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Dec 13, 2008

धरोहर

हिमाचल की पहाडिय़ों में भी है एक एलोरा
-प्रिया आनंद


चट्टान काट कर मंदिरों का आकार देना एक विलक्षण शिल्प है और इस तरह की कारीगरी बहुत कम दिखती है। ऐसे मंदिरों का चलन पल्लव शासकों के समय सातवीं शताब्दी के आस- पास आरंभ हुआ।
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कांगड़ा घाटी की रत्न मंजूशा का सबसे कीमती रत्न मसरूर मंदिर हैं। मसरूर मंदिर शिव को समर्पित है, मुख्य मंदिर के बाईं ओर सीढिय़ां हैं, जो ऊपर तक जाती हैं। ऊपर पहुंच कर ही हमें इन मंदिरों की वास्तविक सुंदरता देखने को मिलती है। यहां से आप पूरी कांगड़ा घाटी देख सकते हैं।
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मसरूर के मंदिरों की दीवारों पर चित्रित तथा गवाक्षों में स्थापित मुर्तियां शिव, विष्णु, बैकुंठ, ब्रम्हा, इंद्र तथा गणेश की हैं। इनके अतिररिक्त इंद्राणी , माहेश्वरी, वैष्णवी, वाराही, चामुंडा और महालक्ष्मी की मूर्तियां हैं। इस वृहदाकार मंदिर की खूबसूरती का पूरा परिचय हमें मंदिर के ऊपर ही जा कर मिलता है। मंदिर की छत से कांगड़ा घाटी की मनोरम रूप दिखाई देता है। मसरूर मंदिर कांगड़ा के गौरवशाली भव्य वास्तुशिल्प का ज्वलंत उदाहरण है।
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हिमाचल को अगर मंदिरों का घर कहा जाए तो गलत न होगा। इस राज्य में 6000 मंदिर हैं एक से एक मंदिर जो पहाड़ी वास्तु शिल्प के सुंदर उदाहरण हैं।


पगोडा, शिकर, गुंबदों और समतल छतों वाले मंदिर। मंदिरों की इस शृंखला में आते हैं मसरुर मंदिर समूह ... आठवीं शताब्दी के बने इन मंदिरों को देखते ही आप समझ जाएंगे कि आप पर्यटन के दुर्लभ खजाने तक आ पहुंचे हैं। एक ही चट्टान को काट कर ताराशे गए ये मंदिर जादुई प्रभाव रखते हैं। इंडो- आर्यन स्टाइल में इन पंद्रह मोनोलिथिक रॉक कट टेम्पल्स की खूबसूरती यह है कि इन पर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है... समंदर, कमल फूल, पत्ते, गंधर्व, यक्षणियां इन पत्थरों में जीवंत हैं। एकल चट्टान को तराश कर बनाया गया उत्तरी भारत का यह अकेला मंदिर है। इस पूरे क्षेत्र में ऐसी संरचना देखने में नहीं आती। चट्टान काट कर मंदिरों का आकार देना एक विलक्षण शिल्प है और इस तरह की कारीगरी बहुत कम दिखती है। ऐसे मंदिरों का चलन पल्लव शासकों के समय सातवीं शताब्दी के आस-पास आरंभ हुआ। कैलाश मंदिर के बनने तक यह कला चरमोत्कर्ण पर पहुंच चुकी थी। दक्षिण में इस तरह के मंदिर सामान्य बात हैं और ऐसे मंदिर पुरातत्व शास्त्रियों के लिए हमेशा से ही दिलचस्पी का विषय रहे हैं।

रोचक बात यह है कि ऐसे मंदिर पूरे भारत में सिर्फ चार जगहों पर पाए गए हैं। महाबलिपुरम के रथ मंदिर, एलोहा कैलाश मंदिर, राजस्थान में धमनार के मंदिर और कांगड़ा का मसरूर मंदिर। रथ मंदिर और कैलाश मंदिर द्रविड़ स्थापत्य में बने हुए हैं तथा मसरूर व धमनार के मंदिर नागर शैली में बने हैं। अगर तुलना करें तो मसरूर मंदर अपने प्रतिद्वंदी से श्रेष्ठ ठहरता है।

मसरूर मंदिर समूह 15 मंदिरों का गौरव रखता है जबकि धमनार में 8 मंदिर ही हैं। इसकी लंबाई-चौड़ाई भी धमनार की अपेक्षा अधिक है और सज्जा में भी यह श्रेष्ठ है। धमनार जहां निचली भूमि पर स्थित है, वहीं मसरूर का यह भव्य संसार 2500 फुट की ऊंची पर्वत श्रृंखला पर स्थित है।

यहां एक और रोचकता है कि एलोरा का कैलाश मंदिर भी 100 फुट के गहरे गड्ढे में ही बना हुआ है। जो भी हो कैलाश मंदिर सर्वश्रेष्ठ है और इसे विश्व के आश्चर्यों में गिना जाता है।

सातवीं- आठवीं शताब्दी की यह प्रस्तर शिल्प शैली और इसका वास्तु देख कर यही लगता है कि यह मानवीय हाथों की रचना नहीं, इसे किसी दूसरी दुनिया के लोगों ने बनाया है। कांगड़ा से 15 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित यह मंदिर समूह पहाड़ी श्रृंखलाओं पर स्थित है। एलोरा के बारे में तो लगभग सभी लोग जानते हैं, पर बहुत कम लोगों ने मसरूर के बारे में जाना होगा। यह एक बेहद खूबसूरत लैंडस्कैप पर किसी चित्र की तरह लगता है। आयताकार काम्पलेक्स के एक तरफ पहाड़ी चट्टानें हैं और दूसरी तरफ बर्फ से ढकी धौलाधार की पहाडिय़ां नजर आती हैं।
समरूर मंदिर की वास्तु शैली अपने आप में अद्भुत है। 1905 के भूकंप में भले ही यह सुंदर मंदिर तबाह हो गया पर खंडहर अपनी बुलंदी की कहानी खुद बताते हैं। कांगड़ा घाटी की रत्न मंजूशा का सबसे कीमती रत्न मसरूर मंदिर हैं। मसरूर मंदिर शिव को समर्पित है, मुख्य मंदिर के बाईं ओर सीढिय़ां हैं, जो ऊपर तक जाती हैं। ऊपर पहुंच कर ही हमें इन मंदिरों की वास्तविक सुंदरता देखने को मिलती है। यहां से आप पूरी कांगड़ा घाटी देख सकते हैं। केंद्रीय परिसर 160 फुट लंबा और 150 फुट चौड़ा है तथा मुख्य मंदिर के साथ आठ मंदिर हैं। दोनों तरफ चार-चार मंदिरों का निर्माण किया गया है। ये सभी मंदिर सैंड स्टोन को काट कर बनाए गए हैं बाकी के 6 मंदिर भी इसी के साथ हैं। किसी समय अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़े अलंकृत स्तंभ टूट कर गिर गए हैं। इन पर सजी चित्र रचना आपूर्व है। कितने ही ऐसे फ्रेम हैं, जिनमें हिंदू देवी- देवताओं की मूर्तियां बनी हैं, इतनी सुंदर और जीवंत कि देखने वाला बंध कर रह जाता है। एलोरा की ही तरह यहां नृत्यांगनाओं की पंक्ति दिखाई देती है। सुंदर देहयष्टि, पतली कमर, कमान जैसी भावें और होंठों की मधुर मुस्कान। सिर से पांव तक आभूषणों से सजी अप्सराएं.... और गंधर्व जिनके खड़े होने में भी लय-ताल की झलक दिखाई देती है। उनकी नृत्य भंगिमाएं अद्भुत हैं।

दुर्भाग्य से 1905 में यहां आए भूकंप से यह मंदिर तबाह हो गया, ज्यादातर हिस्सा ध्वस्त हो चुका है, पर जितना भी अंश बाकी है, कलात्मकता की दृष्टि से अद्वितीय है। गहन प्रचुर खुदाई से अलंकृत ये मंदिर बड़ी तीव्रता से आकर्षित करते हैं।

मंदिर के साथ ही आयताकार तालाब है जो इस धारण को बल देता है कि मंदिर के साथ किसी जलाशय का होना अनिवार्य है। निश्चय ही इतने सुंदर और विस्तार से बनाए गए मंदिर को ठाकुर द्वार कहा जाता है। इस मंदिर की छत बहुत ऊंची है तथा भरपूर खुदाई से चित्रित है। निश्चय ही इतने सुंदर और विस्तार से बनाए गए मंदिर की योजना राज परिवार की ओर से ही की गई होगी। यहां के गांव वालों का कहना है कि इसे बनाने में शिल्पकारों को 80 वर्ष लगे थे।

भले ही इतना समय न लगा हो, पर यह तो सच है कि मंदिर को बनाने में पूरी योग्यता और समय का इस्तेमाल किया गया है। ठाकुर द्वार में स्थापित मुर्तियां राम- सीता व लक्ष्मण की हैं, पर यह मंदिर विष्णु को समर्पित है। इसके सबसे एक अलग तथ्य यह भी है कि इसकी संरचना तथा अलंकरण इसे भगवान शिव का मंदिर घोषित करते हैं। वास्तव में यह शिव मंदिर ही है, क्योंकि 19वीं शताब्दी में एक यूरोपीय यात्री जो यहां तक आया था उसने अपने रिकार्ड में इसे शिव मंदिर ही लिखा है। यहां के मंदिरों की दीवारों पर चित्रित तथा गवाक्षों में स्थापित मुर्तियां शिव, विष्णु, बैकुंठ, ब्रम्हा, इंद्र तथा गणेश की हैं। इनके अतिरिक्त इंद्राणी, माहेश्वरी, वैष्णवी, वाराही, चामुंडा और महालक्ष्मी की मूर्तियां हैं। इस वृहदाकार मंदिर की खूबसूरती का पूरा परिचय हमें मंदिर के ऊपर ही जा कर मिलता है। मंदिर की छत से कांगड़ा घाटी की मनोरम रूप दिखाई देता है। भूकंप के कारण यह भव्य मंदिर खंड- खंड हो गया, पर आज भी जो कुछ यहां देखने को मिलता है, उसी से इसके महत्व और ऐतिहासिकता का पता चल जाता है। मसरूर मंदिर कांगड़ा के गौरवशाली भव्य वास्तुशिल्प का ज्वलंत उदाहरण है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि मसरूर मंदिर अपनी भव्यता सुंदरता से भारी पर्यटन खींच सकते हैं, पर ऐसा तभी संभव है जब मंदिर तक पहुंचने का साधन सुलभ और आम पर्यटक की जेब के अनुकूल हो। ऐसा कोई प्रबंध नजर नहीं आता क्योंकि मंदिर तक बसों का लगातार आवागमन नहीं है। इसलिए अगर एक बार बस वहां तक आपको पहुंचा देती है, तो यह भी संभव है कि वापसी में आपको पैदल चल कर एक लंबा रास्ता तय करना पड़े, तब जाकर आप कोई कांगड़ा की तरफ आती बस पा सकें। कहना न होगा कि वापसी में पैदल चलने की सतह मजबूरी किसी भी पर्यटक का उत्साह खत्म करने को काफी है। इसके लिए जरूरी है कि इस लिंक रोड पर चलने के लिए कम से कम दो ऐसे टेम्पो या टैक्सियां होनी जरूरी हैं जो कम किराया लेकर पर्यटकों को गंतव्य तक पहुंचा सके । परिवहन मंत्री का कहना है कि जो भी बाहरी पर्यटक आता है, वह अपनी गाड़ी ले कर आता है और अगर पर्यटक बढ़ जाते हैं तो टेम्पों वाले खुद ही वहां पहुंच जाएंगें। हां ऐसे में अगर लाइसेंस की समस्या आती है तो उसकी सुविधा देने को मैं तैयार हूं। मसरूर मंदिर के सौंदर्यीकरण के बारे में उनका कहना था कि इसके लिए पूरे 20 लाख का फंड रखा हुआ है, वह भी होगा। डेवलप कर रहे हैं, हो जाएगा।

मौसम जैसे-जैसे बदल रहा है , पर्यटक पहाड़ का रूख करने लगे हैं। इनमें सभी गाड़ी वाले नहीं होते.... बहुत ऐसे भी होते हैं जो जागरूक हैं ऐसी जगहों को देखना चाहते हैं पर सुविधाहीनता की समस्या उन्हें मसरूर तक जाने से रोकती है। ऐसे में यहां का पर्यटन कैसे बढ़ेगा? और जब तक पर्यटन बढ़ेगा नहीं तो इतनी भव्य विरासत विश्व पटल पर कैसे आ सकेगी। जाहिर है हिमाचल के पास आपार पुरातात्विक संपदा है पर उसका सही दोहन न होने से स्थिति जैसी की तैसी है। इस छोटी सी बात को हम कब समझ पाएंगे...?

विमर्श- जिम्मेदार मीडिया का गढ़ छत्तीसगढ़

विमर्श
जिम्मेदार मीडिया का गढ़ छत्तीसगढ़
- जयराम दास



खारून में भले ही काफी पानी न बहा हो लेकिन रायपुर तो मैट्रो जनित रफ्तार से चल पड़ा है । साथ ही शहर का मीडिया भी उसी रफ्तार से कदमताल करने लगा, तेजी से विकसित होते इस अवसरों के शहर के साथ।

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विचारधारा के प्रति अति आग्रह, संगठनों के प्रेस विज्ञप्ति पर अत्यधिक निर्भरता, कस्बायी संस्करणों की बाढ़ के बावजूद गांव-मड़ई की खबरों का कम होते जाना दुखद हैं जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
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बात 25 जुलाई 2004 की है। पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त एक युवक एक राजनीतिक पार्टी के मीडिया में काम करने का नियुक्ति पत्र लिये रायपुर स्टेशन पर उतरा। साथ में एक झोला लिए, एक ऐसा झोला जिसमें निम्न मध्य वर्गीय परिवार के सपने बंद थे और थे दो जोड़ी कपड़े तथा अपने लिखे और प्रकाशित कुछ आलेख। अपने इसी बैसाखी की दौलत वो दिल्ली से आकर एक नये राज्य की नयी राजधानी और नये लोगों के बीच पांव जमाने की फिराक में था।
कुछ इस तरह की करने चला था पार समंदर को आज वो, लेकिन वो हाथ में लिए कागज की नाव था।
उस समय का रायपुर एक कस्बेनुमा उंघता-अनमना अलसाया सा शहर लेकिन जिस पर जल्द से जल्द राजधानी जैसा बन जाने का भूत सवार था, तो उस युवक को भी मीडिया पर्सन बन जाने का। आज जब इस अनजाने से युवक की आंखों से रायपुर को देखा जाय तो अद्भुत अलौकिक चमत्कारिक परिवर्तनों का शहर जान पड़ता है यह तो। तब से खारून में भले ही काफी पानी न बहा हो लेकिन रायपुर तो मैट्रो जनित रफ्तार से चल पड़ा है। साथ ही शहर का मीडिया भी उसी रफ्तार से कदमताल करने लगा, तेजी से विकसित होते इस अवसरों के शहर के साथ। कहते हैं हर क्रिया के समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। निश्चय ही शहर के इस विकास के समानुपाती रूप में ही अच्छी और बुरी चीजें भी मीडिया में साफ-साफ दिखने लगीं।

यदि अच्छी चीजों की बात करें तो प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद के विरोध में-कुछेक अपवादों को छोडक़र-जिस तरह का रूख यहां के अखबारों ने दिखाया उसकी जितनी तारीफ की जाय वह कम है। कम से कम कुछ संवेदनशील मुद्दे पर तो इसने राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया को भी आईना दिखाया है। आपको याद होगा जब देश के सारे इलेक्ट्रानिक चैनल आरूषि को न्याय दिलाने में व्यस्त थे। जिस समय सारे समाचार माध्यम उस पीडि़त परिवार के हर रात लेखा जोखा मांगने की ''पुनीत'' जिम्मेदारी निभा रहा था तब रायपुर अपने 26 लाख बस्तरिया भाई-बहनों को नक्सली ब्लैक आउट से मुक्त करने के प्रयास में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था।
यह भी याद रखने योग्य है कि जब कथित मराठी-राज ठाकरे मुम्बई को अपनी बपौती साबित करने की जद्दोजहद में लगा था और बार-बार फटकारे जाने के बाद भी हिंदी मीडिया स्थानीय टीवी चैनलों से फुटेज ले-ले कर उसे प्रसारित करने में व्यस्त था वहां रायपुर का एक अखबार धमतरी निवासी एक दूसरे ठाकरे, राजू ठाकरे की खबर मुख्यता से प्रकाशित कर रहा था। इस ठाकरे ने रंभा इंगोले नाम की एक वृद्धा की मृत्यु हो जाने पर उन्हें अपनी मां बनाकर उनका अंतिम संस्कार एवं श्राद्ध कर्म अपने हाथों से किया था। तो ये जो राज ठाकरे और राजू ठाकरे में फर्क है, आदमीयत और भलमनसाहत का। कमोवेश रायपुर के समाचार माध्यम ने कथित राष्ट्रीय मीडिया से वही फर्क कायम रखा है।
यहां के मीडिया की एक और सबसे बड़ी सफलता जो कही जाएगी वो है छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का सम्मान दिलवाना। कोई लाख कुछ कह ले लेकिन वह कथित आंदोलन केवल और केवल अखबारों के माध्यम से ही चलाया गया। बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मुठ्ठीभर बुद्धिजीवियों द्वारा शुरू किये गये उस दोस्ताना संघर्ष को, मुखर लेकिन मूक जनभावनाओं की नब्ज जिस तरह से अखबार ने पकड़ी और जितनी जल्दी सरकार का ध्यान आकृष्ट करने में सफल रही, वैसी सफलता तो टीआरपीवादी मीडिया सपने में भी नहीं सोच सकती है। इसके अलावे जब-जब किसी समूह विशेष या कुछ मीडिया द्वारा प्रदेश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया गया, छत्तीसगढ़ ने उसे मुंहतोड़ जवाब देने में पल भर की देरी नहीं की। याद कीजिए एक कुंठित लेखक ने दिल्ली से प्रकाशित एक साहित्यिक पत्रिका में बस्तर- बालाओं का अपमान किया था, सारे के सारे अखबारों ने एक स्वर में उस असभ्य पत्रिका की बखिया उधेड़ कर रख दी थी। या एक खूबसूरत, लोकप्रिय नेत्री को ''स्टोरी'' के माध्यम से बेइज्जत करने का प्रयास एक राष्ट्रीय चैनल के स्थानीय संवाददाता द्वारा किया गया तो उसे भी दुत्कारने में स्तंभ लेखकों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। एक अखबार ने उसके कैमरे की तुलना बंदर के हाथ में उस्तरा तक से कर दी थी।
महान ऐतिहासिक आदिवासी आंदोलन सलवा जुडूम की चर्चा किये बिना मीडिया विमर्श संभव ही नहीं है। इस महान आंदोलन का दुष्प्रचार जिस तरह जाने या अनजाने में गैर छत्तीसगढ़ी मीडिया ने किया है, नक्शा में देखकर भी मुश्किल से एर्राबोर और रानीबोदली को पहचान सकने की अक्षमता के बावजूद दिल्ली में रहने वाले भाई लोगों ने सुनी-सुनायी बात या दुष्प्रचार के आधार पर जितनी भड़ास निकाली, जिस तरह से बिना मतलब प्रदेश को बदनाम किया, सैकड़ों आदिवासियों के मारे जाने, लाखों गरीबों के अंधकार में झोंक देने पर ऊफ तक न करने वाले, नोटिस तक नहीं लेने वाले भाई लोगों ने जिस तरह किसी नक्सली की सामान्य गिरफ्तारी पर भी हायतौबा मचायी उसके लिए इतिहास उन लोगों को कभी माफ नहीं करेगा। कई बार तो इस मामले में ऐसी हास्यास्पद, लज्जास्पद स्थिति आयी कि एक ही अखबार में एक ही दिन में जिस घटना की स्थानीय संपादक द्वारा तारीफ की गई उसी अखबार के दूसरे पन्ने पर दिल्ली के भाई लोगों द्वारा उसी समाचार की भत्र्सना भी की गई।
लब्बोलुबाब यह कि यहां के समाचार माध्यमों ने अपने सामाजिक सरोकारों का परिचय देकर अपनी जिम्मेदार रिपोर्टिंग द्वारा निश्चय ही सप्रे जी की परंपरा को आगे ही बढ़ाया है। उनकी पुनीत आत्मा को गौरवान्वित होने का अवसर दिया है। साथ ही रायपुर द्वारा दिल्ली को आईना दिखाने का काम भी किया गया है। बावजूद इसके कुछ विसंगतियां है। खासकर विज्ञापन और समाचार में फासला निरंतर कम होते जाना, या समाचारों का संबंध डायरेक्टली विज्ञापनों से जोड़ देना, आंख मूंदकर विरोध या समर्थन, विचारधारा के प्रति अति आग्रह, संगठनों के प्रेस विज्ञप्ति पर अत्यधिक निर्भरता, कस्बायी संस्करणों की बाढ़ के बावजूद गांव-मड़ई की खबरों का कम होते जाना दुखद हैं जिसपर ध्यान देने की ज़रूरत है।
खैर, जब उपरोक्त वर्णित वह युवक अपनी झोला उठाये किसी अन्य पड़ाव तक जाने को उद्यत होगा तो उस थैले में ये ढेर सारी अच्छी यादें भी होंगी और होगा इस समूचे यात्रा में गिलहरी समान स्वयं के भी भागीदार होने का आत्मसंतोष भी।

दूसरा चेहरा

1-दूसरा चेहरा 
 - सुकेश साहनी



मिक्की की आंखों में नींद नहीं थी। वह पिल्ले को अपने पास नहीं रख पाएगा, सोच कर उसका मन बहुत उदास था। पिल्ले को लेकर ढेरों सपने बुने थे पर घर आते ही सब कुछ खत्म हो गया था। मां ने पिल्ले को देखते ही चिल्लाकर कहा था, ''अरे, यह क्या उठा लाया तू? तेरे पिता जी ने देख लिया तो किसी की भी खैर नहीं। उन्हें नफरत है इनसे। जा, इसे वापस छोड़ आ।  दादी मां ने बुरा सा मुंह बनाया था, ''राम राम! कुत्ता होई जो कुत्ता पाले। बाहर फेंक इसे।'' यह सब सुनकर उसे रोना आ गया था। कितनी खुशामद करने पर दोस्त पिल्ला देने को राजी हुआ था। चूंकि दोस्त का घर दूर था इसलिए एक रात के लिए उसे पिल्ले को घर में रखने की इजाजत मिली थी। पिता जी के आने से पहले ही उसने बरामदे के कोने में टाट बिछाकर उसे सुला दिया था।

कूं ... कूं की आवाज से वह चौंक पड़ा। बरामदे में स्ट्रीट लाइट की वजह से हल्की रोशनी थी। पिल्ले को ठंड लग रही थी और वह बरामदे में सो रही दादी की चारपाई पर चढऩे का प्रयास कर रहा था। वह घबरा गया... सोना तो दूर दादी अपना बिस्तर किसी को छूने भी नहीं देतीं... उनकी नींद खुल गई तो वे बहुत शोर करेंगी... पिता जी जाग गए तो पिल्ले को तिमंजिले से उठाकर नीचे फेंक देंगे... वह रजाई में पसीने-पसीने हो गया। सोते हुए मां ने एक हाथ उस पर रखा हुआ था, वह चाहकर भी उठ नहीं सकता था। पिल्ले की कूं कूं और पंजों से चारपाई को खरोंचने की आवाज रात के सन्नाटे में बहुत तेज मालूम दे

रही थी।

दादी की नींद उचट गई थी, वह करवटें बदल रही थीं। आखिर वह उठ कर बैठ गई।

आने वाली भयावह स्थिति की कल्पना से ही उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसे लगा दादी पिल्ले को घूरे जा रही हैं।

...दादी ने दाएं-बाएं देखा...पिल्ले को उठाया और पायताने लिटा कर रजाई ओढ़ा दी।

2-मैं कैसे पढूं ?

पूरे घर में मुर्दनी छा गई थी। मां के कमरे के बाहर सिर पर हाथ रखकर बैठी उदास दाई मां ...रो-रोकर थक चुकी मां के पास चुपचाप बैठी गांव की औरतें । सफेद कपड़े में लिपटे गुड्डे के शव को हाथों में उठाए पिताजी को उसने पहली बार रोते देखा था....।

'शुचि!' टीचर की कठोर आवाज़ से मस्तिष्क में दौड़ रही घटनाओं की रील कट गई और वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई।

'तुम्हारा ध्यान किधर है? मैं क्या पढ़ा रही थी..... बोलो?' वह घबरा गई। पूरी क्लास में सभी उसे देख रहे थे।

'बोलो!' टीचर उसके बिल्कुल पास आ गई।

'भगवान ने बच्चा वापस ले लिया ...।' मारे डर के मुंह से बस इतना ही निकल सका ।

कुछ बच्चे खी-खी कर हंसने लगे। टीचर का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा।

'स्टैंड अप आन द बैंच!'

वह चुपचाप बैंच पर खड़ी हो गई। उसने सोचा ...ये सब हंस क्यों रहे हैं, मां-पिताजी, सभी तो रोये थे-यहां तक कि दूध वाला और रिक्शेवाला भी बच्चे के बारे में सुनकर उदास हो गए थे और उससे कुछ अधिक ही प्यार से पेश आए थे। वह ब्लैक-बोर्ड पर टकटकी लगाए थी, जहां उसे मां के बगल में लेटा प्यारा-सा बच्चा दिखाई दे रहा था । हंसते हुए पिताजी ने गुड्डे को उसकी नन्हीं बांहों में दे दिया था। कितनी खुश थी वह!

'टू प्लस-फाइव-कितने हुए?' टीचर बच्चों से पूछ रही थी।

शुचि के जी में आया कि टीचर दीदी से पूछे जब भगवान ने गुडडे को वापस ही लेना था तो फिर दिया ही क्यों था? उसकी आंखें डबडबा गईं। सफेद कपड़े में लिपटा गुड्डे का शव उसकी आंखों के आगे घूम रहा था। इस दफा टीचर उसी से पूछ रही थी । उसने ध्यान से ब्लैक-बोर्ड की ओर देखा। उसे लगा ब्लैक-बोर्ड भी गुड्डे के शव पर लिपटे कपड़े की तरह सफेद रंग का हो गया है। उसे टीचर दीदी पर गुस्सा आया । सफेद बोर्ड पर सफेद चाक से लिखे को भला वह कैसे पढ़े?

उफ... ये मौजा ही मौजा ...

उफ... ये मौजा ही मौजा ...
- डॉ. प्रतिमा चंद्राकर

यदि आपको भी आता है गुस्सा तो आइए उस गुस्से को उदंती.com के इस पृष्ठ पर लिख कर उतारने की कोशिश करें। क्योंकि बड़े- बुजूर्ग कहते हैं कि गुस्से को मन में नहीं रखना चाहिए, उसे बाहर निकाल देने से गुस्सा कम हो जाता है, तो यदि उस गुस्से को लिखकर आपस में बांट लें तो गुस्सा कम तो होगा ही साथ ही इसके माध्यम से एक अभियान चला कर संबंधित विभाग और प्रशासन का ध्यान आकर्षित भी कर सकते हैं। साथ ही एक दूसरे की समस्या का समाधान निकालने का प्रयास।

आज सुबह जब मैं कॉलेज जाने के लिए गेट से बाहर निकली तो सामने वाले पड़ोसी के घर में हलचल देखकर एक अजीब सी दहशत और घबराहट होने लगी। शाम को लौटने पर गाडिय़ां और लाइट की सजावट देखकर सारा माजरा समझ में आ गया। मन गुस्से से भर गया यह सोच कर कि आज फिर रात की नींद हराम होगी।
मेरे पड़ोसी का घर बहुत बड़ा है, अपने हवेलीनुमा मकान को वे शादी, जन्म दिन आदि की पार्टी के लिए किराए पर देते हैं। मैं यहां आए दिन होने वाली शादी और पार्टियों से डरने लगी हूं। अरे ... पर यह कॉलम तो गुस्से का है, मैं डर के विषय में क्यों लिख रही हूं? दरअसल मेरा गुस्सा डर में बदल चुका है। मैं लिख रही हूं और मेरे कानों में full sound में मौजा ही मौजा... की आवाज़ गरम लावे की तरह पिघल रहा है। रात के साढ़े दस बज चुके हैं पर डिस्को की कान के पर्दे फोड़ देने वाली आवाज़.... उफ।

मैं और मेरे परिवार का सम्बन्ध पढ़ाई -लिखाई से है। शाम को और देर रात तक इस तरह कि आवाज़ से सभी परेशान रहते हैं। आप सोचते होंगे पढ़ा-लिखा परिवार और जागरूकता जऱा भी नहीं? तो मैं बता दूं तीन वर्ष पहले मैंने पुलिस को इसकी लिखित शिकायत दी थी, कि रहवासी इलाके में देर रात तक इस तरह के आयोजन हेतु कोई अपना घर कैसे किराए पर दे सकता है? पुलिस ने बताया कि उनके पास परमिशन है। ऐसी बात भी नहीं है कि इस कालोनी में अन्य जगरुक लोग नहीं रहते, यहां कई सरकारी अफसर भी रहते हैं पर शिकायत करने का कीड़ा मुझे ही काटा।
हां तो मैं बता रही थी कि जब शादी, जन्मदिन और डिस्को पार्टी का शोर शिकायत करने के बाद भी नहीं रुका तो नियमानुसार सही-सही जानकारी प्राप्त कर पुन: शिकायत पत्र लिखा परन्तु प्रशासन तो प्रशासन है चलेगी तो अपनी ही चाल से। भले ही आज हम चांद तक पहुंचने पर गर्व करें पर चलेंगे उसी बैल गाड़ी वाले युग की चाल।
आज भी स्थिति यह है कि जब तक थाने फ़ोन न करो, लाऊड स्पीकर कि आवाज़ धीमी नहीं होती। थक कर मैंने मानव अधिकार में भी इस सम्बन्ध में शिकायत की है। लेकिन शायद वहां भी उनकी अपनी सीमाएं हैं। देखते-देखते तीन साल बीत गए और दीपावाली के बाद से गर्मी कि छुट्टियों तक हम बारातियों का स्वागत करते भांगड़ा एवं पटाखे तथा गानों की गूंज में जीने के आदि हो गए।
जब-जब इस घर को किराए पर शादी या किसी और पार्टी के लिए दिया जाता है हमारी और हमारे बच्चों की पढ़ाई लिखाई तो प्रभावित होती ही है, यदि हम इस शोर से बचने के लिए घूमने निकल जाते हैं तो रात को लौटते पर अपनी गाड़ी अन्दर रखने हेतु पहले शादी घर जाकर सैकड़ों लोगों से पूछ -पूछ कर अपने गेट के सामने से गाड़ी हटवाते हैं या फिर अपनी गाड़ी सडक़ पर भगवान भरोसे छोडक़र कानों में रूई डालकर सभी दरवाज़े बंद कर सोने कि कोशिश करते हैं।
मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं एक तो इसी शोर शराबे के बीच पढ़ते हुए बोर्ड पास कर दूसरे शहर पढऩे चली गई, दूसरी बोर्ड की तैयारी में है। इस तरह हम बरस- दर बरस अपने गुस्से के ग्राफ़ को ऊपर से नीचे करते हुए हार मान कर चुप- चाप बैठ गए हैं।
पर उदंती में गुस्से का यह कॉलम देखकर अपने आपको रोक नहीं पाई और मन छटपटा उठा। उदंती के पृष्ठों के लिए अपने दिल का गुबार निकाल कर मन हल्का तो हो गया लेकिन मेरी समस्या का समाधान मुझे नहीं मिल रहा है। मैंने अपने पढ़े- लिखे होने की जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई है और पहल भी की है। लेकिन जब-जब सामने वाले इस घर में जब- जब पार्टी का आयोजन होता है, मेरे गुस्से का ग्राफ बढऩे लगता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ है क्योंकि आज रात मुझे कानों में रुई डालकर सोने का प्रयास करना ही पड़ेगा, अन्यथा कल नौकरी पर कैसे जा पाऊंगी।

इस अंक के लेखक

डॉ. खुशालसिंह पुरोहित


जन्म तिथि - 10 जून 1955 को म.प्र. में एक किसान परिवार में। शिक्षा - एम.ए.(हिन्दी), पी.एच.डी.(पत्रकारिता),डी.लिट् (पर्यावरण) कार्य - पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण जागरुकता और पर्यावरण शिक्षा के क्षैत्र में पिछले ढाई दशक से कार्यरत है, 1987 पहली हिन्दी पर्यावरण पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट का प्रकाशन। पत्रकारिता - सन् 1972- साप्ताहिक मालव समाचार में प्रतिनिधि, 1974 - दैनिक स्वदेश इंदौर में जिला प्रतिनिधि, 1975-हिन्दुस्तान समाचार संवाद एजेंसी में जिला संवाददाता, 1975 - दैनिक इंदौर समाचार में अति.प्रतिनिधि, 1977-दैनिक स्वदेश इंदौर में सह-संपादक, हिन्दी के प्रतिष्ठित पत्रों में सम-सामयिक विषयों पर अनेक लेख प्रकाशित। पता- 19 पत्रकार कॉलोनी, रतलाम, म.प्र. 457001

फ़ोन (07412) 231546, मोबाइ: 9425078098

डॉ. प्रतिमा चन्द्राकर



शिक्षा- एमएससी, पीएचडी (केमेस्ट्री) संप्रति: प्रोफेसर, रसायन शास्त्र विभाग, शासकीकय विज्ञान महाविद्यालय, रायपुर

पता- एफ-2, पेंशन बाड़ा रायपुर (छ.ग.)

mail id- pchandraker@yahoo.com
जयराम दास



जन्म - 7 फरवरी 1977 शिक्षा - पत्रकारिता में स्नातकोत्तर-माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल कार्य- भाजपा की मासिक पत्रिका दीप कमल में समाचार संपादक, विभिन्न समाचार पत्रों में अनेक आलेख प्रकाशित विशेष - इंग्लिश, संस्कृत व मैथिली भाषाओं का ज्ञान। पता - एकात्म परिसर रजबंधा मैदान रायपुर (छ.ग.) mail id- jay7feb@gmail.com


सुकेश साहनी



जन्म तिथि - 5 सितंबर 1956 लखनऊ

शिक्षा- एम. एस-सी (जियोलॉजी) तथा डीआईआईटी (एप्लाइड हाइड्रॉलॉजी) मुंबई। कार्यक्षेत्र- उपन्यास, कहानी, लघुकथा तथा बालकथाओं का लेखन। लगभग प्रत्येक हिंदी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित। लघुकथा की विकास यात्रा में महत्त्वपूर्ण योगदान। प्रकाशित कृतियां - लघुकथा संग्रह-डरे हुए लोग (पंजाबी, गुजराती, मराठी व अंग्रेज़ी में भी ) ठंडी रज़ाई (अंग्रेज़ी व पंजाबी में ) कुछ लघुकथाएं जर्मन भाषा में अनूदित।

अनुवाद- ख़लील जिब्रान की लघुकथाएं, रोशनी कहानी पर दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म का निर्माण, संपादन- लघुकथाओं के आधे दर्जन से अधिक संकलनों का संपादन सम्प्रति- भूगर्भ जल विभाग में हाइड्रोलॉजिस्ट । पता- 193/ 21, सिविल लाइंस , बरेली -243001

mail id- sahnisukesh@gmail.com

प्रिया आनंद



जन्म जनवरी 1950 फैजाबाद उत्तर प्रदेश, शिक्षा एम. ए. हिंदी साहित्य, लेखन- 36 वर्षों से लेखन में सक्रिय। अब तक 260 के लगभग कहानियां, लेख, विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित। कहानी संग्रह- मोहब्बत का पेड़ प्रकाशित। पत्रकारिता- हिमाचल के दैनिक पत्र दिव्य हिमाचल में 9 वर्षों से फीचर एडिटर के पद पर कार्यरत। पता: दिव्य हिमाचल, पुराना मटौर कार्यालय, कांगड़ा पठानकोट मार्ग, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)176001

त्रिजुगी कौशिक



शिक्षा - इंटरमीडियेट । प्रकाशन- ओ जंगल की प्यारी लडक़ी (कविता संग्रह) संपादन - बस्तर- अतीत से आगत- संदर्भ ग्रंथ, सूत्र साहित्यिक पत्रिका में संपादन सहयोग, पं. बाल गंगाधर स्मृति सम्मान, सूत्र साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था में सचिव। विगत 20 वर्षों से कविता, आलेख, छायाचित्रों का दैनिक समाचार पत्रों एवं साक्षात्कार, नया ज्ञानोदय, अक्षरा परिवेश, सूत्र, सर्वनाम, वागर्थ सहित विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में कविता का प्रकाशन। संप्रति- जनसंपर्क संचालनालय रायपुर में मुख्य छायाचित्रकार। मोबाइ: 9826666657

राजेश उत्साही

जन्म- 30 अगस्त, 1958, मिसरोद, भोपा, मप्र शिक्षा- राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र तथा हिंदी साहित्य में स्नातक, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर। कार्य - मप्र की अग्रणी शैक्षिक संस्था एकव्य में 1982 से कार्यरत। वर्तमान में एकव्य में वरिष्ठ संपादक। एकव्य द्वारा संचालित विज्ञान एवं तकनॉलोजी फीचर सर्विस 'स्रोत' में प्रबंध संपादक, द्विमासिक शैक्षणिक पत्रिका 'शैक्षणिक संदंर्भ में संपादन सहयोग। प्रकाशन - नन्हा- कहानी, खट्टा-मीठा: फिपि बुक, कौन कहां से आए जी- कविता पोस्टर, प्रज्ञा- सांपा द्वारा प्रकाशित घुकथा संग्रह 'स्वरों का विद्रोह', 'आलू मिर्ची चाय जी' व 'खिडक़ी वाला पेट' कविता एनसीईआरटी की पांचवीं कक्षा की पर्यावरण अध्ययन पाठ्यपुस्तक में सम्मिति। पता- ई-7/58,अशोका हाउसिंग सोसायटी, अरेरा कालोनी, भोपाल, मप्र, पिन-462016। फोन : 0775- 2422795, mobil : 91-09893663677

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