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Nov 24, 2012

कच्ची उम्र में पुलिस की वर्दी का बोझ



कच्ची उम्र में पुलिस की वर्दी का बोझ
- सुनील शर्मा बिलासपुर से
 सात साल के अनिमेष भारद्वाज को पुलिस की वर्दी पहनना अच्छा नहीं लगता, लेकिन अनिमेष की  माँ उसे समझा-बुझा कर वर्दी पहनाती हैं और फिर ड्यूटी पर भेजती हैं। अनिमेष को भी मालूम है कि वह अगर पुलिस की नौकरी नहीं करेगा तो उसका घर नहीं चल पाएगा। आखिर अपने पिता की मौत के बाद वही तो पूरे परिवार का सहारा है।
छत्तीसगढ़ के पुलिस महकमे में अनिमेष अकेला बच्चा नहीं है, जो पुलिस की नौकरी में है। उसके जैसे सैकड़ों बच्चे इस विभाग में काम कर रहे हैं। किसी के जिम्मे फाइलों को लाना-ले जाना है तो किसी के जिम्मे साफ-सफाई। कोई चाय-पानी लाने का काम करता है तो किसी के जिम्मे महकमे के दूसरे   काम हैं।
इन सैकड़ों बच्चों की त्रासदी एक जैसी है- पुलिस विभाग में काम करने वाले इनके पिता की मौत और उसके बाद अनुकंपा नियुक्ति के तौर पर 5-6 साल की उम्र में ही पुलिस की वर्दी का बोझ। इन बच्चों को हर दूसरे दिन अपनी ड्यूटी पर जाना होता है।
बिलासपुर के सौरभ नागवंशी को ही लें। सौरभ के पिता रामकुमार नागवंशी जीआरपी में थे। मुंगेली के जमकोर गाँव  के निवासी रामकुमार नागवंशी के असमय निधन के बाद परिवार के सामने गुजारे का संकट आ खड़ा हुआ। विभाग ने परिवार के सामने रामकुमार नागवंशी की जगह किसी और को अनुकंपा नियुक्ति का प्रस्ताव रखा। रामकुमार नागवंशी की पत्नी ने इसके लिए अपने बेटे सौरभ का नाम सुझाया और विभाग ने तुरंत ही उसे बाल पुलिस के तौर पर विभाग में नौकरी दे दी।
जिस समय सौरभ पहली बार अपने दफ्तर गया था, उस समय उसकी उम्र केवल 5 साल थी। अब इस बात को आठ साल हो गए  हैं। जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार होते हैं, सौरभ नागवंशी को ट्रेन पकडऩे की जल्दी होती है। बिलासपुर के रेल्वे कॉलोनी में रहने वाले सौरभ नागवंशी को 110 किलोमीटर दूर रायपुर के जीआरपी कार्यालय में सुबह दस बजे तक पहुँचकर हाजिरी देनी होती है। पिछले आठ सालों से यही उसकी दिनचर्या है। शाम को लौटते वक्त वह इतना थक जाता है कि उसकी पढऩे की इच्छा नहीं होती।
बिलासपुर में जीआरपी कार्यालय नहीं होने के कारण उसे अनुकंपा नियुक्ति के तहत रायपुर में काम करना पड़ता है। जब वह वर्दी पहनकर ट्रेन में बैठता है तो लोग उसे अजीब निगाह से घूरते हैं और कानाफूसी करते हैं। इससे उसे बुरा लगता है। आजकल वह सामान्य कपड़ों में जाता है और वहाँ ं जाकर वर्दी पहन लेता है।
मासूम सौरभ को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि इतनी कम उम्र में वह इतनी बड़ी जिम्मेदार निभाता होगा। उसकी दो बड़ी बहनें ज्योति और आरती कक्षा 11वीं और 12 में पढ़ती हैं। उनके विवाह की चिंता भी सौरभ को है।
सौरभ कहता है- अब मैं समझदार हो गया  हूँ और मुझे अपनी दोनों बड़ी बहनों के विवाह की चिंता भी सता रही है। हालांकि अभी वे पढ़ रही हैं लेकिन उनके लिए अच्छा लड़का भी देखना होगा,जो उन्हें खुश रखें। महज तेरह साल के सौरभ के मुँह से यह बातें सुनकर यकीन नहीं होता।
सौरभ की माँ ईश्वरी देवी नागवंशी कहती है- वक्त और हालात ने सौरभ को समझदार बना दिया है। नहीं तो वह तो बिल्कुल बुद्धू था।
हालांकि उन्हें सौरभ की पढ़ाई को लेकर चिंता रहती है। सौरभ बिलासपुर के भारत माता स्कूल में पढ़ता है। लेकिन रायपुर-बिलासपुर की यात्रा और नौकरी के बाद उसे घर के भी कामकाज करने होते हैं। जाहिर है, इसके बाद वह इस कदर थक जाता है कि पढ़ाई कर पाना उसके लिये संभव नहीं होते।
एक जैसा दर्द
बिलासपुर की पुलिस लाइन की एक टपकती छत के नीचे रहने वाले भारद्वाज परिवार का आर्थिक बोझ सात साल के मासूम अनिमेष  के छोटे-छोटे कंधों पर है। उसे तो पिता गिरधर भारद्वाज की मौत की बात याद भी नहीं और यह भी नहीं पता कि कैसे और कब पुलिस विभाग ने उसे अनुकंपा नियुक्ति दी।  माँ के कहने पर वह दूरसंचार पुलिस विभाग ड्यूटी पर जाता है, लेकिन वहाँ उसका मन नहीं लगता। उसकी उम्र का वहाँ कोई भी नहीं है, वह किसके साथ खेले। ऊपर से वहाँ उसे काम भी करना होता है।
करीब ढाई साल पहले अनिमेष के पिता की मौत एक दुर्घटना में हो गई थी। उसके बाद से ही दूरसंचार पुलिस अधीक्षक कार्यालय में वह ड्यूटी पर जाता है और इसके बदले उसे हर महीने साढ़े पाँच हजार रुपए मिलते है लेकिन इससे उसे कोई मतलब नही है। उसे तो शिकायत इस बात की है कि उसे खेलने को नहीं मिलता। स्कूल, दफ्तर, ट्यूशन बस इतने में ही उसकी जिंदगी सिमट कर रह गई है।
उसे साइकिल चलाना अच्छा लगता है और सिक्के जमा करने का शौक है। वह एक अंग्रेजी स्कूल में जरूर पढ़ता है लेकिन पढ़ाई में कमजोर है। कम उम्र में वह आफिस और पढ़ाई दोनों साथ-साथ नहीं कर पाता।
अनिमेष की  माँ सरोजनी भारद्वाज कहती हैं- मैंने सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि इतनी छोटी सी उम्र में अनिमेष को काम करना पड़ेगा। मैं तो उसे बहुत बड़ा अफसर बनाना चाहती थी लेकिन भाग्य पर किसका बस है। उसके पिता होते तो इसकी नौबत ही नहीं आती।
अपने पुराने दिनों को याद करते हुये सरोजनी भावुक हो जाती हैं। वे कहती हैं- 'अनिमेष कभी-कभी ड्यूटी पर नहीं जाने की जिद करता है, लेकिन यदि वो नहीं जाएगा तो परिवार का पालन-पोषण कैसे होगा? इसलिए उसे किसी तरह मनाकर भेजना पड़ता है।Ó
'बच्चा पुलिसÓ कहकर चिढ़ाते हैं
अनिमेष ने वर्दी पहनना छोड़ दिया है। जब उसे उसकी  माँ वर्दी पहनाने की कोशिश करती है तो वह इधर—उधर भाग जाता है और ड्यूटी पर नहीं जाने की जिद करने लगता है। दरअसल जब वह वर्दी पहनकर पुलिस लाइन से गुजरता है बच्चों के साथ ही कुछ बड़े भी उसे 'बच्चा पुलिसÓ कहकर चिढ़ाते हैं।
मनोवैज्ञानिक डा.पीके तिवारी कहते हैं- 'बच्चों को कभी भी नहीं चिढ़ाना चाहिए। इससे उनके दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, असर गहरा होता जाता है। बच्चों के साथ बहुत ही प्यार के साथ पेश आना चाहिए। बचपन में हुई घटना ताउम्र दिमाग में रह जाती है। अनिमेष की  माँ को तत्काल चिढ़ाने वालों पर रोक लगानी चाहिए।'
लेकिन अनिमेष जैसी परेशानी लगभग हरेक बाल आरक्षक को झेलनी पड़ती है। हकीकत तो ये है कि बड़े लोग भी इन बच्चों को पुलिस की वर्दी में देख कर इनकी स्थिति को नहीं जान-समझ पाते। अधिक तर लोग यह मान कर चलते हैं कि बच्चे ने शौक से पुलिस की वर्दी पहनी होगी।
13 साल का हरीश कौशिक जब ड्यूटी पर जाता है तो शुरुआती दौर में उसके स्कूल के दोस्त भी इस बात से वाकिफ नहीं थे कि वह पुलिस विभाग में नौकरी करता है। हरीश कौशिक की तैनाती बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में है।
हरीश दस साल का था, जब उसके पिता शिव प्रसाद कौशिक की हार्ट अटैक में मौत हुई थी। इसके बाद हरीश को अनुकंपा नियुक्ति दी गई।
हरीश को गर्मी की छुट्टियों में रोज एसपी कार्यालय जाना होता है जबकि बाकी दिनों में वह एक दिन स्कूल और एक दिन दफ्तर जाता है। मंगलवार और शुक्रवार को उसे वर्दी पहनकर जाना पड़ता है, बाकी दिन वह सामान्य कपड़ों में ड्यूटी पर जाता है।
हरीश को क्रिकेट खेलने का शौक है लेकिन काम के बोझ के कारण वह अपना यह शौक पूरा नहीं कर पाता। उसे अपने गाँव रमतला जाना भी पसंद है। उसे  गाँव  में जब पुलिस कहकर पुकारा जाता है तो अच्छा तो लगता है लेकिन कई बार उसे लगता है कि लोग उसका मजाक उड़ा रहे हैं।
जब से उसने ड्यूटी पर जाना शुरू किया है, उसकी पढ़ाई पर इसका प्रभाव पड़ा है। पाँंचवीं तक उसे अच्छे अंक मिलते थे लेकिन अब तो उसे सेकेंड डिवीजन ही मुश्किल से मिल पाता है। स्कूल नहीं जाने पर उसे अपने दोस्तों से कापी लेकर होमवर्क करना पड़ता है। टीचरों की डाँट भी खानी पड़ती है। दूसरी ओर ड्यूटी पर नहीं जाने पर आफिस वाले ताना मारते है। मतलब एक तरफ कुँआ और दूसरी तरफ खाई।
हरीश की माँ लता देवी कहती हैं-'काशी की यात्रा के दौरान हरीश के पिता अचानक चल बसे। पूरा परिवार संकट में आ गया। हरीश को अनुकंपा नियुक्ति देकर पुलिस विभाग ने मदद की। वैसे तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन मैं हरीश के भविष्य को लेकर चिंतित रहती हूं। वह पढ़ाई में कमजोर है और यह भी सुनने में आता है कि बाल आरक्षकों के साथ उचित व्यवहार नहीं होता। हालांकि अभी तक हरीश ने इस बारे में कभी नहीं बताया लेकिन कब क्या हो जाए कौन जाता है।'
चमकने से पहले ही चमक खो गई
हरीश की ही तरह आदित्य तिवारी, आकाश निषाद, रविराज पांडेय, किशन, कुलदीप, आशीष बंजारे, मनोज ध्रुव... सहित कई बाल आरक्षक राज्य के पुलिस विभाग में कार्यरत है। जांजगीर-चांपा में पद स्वीकृत नहीं होने के कारण मासूम आनंद तिर्की को बिलासपुर के एसपी कार्यालय में अटैच किया गया है तो रायपुर के जीआरपी कार्यालय में लड़कियाँ भी ड्यूटी पर आती है। पिता की मौत के बाद चंचल त्रिपाठी और ट्विंकल ध्रुव को वहाँ अनुकंपा नियुक्ति मिली है।
यह ठीक है कि पिता की मौत के बाद इन बच्चों को पुलिस विभाग ने सहारे के तौर पर नौकरी दे दी है, लेकिन इस नौकरी का कई स्याह पक्ष भी हैं, जिनका जवाब कोई नहीं देना चाहता।
जिस उम्र में बच्चों के हाथ में कलम और किताबों होनी चाहिए, उस उम्र में कुछ बच्चों से फाइलें लाना, चाय-पानी पिलाना, आगंतुक का स्वागत करना जैसे काम लिए जाते हैं। पिता की मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति के तहत पुलिस विभाग के कार्यालयों में काम करने वाले बच्चों को देखकर लगता ही नहीं कि ये बच्चे हैं। अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो गये इन बच्चों के चेहरों पर तो केवल अपने भविष्य को लेकर एक अजीब तरह की खामोशी पसरी रहती है, जो हरेक सवाल के साथ और गहराती जाती है। (raviwar.com से)

यादें



यादें
- डॉ. भगवतशरण अग्रवाल
1
घूमता मन
बचपन की घनी
अमराई में।
2
यादें ही यादें
आँखें बन्द की तो क्या !
चित्र उभरे।
3
नींद में मेरी
आती हैं परिएँ क्यों
बचपन की।
4
मेरे मन की
विस्तृत नभ गंगा
चित्र तुम्हारा।
5
वर्षों पहले
तुमसे कीं जो बातें
आज भी ताजी।
6
ऐसे बरसी
बदली आज, भूले
याद आ गए।
7
आहट आते
उड़तीं तितलियाँ
मेरे मन में।
8
गुलाबी शीत
आलस्य-भरी हवा
यादों की शाम।
9
टहुके मोर
याद आ गया कौन
इतनी भोर?
10
भोर के साथ
महक किसकी थी
पागल मन!
11
रेत पै बस
लिखूँ मिटाऊँ नाम
और क्या करूँ ?
12
भूलूँगा कैसे ?
घरौंदे बनाए जो
मैंने-तुमने ।
13
मत कुरेदो
स्मृतियों के ढेर को-
ज्वालामुखी है।
14
यादों के लम्हें
कड़वा-मीठा स्वाद
दर्दीला गीत।
15
घटा-सी घिरी
कमलों की सुगन्ध
वह आए क्या?
16
ओस में भीगी
कमल की पंखुरी
ऐसी थीं कभी!
17
अकेलापन
रेगिस्तान-सा फैला
चमके यादें।
18
वर्षा की हवा
यादों के पन्ने लौट
किसे ढूँढ़ती?
19
सिर्फ स्मृतियाँ
निपट एकान्त के
क्षणों में साथी।
20
उल्टे-पलटे
रात रानी की गन्ध
यादों के पन्ने।
21
हर मोड़ पे
यादों के झरोखे से
तुम्हीं झाँकती।
22
भूल जाऊँगा
रतजगों से कहो
पीछा छोड़ दें।
23
हर कदम
आहटें, परछाईयाँ
रीते मन की।
24
आज भी ताज़ी
यौवन के फूलों  में
यादों की गन्ध।
25
अकेलापन
मन-दर्पण यादें-
चन्दन वन।
26
कुलबुलाते
अँखियों में सपने
मीठी यादों के।       
लेखक के बारे में: जन्म 23 फरवरी, 1930, फतेहगंज पूर्वी, जिला- बरेली, उ. प्र.। शिक्षा- एम ए पी-एच डी।  छत्तीसगढ़ राज्य शासन एवं रायपुर विश्वविद्यालय द्वारा कुशाभाई ठाकरे पत्रकारिता और जन-संचार सृजन-सम्मान-2005, गुजरात राज्य हिन्दी अकादमी सम्मान। पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर-इन-चार्ज, गुजरात विश्वविद्यालय। रचनाएँ: शाश्वत क्षितिज-1985, हिन्दी का पहला हाइकु संग्रह- टुकड़े-टुकड़े आकाश-1987, हूं भी नहीं भी (हाइकु संग्रह), अर्घ्य (18 भारतीय और 7 विदेशी भाषाओं में देवनागरी लिप्यन्तर सहित हाइकु संग्रह 1995, अकह (हाइकु एव काव्य-संग्रह), सबरस, इन्द्रधनुष अस्ति- नास्ति (हाइकु एव काव्य-संग्रह), चार अन्य काव्य संग्रह, माटी तेरे रूप अनेक (कहानी-संग्रह, हँसना मना है (हास्य-व्यंग्य), शोध समीक्षा, सम्पादन-संग्रह और हाइकु भारती त्रैमाइक का सम्पादन, गुजरात साहित्य अकादमी के तीन ग्रन्थों का सम्पादन। हाइकु विश्वकोश (हाइकु काव्य पर प्रथम विश्वकोश)   
  सम्पर्क: ए-2 अरुणोदय  बंगलोज , चामुण्डा माता मन्दिर की गली झाडेश्वर रोड भरुच- 392011,
  मोबाइल- 09998965772,  E-mail- drbhagwatsaranagarwala@gmail.com

मान्यताओं का मारा बेचारा उल्लू




मान्यताओं का मारा बेचारा उल्लू  
-नरेन्द्र देवांगन
प्रकृति और पर्यावरण के साझा अस्तित्व में धरती पर मौजूद हर परिंदा खूबसूरत कविता के समान है। इस सच्चाई के बावजूद मनुष्य की रूढि़वादी/प्रगतिशील सोच ने हजारों पक्षी प्रजातियों के अस्तित्व पर तलवार लटका दी है। पिछले दो-तीन सालों से अंबाला-कालका राष्ट्रीय राजमार्ग पर निर्माण में बाधा बने करीब एक लाख पेड़ों की कटाई के दौरान मारे गए परिंदों की संख्या लाखों में है। लेकिन इस दौरान करीब चार दर्जन विभिन्न प्रजातियों के उल्लुओं के शव इस लिहाज से चौंकाने वाले थे कि गिद्धों की भांति ही अब उल्लू भी अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।
धरती पर मौजूद 2500 पक्षी प्रजातियों में से 1500 का अस्तित्व करीब तीन दशक पहले ही समाप्त घोषित किया जा चुका है। उल्लुओं के सामूहिक संहार की यह घटना भी उस समय प्रकाश में आई जब मई 2009 में अंतर्राष्ट्रीय पक्षी दिवस के अवसर पर दुनिया भर के पक्षी विज्ञानी अमरीका में जुटे थे।
उल्लू के अस्तित्व पर मंडराते खतरे पर इटली और स्वीडन के पक्षी वैज्ञानिकों द्वारा हाल में की गई खोजों में साफ तौर से चेतावनी दी गई है कि यदि धरती से उल्लू जैसे बहुपयोगी परिंदे का अस्तित्व समाप्त हो गया तो पूरी दुनिया में अंधाधुंध गति से बढ़ती चूहों की फौज खाद्यान्न संकट की नई समस्या पैदा कर देगी। चूहों की बढ़ती फौज न केवल अन्न संकट पैदा करेगी बल्कि प्लेग जैसी घातक बीमारी भी दोबारा अस्तित्व में आ सकती है।
उल्लू की शक्ल देखने में कुछ भयानक तो अवश्य लगती है, मगर इस बेहद चतुर और अक्लमंद पक्षी को मूर्ख मानना तथ्यों से परे है। इसके शरीर की बनावट सुंदर नहीं होती मगर देखने और सुनने की क्षमता में यह इंसानों से कहीं आगे है। उल्लू फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों जैसे चूहों, चमगादड़ों, टिड्डियों, सांप, छछूंदर व खरगोश आदि का सफाया करके फसलों को बचाता है। शुद्ध मांसाहारी जीव होने के कारण इससे फसलों के नुकसान की तो कृपना भी नहीं की जा सकती। वास्तव में उल्लू के घर में बैठने, उसे देखने, छूने या बोलने से जुड़ी अपशकुन की बातें बेबुनियाद हैं। उल्लू व अन्य परिंदों के खात्मे के दर्जनों कारण हैं।
इसमें मोबाइल फोन की भी भूमिका है। शहरों, कस्बों से लेकर गांव-गांव में लगे मोबाइल फोन के बेशुमार टावरों से निकलने वाली तरंगों ने पक्षियों के अस्तित्व पर प्रश्न चिंह लगा दिया है। उल्लुओं की प्रजातियों को विलुप्ति के कगार तक पहुंचाने में पुराने वृक्षों की कटाई भी जिम्मेदार है क्योंकि आम तौर पर उल्लू पचास-साठ साल पुराने वृक्षों के कोटरों में ही अंडे देना पसंद करते हैं। अमरीका में जमा हुए पक्षीविदों ने इस बात पर गंभीर चिंता जाहिर की है कि गगनचुंबी इमारतें तमाम परिंदों के लिए मौत का पैगाम साबित हो रही हैं। दरअसल पूरी दुनिया में गगनचुंबी इमारतों में शीशे का प्रचलन बढऩे से पक्षियों के लिए समस्या खड़ी हो गई है, क्योंकि पक्षी इन शीशों में वृक्षों का प्रतिबिंब देखकर भ्रमित हो जाते हैं। वे प्रतिबिंब को ही पेड़ समझकर उनमें शरण लेने आते हैं और खिड़कियों से टकराकर मारे जाते हैं।
हरियाणा के वन्य प्राणी विभाग के मुख्य संरक्षक डॉ. परवेज अहमद बताते हैं कि भारत सहित कुछ एशियाई देशों में उल्लू को लेकर प्रचलित अंधविश्वास, ओझाओं और तांत्रिकों के अनगिनत मनगढ़ंत किस्से-कहानियों में उल्लू को अशुभ और मनहूस करार दिए जाने की वजह से उल्लुओं की संख्या तेजी से घट रही है। यही वजह है कि उत्तरी राज्यों में उल्लू की घटती संख्या की वजह से चूहे हर साल इतना अनाज नष्ट कर डालते हैं जो पूरे उत्तर प्रदेश की सवा अठारह करोड़ की आबादी के लिए पर्याप्त होगा।
डॉ. परवेज के अनुसार स्ट्रिगाडी कुल का पक्षी उल्लू एकांतवासी, बेहद चतुर, तेज-तर्रार और सटीक शिकारी है। यह शिकारी परिंदा घोर अंधकार में भी किसी युवक की तुलना में सौ गुना अधिक देख और सुन सकता है। करीब सत्तर साल तक जीवित रहने वाला उल्लू जीव जगत में ऐसा अकेला अपवाद है जिसकी बड़ी-बड़ी और गोल आंखें इंसानों की तरह ठीक सामने होती हैं। इस कारण उल्लुओं को अन्य परभक्षियों और प्रतिद्वंद्वी शिकारी पक्षियों से ज़्यादा खतरा नहीं होता है।
जीव वैज्ञानिक परमिंदर कौर की राय में रूढि़वादी परंपराओं से हटकर देखें तो उल्लू इस धरती पर सबसे सुंदर और श्रेष्ठ निशाचर पक्षी है जिसकी लचीली आंखें 360 डिग्री कोण पर भी आसानी से घूम जाती हैं। उल्लू अपनी आंखों में उपस्थित कुछ खास किस्म के रिफ्लेक्टरों की मदद से अपने शिकार को बड़ी दूर से देख सकता है। इंसान से भी बड़ी आंखों के चलते वह मामूली प्रकाश में भी बड़ी आसानी से अपने शिकार को देख सकता है। आंखों के समान ही उल्लू के कान भी बेहद संवेदनशील होते हैं। ये अति संवेदी कान उल्लू की दिन में कम दिखाई देने की खामी को बड़ी आसानी से पूरा कर देते हैं।
उत्तर भारत के प्रसिद्ध वन्य जीव छायाकार संत अरोड़ा पच्चीस सालों से उल्लू जैसे निशाचर पक्षियों की गतिविधियों को अपने कैमरे में कैद कर रहे हैं। वे चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं कि आज तक कभी यह नहीं सुना कि उल्लू ने किसी इंसान को नुकसान पहुंचाया हो, इसके विपरीत इंसान ने उल्लू को विलुप्ति के कगार तक पहुंचा दिया है। संत अरोड़ा पंचकूला में 2 मार्च 2009 की एक घटना का हवाला देते हुए कहते हैं कि सेक्टर 9 में ठगी की वारदात में पुलिस ने जब एक तांत्रिक बाबा अजमल खान बंगाली पर मुकदमा दर्ज किया तो उसने खुद कबूल किया कि उसने अनिष्ट निवारण की तांत्रिक क्रिया में सात उल्लुओं की बलि चढ़ाई थी। इसके लिए सरकारी नियमों को जिम्मेदार ठहराते हुए संत अरोड़ा कहते हैं कि, उदाहरण के तौर पर, जब भी जीव हत्या का कोई मामला सामने आता है, तो हरियाणा प्रदेश के वन्य प्राणी विभाग को दोषियों को हिसार स्थित एकमात्र वन्य प्राणी अदालत में पेश करना पड़ता है। लिहाजा स्टाफ कर्मियों के अभाव और कोर्ट के चक्कर से बचने के लिए वन्य प्राणी विभाग ज़्यादातर मामलों को ले-देकर रफा-दफा कर देता है।
1972 के संशोधित वन्य प्राणी अधिनियम के तहत उल्लू को संरक्षित और संकटग्रस्त प्रजाति घोषित किया गया है। इसके बावजूद पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में हर साल 15 से 20 हजार उल्लू तांत्रिक क्रियाओं की बलि चढ़ जाते हैं। हरियाणा के जींद में स्थित कामाख्या देवी के कालीबाड़ी आश्रम के मुखिया रामनारायण द्वारा किया गया खुलासा काफी चौंकाने वाला है। वे बताते हैं कि उल्लू के शरीर का तापमान हर मौसम में स्थिर रहने की वजह से ही तंत्र साधना में उल्लू के शरीर का हर अंग काम आता है। इसके पंखों को हासिल करने के लिए इसका शिकार किया जाता है। कितने मामलों में तो उल्लू के बच्चे आंखें खोलने से पहले ही काल के मुंह में चले जाते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में बहेलिया प्रजाति के लोग उल्लुओं के बच्चों को उनके कोटरों से निकालकर उन्हें 3 से 7 हजार रुपए प्रति उल्लू के हिसाब से तांत्रिकों के हवाले कर देते हैं। एक तांत्रिक के अनुसार धन-वैभव की प्रतीक लक्ष्मी को खुश करने, जमीन के नीचे के धन का पता लगाने, मृत्यु का पूर्वाभास, दूसरे की स्त्री को वश में करने तथा मारक वशीकरण जैसी मिथ्या और मनगढ़ंत तंत्र क्रियाएं उल्लू की बलि चढ़ाए बिना कभी भी संपूर्ण नहीं होतीं। इसके अलावा दीवाली के अवसर पर उल्लू के पंख जलाने, उल्लू के शरीर से तैयार भस्म को आंखों में लगाने और बच्चों को बुरी नजर से बचाने वाली ताबीजों के नाम पर मक्कार तांत्रिक आम लोगों को बेवकूफ बनाकर अपनी जेबें भर रहे हैं।
दीवाली के दिन पूजन और तांत्रिक अनुष्ठान के लिए पश्चिम बंगाल के जंगलों में उल्लू की एक प्रजाति बार्न बाउल का शिकार और उनकी तस्करी बढ़ गई है। धार्मिक मान्यताओं के अलावा इस उल्लू की आंखों, चमड़े और पंखों का इस्तेमाल दवाइयां बनाने में होता है, खासकर, म्यांमार और चीन में। यूनानी और चीनी दवाइयों में उल्लू की आंखों का खूब प्रयोग किया जाता है। युरोप के कुछ देशों में भी बंगाल में पाए जाने वाले इस उल्लू की विशेष मांग है।
उल्लू को मारने की एक वजह यह है कि इसके नाखून और चोंच को जलाकर एक प्रकार का तेल तैयार किया जाता है जो गठिया के रोगियों की मालिश में काम आता है। वहीं देसी पद्धति से दवा तैयार करने वालों का यह भी दावा है कि इसके मांस का उपयोग यौन उत्तेजक दवा तैयार करने में किया जाता है। कुछ तांत्रिक विधानों में इनकी बलि से पुत्र प्राप्ति, बीमारी के उपचार, वशीकरण, नपुंसकता जैसी समस्याओं के निदान का दावा किया जाता है जिससे छोटे कस्बों व शहरों की मंडियों में इनकी मांग अधिक रहती है। उल्लू की आंख व अंडे की मांग तांत्रिक क्रियाओं में सबसे अधिक होती है। तांत्रिक साधनाओं की किताब उल्लू तंत्र में उल्लू की बलि द्वारा 150 तांत्रिक विधियों का उल्लेख है। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि तांत्रिक क्रियाओं की वजह से मंडियों में उल्लुओं की कितनी अधिक मांग है। भारत में मिलने वाली 33 उल्लू प्रजातियों में बार्न आउल को लुप्तप्राय घोषित कर दिया गया है। लेकिन बंगाल के जंगल बहुल इलाकों, खासकर बांग्लादेश की सीमा से सटे करीमपुर, नदिया के चापरा व मुर्शिदाबाद के जलंगी, मालदा, पूर्व मेदिनीपुर के हल्दिया व अन्य इलाकों में उल्लू की यह प्रजाति खूब पाई जाती है। ये गांव तस्करों का पसंदीदा इलाका बने हुए हैं और स्थानीय ग्रामीणों के लिए इन उल्लुओं का शिकार रोजगार का एक माध्यम।
उल्लू के गैर कानूनी बाजारों में सामान्यत: रॉक ईगल, ब्रााउन फिश, डस्की ईगल, बॉर्न आउल, कोलार्ड स्कॉप्स, मोटल्ड वुड आदि प्रजातियों के उल्लुओं की अधिक मांग होती है।
तस्कर उल्लुओं को नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते अरब देशों को भेज देते हैं, जहां उसे बड़े चाव से खाया जाता है। भारत के अलावा, नेपाल, बांग्लादेश, मलेशिया, थाईलैंड व म्यांमार में इनके गैर कानूनी व्यापार के रैकेट सक्रिय हैं। विका प्रकृति निधि द्वारा 2008 में जारी रिपोर्ट के अनुसार पिछले 6 सालों में उल्लू की कीमतों में दस गुना वृद्धि हुई है जिससे गैर कानूनी व्यापार में भी इजाफा हुआ है। अंधविश्वास की भेंट चढ़ता यह पक्षी अब अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। (स्रोत फीचर्स)