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Sep 4, 2026

कविताः मृत्यु, तू जब भी आना...

  - डॉ. पूनम चौधरी

मृत्यु,

तू जब भी आना, दबे पाँव आना।

इतना धीरे

कि न टूटे

मेरे घर की हवा का संतुलन।

न काँपे तेरी आहट से

तुलसी की पत्तियों पर ठहरी ओस।

घर के कोनों में न भर देना

अचानक से खालीपन।

बस मेरे  स्पंदन को

बन जाने देना स्मृति।


मैं केवल एक देह,

एक नाम,

एक स्त्री नहीं हूँ।

मैं फैली हूँ—

उस दाम्पत्य में

जो शब्दों से नहीं,

साथ बिताए समय के 

अवक्षेप से बना है;

जहाँ एक के अंतर्मन में उठा

अल्पतम कंपन भी

दूसरे तक

बिना किसी उच्चारण के 

पहुँच जाता है।

 

उन अदृश्य आश्रयों में,

जहाँ मेरे बच्चे

अपनी पराजय,

अपने भय

और अपने अनकहे दुःख

मेरी हथेलियों पर रखकर

निश्चिंत हो जाते हैं।

 

अपनी माँ की प्रार्थनाओं में,

जहाँ मैं आज भी

उनकी चिंता का 

सबसे कोमल कारण हूँ।

 

अपने विद्यार्थियों की

उत्सुक आँखों में,

जो अपने

नन्हे हाथों से

वर्णमाला का 

पहला स्वर साध रहे हैं।

 

आँगन का हरसिंगार,

खिड़की की गौरैया,

दरवाज़े पर बैठा वह बूढ़ा कुत्ता—

ये सब मेरे जीवन के बाहर नहीं,

मेरे जीवन के विस्तार हैं,

जो मेरे होने को

किसी परिचय के बिना 

पहचान लेते हैं।

 

इसलिए, मृत्यु,

तू जब भी आना,

दबे पाँव आना।

 

मुझे पता है,

मेरा जाना भी

इस व्यवस्था का स्वाभाविक क्रम है

 

किन्तु

हर प्रस्थान का होता है 

एक ऋतु-विज्ञान,

हर विदाई की होती है एक गरिमा।

 

बस तब आना,

जब मेरे हिस्से का प्रेम

पहुँच चुका हो

अपने समस्त आश्रयों तक।

 

जब मेरी उपस्थिति से बड़ा हो गया हो

मेरे होने का अर्थ। 

जब आना,

तो किसी वज्रपात की तरह मत आना।

 

आना

जैसे पका हुआ फल

शाख से अलग होता है।

 

आना

जैसे नदी

बिना किसी शोर के

सागर में

अपना नाम विसर्जित कर देती है।

 

आना

जैसे दीप

अपने होने को 

प्रकाश में बदल 

फिर स्वयं

निस्पंद हो जाता है।

 

वैसे ही 

मेरे जाने के बाद

मेरे हिस्से की करुणा,

मेरे हिस्से की ऊष्मा,

मेरे हिस्से का विश्वास

उनके जीवन में बना रहे।

 

और जब कभी

मेरी अनुपस्थिति उन्हें छुए,

तो वह दुःख नहीं,

साहस में बदल जाए।

 

बस तब

ले चलना—

जब मन में

कुछ भी अवशेष न हो।

 

न कोई ऋण,

न कोई अनुताप,

न कोई मोह,

न कोई आकुल पुकार।

 

केवल यह संतोष हो

कि जीवन ने जो मेरे हाथों में सौंपा था,

उसे थोड़ा और सार्थक बनाकर

लौटा दिया। ■

7 comments:

  1. वाह कितनी सुंदर भावनाएं हैं आपकी, अपनी मृत्य से कह रही है किसी को कष्ट न हो मेरे जाने से। जीवन से जो मिला उसे सार्थक कर उसे लौटा दिया। अद्भुत रचना। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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  2. Anonymous09 September

    मृत्यु के आव्हान की अच्छी कविता-शुभकामनाएँ।
    बेहतरीन पंक्ति-
    आना
    जैसे पका हुआ फल
    शाख से अलग होता है।
    रमेश कुमार सोनी-रायपुर

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  3. धन्यवाद सर

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  4. Anonymous10 September

    अप्रत्यक्ष में अपने भीतर बहुत कुछ कहते सुंदर भाव समेटे भावपूर्ण कविता।बहुत सुंदर । हार्दिक बधाई। सुदर्शन रत्नाकर

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  5. Anonymous10 September

    Nice lines

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  6. योग दर्शन में अभिनिवेश या मृत्यु भय एक क्लेश है जिससे हर कोई भयभीत रहता है, उस मृत्यु को सहज ढंग से न केवल स्वीकार करना अपितु उससे यह आग्रह करना कि जब भी आना इस प्रकार आना कि जीवन का संतुलन न टूटे, कहीं कोई रिक्तता न रहे... अद्भुत। ये एक बहुत शांत मन की कविता है। डॉ.पूनम को बहुत बहुत बधाई।

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