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Jul 12, 2011
मेरे बचपन की शाम
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- डॉ. राजीव श्रीवास्तव अठखेलियां करती, खिलखिलाती, कभी हँसाती, कभी रूलाती, बहुत याद आती है, मुझे मेरे बचपन की शाम। शाम का इंतजार सुबह ...
अन्ना के नाम एक पत्र
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- के. पी. सक्सेना 'दूसरे' हम तो बस इतना ही कयास लगा पाये कि यह देश में व्याप्त भ्रष्टाचार नामक 'दानव' को खत्म कर देने ...
लघुकथाएँ
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दुआ वह दफ्तर में था। शहर में दंगा हो गया है, यह खबर ढाई बजे मिली। वह भागा और जिन्दगी में पहली बार शाम का अखबार खरीद लिया। दंगा उसी इलाके ...
उपेक्षित जनकवि बिसंभर यादव 'मरहा'
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- डॉ. परदेशीराम वर्मा बिसंभर यादव मरहा जैसे योद्धा कवि का शरशैया पर लेटे रहना तथा निरुपाय एक- एक दिन गिनना हम सबको लज्जित करता है। समा...
आपके पत्र
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सारगर्भित पत्रिका उदंती के नए अंक में भूले- बिसरे कथाकार भुवनेश्वर की कहानी मास्टरनी पढऩे मिली। पाठकों के लिए यह उपलब्धि है। यह कथाकार का...
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