उदंती.com

Feb 1, 2026

कविताः बीते हुए बसंत की याद में

    - सांत्वना श्रीकान्त

निर्जन वन की तरह ही

मेरी पीठ पर दहकते पलाश के फूल

आती है इनसे पकी हुई फ़सल की गंध

आलिंगन की आँच बिखेरता

अस्त हो रहा सूर्य

सुहागन के आलते जैसा पावन है

तुम्हारा हर एक स्पर्श।

पलाश जो तुम्हारे चुम्बन से

होठों की गोलाई के सहारे

मेरी पीठ पर उग आया है

बड़ी ही शीघ्रता से झरेंगे इसके फूल

लेकिन अगले बसंत के इंतजार में

यह खड़ा रहेगा मौन!

5 comments:

  1. अति सुन्दर रचना बीते हुए वसंत की याद

    ReplyDelete
  2. Anonymous21 February

    निराशा में भी आस है , सुन्दर
    शीला मिश्रा

    ReplyDelete
  3. Anonymous21 February

    बहुत सुंदर कविता । भविष्य को जीवंत बनाता आशावादी दृष्टिकोण। बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

    ReplyDelete
  4. Anonymous21 February

    यह बहुत सुंदर कविता है जिसमें नवजीवन के उमंग के साथ बसंत की पुनः प्रतीक्षा का सुंदर चित्रण है। बधाई!

    ReplyDelete
  5. Anonymous21 February

    यह बहुत सुंदर कविता है जिसमें नवजीवन के उमंग के साथ बसंत की पुनः प्रतीक्षा का सुंदर चित्रण है। बधाई!
    सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल', इंदौर

    ReplyDelete