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Sep 4, 2026

संस्मरणः भाऊ जी

  - सुदर्शन रत्नाकर     

नाम तो उनका दरिया दित्ता था, हम सब उन्हें भाऊ जी कहा करते थे। मझोला कद, गेहुँआ रंग लिए गठीला बदन, मुंडा सिर। खादी की सफेद धोती, हल्के भूरे रंग का कुर्ता। पाँवों में खड़ाऊँ। सर्दी -गर्मी हमेशा यही वेशभूषा। अधिक सर्दी होने पर सुबह और रात्रि में सफेद लोई ओढ़ लेते। दिन के समय धूप में बैठ जाते। वह प्रभात बेला में उठकर नहा लेते और साथ में  अपने कपड़े भी धो लेते थे। बचपन में हमें लगता था कि वह कभी नहाते ही नहीं। उनके निवास स्थान के सामने ही सार्वजनिक नल लगा हुआ था। सुबह होते ही पानी लेने वालो का ताँता लग जाता। गुसलखाना न होने के कारण उन्हें नल के नीचे ही नहाना पड़ता था; इसलिए वह लोगों के आने से पहले ही सारे काम निपटा लेते। जब तक सूर्य निकलता वह चाय पीकर अपना काम शुरू कर देते थे। पीले रंग के काग़ज़ों पर काली स्याही से उर्दू में लिखते। उनकी लिखाई मोतियों के समान थी। जैसे छपी हुई हो। वह किसी उर्दू पत्रिका के लिए लिखा करते थे। यही उनकी जीविका का साधन था। 

भारत विभाजन के बाद पानीपत में विस्थापितों के लिए मॉडल टाउन का निर्माण किया गया था। अन्य परिवारों की तरह उनका परिवार भी वहाँ आकर बस गया। माता-पिता बहनें सब थे, पर वे ठहरे संवेदनशील और स्वाभिमानी। उनकी सौतेली  माँ का व्यवहार उनकी बड़ी बहन और उनके साथ अच्छा नहीं था। बहन की शादी हो चुकी थी। एक दिन माँ की कोई बात उनके मन को भीतर तक छीज गई। पिता ने भी उनका साथ नहीं दिया। बस रूठकर बहन के पास चले गए।नकुछ समय वहाँ रहे फिर पिता उन्हें मनाकर ले आए; लेकिन वह परिवार के साथ नहीं रहे। घर में बाहर के कमरे में वह अकेले रहने लगे। कमरे में बिछी दरी, कोने में रखा बिस्तर और गिनती के सात बर्तन। बस यही थी उनकी गृहस्थी। जब वे वहाँ आए थे, पैंतीस के आसपास वसंत देख देख चुके थे। विवाह उन्होंने जीवन पर्यंत नहीं किया।

भाऊजी की छोटी सौतेली बहन मुझसे एकाध वर्ष छोटी रही होगी। मोहल्ले की सारी लड़कियाँ मिलकर खेला करती थीं। सब घरों के आँगन साझा थे।घरों में कोई दीवार नहीं, कोई बाड़ नहीं। सबके घर से रास्ता निकलता था। भाऊजी की इस बहन से उनकी थोड़ी बातचीत हो जाती थी। सबसे छोटी थी, वह भी उनसे स्नेह करती थी। एक दिन खेलते-खेलते भाऊजी से सामना हो गया। बस उनकी पकड़ में आ गईं।

 “सारा दिन खेलती हो, कुछ पढ़ भी लिया करो। कल से स्कूल से आने के बाद मेरे पास पढ़ने आ जाना।” उन्होंने समझाते हुए कहा।

तब शायद पाँचवीं या  छठी में रही हूँगी। उस समय  स्कूल में जो पढ़कर आते थे, बस वही पढ़ाई होती थी। शेष दिन खेलकूद में निकल जाता। वैसे पढ़ने -लिखने का शौक  था;  इसलिए अगले दिन स्कूल से आकर खाना खाया और बस्ता उठाकर पहुँच गई उनके पास। सारा बस्ता खोलकर सामने रख दिया। उन्होंने ने कहा, जो कुछ स्कूल में पढ़कर आई हो, पहले उसे पढ़ो। सारे विषय पढ़ लिये और जब मैथ्स की बारी आई तो  भाऊजी ने कहा, पहले टेस्ट होगा। पाँच सवाल दिए, जिसमें अच्छी तरह से तो याद नहीं पर शायद एक या दो ग़लत हो गए। उन्होंने बड़े प्यार से दोनों सवाल समझा दिए। बस फिर तो ऐसा सिलसिला चला कि उसके बाद मैथ्स में सबसे अधिक रुचि हो गई। बाक़ी के विषय एक बार पढ़ने से कंठस्थ हो जाते थे। अंग्रेज़ी बड़े भैया पढ़ाते और बाक़ी का समय भाऊ जी के पास मैथ्स करने में ही निकल जाता। उन दिनों गर्मी की छुट्टियाँ जुलाई से सितंबर तक हुआ करती थीं। पूरे अढ़ाई महीने की। बस छुट्टियाँ होते ही भाऊ जी एक मोटी कॉपी मँगवाते और हमारी क्लास शुरू हो जाती। बड़ी क्लास में पाठ्यक्रम की पुस्तक में हर तरीक़े के सवालों में हल करने के लिए दो चार उदाहरण होते थे पर पीताम्बर लाल की मैथ्स की बुक में  पचास -साठ सवाल होते थे। सारी छुट्टियों में उस किताब के सारे सवाल उस कॉपी में हल कर लिये जाते। यानी सारा स्लेबस खत्म। बात यहीं ख़त्म नहीं होती थी। प्रत्येक सप्ताह टेस्ट होता और स्कूल खुलने के बाद सारे सवालों की पुनरावृत्ति। भाऊ जी की इतनी कड़ी मेहनत का परिणाम यह रहता कि हर परीक्षा में मैथ्स में पूरे अंक आते और टीचर से शाबाशी।

धीरे-धीरे उनके पास और लड़कियाँ भी पढ़ने के लिए आने लगीं। लड़कों को कम पढ़ाते थे, उन्हें लगता था कि लड़के शरारतें अधिक करते हैं, पढ़ते कम हैं। डाँट भी नहीं सहते। भाऊ जी पहले तो प्यार से सवाल समझाते थे; लेकिन पुनरावृत्ति के बाद सवाल हल करने में गलती हो जाए, तो डाँटते भी बहुत थे और डाँटने के बाद प्यार से मीठी गोलियाँ भी खाने को देते थे। उनके घर में आम और अमरूद का पेड़ लगा हुआ था। अमरूद के पेड़ के कच्चे अमरूद तोड़कर ख़ूब खाती थी। कुछ टहनियाँ इस तरह से उलझी हुई थीं कि वहाँ बैठने की जगह बन जाती, बस उस पर बैठकर पढ़ती भी और अमरूद भी खाती। आम के पेड़ का तना बहुत मोटा और ऊँचा था। बार- बार उस पर चढ़ने की कोशिश करती पर नाकामयाब रहती। एक दो बार गिर भी गयी। फिर  प्रयास करना छोड़ दिया।

भाऊ जी आम तोड़कर अख़बार में लपेटकर रख लेते और जब हम पढ़ने के लिए जाते तो खाने को दे देते।

वह पढ़े लिखे तो कम थे; लेकिन मैथ्स का उनका ज्ञान अपरिमित था। यह ज्ञान उन्होंने अपने तक सीमित नहीं रखा, हम बच्चों में फ़्री में दिल खोलकर बाँटते थे। मैं तब नौवीं कक्षा में थी। एक बार हमारी मैथ्स की टीचर मिस ठाकुर से एक सवाल हल नहीं हुआ। उन्होंने ईमानदारी से कहा कि वह इसका हल बाद में बताएँगी। भाऊजी ने मुझे वह सवाल पीताम्बर लाल की पुस्तक से  करवा रखा था। मैंने डरते-डरते उनसे कहा कि मैं इस सवाल को कर सकती हूँ, उन्हें बुरा नहीं लगा। मैंने उनकी आज्ञा से वह सवाल ब्लैक बोर्ड पर हल कर दिया। उनके पूछने पर मैंने बता दिया कि हमारे भाऊजी ने यह सवाल करवा रखा है। धीरे-धीरे वह चर्चित होने लगे। कुछ और लड़कियाँ भी आने लगीं। शाम को समय कम रहता था; इसलिए मुझे और एक और लड़की को सर्दी के मौसम में सुबह चार बजे बुलाने लगे। दिसम्बर-जनवरी का महीना और सुबह चार बजे उठकर जाना किसी सज़ा से कम नहीं था, उसपर तुर्रा यह कि ज़र्रा -सी देर हुई नहीं कि डाँट पड़ जाती। मुझे तो सिर्फ़ सड़क पार करनी होती थी। पिताजी उठा देते और मैं भागकर चली जाती। दूसरी लड़की प्रमिला का घर पीछे की गली में था, उसे उसके दादा जी छोड़ने आते। एक दिन मैंने नाराज़ होकर कहा कि आप हमें ही क्यों सुबह बुलाते हैं। उनका उत्तर सुनकर मेरी नाराज़गी दूर हो गयी। बोले, “तुम घर के सामने रहती हो और हक़ से कह भी सकता हूँ। तुम्हारे रहने से बाक़ी के बच्चे भी आ जाते हैं, उन्हें कोई संकोच नहीं होता।” उन्होंने मुझे सदैव छोटी बहन -सा प्यार दिया।

वह किसी से फ़ीस नहीं लेते थे और न ही किसी के घर जाकर पढ़ाते थे। पर एक बार उन्हें जाना पड़ा। हमारे मोहल्ले में एक वकील रहा करते थे, जो मोहन लाल वकील के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने उनके पास आकर हाथ जोड़कर बड़े आग्रह से कहा कि उनकी बेटी रमन के दो महीने में दसवीं के पेपर हैं और इस समय उसे आपके सहयोग की अत्यंत आवश्यकता है। उनके इस आग्रह के आगे उन्होंने अपने नियम को तोड़ दिया। दो महीने बड़ी मेहनत से उसे पढ़ाया,  पेपर अच्छे हो गए। परीक्षा फल के दिन उन्हें भी प्रतीक्षा थी; क्योंकि यह पहली बार था कि उनकी पढ़ाई किसी लड़की ने बोर्ड की परीक्षा दी थी। सारा दिन निकल गया, उन्होंने कोई सूचना नहीं दी कि परीक्षा फल कैसा रहा है। उनसे रहा नहीं गया, तो वह शाम के समय उनके घर चले गए। उन्होंने देखा वहाँ दो और अध्यापक बैठे थे, जो रमन को विज्ञान और अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। वे लोग उन दोनों की ख़ूब आवभगत कर रहे थे। भाऊ जी को उन्होंने पूछा ही नहीं। बस नम्बर बता दिए। वह वहीं से खड़े-खड़े ही आ गए। उनके इस व्यवहार से उनका दिल टूट गया। संवेदनशील तो थे ही। मन को बात चुभ गई कि  जिन्होंने पैसे लेकर पढ़ाया है, उनकी इतनी आवभगत और फ़्री पढ़ाने वाले का तिरस्कार। पहले तो उन्होंने सोचा वह पढ़ाना ही छोड़ देंगे; लेकिन उनके सेवा भाव के जज़्बे ने उनको आज्ञा नहीं दी। यदि लोग समझते हैं कि फ़ीस लेकर पढ़ाने वाले टीचर्स का ही सम्मान होता है, तो यही सही।

बस उन्होंने न चाहते हुए भी बच्चों से ट्यूशन फ़ीस लेनी शुरू कर दी। पर मुझसे फिर भी नहीं ली। फ़ीस भी क्या थी केवल दो रुपये हर मास। सस्ते ज़माने में भी दो रुपये बहुत कम थे। पर उन्होंने इससे अधिक फ़ीस कभी नहीं ली और न ही किसी के घर में जाकर पढ़ाया, चाहे कितना भी पैसे का लालच दिया हो। पैसे से अधिक उनके आत्मसम्मान की बात थी। जिसको बनाए रखने के लिए वह सदा सतर्क रहते थे। पूरी ज़िंदगी उनके चरित्र पर उँगली उठाने का साहस किसी ने नहीं किया।

अगले वर्ष मेरी बोर्ड की परीक्षा थी। भाऊजी ने ख़ूब मेहनत करवाई। उस समय हमारे मैथ्स विषय के साथ हाउस होल्ड भी होता था, जिसमें सौ में से सत्तर अंक का मैथ्स रहता था और मैंने दोनों में शत प्रतिशत अंक लेकर गुरु दक्षिणा के रूप में उन्हें खुश होने और गर्व करने का अवसर दिया था।

कॉलेज में दाख़िला लिया। बचपना वैसा ही बरक़रार था। विषय बदल गए; पर भाऊ जी के पास जाना नहीं छोड़ा। उनके साथ -साथ मैं भी कभी-कभी बच्चों को पढ़ा देती थी। धीरे-धीरे पढ़ाई की व्यस्तताएँ बढ़ती गईं। स्कूल में नौकरी करते समय  मुझे नौवीं और दसवीं कक्षा को पढ़ाने के लिए मैथ्स विषय दिया गया, जबकि मेरे विषय अलग थे। प्राचार्या मेरे बारे में जानती थीं और मैंने भी भाऊ जी की दी शिक्षा के बल पर उन्हें निराश नहीं किया।

विवाहोपरांत स्थान, परिस्थितियाँ सभी कुछ बदल गया। पिताजी के पास जाने पर उनसे ज़रूर मिलतीं। वह ख़ुश हो  जाते। बाद में पता चला- स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वह बड़ी बहन के पास चले गए हैं। 

   भाऊजी दिल से गए तो कभी नहीं, पर गृहस्थी, नौकरी, बच्चों की परवरिश के उत्तरदायित्व के बोझ के नीचे यादें धुँधली ज़रूर पड़ गईं । बरसों बाद वह लौटकर आए थे। सौभाग्य से भतीजी की शादी के कारण मैं भी वहीं थी। मिलने आए तो लगा बचपन लौट आया है। बहुत सारी बातें साझा की पर  मैं उन्हें विवाह का निमंत्रण देना ही भूल गई। भूल भी ऐसी कि बरसों के बाद भी उसकी किरचें आज भी चुभती हैं। अकस्मात् वह उसी रात चल बसे। भूल सुधारने का मौक़ा ही नहीं मिला। बस यह शब्दांजलि ही अर्पित कर सकती हूँ।

ज़हन में उठते सवालों के हल में भाऊ जी आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित हैं, जिनसे मैंने ज्ञान के साथ अनुशासित, संयमित और स्वाभिमान से जीने  का पाठ सीखा था। ■

सम्पर्कः ई 29, नेहरु ग्राउंड, फरीदाबाद 121001

4 comments:

  1. बहुत बढ़िया संस्मरण है। बड़े सौभाग्य से मिलते हैं इतने अच्छे गुरु। आप बहुत भाग्यशाली हैं आपको उनसे पढ़ने को मिला। मेरा भी कोटि कोटि नमन श्रेष्ठ गुरु जी को। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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    1. Anonymous10 September

      आप सही कह रही हैं वंदना जी ।आभार सुदर्शन रत्नाकर

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  2. बेहतरीन संस्मरण, हार्दिक शुभकामनाएँ।

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    1. Anonymous17 September

      बहुत-बहुत धन्यवाद

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