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Jan 1, 2026

आलेखः शोर में डूबता जीवन

हेडफोन की आदत और बिगड़ता स्वास्थ्य

- संध्‍या राजपुरोहित 

आधुनिक जीवन की गति इतनी तीव्र हो चुकी है कि व्यक्ति अपने ही भीतर सिमटने लगा है। हेडफोन आज हर उम्र के हाथ में दिखते हैं सड़क पर चलते हुए, बस में बैठे या रात की नीरवता में मोबाइल स्क्रीन के सामने। संगीत, पॉडकास्ट, गेम या रील यह सब अब हमारे कानों की दुनिया में स्थायी रूप से बस चुके हैं। पर क्या हम यह समझ रहे हैं कि यह सुविधा धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य, व्यवहार और संवेदनशीलता को निगल रही है?

तकनीक ने मनुष्य के जीवन को अत्यंत सुविधाजनक बना दिया है। मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट ने हमें आपस में जोड़ा है, दुनिया को हमारी हथेली पर ला खड़ा किया है। परंतु इस सुविधा के साथ एक अदृश्य खतरा भी धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य को घेरे में ले रहा है और वह है हेडफोन का बढ़ता उपयोग। आज हेडफोन आधुनिक जीवन का प्रतीक बन चुके हैं। चाहे यात्रा हो या व्यायाम, ऑनलाइन क्लास हो या दफ्तर की मीटिंग, हर उम्र का व्यक्ति इनसे जुड़ा है। यह आवश्यकता धीरे-धीरे एक आदत में और फिर लत में बदलती जा रही है। भारत सहित पूरी दुनिया में हेडफोन का बाजार लगातार बढ़ रहा है।

कभी गाँवों में पत्तों की सरसराहट, पक्षियों की चहचहाहट और बहते पानी की ध्वनि मन को शांति देती थी। आज इन प्राकृतिक स्वरों की जगह इलेक्ट्रॉनिक बीट्स ने ले ली है। हमारी पीढ़ी वह संगीत सुन रही है जो सुकून नहीं देता, बल्कि उत्तेजना पैदा करता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ शोर अब मनोरंजन नहीं, बल्कि निर्भरता बन चुका है। आज जब हर जगह तेज़ आवाज़ों का साया फैला है, तब यह समझना जरूरी है कि यह “मौन खतरा” हमारी पीढ़ी को भीतर से कमजोर कर रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक अन्‍य रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में लगभग एक अरब से अधिक युवा प्रतिदिन अत्यधिक आवाज़ में संगीत सुनने के कारण भविष्य में सुनने की क्षमता खोने के खतरे में हैं। भारत में भी यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। 2024 की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, शहरी युवाओं में से लगभग 78 प्रतिशत प्रतिदिन चार घंटे से अधिक समय तक हेडफोन का उपयोग करते हैं। कई विद्यार्थी और किशोर तो दस-दस घंटे तक इनसे जुड़े रहते हैं। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि शहरी युवाओं में लगभग 15 प्रतिशत लोग आंशिक सुनने की समस्या से जूझ रहे हैं, जिसका मुख्य कारण हेडफोन का अत्यधिक उपयोग है।

दिनभर कानों में गूँजती आवाज़ें, न केवल श्रवण तंत्र को क्षतिग्रस्त करती हैं बल्कि मस्तिष्क पर निरंतर दबाव भी डालती हैं। यही कारण है कि आजकल 'साइलेंस' का अर्थ ही बदल गया है हम शोर के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि बिना आवाज़ हमें बेचैनी घेर लेती है।

डॉक्टरों का मानना है कि लंबे समय तक हेडफोन में तेज़ संगीत सुनने से श्रवण नाड़ी को स्थायी हानि पहुँचती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति को 'टिनिटस' (कानों में निरंतर घंटी या आवाज़ की अनुभूति) जैसी समस्या हो सकती है। धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होती जाती है, और व्यक्ति को अपने आसपास की ध्वनियाँ धुंधली लगने लगती हैं। इस समस्या की भयावहता यह है कि इसका प्रभाव धीरे-धीरे होता है,  न दर्द, न कोई स्पष्ट लक्षण, बस एक अदृश्य मौन जो भीतर घर करता चला जाता है।

कान मानव शरीर का अत्यंत संवेदनशील अंग है। इसकी अंदरूनी झिल्ली और नसें तेज़ ध्वनि के प्रति अत्यंत नाजुक होती हैं। जब हम लगातार 85 डेसिबल से अधिक ध्वनि पर संगीत सुनते हैं, तो धीरे-धीरे ये नसें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 100 डेसिबल पर केवल पंद्रह मिनट सुनना भी हानिकारक हो सकता है, जबकि 120 डेसिबल की ध्वनि, जो कई हेडफोन और नाइट क्लबों में सामान्य मानी जाती है, कुछ ही मिनटों में स्थायी हानि पहुँचा सकती है। 

हेडफोन का यह शोर केवल कानों तक सीमित नहीं है; यह मन और व्यवहार तक पहुँच चुका है। जो ध्वनि हमें सुकून देती थी, वही अब हमें बाहरी दुनिया से काटने लगी है। बातचीत कम हो रही है, आत्मीय संबंधों में दूरी बढ़ रही है, और हर व्यक्ति अपने छोटे-से डिजिटल संसार में कैद होता जा रहा है। एक ओर तकनीक हमें जोड़ने का दावा करती है, वहीं यह हमें हमारे आसपास के लोगों से दूर कर रही है। “वर्चुअल कनेक्शन” के इस युग में वास्तविक संवाद का अभाव सबसे बड़ा मौन संकट बनकर उभरा है।

लंबे समय तक ईयरबड्स कान में लगाए रखने से कानों में हवा का आवागमन रुक जाता है। यह नमी और बैक्टीरिया के पनपने का कारण बनता है, जिससे फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण बढ़ने की संभावना रहती है। कानों में खुजली, दर्द, सूजन या मवाद जैसी समस्याएँ आज के युवाओं में आम हो चुकी हैं। तेज़ बीट्स वाले संगीत से मस्तिष्क की तरंगें लगातार उत्तेजित रहती हैं, जिससे ध्यान की एकाग्रता और स्मरण शक्ति दोनों प्रभावित होती हैं। 

हेडफोन का असर शरीर के अन्य हिस्सों पर भी दिखाई देने लगा है। ब्लूटूथ या वायरलेस हेडफोन के लंबे उपयोग से सिरदर्द, चक्कर और थकान की शिकायतें आम हो गई हैं। मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन पर झुककर बैठने से गर्दन और कंधों में जकड़न बढ़ जाती है। लगातार ध्वनि के संपर्क में रहने से न केवल एकाग्रता में कमी आती है, बल्कि बच्चों और किशोरों में व्यावहारिक चिड़चिड़ापन भी देखा जा रहा है। सड़क सुरक्षा की दृष्टि से भी यह खतरनाक प्रवृत्ति है। 

परिवहन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर वर्ष लगभग पंद्रह सौ से अधिक दुर्घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनमें हेडफोन लगाए व्यक्ति चेतावनी संकेत या हॉर्न नहीं सुन पाते। रात में हेडफोन लगाकर संगीत सुनना या वीडियो देखना भी नींद की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करता है। जब मस्तिष्क को विश्राम की आवश्यकता होती है, तब लगातार ध्वनि तरंगें उसे सक्रिय रखती हैं। इससे गहरी नींद नहीं आती और व्यक्ति सुबह थका हुआ महसूस करता है। धीरे-धीरे यह आदत तनाव, चिड़चिड़ापन और स्मरण शक्ति की कमजोरी का कारण बन जाती है।  

भारत का बदलता शहरी परिदृश्य इस समस्या की जद में है। मेट्रो, बस, पार्क, जिम हर जगह लोग अपने-अपने संगीत संसार में खोए दिखाई देते हैं। भीड़ में रहकर भी एकांत का यह रूप सामाजिक दूरी को बढ़ा रहा है। यह स्थिति विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों व आदिवासी समाज में देखने को मिल रही है , जहाँ जो समाज मूल रूप से सामुदायिक ध्वनियों पर आधारित समाज है-गीत, नृत्य, पर्व-त्योहार, वाद्ययंत्र और समूह-प्रदर्शन इसकी सांस्कृतिक धुरी हैं। लेकिन बदलती तकनीक के साथ हेडफोन, विशेषकर युवाओं में, “स्टाइल” और आधुनिक पहचान का प्रतीक बन गए हैं। 

पिछले पाँच–सात वर्षों में सस्ते स्मार्टफोन और डेटा पैक ने इस प्रवृत्ति को और इन इलाकों में तेज़ किया है। अब स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों के साथ-साथ खेतों में काम करते समय, चराई पर जाते हुए या गाँव के रास्तों पर चलते हुए भी युवक-युवतियाँ हेडफोन लगाए दिखाई देते हैं। यह बदलाव केवल एक उपकरण का उपयोग नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक संक्रमण का संकेत है, जिसमें निजी मनोरंजन सामुदायिक ध्वनि-संस्कृति पर हावी होता जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप न सिर्फ सामाजिक संवाद कमजोर पड़ रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का स्थानीय संगीत और सांस्कृतिक मूल्यों से स्वाभाविक जुड़ाव भी कम होता जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन शिक्षा और मोबाइल गेम्स ने बच्चों को भी हेडफोन से जोड़ दिया है। आठ से चौदह वर्ष की आयु में जब उनकी श्रवण शक्ति और मानसिक विकास पूर्ण रूप से नहीं होता, तब तेज़ आवाज़ और लंबे उपयोग का प्रभाव कई गुना अधिक होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बच्चे प्रतिदिन एक घंटे से अधिक हेडफोन का उपयोग करें, तो सुनने की क्षमता में गिरावट, ध्यान की कमी और व्यवहारिक असंतुलन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

अब समय है कि हम इस अदृश्य खतरे को समझें और अपनी संवेदनशीलता को पुनः जगाएँ। संगीत सुनें, पर अपने कानों और मन की सुनने की क्षमता को न खोएँ, क्योंकि जीवन की असली धुन वही है जो हम अपने आस-पास के लोगों, प्रकृति और स्वयं से जुड़कर सुनते हैं।

सम्प्रति - 20 वर्षो से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में आदिवासी अंचल में शिक्षकों व आदिवासी बच्‍चों के साथ जीवन कौशल शिक्षा कार्य से सम्‍बद्ध है। 

 stat.ujjain@gmail.com  मो: 9479514722

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