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Sep 1, 2022
नवगीतः सारे बन्धन भूल गए
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- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ स्नेह सिंचित सारे सम्बोधन याद रहे काँटों ने कितना बींधा वह चुभन भूल गए। चुपके से रक्ताभ हथेली क...
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कविताः हमें बेखौफ उड़ने दो
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- डॉ. शिप्रा मिश्रा डरते हैं हम अपनी आँखें खोलने से डरते हैं हम अपनी पाँखें खोलने से उस घूरने वाले से हम काँप जाते हैं उसके गंद...
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चिंतनः जीवन के कुछ पल
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– साधना मदान खुराक आज सुबह उठते ही अलमस्त हवाओं में साँस लेने ही लगी थी कि पुरानी बात चाय की प्याली की तरह जीभ पर लहराने लगी। ये बातें कभ...
व्यंग्यः आप कौन से अतिथि हैं
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- राजेंद्र वर्मा अतिथि शब्द सुनते ही मन में घबराहट-सी होने लगती है , क्योंकि वह बिना तिथिवाला ठहरा। अतिथि का अर्थ ही होता है- जिसके आने क...
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कविताः धरोहर के रूप में
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- डॉ. लता अग्रवाल पास की थी जब मैट्रिक प्रथम श्रेणी में अखबार की सुर्खियों में था नाम उठाते हुए अखबार नम थी आँखें आपकी तब पूछा थ...
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