— एक नेटिव अमेरिकन कहावत
यह कहानी पुनर्जन्म की है- यदि आप ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं। या शायद यह केवल अपनी जड़ों की कहानी है।
उन अदृश्य धागों की कहानी, जो पीढ़ियों को महासागरों, दशकों और कभी-कभी जन्मों के पार भी जोड़ देते हैं।
हाल ही में मुझे काम के सिलसिले में स्पेन के बार्सिलोना जाने का अवसर मिला। मेरे बेटे शिव ने पूछा –“क्या मैं आपके साथ चल सकता हूँ।”
पहले तो मैं थोड़ा झिझका। मेरा कार्यक्रम अक्सर व्यस्त और अनिश्चित रहता है और किसी विदेशी देश के होटल के कमरे में बारह वर्षीय बच्चे को अकेला छोड़ना मुझे उचित नहीं लगा। लेकिन शिव अपनी जिद पर अड़ा रहा और सच कहूँ, तो मुझे भी उसके साथ कुछ निर्बाध समय बिताने का अवसर अच्छा लगा।
मैंने कल्पना की थी कि यह यात्रा पिता-पुत्र की यादों से भरी होगी—बार्सिलोना की घुमावदार गलियों में घूमना, स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेना, छोटी-मोटी खरीदारी करना, अनिवार्य रूप से एक एफ.सी. बार्सिलोना की जर्सी खरीदना और सग्रादा फ़मीलिया की भव्यता को निहारना।
और अधिकांशतः ऐसा ही हुआ।
शिव के साथ यात्रा करना आनंददायक था। बच्चे दुनिया को एक अलग दृष्टि से देखते हैं। उनकी जिज्ञासा साधारण क्षणों को भी रोमांचक बना देती है। एक ही दिन में वह यात्री से मार्गदर्शक बन गया। मैं उसके पीछे-पीछे चलता, और वह तय करता कि हमें कहाँ जाना है, क्या देखना है और सबसे महत्त्वपूर्ण- क्या खाना है। उसके अनुसार हर अवसर पर जिलेटो खाना चाहिए!
और यदि आसपास जिलेटो न मिले, तो मैकडॉनल्ड्स हमेशा मौजूद था। उसके लिए चिकन नगेट्स एक ऐसी भाषा थे जिसे पूरी दुनिया समझती है।
लेकिन शहर में घूमते हुए मैंने एक और बात पर ध्यान दिया।
हम जहाँ भी होते, जिस विषय पर भी बात कर रहे होते, शिव किसी न किसी तरह बातचीत को भारत की ओर मोड़ देता। पहले मुझे लगा कि यह केवल सामान्य बातचीत का हिस्सा है; लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझे महसूस हुआ कि बात इससे कहीं गहरी है।
यह एक ऐसा लड़का था, जिसका जन्म और पालन-पोषण अमेरिका में हुआ था। जिसकी दुनिया अमेरिकी स्कूलों, उपनगरीय मोहल्लों, खेल के मैदानों और आधुनिक जीवनशैली से बनी थी। फिर भी वह भारत के बारे में जिस आत्मीयता और अपनत्व से बात करता था, वह बात उसकी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व लगती थी।
वह भारतीय इतिहास, संस्कृति, प्राचीन राजवंशों, युद्धों, स्वतंत्रता संग्राम और हमारे पारिवारिक वंश के बारे में बातें करता। उसे यह जानने में गहरी रुचि थी कि हमारे पूर्वज कौन थे, उन्होंने कैसा जीवन जिया और हम कहाँ से आए।
हर शाम, जिलेटो के कप हाथ में लिये, हमारी बातचीत सदियों और महाद्वीपों की यात्रा करने लगती। वह इतिहास के तथ्य सुनाता, विचारोत्तेजक प्रश्न पूछता और अपने खोजे हुए नए-नए प्रसंग साझा करता।
जितना अधिक मैं उसे सुनता, उतना ही महसूस करता कि यह केवल जिज्ञासा नहीं थी। यह एक संबंध था।
उसके भीतर कुछ ऐसा था, जो एक ऐसी भूमि से बँधा हुआ था जिसे उसने वास्तव में कभी जाना ही नहीं था। भारत उसके लिए केवल एक देश नहीं था। वह एक ऐसा घर था जिसे मानो उसका मन कहीं गहराई से पहचानता था।
यात्रा की अंतिम शाम तक मैं सोचने लगा था कि यह गहरा लगाव आया कहाँ से। ऐसा कैसे हो सकता है कि अमेरिका में पला-बढ़ा एक बालक उस देश से इतना जुड़ाव महसूस करे, जहाँ उसने जीवन के केवल कुछ दिन बिताए हों?
हमारी अंतिम दोपहर थी। हम ‘ला राम्बला’ सड़क पर टहल रहे थे कि अचानक शिव रुक गया। वह मुड़ा और एक छोटी-सी दुकान में चला गया।
जिज्ञासावश मैं भी उसके पीछे हो लिया।
दुकान में न कोई फुटबॉल जर्सी थी, न कोई स्मृति-चिह्न, न ही जिलेटो।
शिव बिना कुछ कहे सीधे विक्रेता महिला के पास गया और शो-केस की ओर इशारा किया।
महिला मुस्कुराई और कोने की एक शेल्फ से एक विशेष टोपी निकाल लाई।
एक बहुत विशेष टोपी।
जैसे ही उसने वह टोपी शिव को थमाई, उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।
और उसी क्षण मुझे सब समझ में आ गया।
मेरे दादाजी- जिन्हें हम सब प्यार से पिताजी कहते थे- लगभग हर दिन एक आयरिश टोपी पहनते थे। शिव ने उन्हें कभी नहीं देखा था। वह उन्हें केवल एक पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर में जानता था, जो मेरे पिता के लैपटॉप में सुरक्षित थी।
फिर भी, वर्षों बाद और घर से हजारों मील दूर बार्सिलोना की एक दुकान की खिड़की में उसने वही टोपी पहचान ली।
और वह उसे चाहता था; इसलिए नहीं कि वह फैशन में थी।
इसलिए नहीं कि वह आकर्षक दिखती थी; बल्कि इसलिए कि वह उसे उसके परदादा की याद दिलाती थी।
दुकान से बाहर निकलते ही शिव अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहा था।
“पापा,” उसने कहा, “जब से मैंने वह तस्वीर देखी है, मैं ऐसी ही टोपी चाहता था।”
उसे याद था…
एक तस्वीर…
एक चेहरा जिसे उसने कभी नहीं जाना।
एक व्यक्ति, जो उसके जन्म से बहुत पहले इस दुनिया से जा चुका था।
और फिर भी, वह उनसे जुड़ाव महसूस करता था।
हम आगे बढ़ते रहे। मैं उसे देखता रहा। वह गर्व से टोपी को अपनी बाँह के नीचे दबाए चल रहा था। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो बच्चों के चेहरे पर क्रिसमस की सुबह दिखाई देती है।
मैंने आसमान की ओर देखा। अचानक मुझे अपने गाल पर पानी की एक बूँद महसूस हुई। शायद बारिश थी।
शायद नहीं।
और उस शांत क्षण में, बार्सिलोना के हृदय में खड़ा, मैं पिताजी के बारे में सोचने लगा-
चार पीढ़ियाँ।
एक तस्वीर।
एक टोपी।
एक अदृश्य धागा, जो एक अमेरिकी जन्मे बालक को उस व्यक्ति से जोड़ रहा था, जिसने अपना पूरा जीवन भारत में बिताया था।
लेकिन जब मैंने शिव को अपने आगे चलते देखा, अपने परदादा की स्मृति को साथ लिये हुए, तो मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।
पिताजी, शिव से मिलिए।
आपका परपोता।
उसका जन्म महासागर के उस पार हुआ है, लेकिन किसी रहस्यमय ढंग से वह आपका एक अंश अपने भीतर लिये हुए है।
और बिल्कुल आपकी तरह, वह भी उस टोपी में बहुत अच्छा लगता है।
सम्पर्कः वर्जीनिया, यू एस ए, Email: shashipadha@gmail.com

अत्यंत रोचक।पहले भी कहीं पढ़ा था पर दूसरी बार पढ़ने पर भी उतनी ही जिज्ञासा बनी रही।ऐसी मान्यता है कि आत्माएँ घूम फिरकर उसी परिवार में जन्म लेती हैं । बहुत सुंदर प्रसंग। अनुवाद भी बहुत सुंदर है। सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना, यह मूल रचना किस भाषा में है? अनुवाद अच्छा किया है आपने कहीं भी रचना का आनंद बाधित नहीं हुआ है । मान्यताएं अपनी अपनी होती हैं वैसे तो आप इसे सीधे सीधे पुनर्जन्म से जोड़कर भी रोमांचित हो सकते हैं ।इसके अतिरिक्त अगर परंपरागत मान्यताओं पर विश्वास करें तो बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि कोई भी बालक अपनी पिता की सात और माता की पाँच पीढ़ियों से गुण गृहण करता है! कुल जमा बहुत बढ़िया रचना पढ़ाकर बहुत अच्छा लगा 🙏
ReplyDeleteTouching my heart a nice tale of Indian diaspora
ReplyDelete