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Dec 18, 2012

विचार

अच्छी सोच
- राम अवतार सचान
जीवन का सिलसिला है जिसका आदि और अंत दोनों है, जी हाँ। सुख-दुख से भरा जीवन पूर्ण रूप से आपकी अपनी सोच पर टिका है उदाहरण के तौर पर लीजिए- आधा भरा गिलास किसी के लिए आधा खाली भी नजर आता है। जीवन किसी के लिए दुखों का अम्बार है तो किसी के लिए खुशियों का खजाना। कोई इस जीवन को सौभाग्य समझता है तो कोई दुर्भाग्य, किसी का जीवन शिकायतों से भरा है तो किसी का धन्यवाद से, किसी को मरने की जल्दी है तो किसी को जीवन काल छोटा लगता है। जबकि जीवन एक ही है, एक ही अवसर है परंतु फिर भी अलग-अलग सोच है और इसके भिन्न-भिन्न परिणाम हैं। सब कुछ हमारे नजरिए पर टिका है। तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में बहुत पहले लिखा है कि -
जिसकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरत देखी तिन वैसी ॥
जिसकी जैसी भावना होती है उसको वैसे ही परिणाम मिलते भी हैं। इस संदर्भ में मैं तीन मजदूरों वाली एक कहानी सुनाना चाहता हूँ जो आपको पूर्ण रूप से संतुष्ट कर देगी-
तीन मजदूर पत्थर तोडऩे का एक ही काम कर रहे हैं जब एक से पूछा गया कि आप क्या कर रहे हो? तो उसने गुस्से में शिकायत भरी नजर उठाकर जवाब दिया कि आपको दिखाई नहीं दे रहा है क्या? अपनी किस्मत तोड़ रहा हूँ और ठीक यही प्रश्न दूसरे मजदूर से किया गया। उसके उत्तर में गुस्सा नहीं था, दर्द था, जुबाँ पर शिकायत नहीं पर आँखें नम थी, चेहरा उदास था, उसने उत्तर दिया कि पेट की आग बुझाने के लिए खाने का जुगाड़ कर रहा हूँ। जबकि यही प्रश्न तीसरे मजदूर से किया गया तो उसका उत्तर ही कुछ अलग था। न तो उसके लहजे में शिकायत थी, न तो दर्द था, आँखों में न गुस्सा था और न नमी। उसका उत्तर सुनकर सभी अचम्भित हो गए। उसके उत्तर में प्यार और एक सुख की अनुभूति थी। उसका उत्तर था- मैं इस काम में बहुत ही आनंदित हूँ मैं पूजा कर रहा हूँ। पत्थर, जिसे मैं तोड़ रहा हूँ, भगवान के मंदिर में लगने जा रहा है, मैं उसमें सहयोग दे रहा हूँ। मैं भाग्यशाली हूँ,  मैं आभारी परमात्मा का हूँ। उसने इस नेक काम के लिए मुझे अवसर दिया। ये शुभ कार्य हमारे हाथों द्वारा हो रहा है। उस मंदिर में भगवान विहार करेंगे। प्रभु ने मेरी सेवा स्वीकार कर मुझे कृतार्थ किया और मुझे इस काम में बहुत आनंद आ रहा है। सोचता हूँ पूरा जीवन प्रभु की सेवा में गुजरे।
 जीवन ऐसा ही है जो दृष्टिकोण के कारण ही सुख-दुख, लाभ-हानि, शुभ-अशुभ में बँट जाता है। सुख-दुख का कोई पैमाना नहीं है, सब सोच पर आधारित है। किसी के लिए कोई तारीख, दिन, महीना, साल अच्छा है तो किसी के लिए अशुभ हो जाता है। यह सोच और समझ केवल आपकी अपने नजरिए पर टिकी है। आप चाहे तो गिलास को पूरा देखें या आधा। सब आपकी सोच पर निर्भर है।
शेक्सपियर ने कहा है कि कोई भी चीज अच्छी या बुरी नहीं होती। हमारा नजरिया ही इसे अच्छा या बुरा बनाता है। सचमुच आपकी सोच ही आप पर जादू की तरह काम करती है। किसी शायर ने कहा है 'घर में न मिले सुकून तो बाहर निकल कर देखो, जिंदगी बड़ी हसीन है केवल सोच बदलकर देखो।'
संपर्क:13/1, बलरामपुर हाउस, मम्फोर्डगंज, इलाहाबाद-211002,  मो.09628216646

यात्रा

 बाबा कार्ल मार्क्स  
की मजार 
- सूरज प्रकाश 
2005 का कथा यूके का इंदु शर्मा कथा सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार श्री असगर वजाहत को उनके उपन्यास 'कैसी आगी लगाई’ के लिए हाउस हॉफ लॉर्ड्स में दिया गया था। इसी सिलसिले में मैं उनके साथ जून 2006 में बीस दिन के लिए लंदन गया था। सम्मान आयोजन के पहले और बाद में हम दोनों खूब घूमे। बसों में, ट्यूब में, तेजेन्द्र शर्मा और ज़कीया जी की कार में और पैदल भी। हम लगातार कई-कई मील पैदल चलते रहते और लंदन के आम जीवन को नजदीक से देखने, समझने और अपने-अपने कैमरे में उतारने की कोशिश करते। हम कहीं भी घूमने निकल जाते और किसी ऐसी जगह जा पहुँचते जहाँ आम तौर पर कोई पैदल चलता नजर ही न आता।
एक बार हमने तय किया कि बाबा कार्ल मार्क्स  की मजार तक चला जाए। असगर भाई का विचार था कि कहीं इंटरनेट कैफे में जा कर पहले लोकेशन, जाने वाली ट्यूब और दूसरी बातों की जानकारी ले लेते हैं तो वहाँ तक पहुँचने में आसानी रहेगी। उन्हें इतना भर पता था कि हमें हाईगेट ट्यूब स्टेशन तक पहुँचना है और ये वाला कब्रिस्तान वहाँ से थोड़ी ही दूरी पर है। लेकिन मेरा विचार था कि हाईगेट स्टेशन तक पहुँच कर वहीं से जानकारी ले लेंगे।
 हाईगेट पहुँचने में हमें कोई तकलीफ नहीं हुई। अब हमारे सामने एक ही संकट था कि हमारे पास लोकल नक्शा नहीं था और दूसरी बात हाईगेट स्टेशन से बाहर निकलने के तीन रास्ते थे और हमें पता नहीं था कि किस रास्ते से हमारी मँजिल आयेगी। हमारी दुविधा को भाँप कर रेलवे का एक अफसर हमारे पास आया और मदद करने की पेशकश की। जब हमने बताया कि हमारी आज की मँजिल कौन-सी है तो उसने हमें लोकल एरिया का नक्शा देते हुए समझाया कि हम वहाँ तक कैसे पहुँच सकते हैं।
बाहर निकलने पर हमने पाया कि बेशक हम लंदन के बीचों-बीच थे लेकिन अहसास ऐसे हो रहा था मानो इंग्लैंड के दूर-दराज के किसी ग्रामीण इलाके की तरफ जा निकले हों। लंदन की यही खासियत है कि इतनी हरियाली, मीलों लम्बे बगीचे और सदियों पहले बने एक जैसी शैली के मकान देख कर हमेशा यही लगने लगता है कि हम शहर के बाहरी इलाके में चले आये हों। बेशक हाईगेट सिमेटरी तक बस भी जाती थी लेकिन हमने एक बार फिर पैदल चलना तय किया। रास्ते में एक छोटा-सा पार्क देख कर बैठ गये और डिब्बा बंद बीयर का आनंद लिया।
आगे चलने पर पता नहीं कैसे हुआ कि हम सिमेटरी वाली गली में मुडऩे के बजाये सीधे निकल गए और भटक गये। वहाँ कोई भी पैदल चलने वाला नहीं था जो हमें गाइड करता। हम नक्शे के हिसाब से चलते ही रहे। तभी हमारी तरह का एक और बंदा मिला जो वहीं जाना चाहता था।
खैर, अपनी मंजिल का पता मिला हमें और हम आगे बढ़े। ये एक बहुत ही भव्य किस्म की कॉलोनी थी और वहाँ बने बंगलों को देख कर आसानी से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था वहाँ कौन लोग बसते होंगे। एक मजेदार ख्याल आया कि हमारे सुपर स्टार अमिताभ बच्चन अगर अपनी 227 करोड़ की सारी की सारी पूँजी भी लेकर वहाँ बंगला खरीदने जायें तो शायद खरीद न पाएँ।
ऐसी जगह के पास थी बाबा कार्ल मार्क्स  की मजार। मीलों लम्बा कब्रिस्तान। अस्सी बरस की तो रही ही होगी वह बुढ़िया जो हमें कब्रिस्तान के गेट पर रिसेप्शनिस्ट के रूप में मिली। एंट्री फी दो पाउंड। हम भारतीय कहीं भी पाउंड को रुपये में कन्वर्ट करना नहीं भूलते। हिसाब लगा लिया। 174 रुपये प्रति टिकट। अगर कब्रिस्तान की गाइड बुक चाहिए तो दो पाउंड और। ये इंग्लैंड में ही हो सकता है कि कब्रिस्तान की भी गाइड बुक है और पूरे पैसे देने के बाद ही मिलती है। हमने टिकट तो लिये लेकिन बाबा कार्ल मार्क्स  तक मुफ्त में जाने का रास्ता पूछ लिया। उस भव्य बुढ़िया ने बताया कि आगे जा कर बायीं तरफ मुड़ जाना। ये भी खूब रही। मार्क्स  साहब मरने के बाद भी बायीं तरफ।
मौसम भीग रहा था और बीच-बीच में फुहार अपने रंग दिखा रही थी। कभी झीनी पड़ती तो कभी बौछारें तेज हो जातीं।
हम खरामा-खरामा कब्रिस्तान की हरियाली, विस्तार और एकदम शांत परिवेश का आनंद लेते बाबा कार्ल मार्क्स  की मजार तक पहुँचे। देखते ही ठिठक कर रह गये। भव्य। अप्रतिम। कई सवाल सिर उठाने लगे। एक पूँजीवादी देश में रहते हुए वहाँ की नीतियों के खिलाफ जीवन भर लिखने वाले विचारक की भी इतनी शानदार कब्र। कोई आठ फुट ऊँचे चबूतरे पर बनी है कार्ल मार्क्स  की भव्य आवक्ष प्रतिमा। आस-पास जितनी कब्रें हैं, उनके बाशिंदे बाबा की तुलना में एकदम बौने नजर आते हैं। बाबा की कब्र पर बड़े-बड़े हर्फो में खुदा है- वर्कर्स ऑफ ऑल लैंड्स, युनाइट। ये कम्यूनिस्ट मैनिफैस्टों की अंतिम पँक्ति है।  
ये भी कैसी विडम्बना है जीवन की। जियो तो मुफलिसी में और मरो तो ऐसी शानदार जगह पर इतना बढिय़ा कोना नसीब में लिखा होता है।
अगर हम मार्क्स  बाबा के जीवन का ग्राफ देखें तो हम पाते हैं कि 1850 वाले दशक में उन्होंने गरीबी में दिन गुजारे और लंदन के सोहो इलाके में मामूली घर में रहते रहे। सोहो लंदन के बीचो-बीच पिकैडली स्क्वायर के पास एक इलाका है जहाँ आज-कल दुनिया का आधुनिकतम वेश्या बाजार है। हम दोनों उसी शाम वहां भी घूमने गए थे लेकिन उस शाम विश्व कप फुटबाल का कोई महत्त्वपूर्ण मैच होने के कारण सारी रौनकें गेंद की तरफ शिफ्ट हो गयी थीं।
वहाँ रहते हुए उनके चार बच्चे पहले से थे और दो बाद में हुए। मार्क्स  तब न्यू यार्क डेली ट्रिब्यून में लेख लिख कर कुछ कमा लिया करते थे। बाद में वे बेशक अच्छी जगह शिफ्ट हो गए थे लेकिन अक्सर उन्हें गुजारा करने में मुश्किलें ही होती थीं। कई बार वे घर परिवार के लिए कुछ ऐय्याशियाँ भी जुटा लेने में सफल हो जाते थे।
1881 में पत्नी जेनी की मृत्यु हो जाने के बाद कार्ल मार्क्स  बीमार रहने लगे थे और ज्यादा दिन नहीं जी पाये थे। 14 मार्च 1883 में उनकी मृत्यु स्टेटलेस व्यक्ति यानी बिना देश वाले व्यक्ति के रूप में हुई। उन्हें 17 मार्च 1883 हाईगेट सिमेटरी में दफनाया गया। जब उनका अंतिम संस्कार हुआ तो वहाँ पर मात्र 11 लोग थे। इनमें से एक थे उनके प्रिय फ्रेड्रिक एंजेल्स। एंजेल्स ने वहाँ पर अपने शोक संदेश में कहा था, 14 मार्च को दोपहर पौने तीन बजे अब तक का सबसे महान जीवित विचारक चल बसा। उन्हें बस, दो मिनट के लिए ही अकेला छोड़ा गया था और जब हम वापिस आये तो वे अपनी आराम कुर्सी में नींद में ही अपनी अनंत यात्रा पर निकल गये थे।
उनकी मज़ार पर इस समय जो शिला लेख लगा है वह 1954 में ग्रेट ब्रिटेन की कम्यूनिस्ट पार्टी ने लगवाया था और उस स्थल को विनम्रता पूर्वक सजाया गया था। एक और अजीब बात इस मजार के साथ जुड़ी हुई है कि 1970 में इसे उड़ा देने का असफल प्रयास किया गया था।
यहाँ यह जानना रोचक होगा कि स्टेटलेस व्यक्ति कौन होता है और क्यों होता है। स्टेटलेस व्यक्ति दरअसल वह होता है जिसका कोई देश या राष्ट्रीयता नहीं होती। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि जिस देश का वह नागरिक था, वह देश ही अब अस्तित्व में न रहा हो और बाद में उसे किसी और देश ने अपनाया न हो। ऐसा भी हो सकता है कि उसकी राष्ट्रीयता खुद उनके देश ने समाप्त कर दी हो और इस तरह से उसे शरणार्थी बन जाना पड़ा हो। ऐसे लोग भी स्टेटलेस यानी बिना देश वाले हो सकते हैं जो किसी ऐसे अल्पसंख्यक जनजातीय समुदाय से ताल्लुक रखते हों जिसे उस देश की नागरिकता से वंचित कर दिया जाये जिसके इलाके में वे पैदा हुए हैं या वे किसी ऐसे विवादग्रस्त इलाके में पैदा हुए हैं जिसे अपना कहने को कोई आधुनिक देश तैयार ही न हो। ऐसी भी स्थिति हो सकती है कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश में रहते हुए अपने पिछले देश की अपनी नागरिकता किसी वजह से त्याग दे। ये बात अलग है कि सारे देश इस तरह से किसी नागरिक द्वारा उसकी नागरिकता को त्यागने को मान्यता नहीं देते। पिछली शताब्दी में ऐसे में बहुत से गणमान्य व्यक्तियों के साथ हुआ कि वे बे-घर-बार और बे-दरो-दीवार हो गए और अपना कहने के लिए उनके पास कोई देश या राष्ट्र नहीं था। और ऐसे व्यक्तियों में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आंइस्टीन, कार्ल मार्क्स , स्पाइक मिलिगन और फ्रेडरिक नित्शे का नाम शुमार है।
जहाँ तक कार्ल मार्क्स  का सवाल है, वे बेशक ब्रिटिश नागरिक थे लेकिन ब्रिटिश नागरिकता कानून की ऐतिहासिक पेचीदगियों के चलते वे स्टेटलेस नागरिक थे और इसी रूप में वे दफनाये गये थे। इस कानून की धारा के अनुसार वे ब्रिटिश पासपोर्ट के बावजूद युनाइटेड किंगडम में रहने के हकदार नहीं थे। ऐसे लोग जिनके पास किसी और देश की नागरिकता नहीं थी या उन्हें अपने अपने देश में आवास का हक नहीं था ब्रिटिश नागरिकता के बावजूद व्यावहारिक रूप से यहाँ भी स्टेटलेस ही थे। क्या कहा जाये ऐसे बाशिंदों के जो न घर के रहे न घाट के। बलिहारी है ऐसे कानूनों की।   
अभी हम मार्क्स  बाबा की तस्वीरें ले ही रहे थे कि हमारी निगाह सामने वाले कोने की तरफ गयी जहाँ कुछ कब्रों पर ताजे फूल चढ़ाए गए थे। हम देख कर हैरान रहे गये कि ये पूरा का पूरा कोना दुनिया भर के ऐसे कम्यूनिस्ट नेताओं की कब्रों के लिए सुरक्षित था जिन्होंने पिछले दशकों में इंग्लैंड में रह कर देश निकाला झेलते हुए यहाँ से अपने अपने देश की राजनीति का सूत्र संचालन किया था। यहाँ पर हमने ईराकी, अफ्रीकी, लातिनी देशों के कई प्रसिद्ध नेताओं की कब्रें देखीं। ज्यादातर कब्रों पर इस्लामी नाम खुदे हुए दिखायी दिए। किसी ने लंदन में तीस तो किसी ने बीस बरस बिताए थे और अपने-अपने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी और अंत समय आने पर यहीं, बाबा कार्ल मार्क्स  से चंद कदम दूर ही सुपुर्दे-खाक किए गए थे। उस कोने में कम से कम पचास कब्रें तो रही ही होंगी। लेकिन यहाँ भी मामला वही रहा होगा, स्टेटलेस नागरिक होने का। अपने मिशन के कारण मुलुक से बाहर कर दिए गए होंगे और यूके ने उन्हें घर देने के बावजूद घर पर नेमप्लेट लगाने का हक नहीं दिया होगा।
कब्रिस्तान सौ बरस से भी ज्यादा पुराना होने के बावजूद अभी भी इस्तेमाल में लाया जा रहा था। बरसात बहुत तेज होने के कारण हम ज्यादा भीतर तक नहीं जा पाये थे लेकिन कब्रों पर लगे फलक पढ़ कर लग रहा था कि ये कब्रगाह ऐसे-वैसों के लिए तो कतई नहीं है। ये आम रास्ता नहीं है की तर्ज पर परिवेश यही बता रहा था कि ये आम कब्रगाह नहीं है। दफनाए गए लोगों में कोई काउंट था तो कोई काउंटेस। कोई गवर्नर था तो कोई राजदूत। वापसी पर हम जिस रास्ते से हो कर आये वह एक बहुत बड़ा हरा-भरा खूबसूरत बाग था जिसमें सैकड़ों किस्म के फूल और पेड़ लगे हुए थे। वहाँ से वापिस आने का दिल ही नहीं कर रहा था।
हम दोनों ही सोच रहे थे, रहने को नहीं, मरने को ही ये जगह मिल जाये तो यही जन्नत है।
जुलाई 2005 

संपर्क:एच1/101 रिद्धि गार्डन, फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व मुंबई 400097, मो. 9930991424,  Email- mail@surajprakash.com

प्रेरक

दो नगीने
किसी शहर में एक रब्बाई (यहूदी पुजारी) अपनी गुणवती पत्नी और दो प्यारे बच्चों के साथ रहता था।  एक बार उसे किसी काम से बहुत दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा. जब वह दूर था तब एक त्रासद दुर्घटना में उसके दोनों पुत्र मारे गए।
ऐसी दु:ख की घड़ी में रब्बाई की पत्नी ने खुद को बड़ी मुश्किल से सँभाला. वह बहुत हिम्मती थी और ईश्वर में उसकी आस्था अटूट थी. लेकिन उसे यह चिंता थी कि रब्बाई के लौटने पर वह उसे यह दुखद समाचार किस प्रकार देगी। रब्बाई स्वयं बहुत आस्थावान व्यक्ति था लेकिन वह दिल का मरीज़ था और पूर्व में अस्पताल में भी भर्ती रह चुका था. पत्नी को यह आशंका थी कि वह यह सदमा नहीं झेल पाएगा।
पति के आगमन की पूर्व संध्या को उसने दृढ़तापूर्वक प्रार्थना की और शायद उसे अपनी समस्या का कोई समाधान मिल गया। अगली सुबह रब्बाई घर पहुँच गया। बड़े दिनों के बाद घर वापसी पर वह पत्नी से गर्मजोशी से मिला और लड़कों के बारे में पूछा। पत्नी ने कहा- उनकी चिंता मत कीजिए। आप नहा-धोकर आराम करें।
कुछ समय के बाद वे भोजन करने के लिए बैठे। पत्नी ने उससे यात्रा के बारे में पूछा। रब्बाई ने उसे इस बीच घटी बातों की जानकारी दी और कहा कि ईश्वर की दया से सब ठीक हुआ। फिर उसने बच्चों के बारे में पूछा।
पत्नी कुछ असहज तो थी ही, फिर भी उसने कहा- उनके बारे में सोचकर परेशान मत होइए। हम उनकी बात बाद में करेंगे। मैं इस वक्त किसी और उलझन में हूँ, आप मुझे उसका उपाय बताइए। रब्बाई समझ रहा था कि कोई-न-कोई बात जरूर थी। उसने पूछा- क्या हुआ? कोई बात तो है जो तुम्हें भीतर-ही-भीतर खाए जा रही है। मुझे बेखटके सब कुछ सच-सच बता दो और हम साथ बैठकर ईश्वर की मदद से उसका हल जरूर निकाल लेंगे।
पत्नी ने कहा- आप जब बाहर थे तब हमारे एक मित्र ने मुझे दो बेशकीमती नगीने एहतियात से सहेजकर रखने के लिए दिए। वे वाकई बहुत कीमती और नायाब नगीने हैं! मैंने उन जैसी अनूठी चीज और कहीं नहीं देखी है। अब वह उन्हें लेने के लिए आने वाला है और मैं उन्हें लौटाना नहीं चाहती। मैं चाहती हूँ कि वे हमेशा मेरे पास ही रहें। अब आप क्या कहेंगे?
तुम कैसी बातें कर रही हो? ऐसी तो तुम नहीं थीं? तुममें यह सांसारिकता कहाँ से आ गयी? रब्बाई ने आश्चर्य से कहा।
सच यही है कि मैं उन्हें अपने से दूर होते नहीं देखना चाहती। अगर मैं उन्हें अपने ही पास रख सकूँ तो इसमें क्या बुरा है? पत्नी ने कहा।
रब्बाई बोला- जो हमारा है ही नहीं उसके खोने का दु:ख कैसा? उन्हें अपने पास रख लेना तो उन्हें चुराना ही कहलाएगा न? हम उन्हें लौटा देंगे और मैं यह कोशिश करूँगा कि तुम्हें उनसे बिछुडऩे का अफसोस नहीं सताए। हम आज ही यह काम करेंगे, एक साथ।
ठीक है जैसा आप चाहें। हम वह सम्पदा लौटा देंगे और सच यह है कि हमने वह लौटा ही दी है। हमारे बच्चे ही वे बेशकीमती नगीने थे। ईश्वर ने उन्हें सहेजने के लिए हमारे सुपुर्द किया था और आपकी गैरहाजिरी में उसने उन्हें हमसे वापस ले लिया। वे जा चुके हैं....
रब्बाई ने अपनी पत्नी को भींच लिया और वे दोनों अपनी आँसुओं की धारा में भीगते रहे। रब्बाई को अपनी पत्नी की कहानी के मर्म का बोध हो गया था। उस दिन के बाद वे साथ-साथ उस दु:ख से उबरने का प्रयास करने लगे। (पाउलो कोएलो के ब्लॉग से) हिन्दी नेस्ट

हम सोते-सोते सीखते हैं


हम सोते-सोते सीखते हैं
नेचर न्यूरोसाइंस में प्रकाशित शोध पत्र के मुताबिक सोते हुए हम एकदम नई जानकारियाँ सीख सकते हैं। यह तो हर छात्र का सपना होगा। इजराइल के रिहोवाट में स्थित वाइजमैन इंस्टीटयूट ऑफ साइंस के अनत अर्जी और उनके साथियों ने सोते वक्त सीखने की क्रिया को समझने के लिए 55 स्वस्थ प्रतिभागियों पर शोध कार्य किया। सोते हुए प्रतिभागियों को कभी डिओडोरेंट व शैंपू जैसी कोई मनोहर सुगंध और कभी सड़ी मछली व मांस जैसी कोई अप्रिय गंध सुँघाई गई। हर बार गंध के साथ एक विशिष्ट ध्वनि भी सुनाई गई।
यह पहले से ज्ञात है कि पहले से मौजूद याददाश्त को बढ़ाने में नींद एक प्रमुख भूमिका अदा करती है। और यह भी पता है कि जागृत लोगों में इस तरह का गंध और ध्वनि का जुड़ाव गंध सम्बंधी व्यवहार को बदल देता है। ऐसे व्यक्ति जब किसी मनोहर सुगंध से सम्बंधित ध्वनि सुनते हैं तो उनकी सूँघने की क्रिया तेज होती है, लेकिन जब अप्रिय गंध से सम्बंधित ध्वनि सुनते हैं तब हल्के से सूँघते हैं।
लेकिन हाल ही के शोध में यह पता चला है कि नींद के दौरान हुआ अनुकूलन जागने के बाद भी बना रहता है। नींद के दौरान व्यक्ति किसी ध्वनि और गंध के बीच जो सम्बंध जोड़ता है वह उसे जागने के बाद भी याद रहता है।
प्रयोग में किया यह गया था कि सोते समय प्रतिभागियों को कोई प्रिय या अप्रिय गंध सुंघाई गई और उसके साथ कोई विशिष्ट ध्वनि भी सुनाई गई। आम तौर पर माना जाता है कि सोते हुए व्यक्ति में घ्राणेंद्रिय सुप्त रहती है मगर इस प्रयोग में देखा गया कि प्रिय गंध आने पर प्रतिभागी गहरी साँस लेते थे जबकि गंध अप्रिय होने पर वे उथली साँस लेते थे। इस प्रक्रिया से प्रतिभागी पूरी तरह से अनजान थे।
जागने के बाद जब प्रतिभागियों को वे ध्वनियां सुनाई गर्इं तो उनकी साँसों में वही पैटर्न नजर आया जो प्रिय/अप्रिय गंध की वजह से होता है- साँस का गहरा और उथला होना (जबकि अब गंध नदारद थी, सिर्फ ध्वनि सुनाई पड़ रही थी)। मतलब सोते-सोते भी हम ऐसे सह-सम्बंधों को याद रख पाते हैं। वैसे तो यह प्रक्रिया सारे प्रतिभागियों में दिखी मगर उन लोगों में ज़्यादा नजर आई जिन्हें रेपिड आई मूवमेंट (आरईएम) नींद के दौरान यह सम्बंध बनाना 'सिखाया’ गया था।
अर्जी का सोचना है कि हम सोते हुए ज़्यादा जटिल चीजें सीख सकते हैं। हालाँकि इसका यह मतलब नहीं है कि आप अपना होमवर्क तकिए के नीचे रखकर सो जाओगे तो वह सुबह तक याद हो जाएगा।

कानून के साथ जन अभियान भी ज़रूरी



 गुटके पर प्रतिबंध- 
कानून के साथ जन अभियान भी ज़रूरी
- भारत डोगरा
हाल के वर्षों में तम्बाकू वाले गुटके या पान मसाले का सेवन खूब बढ़ा है। इसके सेवन से अनेक स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं। इनके अधिक समय तक सेवन से मुँह के कैंसर का खतरा बहुत बढ़ जाता है। इनके कारण प्लास्टिक के कचरे में भी भयंकर वृद्धि हुई है।
धूम्रपान करने वालों को धूम्रपान न करने वालों की अपेक्षा फेफड़ों के कैंसर की संभावना 15 गुना अधिक होती है। फेफड़ों के कैंसर के अतिरिक्त और भी कई तरह के कैंसर धूम्रपान से जुड़े हैं।
धूम्रपान से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। धूम्रपान से ब्रोंकाइटिस जैसे गंभीर रोग भी हो सकते हैं। धूम्रपान से पेट का अल्सर हो सकता है और अल्सर पहले से हो तो गंभीर रूप ले सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमान लगाया था कि विश्व में एक वर्ष में तीस लाख मौतें धूम्रपान से जुड़े रोगों के कारण होती हैं।
जो लोग कैंसर जैसे जानलेवा रोग के खतरे को नजरअंदाज कर धूम्रपान करते रहे हैं, लगता है कि अब निष्क्रिय धूम्रपान के नए खतरे पता चलने के बाद उन्हें भी अब धूम्रपान छोडऩा पड़ेगा। अपने स्वास्थ्य से तो कोई खिलवाड़ कर सकता है, पर अपने बच्चों या पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों के स्वास्थ्य से कोई खिलवाड़ नहीं करना चाहेगा। निष्क्रिय धूम्रपान के खतरों की यही विशेषता है कि ये धूम्रपान करने वालों को नहीं उनके आसपास बैठे हुए अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं।
जब कोई व्यक्ति सिगरेट पीता है तो उसमें से लगभग तीन-चौथाई धुआँ बाहर निकलता है व  सिर्फ़ एक चौथाई धुआँ ही सिगरेट पीने वाला व्यक्ति ग्रहण करता है। इस एक-चौथाई धुएँ का भी लगभग आधा हिस्सा वह प्राय: बाद में बाहर ही छोड़ देता है। इस तरह लगभग 85 प्रतिशत धुआँ बाहर छोड़ा जाता है जो फिल्टर किया हुआ भी नहीं होता है। यह धुआँ पास बैठे लोगों तक पहुँचता है और इस धुएँ में हानिकारक पदार्थ और भी ज़्यादा होते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका के विख्यात स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. डेविड वर्नर ने नशीले पदार्थों पर अपने एक बहुचर्चित भाषण में बताया था कि संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति वर्ष 50,000 मौतें निष्क्रिय धूम्रपान के कारण होती हैं।
इसी देश के स्वास्थ्य व मानवीय सेवाओं के सचिव लुई सुलिवान ने हाल ही में अनुमान लगाया है कि यहाँ बच्चों की जितनी मौतें होती हैं, उनमें से 10 प्रतिशत मौतों का कारण गर्भावस्था के दौरान इन बच्चों की माँ के द्वारा धूम्रपान करना या किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन था।
गुटके से जुड़ी उक्त दोनों समस्याओं को देखते हुए सरकारी स्तर पर कुछ कार्रवाई भी हुई है। पहले तो कुछ स्थानों पर सिर्फ़ प्लास्टिक पाउच की पैकिंग पर प्रतिबंध लगा, पर फिर यह समझ बनी कि इससे तो केवल समस्या के एक पक्ष का ही समाधान होगा। अत: हरियाणा व राजस्थान जैसे राज्यों में गुटके पर प्रतिबंध लगाया गया।  इस समय पाँच-छह राज्य इस तरह गुटके या खाने-चबाने के तम्बाकू पर रोक लगाने की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं।
दक्षिण राजस्थान में सामाजिक कार्यकत्र्ताओं की एक कार्यशाला में यह अनुमान व्यक्त हुआ कि 1500 की आबादी के एक औसत गाँव में औसतन लगभग चार सौ व्यक्ति गुटके का सेवन करते हैं। गुटके पर प्रति व्यक्ति प्रति दिन के अनुमानित खर्च दस रुपए के हिसाब से एक दिन में पूरे गाँव में 4000 रुपए (सालाना 14 लाख रुपए) गुटके पर खर्च होते हैं। सिगरेट, बीड़ी के बारे में अनुमान लगाया गया कि इन पर सालाना 12 लाख रुपए खर्च होते हैं।
चर्चा में उभरा कि राजस्थान सरकार ने गुटके पर जो प्रतिबंध लगाया है उससे इसकी खपत बाद में चाहे रुके पर अभी तो यह ब्लैक में बिकने लगा है।
इन समस्याओं का समाधान दो स्तरों पर हो सकता है। पहला कि पूरे देश में एक साथ गुटके पर प्रतिबंध लगाया जाए। दूसरा प्रयास यह होना चाहिए कि मात्र कानूनी प्रतिबंध से संतुष्ट न होकर तम्बाकू के सेवन के विरुद्ध एक जन अभियान चलाया जाए ताकि एक माहौल तैयार हो जिसमें लोग तम्बाकू का सेवन छोडऩे को स्वयं प्रेरित हों। तम्बाकू के विरुद्ध  कानूनी कार्यवाही व जन अभियान दोनों प्रयास साथ-साथ चलने चाहिए। केवल एक प्रयास से बात नहीं बनेगी। (स्रोत फीचर्स)