- डॉ. रत्ना वर्मा
तपती हुई धरती पर जब बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो मिट्टी से आती वह सोंधी खुशबू आत्मा को भिगो जाती है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों को पीछे छोड़ते हुए जब मौसम करवट लेता है, तो सुकून और सुरक्षा का अहसास होने लगता है। इस बदलते मौसम में जब भी हम घर से बाहर कदम बढ़ाते हैं, तो हमारी सबसे पहली जरूरत बनकर आती है- एक अदद छतरी। वह छतरी जो हमें आसमान से बरसते पानी से बचाती है और सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाती है।
मौसम की इस छतरी को देखते हुए कभी-कभी सोचती हूँ कि हमारी जिंदगी का ताना-बाना भी तो कुछ ऐसा ही है। जीवन के जंजालों के बीच जब दुखों, जिम्मेदारियों, तनाव और अनिश्चितताओं की मुसलाधार बारिश शुरू होती है, तब हमें एक ऐसी ही छतरी की जरूरत होती है; लेकिन वह छतरी रंग - बिरंगे कपड़े से नहीं बनी होती, बल्कि वह हमारे बुजुर्गों के अनुभवों, उनके आशीर्वाद और रिश्तों की आत्मीयता से बनी होती है, जो हमें हर मुश्किल घड़ी में भावनात्मक सुरक्षा देती है। बड़े-बुजुर्गों का हमारे सिर पर हाथ रखना, जिंदगी की किसी भी कड़ी धूप या भारी बारिश में एक मजबूत छतरी की तरह ही तो काम करता है।
कहाँ गया वह दौर, जब हमारे परिवार संयुक्त हुआ करते थे। घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति उस विशाल बरगद की तरह होता था, जिसके नीचे पूरा कुनबा सुरक्षित रहता था। जिंदगी में कोई भी संकट आए, रिश्तों में कोई कड़वाहट घुले, बुजुर्गों के अनुभवों की वह छतरी तुरंत खुल जाती थी। उनके कहे दो शब्द कि -चिंता मत करो, हम हैं न, सब ठीक हो जाएगा- किसी भी मानसिक तनाव को पल भर में सोख लेते थे। वह केवल शब्द नहीं होते थे, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा कवच होते थे जो नई पीढ़ी को बिखरने नहीं देते थे। उस दौर में अवसाद, अकेलापन या तनाव जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं थे, क्योंकि हमारे ऊपर अनुभवों की छतरी हमेशा तनी रहती थी।
लेकिन आज के इस आधुनिक और महानगरीय दौर में स्थितियाँ बिल्कुल बदल चुकी हैं। अब तो संयुक्त परिवार ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। दादा-दादी और नाना-नानी की छाँव का मिलना तो बहुत दूर की बात हो गई है। विडंबना देखिए कि आज के परिवारों में माता-पिता तक पीछे छूटते जा रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने, उन्हें बड़ा करने और इस काबिल बनाने में लगा दी कि वे आसमान छू सकें, उनका नाम रोशन करें; लेकिन वही बच्चे पंख उगते ही उनको छोड़कर दूर कहीं उड़ जाते हैं। आज के भारतीय परिवारों में बेहतर करियर और नौकरी के लिए विदेशों में जाकर बसना एक आम बात हो चुकी है। जो देश में रह रहे हैं, वे भी किसी बड़े मेट्रो शहर की अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मजबूरी कहें या जीवनशैली, वे हर जगह अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तब पीछे छूट जाते हैं सूने घर और उन बुजुर्गों की बूढ़ी आँखें, जो सिर्फ त्योहारों पर बच्चों के लौटने का इंतज़ार करती हैं।
यह अलगाव केवल उन बुजुर्गों को अकेला नहीं कर रहा, बल्कि नई पीढ़ी को भी असुरक्षित बना रहा है। जब सिर पर बुजुर्गों की मानसिक सुरक्षा रूपी कवच या उनकी तसल्ली देने वाली छतरी की छाया ही नहीं होगी, बच्चों को दादा- दादी का प्यार और उनके अनुभवों के किस्से- कहानियाँ सुनने नहीं मिलेगी तो वे कैसे एकता, सहयोग, प्रेम और मानवता की भावना को आत्मसात कर पाएँगे। इस तरह तो हमारी यह समृद्ध संस्कृति और परंपराएँ सब पीछे छूटती चली जाएँगी। भला जड़ों से कटकर कोई भी संस्कृति कोई भी परंपरा जीवित रह सकती है?यह एक अजीब विरोधाभास है कि आज हम अपनी गाड़ियाँ, अपने बैंक खातों की सुरक्षा के लिए तमाम तरह के इंश्योरेंस और सुरक्षा कवच खरीदते हैं; लेकिन जो हमारा असली और प्राकृतिक सुरक्षा कवच है -हमारे अपने बुजुर्गों का सानिध्य- जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, उसे हमने खुद ही अपने से दूर कर दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि किताबें और गूगल आपको ज्ञान दे सकते हैं; लेकिन जिंदगी को जीने की समझ और संकटों से लड़ने का धीरज केवल बुजुर्ग दे सकते हैं, जिन्होंने अपनी उम्र के कई सावन और पतझड़ देखे हैं। उनका अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं; बल्कि जिंदगी की भट्टी में तपा हुआ वह सच है जो हमें सही दिशा दिखाता है।
कहना यही चाहती हूँ कि, सावन की इस रिमझिम फुहारों के बीच, खिड़की से बाहर पानी की बूँदों को गिरते हुए जब देखें, तो जरा ठहरकर अपने भीतर अवश्य झांकें- कि जिंदगी की यह मशीनी जैसी दौड़ और दूसरों से आगे निकलने की अंधी प्रतियोगिता हमें किस ओर ले जा रही है। कहा जाता है कि जो पेड़ अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वे पहली ही भारी बारिश या तूफान में धराशायी हो जाते हैं। यही बात इंसानी रिश्तों और समाज पर भी लागू होती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी जिंदगी इस मशीनी युग में भी हरी-भरी और जीवंत बनी रहे, तो हमें अपने घरों में, अपने समाज में अनुभवों की उस छतरी को फिर से सहेजकर खोलना होगा। बुजुर्गों के आशीर्वाद वाले उन हाथों का सम्मान करना होगा; क्योंकि जब तक वह छतरी हमारे सिर पर तनी है, तब तक चाहे आँधी- तूफान हो या मूसलाधार बारिश, हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।


प्रकृति के संग जीवन परिवेश का सुन्दर चित्रण
ReplyDeleteनमस्कार शुक्रिया
Deleteअनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश। बारिश और छतरी के रूपक के माध्यम से आज की सच्चाई को इतने मार्मिक ढंग से लिखा है कि मन भीग -भीग-सा गया है। समाज का आईना दिखाता बेहतरीन सम्पादकीय। भौतिक सुखों की आड़ में युवा पीढ़ी अपने संस्कारों को भूल रही है ।भागते जीवन में कहीं साँस लेने की फुर्सत ही नहीं।पहले माता-पिता को छोड़ा और अब बच्चे छोड़कर जा रहे हैं। फिर उनके बच्चे छोड़ जाएँगे। कितनी पीढ़ियाँ अकेली होती जा रही हैं। संयुक्त परिवार सपना हो गए है। भूले- भटके जिन परिवारों में माता-पिता साथ रहते भी हैं तो अपने ही घर में असहज से रहते हैं। बरगद (छतरी)नहीं रहे वो, अनुभवों की बारिश को बच्चे महसूस ही नहीं करते तो आनंद कहाँ से लेंगे। स्वस्थ समाज के लिए बदलाव आवश्यक है। युवा पीढ़ी को जागरूक करता बहुत सुंदर आलेख। सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteआदरणीय सुदर्शन रत्नाकर जी, आपकी यह अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक टिप्पणी सीधे दिल को छू गई। हर अंक में आपकी नियमित उपस्थिति और रचनाओं की इतनी सूक्ष्म व गहरी समीक्षा हमारे लिए किसी अनमोल थाती से कम नहीं है।
Deleteआपने 'छतरी और बारिश' के रूपक को जिस तरह विस्तार देते हुए आज की एकाकी होती पीढ़ियों और बिखरते संयुक्त परिवारों के दर्द को रेखांकित किया है, उसने इस विषय की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। यह सच है कि जब तक युवा पीढ़ी इन 'बरगद' रूपी अनुभवों की छांव को महसूस नहीं करेगी, तब तक समाज में स्वस्थ बदलाव आना मुश्किल है।
लेखन की सार्थकता तब और बढ़ जाती है जब आपके जैसे प्रबुद्ध और संवेदनशील पाठक उसे इस गहराई से आत्मसात करते हैं। हमारी हर वैचारिक यात्रा में निरंतर साथ बने रहने और अपनी लेखनी से हमारा मार्गदर्शन करने के लिए आपका हृदय से आभार एवं धन्यवाद।
आदरणीया
ReplyDeleteबहुत सामयिक विषय को छुआ है आपने। इस दौर में तो रिश्तों की बात बेमानी होकर रह गई है। वो दौर और था जब रिश्ते सिद्धांत हुआ करते थे। अब तो हो गए हैं सुविधा। Commitment से Convenience. आदमी उपयोगी हो तो कढ़ी पत्ते के समान उपयोग करो। Use & throw. कुल मिलाकर :
- इस दौर में वफ़ा की बात मत कर ग़ालिब
- वो दौर और था जब मकान कच्चे और लोग सच्चे थे
एक अत्यंत ज्वलंत विषय पर सारगर्भित संपादकीय हेतु हार्दिक बधाई। सादर : विजय जोशी
आदरणीय विजय जोशी जी, सादर नमस्कार। लंबे समय बाद 'उदंती' के पन्नों पर आपकी गरिमामयी उपस्थिति देखकर अत्यंत हर्ष हुआ। व्यस्तताओं के बीच से वक्त निकालकर अंक को पढ़ने और इतनी बेबाक प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हृदय से आभार।
Deleteआपने आज के उपभोक्तावादी दौर में रिश्तों की जिस कड़वी हकीकत को बयां किया है, वह समाज का सबसे बड़ा सच है।
कच्चे मकानों और सच्चे लोगों का वह दौर बेशक पीछे छूट रहा है, लेकिन आप जैसे सुधी पाठकों की वैचारिक ऊर्जा ही हमें ऐसे ज्वलंत विषयों पर लिखने का हौसला देती है। आपकी आत्मीय सराहना के लिए पुनः बहुत-बहुत धन्यवाद।
आधुनिक होने की दौड़ में अकेलेपन का दर्द बढ़ता ही जा रहा है फलस्वरूप वृद्धाश्रम की संख्या बढ़ी है।
ReplyDeleteएक बेहतरीन लेख है, बधाई।
समाज को चिंतन करना होगा।
आपकी इस सटीक और गंभीर टिप्पणी के लिए हृदय से धन्यवाद।आधुनिकता और तथाकथित प्रगति की अंधी दौड़ में हमने जो कुछ भी खोया है, उसमें सबसे कीमती हमारे पारिवारिक मूल्य और अपनों का साथ ही है। जब तक समाज इस विषय पर गहराई से आत्मचिंतन नहीं करेगा और अपनी जड़ों की ओर नहीं लौटेगा, तब तक यह दर्द कम नहीं होगा।
ReplyDeleteडॉ. रत्ना वर्मा जी का यह लेख केवल बुजुर्गों के महत्व की बात नहीं करता, बल्कि बदलते समय में बिखरते पारिवारिक मूल्यों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है। "छतरी" का रूपक अत्यंत प्रभावी है, जो अनुभव, स्नेह और सुरक्षा के भाव को सहजता से पाठक तक पहुँचाता है। संवेदनशील भाषा और जीवन-सत्य से जुड़ा यह लेख आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
ReplyDeleteनंदा जी, लेख की मूल भावना और "छतरी" के रूपक को इतनी गहराई से समझने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद। आपकी यह सारगर्भित और आत्मीय समीक्षा हमारे इस वैचारिक प्रयास को सार्थक बनाती है। 'उदंती' के प्रति अपना यह स्नेह हमेशा बनाए रखिएगा। सादर आभार!
Deleteइस समय को तो मैं शिद्दत से चाहती हूँ, वापस आ जायें। उस समय बारिश का एक अलग ही लुफ़्त होता था। बहुत बहुत भीगा-भीगा मन हो गया है। इस रचना के लिए असीम बधाई आपको
ReplyDeleteशुक्रिया अंजू जी
Deleteमन को छू गई गहरे तक , संयुक्त परिवार, मन के किसी कोने को आज भी भिगो जाती है वो स्मृतियाँ , दादा दादी का दुलार, बुआ का लाड़ और भाई बहनों का प्यार तकरार । उनका आस-पास होना ही पावन तीर्थ का अहसास ।
ReplyDeleteबचपन की उन पावन स्मृतियों और संयुक्त परिवार के उस अनमोल दुलार को शब्दों में सहेजने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद। आपकी इस सुंदर टिप्पणी ने सचमुच यादों के उस तीर्थ को और जीवंत कर दिया है। 'उदंती' के साथ ऐसे ही दिल से जुड़े रहिएगा। सादर आभार!
Deleteजीवन का मौसम बिगड़ गया। कोई मानसून अब उदास कोनों को नहीं छू पाता। अपनापन कहीं गुम हो गया। साधन कम रहें, लेकिन संबंधों की ऊष्मा बनी रहे. पता नहीं आने वाली पीढ़ी इसे कितनी दूर तक ले जाएगी! रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु '
ReplyDeleteआदरणीय हिमांशु जी, "संबंधों की ऊष्मा" और खोते जा रहे अपनेपन का यह दर्द आपकी इस टिप्पणी के माध्यम से सीधे दिल को छू गया। साधन और संवेदना के इस संतुलन को आपने बहुत गहराई से रेखांकित किया है। मेरे शब्दों के मर्म को इस तरह आत्मसात करने और अपनी सुंदर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हृदय से आभार!
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ReplyDeleteरत्नाकर जी का बेहतरीन संपादकीय। बारिश , छतरी और हमारे स्नेहिल संबंध, बड़ों के स्नेह की छतरी अनिवार्य है । युवा पीढ़ी का बड़ा होना , पर संस्कारों का छाता नहीं होगा तो युवा पीढ़ी भटक सकती है । संसार के झंझावातों और बारिश को रोकने के लिए छाते से संबंधों की आवश्यकता है ।बरगद सी घनेरी छाँव चाहिए जिससे विपरीत मौसम का सामना कर सकें । जीवन आनंद प्राप्त करने के लिए छतरी आवश्यक है ।
ReplyDeleteविभा रश्मि
विभा जी, "संस्कारों के छाते" और "बरगद सी घनेरी छाँव" के जरिए आपने संदेश को बहुत ही सुंदर विस्तार दिया है। संसार के झंझावातों से बचने के लिए बड़ों का स्नेह वाकई अनिवार्य है। इस खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए आपका हृदय से आभार!
Deleteआज के युवाओं को दिशा निर्देश देती हुई बेहतरीन संपादकीय। आज के युवा स्वच्छंद जिंदगी जीने के लिए अपने माता-पिता की अवहेलना करते हैं और यही कारण है कि वह अकेलेपन डिप्रैशन एंजायटी जैसे बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं। बुजुर्गों के अनुभवों की छतरी के नीचे वे सुरक्षित रह सकते हैं। संयुक्त परिवार व्यक्ति को मानसिक संबल देता है। किसी भी मुश्किल घड़ी में उन्हें टूटने नहीं देता। यह बात आज के युवाओं को समझनी होगी।
ReplyDeleteनमिता सिंह 'आराधना'
जीवन को समझने मे पूरा जीवन कम है...अनुभव साझा करने औऱ अपनी गलतियों को सुधारने का मौका नहीं मिल पाता ...अगर ये बात समय रहते समझ पाएँ तो सुख और आनंद दोनों हमारे ही पास है...
ReplyDeleteरत्ना दी,
ReplyDeleteवर्तमान समय पर सटीक बहुत ही हृदय स्पर्शी लेख आपने लिखा है
पर क्या ??? हम स्वयं... _इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं हैं.
जब बच्चों को हमें अच्छे संस्कार देने चाहिए थे तो शायद हमने..
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संस्कार से कहीं ज्यादा उन्हें अपनी महत्वाकांक्षा के ऊंचे पंख दिये.
यूँ ही आपकी लेखनी बेहतरीन लेख रचती रहे_
🙏🙏
विवेक दुबे सलाहकार आयकर, वित्त एवं निवेश
बहुत ही सुंदर एवं सार्थक लेख.... वर्तमान की स्थिति इतनी संवेदनशील हो गई है कि... धैर्य भी नहीं रहता...
ReplyDeleteआपने सभी वर्ग के पाठकों का मार्गदर्शन किया है..... 🙏