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May 1, 2026

लघुकथाः अगोचर

 - भीकम सिंह 

अचानक उसने पहाड़ी से उतरते हुए भेड़-बकरियों का रेवड़ देखा, जो किसी डर से ओक-बुरांश के पेड़ों से बचता-बचाता दौड़े चला जा रहा था - बाऽऽ.... बाऽऽ.... बाऽऽ....

एक पल उसने मनीषा की ओर देखा जो एक बकरी के बच्चे को अपनी छाती से चिपकाए जी-जान से रेवड़ को रोकने की कोशिश कर रही थी। वह अभी कुकीना स्वाल पर रेवड़ के साथ कुछ देर और रहना चाहती थी, किंतु एक गुलदार (तेंदुए) को जाने मनीषा के रेवड़ से क्या ले जाना था कि ओक की ओट में घात लगाने लगा।  बहादुर मनीषा ने चिल्लाकर गुलदार को दुत्कारा, फिर भी वह न टला तो ओक यह देखकर अपनी जान से खेल गया और जड़ों से उखड़कर उसी पर गिर पड़ा... उसके साथ उसकी टहनियाँ  और पत्ते भी। गुलदार अपनी चोटों से कराहता मोनाल टॉप की ओर भागा... और रेवड़ कुकीना खाल की ओर... दोनों एक-दूसरे के विपरीत दिशा में।

मनीषा ने अपनी सांसें बटोरकर ओक से कहा, "ऐसा क्यों किया?" ओक ने पत्तियाँ  झपकाई और दो कदम नीचे खिसक गया... उसकी जड़ें जमीन के बाहर निकल आईं।

मनीषा को समझ नहीं आया।

मनीषा कुकीना खाल पर रेवड़ के साथ अकेली ही आती थी, किंतु इस कदर जंगल उसके साथ जुड़ा था... यह उसे आज अहसास हुआ...


3 comments:

  1. Anonymous02 May


    बहुत सुन्दर,हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  2. Anonymous04 May

    Bhut sunder sir ji

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  3. Anonymous05 May

    बहुत सुंदर, एक अलग तरह की बढ़िया लघुकथा। हार्दिक बधाई।सुदर्शन रत्नाकर

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