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Nov 3, 2020
व्यंग्य- दिवाली पर बल्ले-बल्ले! उर्फ किस्सा मुफ़्तेश्वर जी का
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- गिरीश पंकज अफ़सर जी का पूरा जीवन मुफ़्तखोरी का पर्याय बन चुका है । मज़े की बात यह है कि वे अपनी मुफ़्तखोरी पर कस्तूरी मृग की तरह मगन रहत...
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दो ग़ज़लें
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- डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल 1. नन्ही-सी लौ न हो दुख-दर्द का साथी तो तन्हा काट देता है मुसीबत में भी इंसाँ वक़्त अपना काट देता है नहीं...
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कविता - ज्योति जगाएँगे
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- रामेश्वर काम्बोज ‘ हिमांशु ’ शुभ संकल्प हृदय में जागें , दुनिया को सुखी बनाएँगे। रोग-शोक घर-घर से भागें , मिल ऐसी ज्योति जगाएँगे। दी...
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कविता- दीपावली मनाएँ कैसे
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- डॉ. शिवजी श्रीवास्तव अभी दशानन मरा नहीं है प्रियवर , दीप जलाएँ कैसे दीपावली मनाएँ कैसे ? उन्मादी उन्मुक्त निशाचर अट्टहास करते ...
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संस्मरण- नन्ही-सी परी
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- प्रगति गुप्ता सरकारी अस्पतालों की दिनचर्या के बारे में जितना सो चें, उतना ही लगता है कि हम बहुत कम सोच पाए है। इधर से उधर दौड़ते मरी ज़ों ...
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