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May 15, 2020
दु:ख
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दु:ख - पृथ्वीराज अरोड़ा उसने पास जाकर पुकारा , ‘ माँ!’ माँ ने सिलाई– मशीन के रिंग को हाथ से रोकते हुए कहा , ‘ क्या है बेटा ?’ ...
दो लघुकथाएँ
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1. सूरजमुखी खिल उठे -सुदर्शन रत्नाकर दरवाज़े की घंटी बजते ही शीना बिस्तर से उठ कर बाहर आ गई। इतनी सुबह कौन हो सकता है। दरवाजा ...
पाँच लघुकथाएँ
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1 . तिलिस्म -डॉ. शील कौशिक साल भर से अलग रह रहे विनय ने अनुष्का को कॉल किया, “क्या कल तुम ओम सिने गार्डन में मिलने आ सकती हो?”...
तीन लघुकथाएँ
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1. ज़रूरत महेश शर्मा दीवाली की सफाई धूम - धाम से चल रही थी। बेटा-बहू , पोता-पोती , सब पूरे मनोयोग से लगे हुए थे। वे सुबह से ही छत प...
इबादत
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इबादत सतीशराज पुष्करणा रमजान का पवित्र माह चल रहा था । उसी दौरान मुजफ्फरपुर से पटना आने वाली बस में एक सज्जन इत्मीनान से बैठ...
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