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Jun 5, 2010

वापसी

वापसी
- अब्दुल कलाम

मैंने जब भी तुमसे
कुछ कहना चाहा
तुम हमेशा
मुंह फेरकर चल दिए

मैं दूर तक
तुम्हें जाता देखता रहा
कुछ कहता भी तो कैसे
दरमियान लम्बे फासले थे।

तुम आसमान छूते
महलों में थी
और मैं बरसात में
टपकते हुए छत के नीचे
कोई महफूज कोना
तलाश रहा था।

आज जब
हाथ को हाथ
नहीं सूझ रहा है
दुश्वारियां बढ़ती जा रही हैं


ऐसे में तुम्हारी वापसी
जैसे आखिरी बार
बंद होती पलकों पर
कोई धीमे से
हाथ रख दे
और नींद आ जाए।

चुपके चुपके
लम्हा लम्हा
जख्म रिसा
बनकर नासूर
पत्थर दिल को
दिल देकर
यह किया कुसूर

पलछिन पलछिन
तुम याद आए
बनकर दर्द
तपी हवाएं
जो थी अब तक
शीतल सर्द
मौसम मौसम
वो बदले हैं
दिल टूटा
तुमने क्या मुंह फेरा
मुझसे जग रूठा

चुपके चुपके
कोई आया
मन के द्वारे
रोशन हो गए अंतर्मन
जो थे अंधियारे।

अप्रत्याशित

- शकुन्तला किरण
सिर दुखने का बहाना कर वह लेट गई ताकि अपने बारे में मम्मी- पापा का वार्तालाप सुन सके, उसकी सहेली शादी का कार्ड देने सुबह स्वयं आई थी और उसे पूरी संभावना थी कि मम्मी आज पापा से जरूर कहेंगी- 'सुनते हो... गली वाले शर्मा की बेटी, गैर जात में ब्याह रचा रही है। राम राम! कितना खराब जमाना आ गया है? छोरी ने मां-बाप की इज्जत ही मिट्टी में मिला दी। ...और भेजो कॉलेज पढऩे? और इतराओ... सिर चढ़ाओ लड़कियों को। उसकी जगह... मेरी तनु होती... तो चीर के रख देती...'
और तब शायद पापा, बीच में सगर्व घोषणा करेंगे, 'खबरदार, जो ऐसे कामों में मेरी तनु को घसीटा। उसकी होड़ करेगा कोई? उसे तो बाहर आना-जाना तक पसंद नहीं। ....बस, उसकी किताबें और उसका कमरा भला। मजाल...कभी किसी छोकरे की ओर नजर भी उठा के देखा हो? ...अरे...उसने.....तो....'
उसकी कल्पना को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। उसने सुना, पापा कह रहे थे, 'तनु की सहेली बड़ी लकी निकली। बिना दान-दहेज, खोज-बीन के, सर्विस लगा इतना अच्छा लड़का घर बैठे ही हाथ लग गया शर्मा को....'
और एक लंबी नि:श्वास छोड़ मम्मी ने उत्तर दिया, 'सबकी तकदीर एक- सी थोड़े ही होती है। हमें भी देखो, वर्षों से परेशान हैं, हजारों रुपए झोंक दिया फिर भी कहीं कोई जोग ही नहीं। तनु का भाग्य, वह कहीं आती-जाती भी तो नहीं है।'
तनु से आगे सुना न गया, लगा, एक तीखी-कटार उसके हृदय को चीरती जा रही है और वह अभी चीख पड़ेगी। बिना मतलब बस यूं ही।
विकल्प
आखिरी निश्चय कर वह तालाब के किनारे बैठ गया। परिवार में महीनों से कड़की चल रही थी। एम.कॉम. होने पर भी उसे छोटी-मोटी किसी तरह की कोई नौकरी नहीं मिल पाई। न किसी 'बड़े' से जान-पहचान, न चांदी की खनखनाहट। खाली डिग्री के भरोसे पूरे दो वर्ष निकल गए... अगले ही माह... ओवर एज भी हो जाएगा। तब?
वह इंतजार करने लगा... कब ये धोबी कपड़े समेटें... और वह छलांग लगाकर हमेशा- हमेशा के लिए...।
लेकिन तभी उसे एक विकल्प सूझा- क्यों न किसी से गोदनामे की रस्म अदा करवा के शिड्यूल्ड कास्ट में नाम लिखवा ले... कई जगह सीटें खाली हैं। ...और पिघलते इरादे सहित वह खड़ा होकर टहलने लगा।

रंग बिरंगी दुनिया

तकिए का दीवाना एक बेचारा
सुनने में यह बात बहुत अजीब लगती है कि किसी व्यक्ति को अपने तकिए से इतना प्यार हो जाए कि वह उससे शादी ही रचा ले। लेकिन यह बात है सच। 28 वर्षीय ली जिन ग्यू ने टोक्यो में एक खास समारोह में पादरी बुलवाकर अपने प्यारे बड़े से तकिए से शादी कर ली। इतना ही नहीं उसने शादी के समय अपने इस तकिए को बाकायदा दुल्हन वाली ड्रैस भी पहनाई।
ली एक फेवरिट सैक्सी एनिमेटिड कार्टून कैरैक्टर फेट टैस्टारोसा का दीवाना है। लोगों का कहना है कि ली ने उसी से प्रेरित होकर अपने तकिए से इस तरह शादी की। ली के एक दोस्त अनुसार वह पूरी तरह इस तकिए का दीवाना है और वह जहां भी जाता है इसे अपने साथ लेकर जाता है। पार्क में घूमने जाते समय, खाना खाने कहीं बाहर होटल जाते समय भी वह इसे अपने साथ रखता है। चौंकिए मत बाकायदा अपनी इस दुल्हन तकिए के लिए अलग सीट लगवा कर उसके लिए भी खाना मंगवाता है!
ली के इस तकिए प्रेम के बाद से तो जापान में तकियों को गले लगाकर घूमना आम बात हो गई है। इस तरह किशोर मानो अपने सपनों की रानी को आगोश में ले रहे होते हैं। वैसे भी तरह- तरह के आकार वाले खूबसूरत तकिए दुनिया भर के बाजार में बहुतायत से मिलते हैं जिनका इस्तेमाल विभिन्न अवसरों पर अपने प्रिय को उपहार में देने के लिए भी किया जाता है। अब इस जापानी व्यक्ति द्वारा तकिये से शादी करने के बाद तकियों के बाजार का रुख क्या होगा इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है! व्यापारियों के लिए तकिये का अपना व्यापार बढ़ाने का बढिय़ा मौका है।
66 की उम्र में मातृत्व सुख !
दुनिया के रंग भी निराले हैं यहां चमत्कारों की भरमार है। ऐसे ऐसे चमत्कार यहां हो जाते हैं कि विज्ञान भी उनके सामने हार जाता है। 75 साल का एक इंसान हवा खाकर जिंदा रहता है तो 66 साल की उम्र में एक महिला एक साथ तीन-तीन बच्चों को जन्म दे कर चकित कर देती है। नाती-पोतों को कहानी सुना कर उनकी बलैया लेने की उम्र में हरियाणा के हिसार जिले की भतेरी देवी तीन बच्चों को जन्म देने वाली संभवत: सबसे उम्रदराज महिला बन गई है। भतेरी देवी ने 29 मई 2010 को दो लड़कों और एक लड़की को एक साथ जन्म दिया है।
भतेरी की शादी को 44 वर्ष हो चुके हैं। सातरोड गांव की भतेरी देवी को नैशनल फर्टिलिटी सेंटर में इनविट्रो फर्टिलाइजेशन तकनीक के माध्यम से गर्भाधान कराया गया था। भतेरी के पति देवा सिंह ने भतेरी से शादी करने के बाद बच्चों की आस में दो बार और शादी की थी लेकिन वह एक बार भी पिता नहीं बन सके। भतेरी देवी से पहले इसी तकनीक से डेढ़ वर्ष पूर्व जींद की राजो देवी ने 70 वर्ष की उम्र में इसी केंद्र में एक लड़की को जन्म दिया था।
दादी की उम्र में मां बनी भतेरी देवी और उसके पति ने कहा कि तीन बच्चों के जन्म के बाद उनका आंगन गुलजार हो गया है इतना ही नहीं भतेरी को बेहद खुशी है कि वह इस उम्र में बच्चे पैदा कर पाई हैं। पेशे से खेती का कार्य करने वाले बच्चों के पिता देवा सिंह कहते हैं कि वे तीनों बच्चों की परवरिश बहुत अच्छी तरह से करेंगे।
यह सब तो ठीक है बच्चे उनके हैं तो पालन- पोषण तो करेंगे ही पर क्या वे कुदरत और विज्ञान के इस करिश्मे के साथ अपनी उम्र भी बढ़वा कर लाए हैं? कितने साल तक ये बूढ़े माता- पिता अपने इन तीन नन्हें बच्चों का लाड़- दुलार कर सकेंगे? चिकित्सा विज्ञान भले ही अपने इस करिश्मे पर इतराये, पर क्या इस सवाल का जवाब उनके पास है कि इन बच्चों का भविष्य किससे साये में पलेगा?

आपके पत्रमां और गौरैया के बहाने

मां और गौरैया के बहाने
हमेशा की तरह यह अंक भी बहुत ही मनभावन बन पड़ा है। मज़े की बात यह भी कि इस बार वेब से पहले छपी हुई प्रति हाथ में आ गई। गौरैया पर जानकारी और उसकी तस्वीरे बहुत सुंदर हैं।
लघुकथा आंदोलन के दौर में गंभीर जी का नाम लघुकथाकार के रूप में बहुत चर्चित था। बड़े दिनों के बाद उनकी लघुकथा पढ़कर अच्छा लगा। उनकी लघुकथा बड़ा होने पर बिना कुछ कहे ही बहुत सारी बातें कह गई है।
मां और गौरैया के बहाने कितनी सारी बाते रामेन्द्र जी इतनी सहजता से कह गए कि पता ही नहीं चला। बहुत सुंदर कविता। बधाई।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर, utsahi@gmail.com
पर्यायवरण के लिए अलख
आपकी चिन्ता वाजिब है। उदन्ती के माध्यम से आप पानी और पर्यायवरण के लिए जो अलख जगा रही हैं , यह कार्य आपको अन्य सम्पादकों से अलग करता है। आपका कार्य पूरी तरह रचनात्मक है।
बड़ा होने पर और फ़ीस लघुकथाएं अपने अलग -अलग तेवर से प्रभावित करती हैं।
- रामेश्वर काम्बोज, सहज साहित्य, दिल्ली, rdkamboj@gmail.com
संरक्षण के लिए बहुत जरूरी
अपने नए- नए आयामों की ओर पाठकों का ध्यान खींचा है इसके लिए आपको जितना धन्यवाद दिया जाए कम है। आपने अनकही में जिन तीन विषयों को सहेजा है वे आज के परिवेश के संरक्षण के लिए बहुत जरूरी हैं । बधाई।
- डॉ. जयजयराम आनंद, अरेरा कालोनी, भोपाल
छत्तीसगढ़ की शान
उदंती में सामने जो चिडिय़ा बैठी है मानो छत्तीसगढ़ की शान में बैठी है इसे तो अभयारण्य में छोड़ देना चाहिए।
-देवेन्द्र तिवारी, रायपुर
मन को भा गयी
सुन्दर साज-सज्जा व बेहतर आलेखों के साथ उदंती तो मेरे मन को भा गयी!
- कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर, खीरी (उत्तर प्रदेश)
dudhwalive.com
दस्तावेजों में दर्ज
उदंती के मई अंक में गौरेया विशेषांक देखकर मुझे याद आया कि कभी छत्तीसगढ़ रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय में गौरेया की अधिकता दस्तावेजों में दर्ज हुई है।
- राहुल सिंह, रायपुर rahulsinghcg@gmail.com
काहे को ब्याही बिदेस
मनोज राठौर का लेख विदेशों में सुरक्षित नहीं है भारत की बेटियां पढ़कर मन खिन्न हो गया। हमारे देश में बेटियां आज भी पराई अमानत के तौर पर पाली जाती हैं तभी तो आजादी के इतने बरसो बाद भी न तो हम पूरी तरह से बाल विवाह रोक पाए न कन्या भ्रूण हत्या। और अब विदेशों में ब्याही जाने वाली बेटियों की समस्या पैदा हो गई है। लेकिन यह समस्या तो हमारे द्वारा ही पैदा की गई है जब हमें पता है कि एनआरआई शादी सिर्फ विदेशों में अपना पैर जमाने के लिए करते हंै और मकदस पूरा होते ही अपनी पत्नी को छोड़ देते हंै फिर भी क्यों हम ऐसे लड़कों को अपनी बेटियां सौंप देते हैं। बाल विवाह और भ्रूण हत्या तो हमारे देश में सामाजिक अंधविश्वासों और रूढ़ परंपराओं के चलते आज तक जिंदा है पर एनआरआई पतियों की चाहत कौन सी रूढि़ की देन है?
- पल्लवी, भिलाई

गंभीर विषय की गहन पड़ताल

गंभीर विषय  की गहन पड़ताल

वेद हिन्दू धर्म, हिन्दुतत्व एकलव्य प्रकाशन की एक महत्वपूर्ण किताब है। इस पुस्तक के मूल लेखक हैं कुमकुम राय, कुणाल चक्रबर्ती और तनिका सरकार। पुस्तक का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद स्वयं प्रकाश ने किया है।
हिन्दू धर्म में लगातार आ रहे बदलावों के साथ वर्तमान में धर्म के साथ खिलवाड़ हो रहा है साथ ही उसको हथियार बनाकर उसका राजनीतिकरण कर दिया गया है। इस तरह हम अपनी ही सांस्कृतिक धरोहर को शंका की दृष्टि से देखने लगे हैं। ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि वास्तविक स्थिति को सामने लाया जाए। कुछ ऐसी ही वास्तविकताओं को सामने लाने का प्रयास है यह पुस्तक। इस पुस्तक में तीनों लेखकों के क्रमश: एक- एक निंबंध संकलित हैं- 1. वैदिक युग की खोज में 2. स्मृति, पुराण, हिन्दू धर्म 3. हिन्दुत्व। लेखक अपने-अपने क्षेत्र के सम्मानित इतिहासकार हैं और उन्होंने वेद हिन्दू धर्म, हिन्दुतत्व जैसे गंभीर विषय की गहन पड़ताल की है ।
रोमिला थापर ने भूमिका में बिल्कुल सही कहा है कि वेदों के बारे में कुछ धारणाएं प्रचलित हैं जो अल्प परिचय या सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होती हैं। अतीत के बारे में ऐसे बयानों और वर्तमान के साथ उनके संबंध का इतिहासकारों को परीक्षण करना चाहिए और देखना चाहिए कि उनमें कोई दम है या नहीं। प्रस्तुत पुस्तक में तीनों लेखकों ने अपने गहन अध्ययन के आधार पर इन्हीं सब जवाबों को तलाशने की कोशिश की है।
यह पुस्तक निश्चित ही उन जिज्ञासुओं पाठकों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी जो वेद, हिन्दू धर्म और हिन्दुतत्व के बारे में और अधिक व सही जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। एकलव्य संस्था भोपाल से प्रकाशित इस पुस्तक में विषय से संबंधित चित्रों का भी समावेश किया गया है। पुस्तक का मुखपृष्ठ विषय के अनुरुप आकर्षक है तथा छपाई भी साफ सुथरी है। कीमत है मात्र 45/-रुपए।
स्वैच्छिक संस्था एकलव्य जो शिक्षा एवं जनविज्ञान के क्षेत्र में कार्य करती है तथा समय समय पर इससे संबंधित किताबें एवं पत्रिकाएं भी प्रकाशित करती हैं। बच्चों की पत्रिका चकमक और स्रोत फीचर्स एवं शैक्षणिक संदर्भ उनके नियमित प्रकाशन हंै।
99 साल पुरानी गलती सुधारी
ऑस्ट्रेलिया में भौतिकीशास्त्र के एक प्रोफेसर के इंगित करने पर विश्वविख्यात शब्दकोष ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी को अपनी 99 साल पुरानी गलती सुधारनी पड़ी।
क्वींसलैंड यूनीवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के लेक्चरर स्टीफन ह्यूजेस ने एक शोधपत्र तैयार करने के दौरान ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में वर्णित 'साइफन' शब्द की परिभाषा को गलत पाया।
दुनिया के सबसे अच्छे शब्दकोषों में गिनी जाने वाली ऑक्सफोर्ड में यह गलती पिछले 99 वर्षों से दोहराई जा रही थी।
'हेराल्ड सन' की रिपोर्ट के मुताबिक ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी ने साइफन की प्रक्रिया के लिए वातावरणीय दबाव को प्रमुख कारक बताया था, जबकि दरअसल यह प्रक्रिया गुरुत्वाकषर्ण बल की वजह से होती है। साइफन को आमतौर पर पेट्रोल टैंक खाली करने में इस्तेमाल किया जाता है।
ह्यूजेस ने ऑक्सफोर्ड के सम्पादकों को इस गलती को लेकर ई-मेल भेजा, जिसकी रिवीजन टीम ने कहा कि यह गलती सुधारी जाएगी।