुकाव और बढ़ावा भी बहुत बड़ी चीज़ होती है। मगर फिर भी आखिर काबलियत भी कोई चीज़ होती है भई, जीतता वही है जिसमें दम हो।
आजकल लंदन में पिछले कुछ दिनों से मौसम भी बहुत अच्छा चल रहा है मतलब 28 डिग्री यानी सूर्य नारायण की भरपूर कृपा बरस रही है आजकल यहाँ जो आमतौर पर बहुत ही कम होता है यहाँ, जिसके चलते बेहद गरमी है लोग हाहाकार कर रहे है। उस दौरान हमे भी यही लग रहा था कि अभी तो हम छाँव में बड़े मज़े से बैठे हैं ;  मगर जब सूर्य नारायण की दिशा बदलेगी और उनका प्रकोप हम पर भी पड़ने लगेगा तब हमारा क्या होगा। हमारी यह चिंता शायद हमारे चहरे पर भी दिखाई देने लगी थी। इसलिए वहाँ हमारे पास खड़े गार्ड ने हमे बताया कि आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है आप बहुत ही किस्मत वाले हैं जो आपको यहाँ सीट मिली है यहाँ धूप आते ही हम ऊपर का शेड (Retractable roof )  आपके लिए खोल देंगे। पहले हमें लगा शायद वह मज़ाक कर रहा है लेकिन वो मज़ाक नहीं सच था। हम पर धूप आते ही हमारे साइड का ऊपर का कवर थोड़ा सा खोल दिया गया। यहाँ मैं आपको यह भी बताती चलूँ कि केवल सेंट्रल कोर्ट में ही यह व्यवस्था है जो खिलाडिय़ों और वहाँ बैठी जनता को धूप और पानी से बचा सकता है बाकी अन्य कोर्ट में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है  । वहाँ यदि बारिश हो जाये तो खेल बीच में ही रोकना पड़ता है।  इसलिए इस दौरान होने वाले सभी महत्वपूर्ण मैच केवल सेंट्रल कोर्ट में ही खेले जाते है। हमने भी गर्मी का लुत्फ़ उठाते हुए वहाँ (पिम्म्स पेय) पीकर और ठंडी-ठंडी स्ट्रॉबेरी के साथ ठंडी-ठंडी क्रीम डालकर खायी, सच मज़ा आ गया था खाकर,वो भी  HSBC बैंक की मेहरबानी थी जिसका जाइंट खाता था उसके कारण फ्री में यह स्ट्रॉबेरी और क्रीम खायी और खूब मज़ा आया खेल देखकर जैसा कि मैंने उपर्युक्त कथन में भी लिखा है खिलाड़ियों के हस्ताक्षर (Autograph) भी लिये।
महिलाओं के खेल का तो हमने भरपूर मज़ा लिया और जि़ंदगी भर के लिए इन मीठी यादों को अपने दिल में सजा लिया। पुरुषों के खेल का मज़ा हमने घर बैठकर टीवी पर ही लिया ,जबकि मन पुरुषों के खेल को देखने का ही ज्यादा था । टिकिट मिली महिलाओं वाले खेल की, फिर भी हम बहुत खुश थे। पुरुषों वाले खेल के खत्म हो जाने के बाद जब यह जाना कि यह ट्रॉफी ब्रिटेन में 77 साल के बाद आयी है  यह सोचकर लोग ज्यादा खुश हो रहे हैं ।और लोगों की तो छोड़ो जीतने वाला Andy Murray वो भी ऐसा ही सोचता है यह जानकार बहुत अफसोस हुआ क्योंकि महिलाओं के साथ हमेशा हर जगह दुनिया के किसी भी कोने में दोगला व्यवहार ही होता आया है और शायद हमेशा ही होता रहेगा। जब भी यह बात ज़ेहन में आती है एक आग सी लग जाती है दिल के अंदर की खेल में भी दोगलापन क्यों? क्या महिलाओं को कम मेहनत लगती है टैनिस खेलने में जो उनकी विनर को सिर्फ एक सुनहरी प्लेट दी जाती है और पुरुषों को पूरा कप क्यों? अभी तक लगता था यह दोगलापन केवल हमारे यहाँ ही ज्यादा देखने को मिलता है। मगर अब यहाँ ऐसा देखकर लगा सभी जगह महिलाओं की स्थिति एक सी ही है कहीं कोई फर्क नहीं है। जबकि Murray  से पहले एक महिला खिलाड़ी 1977 में भी यह Wimbledon  जीत चुकी है तो 77 साल बाद नहीं बल्कि पहले भी यह जीत ब्रिटेन को एक महिला (Virginia Wade) दिला चुकी है। मगर उसका कहीं किसी ने नाम तक नहीं लिया आप चाहे तो इस लिंक पर पूरी जानकारी पढ़ सकते है  
 http:// ftw.usatoday.com/2013/07/andy-murray-virginia-wade-first-brit-wimbledon/
जहाँ तक पुरुषों के फाइनल को देखने की बात है कि लोग उसके पीछे इतना पागल क्यों थे कि इतना महंगा बिका उसका टिकिट तो वो सिर्फ इसलिए कि इस बार केवल यह ही दो प्रसिद्ध खिलाड़ी टिक पाए बाकी सब मशहूर लोग इस बार जल्दी बाहर हो गए थे। जब उनके खेल देखे रहे थे तब ऐसा लग रहा था जैसे इस बार सभी मशहूर खिलाड़ियों ने यह मन बना लिया है कि इस बार नए खिलाड़ियों को आगे आने का मौका देंगे। जबकि वास्तविकता यह नहीं होगी, मगर लग ऐसा ही रहा था और यही वजह थी कि पुरुषों का खेल देखने के लिए लोग ज्यादा पागल थे। मगर इस सब के बीच यह देखकर मन को तसल्ली हुई थी कि और कुछ हो न हो महिलाओं के खेल को देखने के लिए भी लोग उतने ही पागल थे , मतलब जनता ने खेल देखने के मामले में दोगलापन न दिखाते हुए इंसाफ किया क्योंकि महिलों के खेल वाले दिन भी पूरे कोर्ट में कहीं पैर रखने की जगह नहीं थी पूरा कोर्ट खचाखच भरा हुआ था यकीन ना आए तो खुद ही देख लिए इस तस्वीर में...)

संपर्क:  संपर्क: द्वारा- डॉ. एस के सक्सेना, 27/1 गीतांजलि कॉम्पलेक्स, गेट नं. 3 (भोपाल म. प्र.) 
Email-pallavisaxena80@gmail.com

प्रिय बहना

प्रिय बहना
मुरलीधर वैष्णव

सहोदर थे हम
फिर मेरे लिए
खुशी की लहर,
तो तेरे आने से
क्यों बरपा कहर।

हम शैशव की शान थे
किलकारी हो या रुदन
हमारे सहगान थे।

माँ से पूछूँ या बापू जाने
मैं जाता स्कूल जब
तू क्यों जाती बकरी चराने।

चौका- बर्तन तक सिमटी तुम
होती रही जार जार
मैं अनवरत पाता रहा
कंचों से कम्प्यूटर तक प्यार।

मैं लुटाता स्वर्ण- मोहरें
तू कौडिय़ाँ गिनती रही
मैं नहाता दूध से
तू छाछ को तकती रही।

मेरे लिए ममता की नदी
तुझसे छीनी तेरी अपनी सदी।

इन रेशमी धागों की आन
मोती चुगेगी हंसिनी
तेरी अपनी होगी उड़ान।

हे शतरूपा ! अब न सहना
प्रिय सहोदरा मेरी प्रिय बहना।

 संपर्क'गोकुल’, ए-77, रामेश्वर नगरबासनी प्रथम फेज,
जोधपुर- 342005,  Email- mdvaishnav.1945@gmail.com

स्वाधीनता से साढ़े छह दशक और हमारा विज्ञान

स्वाधीनता से साढ़े छह दशक और हमारा विज्ञान
- चक्रेश जैन
   

भारत ने 15 अगस्त 1997 के दिन अपनी स्वाधीनता के 50 वर्ष पूरे होने पर स्वर्ण जयंती मनाई थी। एक स्वाधीन राष्ट्र के इतिहास में विज्ञान यात्रा के लिहाज़ से यह अवधि बहुत छोटी है। समीक्षकों के अनुसार हम स्वाधीनता का पूर्वार्द्ध पार कर उत्तरार्द्ध में प्रवेश कर चुके हैं। इस वर्ष आबादी के लगभग साढ़े छह दशक पूरे हो चुके हैं। यह वही वर्ष है, जब जनवरी में भारत सरकार ने साइंस कांग्रेस के शताब्दी समारोह में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति की घोषणा करते हुए नवाचारों को विशेष घटक के रूप में सम्मिलित किया है। भले ही हमने बीते दशकों में अंतरिक्ष विज्ञान, प्रक्षेपास्त्र, परमाणु ऊर्जा और एक-दो अन्य क्षेत्रों में उपलब्धियों के नए अध्याय रचे हैं, लेकिन नवाचारों के मामले में हमारा हाल चिन्ता की परिधि में है। विज्ञान जगत के विश्लेषकों के अनुसार स्वाधीनता के साढ़े छह दशकों में भारत ने वैज्ञानिक तरक्की तो की है, लेकिन तरक्की की रफ्तार बेहद धीमी है।
स्वाधीन भारत में विज्ञान की चर्चा करते समय दो सवाल हमेशा प्रासंगिक होते हैं। पहला, स्वाधीनता के बाद आर्थिक-सामाजिक बदलावों में विज्ञान की कितनी भूमिका रही है? दूसरा, विज्ञान में हुई रिसर्च का लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचा है अथवा नहीं? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर हाल के दशकों में प्रौद्योगिकी अर्थात व्यावहारिक विज्ञान के रूप में हमारे सामने हैं। आज जो 'आधार संख्या करोड़ों देशवासियों को मिली है, वह विज्ञान की समाज को देन है। बॉयोमेट्रिक्स असल में जीव विज्ञान की शाखा है, जिसने आम आदमी की आधार संख्या बनाने में अहम भूमिका निभाई है। दिल्ली की मेट्रो रेल परियोजना प्रौद्योगिकी का अनुपम उदाहरण है। ऐसा लगता है, स्वाधीन भारत के उत्तरार्द्ध में विज्ञान और समाज के रिश्ते प्रगाढ़ होते जा रहे हैं।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक शोध पर विशेष ज़ोर दिया था। उनका कहना था कि वैज्ञानिक संस्थान आधुनिक भारत के मंदिर हैं और राष्ट्र के विकास और निर्माण में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हमारे यहां स्वाधीनता के बाद सुनियोजित विकास का दौर 1952 में प्रथम पंचवर्षीय योजना से शुरू हुआ, जो अब बारहवीं योजना तक पहुँच  गया है। योजनाकारों ने विज्ञान को विकास की कुंजी मानते हुए सभी पंचवर्षीय कार्यक्रमों में वैज्ञानिक अनुसंधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार मार्च 1958 में संसद ने विज्ञान नीति को मंज़ूरी दी थी। इस नीति का ऐतिहासिक महत्त्व है। इसका उद्देश्य देश में विज्ञान को प्रोत्साहन देना और इसका लाभ आम जनता को प्रदान करना है।
1950-51 में शोध और विकास का बजट 4.7 करोड़ रुपए था, जो आज की तुलना में बहुत कम था। स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन वर्षों बाद अधोसंरचना के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना की गई। स्वाधीन भारत में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) देश का सबसे बड़ा रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट संगठन है, जिसके झण्डे तले 37 प्रयोगशालाएँ हैं।
आज़ादी के बाद सभी सरकारों ने वैज्ञानिक अनुसंधान को आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों से जोड़ा है। आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के लिए समावेशी विकास को महत्त्व दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने आधुनिक शोध के ज़रिए जो प्रौद्योगिकी विकसित की है, उसका उपयोग ग्राम संसाधन केन्द्रों और दूर चिकित्सा कार्यक्रम में हो रहा है। स्वदेशी उपग्रहों का उपयोग संचार, प्रसारण, मौसम और आपदा प्रबंधन में हो रहा है। यही नहीं हमारा शैक्षणिक उपग्रह एडुसैट अंतरिक्ष में गुरुजी की भूमिका निभा रहा है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दोनों में कृषि के विकास और वैज्ञानिक विधियों से उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ज़ोर दिया गया। स्वाधीनता के बाद भारत में संचार क्रांति हुई है। 1947 के आसपास देश में टेली घनत्व 0.02 प्रतिशत था, जो 2012 में बढ़कर 79.28 प्रतिशत तक पहुँच  गया। स्वतंत्र भारत में हरित, नील और श्वेत क्रांति का सूत्रपात हुआ। हमारे यहाँ जैव प्रौद्योगिकी क्रांति अस्सी के मध्य दशक में आरंभ हुई। वर्तमान में भारत टीकों के उत्पादन में सक्षम हो चुका है। हाल के दशक में हम बीटी कॉटन की खेती में सबसे बड़े उत्पादक देश बन चुके हैं।
अलबत्ता, आज़ादी के 66 वर्षों बाद भी वैज्ञानिक शोधकार्य प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों के कैम्पस तक सीमित है। इसका लाभ जनसामान्य के बीच नहीं पहुँचा है। युवा प्रतिभाओं की मूलभूत विज्ञान में कैरियर बनाने में रुचि नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में शोध पत्रों की प्रकाशन संख्या बहुत कम है। भारत में आज़ादी के साढ़े छह दशकों के दौरान हुए आविष्कारों और खोजों की संख्या न के बराबर है। स्वाधीनता प्राप्ति के छह दशक बाद कृषकों को पता नहीं है कि 'जीएम बीज किस चिड़िया का नाम है। सच पूछा जाए तो जेनेटिक साक्षरता के मामले में हमारी हालत बुरी है। आज भी ग्रामीण लोग गरीबी, कुपोषण, स्वच्छ जल और बीमारियों के संदर्भ में वैज्ञानिक तरीकों से अनजान व अछूते ही हैं।
सब मिलाकर कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक बिरादरी के सामने एक प्रश्न यही है कि वह आज़ादी का जश्न कैसे मनाएँ? हर वर्ष की तरह अपनी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों को याद करते हुए खुश महसूस करें या फिर ऐसा प्रयास करें कि स्वाधीनता से पहले भारत ने जिस तरह नोबेल सम्मान प्राप्त किया था, वैसा सम्मान आज़ादी की सौवीं सालगिरह यानी 2047 से पहले फिर मिले? स्वाधीनता के उत्तराद्र्ध में हम विश्व के वैज्ञानिक मानचित्र पर जगह बना चुके हैं, लेकिन विशिष्ट जगह बनाने की मंज़िल दूर है। (स्रोत फीचर्स)

काठ का सपना

काठ का सपना
गजानन माधव मुक्तिबोध
 भरी, धुआँती मैली आग जो मन में है और कभी-कभी सुनहली आँच भी देती है। पूरा शनिश्चरी रूप। वे एक बालिका के पिता हैं, और वह बालिका एक घर के बरामदे की गली में निकली मुँडेर पर बैठी है, अपने पिता को देखती हुई। उन्हें देख उसके दुबले पीले चेहरे पर मुस्कराहट खिलती है। और वह अपने दोनों हाथ आगे कर देती है जिससे कि उसके काका उसे अपने कंधों पर ले लें।
उसके पिता अपनी बालिकाओं को देख प्रसन्न नहीं होते हैं। विक्षुब्ध हो जाता है उनका मन। नन्हीं बालिका सरोज का पीला उतरा चेहरा, तन में फटा हुआ सिर्फ एक 'फ्राक’ और उसके दुबले हाथ उन्हें बालिका के प्रति अपने कर्त्तव्य की याद दिलाते हैं; ऐसे कर्त्तव्य की जिसे वे पूरा नहीं कर सके, कर भी नहीं सकेगें, नहीं कर सकते थे। अपनी अक्षमता के बोध से ये चिढ़ जाते हैं। और वे उस नन्हीं बालिका को डाँट कर पूछते हैं, 'यहाँ क्यों बैठी है अंदर क्यों नहीं जाती?’
बालिका सरोज, गंभीर, वृद्ध दार्शनिक-सी बैठी रहती है। अपने क्रोध पर पिता को लज्जा आती है। उनका मन गलने लगता है। उनके हृदय में बच्ची के प्रति प्यार उमड़ता है। वे उसे अपने कंधे पर ले लेते हैं। ऊँचे उठने का सुख अनुभव कर बच्ची मुस्करा उठती है।
पिता बच्ची को लिए घर में प्रवेश करते हैं तो एक ठंडा सूना, मटियाली बास-भरा अँधेरा प्रस्तुत होता है, पिछवाड़े के अंतिम छोर में आसमान की नीलाई का एक छोटा चौकोर टुकड़ा खड़ा हुआ है! वह दरवाजा है।
घर में कोई नहीं है। सिर्फ दो साँसें हैं,
एक पिता की। दूसरी पुत्री की।
वे एक अँधेरे कोने में बैठ जाते हैं और उनके घुटनों में वह बालिका है। उसका चेहरा पिता को दिखाई नहीं देता। फिर भी वह पूरा-का-पूरा महसूस होता है। वे चुपचाप उसके गाल पर हाथ फेरते जाते हैं और सोचते हैं कि वह लड़की मेरे समान ही धैर्यवान् है, सब कुछ पहचानती है। बड़ी प्यारी लड़की है। उन्हें लगता है कि उनकी आँखे तर हो रही हैं।
एकाएक खयाल आता है कि अगर घर में बड़ा आईना होता तो अच्छा होता; अपनी बड़ी आँसू-भरी सूरत की बदसूरती देख लेते। उन्हें उमर रसीदा आदमियों का रोना अच्छा नहीं लगता।
सामने, अँधेरे में, रंग-बिरंगी पर धुँधली आकृतियाँ तैर जाती हैं। सुंदर चेहरेवाली एक लड़की है, वह उनकी सरोज है! नारंगी साड़ी है, सुनहली किनारी है सफेद ब्लाउज है! गले में हार है। हाथों में रंग-बिरंगी चूडिय़ाँ हैं एक-एक दर्जन! पति के घर से वापस लौटी है। खुश है, दामाद मैकेनिकल इंजीनियर है जिसकी गरीब सूरत है। और वह बाहर बरामदे में कुरसी पर बैठा है; क्या करे सूझता नहीं!
घर में उनकी स्त्री पूड़ी बना रही है। पकौडिय़ाँ बन रही हैं। बहुत-बहुत-सी चीजें हैं। भाग-दौड़ है। हल्ला-गुल्ला है। शोर-शराबा है। लोग आ-आ कर बैठ रहे हैं- आ रहे हैं, जा रहे हैं। पास-पड़ोस की लुगाइयाँ चौके में मदद कर रही हैं। और उनके दिल में... क्या करें, क्या न करें, सब कुछ कर डालें! क्या ही अच्छा होता कि उनमें यह ताकत होती कि वे सबको प्रसन्न कर सकते और सारी दुनिया को खुश देख सकते। ...कि इतने में सपना टूट जाता है।
बरामदे का दरवाजा बज उठता है। पैरों की आवाज से साफ जाहिर होता है कि स्त्री, जो कहीं गई थी लौट आई है।
अंदर आ कर देखती है। उसे अचंभा होता है। 'यहाँ क्या कर रहे हो?’
उसकी आवाज गूँजती है। जैसे लोहे की साँकल बजती है। जैसे ईमान बजता है!
'सरोज कहाँ है?’
कोई आवाज नहीं! सरोज और उसके पिता स्तब्ध बैठे हैं।
पिता बोलते हैं मानो छाती के कफ को चीरती हुई घरघराती आवाज आ रही हो। कहते हैं, 'कहाँ गई थी घर बड़ा सूना लग रहा था।?’
स्त्री कोई जवाब नहीं दे कर वहाँ से चली जाती है। आँगन में पहुँच कर, जमीन में गड़ा हुआ एक पुराना पेड़, जो कट चुका है और जिसकी झिल्लियाँ बिखरी हैं, उस पर पैर रख कर खड़ी होती है। जमीन में उस कटे पेड़ में से जमीन की तहें छूते हुए नए अंकुर निकले हैं। बाद में उन पर से उतर कर वह झिल्लियाँ बीनती है। पड़ोस से लाई हुई कुल्हाड़ी चला कर उन अधकटे ठूँठों से लकड़ी निकालने का खयाल आता है। लेकिन काटने का जी नहीं होता। इसलिए झिल्लियाँ बीन कर वह उनका एक ढेर बना देती है और फिर आँगन की दीवार की मुँडेर पर चढ़ जाती है, क्योंकि उस मुँडेर के एक ओर नीम की एक सूखी डाल निकल आई है।
उसे वह तोड़ती है। ऊँची मुँडेर पर चढ़ कर नीम की सूखी डाल तोड़ लाने का जो साहस है, उस साहस से दीप्त हो कर वह प्रफुल्ल हो जाती है। सारी लकड़ी ठंडे चूल्हे के पास लाती है, जमा कर देती है।
सरोज पिता की गोद से उठ आई है। वह देखती है कि चूल्हे में सुनहली ज्वाला निकल रही है! वह देखती है, और देखती रह जाती है। उसे उस ज्वाला का रंग अच्छा लगता है। वह चूल्हे के पास जा कर बैठ गई है। उसकी रीढ़ की हड्डी दु:ख रही है, पर चूल्हे में जलती हुई ज्वाला उसे अच्छी लग रही है।
सारा चौका सुहाना हो उठता है- भूरा-मटियाला, साफ-सुथरा! भीत की पटिया पर रखी पीतल की एक भगोनी, छोटे-छोटे दो गिलास और दो कटोरियाँ, कैसी चमचमा रही हैं, कितनी सुंदर! उन पर माँ का हाथ फिरा है। तभी तो... तभी तो...।
सुबह के पकाए भात में पानी डाला जाता है और नमक! चूल्हे पर चढ़ गया है भात! सुबह का बेसन भी है। उसमें पानी मिला दिया जाता है। उसे भी चूल्हे के दूसरे मुँह पर रख दिया गया है, सीझता रहेगा!
सरोज बोलती नहीं, माँ बोलती नहीं, पिता बोलते नहीं!
जब वह नन्ही बालिका भोजन कर चुकी तो उसकी जान में जान आई। बोरे पर बिछे, माँ के चिथड़े से बने, अपने मुलायम बिस्तर पर वह सो गई। पिताजी के बिस्तर से सटा हुआ उसका बिस्तर है! वे उसे अपने पास नहीं लेते। रात को वह बिस्तर गीला करती है, इसलिए!
दोनों तथाकथित बिस्तरों पर लेट गए हैं! दोनों को नींद नहीं! दोनों एक दूसरे से कुछ कहना चाहते हैं; कहना आवश्यक है। उस पूर्व-ज्ञान को वे कहना-सुनना नहीं चाहते। वह पूर्व-ज्ञान वेदनाकारक है, इसलिए उसे न कहना ही अच्छा! फिर भी न कहने से काम नहीं बनता, क्योंकि कह-सुन लेने से अपने-अपने निवेदनों पर सील लग जाती है, व्यक्तिगत मुहर लग जाती है। वह व्यक्तिगत मुहर अभी लगी नहीं हैं। हर एक उत्तर हर एक ज्ञान है। फिर भी बहुत कुछ अज्ञात छूट जाता है!
वे नहीं चाहते थे कि रात में नींद के पहले के ये कुछ क्षण खराब हो जाएँ, मन:स्थिति विकृत हो और दुर्दमनीय चिंता से ग्रस्त हो कर वे रात-भर जागते-कराहते रहें। नहीं, ऐसा नहीं! चिंता सुबह उठ कर करेंगे। रात है। यह रात अपनी है। कल की कल देखी जाएगी!
किंतु इन खयालों से माथे का दुखना नहीं थमता, देह की थकान दूर नहीं होती, असंतोष की आग और बेबसी का धुआँ दूर नहीं होता।
नहीं, उसका एक उपाय है! जबरदस्ती नींद लाने के लिए आप एक से सौ तक गिनते जाइए! इस तरह, आप कई बार गिनेंगे, दिमाग थक जाएगा और आप ही आप भीतर अँधेरा छा जाएगा। एक दूसरा तरीका है! रेखागणित की एक समस्या ले लीजिए। मन-ही-मन चित्र तैयार कीजिए। उसके कोणों को नाम दीजिए और आगे बढ़ते जाइए। अंत तक आने के पहले ही नींद घेर लेगी। एक और भी मार्ग है, जिसे इस लेख का लेखक अपनाया करता है! मस्तिष्क की सारी नसें ढीली कर दीजिए। आँखे मूँद कर पलकें बिलकुल बंद करके, सिर्फ अँधेरे को एकाग्र देखते रहिए। तरह-तरह की तसवीरें बनेंगी। पेड़दार रास्ते और उस पर चलती हुई भीड़ अथवा पहाड़ और नदियाँ जिनकों पार करती हुई रेलगाड़ी... भक-भक-भक ।
अँधेरा जड़ हो गया और छाती पर बैठ गया। नहीं, उसे हटाना पड़ेगा ही- सरोज के पिता सोच रहे हैं! और उनकी आँखे बगल में पड़े हुए बिस्तर की ओर गईं।
वहाँ हलचल है। वहाँ भी बेचैनी है। लेकिन कैसी
...लेकिन उन दोनों में न स्वीकार है न अस्वीकार! सिर्फ एक संदेह है, यह संदेह साधार है कि इस निष्क्रियता में एक अलगाव है- एक भीतरी अलगाव है। अलगाव में विरोध है, विरोध में आलोचना है, आलोचना में करुणा है। आलोचना पूर्णत: स्वीकरणीय है, जिसे इस पुरुष ने कभी पूरा नहीं किया। वह पूरा नहीं कर सकता।
कर्त्तव्य कर्म को पूरा करना केवल उसके संकल्प-द्वारा ही नहीं हो सकता। उसके लिए और भी कुछ चाहिए! फिर भी, वह पुरुष मन-ही-मन यह वचन देता है, यह प्रतिज्ञा करता है कि कल जरूर वह कुछ-न-कुछ करेगा; विजयी हो कर लौटेगा।
पुरुष में भी आवेश नहीं है। वह भी ठंडा है, सिर्फ गरमी लाने की कोशिश कर रहा है।
वह उसकी बाँहों में थी। निश्चेष्ट शरीर! फिर भी, उसमें एक ऊष्मा है, जो मानो सौ नेत्रों से अपने पुरुष को देख रही हो, निर्णय प्रदान करने के लिए प्रमाण एकत्र कर रही हो। फिर भी निश्चेष्ट और सक्रिय!
पुरुष संवेदनाओं के जाल में खो गया। उसे स्त्री के होठ गुलाब की सूखी पँखुरियों-से लगे, जिससे उसे सूरज की गरमी की याद आई। उसके कपोल मिट्टी-से थे - भुसभुसी, नमकीन, शुष्क मृत्तिका! उसका हृदय एक अनजानी गूढ़ करुणा की सूचना से भर उठा। ...हाँ, उसका पेट, उसकी त्वचा में तो घरेलू बास थी। उसने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और वह, मन-ही-मन, उस पूरी गरम चिलकती हुई पृथ्वी को याद करने लगा जिस पर वह बेसहारा मारा-मारा फिरता है। क्या यह पृथ्वी उतनी ही दु:खी रही है जितना कि वह स्वयं है!
एक उर्जा उठी और गिर गई। पुरुष निश्चेष्ट पड़ा रहा। मन जाग्रत था।
...दोनों स्त्री-पुरुष के जीवन पर विराम का पूर्ण चिह्न लग गया है, काठ हो गए हैं। बाढ़ आती है। किनारे पर पड़े हुए काठों को बहा कर ले जाती है। जल-विप्लव में। काठ बहते जाते हैं, फिर भी वे प्राणहीन काठ, आपस में गुँथे हुए बहे जा रहे हैं।
बादल-तूफान के कारण, पेड़ तिरछे हो रहे हैं। पर वे गुँथे-बँधे बहे जा रहे हैं, बहे जा रहे हैं... और, हाँ गुँथे-बँधे काठ खाली नहीं हैं। उन पर एक बालिका बैठी हुई है। हाँ, वह सरोज है। अपने नन्हे दो हाथ उसने दोनों के काठों पर टेक दिए हैं, जिनके सहारे वह स्वयं चली जा रही है।
सरोज की उस बाल मूर्ति की रक्षा करनी ही होगी! उन दो निष्प्राण काठ-लोगों का यही कर्त्तव्य है।
पुरुष इस स्वप्न को देखता ही रहता है। बारह का गजर होता है। रात और आगे बढ़ती है। सप्तर्षि, जो अब तक कोने में थे, सामने आ कर साफ दिखाई देते हैं।

बदलते सपने चूड़ियों जैसे

बदलते सपने
चूड़ियों जैसे
- ज्योत्स्ना प्रदीप
1
जब से पिता
छोड़ चले हैं घर
माँ है सावन।
2
भरी कलाई
सूनी सड़क बन
ताके मौसम।
3
हमारा दर्द
आपमें बसता था
दर्द यही है।
4
ऐसा बाबुल
किसका होगा भला
इतना भला!
5
चुप लेटी हैं
मायके की गलियाँ
कुछ दिनों से।
6
आँखों का पानी
कह रहा माँ की
एक कहानी।
7
बहा न सके
दर्द मन का सारा
बहते आँसू।
8
उमर भर
बदलते सपने,
चूड़ियों जैसे।
9
पावन मन
ये निष्पाप नयन
फिर भी आँसू!
10
राखी के धागे
वो बड़े हैं अभागे
जो नहीं बँधे।
11
माँ और बाप
वात्सल्य का अनन्त
पूर्ण  आलाप।
12
टूटते घर
बन रहे मकान
सुबह-शाम।

13
सपने सारे
कच्ची बेल -से फैले
ले के सहारे।
14
जीवन बीता
वो कभी बनी राधा
तो कभी सीता।
15
हिम-सा दर्द
हँसी की मीठी धूप
पिघला गई।
16
खो गई सारी
वे कागज़ की नावें
सूखा है गाँव।
17
हथेली पर
लकीरों में उगी है
पूरी जि़न्दगी।
18
याद तुम्हारी
बन गई है अब
सितार गूँगा।
19
घर-मकान
खिंच गई दीवार
टूटते रिश्ते।
20
खो गई सभी
कागज़ की नावें थीं
चुप है नदी।
21
कौन किसका?
कोई हँस पड़ा तो
कोई सिसका।
22
गिरी है आज
कलियों पर ओस
रोया है कोई।
23
तू तो फरिश्ता
मैं हूँ एक इंसान
ये कैसा रिश्ता?
24
काली रात में
तुम्हारी याद हुई
सोनम भोर।

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