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Feb 1, 2022
कविता- ज्ञानदायिनी माता मेरी नैया पार लगा दो
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-डॉ. कमलेन्द्र कुमार श्रीवास्तव दूर- दूर तक तम ने अपनी , चादर है फैलाई । तरस रहे हम उजियारे को , तम ने कला दिखाई । तम को दूर भगा दो माता ज्...
तीन लघुकथाएँ
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- हरभगवान चावला 1. पहाड़ मैं पहाड़ से लौटने लगा तो पहाड़ ने मेरे साथ चलने की ज़िद पकड़ ली। मैंने लाख कहा मैदान में कुछ भी नहीं पहाड़ ...
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व्यंग्य- चोरी होना कवि- प्रिया की कार का
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- यशवंत कोठारी कवि- प्रिया की कार जो थी, वो चोरी हो गई। कवि प्रिया रूठ गई। कवि घबरा गया, लेकिन कवि- प्रिया की प्रिय कार ढूँढकर लाना कोई...
ग़ज़ल - मेरा सूरज तो कभी ढलता नहीं
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- धर्मेन्द्र गुप्त अपने बारे में कभी सोचा नहीं ठीक से दरपन कभी देखा नहीं भूखे बच्चे को सुलाऊँ किस तरह याद मुझको कोई भी क़िस्सा नहीं आप ...
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जीवन दर्शन - पौराणिक की प्रासंगिकता
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-विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.) बाहर की तू माटी फाँके भीतर मनवा क्यों ना झाँके आधुनिक जन पौराणिक को पुरातन मानत...
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