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Jul 18, 2013

दहेज लेने और देने की होड़


दहेज लेने और देने की होड़
- संजीव खुदशाह
आज दहेज शब्द समाज में एक दानव के रूप में प्रचारित है। कितनी ही शादियाँ दहेज के कारण होती हैं और कितनी ही शादियाँ दहेज के कारण भी टूटती भी हैं। जिनके घर दहेज के कारण बर्बाद हो रहे है उनके लिए दहेज एक दानव की तरह है। जिनके आबाद हो रहे है (दहेज लेने वाले के नजरिए से) उनके लिए दहेज रुतबा और लक्ष्मी का प्रतीक भी है वैसे तो दहेज विरोधी होना आज एक फैशन की बात हो गई है ;लेकिन शायद ही कोई होगा जो लक्ष्मी से प्यार न करता हो। बड़े-बड़े आदर्शवादी भी दहेज के नाम पर लार टपकाते देखे जाते हैं। ज्यादातर यही होता जिन्हें दहेज नहीं मिला वे दहेज विरोधी बन जाते। जिन्हें मिला वे चुप बैठ जाते हैं। खास कर जिनके घर लड़कियाँ ज्यादा हैं, वे पक्के दहेज विरोधी हो जाते  हैं और लड़के के मामले में लड़कियों को देने का हवाला देकर खूब दहेज बटोरते हैं ; लेकिन समाज में दहेज को दानव के रूप में प्रचारित करना सभी को अच्छा लगता है। यह फैशन नया-नया सही किन्तु सर्वे स्वीकृत अवश्य है।
ज्यादातर यही माना जाता रहा है कि दहेज जैसी कुप्रवृत्ति हमारे समाज की संस्कृति में नहीं रही है यह तो विदेशी सभ्यता की देन है। जैसा कि सभी सामाजिक बुराइयों के बारे में फ़ासीवादियों का हथियार रहा है। यही मान्यता समाज के ठेकेदार इस मामले में कहकर अपने दामन एवं संस्कृति को पाक साफ होने का मुहर लगा देते हैं। लेकिन एक पुत्री को वस्तु तथा साथ में दिए जाने वाले समान को उपहार समझना इसी समाज की बहुत पुरानी परम्परा है ऐसे प्रमाण मिलते है। मनुस्मृति तृतीय अध्याय श्लोक 21 में विभिन्न प्रकार के विवाह का उल्लेख किया गया है ।ये विवाह आठ प्रकार के हो सकते हैं।
जिनमें आदर्श विवाह  ब्राह्म विवाह है-
ब्राह्म विवाह-विद्या और आचार युक्त वर को बुलाकर और उत्तम वस्त्रों और अलंकारों से कन्या तथा वर को भूषित कर वर को जो कन्यादान दिया जाता है, उसको ब्राह्म विवाह कहते हैं।
यहाँ पर कन्या एक दान की वस्तु (न कि एक मनुष्य) है। तथा इस दान के साथ उत्तम वस्त्र तथा अलंकार (आभूषण, उपहार आदि) भी दिया जाता है। यही अलंकार ही दहेज का पितामह है। जिन्होंने दहेज नामक शिशु को जन्म दिया। राजाओं के समय दहेज में हजारों नौकर-चाकर, दास-दासियाँ, हाथी, घोड़े दिया जाना सर्व विदित है। लेकिन संस्कृति के झण्डाबरदार यही कहते फिरते हैं कि दहेज तो मुसलमानों की देन है। हमारी संस्कृति में दहेज-वहेज नहीं चलता था। आइए देखें मुसलमानों में विवाह की क्या प्रकिया है।
निकाह-काजी के सामने दुल्हा, दुल्हन को दिए जाने वाले मुकर्रर मेहर की रकम अदा करेगा तथा दोनों पक्ष विवाह कुबूल करके निकाहनामे में अपने-अपने दस्तखत करेंगे।
यहाँ पर दुल्हा-दुल्हन को मेहर के रूप में कुछ धन देता है। लेकिन दहेज लेने का रिवाज यहाँ नहीं था ।यह रिवाज कब चालू हुआ अभी कहना कठिन है फिर भी मुसलमानों में दहेज समस्या उतनी विकराल नहीं है ;जितनी हिन्दू समाज में है। अत: यह समस्या मुसलमानों से आई कहना गलत है।
आइए देखें दहेज की समस्या को विभिन्न कोणों से-
0 दहेज एक नारीवादी समस्या नहीं है ।यह एक खालिस एवं शुद्ध सामाजिक समस्या है, क्योंकि यदि कोई परिवार दहेज समस्या से पीड़ित है तो अन्य प्रकरण में वो दहेज का शोषक बन जाता है। यदि अपनी लड़की के मुआमले में वो परिवार पीड़ित होता है तो लड़के के मामले में पूरा दहेज लोभी बन जाता है। अत: उसे नारीवादी से पुरुषवादी बनने में क्षणभर भी समय नहीं लगता है। इसलिए इस समस्या को नारीवादी दृष्टिकोण से देखना गलत होगा।
 दहेज की समस्या सिर्फ दहेज माँगने में नहीं है। उससे कहीं ज्यादा बढ़कर दहेज देने के लिए होड़ लगने में है। दरअसल भारतीय समाज में वधू पक्ष  अपने स्तर से कहीं अधिक सर्व सुविधायुक्त को हो आदर्श वर के रूप में तलाश करता है। यही आदर्श वर की तलाश उसे दहेज के लिए प्रेरित करती है। आदर्श वर की निम्नलिखित खासियत होनी चाहिए। (मध्य श्रेणी परिवारों के लिए)
(1) अपनी ही जाति का हो (2) वांछित गोत्र का हो (3) उच्च शिक्षित हो (4) शासकीय नौकरी या स्थापित व्यवसाय में हो (5) परिवार समृद्ध हो (6) परिवार प्रतिष्ठित हो।
 उसके साथ-साथ यदि वर गोरा और स्मार्ट हो तो सोने पर सुहागा हो जाता है। ऐसे आदर्श वर की तलाश में वधू पक्ष अपनी शक्ति खर्च करता रहता है जैसा कि एक साधारण बुद्धिवाला व्यक्ति भी कह सकता है कि ऐसे 7 (सात) गुणों वाला वर तो बिरलों को ही मिल सकता है; क्योंकि समाज में बहुत ही कम परिवार में ही ऐसे वर मिल सकते हैं ; जिनकी मांग पूरे समाज को है। आइए अब देखें एक आदर्श वधू की तलाश में क्या-क्या गुण ध्यान दिए जाते हैं।
(1) अपनी जाति की हो। (2) वांछित गोत्र की हो (3) खूबसूरत हो (4) परिवार समृद्ध एवं विनम्र हो (5) पढ़ी-लिखी हो।
वर पक्ष बिन्दु क्रमांक (1) एवं (2) पर कोई समझौता नहीं करता है लेकिन 3,4,5 पर अपना सामंजस्य बिठाने की चेष्टा करता है। जैसे ज्यादा खूबसूरत हो तो गरीब परिवार भी चलेगा यानी कम दहेज भी चलेगा आदि। लेकिन वधू पक्ष बिन्दु क्रमांक (वर पक्ष का) 1,2,3,4,5 पाँचों गुणों पर ध्यान केन्द्रित करता है। भले वर देखने में कितना ही कुरूप हो किन्तु यदि बिन्दु क्रमांक 1,2,3,4,5 की शर्त पूरी करता है तो वधू पक्ष हर कीमत में ऐसे वरन् से संबंध जोडऩा चाहते हैं। बस यहीं से चालू होता है वर पक्ष को दहेज का ऑफर देकर विवाह की परिणति तक लाने का। ऐसी स्थिति में इन गुणों से भरपूर वर पक्ष वाले अपनी माँग को बढ़ता हुआ देखकर अपना मूल्य बढ़ाते जाते हैं। इसमें वधू पक्ष के बिन्दु क्रमांक (3) तथा (4) का ध्यान रखकर मूल्य तय किए जाते हैं। यदि कन्या काली या भद्दी है तो दहेज मूल्य और बढ़ जाता और कन्या पक्ष वाले भी ज्यादा देने का ऑफर देते हैं। व्यक्ति के ऐसे व्यवहार का असर पूरे समाज पर पड़ता और गरीब, मध्यम गरीब परिवार भी उसी आदर्श स्थिति को प्राप्त करने की कोशिश में लगा रहता। इसलिए दहेज आज एक साधारण व्यवहार के रूप में स्थित है। बिना दहेज के शादी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस मामले में सिर्फ प्रेम विवाह को एक अपवाद कहा जा सकता है। नहीं तो प्रेम विवाह को भी अरेंज विवाह का जामा पहना कर दहेज की कसौटी पर कसे जाने की परंपरा चालू हो चुकी है। कई बार ऐसा देखा जाता की अमुक ने बिना दहेज की शादी की ;लेकिन उसके कारण की पड़ताल की जाती तो पता चलता कि लड़की बेहद खूबसूरत तथा गुणवान थी ;इसलिए लड़के वालों ने बिना दहेज शादी की।
यानी दहेज किसी न किसी रूप में लिया जा रहा है। चाहे वो कन्या की खूबसूरती ही क्यों न हो। आज कितनी ही सामान्य नैन नक्श की युवतियाँ दहेज विरोधी बनकर आजीवन कुँवारी बैठी रहती है। कारण स्पष्ट है वे समाज के माँग एवं पूर्ति में सामंजस्य नहीं बिठा पाई। वहीं खूबसूरत लड़कियों के लिए कोई समस्या नहीं कम दहेज में भी ठीक-ठाक लड़के से विवाह कर घर बसा सकती है। यहाँ भी माँग और पूर्ति के अर्थशास्त्र की संतुष्टि हो रही है। वहीं कई ऐसे प्राइवेट व्यवसाय वाले साधनहीन युवक है जो साधारण सूरत तथा बिना दहेज के युवती से विवाह करके घर बसा लेते हैं। यहाँ भी कारण स्पष्ट है कि अविवाहित रहने से अच्छा है विवाहित रहना। यानी दहेज के अर्थशास्त्र की संतुष्टि यहाँ भी हो रही है।
इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हम आदर्श वर के मामले में अपने आपको थोड़ा शिथिल करें तो बिना दहेज के शादी कर सकते हैं। लेकिन दहेज के नाम पर हाय-तौबा मचाने वाला ये समाज इतनी थोड़ी सी बात नहीं समझ पाता। ज्यादातर यही होता कि आदर्श वर को पाने के बाद वधू पक्ष रिश्ता फिट करने की जुगत में भिड़ जाता, चाहे उसे साम, दाम, दण्ड, भेद कोई भी नीति क्यों न अपनानी पड़ जाए। इस कोशिश में वर पक्ष को ऊँचे-ऊँचे वायदे किए जाते ऑफर दिए जाते। विवाह पश्चात् वर पक्ष इन आफरों को फलीभूत होते देखना चाहता। यहीं से शुरू होती है महिलाओं की प्रताडऩा की शुरूआत। जिसके लिए मैदान उसी के अपने परिवार ने तैयार की थी। लेकिन ऐसे मामले में वधू पक्ष वाला पीडि़त एवं निर्दोष बनने का ढोंग (कुछ मामले में सच भी) करने लगता है और अपनी गलतियों को भूल जाता है। आखिर दहेज का लालच तो आपने ही दिया, माँगे तो आपने ही पूरी कीं तो परिणाम भी आपको ही भुगतने पड़ेंगे। इसी कारण कानून में भी दहेज लेना एवं देना दोनों जुर्म है। काश, दहेज देने वालों को भी सजा होती तो आज यह समस्या ही न होती। रोज शादियों में बैण्ड-बाजों के साथ ऐसे जुर्म होते देखे जा सकते हैं खुलेआम। आखिर क्यों नहीं दहेज देने वालों पर जुर्म दर्ज होता जब शादी हो रही होती। आखिर क्यों नहीं उस पक्ष पर मुकदमा दर्ज होता जब वह स्वीकार करता की उसने दहेज दिया है।
वास्तव में कानून के लागू करने  के तरीके से तो लगता है कि कोई इस समस्या को जड़ से सुलझाना नहीं चाहते चाहे वो महिलावादी हो या सुधारवादी। सभी अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकना चाहते हैं।                                                
 संपर्क: मो. 9977082331, Email- sanjeevkhudshah@gmail.com

स्वामी विवेकानंद

पूर्णता का मार्ग

 धर्म और विशेषकर हिन्दू धर्म के बारे में अज्ञान, अंधविश्वास तथा विकृत धारणाओं का निराकरण करना- स्वामी विवेकानंद के समक्ष यह कितना कठिन काम था! अत: उनके मन में यदाकदा निराशा का झोंका आ जाना स्वाभाविक ही था। एक ऐसी ही मन:स्थिति में स्वामी जी ने डेट्राएट से 15 मार्च 1894 ई. को शिकागो की हेल-बहनों के नाम एक पत्र में लिखा-
परंतु जब से मैं यहाँ आया हूँ, पता नहीं क्यों, मन बड़ा उदास रहता है- कारण मुझे मालूम नहीं। मैं व्याख्यान देते-देते और इस प्रकार के निरर्थक वाद से थक गया हूँ। सैकड़ों प्रकार के मानवीय पशुओं से मिलते-मिलते मेरा मन अशांत हो गया है। मैं तुम लोगों को अपनी रुचि की बात बतलाता हूँ कि मैं लिख नहीं सकता, मैं बोल नहीं सकता, परंतु मैं गंभीर विचार कर सकता हूँ और जब जोश में होता हूँ तो वाणी से स्फुलिंग निकाल सकता हूँ। परंतु यह होना चाहिए कुछ चुने हुए, केवल थोड़े से चुने हुए लोगों के सामने ही।
वे यदि चाहें तो मेरे विचारों को ले जाकर प्रसारित कर दें  परंतु मैं यह नहीं कर सकता। यह तो श्रम का समुचित विभाजन है, एक ही आदमी सोचने में और अपने विचारों के प्रसार करनें में सफल नहीं हो सकता। मनुष्य को चिंतन के लिए मुक्त होना चाहिए, विशेषत: जबकि विचार आध्यात्मिक हो। मैं चाहता हूँ, वह यहाँ नहीं है और मैं इस तूफानी वातावरण को और अधिक काल तक सहन करने में असमर्थ हूँ।
कुछ शुद्ध सत्कप्रकृति के दर्पण इन शांतिपूर्ण शीतल, सुंदर, गहन, मर्मभेदी, स्वाधीन, खोजपूर्ण विचारों को परावर्तिक कर, पुन: तब तक ग्रहण करते रहेंगे जब तक कि उन सभी के स्वरों के बीच सामंजस्य नहीं स्थापित हो जाता। फिर दूसरे लोग इसे यथासंभव बाह्य जगत में प्रसारित करने का प्रयास करेंगे।
पूर्णता का मार्ग यह है कि स्वयं पूर्ण बनने का प्रयत्न करना तथा कुछ थोड़े से नर नारियों को पूर्ण बनाने का प्रयत्न करना। भला करने से मेरा यह तात्पर्य है कि कुछ असधारण योग्यता के लोगों का विकास करूँ कि भैंस के आगे बीन बजाकर समय, स्वास्थ्य और शक्ति का अपव्यय करूँ। अब और व्याख्यान देने की मुझे परवाह नहीं। किसी व्यक्ति अथवा किसी श्रोता मंडली की सनक के अनुसार मुझे परिचालित कराने का यह प्रयास बड़ा ही विरक्तिकर है।      

बढ़ता जा रहा है भू-स्खलन का खतरा

 बढ़ता जा रहा है भू-स्खलन का खतरा
 जानी-मानी विज्ञान पत्रिका जियोलॉजी में उपलब्ध जानकारी व आँकड़ों के आधार पर दावा किया गया है कि विश्व में भू- स्खलन के कारण होने वाली मौतों की संख्या वास्तव में पहले के अनुमानों की अपेक्षा दस गुना अधिक है। यह 'डरहम फेटल लैंडस्लाइड डैटाबेसके आधार पर कहा गया है। जानलेवा भूस्खलनों सम्बंधी आँकड़ों व जानकारियों के इस कोश को ब्रिटेन के डरहम विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्त्ताओं ने तैयार किया है।
पहले के अनुमान बताते थे कि वर्ष 2004 से 2010 के बीच भूस्खलनों के कारण 3000 से 7000 मौतें हुईं। इस नए डैटाबेस ने बताया गया है कि इस दौरान भूस्खलनों से 32,300 मौतें हुईं। अधिक भूस्खलन वाले क्षेत्रों में भारत के अनेक पर्वतीय क्षेत्र भी बताए गए हैं। इन अनुसंधानकर्ताओं ने कहा है कि इस नए डैटाबेस से उपचार व रोकथाम के उपाय करने में सरकारों को मदद मिलेगी व इस तरह अनेक बहुमूल्य जीवन बचाए जा सकेंगे।
इस अनुसंधान का भारतीय संदर्भ में महत्त्व स्पष्ट है;  क्योंकि हाल के वर्षों में भूस्खलनों से होने वाली भीषण क्षति के समाचार वैसे भी बढ़ते ही जा रहे हैं। हाल ही में उत्तराखंड में भारी बारिश व बाढ़ से हुई भयानक क्षति में भू- स्खलन की अहम भूमिका थी। भू-स्खलन सम्बंधी राष्ट्रीय स्तर के आँकड़े सहजता से हमारे देश में उपलब्ध नहीं होते हैं,
पर बहुत-सी छिटपुट जानकारी विभिन्न पर्वतीय राज्यों में बिखरी हुई हैं। ज़रूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय स्तर पर इस आपदा के महत्त्व को समझ कर इस सम्बंधी उपचार, रोकथाम व सहायता के उपायों पर समुचित ध्यान दिया जाए।
विशेषकर इस ओर विशेष ध्यान देना ज़रूरी है कि पर्वतीय क्षेत्र में किन मानवीय कारणों व गलतियों से भू-स्खलन के कारण होने वाली क्षति बढ़ी है। एक बड़ी वजह तो यह है कि विभिन्न निर्माण कार्यों, विशेषकर बांध निर्माण तथा खनन के लिए, पर्वतीय क्षेत्रों में विस्फोटकों का अंधाधुंध उपयोग किया गया है। इस
कारण भू-स्खलन की संभावना बढ़ गई है। इसको नियंत्रित व नियमित करना ज़रूरी है। वन विनाश भी भू-स्खलन की संभावना बढऩे का एक अन्य बड़ा कारण रहा है।
भू-स्खलन अपने आप में तो बड़ी आपदा है ही, साथ में वे बाढ़ को और उग्र करते हैं व बहुत विनाशकारी व अचानक आने वाली बाढ़ का कारण भी बनते हैं। यदि हिमालय में किसी नदी का बहाव भू-स्खलन के मलबे के कारण रुक जाता है तो इससे कृत्रिम अस्थायी झील बनने लगती है। अंत में पानी का वेग अधिक होने से जब यह झील फूटती है तो बहुत प्रलयंकारी बाढ़ आ सकती है, जैसे कनोडिया गाड में झील बनने के कारण उत्तरकाशी में बाढ़ आई थी। इन संभावनाओं के मद्देनजऱ भू-स्खलन की संभावना को कम करने तथा जहाँ खतरनाक भूस्खलन होते हैं वहाँ उपचार करने पर समुचित ध्यान देना चाहिए। भू-स्खलन प्रभावितों को समुचित सहायता समय पर पहुँचनी चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

रथयात्रा


लोक आस्था का प्रतीक
- प्रो अश्विनी केशरवानी

छत्तीसगढ़ प्रदेश का अधिकांश भाग बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा से जुड़ा है। अत: इन सीमावर्ती क्षेत्रों में उन प्रदेशों की परम्पराएँ देखने को मिलती है। वहाँ का खानपान, रहन सहन और बोल चाल भी प्रभावित होती है। ऐसी अनेक परम्पराएँ छत्तीसगढ़ की पूर्वी सीमा जो उड़ीसा से जुड़ा है, में देखने को मिलती है। रथयात्रा उनमें से एक बहु प्रचलित और बहु चर्चित परम्परा है। इसे उड़ीसा के साथ ही छत्तीसगढ़ में भी बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उड़ीसा में प्रचलित है '..मोर गौरव जगन्नाथ’ (जगन्नाथ जी हमारे गौरव हैं) समुद्र तट पर स्थित पुरी भागवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की के कारण 'जगन्नाथ पुरीकहलाती है जो चारों धाम में एक है। रथयात्रा यहाँ का एक प्रमुख पर्व है। इस पर्व में देश -विदेश के हजारों-लाखों दर्शनार्थी और पर्यटक बड़ी श्रद्धा के साथ सम्मिलित होते हैं। यहाँ की मूर्ति और स्थापत्य कला और समुद्र का मनोरम किनारा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। कोणार्क को अद्भुत सूर्य मंदिर, भगवान बुद्ध की अनुपम मूर्तियों से सजा धौलगिरि और उदयगिरि की गुफाएँ, जैन मुनियों की तपस्थली खंडगिरि की गुफाएँ, लिंगराज, साक्षी गोपाल और भगवान जगन्नाथ मंदिर दर्शनीय है। पुरी और चंद्रभागा का मनोरम समुद्री किनारा, चन्दन तालाब, जनकपुर और नंदनकानन अभयारण्य बड़ा ही मनोरम और दर्शनीय है। रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ चलकर जनता के बीच आते हैं और उनके सुख -दुख में सहभागी होते हैं। '...सब मनिसा मोर परजा’ (सब मनुष्य मेरी प्रजा है), ये उनके उद्गार है। भगवान जगन्नाथ तो पुरुषोत्तम हैं। उनमें श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म समाहित है। उनके अनेक नाम है, वे पतित पावन हैं।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की जनकपुर यात्रा रथ में बिठा कर करायी जाती है। जगन्नाथपुरी में तीनों को अलग अलग रथ में बिठाकर यात्रा कराया जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोषकहते हैं जो 65 फीट लंबा, 65 फीट चौड़ा और 45 फीट ऊँचा होता है। इसमें 7 फीट व्यास के 17 पहिये लगे होते हैं। इसी प्रकार बलभद्र जी के रथ को 'तालध्वजऔर सुभद्रा जी के रथ को 'देवलनकहा जाता है जो जगन्नाथ जी के रथ से कुछ छोटे होते हैं। इन रथों को खींचने के लिए गाँव-गाँव से हजारों-लाखों लोग आते हैं। पुरी में प्रथम पूजा और रथ को खींचने का प्रथम अधिकार वहाँ के तत्कालीन राजा को था। आज भी उनके वंशज इस परम्परा को निभाते हैं। विशाल जनसमुदाय इस रथयात्रा का आनंद और पुण्य लाभ लेते हैं। नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद विशेष रूप से इस दिन मिलता है। तीनों रथ गुंडिचा मंदिर (मौसी के घर, जिसे जनकपुर भी कहते हैं) में आकर रुक जाती है। यहाँ भगवान आठ दिन रहकर विजियादसमीं को मंदिर लौट आते हैं। जनकपुर में भगवान जगन्नाथ दसों अवतार का रूप धारण करते हैं.. विभिन्न धर्मो और मतों के भक्तों को समान रूप से दर्शन देकर तृप्त करते हैं। इस समय उनका व्यवहार सामान्य मनुष्यों जैसा होता है।
मौसी के घर अच्छे-अच्छे पकवान खाकर भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं। तब यहाँ पथ्य का भोग लगाया जाता है; जिससे भगवान शीघ्र ठीक हो जाते हैं। रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी को लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढूँढ़ते यहाँ आती हैं। तब द्वैतापति दरवाजा बंद कर देते हैं जिससे लक्ष्मी जी नाराज होकर रथ का पहिया तोड़ देती है और 'हेरा गोहिरी साही(पुरी का एक मुहल्ला जहाँ लक्ष्मी जी का मंदिर है) में लक्ष्मी जी लौट आती हैं। बाद में भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी को मनाने जाते हैं। उनसे क्षमा माँगकर और अनेक प्रकार के उपहार देकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। इस आयोजन में एक ओर द्वैतापति भगवान जगन्नाथ की भूमिका में संवाद बोलते हैं तो दूसरी ओर देवदासी लक्ष्मी जी की भूमिका में संवाद करती हैं। लोगों की अपार भीड़ इस रूठन और मनौव्वल के संवाद को सुनकर खुशी से झूम उठते हैं। सारा आकाश जै श्री जगन्नाथ... के नारों से गूँज उठता है। लक्ष्मी जी को भगवान जगन्नाथ के द्वारा मना लिए जाने को विजय का प्रतीक मानकर इस दिन को 'विजयादशमीऔर वापसी को 'बोहतड़ी गोंचाकहा जाता है। रथयात्रा में पारम्परिक सद्भाव, सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
कल्पना और किंवदंतियों में जगन्नाथ पुरी का इतिहास अनूठा है। आज भी रथयात्रा में जगन्नाथ जी को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है.. उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन भी हैं और बुद्ध भी। अनेक कथाओं और विश्वासों और अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि भगवान जगन्नाथ विभिन्न धर्मो, मतों और विश्वासों का अद्भुत समन्वय है। जगन्नाथ मंदिर में पूजा पाठ, दैनिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन यहाँ तक तांत्रिकों ने भी प्रभावित किया है। भुवनेश्वर के भास्करेश्वर मंदिर में अशोक स्तम्भ को शिव लिंग का रूप देने की कोशिश की गयी है। इसी प्रकार भुवनेश्वर के ही मुक्तेश्वर और सिद्धेश्वर मंदिर की दीवारों में शिव मूर्तियों के साथ राम, कृष्ण और अन्य देवताओं की मूर्तियाँ हैं। यहाँ जैन और बुद्ध की भी मूर्तियाँ हैं पुरी का जगन्नाथ मंदिर तो धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर कि पीछे विमला देवी की मूर्ति है जहाँ पशुओं की बलि दी जाती है, वहीं मंदिर की दीवारों में मिथुन मूर्तियों चौंकाने वाली है। यहाँ तांत्रिकों के प्रभाव के जीवंत साक्ष्य भी हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार शरीर के 24 तत्वों के ऊपर आत्मा होती है। ये तत्व हैं- पंच महातत्त्व, पाँच तंत्र मात्राएँ, दस इंद्रियों और मन के प्रतीक हैं। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजन का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होती है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करती है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उस माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता ; बल्कि उसे खींचने के लिए लोकशक्ति की आवश्यकता होती है।
उड़ीसा प्रदेश से जुड़े छत्तीसगढ़ के अनेक गाँवों, कस्बों और शहरों में रथयात्रा बड़े धूमधाम, श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। जिस प्रकार राजा-महाराजा, जमींदार, मालगुजारों ने रतनपुर की महामाया देवी और सम्बलपुर की समलेश्वरी देवी को अपने नगरों में 'कुलदेवीके रूप में प्रतिष्ठित किया है, वैसे ही जगन्नाथ धाम की यात्रा करके भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों को अपने नगरों में स्थापित कर पुण्य लाभ प्राप्त करते रहें हैं। यहाँ के हर गाँवों में और घरों में जगन्नाथ जी का मंदिर अवश्य मिलेगा।
शिवरीनारायण में रथयात्रा-
स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को 'श्री सिंदूर गिरिक्षेत्र कहा गया है। प्राचीन काल में यहाँ शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।
जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्री सिंदूर गिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बाँस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा तभी भगवान नीलमाधव अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहाँ गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिये। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकुंठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम कहलाया।
तथ्य चाहे जो हो, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शबरीनारायण मंदिर में बहुत कुछ समानता है। दोनों मंदिर तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे क्रमश: आदि गुरू शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के ताँत्रिकों का कब्जा था। चूँकि शबरीनारायण से होकर जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग था। पथिकों को यहाँ के तांत्रिक शेर बनकर डराते और अपने प्रभाव से मारकर खा जाते थे। इसलिए इस मार्ग में जाने में यात्रिगण भय खाते थे। एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन के लिए घूमते हुए रतनपुर पहुँचे। उनकी विद्वता और पांडित्य से रतनपुर के राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें शबरीनारायण के मंदिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा। स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुँचे तब वहाँ के तांत्रिक उन्हें भी डराने के लिए शेर बनकर झपटे लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ कि शेर के रूप में तांत्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ ,जिसमें कनफड़ा बाबा को पराजय का सामना करना पड़ा और डर के मारे वे जमीन के भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रकार शबरीनारायण के मठ और मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुआ, जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तांत्रिकों के भय से मुक्ति मिली और यहाँ रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णवों का बीजारोपण हुआ। यहाँ के मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महंत हुए और तब से आज तक इस वैष्णव मठ में 14 महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक धार्मिक, आध्यात्मिक और ईश्वर भक्त हुए। उनकी प्रेरणा से अनेक मंदिर, महानदी के किनारे घाट और मंदिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में देकर कृतार्थ ही नहीं हुए ; बल्कि इस क्षेत्र में भक्ति भाव की लहर फैलाने में मदद भी की। जिस स्थान पर कनफड़ा बाबा ने जमीन के भीतर प्रवेश किया था ,उस स्थान पर स्वामी दयाराम दास ने एक 'गाँधी चौरा का निर्माण कराया। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल तेरस और आश्विन शुक्ल दसमी (दशहरा) को शिवरीनारायण के महंत इस गाधी चौरा में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रतीकात्मक रूप से यह प्रदर्शित करते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तांत्रिकों के प्रभाव से बहुत ऊपर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे से मंदिर के भीतर तांत्रिकों के गुरु कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है और बस्ती के बाहर एक नाथ गुफा के नाम से एक मंदिर है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।
शबरीनारायण में मठ के भीतर संवत् 1927 में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगाँव के जमींदार श्री राजसिंह ने जगन्नाथ मंदिर की नींव डाली जिसे उनके पुत्र श्री चंदन सिंह ने पूरा कराया और उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों की स्थापना कराई। संवत् 1927 में ही उन्होंने महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवासार्थ एक भवन का निर्माण कराया। इसे 'जोगीडीपाकहते हैं।
रथयात्रा यहाँ का एक प्रमुख त्योहार है। प्राचीन काल से यहाँ रथयात्रा का आयोजन मठ के द्वारा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महंत गौतमदास ने यहाँ रथयात्रा की शुरुआत की और महंत लालदास ने उसे सुव्यवस्थित किया। मठ के मुख्तियार पंडित कौशल प्रसाद तिवारी को हमेशा स्मरण किया जाएगा। उन्होंने ही यहाँ रामलीला, रासलीला, नाटक, रथयात्रा, और माघी मेला को सुव्यवस्थित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रथयात्रा के लिए जगन्नाथ पुरी की तरह यहाँ भी प्रतिवर्ष लकड़ी का रथ निर्माण कराया जाता था ,जिसे बाद में बंद कर दिया गया और एक लोहे का रथ बनवाया गया है ;जिसमें आज रथयात्रा निकलती है। शिवरीनारायण और आस-पास के हजारों-लाखों श्रद्धालु यहाँ आकर रथयात्रा में शामिल होकर और रथ खींचकर पुण्यलाभ के भागीदार होते हैं। जगह जगह रथ को रोककर पूजा-अर्चना की जाती है। प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूंग दिया जाता है। मेले जैसा दृश्य होता है। इस दिन को सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में बड़ा पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन बेटी को बिदा करने, बहू को लिवा लाने, नई दुकानों की शुरुआत और गृह प्रवेश जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। इस दिन अपने स्वजनों, परिजनों और मित्रों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की परम्परा है। बच्चे नये कपड़े पहनते हैं और उन्हें खर्च करने के लिए पैसा दिया जाता है। उनके लिए यह एक विशेष दिन होता है। सद्भाव की प्रतीक रथयात्रा आज भी यहाँ श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।  शिवरीनारायण को 'छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरीकहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं और ऐसी मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है अन्यथा उनकी यात्रा निरर्थक होता है।
यहाँ भगवान नारायण के चरण को स्पर्श करती रोहिणी कुंड की महिमा अपार है। कवियों ने उसे साक्षात् मोक्ष देने वाला बताया है। उस कुंड के कारण इसे बैकुंठ द्वार माना गया है। देखिए कवि की एक बानगी-
नारायण के कलाश्रित जानिय धामहि एक
प्रथम विष्णुपुरि नाम पुनि रामपुरि हूँ नेक
चित्रोत्पल नदि तीर महि मंडित अति आराम
बस्यो यहाँ बैकुंठपुर नारायणपुर धाम
भासति तहं सिंदूरगिरि श्रीहरि कीन्ह निवास
कुंड रोहिणी चरण तल भक्त अभीष्ट प्रकास।
छत्तीसगढ़ के अन्यान्य नगरों-सारंगढ़, रायगढ़, सक्ती, चाम्पा, नरियरा, रायपुर, राजिम, बिलासपुर, रतनपुर बस्तर, जशपुर, धरमजयगढ़, और सरगुजा में भी जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की रथयात्रा निकलती है। रायपुर में रथयात्रा दूधाधारी मठ से, बिलासपुर में वेंकटेश मंदिर से और अन्य स्थानों में जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा निकलती है। चांपा में जमींदार रूद्रशरण सिंह ने जगन्नाथ मंदिर बनवाया। इसी प्रकार सारागाँव में श्री काशीप्रसाद राठौर के पूर्वज हटरी चौंक में और रगजा में श्री घासीराम चौधरी ने सन 1926 में जगन्नाथ मंदिर बनवाया था। रथ को खींचकर नारियल, लाई और गजामूंग का प्रसाद ग्रहण करते हैं। जगन्नाथपुरी और चांपा में विशेष रूप से मालपुआ बनाया जाता है। सुदूर बस्तर में तो इसे 'गोन्चा परबके रूप में विशेष रूप से मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में रथयात्रा की तिथि को बड़ा शुभ दिन माना जाता है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जाता है। बेटी बिदा और बहू को लिवा लाने की विशेष परम्परा है। बच्चे, बूढ़े सब नये कपड़े पहनकर रथयात्रा में सम्मिलित होते हैं। इस दिन नाते-रिश्तेदारों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की प्रथा है। यह लोक -भावना से जुड़ी परंपरा है। इससे सद्भावना का विकास होता है। इसमें जात-पात का भेद नहीं होता। इसीलिए कवि गाता है-
मास आषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।
दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान।।

संपर्क: राघव, डागा कालोनी, चाम्पा-495671