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Apr 1, 2026

तुतलाहट: भाषा का प्रथम संगीत

- जयप्रकाश मानस

हर भाषा के आरंभ में एक अस्फुट स्वर होता है - जैसे कंठ से नहीं, आत्मा से निकलता कोई अधूरा राग। वही तुतलाहट है।

बच्चे का पहला बोलना, जीवन की पहली कविता है,  जो किसी व्याकरण में नहीं आती, लेकिन सबके भीतर छिपी होती है। शायद मनुष्य का सबसे सच्चा बोलना वही है, जिसमें सार्थकता से पहले स्नेह होता है।

बच्चे के पहले शब्द किसी पुस्तक से नहीं, जीवन से निकलते हैं। वे तुतलाहटें हैं - जैसे किसी झरने ने अभी-अभी बोलना सीखा हो। उनमें अर्थ नहीं, आकांक्षा बोलती है।

हर अधूरा शब्द एक छोटे ब्रह्मांड की तरह है, जहाँ भाषा जन्म नहीं लेती; बल्कि घटती है - धीरे-धीरे, अपने ही भीतर से उजागर होती हुई।

जब हम बच्चे के साथ तुतलाते हैं, तो उसके बोलने की नकल नहीं करते - बल्कि भाषा के जन्म में सहभागी बनते हैं। जैसे कोई कवि अपनी कविता के बनने की आहट सुनता है। वह पल शिक्षण का नहीं, 'साक्षात्कार' का होता है - जीवन के उस आरंभ का, जहाँ शब्द और मौन अब तक एक ही चीज़ हैं।

तुतलाहट भाषा से पहले का संगीत है। यह उस काल की ध्वनि है, जब शब्द अभी अर्थ नहीं बने, वे केवल धड़कन थे। बच्चे की बोली में व्याकरण नहीं, लय होती है। उसके साथ तुतलाना, उस लय में सम्मिलित होना है - बिना किसी श्रेष्ठता के भाव के। उस क्षण में संवाद नहीं, सहभागिता होती है।

संचार का सबसे सुंदर रूप वह है, जो शब्द बनने से पहले घटता है।

हर तुतलाहट एक बीज है - भविष्य की भाषा का बीज। हम जब उसे सुनते हैं, तो उसके बोलने में सहायता नहीं करते; बल्कि उसके भीतर सुनने की शक्ति को जगाते हैं; क्योंकि भाषा की जड़ बोलने में नहीं, सुनने में है। इसीलिए शायद बच्चे की हर भूल में एक नयी सृष्टि की झलक होती है।

कभी-कभी अधूरे शब्द ही सबसे पूरा अर्थ कहते हैं।

तुतलाहट मौन और भाषा के बीच की वह सीढ़ी है, जिस पर हर मनुष्य एक बार अवश्य चढ़ता है। हर गलत उच्चारण, हर हँसी, हर झिझक - उस सीढ़ी का एक पायदान है। जब हम उसके साथ तुतलाते हैं, तो सिखाते नहीं, साथ चलना सीखते हैं।

क्योंकि मनुष्य पहले साथ बोलना सीखता है, फिर अलग अलग भाषाएँ बोलने लगता है। और शायद यही तुतलाने का सबसे गहरा अर्थ है  कि भाषा का जन्म हमेशा दो आवाज़ों से होता है - एक बच्चे की, और दूसरी हमारे भीतर के बच्चे की।

जब हम किसी बच्चे के साथ तुतलाते हैं, तो हम उस आरंभ की ओर लौटते हैं, जहाँ भाषा अभी किसी राष्ट्र या धर्म की नहीं थी - बस मनुष्यता की थी। हर ‘पा-पा’, हर ‘मा-मा’ में वही आदिम संवाद छिपा है, जो पृथ्वी के पहले मनुष्य ने हवा से किया होगा।

तुतलाना, दरअसल, स्मरण का कर्म है - उस प्रथम सृजन का, जब शब्द अबोध थे, पर मनुष्य सबसे बुद्धिमान।

2 comments:

  1. Anonymous03 April

    हम किसी बच्चे के साथ तुतलाते हैं, तो हम उस आरंभ की ओर लौटते हैं, जहाँ भाषा अभी किसी राष्ट्र या धर्म की नहीं थी - बस मनुष्यता की थी। बहुत सुंदर बात ।रोचक आलेख। सुदर्शन रत्नाकर

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  2. तुतलाहट का अपना अलग मजा है, ये हमें अपने बचपन की ओर ले जाता है।
    बेहतरीन आलेख- बहुत बधाई।

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