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Aug 1, 2026

दो संस्मरणः

- अंजू खरबंदा

 1.कपड़े सुखाना भी एक कला है

हाँ, बिल्कुल है! सच्ची! किंग्जवे कैम्प में गली में लोहे की तारें या रस्सियाँ बंधी रहती थीं कपड़े सुखाने के लिए। कुछ महिलाएँ तो जल्दबाज़ी में कपड़े सूखने डालतीं, पर कुछ बड़े ही सिस्टेमैटिक वे में कपड़े सुखातीं।

एक तार पर पुरुषों की सफेद झक्क बनियानें बड़े ही करीने से चमचमातीं, तो दूसरी तार पर पुरुषों की हल्के रंग की कमीज़ें! बीच-बीच में आकर उन्हें अलटा-पलटी करना। फिर एक पंक्ति में जेंट्स के फाटे वाले कच्छे (उस समय यही ट्रेंड हुआ करता था) और दूसरी तार पर पतलूनें। फिर आती लेडिज कपड़ों की बारी। रंग-बिरंगी खूबसूरत सलवार-कमीज।

चुन्नी सुखाना तो हम बच्चों के लिए मानो खेल ही होता। दो बच्चे चुन्नी के दो-दो सिरे लंबाई में पकड़ लेते और गाने- गाते हुए चुन्नी सुखाते।

मेरी एक दीदी चुन्नी सुखाने को चैलेंज की तरह लेती। खूब अच्छे से चुन्नी सुखाना, कोई सिलवट न रहने पाए, उसका कोना-कोना अच्छे से चेक करना कि गीला न रह गया हो। फिर खूब जतन से उसे तह करके सँभालकर रखना। उस ज़माने में हम लोगों के घरों में अलमारियाँ नहीं हुआ करती थीं। हर कपड़े को करीने से तह करके ट्रंक में रखा जाता था।

कई साइज़ के अलग-अलग ट्रंक हुआ करते थे।

सबसे बड़ा ट्रंक मेरी दादी के दहेज का था। उसमें घर भर की रजाइयाँ रखी जाती थीं और दादी के दहेज के पीतल के बड़े बर्तन, जिन्हें साल भर में एक बार कलई जरूर करवाया जाता। वह ट्रंक इतना बड़ा था कि जब सालाना सफाई के लिए उसे बाहर धूप में रखा जाता, तो हम पाँचों भाई-बहन उसमें घुस जाते। तब दादी से खूब डाँट पड़ती।

"नामुराद ओत्रो! ट्रंक भज पोसी!"

और नए कपड़ों का ट्रंक, जिसे मेरी दादी हाथ तक लगाने नहीं देती थीं, जब खुलता, तो हम आसपास मजमा लगाकर खड़े हो जाते और कौतूहल से पूछते,"दादी, हम ये नए कपड़े कब पहनेंगे?"

दादी हर बार एक ही जवाब देतीं, "जब कोई शादी-ब्याह होगा, तब पहनना।"

और कपड़े वहीं पड़े-पड़े छोटे हो जाते और हम मन मसोसकर रह जाते।

सर्दियों में रजाई के उछाड़ यानी गिलाफ धोने-सुखाने में बड़ी मशक्कत हुआ करती थी। बड़े-बड़े गिलाफ धोना कोई बच्चों का हँसी-खेल न था। उसे सोडे के पानी में उबालना, साबुन से कुच-कुच करके धोना, पानी में तब तक अघालना, जब तक साबुन अच्छे से न निकल जाए। फिर नील लगाना। उसके बाद दो लोग आ जाते मैदान में। गिलाफ के दोनों सिरे पकड़कर खूब ज़ोर लगाकर निचोड़ते, ताकि खुली धूप में अच्छे से सूखकर कड़क हो जाए।

वाह! सफेद झक्क रजाई के गिलाफ! आनंद ही आ जाता उसे ओढ़कर।

मेरी दादी की आदत थी एक बड़े थाल में पानी डालकर उसी में एक-एक कपड़ा बड़े जतन से रगड़तीं, फिर उस कपड़े को साथ रखी पानी की बाल्टी में डालती जातीं। थाल का पानी मटमैला हो जाता, पर क्या मजाल जो दादी उस पानी को फेंक दें। जब तक उसमें साबुन की ज़रा-सी भी झाग शेष रहती, दादी उसी में कपड़े रगड़ती रहतीं। आखिरकार उस साबुन वाले पानी का उपयोग घर के पोछे आदि धोने में लाया जाता।

कपड़े धोना यानी पूरी दिहाड़ी उसी में गई।

आजकल तो कपड़े मशीन में डाले और निश्चिंत हो गए। धन्य थे पहले के लोग, जो शरीर से इतना काम लेते थे कि उन्हें न तो किसी जिम की आवश्यकता पड़ी, न ही कभी किसी मेड की!

2 . बाबू मोशाय

लंबा, ऊँचा, गौरवर्णीय बंगाली लड़का। पान की गिलौरी मुँह में दबाए जब बोलता, तो इतनी जल्दी-जल्दी बोलता कि आधी बात उसके मुँह में ही रह जाती।

"चटर्जी भैया, धीरे बोलिए न! आपकी आधी बात तो मुझे समझ ही नहीं आई।"

मैं उनकी बात न समझ पाने पर अक्सर शिकायत करती। मेरी बात सुनकर फिस्स से हँस पड़ते। जब वे हँसते, तो उनके गालों में गड्ढे पड़ जाते। उनकी गहरी काली आँखों पर नज़र जाती, तो यूँ लगता मानो वे भी खिलखिलाकर हँस रही हों... सुंदर, मोहक, मनभावन हँसी।

मेरी बात में शिकायत का लहजा पाकर वे अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी ओर देखते। अपने हाथों से होंठों पर उतर आई पान की लाली पर धीरे से हाथ फेरते। उनका दिल होता, तो अपनी बात फिर से दोहराते, नहीं तो हँसकर निकल जाते। पीछे वाला सोचता ही रह जाता कि बंदे ने बोला, तो बोला क्या। उनकी बोलचाल में बंगाली शब्द बहुत होते, जो हम दिल्ली वालों को भला कहाँ समझ आने वाले थे।

वे दिखने में मस्तमौला टाइप के व्यक्ति थे। जाने उनकी कौन-सी क्वालिटी देखकर उन्हें नौकरी पर रखा गया था। न काम करते, न किसी को करने देते। जब देखो, मजमा लगाकर बैठ जाते और सबका हाथ देखने लगते।

हाँ! हाथ देखते हुए उनका खिलंदड़पन एकाएक दार्शनिक व्यक्तित्व में तब्दील हो जाता। उन्हें हस्तरेखाओं की भरपूर जानकारी थी। बड़ी गहराई से हाथों की रेखाएँ पढ़ा करते।

उन्हें रत्नों की भी बेहद गहरी समझ थी और उनकी खूब पहचान भी थी। एक नज़र देखते ही समझ जाते कि कौन-सा रत्न असली है और कौन-सा सिर्फ पत्थर!

एक बार मैंने भी उत्सुकतावश अपना हाथ दिखाया। मेरा हाथ देख उन्होंने जो-जो भी बताया, उसे सुनकर मैं खूब हँसी; पर भविष्य में एक-एक बात शत-प्रतिशत सच साबित हुई। जब-जब उनकी बात सच सिद्ध होती, तब-तब वे शिद्दत से याद आते। बीस-तीस बरस आगे का भविष्य बातों ही बातों में बता देने वाला वह शख्स पता नहीं आज कहाँ है।

उनकी मीठी यादें मेरी ज़िंदगी के ख़ज़ाने का अनमोल हिस्सा हैं और उनसे अपनी शादी के लिए बंगाल से मँगवाई एक बंगाली साड़ी भी, जिसे आज भी सबसे ज़्यादा खुशी से पहनती हूँ।

सम्पर्कः 207, द्वितीय तल, परमानंद कॉलोनी, दिल्ली – 110009, मो. 9582404164

9 comments:

  1. स्नेहिल आभार 💐💐

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  2. दोनों संस्मरणों ने मन मोह लिया। पहले भी मोह लिया था। जो संस्मरण विगत के पन्ने खोले, मुझे सदा से ही बातें हैं। तिस पर इस संस्मरण में तो कपड़ों के जरिए रहन-सहन के तौर-तरीकों को भी बेहद सलीकेदार तरीके से बताया है। बिल्कुल ऐसा ही सादा जीवन हमारी पीढ़ी ने जीता है और बेहद सुकून से जीता है। अंजू, विगत से दोबारा परिचय कराने के लिए असीम धन्यवाद।
    मैं भी कई बंगाली परिवारों के सानिध्य में रही। और अंजू ने जैसा विवरण बताया , बहुत अपना सा लगा। अंजू की लेखनी है ही इतनी कमाल की कि वाक्ये संजीव हो उठते है

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  3. Anonymous02 August

    दोनों ही संस्मरण बहुत सुंदर है कपड़े सुखाना भी एक कला है. पुराने दिनों की याद दिला दी. हमने भी ये सब किया है. सभी कपड़े हाथ से ही धोये जाते थे अलटते पलटते भी रहते थे।दूसरा संस्मरण भी बहुत सुंदर सजीव सा लगता है.

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  4. Anonymous02 August

    सही में कपड़े सुखाना एक कला है, मेरी माँ को भी किसी के सुखाए कपड़े पसंद नहीं आते थे वह ऐसे कपड़े सुखाती थी कि उन्हें प्रेस करने की जरूरत हीं नहीं पड़ती थी l बढ़िया संस्मरण

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  5. " कपड़े सुखाना भी एक कला है "

    " कपड़े सुखाना भी एक कला है "

    भारतवर्ष अर्थात अपने ही देश के एक भाग में सैकड़ों वर्षों से स्थिर अपनी जड़ों को निर्दयतापूर्वक उखाड़े जाने के बाद , सबकुछ सहन कर अपने ही देश के इस भाग में फिर से अपनी जमीन ढूंढ कर उसे पकड़ने की जद्दोजहद में हर घर की दिनचर्या को इतने सलीके से परत दर परत वर्णित किया गया है, जैसे शब्द चलचित्र के बदलते दृश्यों में परिवर्तित कर दिए गए हों।
    हर दिन की दिनचर्या में घटित होने वाली सामान्य सी घटनाओं को इतनी रोचकता और आत्मीयता से उकेरा गया है , कि पूरा पदे बिना रुका नहीं गया और कभी मां तो कभी नानी याद आती चली गयी। सुन्दर और वास्तविक संस्मरण ... अंजू कि कलम से।

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  6. Anonymous02 August

    चटर्जी भैया जैसे लोग सच में अपनी छाप सदा के लिए छोड़ जाते है, बढ़िया संस्मरण

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  7. बाबू मोशाय

    जैसे किरदार हमारी जिंदगी में विरले ही आते हैं। किस्मत हमें उनसे जब मिलवा देती है तो विशवास नहीं होता कि कोई ऐसा भी हो सकता है। पर जब वे हमारे पास न होते हुए भी , फिर से होते हैं तो ईश्वरीय चमत्कार पर विशवास करने की इच्छा होती है।

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  8. Anonymous04 August

    बहुत शानदार वर्णन... आज ऑटोमेटिक या सेमी ऑटो वाशिंग मशीन चलाने वाले क्या जानें उस दौर की कपड़े धोने की कला 🥰 चुन्नी या पगड़ी सुखाने वाली बात से बचपन का समय याद आ गया .. जब घर के या पड़ोस के बड़े पगड़ी या चुन्नी दोनों किनारे पकड़ कर सुपर नीचे लहराकर सुख रहे होते तो hm बच्चे बार बार उसके नीचे से गुजरते .. भीगे कपड़े की ठंडी गीली छुअन बहुत मजेदार लगती थी .. अब न समय है और न ही वैसी खुली जगह आंगन या गली जहां कपड़े सुखाये जा सके.. छोटी सी बालकनी में स्टैंड पर कुछ कपड़े डाल दिए जाते हैं. जो वॉशिंग मशीन से लगभग सूख कर ही निकलते हैं

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  9. Anonymous12 August

    कपड़े सुखाना भी एक कला है। रोचक संस्मरण। इस बहाने और भी बहुत सारी बातें जुड़ी हैं, जिन्होंने बीता याद दिला दिया है। अंजु अपने कपड़े मैं आज भी ऐसे ही हाथ से धुलवा कर सुखवाती हूँ ।दुपट्टा सुखाने का भी वही तरीक़ा है। आपके दोनों संस्मरण बहुत बढ़िया हैं । बाबू मोशाय जैसे पात्र कठिनाई से मिलते हैं।सुदर्शन रत्नाकर

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