भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वह हमारे घर- परिवार, समाज और पूरे देश के लोगों की दिनचर्या में रचा- बसा हुआ है। अभी- अभी हमने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पर्व रंगारंग होली का त्योहार मनाने के बाद नवसत्संवर, नवरात्रि और फिर रामनवमी का त्योहार बड़े ही धूम- धाम से मनाया है। पूरा देश रंगों से सराबोर होकर श्रद्धा, भक्ति और आस्था में डूबा हुआ था; परंतु क्या आपने कभी ये सोचा है कि हमने नौ दिनों तक जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा अर्चना की, देवी के लिए लाल चुनरी, चूड़ियाँ, सिंदूर, आलता और जेवर चढ़ाकर हवन - पूजन किया और पूजा समाप्ति के बाद इनमें से बहुत कुछ पूजा सामग्री जैसे- फूल- मालाएँ, कपड़े, प्लास्टिक, थर्माकोल, रंग- रोगन वाली मूर्तियाँ और भी बहुत सारी चढ़ावे की सामग्री नदी और तालाब में यह कहते हुए विसर्जित कर देते हैं कि यह पूजा की पवित्र सामग्री है, इसे यूँ ही कहीं भी नहीं फेंका जा सकता।
यहीं एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। क्या हमने कभी गंभीरता से यह सोचा है कि जिन जलस्रोतों को गंगा मैया और नर्मदा मैया कहते हुए पूजते हैं, वे हमारे ही हाथों से धीरे-धीरे विषैले बनते जा रहे हैं? वे आज दुर्गंध और गंदगी के कारण उपयोग के योग्य भी नहीं बचे। आखिर यह स्थिति आई क्यों? यह सब किसी एक व्यक्ति या समुदाय की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक उपेक्षा का परिणाम है।
दरअसल समस्या आस्था में नहीं है, समस्या आस्था की हमारी समझ में है। हमारी परंपराओं में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि पूजा के नाम पर प्रकृति को नुकसान पहुँचाया जाए; बल्कि इसके उलट भारतीय दर्शन में तो प्रकृति को देवतुल्य माना गया है- पृथ्वी माता, जल देवता, वायु देव और अग्नि देव। जब हम इन्हें देव या माता के रूप में पूजते हैं, तो इन्हें प्रदूषित करने का विचार भी मन में नहीं ला सकते।
आज आवश्यकता है कि हम आस्था और अपने धार्मिक विश्वास को इस अंधविश्वास में न बदलें कि पूजन- सामग्री का जल में विसर्जन ही अनिवार्य है। इस सोच को बदलना जरूरी है। पूजा के बाद जो सामग्री प्राकृतिक रूप से नष्ट हो सकती है- जैसे फूल, पत्ते, लकड़ी, राख, मिट्टी के दीपक और मूर्तियाँ- उन्हें मिट्टी में ही मिलाया जा सकता है। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य का सरल और सम्मानजनक तरीका है, जिससे न आस्था को ठेस पहुँचती है और न पर्यावरण को हानि होती है। और जो वस्तुएँ नष्ट नहीं होतीं- जैसे भगवान के वस्त्र, सजावटी आभूषण, मुकुट, चुनरी, कृत्रिम फूल- उन्हें नदी या तालाब में डालना किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता। आज देश भर में कई सामाजिक संस्थाएँ और स्वयंसेवी संगठन ऐसी पूजा- सामग्री को एकत्र कर उसका पुनः उपयोग या रिसाइक्लिंग कर रहे हैं। इससे न केवल रोजगार के अवसर पैदा होते हैं; बल्कि जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने में भी मदद मिलती है। यह एक व्यावहारिक और सकारात्मक समाधान है, जिसमें आस्था भी सुरक्षित रहती है और पर्यावरण भी। कुछ मंदिरों में अलग- अलग डब्बे रखकर भक्तों को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है, पर यह कार्य अभी इतने प्रारंभिक स्तर पर है कि इस छोटे से प्रयास मात्र से नदी तालाब को प्रदूषित होने से बचाया नहीं जा सकता।
अतः यह विषय केवल पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार, समाज और आम नागरिक- सभी को इसमें अपनी - अपनी भूमिका निभानी होगी। पूजा स्थलों के पास संग्रह केंद्र, स्पष्ट दिशानिर्देश और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए और उनके पालन में भी सख्ती बरतनी चाहिए। कुछ वैसे ही सख्त नियम कि एक दिन हमारा देश भी न्यूजीलैंड की तरह उदाहरण के रूप में रेखांकित किया जा सके। ज्ञात हो कि न्यूजीलैंड में पर्यावरण को लेकर नियम और कानून इतने सख्त हैं कि वहाँ कोई व्यक्ति पानी को प्रदूषित करने के बारे में सोच भी नहीं सकता।
सोशल मीडिया जागरूकता का अच्छा माध्यम हो सकता है; लेकिन वास्तविक बदलाव तब आएगा जब हम अपने घरों में, अपने बच्चों को छोटी उम्र से यह सीख देंगे कि पूजा का अर्थ प्रकृति को कष्ट देना नहीं; बल्कि उसका सम्मान करना है। जिस दिन यह समझ आम हो जाएगी, उस दिन नदियाँ भी स्वच्छ होंगी और हमारी आस्था भी। इसके लिए हमें आज अपने पूजा-पाठ के तरीकों में थोड़ा-सा बदलाव लाने की आवश्यकता है। भगवान को फूलों से ढकने की बजाय उनके चरणों में एक फूल चढ़ाकर भी हम अपनी आस्था व्यक्त कर सकते हैं। हवन- पूजन के बाद जली हुई राख को आपने बगीचे या गमलों में डालकर मिट्टी को और अधिक उपजाऊ बना सकते हैं। यदि प्रतिवर्ष आप अपने भगवान के वस्त्र और आभूषण बदलते हैं, तो उन्हें नदी या तालाब में विसर्जित मत कीजिए, इन सबको इकट्ठा कीजिए और उनके लिए रोजगार का माध्यम बनिए, जो इन वस्तुओं का उपयोग करके आपके लिए खूबसूरत सजावटी सामान तैयार करते हैं।
यदि हमने अपनी आस्था में इन छोटी- छोटी कुछ बातों को जीवन में ढाल लिया, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, जीवित नदियाँ और सच्ची आस्था- तीनों सौंप सकते हैं। तो आइए, हम यह संकल्प लें कि भक्ति निभाते समय प्रकृति की रक्षा करेंगे, क्योंकि नदियाँ तभी माँ की तरह हमें स्नेह करेंगी, जब हम उन्हें साफ- सुथरा रखते हुए, कल – कल कर बहते हुए रहने देंगे।■


आस्था,विश्वास,जागरूकता ...सभी का सामंजस्य होना ही हमारी परम्परा को आगे बढ़ा सकती है...वर्ना हमारे अस्तित्व की रक्षा खतरे मे पड जायेगी..
ReplyDeleteनदी, तालाब जैसे जल स्रोत में व्याप्त प्रदूषण पानी के विकसित होते बाजार से होने लगा है। तालाब गांव के होते थे जिन्हें साफ सुथरा रखा जाता था। अब वे सरकार के स्वामित्व में आ गये। नदियां तो कचरा ढोने वाली बन चली हैं।
ReplyDeleteसदैव की तरह आपका सम्पादकीय एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं समसामयिक विषय पर है। कैसी विडंबना है कि जैसे- जैसे हम उन्नति कर रहे हैं, हम स्वच्छता के बारे में पिछड़ रहे हैं। सब कुछ जानकर भी अनजान बन ग़लतियाँ करते जा रहे हैं।नियम तो बनें ही पर ऐसी भावना मन में स्वतः उत्पन्न होनी चाहिए। नहीं तो दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।
ReplyDeleteजागरूक करते बेहतरीन आलेख के लिए साधुवाद। सुदर्शन रत्नाकर
Very true and important fir all to read
ReplyDeleteअच्छा आलेख, आस्था पर भारी पड़ता जा रहा है प्रदूषण।
ReplyDeleteजागरूकता बेहद जरूरी है।
सत्य कहा आपने....अत्यंत महत्वपूर्ण संपादकीय..
ReplyDeleteमैंने आपकी यह पोस्ट पढ़ी और इसमें मुझे बहुत सीधी-सादी लेकिन असरदार सोच दिखाई दी। आपने जिन भावों को लिखा है, उनमें एक अपनापन और जीवन की असल झलक मिलती है। मुझे अच्छा लगा कि आपने बातों को बिना किसी दिखावे के, साफ भाषा में रखा है। हर पंक्ति में एक अनुभव झलकता है जो पाठक को जोड़ लेता है।
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